विचार

View All
Published / 2022-03-04 13:05:15
यूपी चुनाव : दुविधा में रहे मुस्लिम मतदाताओं का लाभ आखिर किसे मिलेगा...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अदिति)। 10 मार्च को यूपी विधानसभा के चुनाव परिणाम आने वाले हैं। महिलाओं और मुस्लिमों वोटरों का रूझान किस ओर रहा। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता इस वक्त दुविधा में हैं। अपनी पहचान की रक्षा करने की उनकी पुरजोर ख्वाहिश और प्रदेश के शासन में उनकी भी बात सुनी जाए, उसको देखते हुए उनके सामने आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को ही वोट देने का विकल्प बचा है जो राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इसके अलावा समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) जैसे परंपरागत राजनीति दलों से ही जुड़े रहने का एक रास्ता बचा है जो शायद अल्पसंख्यकों के हितों का भले ही खुलकर समर्थन नहीं कर पा रहे हों लेकिन वे प्रमुख विरोधी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर हाल में सपा को लेकर सबसे ज्यादा निराशा इस बात को लेकर बढ़ी है कि पार्टी ने आजम खान की लंबी कैद के मुद्दे को ठीक तरह से नहीं उठाया। अदालत द्वारा जमानत देने से इनकार किए जाने के बाद खान जेल से सपा उम्मीदवार के रूप में विधानसभा चुनाव (रामपुर से) लड़ रहे हैं। उनके और उनके परिवार के खिलाफ 104 अदालती मामले दर्ज हैं जिनमें भूमि अतिक्रमण से लेकर बकरी, भैंस और पुस्तकों की चोरी तक के आरोप शामिल हैं। इस समुदाय में इस बात को लेकर काफी अफसोस है कि सपा ने खान के मामले को पुरजोर तरीके से जनता के सामने नहीं उठाया लेकिन मुलायम सिंह यादव अगर पार्टी प्रमुख रहते तब इस मुद्दे पर पार्टी का रुख कुछ और ही होता। वर्ष 2021 में जब वह पहले से ही कई महीनों तक जेल में थे तब सपा ने उनकी रिहाई के लिए एक अभियान शुरू किया था। उनके बेटे अब्दुल्ला इस चुनाव में सपा उम्मीदवार (स्वार) हैं जो हाल ही जेल से रिहा हुए हैं। उन पर कथित रूप से चुनावी दस्तावेजों में गलत जन्मतिथि बताने के आरोप हैं। चुनाव विशेषज्ञ और नेता योगेंद्र यादव कहते हैं, एआईएमआईएम का उभार यह दर्शाता है कि मुसलमान कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के ब्रांड से थक चुके हैं जिस पर सपा और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी अमल करती है। वे वोट बैंक और बंधकों के रूप में अपने समुदाय के इस्तेमाल किए जाने से नाराज हैं। लेकिन अकादमिक जगत से जुड़ी रही और उत्तर प्रदेश की विशेषज्ञ सुधा पई का कहना है कि इस आधार के हिसाब से कम सबूत हैं कि मुसलमान अपने रणनीतिक मतदान के पिछले रुझान से अलग कुछ करेंगे। वह कहती हैं, आम रुझान यही है कि आप पहले प्रत्याशी को देखते हैं और आकलन करते हैं कि वह प्रत्याशी उस विशेष निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को हराने जा रहा है या नहीं और उस आधार पर उस व्यक्ति को वोट दिया जाएगा। ऐसे में कोई अलग पैटर्न नहीं उभर सकता है बल्कि यह जमीनी वास्तविकता पर आधारित फैसला है। एआईएमआईएम का उदय अपने आप में एक दिलचस्प कहानी है। तेलंगाना के पुराने हैदराबाद क्षेत्र से गहरा ताल्लुक रखने वाली पार्टी ने 2017 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा था। उसने 38 सीट पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीती और उसके 37 प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। लेकिन इन सीट पर पार्टी 2.4 प्रतिशत की वोट हिस्सेदारी पाने में कामयाब रही। अगर यह पार्टी तस्वीर में नहीं होती तब ये वोट सपा या कांग्रेस के खाते में जा सकते थे और इसी वजह से उस पर भाजपा की बी टीम होने का तोहमत लगा। इस बात को तब और बल मिला जब उसने तृणमूल कांग्रेस के साथ सहयोग किए बिना अपने दम पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और उससे पहले बिहार विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस बार भी पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सपा-रालोद गठबंधन का समर्थन करने से इनकार कर दिया है बल्कि 100 सीट पर चुनाव लड़ने की अपनी महत्त्वाकांक्षा भी बढ़ा दी। इस समुदाय के नेताओं ने नाम न बताने की शर्त पर दो रुझानों के बारे में बात की। उनका कहना है, मुस्लिम राजनीति के ओवैसीकरण में मुसलमानों के लिए कट्टरपंथी अधिकारों की बयानबाजी एक मुख्य विषय बन गया है। इसमें कोई शक नहीं कि ओवैसी शानदार वक्ता हैं और उन्होंने संसद में कई बार कहा है कि एक मुस्लिम के रूप में भारतीय संविधान उनका अंतिम हथियार है क्योंकि यह भारत के लिए, भारतीयों के लिए, मुसलमानों के लिए और दलितों के लिए सबसे अच्छा दस्तावेज है। यह सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए भी सबसे अच्छा दस्तावेज है। लेकिन ओवैसी चाहते हैं कि संविधान में निहित मुसलमानों के अधिकारों को उनकी वर्तमान परिस्थितियों पर लागू किया जाए। उदाहरण के लिए वह चाहते हैं कि हाल ही में उन पर हुए जानलेवा हमले के दोषियों को भी सख्त गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून (यूएपीए) के हिसाब से दंडित किया जाए जिसके तहत कई मुस्लिम युवाओं को जेल में डाला गया है। हालांकि इस तरह की जोशीली बयानबाजी चुनावी जनसभाओं में काफी पसंद की जाती है लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि इसका सीधा मतलब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अधिक ध्रुवीकरण करना है और भाजपा ऐसा ही चाहती है। अगर 403 सदस्यों वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिनिधित्व की बात करें तो पहले 63 मुस्लिम विधायक थे। 2017 में यह तादाद घटकर 24 रह गई। हालांकि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों का तर्क है कि मुसलमानों को अकेले ही अपने समुदाय के लिए बोलने की जरूरत नहीं है बल्कि दूसरों को भी उनके लिए आवाज उठानी चाहिए। विधानसभा और राज्य के नीति निर्माण में उनकी हिस्सेदारी महज 5.9 प्रतिशत तक सिमट गई है जबकि राज्य की आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी 20 फीसदी तक है। ऐसे में निश्चित तौर पर इस समुदाय के भीतर सपा और एआईएमआईएम जैसे दलों की भूमिका ही आंतरिक स्तर पर बहस का मुद्दा बनी हुई है।

Published / 2022-03-04 04:30:06
किसी भी युद्ध में कभी कोई वास्तविक विजेता नहीं होता...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रशांत झा)। युद्धों में कोई वास्तविक विजेता नहीं होता है क्योंकि इसमें शामिल सभी पक्षों को परिणाम भुगतना पड़ता है, जिसमें अक्सर दोनों पक्षों के हताहतों की संख्या अधिक होती है। युद्ध और उसके अंत के परिणाम हमेशा खतरनाक होते हैं। इसका सीधा प्रभाव लोगों, राजनीति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण पर पड़ता है। युद्ध के शिकार प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में 17 से 20 मिलियन लोगों की मौत हुई। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के पीड़ितों की संख्या 50 से 56 मिलियन के बीच अनुमानित है (कुछ स्रोतों में तो 80 मिलियन का भी उल्लेख है)। द्वितीय विश्व युद्ध अधिक अन्य युद्ध ने इतना विनाश नहीं किया है, 1989 और 2010 के बीच हिंसक संघर्षों में अभी भी लगभग 800,000 लोग मारे गए। युद्ध के पीड़ितों की वास्तविक संख्या का केवल अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या पीड़ितों को केवल उन लोगों के रूप में परिभाषित किया गया है जो सशस्त्र हिंसा के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में मारे गए। इसका मतलब उन लोगों की अवहेलना करना होगा, जो युद्ध के दौरान, जोखिम, महामारी या (यौन) हिंसा और भूख के परिणामस्वरूप मर गए। यह उन लोगों की भी अवहेलना करता है जो वर्षों बाद युद्ध में लगे घावों या बीमारियों से मर गए हैं- जैसे कि हिरोशिमा और नागासाकी के विकिरण पीड़ित। वियतनाम और कंबोडिया (1965-1975) में अमेरिकी हस्तक्षेप के परिणामों पर एक नज़र इस समस्या की एक स्पष्ट तस्वीर प्रदान करता है। वियतनाम युद्ध में मरने वालों की संख्या 30 लाख आंकी गई है। इसकी समाप्ति के बाद से वियतनामी सरकार का दावा है कि पुराने गोला-बारूद के कारण होने वाली घातक दुर्घटनाओं से 42,000 से अधिक लोग मारे गए हैं। उत्तरी वियतनामी सैनिकों के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी सशस्त्र बलों ने 15 मिलियन टन बम और विस्फोटकों का इस्तेमाल किया, जिनमें से 800,000 टन अभी भी देश के 20 प्रतिशत को प्रदूषित करते हैं। ऐसा ही नजारा कंबोडिया में भी है। यूनिसेफ के अनुसार, चार से छह मिलियन बारूदी सुरंगें अभी भी रास्तों के पास, खेतों में और स्कूलों के पास या गांवों में कुओं के पास दुबकी हुई हैं। यह ज्यादातर नागरिक आबादी है जो पीड़ित है-हर तीसरा बारूदी सुरंग शिकार एक बच्चा है। साहित्य के लिए जर्मन नोबेल पुरस्कार विजेता हेनरिक बोल ने युद्धों के दीर्घकालिक प्रभावों की विशेषता बताई। युद्ध में घायल-चाहे वे सैनिक हों या नागरिक-अक्सर दशकों तक शारीरिक चोटों से पीड़ित रहते हैं। अक्सर, उन्हें अंधे या बहरे होने के कारण, विच्छेदन के साथ जीना सीखना पड़ता है। मनोवैज्ञानिक प्रभावों का भी उत्तरजीवियों के दैनिक जीवन पर प्रभाव पड़ता है। युद्ध के दैनिक अनुभवों से उत्पन्न भय और असुरक्षा चाहे अपराधियों या पीड़ितों के रूप में निशान छोड़ जाते हैं। देर से आने वाले लक्षण तनाव विकार, अवसाद और चिंता हो सकते हैं। ये परिणाम नागरिकों और सैनिकों को समान रूप से प्रभावित करते हैं। युद्ध का एक अन्य परिणाम राष्ट्रीय नागरिकों का शरणार्थियों में परिवर्तन है। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में 18 मिलियन शरणार्थी हैं जिन्हें संघर्ष या उत्पीड़न के कारण अपना घर छोड़ना पड़ा है। तीन-चौथाई विकासशील देशों में रहते हैं। युद्ध ने उनके घर और उनकी आजीविका, अक्सर दीर्घकालिक रूप से छीन ली है। भूख, कुपोषण, और बीमारियां सीधे शरणार्थियों और उनके बच्चों के लिए खतरा हैं। शरणार्थियों की स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है जब अंतर्राष्ट्रीय ध्यान और समर्थन कम हो जाता है, जबकि उनकी कानूनी, आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अभी भी कोई अंत नहीं है और दृष्टि में कोई टिकाऊ समाधान नहीं है। विशेष रूप से, जब शरणार्थियों को बड़े शिविरों में रहना पड़ता है, तो शरणार्थियों और उनके पर्यावरण दोनों के लिए विभिन्न सुरक्षा जोखिम उत्पन्न होते हैं जो नए हिंसक संघर्षों को जन्म दे सकते हैं। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है युद्ध एक बर्बर गतिविधि है जो केवल जीवन और संपत्ति के नुकसान में समाप्त होती है। युद्ध की हिंसा जीवन के लिए खतरा है जो कभी भी किसी भी विवाद को हल नहीं कर सकती है। युद्ध का अभ्यास करने वाले दोनों पक्ष सामाजिक और आर्थिक नुकसान में समाप्त होते हैं जैसा कि जॉन एस सी एबॉट ने कहा है कि युद्ध विनाश का विज्ञान है।

Published / 2022-03-01 16:17:05
सरकार के निजीकरण के रुख में बदलाव...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (राममोहन)। वर्ष 2022-23 के केंद्रीय बजट से यह संकेत निकलता है कि सरकार निजीकरण की दिशा में सतर्क तरीके से आगे बढ़ेगी। सुधार समर्थक इस बदलाव की आलोचना करते हुए कहेंगे कि यह सुधारों के लिए बहुत बड़ा झटका है। हालांकि यह एक ऐसा कदम है जो देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं को स्वीकार करता है। बजट में निजीकरण के लिए 65,000 करोड़ रुपये का अपेक्षाकृत सहज लक्ष्य रखा गया है। यह वित्त वर्ष 2021-22 के 1.75 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से काफी कम है। वित्त वर्ष 2021-22 में 78,000 करोड़ रुपये हासिल होने की आशा है जिसमें से ज्यादातर राशि जीवन बीमा निगम के विनिवेश से आने की आशा है। यह राशि निजीकरण या स्वामित्व और नियंत्रण के हस्तांतरण से नहीं आएगी जबकि वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में इसी बात पर जोर दिया गया था और इसके लिए बजट की सराहना भी की गई थी। इस वर्ष के बजट में दो बैंकों या एक बीमा कंपनी के निजीकरण का कोई जिक्र नहीं है जबकि गत वर्ष इनका उल्लेख किया गया था। निजीकरण को लेकर उत्साहित लोग इस वर्ष एयर इंडिया के सफल निजीकरण के बाद इसे एक गंभीर कमी के रूप में देखेंगे। वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि एयर इंडिया के निजीकरण की शुरूआत 2018 में हुई थी और इस प्रक्रिया को पूरा होने में चार वर्ष लगे। एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया में विमानन कंपनी की जमीन और इमारत को एक विशेष उद्देश्य से बनाई गई कंपनी को हस्तांतरित किया गया। सरकार ने एयर इंडिया के 61,000 करोड़ रुपये के कर्ज का 75 फीसदी खुद वहन करके एक अस्वाभाविक कदम उठाया। कर्मचारियों को गारंटी दी गई कि उन्हें कम से कम एक वर्ष तक काम से नहीं निकाला जाएगा। विमानन कंपनी को एक प्रतिष्ठित कारोबारी समूह टाटा को बेचा गया। अन्य सरकारी कंपनियों के निजीकरण के दौरान इस स्तर पर ध्यान देना न केवल बहुत समय खपाऊ होगा बल्कि ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन हो सकता है। सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री सरकार के निजीकरण पर जोर न देने के निर्णय से तीन बातें पता चलती हैं। पहली बात, भारत सरकार के पास बड़े पैमाने पर निजीकरण को पूरा करने की क्षमता नहीं है। दूसरा, सरकारी परिसंपत्तियों की बिक्री के मामले में ढिलाई बरतना राजनीतिक और आर्थिक दोनोंं संदर्भों में महंगा पड़ सकता था। तीसरी बात, निजीकरण को समग्र आर्थिक प्रदर्शन का मानक बनाने से कोई मदद नहीं मिलने वाली थी। यह सुनिश्चित करना तथा अन्य शर्तों को पूरा करते हुए नीलामी को सफलतापूर्वक अंजाम देना आसान काम नहीं है। दुनिया मेंं बहुत कम सरकारें ही सफलतापूर्वक ऐसा कर पाती हैं। एक सरकार के लिए सबसे बुरा यही हो सकता है कि वह इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कठिन लक्ष्य तय करे। जब ऐसा होता है तो निजीकरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है और विवाद खड़ा होना तय होता है। हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड (एचजेडएल) की बिक्री हुए दो दशक से अधिक समय बीत चुका है। इतने लंबे अरसे के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो से कहा कि वह इससे संबंधित लेनदेन की जांच करे। एचजेडएल कोई बहुत महत्त्वपूर्ण सरकारी उपक्रम नहीं था। इसके बावजूद इसकी रणनीतिक बिक्री विवादों में आ गई। कल्पना कीजिए कि तब क्या होगा जब बड़े और अच्छी तरह संचालित सरकारी उपक्रमों के बारे में यह माना जाएगा कि उन्हें सस्ती दरों पर या गलत खरीदार को बेच दिया गया। यदि बड़ी और मुनाफे में चल रही सरकारी कंपनियों की बिक्री विवादित हो सकती है तो वहीं सरकारी बैंकों की बिक्री में अलग तरह की चुनौतियां हैं। हमेंं संभावित खरीदारों के बारे में स्पष्ट रहना होगा। देश में बड़े निजी बैंकों ने शाखाओं का तगड़ा जाल बिछा लिया है और विदेशी बैंक वित्तीय संकट के बाद अपने घरेलू बाजारों के लिए पैसा बचा रहे हैं। वे रिजर्व बैंक की इच्छा के अनुसार पूर्ण अनुषंगी बनाकर भी भारत नहीं आना चाहते। विदेशी संस्थागत निवेशकों के समूह को बैंक बेचने से उनमें संचालन की समस्या पैदा हो सकती है। ऐक्सिस बैंक का उदाहरण याद करें। सरकारी उपक्रमों की भूतपूर्व यूटीआई बैंक में अहम हिस्सेदारी थी कि तभी उसका बड़ा हिस्सा संस्थागत विदेशी निवेशकों को बेच दिया गया। ऐक्सिस बैंक में उनकी अहम हिस्सेदारी बरकरार है। एक बैंक की नाकामी से लाखों लोगों की बचत प्रभावित होती है। यदि ऐसी स्थिति बनती है तो संसद से लेकर प्रशासनिक मशीनरी तक उथलपुथल मचेगी और मीडिया में भी नकारात्मक प्रचार-प्रसार होना तय है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो सरकार ने बैंकों के निजीकरण की दिशा में धीमी गति से आगे बढ़ने का निर्णय लिया है। जानकारी के मुताबिक सरकारी 26 फीसदी हिस्सेदारी के साथ नियंत्रण अपने पास रखना चाहती है। वह संभावित खरीदारों के मानक के बारे में रिजर्व बैंक से मशविरा करेगी। इतनी समझदारी तो दिखानी ही चाहिए। सरकार के लिए यह भी उचित नहीं कि निजीकरण को आर्थिक प्रदर्शन का मानक बना दिया जाए। बजट से पहले के सप्ताहों में मीडिया ऐसी खबरें चलाता है कि निजीकरण का लक्ष्य हासिल नहीं हो पाएगा। बजट के बाद एक बार फिर यही थीम दोहरायी जाती है। निजीकरण के मोर्चे पर नाकामी अन्य सभी सुधारों तथा पहलों को पीछे धकेल देती है। तत्काल यह घोषणा कर दी जाती है कि यह सरकार भी बड़े सुधारों के मोर्चे पर अनिच्छुक है। निजीकरण के लिए कमतर लक्ष्य तय करना समझदारी की बात है। बेहतर तो यह होगा कि कोई लक्ष्य ही तय न किया जाए और विनिवेश तथा निजीकरण से होने वाली प्राप्तियों को बजट में संतुलनकारी कारक के रूप में देखा जाए। सरकार ने महामारी के बाद व्यापक राजकोषीय व्यय की मांगों पर कान न देते हुए नकदी समर्थन पर ध्यान केंद्रित करके बेहतर किया।

Published / 2022-02-25 15:22:58
जनकल्याण के मकसद वाली पूंजी की सीमा...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कनिका दत्ता)। पिछले सप्ताह की दो खबरों पर गौर करें। पहली यह कि घाटे में चल रही अक्षय ऊर्जा कंपनी सुजलॉन एनर्जी ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी पावर फाइनैंस कॉपोर्रेशन से 4,200 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की मांग की है। दूसरी खबर में जीवाश्म ईंधन वाली दिग्गज कंपनी बीपी ने आठ वर्षों में अपना उच्चतम मुनाफा दर्ज किया है। सुजलॉन के संकट और बीपी के अच्छे मुनाफे के बीच का अंतर काफी कुछ बयां कर रहा है। सुजलॉन का घाटा बढ़ने की असली वजह, परिचालन से जुड़ी दिक्कतों मसलन कच्चे माल की लागत बढंने परियोजनाओं की भरमार दिखने के साथ ही पवन ऊर्जा पर शुल्क का दबाव बढ़ है। जबकि बीपी को, यूक्रेन में भू-राजनीतिक संकट की वजह से तेल और गैस की कीमतों में आई तेजी का फायदा उठाने का मौका मिला है। सुजलॉन ने पर्यावरण, समाज और संचालन (ईएसजी) में निवेश करने का शुरूआती रुझान दिखाया था। इसकी नाकामी ईएसजी निवेश से जुड़े जोखिमों को भी उजागर करती है। हालांकि इस निवेश की रफ्तार जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते के बाद बढ़ी है। इस विंड टर्बाइन निमार्ता कंपनी का 6,640 करोड़ रुपये का कर्ज है और इसमें आईडीएफसी पीई, ओलिंपस और एशिया क्लाइमेट पार्टनर्स जैसी ब्लू-चिप निजी इक्विटी कंपनियों और यहां तक कि सन फार्मा के दिलीप सांघवी की दिलचस्पी भी थी। अमेरिका में इसकी सहायक कंपनी ने दिवालिया होने की अर्जी दी है और कंपनी ने सरकारी राहत पैकेज की मांग की है। दुनिया भर में ईएसजी में निवेश को वैश्विक निवेश की निरंतरता के संदर्भ में देखा जा सकता है जिसमें 21वीं सदी के शुरूआती दौर के लेखा से जुड़ी धोखाधड़ी जैसे कि एनरॉन, वर्ल्डकॉम, फ्रेडी मैक, एआईजी जैसे मामलों में तेजी आई। शीत युद्ध के दौर में साम्यवाद पर पूंजीवाद की जीत के लगभग एक दशक बाद हुए ये घोटाले स्वतंत्र उद्यमों के अनैतिक पक्ष की याद दिलाते हैं। दावोस और अन्य वैश्विक वार्ता मंचों की चर्चा, पूंजीवाद को बचाने के तरीकों पर केंद्रित रही और इसके तहत ही उभरते बाजारों में ऐसे निवेश पर जोर देने की बात हुई जिसमें मुनाफा कमाने के साथ ही अच्छा काम भी किया जाए। मसलन गरीबी दूर करने जैसे अभियान के लिए अनुकंपा या उदार पूंजी और प्रभाव निवेश की धारणाएं उभरींं। इन अवधारणाओं के मुताबिक पूंजीवाद को केवल मुनाफे की ताकत नहीं बनना चाहिए, बल्कि बेहतर सामाजिक प्रभाव का एक स्रोत भी होना चाहिए। बिल गेट्स इस अवधारणा के शुरूआती समर्थकों में थे। सामुदायिक विकास के मकसद से अनुकंपा वाली पूंजी की विशाल मात्रा वैश्विक बाजारों में आ गई जिससे गरीब देशों में स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचे और शिक्षा पर केंद्रित प्रभाव डालने वाले निवेश फंड का दायरा बढ़ा। नए युग के पूंजीपतियों ने प्रबंधन गुरु सी के प्रह्लाद से प्रमाणित सिद्धांत हासिल किया। उन्होंने, दि फॉर्च्यूून एट दि बॉटम आॅफ द पिरामिड लिखा जिसमें गरीबों की मदद करने और मुनाफा कमाने के लिए तर्क दिया गया। कई केस स्टडी में गरीबों की मदद करने वाला हिस्सा दरअसल लाभ कमाने के हिस्से के बाद का विचार प्रतीत होता है। हैरानी की बात यह है कि 2008 के वित्तीय संकट ने पुनर्विचार का मौका नहींं दिया जबकि यह संकट ही पिरामिड के निचले स्तर के ग्राहकों को ज्यादा आवास ऋण देने की वजह से पैदा हुआ था। इस संकट ने लेखा-जोखा और जवाबदेही से जुड़े पुराने जोखिम को फिर से जगजाहिर किया। यही बात सामुदायिक विकास या पर्यावरण के विकास में असर डालने वाले निवेश पर भी लागू हुई। ये निवेश उन देशों में किए गए जहां कमजोर कानून या कानून की उपस्थिति न के बराबर थी और संस्थागत शासन तंत्र के साथ-साथ बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था। अब ऐसे हालात में यह कैसे निर्धारित किया जाए कि गरीबों का एक अस्पताल या एक बिजली संयंत्र उस उदार और अनुकंपा वाली पूंजी की सफलता का परिचायक था? इसका जवाब स्पष्ट नहीं था और इसी वजह से विश्व स्तरीय फजीर्वाड़ा करने वाले अबराज कैपिटल के पाकिस्तानी संस्थापक आरिफ नकवी जैसे लोगों के लिए दरवाजे खुल गए। वैश्विक गरीबी को खत्म करने के लिए पहले पूंजी निवेश और मुनाफा बनाने की इस सम्मोहक कहानी ने बिल गेट्स, एडगर ब्रॉनफमैन, जॉन केरी, प्रिंस चार्ल्स, क्लॉज श्वाब, बैंक आॅफ अमेरिका, मैकिंजी, केपीएमजी, हैमिल्टन लेन, विश्व बैंक के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सरकारों को भी बेवकूफ बनाया। अबराज ने भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, घाना, तुर्की और कई अन्य देशों की कल्याणकारी परियोजनाओं के लिए शीर्ष वैश्विक निवेशकों से पूंजी जुटाई और इसके लिए वैसी फर्जी कहानी बुनी गई जो दुनिया के अमीर निवेशक सुनने के लिए और निवेश के लिए भी तैयार थे। हालांकि ऐसा नहीं है कि ईएसजी फंड का पूरा उद्गम ही फर्जी है। लेकिन तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन के एजेंडे के समर्थन से वास्तव में ईएसजी निवेश में तेजी आती है जो असरदार निवेश तो है लेकिन साथ ही इसमें सतर्कता का स्तर बढ?ा चाहिए। पिछले साल मई में अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने एक ईएसजी-केंद्रित जोखिम वाली चेतावनी जारी की जो अपर्याप्त खुलासा, भ्रामक दावों और ईएसजी निवेश विश्लेषण की अपर्याप्त जानकारी के संकेत देती है। यह एक समस्या है। दूसरी समस्या बदलने वाली राष्ट्रीय नीतियां हैं, विशेष रूप से उभरते बाजारों में जहां निवेश का अंदाजा लगाना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, भारत में विनियमित ऊर्जा मूल्य निर्धारण की लंबे समय से दिख रही समस्याएं अक्षय ऊर्जा कारोबार में जटिलता की परतों को जोड़ती हैं। इसी तरह ज्यादा जीवाश्म ईंधन का उपयोग करने वाली कंपनियां अक्षय ऊर्जा से मिलने वाली बिजली में मामूली निवेश या कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व वाली परियोजनाओं पर जोर देना चाहती हैं ताकि ईएसजी पूंजी हासिल की जा सके।

Published / 2022-02-24 15:22:27
...विश्व शांति के लिए खतरा बने पुतिन?

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मनोज शर्मा)। आखिरकार रूस ने यूक्रेन पर जोरदार हमला किया है। लेकिन पुतिन कभी कमजोर और दरिद्र रूस के राष्ट्रपति थे। लेकिन पुतिन चुपचाप कब खुद को और रूस को शक्तिशाली बना लिये, इसका एहसास न विश्व को हुआ न अमेरिका समेत नाटो को। रूस को इस स्थिति में लाने के पहले एक बार पीछे मुड़ कर देखना भी आवश्यक है। क्या आज का भारत भी इससे कुछ सीख सकता है? नब्बे के दशक में सोवियत संघ का टूटना एक ऐतिहासिक घटना थी। तब हम भारतीय यह भी नहीं समझ पाये थे कि रूसी राष्ट्रपति गौर्बाच्यौफ नायक हैं या खलनायक गौर्बाच्यौफ से राजीव गांधी की बहुत घनिष्ठता थी। तब एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें राजीव गांधी को गरीब सुदामा और गोर्बाच्यौफ को कृष्ण की दिखाया गया था।दरिद्र राजीव भारत महोत्सव की पोटली लिये अमीर गोर्बाच्यौफ से मिलने मास्को पहुंचे हुये हैं। इसके बाद एकाएक सोवियत संघ टूट गया। यूक्रेन, बेलारूस, जार्जिया, सभी अलग होकर स्वतंत्र देश बन गये। जिस रूस की धमक ऐसी थी कि उसने मुजाहिदिनों वाले अफगानिस्तान में डॉ नजीबुल्ला को राष्ट्रपति बना कर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना कर रखी थी वह खुद एक झटके में कमजोरी निरीह सा दिखने लगा। रूस का टूटना कमजोर होना शीतयुद्ध की समाप्ति मानी गयी। इसे अमेरिका और नाटो के विजय के तौर पर देखा गया। सोवियत संघ टूट गया इसके बाद भी रूस की बार बार फजीहत होती रही। नाटो और अमेरिका ने उसे बार-बार धमकाया। सोवियत संघ के प्रभाव वाले पूर्वी यूरोपीय देशों में क्रांति हुई रोमानिया में तानाशाह निकोलाइ चुसेस्कू की एक जनक्रांति के बाद गोली मार कर हत्या कर दी गयी। रूस की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी थी। सोवियत संघ के टूटने के बाद बोरिस येल्तसीन राष्ट्रपति बने थे। वह पहले से ही गोर्बाच्यौफ के कट्टर विरोधी थे। येल्तसीन एक तुनकमिजाज और सनकी किस्म के व्यक्ति थे। वह शराब के नशे में अपने आर्मी बैंड को खुद निर्देशित करते हुए कई तरह की धुनें बजवाने लगते थे। रूस में लोगों को मुख्य भोजन ब्रेड तक पर आफत हो गयी थी। एकाएक आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर होगयी थी कि वहां के राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को फटे जूते और ड्रेस में खेलना पड़ा। कभी रूस की हॉकी टीम मजबूत हुआ करती थी ओलंपिक तक में उन्होंने भारत को हराया था, सुल्तान अजलान शाह टूर्नामेंट जीता था लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस की स्थिति ऐसी हो गयी कि खिलाड़ियों को पहनने के लिए बूट और जर्सी तक नसीब नहीं थे। तब का एक दिलचस्प वाकया है कि उनकी हॉकी टीम भारत आयी तो भारतीय खिलाड़ियों से हॉकी स्टिक मांग कर ले गयी। सोवियत संघ से टूटने के बाद सबसे रूस के अलावा सबसे बड़े देश यूक्रेन ने परमाणु संयत्रों और सामनों के लिये छीना झपटी शुरू कर दी। कभी अमेरिका को चुनौती देने वाले येल्तसीन ने भारत को अमेरिका के डर से क्रायोजेनिक इंजन नहीं दिया। तब इस घटना से भारत में यही संदेश गया कि रूस अब एक दीन-हीन कमजोर देश बन चुका है। रूस को सुदंर वेश्या वाला देश कहा जाने लगा। येल्तसीन का स्वास्थ्य गिरने के साथ ही उनके उत्तराधिकारी पुतिन घोषित हुये और जब पुतिन रूस के राष्ट्रपति बने तब प्रांरभ में उन्हें भी कोई बहुत करिश्माई राष्ट्रपति नहीं माना गया। अपनी सत्ता को निष्कंटक बनाने के लिए पुतिन ने बंद कमरे में रूस के बड़े माफिया और सफेदपोशों से मुलाकात की और देश के कई खुफिया बातों को उनसे शेयर किया, पर पुतिन केजीबी के लिए डेढ़ दशक तक जासूसी कर चुके थे और उनके दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। तब से लेकर अब तक पुतिन ने चुपचाप रूस को कहां से लाकर कहां खड़ा कर दिया इसका किसी को भान तक नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि दो दशक कब पार हो गये और रूस की सामरिक शक्ति फिर से चुनौती देने लायक कब तैयार हो गयी इसका अहसास न अमेरिका को हुआ न नाटो वाले यूरोपीय देशों को। भारत का झुकाव भी कुछ समय के लिये अमेरिका के प्रति ज्यादा रहा। संभवत: भारत को रूस एक कमजोर मित्र नजर आ रहा था। जबकि इस दरम्यान पुतिन रूस की सत्ता में अपने आपको निरंकुशता से काबिज कर चुके हैं। उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से भी रूस में कोई चुनौती नहीं दे सकता। विरोधियों को शातिर तरीके से ठिकाने लगा दिया जाता है। एकाएक रूस ने दो साल पहले ही अपनी शक्ति का अहसास कराया जब विश्व के सभी प्रमुख मुल्कों के राष्ट्रध्यक्ष आस्ट्रेलिया में किसी कार्यक्रम में एकत्र हुए जिसमें पुतिन भी थे तो चुपचाप एक रूसी सैन्रू पनडुब्बी पूरे आयुध के साथ आस्ट्रेलिया के समुद्र में चक्कर काटने लगा। बाद में जब अमेरिका समेत यूरोप के अन्य देशों ने इस पर आपत्ति जतायी तो रूसी नौसेना के प्रवक्ता ने कहा कि हमें कोई नहीं रोक सकता। हमारे राष्ट्रपति जहां रहेंगे हम उनकी सुरक्षा में वहां पहुंच जायेंगे। इस वाकये के बाद रूस ने अपने हाव भाव से पूरे विश्व को एक तरह से चुनौती पेश करनी शुरू कर दी। आज पुतिन किसी शातिर की तरह पेश आ रहे हैं। अजरबैजान और आर्मिनिया के युद्ध में रूस ने अपने स्वार्थ को सर्वोपरिरखा। सुरक्षा का वादा करने के बाद भी आर्मिनियाको अजरबैजान के हाथों पिटने दिया। बेलारूस में जनाक्रोश के बावजूद राष्ट्रपति लुकाशेंको को सत्ता में बनाये रखा। ताजा यूक्रेन संकट से पहले भी पुतिन ने उससे क्रिमिया को छीन लिया है और अब नाटो और उसके नेतृत्वकर्ता अमेरिका को पुतिन उनकी औकात बता रहे हैं। एस 400 और एस500 जैसी एंटी मिसाइलें बना कर रूस अमेरिका और विश्व को डरा रहा है। पुतिन चीन से दोस्ती कर अमेरिकी खेमे को संकट में डाल चुके हैं। आज अमेरिका और नाटो सिर्फ तमाशाई है, ये सिर्फ तरह तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं जिससे पुतिन निबट लेंगे। पुतिन अपनी शर्तों पर जो चाहें सो कर सकते हैं। अफगानिस्तान में बाइडेन की नीतियों से अमेरिका की जबरदस्त हार हुई। अब पुतिन अमेरिका को खुली चुनौती दे रहे हैं। देखना है अब अमेरिका सहित नाटो देश क्या कर पाते हैं?

Published / 2022-02-23 15:53:49
सबके हित में हैं शैक्षणिक संस्थाओं की गरिमा...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मृत्युंजय दीक्षित)। अगर कटटरपंथियों के दबाव में आकर उनकी यह मांग एक मान ली गयी तो उनकी डिमांड और बढ़ती जायेगी। विद्यालयों में बच्चों के बीच समानता बढ़ाने के लिए यूनिफार्म का प्रावधान किया गया है। कुछ तत्व इस बात को अनदेखा कर इस्लाम के नाम पर हंगामा कर रहे हैं। कर्नाटक में उडुप्पी के एक छोटे से स्कूल से प्रारम्भ हुआ हिजाब विवाद अब एक बड़ा और विकराल रूप ले चुका है। देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन करके विवाद को और गहरा करने का प्रयास किया जा रहा है। जब विश्व के कई देशों ने मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया है, तब भारत में इस्लामिक कटटरपंथियों द्वारा हिजाब आंदोलन खड़ा कर देना एक राजनैतिक साजिश लग रही है जो प्रथम दृष्टया विपक्षी दलों का काम लग रहा है किन्तु इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। अब कर्नाटक के स्कूल की छह लड़कियों के पीछे के कट्टरपंथियों ने कमान संभल ली है। कर्नाटक से लेकर हैदराबाद और जयपुर तक तथा दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर बंगाल के मुर्शिदाबाद तक और उप्र के अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय तक सभी जगह हिजाब समर्थक गोलबंद होकर सड़कों पर निकल आये हैं। यह प्रदर्शन तब हो रहे हैं जबकि कर्नाटक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मामले की सुनवाई चल रही है। जिस तरह सेक्युलर दलों ने हिजाब विवाद को लपका तथा आग में घी डाल कर भड़काने का काम किया वो आश्चर्यचकित करने वाला है, कर्नाटक से लेकर महाराष्ट्र के मालेगांव तक इनकी भूमिका आग लगा दो, रोटी सेक लो वाली दिखाई दे रही है। महाराष्ट्र में एआईएएम, शरद पवार की एनसीपी ने तो मुस्लिम समाज की महिलाओें व कटटरपंथियों को भड़काकर हिजाब डे तक बना डाला है। एआईएएम नेता ओवैसी यहां तक बौखला गये हैं कि वह कह रहे हैं कि जब तक हिजाब नहीं तब तक किताब नहीं, वह यह भी कह रहे हैं कि एक दिन एक हिजाबी देश की प्रधानमंत्री भी बनेगी। यह पूरा का पूरा घटनाक्रम एक बहुत बडी साजिश है जिसे तथाकथित सेकुलर राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने के लिए अंजाम दे रहे हैं। यही कारण है कि विपक्ष हिजाब विवाद की आड़ में मोदी सरकार, भाजपा व संघ के खिलाफ नये सिरे से नफरत फैला रहा और मुसलमानों का तुष्टिकरण करने के लिए खूब बयानबाजी कर रहा है। हिजाब विवाद को राजनैतिक रंग देने और नफरत की आग को भड़काने के लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो जारी किये गये हैं जिसमें जिसमें कुछ मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनकर क्रिकेट खेल रही हैं और कहीं फुटबाल और हॉकी खेल रहीं हैं। एक मुस्लिम महिला चिकित्सक का वीडियो आया जो हिजाब पहनकर हास्पिटल जा रही है और मरीजों को देख रही है। बिना हेलमेट राइडिंग करती और ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर भद्दे इशारे करती बुर्कानशीनों के वीडियो भी आ रहे हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मत है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बहुत सी मुस्लिम महिलाएं व युवतियां जो तीन तलाक कानून से बहुत खुश हैं तथा जिन गरीब मुस्लिम महिलाओं को उज्ज्वला योजना का लाभ मिला है, फ्री राशन मिला है आवास मिला है और सुरक्षा मिली है वे बीजेपी को वोट देने जा रही थीं अत: ऐसे में वातावारण को खराब कर उन महिलाओं को वोट देने से रोकने के लिए यह आंदोलन खड़ा किया गया है। अगर कट्टरपंथियों के दबाव में आकर उनकी यह मांग एक मान ली गयी तो उनकी डिमांड और बढ़ती जायेगी। विद्यालयों में बच्चों के बीच समानता बढ़ाने के लिए यूनिफार्म का प्रावधान किया गया है। कुछ तत्व इस बात को अनदेखा कर इस्लाम के नाम पर हंगामा कर रहे हैं। क्या इन लोगों को पता नहीं है कि भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक शिक्षा सबके लिए अनिवार्य है। इस अनिवार्यता के बावजूद आज भी देशकी 66 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं निरक्षर हैं। इसी मजहबी कट्टरता ने मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर को इतना नीचे रखा। बेटियों को घरों से निकलने नहीं दिया जाता। दूसरा उन पर बुर्के को लाद दिया जाता था। बेटियों को सिर से पांव तक बेडियों की तरह जकड़ दिया गया। आज केंद्र सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान के अंतर्गत शिक्षा के लिए विशेष प्रारंभ किये हैं जिसके सुखद परिणाम प्राप्त हो रहे थे लेकिन मुस्लिम समाज के कुछ ठेकेदारों और उनके हमराह राजनैतिक दलों को यह बात पसंद नहीं आ रही है। उडुप्पी जिले का एक हिजाब विवाद आज पत्थरबाजी व हिंसक प्रदर्शनों में बदल गया है। दिल्ली के शाहीन बाग में नारा-ए-तकदीर व अल्लाह हू अकबर के नारे गूंज रहे हैं। बुर्कानशीं मुस्लिम लड़की कटटरपंथियों की पोस्टर गर्ल बन बन चुकी है। पाकिस्तान, तुर्की से उसे बधाई मिल रही है और तो और मलाला जैसे लोग उसके समर्थन में ट्वीट कर रहे हैं। इस बवाल से देश में जिहाद, अलगाववाद व इस्लामिक कट्टरता की फैक्टरी कहलायी जाने वाली संस्था एसडीपीआई, पीएफआई की संलिप्तता जगजाहिर हो गई है। हिजाब की आड़ में भारत में दंगे की आग को भड़काने की साजिश भी बेनकाब हो चुकी है। इस आग को भड़काने में पाक खुफिया एंजेसी आईएसआई व सिख फार जस्टिस जैसे संगठनों की भूमिका सामने आ रही है।कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डी के शिवप्रसाद व कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भडकाऊ ट्वीट किये। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने देशमें गृहयुद्ध छिडने की बात कह दी। कांग्रेस सहित सभी दल एक बार फिर तुष्टिकरण के चलते नीचता पर उतर आये हैं। उप्र में एक सपा नेता ने हिजाब पर विवादित बयान दिया कि हिजाब पर हाथ डालने वालों का हाथ काट देंगे, आखिर यह लोग चाहते क्या हैं। स्पष्ट है कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दल एसडीपीआई, पीएफआई तथा आईएसआई व सिख फार जस्टिस जैसे संगठनों का सहारा लेकर चुनाव में है।

Published / 2022-02-22 15:34:45
बचानी होगी मितव्ययिता की संस्कृति...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह नियंत्रित इच्छा, आवश्यकता एवं उपभोग की आवश्यकता व्यक्त करता है। जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। इसी में विश्व की अनेक समस्याओं को समाधान निहित है और इसी में हमने कोरोना महाव्याधि से मुक्ति का मार्ग पाया है। असल में कोरोना महामारी ने जीवन को नये रूप में निर्मित करने की स्थितियां खड़ी की है, जिसका आधार मितव्ययिता एवं संयम ही है। जिसने इच्छाएं सीमित रखी, वह कभी दु:खी नहीं होगा। क्योंकि वह इस सचाई को जानता है कि इच्छा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। तभी तो महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में जैसे-जैसे मितव्ययिता का दृष्टिकोण धुंधला होता जारहा है, कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्रकृति दोहन, आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष की स्थितियों बढ़ती जा रही है। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज, राष्ट्र एवं विश्व में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा भी है कि अगर तुम जितना कमाते हो और उससे कम खर्च करते हो तो तुम्हारे पास पारस पत्थर है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मेरी दृष्टि में यह दिवस कोरा बचत का दिवस नहीं है, बल्कि यह अर्थ के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण एवं संयममय जीवनशैली को अपनाने का दिवस है। जबकि दुनिया में अनियंत्रित इच्छाओं को बल दिया जा रहा है, जिसका परिणाम क्या होगा? इच्छापूर्ति के लिये, आवश्यकता को बढ़ाने और उसे पूरा करने के लिये हिंसा अनिवार्य हो जाती है। नया उपभोक्तावाद एक प्रकार से नई हिंसा यानी कोरोना महामारियों का उपक्रम है। हिंसा, प्रतिस्पर्धा, सत्ता की दौड़ एवं आर्थिक साम्राज्य को इससे नया क्रूर आकार मिला है। क्योंकि अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, भोग-विलास एवं स्वार्थ से जोड़ दिया है। समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय, शोषण एवं अनैतिकता होने लगी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई तो दूसरी ओर गरीबी एवं अभाव की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में जलने लगा, तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गई। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया। फ्रांसीसी विचारक विचारक ज्यां बोद्रियो ने आधुनिक उपभोक्तावाद की मीमांसा करते हुए कहा है कि पहले वस्तु आती है तो वह सुख देने वाली लगती है। अंत में वह दु:ख देकर चली जातीहै। पहले वह भली लगती है, किन्तु अंत में बुरी साबित होती है। आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं, दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है। किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है। प्रश्न उठता है कि ये चकाचौंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है। मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था। पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सुंदर महंगे कपडे़ पहनना, फ्लाइट में घूमना, भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है। दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जैन धर्म में आदर्श गृहस्थ की जिस जीवनशैली का प्रतिपादन हुआ है, उसमें मितव्ययिता पर बहुत बल दिया गया है पर आज उसका जागरूकता के साथ अनुसारण करने वाले बहुत थोड़े हैं। भगवान महावीर ने व्यक्तिगत स्वामित्व का सीमाकरण और उपभोग का सीमाकरण-ये दोनों दर्शन दिये। इसी से समाज सुखी, स्वस्थ और शांत जीवन जीता रहा है। महात्मा गांधी के विचारों पर भी महावीर एवं जैन धर्म का गहरा प्रभाव था। जैनत्व के संयम प्रधान आदर्शों का उन्होंने अत्यंत श्रद्धा और निष्ठा से अनुसरण किया था। महामात्य चाणक्य एक प्रसिद्ध संत हुए हैं। वे अपने स्थान पर रात्रि में लिख रहे थे। उस समय उनके पास दो दिये जल रहे थे। कुछ जिज्ञासु व्यक्ति उनसे मिलने आये। उनके बैठते ही संत ने एक दिया बुझा दिया। उन्होंने संत से पूछा-आपने ऐसा क्यों किया? चाणक्य ने कहा-लिखने के लिए अधिक उजाले की आवश्यकता होती है। आप लोगों से ज्ञान-चर्चा तो थोड़ी रोशनी में भी हो जाएगी। संत के इस व्यवहार से उन्हें एक नई पे्ररणा प्राप्त हुई। आज पानी और बिजली के अ्रभाव की चर्चा सारे राष्ट्र में हो रही है, पर दूसरी ओर सड़कों पर जगह-जगह नल खुले रहते हैं। इस दिशा में सरकार और जनता दोनों में ही जागरूकता का अभाव है। इसी प्रकार बिजली का भी दुरुपयोग होता रहता है।

Published / 2022-02-21 16:01:25
माओवादियों को मुख्यधारा में आने का समय...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रभात झा)। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासी का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। छत्तीसगढ़ के जंगलों में केंद्रित माओवादी संघर्ष को समाप्त करने के लिए यदि बातचीत से समाधान होना है, तो भारत के माओवादी, नेपाली माओवादियों से कुछ सीख ले सकते हैं। मुझे करीब बीस साल पहले नेपाली माओवादी नेताओं से मिलना याद है जब मैं बीबीसी के साथ काम करता था। उनके नोएडा और बैंगलोर में गुप्त ठिकाने हुआ करते थे और बिना नंबर प्लेट के एंबेसडर कारों में वे हमसे मिलने आते थे। एक दिन मैंने उनमें से कुछ से पूछा, कृपया मुझे बताओ कि ये चल क्या रहा है? आप लोग नेपाल में क्रांति की बात करते हैं, वहां चल रहे युद्ध में सैकड़ों आम लोग मर रहे हैं, और यहां आप नेतागण भारतीय राजधानी में ब्यूरो के वाहनों में घूम रहे हैं! उन्होंने शांति से उत्तर दिया था, हम आज नेपाल के लगभग 80% हिस्से को नियंत्रित करते हैं। लेकिन हम यह भी समझ चुके हैं कि भारत हमें कभी भी काठमांडू पर कब्जा नहीं करने देगा। अमेरिका सुनिश्चित करेगा कि ऐसा न हो। इसलिए हम दूसरे सर्वश्रेष्ठ की तलाश कर रहे हैं जो हासिल किया जा सकता है। उन्होंने समझाया कि जनयुद्ध की रणनीति की तरह, संयुक्त मोर्चा भी माओ द्वारा दी गई एक रणनीति है। ठीक यही अगले कुछ वर्षों में काठमांडू की सड़कों पर तब तक नजर आया था जब तक शांति वार्ता के परिणामस्वरूप नेपाल के लिए एक धर्मनिरपेक्ष और परिपक्व लोकतंत्र नहीं बन गया, जिसमें माओवादियों की प्रमुख भूमिका थी। उसके बाद से नेपाल धरती पर स्वर्ग नहीं बन गया है लेकिन बेवजह हजारों लोगों की जान लेने वाली हिंसा का अंत हुआ है। भारत में अब भी कुछ कट्टर माओवादी नेता किसी भी कीमत पर बस्तर जैसे आधार इलाकों में क्रांति की लौ को तब तक जलाए रखना चाहते हैं, जब तक कि पूंजीवाद अपने ही वजन तले धराशायी नहीं हो जाता, पर अब यह भी लग रहा है उनके ही कुछ नेता संयुक्त मोर्चे की बदली हुई रणनीति के तहत गठबंधन बनाने की कोशिश भी कर रहे हैं। भारतीय राज्य सिलगेर (जहां उन्होंने एक पुलिस शिविर का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों को मारा था) तथा उस जैसी अन्य जगहों पर भी अनुशासनहीन सैनिकों को दंडित न कर लोगों को जबरदस्ती माओवादियों की ओर और धकेल रहे हैं। पर उन्हीं जगहों पर नीति में बदलाव घोषित किए बिना ही माओवादी इन अवसरों का इस्तेमाल आदिवासियों के हितों के साथ खुद को जोड़कर एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए कर रहे हैं। सिलगेर जैसी जगहों पर ओवरग्राउंड संगठनों के प्रेस नोट अक्सर शुद्ध हिंदी में सैद्धांतिक विवरणों के साथ (स्वयं माओवादियों की शैली के समान) लिखे जाते हैं जो किसी ग्रामीण आदिवासी युवा के लिए लिखना साधारण रूप से मुश्किल है जो इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं। आंदोलन संवैधानिक अधिकारों के साथ सड़क और पुलिस शिविर का भी विरोध करते हैं। वे माओवादियों के लिए कठिन सवाल कभी नहीं उठाते जैसे मुखबिर होने के आरोप में आदिवासियों की हो रही नियमित हत्याओं का मामला। लेकिन फिर भी सिलगेर की तरह के ये आंदोलन बहुत ही स्वागत योग्य संकेत हैं जिनके साथ काम किया जाना चाहिए। माओवादियों का अभी भी बस्तर के 37% इलाके पर कब्जा है (बस्तर आकार में केरल राज्य से बड़ा है)। 5 लाख से अधिक लोग उनके प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहते हैं। लेकिन उनके आंदोलन का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि मध्य भारत के वनवासी लोगों ने अपना विचार बदल दिया है और अब उन्होंने माओवादी आंदोलन से अपनी सहमति वापस ले ली है। पिछले साल मार्च में दूसरी कोरोना लहर से पहले अबूझमाड़ से रायपुर शांति पदयात्रा के दौरान माओवादियों ने अपने प्रेस नोट में संकेत दिया था कि अगर उनके कुछ शीर्ष नेताओं को जेल से रिहा कर दिया जाता है, तो वे बातचीत में उनका नेतृत्व कर सकते हैं। इसे नंबर 2 माओवादी नेता प्रशांत बोस ने अपनी गिरफ्तारी से पहले एक साक्षात्कार में दोहराया था। बोस जैसे कट्टरवादी से इस तरह का वक्तव्य आना एक आश्चर्य की बात थी। सरकार को इन प्रस्तावों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देनी चाहिए और अगर बातचीत होनी है, तो माओवादियों के पास भारतीय आदिवासियों के पास मौजूदा उपलब्ध संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करवाने के लिए बात करना एक आसान रास्ता होगा। भारतीय संविधान आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन के नारे में समाहित कुछ विशेष अधिकार देता है, लेकिन 75 वर्षों के बाद भी ये अधिकांश अधिकार केवल कागजों पर ही हैं। मध्य भारत में शांति के बोनस के साथ, माओवादियों के माध्यम से भारतीय आदिवासियों को भारतीय संविधान का हक दिलाने का राज्य के लिए भी यह एक अच्छा अवसर है। भारत में माओवादी आंदोलन किसानों और मुख्य रूप से भूमि अधिकारों के लिए एक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ। लेकिन 50 साल बाद यह केवल वन क्षेत्रों तक ही सीमित है और आज 99% लड़ाके आदिवासी हैं। यह सही समय है जब माओवादी उन आदिवासियों के लिए कुछ हासिल करने की कोशिश करें जिन्होंने पिछले 40 वर्षों में उनके आंदोलन के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। माओवादियों के लिए आदिवासियों का कर्ज चुकाने का समय अब आ गया है। राज्य की एक अति हिंसक कार्रवाई, को सहन करना कठिन होगा। वे कुछ वैसा ही कर सकते हैं जैसा श्रीलंका ने लिट्टे को कुचलने के लिए किया था।

Page 48 of 63

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse