विचार

View All
Published / 2022-03-21 14:56:04
हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार की दर अधिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। कोविड-19 महामारी का प्रसार रोकने के लिए 2020 में लगी पाबंदी (लॉकडाउन) के बाद भारतीय श्रम बल में शिक्षा स्तर के आधार पर काफी बदलाव आया है। कम पढ़े-लिखे लोगों के समूह को रोजगार का अधिक नुकसान हुआ है। अधिक पढ़े-लिखे लोगों की भी नौकरियां गईं। स्नातक एवं स्नातकोत्तर उत्तीर्ण लोग अब भी रोजगार छिनने की त्रासदी से उबर नहीं पाए हैं। दूसरी तरफ उच्चतर माध्यमिक तक शिक्षा प्राप्त लोगों को अधिक रोजगार मिले हैं। कम और अधिक पढ़े-लिखे दोनों तरह के लोगों को नुकसान हुआ है, मगर इन दोनों श्रेणियों के बीच आने वाले लोगों को लाभ हुआ है। कोविड महामारी आने तक स्नातक एवं स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोगों की नौकरियां बनी रहीं। ऐसे लोगों की संख्या 2016-17 में 5.15 करोड़ थी जो 2017-18 में बढ़कर 5.29 करोड़ हो गई। वर्ष 2018-19 में यह संख्या और बढ़कर 5.43 करोड़ हो गई। 2019-20 में इनकी संख्या कम जरूर हुई थी मगर वर्ष के अंत में ऐसे लोगों की संख्या 5.4 करोड़ हो गई। श्रम बल में स्नातकोत्तर तक पढ़े लोगों की संख्या 2016-17 में 12.5 प्रतिशत से बढ़कर 2018-19 में 13.4 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2019-20 में यह कम होकर 13.2 प्रतिशत रह गई। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां बढ़कर 5.56 करोड़ हो गई। कोविड महामारी के दस्तक देने से ठीक पहले का यह आंकड़ा था। लॉकडाउन के तत्काल प्रभाव के रूप में 1 करोड़ से अधिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियां चली गईं। इनकी नौकरियों की संख्या जून 2020 में समाप्त तिमाही में 4.49 करोड़ हो गई। मगर शुरू में स्नातकोत्तर पास लोगों की नौकरियों पर असर नहीं हुआ इसलिए कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी थोड़ी अधिक बढ़कर 13.7 प्रतिशत हो गई। मगर यह बढ़त अस्थायी ही थी। लॉकडाउन का पूर्ण और दीर्घ असर सितंबर 2020 में समाप्त हुई तिमाही में नजर आया। स्नातकोत्तर पास लोगों के रोजगार कम होकर 4.37 करोड़ रह गए और कुल श्रमबल में इनकी हिस्सेदारी इस तिमाही के दौरान कम होकर 11.1 प्रतिशत रह गई। यह वास्तव में भारत में श्रमबल का हिस्सा रहे लोगों की शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ी गिरावट थी। हालांकि इसमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है मगर यह पर्याप्त नहीं है। दिसंबर 2021 की तिमाही तक 12.2 प्रतिशत स्तर पर भारत के कार्यबल में स्नातकोत्तर पास लोगों की हिस्सेदारी अप्रैल 2020 से पूर्व के 13.7 प्रतिशत से काफी खराब थी। फरवरी 2022 तक भारतीय श्रम बल में 5.03 करोड़ स्नातक और स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त लोग थे। यह फरवरी 2020 के 5.73 करोड़ स्नातकोत्तर पास लोगों की संख्या में 70 लाख कम है। दूसरी तरफ श्रमबल में ऐसे लोग हैं जिनकी शिक्षा उच्चतर माध्यमिक से भी कम है। उन्होंने दसवीं की परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं की थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में श्रम बल में उनकी हिस्सेदारी 54.5 प्रतिशत थी। दिसंबर 2021 की तिमाही तक उनकी हिस्सेदारी कम होकर 49 प्रतिशत रह गई। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह के लिए जोखिम भी अधिक हैं। जून 2020 तिमाही में इन लोगों की नौकरियों में 30 प्रतिशत की तेज गिरावट आ गई। इसके बाद जब अगली तिमाही में लॉकडाउन लगभग पूरी तरह हटा लिया गया तो इस समूह में रोजगार में 31 प्रतिशत तेजी आई। इस समूह में रोजगार अनौपचारिक होता है इस वजह से इनती तेजी आई। मगर चुनौतियां अब भी कायम हैं। सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के इस समूह में रोजगार में लगातार गिरावट आई है। फरवरी 2022 में जिन लोगों ने अपनी दसवीं परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी उनमें रोजगार की संख्या 19.28 करोड़ थी। फरवरी 2020 की तुलना में यह 11.6 प्रतिशत कम थी। यह गिरावट इसी अवधि के दौरान आई 2.2 की कुल गिरावट की तुलना में कहीं अधिक है। रोजगार में लगातार आई कमी के दौर में फायदा उन लोगों को हुआ जिन्होंने 10वीं या 12वीं की परीक्षा पास की थी। इस समूह में रोजगार और कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी महामारी से पहले भी लगातार बढ़ रही थी। वर्ष 2016-17 में उनकी हिस्सेदारी कुल रोजगार में 27.9 प्रतिशत थी। 2017-18 में यह बढ़कर 29.7 प्रतिशत हो गई। 2018-19 में यह 30.5 प्रतिशत और 2019-20 में यह 31.3 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में उच्च माध्यमिक उत्तीर्ण लोगों की संख्या 38 प्रतिशत हो गई। यह बढ़ोतरी अचानक एवं तेज थी। मार्च 2020 में समाप्त हुई तिमाही में कुल रोजगार में उनकी हिस्सेदारी 31.8 प्रतिशत थी। अप्रैल-जून 2020 के दौरान यह हिस्सेदारी 39 प्रतिशत हो गई। तब से यह हिस्सेदारी 37 से 39 प्रतिशत के बीच रही है। पाबंदी जब चरम पर थी तो उच्च विद्यालय उत्तीर्ण लोगों में रोजगार बरकरार रहने की दर अधिक रही। अप्रैल 2020 में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों (जिन्होंने दसवीं कक्षा की परीक्षा भी पास नहीं की थी) के समूह में रोजगार दर 38 प्रतिशत कम हो गई और स्नातकोत्तर पास लोगों के मामले में यह 20 प्रतिशत तक फिसल गई। उच्च विद्यालय (हाई स्कूल) पास लोगों के मामले में यह गिरावट 17 प्रतिशत के साथ थोड़ी कम रही। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि हाई स्कूल तक शिक्षा रखने वाले लोगों ने रोजगार के मामले में अधिक तेजी से वापसी की। जून 2020 में समाप्त हुई तिमाही में सबसे कम पढ़े-लिखे लोगों के बीच रोजगार 30 प्रतिशत कम हो गया और स्नातकोत्तर तक शिक्षा रखने वाले लोगों में यह 19 प्रतिशत कम हो गया। मगर हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार में केवल 1 प्रतिशत गिरावट आई। फरवरी 2022 में हाई स्कूल पास लोगों में रोजगार फरवरी 2020 की तुलना में रोजगार 18 प्रतिशत अधिक था। दूसरी तरफ, सबसे कम पढ़े-लिखे और स्नातकोत्तर पास लोगों में फरवरी 2020 के स्तर की तुलना में रोजगार का स्तर 12 प्रतिशत कम था। स्नातक पास लागों में बेरोजगारी दर सबसे अधिक यानी 19 प्रतिशत से अधिक रही है। अगर इस तथ्य को ऊपर के विश्लेषण के संदर्भ में देखें तो हाई स्कूल से अधिक शिक्षा के बाद नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाती है। (लेखक सीएमआईई के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी हैं)

Published / 2022-03-15 12:43:26
आजादी के 75 साल बाद बढ़ती उम्मीद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ललित गर्ग)। आजादी की पचहरवीं वर्षगांठ मनाने की ओर अग्रसर होते हुए नया भारत बनाने, भारत को नये सन्दर्भों के साथ संगठित करने, राष्ट्रीय एकता को बल देने की चचार्एं सुनाई दे रही है। इसकी आवश्यकता इसलिये महसूस की जा रही है क्योंकि हम आजाद हो गये, लेकिन हमारी मानसिकता एवं विकास प्रक्रिया अभी भी गुलामी की मानसिकता को ओढ़े हैं। शिक्षा से लेकर शासन व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया अंग्रेजों की थोपी हुई है, उसे ही हम अपनाये जा रहे हैं। जीवन का उद्देश्य इतना ही नहीं है कि सुख-सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत किया जाये, शोषण एवं अन्याय से धन पैदा किया जाये, बड़ी-बड़ी भव्य अट्टालिकाएं बनायी जाये और भौतिक साधनों का भरपूर उपयोग किया जाये। उसका उद्देश्य है- निज संस्कृति को बल देना, उज्ज्वल आचरण, सात्विक वृत्ति एवं स्व-पहचान। भारतीय जनता के बड़े भाग में राष्ट्रीयता एवं स्व-संस्कृति की कमी महसूस हो रही है। राष्ट्रीयता के बिना राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिये आजादी की पचहरवें वर्ष के आयोजनों का लक्ष्य है नया भारत-सशक्त भारत निर्मित करना। अपनी पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक, संघ के प्रचारक एवं शिक्षाविद् सुनील अंबेडकर ने नया भारत निर्मित करने की आवश्यकता उजागर करते हुए उसके इतिहास में सच्चाई के प्रतिबिम्बों को उभारने पर बल दिया है। भारत के इतिहास को धूमिल किया गया, धुंधलाया गया है, अन्यथा भारत का इतिहास दुनिया के लिये एक प्रेरणा है, अनुकरणीय है। क्योंकि भारत एक ऐसा शांति-अहिंसामय देश है जिसका न कोई शत्रु है और न कोई प्रतिद्वंद्वी। सम्पूर्ण दुनिया भारत की ओर देख रही है, उसमें विश्व गुरु की पात्रता निरन्तर प्रवहमान रही है, हमने कोरोना महामारी के एक जटिल एवं संघर्षमय दौर में दुनिया के सभी देशों के हित-चिन्तन का भाव रखा, सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास मंत्र के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया कि वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है, का भारतीय दर्शन ही मानवता का उजला भविष्य है। इसी विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे बढ़ रहा है, वह एक अनोखा और दुनिया का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। यह भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे मुखर, सबसे प्रखर आवाज है। देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता उसका मूल उद्देश्य है। जैसे-जैसे संघ का वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रभाव देश और दुनिया में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित इस संगठन के बारे में जानने और समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। इस विशाल संगठन के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं। अंबेडकर की पुस्तक संघ से जुड़ी जिज्ञासाओं का प्रभावी, प्रासंगिक एवं तथ्यपरक विवेचन करती है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रीयता की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है। भारत की हिंदू अस्मिता, हिंदू समाज की उत्पत्ति व संघटन, विवाह, माता-पिता द्वारा संतान का पालन-पोषण, आपसी सौहार्द, सामाजिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता, आर्थिक स्थितियां, कृषि, जीवनशैली तथा ऐसे ही अन्य अनेक विषयों पर इसमें मुक्त भाव से चर्चा की गई है। भारत का विश्वगुरु के रूप में अभ्युदय एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा जिसकी विवेचना लेखक ने समग्र रूप से प्रस्तुत पुस्तक में की है, जो आजादी के पचहरवें वर्ष की आयोजना का मूल केंद्र है। राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व का अभियान लोकव्यापी बना और उसके वैचारिक पक्ष को समृद्ध बनाने में जिन लोगों का योगदान रहा उनमें डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार, एमएस गोलवाकर, वीर सावरकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय प्रमुख हंै। जो नये भारत के आदर्श पात्र एवं कर्णधार हैं। राजनीतिक स्वार्थों एवं संकीर्णताओं के चलते अब तक उनको उचित सम्मान नहीं मिला, अब संघ एवं भाजपा इसके लिये प्रयासरत है, जो नये भारत की बुनियाद को मजबूती देने के लिये आवश्यक है। न केवल व्यक्ति, परिवार बल्कि समाज, राष्ट्र और विश्व के संदर्भ में इन भारत निमार्ताओं ने आरएसएस का गहन और विस्तृत विश्लेषण करते हुए जो विचार दिए, उन्हीं विचारों को इस पुस्तक में संकलित कर हिंदुत्व अस्मिता एवं सुदृढ़ भारत का नया आलोक बिखेरा गया है। इस पुस्तक में सुनील आंबेकर ने हिंदुत्व की विशद् विवेचना करते हुए आरएसएस का विभिन्न संदर्भों- व्यक्ति, समाज, धर्म, शिक्षा एवं संस्कृति के साथ तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह पुस्तक संघ को परम प्रतिष्ठा देती है क्योंकि संभवत: इतनी सहज और सरल अभिव्यक्ति में संघ की गूढ़ एवं गहन विवेचना का यह अपना एक अनूठा प्रयास है। प्रस्तुत पुस्तक में संघ के प्रति जन दृष्टिकोण एवं संघ का राष्ट्र निर्माण में योगदान का समन्वित प्रस्तुतीकरण है। भारत के राजनीतिक भविष्य के संदर्भ में संघ अनुभव करता है कि यहां बहुत से राजनीतिक दल होंगे किंतु वे सब प्राचीन भारतीय परंपरा एवं आध्यात्मिक धरोहर का सम्मान करेंगे। आधारभूत मूल्य तथा हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के संबंध में एकमत होंगे। मतभेद तो होंगे लेकिन ये केवल देश के विकास के प्रारूपों के संदर्भ में ही होंगे। वहीं संघ के भविष्य के बारे में पुस्तक कहती है कि जब भारतीय समाज समग्र रूप में संघ के गुणों से युक्त हो जाएगा, तब संघ तथा समाज की दूरी समाप्त हो जाएगी। उस समय संघ संपूर्ण भारतीय समाज के साथ एकाकार हो जाएगा और एक स्वतंत्र संगठन के रूप में इसके अस्तित्व की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी। संघ देश के समक्ष चुनौतियों को लेकर भी अत्यंत गंभीर है। इनमें इस्लामी आतंकवाद, नक्सलवाद अवैध घुसपैठ, हिंदुओं की घटती जनसंख्या, हिंदुओं का धर्मांतरण जैसे विषय शामिल हैं। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह पुस्तक, जो संघ से परिचित हैं उनकी समझ एवं सोच को परिष्कृत करेगी।

Published / 2022-03-13 16:13:45
चार राज्यों की सफलता के बाद गुजरात में पीएम मोदी की रणभेरी

एबीएन डेस्क (अदिति फडणीस-विनय उमरजी)। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों में से चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जीत दर्ज करने के एक दिन बाद बगैर कोई समय गंवाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के दौरे पर गुजरात की सड़कों पर उतरे। इस राज्य में साल के अंत में चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री ने अहमदाबाद से पार्टी के चुनाव अभियान की प्रभावी शुरुआत शुक्रवार को कर दी। इसे एक आकस्मिक फैसला कहा जा सकता है क्योंकि भाजपा की राज्य इकाई को यात्रा आयोजित करने के लिए बहुत कम समय मिला। लेकिन फिर भी सड़कों पर भारी भीड़ दिखी क्योंकि मोदी फूलों से भरी एक खुली कार में सवार होकर रोडशो करते हुए हाथ हिला रहे थे। उनके रोड शो की शुरुआत हवाई अड्डे से लेकर गांधीनगर में भाजपा के राज्य मुख्यालय कमलम तक हुई जो हवाई अड्डे से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। मोदी ने पंचायत निकायों के एक लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों की रैली को भी संबोधित किया। वह नवरंगपुरा के सरदार पटेल स्टेडियम में शनिवार को खेल महाकुंभ 2022 में उपस्थित रहेंगे और राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। रोडशो के भाजपा मुख्यालय तक पहुंचने के वक्त तक "जय श्री राम", "भारत माता की जय" के नारे लगते सुनाई दे रहे थे। उनके सम्मान में एक विशाल रंगोली तैयार की गई थी और संतों और संन्यासियों की तर्ज पर भगवा रंग के कपड़े पहने प्रधानमंत्री ने अर्घ्य दिया। मोदी ने लोगों से खचाखच भरे सभा स्थल पर पंचायत प्रमुखों से कहा, गांव कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने में सफल रहे हैं। मैं ग्राम प्रधानों को उनके प्रयासों के लिए बधाई देता हूं। मैं देश के किसानों को भी बधाई देता हूं कि उनकी वजह से महामारी के दौरान खाद्य आपूर्ति प्रभावित नहीं हुई। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन के दौरान महात्मा गांधी और सरदार पटेल का जिक्र भी किया। प्रधानमंत्री ने कहा, गुजरात, बापू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की धरती है। बापू हमेशा ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर गांवों की बात करते थे। आज, जब हम अमृत महोत्सव मना रहे हैं ऐसे में हमें ग्रामीण विकास के बापू के सपने को पूरा करना चाहिए। उन्होंने गुजरात के एकमात्र प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का उल्लेख नहीं किया। उन्होंने कहा, ग्राम स्वराज के सपने को पूरा करने के लिए एक मजबूत पंचायती राज बुनियादी ढांचा महत्त्वपूर्ण है। सभी पंचायत सदस्य और सरपंच इस उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में काम कर रहे हैं। गुजरात में 2021 में पंचायत चुनाव आयोजित किए गए थे, हालांकि आधिकारिक तौर पर ये चुनाव दलों से इतर तर्ज पर लड़े गए थे लेकिन जिन अधिकांश उम्मीदवारों ने जीत हासिल की वे भाजपा के सदस्य हैं। भाजपा ने सभी 31 जिला पंचायतों के साथ-साथ 231 तालुका पंचायतों में से 196 और 81 नगरपालिकाओं में से 74 में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। राज्य में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केवल एक नगरपालिका और 18 तालुका पंचायतों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया जबकि एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी (आप) ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कांग्रेस जिन पंचायतों में सत्ता में थी वहां भी हार गई। इस बीच, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि आप गुजरात चुनाव भी उसी तर्ज पर लड़ने के लिए तैयार है जैसे कि उसने पंजाब में खुद को संगठित किया था और कहा कि दिल्ली और पंजाब मॉडल को गुजरात में भी दोहराया जाएगा।

Published / 2022-03-11 16:47:26
बुल्डोजर मंत्र के सामने सपा गई चूक...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अतुल सिन्हा)। उत्तर प्रदेश में डबल इंजन और बुल्डोजर का मंत्र कुछ इस कदर सिर चढ़कर बोला कि विपक्षी गठबंधन के सपने चकनाचूर हो गए। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग पूरी तरह फेल हुई तो प्रियंका गांधी का लड़की हूं, लड़ सकती हूं का जबरदस्त अभियान फ्लॉप हो गया। बेशक समाजवादी पार्टी एक मजबूत विपक्ष बनकर जरूर उभरने में कामयाब रहा। अगर आपने अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के अभियानों और सभाओं की भीड़ देखी होगी और खासकर अखिलेश यादव के हौसले देखे होंगे तो यह मानना मुश्किल हो रहा होगा कि आखिर नतीजे ऐसे कैसे आ गए। लेकिन भाजपा की जो कार्यशैली रही है और जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर तमाम दिग्गज नेताओं ने खुद को यूपी पर केन्द्रित किया है, उससे ये नतीजे बहुत हैरत नहीं पैदा करते। दरअसल, पिछले कई सालों से यूपी की सियासत एक खास दिशा में चलती रही है और अगर आप भाजपा की रणनीतियों पर गौर करें तो उसका सबसे बड़ा रणक्षेत्र यही प्रदेश रहा है। बेशक राम मंदिर और अयोध्या अब विवादास्पद या चुनावी मुद्दा न रहा हो, लेकिन मंदिर की राजनीति और हिन्दुत्व की प्रयोगशाला में भाजपा ने इस प्रदेश में अपनी पुख्ता जमीन जरूर तैयार कर ली है। उसे सबसे बड़ा फायदा अगर मिला है तो वह है यहां के बिखरे हुए और कमजोर विपक्ष का। सपा के दागदार अतीत और बसपा की लगातार कमजोर होती जमीन, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की बदहाली और इन तमाम पार्टियों से लोगों का तेजी से मोहभंग, भाजपा के लिए हमेशा से फायदेमंद रहा है। बतौर विपक्ष अगर देखें तो इस बार समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर से खड़े होने की कोशिश जरूर की है। चुनाव से पहले के गठबंधन की जो रणनीति बनी थी बेशक उस पर कई सवाल अब उठेंगे और उसकी खामियों का भी विश्लेषण जरूर होगा। लेकिन इतना तो जरूर है कि जब विपक्ष इतने खेमों में बंटा हो और सबके अपने-अपने अहंकार हों तो भला आप भाजपा जैसी पार्टी को सत्ता से कैसे उखाड़ सकते हैं। यूपी के चुनावी गणित कम पेचीदा नहीं हैं। जातिगत आधार पर देखें या धर्म-संप्रदाय के आधार पर, यहां मुख्य मुद्दे हर बार कहीं न कहीं गुम हो जाते हैं और वोटों का ध्रुवीकरण इन आपसी बयानबाजियों और आरोपों-प्रत्यारोपों के भावनात्मक जाल में उलझ कर रह जाता है। यूपी में जिस विपक्ष को कोरोना में सरकार की नाकामी, महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्या, छुट्टा पशु से त्रस्त किसान, लखीमपुर कांड या महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम लग रहे थे, वहीं भाजपा के लिए इनकी कोई अहमियत नहीं थी। विपक्ष लगातार लोगों में ये अवधारणा बनाने की कोशिश करता रहा कि योगी सरकार तमाम मोर्चों पर नाकाम रही है, वहीं योगी और उनकी टीम डबल इंजन, विकास की गाथाएं, सरकारी योजनाओं के लाभ को अंतिम आदमी तक पहुंचाने के साथ गुंडों, दंगइयों पर बुल्डोजर चलाने के साथ-साथ वाराणसी, अयोध्या और अन्य धर्मस्थलों के कायाकल्प की बात करते रहे। बेशक उनके लाभार्थियों ने उनकी बात सुनी और उन्हें दोबारा मौका दे दिया। लेकिन अब ये अहम सवाल है कि क्या इन नतीजों की रोशनी में हमें सपा या विपक्ष को एकदम कमजोर या असरहीन मान लेना चाहिए? क्या इसे 2024 में मोदी को वॉकओवर देने वाले नतीजे के तौर पर देखा जाना चाहिए? या फिर इससे सीख लेकर विपक्ष को नए और धारदार तरीके से अपनी रणनीति तैयार करने के तौर पर देखा जाना चाहिए। बेशक भाजपा ने यूपी में इतिहास रचा है। पहली बार प्रदेश में कोई सरकार दोबारा बनी है। इसने कई मिथक भी तोड़े हैं लेकिन पिछली बार की तुलना में देखें तो अखिलेश यादव की सपा को भी लोगों ने नकारा नहीं है। पिछली बार जहां विपक्ष सत्ता पक्ष के आगे कहीं नहीं ठहरता था, वहां इस बार वह एक मजबूत ताकत के तौर पर जरूर उभरा है। कांग्रेस को जरूर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आखिर उनकी स्टार महासचिव और लोगों से सीधा कनेक्ट करने वाली, भावनात्मक तौर पर जुड़ने की कोशिश करने वाली प्रियंका गांधी को भी लोगों ने क्यों ठुकरा दिया और क्यों अब कांग्रेस का वजूद इस नई पीढ़ी के नेतृत्व में लगातार खतरे में पड़ता दिख रहा है। अगर अब भी कांग्रेस अपने नेतृत्व में बदलाव और संगठन की खामियों को लेकर गंभीर नहीं हुई तो आने वाले कुछ राज्यों के चुनावों के साथ-साथ 2024 में उसकी हालत और खस्ता हो सकती है। यूपी तो एक बानगी भर है। मायावती की सोशल इंजीनियरिंग अब आम लोगों को या उनके तथाकथित वोट बैंक को कमरे में बंद होकर नहीं पसंद आ रही। न तो उनमें वो धार बची, न सियासत करने का वो जज्बा। ऊपर से उनके भाजपा के साथ दोस्ताना रिश्तों की चर्चा और आने वाले वक्त में उपराष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा। अब पता नहीं भाजपा के साथ भीतर ही भीतर उनकी क्या बात हुई कि उन्होंने पूरी पार्टी को ही दांव पर लगा दिया। ऐसे में अब भी अगर यूपी के लोगों के लिए उम्मीद की कोई किरण हैं तो वे थोड़े-बहुत अखिलेश यादव ही हैं। बेशक इस बार अखिलेश यादव ने अपने गठबंधन और प्रत्याशियों के चयन में कई रणनीतिक गलतियां कीं, जिसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। सपा के दागदार इतिहास को दोहराते हुए उन्होंने एक बार फिर ऐसे ही कई दागदार उम्मीदवार उतारने की गलती की। अपने सहयोगियों में न तो राष्ट्रीय लोकदल को सही प्रतिनिधित्व दे पाए और चाचा शिवपाल यादव को खुश करने के चक्कर में अपने ही कुछ लोगों को नाराज होने से भी नहीं बचा पाए। इससे कम से कम उन्हें पचास सीटों का नुकसान तो हुआ ही। जाहिर है ये सपा की अंदरूनी चिंता का विषय है और अखिलेश की टीम इसकी समीक्षा करेगी। लेकिन फिलहाल तो अगले पांच साल एक बार फिर योगी आदित्यनाथ और भाजपा के खाते में चले गए। जाहिर है हर पार्टी अपनी हार की रणनीतिक खामियों की समीक्षा करेगी, कुछ समय बाद फिर से उठ खड़ी भी होगी। कुछ का मोहभंग होगा तो कुछ फिर से सत्ताधारी पार्टी की तरफ दौड़ लगाएंगे, लेकिन सियासत में जंग कभी खत्म नहीं होती। खुद को फिर से स्थापित करने की कोशिश और सत्ता के दांवपेंच कभी कम नहीं होते। फिलहाल, यूपी में जश्न का माहौल है। भाजपा की जबरदस्त कामयाबी के बीच अब सबकी निगाह साल 2024 के इंतजार में है।

Published / 2022-03-09 16:08:31
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की असली परीक्षा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सूरज शाहदेव)। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दुनियाभर की नजर है।युध्द से पहले एक आशंका थी कि कही यह तीसरा विश्व युद्ध की शुरूआत न कर दे। लेकिन रूस के यूक्रेन में आक्रमण के बाद अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश यूक्रेन का साथ दे रहे है। तो वही दूसरी तरफ रशियन संगठन के 11 देशों के सेना मिलकर इस युद्ध मे भाग ले रहे है। यूक्रेन के साथ साथ पूरे विश्व को लगता था की अगर रूस यूक्रेन पर हमला करेगा तो नाटो देश की सेना यूक्रेन के साथ मिलकर रूसी सेना के साथ लड़ेंगे लेकिन जो नजारा देखने को मिल रहा है वह सोच से उलट है। ये नाटो के देश सिर्फ बन्दर घुड़की दे रहे थे सैन्य मदद से पूरी तरह से पीछे हट गए है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तो अपने सेना भेजने से साफ इंकार कर दिया है। रूस ने साफ साफ कहा है कि जो भी देश यूक्रेन के पक्ष में लड़ने आएगा उसे गंभीर अंजाम भुगतने पड़ेंगे। अभी भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिर वह इस मसले पर क्या रुख अख्तियार करे। दरअसल रूस भारत का लंबे समय से मित्र देश रहा है और अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक महत्ता का देश है। लिहाजा भारत दोनों में से किसी भी देश के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा। भारत शुरू से ही गुटनिरपेक्ष देश रहा है।प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूएसएसआर का गठन किया गया था और यूक्रेन भी इसका हिस्सा था। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो का गठन किया। और 1945 से लेकर 1991 तक लगातार रूस और अमेरिका के बीच शीत युद्ध चलता रहा। इस युद्ध मे कोई सेना नही कोई हथियार नही बल्कि मीडिया और बयानों के माध्यम से रूस को कमजोर करने की कोशिश होती रही। अमेरिका लगातार रूस को तोड़कर कमजोर करने की कोशिश में रहा। आखिरकार अमेरिका को यह सफलता 1991 में मिल ही गया और रूस से लगभग 15 देश अलग हो गए जिसमे यूक्रेन भी शामिल था। ब्लादिमीर पुतिन जब रूस के प्रधानमंत्री और बाद में राष्ट्रपति बने तब से वे लगातार रूस को मजबूत करने की कोशिश करते रहे जो देश रूसी संगठन से अलग हो गए थे उन्हें फिर से अपने साथ लाने में सफल हो गए। लेकिन 2010 में जब यूक्रेन ने रूस का विरोध करके नाटो में शामिल होने की कवायद शुरू की तो रूस नाराज हो गया। रूस-यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ. यानुकोविच को रूस का समर्थन हासिल था जबकि प्रदर्शनकारियों को अमेरिका और ब्रिटेन का. बगावत के चलते फरवरी 2014 में यूक्रेन के राष्ट्रपति यानुकोविच को देश छोड़कर रूस में शरण लेनी पड़ी थी। रूस ने 2014 में यूक्रेन के एक आइलैंड क्रीमिया पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब यूक्रेन और रसिया के बीच तनाव और बढ़ गया। वास्तव में रूस नही चाहता है कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो। नाटो एक सैन्य समूह है जिसमें अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे 30 देश शामिल हैं। अब रूस के सामने चुनौती यह है कि उसके कुछ पड़ोसी देश पहले ही नाटो में शामिल हो चुके हैं। इनमें एस्टोनिया और लातविया जैसे देश हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा थे। अब अगर यूक्रेन भी नाटो का हिस्सा बन गया तो रूस हर तरफ से अपने दुश्मन देशों से घिर जाएगा और अमेरिका जैसे देश उस पर हावी हो जाएंगे। अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन जाता है और रूस भविष्य में उस पर हमला करता है तो समझौते के तहत इस समूह के सभी 30 देश इसे अपने खिलाफ हमला मानेंगे और यूक्रेन की सैन्य सहायता भी करेंगे। रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन ने एक बार कहा था कि यूक्रेन को खोना रूस के लिए एक शरीर से अपना सिर काट देने जैसा होगा। यही कारण है कि रूस नाटो में यूक्रेन के प्रवेश का विरोध कर रहा है। यूक्रेन रूस की पश्चिमी सीमा पर स्थित है। जब 1939 से 1945 तक चले द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर हमला किया गया तो यूक्रेन एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जहां से रूस ने अपनी सीमा की रक्षा की थी। अब अगर यूक्रेन नाटो देशों के साथ चला गया तो रूस की राजधानी मास्को, पश्चिम से सिर्फ 640 किलोमीटर दूर होगी। फिलहाल यह दूरी करीब 1600 किलोमीटर है।इसे लेकर ही रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन नही चाहते थे कि यूक्रेन नाटो में शामिल हो और रूस के लिए खतरा बने। अब इन दोनों देशों के बीच छिड़ी जंग में पूरी दुनिया की नजर भारत के रुख पर है। अमेरिका सहित यूरोपियन देश चाहते है कि भारत रूस की आलोचना करे। लेकिन भारत अपनी सुरक्षा हित को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लेगा। भारत का सम्बंध रूस के साथ बहुत ही अच्छा है। भारत की 55 प्रतिशत सैन्य उपकरण रूस से ही आयात होते है। रूस जरूरत के समय खुल कर भारत का साथ देता रहा है। रूस भारत और चीन विवाद के बीच तटस्थ रुख अपनाया है। 1998 का परमाणु परीक्षण हो या फिर कश्मीर का मसला हो रूस हमेशा भारत के पक्ष में रहा है। ऐसे समय मे अगर भारत रूस के खिलाफ जाएगा तो चीन रूस के और नजदीक आएगा जो भारत के लिए खतरनाक हो सकता है।अत: भारत कभी अपने मित्र देश को नाराज नही करना चाहेगा। अभी पिछले 10 सालों से अमेरिका के साथ भी भारत का सम्बंध बहुत ही प्रगाढ़ हुआ है। अमेरिका भारत के साथ मिलकर क्वाड का गठन किया है जिसमे अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया एवम भारत शामिल है। इस क्वाड का गठन एशिया में चीन कि बढ़ती प्रभाव के खिलाफ किया गया है। अमेरिका भी अच्छी तरह से जानता है कि दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत एक बहुत ही अहम देश है अत: अमेरिका भी भारत को नाराज नही करना चाहेगा। जिस प्रकार से चीन और पाकिस्तान रूस के साथ अपना सम्बन्ध को मजबूत बनाने में लगे हुए है इसको लेकर भी भारत सतर्क है। यूक्रेन और रूस के मामले में भारत कोई भी फैसला लेगा तो इस बात पर भी गौर जरूर करेगा। अत: भारत रूस एवम अमेरिका दोनों को ही नाराज नही करना चाहेगा।

Published / 2022-03-09 15:18:40
मेडिकल की पढ़ाई : विदेश जाने से रोकने के क्या हैं उपाय...

एबीएन कैरियर डेस्क (विनय उमरजी)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही भारत में निजी भागीदारी बढ़ाने का आह्वान कर रहे हों ताकि छात्रों को चिकित्सा अध्ययन के लिए विदेश जाने की जरूरत महसूस न हो, लेकिन उद्योग का मानना है कि यह दायित्व सरकार का है। मोदी ने हाल ही में एक वेबिनार में कहा था आज हमारे बच्चे पढ़ने के लिए छोटे देशों में जा रहे हैं, खास तौर पर चिकित्सा शिक्षा में। वहां भाषा की दिक्कत होती है। फिर भी वे जा रहे हैं ... क्या हमारा निजी क्षेत्र इस क्षेत्र में बड़े स्तर पर प्रवेश नहीं कर सकता है? क्या हमारी राज्य सरकारें इस संबंध में भूमि आवंटन के लिए अच्छी नीतियां नहीं बना सकतीं? हालांकि कई उद्योग पर्यवेक्षकों और हितधारकों का कहना है कि सस्ती जमीन उपलब्ध कराने वाली राज्य सरकारें अकेले ही सरकारी और निजी या स्व-वित्तपोषित मेडिकल कॉलेजों के बीच मौजूदा मूल्य अंतर को पूरा नहीं कर सकती हैं। जहां एक ओर सरकारी कॉलेजों और सरकारी कोटे में 4.5 वर्षीय एमबीबीएस कार्यक्रम के लिए मेडिकल सीटों की लागत 15,000 रुपये सालाना होती है, वहीं दूसरी ओर निजी कॉलेजों में यह लागत सालाना 5-6 लाख रुपये और 15-17 लाख रुपये के बीच रहती है। गुजरात में एक स्व-वित्तपोषित कॉलेज के डीन ने नाम न छापने की शर्त पर कहा यहां तक कि ग्रामीण इलाके में भी किसी निजी कॉलेज की स्थापना के लिए करोड़ों रुपये की जरूरत होती है और यहां जमीन की समस्या सबसे कम होती है। डीन ने कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के अंतर्गत सरकारी मानदंड यह बात विनियमित करते हैं कि कॉलेज की प्रत्येक मेडिकल सीट के लिए उसे 4-5 गुना अधिक संख्या वाले बेड के साथ अस्पताल चलाने की भी जरूरत होती है। इसके अलावा प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय अन्य बुनियादी ढांचा और संकाय का वेतन भी रहता है। उदाहरण के लिए हमारे अपने पुस्तकालय की लागत हमें प्रति वर्ष 80 लाख रुपये से 90 लाख रुपये पड़ती है। चीन तथा यूक्रेन, फिलिपींस और किर्गिस्तान जैसे छोटे देश कहीं ज्यादा किफायती विकल्प प्रदान करते हैं, जबकि भारतीय योग्यता मानकों की जरूरत नहीं होती है। अहमदाबाद में विदेशी शिक्षा सलाहकार समीर यादव ने कहा कि जहां भारत में निजी चिकित्सा शिक्षा की लागत 80 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये के बीच है, वहीं दूसरी ओर चीन और फिलिपींस जैसे देशों में इसकी लागत 25 लाख रुपये है। बेलारूस में यह 30 लाख रुपये और रूस में 40 से 45 लाख रुपये है। यादव ने कहा इसके अलावा इन देशों के चिकित्सा कार्यक्रमों को अमेरिका और ब्रिटेन में मान्यता प्राप्त है और स्नातकों को पश्चिमी देशों में केवल लाइसेंसिंग परीक्षा पास करने की ही आवश्यकता होती है। विदेशी चिकित्सा शिक्षा सलाहकार करियर एक्सपर्ट के संस्थापक गौरव त्यागी का विचार है कि सरकार को किफायती फीस के साथ सरकार द्वारा संचालित कॉलेजों और मेडिकल सीटों की संख्या में विस्तार करने की जरूरत है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सहित कई सूत्रों का हवाला देते हुए नैशनल मेडिकल जर्नल आॅफ इंडिया में प्रकाशित तथा एनएमसी के अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड की अध्यक्ष अरुणा वाणीकर द्वारा सह-लेखन वाले एक वर्किंग पेपर में कहा गया है कि वर्ष 2020 में हालांकि भारत में 80,312 एमबीबीएस सीटें उपलब्ध थीं (इनमें से करीब 51 प्रतिशत सरकारी कोटे वाली थीं), लेकिन राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) में बैठने वाले छात्रों की 14 लाख की विशाल संख्या थी। नवीनतम अनुमानों के अनुसार, जहां वर्ष 2021 में नीट के आवेदनों की संख्या वर्ष 2018 की 13.3 लाख से बढ़कर वर्ष 2021 में करीब 16 लाख हो गई है, वहीं दूसरी ओर एमबीबीएस की उपलब्ध सीटों की संख्या 88,000 से कुछ अधिक है। त्यागी ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा के लिए जो छात्र विदेश जाते हैं, वे मुख्य रूप से चीन, रूस, यूक्रेन, फिलिपींस, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और जॉर्जिया जैसे देशों में जाते हैं। इस बात के बावजूद ऐसा है कि इनमें से कई देशों में, जिनमें चीन, रूस और यूक्रेन भी शामिल है, उनकी स्थानीय भाषा सीखने की आवश्यकता होती है, जिसे भारतीय छात्र भारत में पर्याप्त सीटों की कमी और नीट में खराब प्रदर्शन के कारण पांच से छह महीने में पूरा कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि इस बहिर्वाह को रोकने के लिए न केवल सरकारी सीटों की संख्या में वृद्धि करने की जरूरत है, बल्कि मेरिट कट-आॅफ पर फिर से विचार करने के अलावा निजी कॉलेजों द्वारा ली जाने वाली फीस को भी विनियमित करने की आवश्यकता है। वर्ष 2021 में नीट कट-आॅफ पासिंग मार्क्स और पर्सेंटाइल सामान्य वर्ग के लिए क्रमश: 720-138 और 50 वां तथा एससी/एसटी/ओबीसी के लिए 137-18 और 40वां था। एनएमसी जैसे निकायों के जरिये भारत द्वारा आवश्यक मानक के मुकाबले इन देशों में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रम के मानक में अंतर से छात्रों की परेशानी बढ़ रही है। उदाहरण के लिए वर्किंग पेपर के अनुसार विदेशों में अध्ययन करने वाले 18 से 20 प्रतिशत मेडिकल स्नातक भारत में विदेशी चिकित्सा स्नातक परीक्षा (एफएमजीई) पास कर सकते हैं। एफएमजीई भारत में राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) द्वारा आयोजित लाइसेंसधारक परीक्षा होती है। यह उन भारतीय नागरिकों के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं में से एक होती है, जो यहां मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए विदेशों में किसी कॉलेज से मेडिकल डिग्री प्राप्त करते हैं। पेपर में कहा गया है कि एनएमसी एमबीबीएस में प्रवेश के लिए आयु सीमा को हटाकर और सरकारी कोटे में एमबीबीएस के लिए फीस कम करने की सिफारिश करके इस मसले को हल करने की कोशिश कर रहा है। डीन ने कहा कि बोझिल प्रक्रिया और भारी निवेश की आवश्यकता के मद्देनजर सरकार को निजी मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के लिए मानदंडों को आसान करने की भी जरूरत है। डीन ने कहा कि किसी निजी अस्पताल के लिए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के वास्ते आवेदन कई चरणों से गुजरता है।

Published / 2022-03-08 16:04:24
जबरा बना रूस और बकरा यूक्रेन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आर जगन्नाथन)। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका तथा उसके वैश्विक साझेदारों ने बार-बार नियम आधारित विश्व व्यवस्था तथा लोकतंत्र को बचाने की बात कही है। यहां प्रश्न यह है कि आखिर किसके नियम? जब रूस और चीन तथा कुछ अन्य देश सोच रहे हैं कि वे नए नियम निर्माण करने वाले क्लब के सदस्य हैं लेकिन वे अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपने नियम चला रहे हैं तो हम किस नियम आधारित व्यवस्था की बात कर रहे हैं? नियम ताकत के अधीन हैं। विश्व व्यापार संगठन तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन के प्रवेश के नियमों को अमेरिका तथा उसके साझेदारों ने सन 1970 और 1980 के दशक में शिथिल किया क्योंकि वे चाहते थे कि चीन सोवियत संघ के खिलाफ संतुलन साधने के काम आए। भारत के लिए उन नियमों को शिथिल नहीं किया गया। अमेरिका नियम आधारित व्यवस्था की बात करता है लेकिन उसने कभी अपने बनाये नियम ही नहीं माने। जब अपने हितों की बात आती है तो अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी या वैश्विक सहमति लिए बिना किसी देश पर आक्रमण कर देता है। वियतनाम, कोरिया, इराक, अफगानिस्तान आदि इसके उदाहरण हैं। बड़ी ताकतों के लिए कोई नियम नहीं होते। पश्चिम में नियमों और कानूनों पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाता है। प्रमुख बात यह है कि नियमों को लागू करना होता है और केवल वही नियम लागू किए जा सकते हैं जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शक्तिशाली लोगों के लिए लाभप्रद हों या उनके लिए फायदेमंद हों जिन्होंने वे नियम बनाए हैं। अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध के बाद मुक्त व्यापार चाहता था क्योंकि उसे यूरोप और एशिया पर दबदबा बनाना था। चूंकि अमेरिका को किए जाने वाले हर निर्यात के मूल्य के रूप में डॉलर स्वीकार्य था इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आयातकों की भूमिका बढ़ी। परंतु एक बार चीन के आने के बाद इस नियम पर आधारित व्यवस्था लडखड़ाने लगी। अमेरिका ने पाया कि उसके नागरिकों को सस्ती चीनी वस्तुओं से फायदा हो रहा है, उसके उत्पादकों को सस्ते चीनी श्रम से लाभ मिल रहा है। ऐसे में उसने अपने तमाम रोजगार चीन स्थानांतरित किए। उसकी कंपनियां प्रतिस्पर्धी बनी रहीं क्योंकि उन्होंने पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल करके श्रम को स्थानांतरित किया और उत्पाद तथा सेवाएं तैयार कीं। इससे उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार भारत तथा उभरते बाजार वाले अन्य देशों में भी आए। यदि अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप जीत सके और वाम झुकाव वाले नेताओं के राष्ट्रपति या गवर्नर पदों के करीब पहुंचने की संभावना बनी तो इसलिए क्योंकि उसके नियम अब उस पर ही कारगर नहीं हैं। नियम आधारित व्यवस्था अमेरिका के भीतर से ही टूट रही है और यही कारण है कि हमें देश के भीतर ऐसा ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। यहां तक कि राजनीति के बाहर भी इस बात पर विचार कीजिए कि कैसे पुरुषों द्वारा बनाए गए नियम ध्वस्त हो रहे हैं क्योंकि महिलाएं उन्हें चुनौती दे रही हैं। जिस तरह आज पितृसत्ता उचित नहीं लगती वैसे ही अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन के नियम जो ईसाई अनुभवों और मूल्यों पर आधारित हों या चीन के नेतृत्व वाले कन्फूशियन मूल्यों पर आधारित नियम भी शायद लंबी अवधि में व्यवहार्य न हों। इनसे हम तीन नतीजों पर पहुंच सकते हैं। पहला, नियम तब तक काम करते हैं जब तक एक वर्चस्ववादी देश हो जिसने उनमें जमकर निवेश किया हो और जो नियम न बनाने वालों को कुछ लाभ सुनिश्चित करने की इच्छा रखता हो। अमेरिका के मुक्त व्यापार को यूरोप और एशिया के निर्यातक देशों से इसी के चलते लाभ मिला। उन्हें अमेरिकी लोकतंत्र से कोई लगाव नहीं था। बल्कि आरंभ में लाभान्वित होने वाले देशों में से ज्यादातर अधिनायकवादी थे। नियम और कानून कागज पर हो सकते हैं लेकिन प्रवर्तन क्षमता न हो तो वे वास्तविक दुनिया में काम नहीं करते। तीसरा, जब शक्ति द्विध्रुवीय हो या बहुध्रुवीय हो तब नियमों में निरंतर परिवर्तन करना होता है ताकि सभी के हितों का ध्यान रखा जा सके या फिर हमारे सामने दो समांतर व्यवस्थाएं उत्पन्न हो जाती हैं। इनमें से प्रत्येक के अपने नियम होते हैं। शीतयुद्ध के दौरान हमने ऐसा ही देखा जहां कुछ देश अमेरिका के नियम मानते थे तो कुछ अन्य सोवियत संघ के। द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्था में वही कानून बच सकता है जिसका क्रियान्वयन कमजोर हो, भले ही प्रत्येक ब्लॉक अपने मूल समूह पर कड़ाई से नियम लागू करता हो। इससे भारत जैसे देशों के लिए दिक्कत पैदा होती है जो एशिया में हैं और जिसे चीन के नेतृत्व वाले ब्लॉक के साथ कारोबार करना है। जबकि उसके सामने चीन-पाकिस्तान का सैन्य खतरा भी है। उसे अपने पक्ष में पश्चिमी ब्लॉक की जरूरत है। कमजोर वैश्विक नियम हमें बिना किसी एक पक्ष से जुड़े अपने हितों के बचाव की गुंजाइश देते हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश तथा अफ्रीका के कई देश इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि सार्वजनिक स्वीकार्यता वाले नियम उन पर नहीं थोपे जा सकते। ताकत एक ऐसा तत्त्व है जो नियम आधारित व्यवस्था की अनुमति देता है और फिलहाल इसे उभरती ताकतों से चुनौती मिल रही है। चीन का उभार हो चुका है लेकिन रूस दोबारा उभार के प्रयास में है। जापान और जर्मनी दोनों अपने-अपने उभार का प्रयास करेंगे। एक बार अगर जापान और जर्मनी का सैन्यीकरण हो गया तो अमेरिका अपने सहयोगियों के लिए भी नियम नहीं बना पाएगा। नियम निमार्ता के रूप में अमेरिका के दिन अब लदने वाले हैं। भारत के लिए दोहरी चुनौती है। पहला, उसे नियम निमार्ता क्लब का सदस्य बनना है तो उसे अर्थव्यवस्था मजबूत बनानी होगी और आंतरिक रक्षा क्षमता स्थापित करनी होगी। दूसरा, अल्पावधि में यानी हमारे 10 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के पहले हमें अमेरिका, चीन, रूस और जापान तथा यूरोपीय संघ के साथ सामंजस्य बनाना होगा। अल्पकाल में सामरिक अस्पष्टता चलेगी, बशर्ते दीर्घावधि के लक्ष्य स्पष्ट हों। यदि हम दोनों चुनौतियों का सामना कर सके तो 2030 के दशक तक भारत महाशक्ति बन सकता है। हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। (लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं)

Published / 2022-03-07 15:27:20
किसानों के लिए वरदान है पीएम मत्स्य संपदा योजना

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता सिंह)। नब्बे के दशक की शुरूआत में जहां देश में आर्थिक उदारीकरण बड़ा जोर -शोर से हो रहा था, वहीं दूसरी ओर इस प्रक्रिया में कृषि क्षेत्र बहुत ही पीछे छूट गया था।और भारत अपनी बढ़ती आबादी का भरण पोषण करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहने को मजबूर था। वर्तमान में नरेंद्र मोदी की सरकार कृषि के क्षेत्र में चौतरफा प्रयास करते हुए कृषि और कृषि से जुड़े विभिन्न तरह के व्यवसाय को सामने लाकर आत्मनिर्भर भारत कृषि कार्यक्रम को और मजबूत करते जा रही है। केंद्र की मोदी सरकार देश में कृषि और किसानों को मजबूत करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। इस बार के बजट में कृषि पर लगभग 40 लाख करोड़ रुपए का आवंटन इसी बात को दर्शाता है। इसके साथ ही कृषि और खेती किसानी से जुड़े क्षेत्रों पर अलग-अलग जोर देते हुए कृषि को समग्रता में देखने की कोशिश भी की जा रही है ।मोदी सरकार ने खेती किसानी के लिए व्यापक सोच के साथ अनेकों संभावनाओं को देखते हुए कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी लाई है। खेती किसानी पर बात करने से ही सामान्य धारणा बनती है- अनाज और सब्जी का उत्पादन। लेकिन मोदी सरकार ने आम जनों के बीच कृषि को समग्रता में देखने की दृष्टि भी पैदा की और साथ ही इसे जमीन पर उतारने की भरपूर कोशिश भी की है। मसलन पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, पोल्ट्री फॉर्म, तसर सिल्क उत्पादन आदि अनेकों ऐसे व्यवसाय हैं, जिस पर जोर दिया जा रहा है और साथ ही रोजगार के व्यापक द्वार को खोलने की कोशिश भी जारी है। केंद्र सरकार द्वारा देश में कृषि से जुड़े किसानों की आय में वृद्धि करने के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई जा रही है। इसके लिए देश के कृषि गतिविधियों से जुड़े किसानों, पशुपालकों के साथ अब केंद्र सरकार द्वारा मत्स्य पालन के व्यवसाय करने वाले किसानों को भी आर्थिक सहयोग देने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की शुरूआत की गई है। जिसे नीली क्रांति के नाम से भी जाना जा रहा है। इस योजना के माध्यम से केंद्र के साथ-साथ कई राज्य सरकारों के द्वारा मिलकर मत्स्य पालन का व्यवसाय करने वाले किसानों को 40 से 60% सब्सिडी का लाभ भी प्रदान किया जा रहा है। इसे शुरू करके किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना कृषि क्षेत्र पर केंद्रित एक अनवरत चलनेवाली विकास योजना है, जिसे आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत वित्त वर्ष 2020-21 से वित्त वर्ष 2024 -25 तक सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यान्वित किया जाना है। इस योजना के अंतर्गत 20,050 करोड़ रुपए का निवेश मत्स्य क्षेत्र में होने वाला सबसे अधिक निवेश है। इसमें लगभग 12,340 करोड़ रुपए का निवेश समुद्री अंतरदेशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि में लाभार्थी केंद्रित गतिविधियों पर तथा 7,710 करोड़ रुपए का निवेश फिशरीज इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए प्रस्तावित है। इस योजना के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर आय वर्ग के किसान, जिनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि मत्स्य पालन के व्यवसाय को शुरू करने के लिए उसमें अधिक पैसे खर्च कर सके, ऐसे सभी किसानों को सरकार योजना के माध्यम से 40% अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को सरकार द्वारा 60% तक की सब्सिडी का लाभ दिया जाता है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना को पूरे देश में 5 वर्ष के लिए लागू किए जाने के बाद सरकार का मुख्य लक्ष्य देश में 55 लाख युवाओं के लिए रोजगार उत्पन्न करने का रखा गया है। इसके साथ ही देश में वर्ष 2018 -19 में 46589 करोड़ रुपए निर्यात आय को बढ़ाकर 2024 -25 तक एक लाख करोड़ की दुगुना निर्यात आय करके 70 लाख टन का अतिरिक्त मछली उत्पादन करना है। जिससे देश में मछली पालन का व्यवसाय शुरू करने वाले किसान अपने व्यवसाय से अधिक मछली का बेहतर लाभ अर्जित कर सकेंगे। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना की प्रमुख बातों पर भी हमें गौर करना चाहिए। मछलियों की गुणवत्ता वाली प्रजातियों की नस्ल तैयार करने तथा उनकी विभिन्न प्रजातियां विकसित करने ,महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के विकास और विपणन नेटवर्क आदि पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। नीली क्रांति योजना की उपलब्धियों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कई कार्य किये जा रहे हैं।-जिसमें मछली पकड़ने के जहाजों का बीमा, मछली पकड़ने वाले जहाजों /नावों के उन्नयन हेतु सहायता ,बायो -टॉयलेट्स, लवण छारीय में जलीय कृषि, मत्स्य पालन और जलीय कृषि स्टार्ट-अप्स, इंक्यूबेटर्स, एक्वाटिक प्रयोगशालाओं के नेटवर्क और उनकी सुविधाओं का विस्तार, ई ट्रेडिंग /विपणन मत्स्य प्रबंधन आदि योजना शामिल है। झारखंड में मत्स्य पालन की असीम संभावनाएं देखने को मिल रही है। झारखंड में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत राज्य में पिछले साल 2.38 लाख मैट्रिक टन मछली का उत्पादन किया गया। और आगे 2024 -25 तक 1.5 लाख मैट्रिक टन अतिरिक्त मछली उत्पादन करने का लक्ष्य लिया गया है। ज्ञात हो कि झारखंड के लगभग 70 फीसदी मछली का सेवन करती है। राज्य में ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को मछली पालन के क्षेत्र में अवश्य आगे आना चाहिए, जिससे कि एक तरफ युवाओं को रोजगार मिल सके और दूसरी तरफ मछली व्यवसाय के क्षेत्र में वे आगे बढ़ सकें। यह कहना सही होगा कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना देश के कृषि और किसानों के लिए वरदान साबित हो रही हैं। वैसे तो देश में किसानों की आय बढ़ाने के मुद्दे पर राजनीतिक और नीतिगत चचार्एं तो खूब होती रही है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के रूप में इस क्षेत्र में सुधार करने में सक्षम अन्य दूसरी कोई सरकार नहीं रहीं। (लेखिका प्रदेश कार्यसमिति सदस्य भाजपा झारखंड हैं।)

Page 47 of 63

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse