एबीएन एडिटोरियल डेस्क (जीबीएस शास्त्री)। कोविड-19 के कारण गत छह माह के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्रालय के चुनिंदा अधिकारी उद्योग जगत के लोगों से वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिये ही रूबरू हुए हैं। अधिकारियों ने 2014 के बाद किए गए रक्षा नीति सुधारों के बारे में बात की। उनका कहना है कि ये सुधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के नारे के अनुरूप रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने वाले हैं। अधिकारी रक्षा क्षेत्र की 101 वस्तुओं की नकारात्मक आयात सूची, नई रक्षा अधिग्रहण नीति 2020 (डीएपी 2020) का जिक्र करते हुए स्वदेशीकरण पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि नई रक्षा उत्पादन एवं निर्यात संवर्द्धन नीति (डीपीईपीपी 2020) की मदद से सालाना रक्षा उत्पादन को बढ़ाकर 26 अरब डॉलर पहुंचाया जाएगा और हर वर्ष 5 अरब डॉलर के हथियार निर्यात किए जाएंगे। तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा उद्योग कॉरिडोर दो स्थापित किए जाएंगे। वे देश के रक्षा उद्योग में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदारीकरण का भी जिक्र करते हैं। गत 17 सितंबर को उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई की सीमा को उन कंपनियों के लिए 49 फीसदी से बढ़ाकर 74 फीसदी (स्वचालित रास्ते के जरिये) कर दिया जो नए लाइसेंस चाहती हैं। महज 13 दिन बाद 30 सितंबर को रक्षा मंत्रालय ने नई रक्षा खरीद नीति 2020 (डीएपी 2020) जारी कर दी जिसमें संशोधित एफडीआई सीमा का जिक्र नहीं था। नई नीति में कहा गया कि किसी कंपनी को भारतीय नागरिक के स्वामित्व वाला माना जाएगा जब उसमें 50 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी भारतीय नागरिक या भारतीय कंपनी के पास होगी। यानी एफडीआई की अधिकतम सीमा 49 फीसदी होगी। डीएपी 2020 में कंपनी अधिनियम 2013 में परिभाषित उपायों का भी हवाला दिया गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विभिन्न श्रेणियों में रक्षा निविदाओं में भाग लेने वाली कंपनियों का नियंत्रण भारतीय नागरिकों के हाथ में ही रहे। नीति में कहा गया है, नियंत्रण में अधिकांश निदेशकों की नियुक्ति का अधिकार या प्रबंधन पर नियंत्रण या नीतिगत निर्णयों पर नियंत्रण जिसमें उनकी अंशधारिता या प्रबंधन अधिकार अथवा अंशधारक समझौते या वोटिंग समझौते शामिल होंगे। इस विरोधाभास से कुछ सवाल उठते हैं : एफडीआई की सीमा को बढ़ाकर 74 फीसदी करने के पीछे इरादा क्या था? क्या 49 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली भारतीय कंपनियों के साथ अलग व्यवहार होगा और 74 फीसदी विदेशी हिस्सेदारी वाली कंपनियों के साथ अलग? अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनियां भारतीय रक्षा क्षेत्र में 74 फीसदी निवेश क्यों करेंगी जबकि कंपनी को भारतीय माना भी नहीं जाएगा और वे भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित श्रेणी में बोली भी नहीं लगा सकेंगी। रक्षा एफडीआई नीति सन 2001 में निजी क्षेत्र को मंजूरी के समय से ही उद्देश्य विहीन नजर आती है। रक्षा और विमानन क्षेत्र में 2001 से अब तक कुल एफडीआई बमुश्किल 3,454 करोड़ रुपये है। इसमें से 2,133 करोड़ रुपये की राशि वित्त वर्ष 2014-15 के बाद आई। रक्षा मंत्रालय ने कभी यह स्पष्ट नहीं किया कि रक्षा क्षेत्र में एफडीआई को उदार बनाकर क्या हासिल किया जाना है। सन 2001 में 26 फीसदी से 2016 में इसे 49 फीसदी किया गया और फिर यह 74 फीसदी तक पहुंचा। एक ओर इसे आधुनिक सैन्य तकनीक को भारत लाने के तरीके के रूप में देखा गया (मंत्रालय ने कहा भी है कि उच्च तकनीक वाली परियोजनाओं में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत होगी) तो दूसरी ओर एफडीआई को उदार बनाने को रक्षा उत्पादन बढ़ाने के तरीके के रूप में भी देखा जा रहा है। भले ही यहां सस्ते और मंझोले तकनीकी उपकरण बनें जिन्हें वैश्विक उपकरण निमार्ता भारत में श्रम सस्ता होने के कारण बनाएं। रक्षा एफडीआई को 100 फीसदी तक बढ़ाने को लेकर दी गई दलील इस गलत धारणा पर आधारित है कि रक्षा उद्योग बाजार संचालित है। बल्कि सरकार उच्च गुणवत्ता वाले सैन्य उपकरणों के निर्माण पर कड़ा नियंत्रण रखती है। बल्कि जब कोई रक्षा कंपनी विनिर्माण को भारत स्थानांतरित करने में बेहतरी देखती है तो यह निर्णय भी उसका बोर्ड नहीं भारत सरकार की मंजूरी पर निर्भर है। उन्नत रक्षा क्षमताओं वाले देशों में विधायी ढांचा मसलन अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय शस्त्र व्यापार नियमन आदि रक्षा तकनीक से जुड़े मसले देखते हैं। रक्षा एफडीआई की सीमा बढ़ाने और उसे 100 फीसदी करने के पीछे दलील यह है कि इससे विनिर्माण को बढ़ाया जा सकता है, रोजगार उत्पन्न किए जा सकते हैं और उत्पादन कौशल में सुधार किया जा सकता है। यह कौशल मध्यम तकनीक वाले उत्पाद मसलन इलेक्ट्रॉनिक सर्किटरी, फ्यूज बॉक्स या विमानों का लैंडिंग गियर बनाने के काम आता है। हम अपनी रक्षा जरूरत का 55-60 फीसदी आयात करते हैं जिसमें अधिकांश रूस, अमेरिका, फ्रांस और इजरायल से खरीदा जाता है। यदि इन देशों की कंपनियों को भारत में पूर्ण क्षमता वाली उत्पादन इकाइयां स्थापित करने दिया जाए तो बड़े आॅर्डर का अहम हिस्सा यहीं बन सकता है। इससे देश में उच्च गुणवत्ता वाली विनिर्माण इकाइयां तैयार होंगी, भले ही स्वामित्व विदेशियों का हो। आॅफसेट करारों के माध्यम से इस विकल्प को टटोला गया है लेकिन भविष्य की सभी प्रत्यक्ष विदेशी खरीद में यह शर्त जोड़ी जा सकती है कि वे भारत में पूर्ण स्वामित्व वाली इकाई स्थापित करेंगे। देश के रक्षा बाजार में पहुंच को सशर्त बनाया जा सकता है। यानी केवल उनके लिए जो देश में लंबी अवधि तक टिक सकें। वैश्विक कंपनियों को पूर्ण स्वामित्व वाली या 74 फीसदी स्वामित्व वाली विनिर्माण इकाइयां भारत में स्थापित करने से उच्च प्रतिस्पर्धा का माहौल बनेगा और भारतीय निजी और सरकारी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगी। शायद इससे देश के रक्षा उद्योग में तेजी आए और सामान्य से अलग उत्कृष्ट उत्पाद तैयार हों। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन डेस्क (तमाल बंद्योपाध्याय)। भारतीय बैंकिंग जगत की शीर्ष हस्तियों में शामिल के वी कामत ने कुछ दिनों पहले कहा था कि भारतीय बैंकिंग उद्योग पिछले 50 वर्षों में परिसंपत्ति गुणवत्ता एवं पंूजी की मात्रा के लिहाज से बेहतरीन स्थिति में है। कई दूसरे लोग एवं रेटिंग एजेंसियों का भी यही आकलन है। फरवरी में इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने वित्त वर्ष 2023 के लिए देश के बैंकिंग क्षेत्र के परिदृश्य में संशोधन किया। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि पिछले कई दशकों में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र इस समय सर्वाधिक अच्छी स्थिति में है। एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2020 से बैंकिंग क्षेत्र में शुरू हुआ सुधार का सिलसिला अब भी जारी है। इस रेटिंग एजेंसी के अनुसार अप्रैल की शुरूआत से मुख्य वित्तीय मानदंडों में और सुधार होगा। वास्तव में नकदी की उपलब्धता कम होगी और ब्याज दरें बढ़ेंगी जिनसे बैंकों के ट्रेजरी लाभ पर असर होगा मगर ब्याज दरें बढ़ने से इस नुकसान की भरपाई हो जाएगी। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निगमित ऋण बैंकों का कारोबार बढ़ाएंगे और वे इस मामले में खुदरा ऋणों की जगह ले लेंगे। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों का क्या कहना ह : मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का परिदृश्य संशोधित कर नकारात्मक से स्थिर कर दिया है। इस रेटिंग एजेंसी का मानना है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी से ऋण आवंटन में 10-13 प्रतिशत इजाफा हो सकता है और परिसंपत्ति गुणवत्ता में भी सुधार होगा। इसके अनुसार बैंकों की पूंजी कोविड-19 महामारी से पूर्व की स्थिति से भी अधिक हो जाएगी। एजेंसी के अनुसार इन सभी अनुकूल बातों से बैंकों का मुनाफा बढ़ेगा। एसऐंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने नवंबर 2021 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र एक बार फर मुनाफे में आ गया है और उनकी स्थिति पूंजी के लिहाज से मजबूत हो गई है। एक अन्य रेंटिंग एजेंसी एसऐंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलीजेंस (वित्तीय सूचना सेवा इकाई) का कहना है कि भारत के बैंकिंग उद्योग में पर्याप्त पूंजी है और फंसे ऋणों में खासी कमी आई है। इस एजेंसी ने आरबीआई के एक सर्वेक्षण का हवाला दिया है जो निवेशकों में बढ़ते आत्मविश्वास और आने वाली तिमाहियों में उत्पादन में तेजी आने का संकेत देता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जून 2020 में परिसंपत्तियों पर प्रतिफल और सरकार नियंत्रित बैंकों की पूंजी में सुधार हुआ है। इससे पहले पिछले चार वर्षों से मुनाफा अनुपात नकारात्मक रहा था। इन सभी बातों से लगता है कि बैंकिंग क्षेत्र के लिए अब संभावनाएं कई गुना मजबूत लग रही हैं। सभी कह रहे हैं कि भारतीय बैंकिंग उद्योग इतनी अच्छी हालत में कभी नहीं था। क्या वाकई ऐसा है? मगर भारतीय बैंकिंग उद्योग को लेकर मेरी राय कुछ अलग है। इसमें कोई शक नहीं कि कुछ बैंकों को छोड़कर बैंकिंग प्रणाली की स्थिति में खासा सुधार हुआ है। कुछ ऐसे बैंक जरूर हैं जिन्होंने सूक्ष्म ऋण खंड में अधिक ऋण आवंटित किए हैं मगर फंसी परिसंपत्तियां नियंत्रण में हैं और पूंजी की भी कोई कमी नहीं है। इसके साथ ही ऋण की मांग में भी इजाफा हो रहा है। बैंकों के पास काफी नकदी है इसलिए वे ऋण देना चाह रहे हैं। मगर समस्या यहीं खड़ी हो जाती है। चालू वित्त वर्ष समाप्त होने ही वाला है और दौरान कई बैंक कंपनियों को बंद लिफाफा भेज रहे हैं। ये ऐसी कंपनियां हैं जो अपना मौजूदा ऋण किसी दूसरे बैंक या वित्तीय संस्थान में सस्ती ब्याज दरों पर स्थानांतरित कराना चाहती हैं। हाल में ही सार्वजनिक क्षेत्र की एक इकाई ने 10 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाले बॉन्ड पर मिलने वाले प्रतिफल की तुलना में करीब 1.5 प्रतिशत अंक कम दर पर 15 वर्ष के लिए रकम जुटाई है। एक दूसरी इकाई ने 4 प्रतिशत से कुछ अधिक दर पर एक वर्ष के लिए रकम जुटाई है। कुछ बड़ी ऋण परियोजनाएं महंगे ऋण हटाकर दीर्घ अवधि के लिए ऋण ले रही हैं। वे करीब 7 प्रतिशत ब्याज दर पर 15 वर्षों के लिए ऋण ले रही हैं। बैंक ऐसे अवसरों पर दांव लगाने के लिए तैयार हैं क्योंकि निर्माण कार्य पूरा होने की वजह से नकदी प्रवाह में किसी तरह की बाधा आने की आशंका नहीं है। इस समय भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रीपो रेट 4 प्रतिशत और रिवर्स रीपो रेट 3.5 प्रतिशत हैं। मगर बैंक वैरिएबल रेट रविर्स रीपो नीलामी के तहत करीब 4 प्रतिशत ब्याज कमा सकते हैं। 4 प्रतिशत से अधिक ब्याज की पेशकश करने वाला कोई भी ऋण बैंकों को स्वीकार्य है। बैंकों से ऋण लेने वाली कंपनियां सस्ती दरों पर ऋण दूसरी जगह स्थानांतरित कर रही हैं। बैंकों के पास ऋण पर ब्याज के मसले पर मोल-भाव में शिरकत करने के आलवा कोई दूसरा विकल्प नहीं हैं। पहले कम दरों की पेशकश कर निजी बैंक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से ग्राहक छीन लेते थे मगर अब स्थिति बदल चुकी है और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच भी एक दूसरे के ग्राहक अपनी ओर खींचने की शुरूआत हो चुकी है। पहले ऐसी होड़ नहीं दिखी थी। बैंकिंग उद्योग को लेक इस नए उत्साह का नतीजा क्या होगा? बचतकर्ताओं को नुकसान हो रहा है क्योंकि कर कटौती के बाद महंगाई को मात देने के लिए पर्याप्त ब्याज वे नहीं अर्जित कर पाते हैं। बैंकों को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि उनका ब्याज मार्जिन कमजोर हो रहा है। केवल उधार लेने वालों को लाभ मिल रहा है। मगर यह भी सच है कि जब किसी को सस्ती रकम मिलती है तो जोखिम लेने की उसकी क्षमता भी बढ़ जाती है। वे उत्साह में आकर वे निवेश के लिहाज से कमजोर परियोजनाओं में निवेश कर बैठते हैं जिन्हें लेकर उन्हें पछतावा होता है। सस्ती रकम बेजा इस्तेमाल का भी कारण बनती है। क्या हम बैंकिंग उद्योग को लेकर समय से पहले ही अति उत्साह का शिकार हो गए हैं?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (प्रह्ललाद सबनानी)। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र एवं फार्मा उद्योग के लिए भी अब संयुक्त अरब अमीरात के द्वार खुल जाएंगे। पहले विशेष रूप से फार्मा क्षेत्र को अपने उत्पाद संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात करने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता था। हाल ही में भारत ने संयुक्त अरब अमीरात के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह एतिहासिक समझौता न केवल भारत और संयुक्त अरब अमीरात के द्विपक्षीय संबंधों को और भी मजबूती प्रदान करेगा बल्कि दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को 100 अरब डॉलर के स्तर के ऊपर ले जाने में भी सहायक होगा। इस समय अमेरिका एवं चीन के बाद, संयुक्त अरब अमीरात भारत का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी व्यापार का भागीदार है। भारत का किसी भी अरब देश (मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के देश) के साथ यह पहला व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता है और इस समझौते के अंतर्गत दोनों देशों के बीच विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं का विदेशी व्यापार बढ़ाने के साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा। साथ ही इस समझौते के अंतर्गत दोनों देश एक दूसरे के साथ की जाने वाली आयात एवं निर्यात की वस्तुओं पर आयात शुल्क एवं कस्टम शुल्क आदि को कम करेंगे एवं विदेशी व्यापार में आने वाली अन्य कठिनाइयों को भी दूर करने का प्रयास करेंगे। वर्तमान में भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात के बीच प्रतिवर्ष 60 अरब डॉलर का विदेशी व्यापार होता है तथा सेवा क्षेत्र में भी प्रतिवर्ष 15 अरब डॉलर का व्यापार होता है। संयुक्त अरब अमीरात एक तरह से भारत के लिए दक्षिण अफ्रीका का प्रवेश द्वार है एवं अफ्रीका आज आर्थिक क्षेत्र की दृष्टि से बहुत बड़ा बाजार है। अत: उक्त समझौते के बाद भारतीय उत्पादों को संयुक्त अरब अमीरात के बाजारों में प्रदर्शित कर अरब के अन्य देशों के साथ ही दक्षिणी अफ्रीकी देशों को भी निर्यात किया जा सकेगा। इससे भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच आर्थिक साझेदारी और भी मजबूत होगी। वैसे भी संयुक्त अरब अमीरात किसी भी आर्थिक क्षेत्र में भारत का प्रतिद्वंद्वी नहीं है अत: भारत द्वारा किया गया यह एक पहला ऐसा समझौता है जो कांप्लिमेंटरी अर्थव्यवस्था के साथ किया गया है अन्यथा भारत द्वारा अभी तक किए गए मुक्त व्यापार समझौते विनिर्माण क्षेत्र में मजबूत देशों के साथ किए गए हैं जैसे दक्षिण कोरिया, जापान या आसियान देशों के साथ हुआ है। भारत ने उक्त व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को मिलाकर अभी तक कुल 12 मुक्त व्यापार एवं क्षेत्रीय व्यापार समझौते विभिन्न देशों के साथ किए हुए हैं। यह मुक्त व्यापार समझौते भारत के विदेश व्यापार को रफ्तार देने में अहम भूमिका निभा रहे है। भारत ने पूर्व में श्रीलंका, नेपाल, दक्षिणी कोरिया, जापान, मलेशिया, मारिशस, अफगानिस्तान, चिली, मरकोसुर आदि देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते, व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) अथवा तरजीही व्यापार समझौते किए हैं। इसी प्रकार भारत ने कुछ क्षेत्रीय व्यापार समझौते भी किए हैं जैसे दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौता (एसएएफटीए), भारत एशिया एनएफटीए, एशिया पेसिफिक व्यापार समझौता, सार्क तरजीही व्यापार समझौता (एसएपीटीए), आदि। अब भारत द्वारा ब्रिटेन, अमेरिका एवं यूरोपीयन यूनियन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्रता से सम्पन्न किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं, क्योंकि जिन अन्य देशों के साथ उक्त देशों के मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए जा चुके हैं उन देशों को उक्त देशों के साथ विदेशी व्यापार करने में वरीयता प्रदान की जाती है जिसके कारण भारतीय व्यापारियों को उक्त देशों के साथ विदेशी व्यापार करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वर्ष 2015 के बाद से भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात कई क्षेत्रों में मिलकर कार्य कर रहे हैं एवं इस दौरान इन दोनों देशों के बीच आपस में सामरिक भागीदारी भी बढ़ी है, चाहे वह सुरक्षा का क्षेत्र हो, चाहे वह समुद्रीय क्षेत्र हो एवं चाहे वह दोनों देशों के नागरिकों के आपसी रिश्ते का क्षेत्र हो। आज संयुक्त अरब अमीरात एक ऐसा अरब देश है जिससे भारत के बहुत मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं। हाल ही के समय में आर्थिक रिश्तों के मजबूत होने के साथ ही भारत और संयुक्त अरब अमीरात की आपस में राजनैतिक निकटता एवं सूझबूझ भी बढ़ी है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का निर्यात बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में संयुक्त अरब अमीरात को भारत से 17 अरब डॉलर का निर्यात किया गया वहीं भारत ने 26 अरब डॉलर का आयात किया है। इस प्रकार इस समय भारत के लिए 9 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। परंतु भारत एवं संयुक्त अरब अमीरात के बीच हाल ही में संपन्न किए गए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के बाद भारत से निर्यात को संयुक्त अरब अमीरात में जीरो ड्यूटी का लाभ मिलेगा इससे भारत से संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात अधिक तेज गति से बढ़ेंगे इससे भारत को अपने व्यापार घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र एवं फार्मा उद्योग के लिए भी अब संयुक्त अरब अमीरात के द्वार खुल जाएंगे। विशेष रूप से फार्मा क्षेत्र को अपने उत्पाद संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात करने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता था क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात भारत से दवाईयों का आयात करने के पूर्व भारतीय फार्मा उत्पादक कम्पनियों का निरीक्षण करना चाहता था, परंतु अब संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अमेरिका के यूएसएफडीए द्वारा प्रदान की गई अनुमति के आधार पर भारतीय फार्मा उत्पादक कम्पनियों को संयुक्त अरब अमीरात में दवाईयों के निर्यात की अनुमति प्रदान कर दी जाएगी। साथ ही भारत से रत्नों, रक्षा उत्पादों, ग्रीन इनर्जी उत्पादों, मशीनरी आदि का निर्यात भी बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा। एक अनुमान के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात के साथ किए गए व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के बाद आने वाले समय में भारत में 10 लाख रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। उक्त वर्णित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत के लिए संयुक्त अरब अमीरात के साथ ही अब अरब खाड़ी के अन्य देशों यथा बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब एवं इराक के साथ भी विदेशी व्यापार बढ़ाने में मदद मिलेगी एवं इन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते किए जा सकेंगे। वैसे भी अब अरब खाड़ी के देश भारत के साथ न केवल अपने विदेशी व्यापार को आगे बढ़ाना चाहते हैं बल्कि भारत में भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी करना चाहते हैं। क्योंकि, ये देश भी अब समझने लगे हैं कि आगे आने वाले समय में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है अत: अब भारत से ये देश भी आर्थिक सम्बंध मजबूत करना चाहते हैं। अभी हाल ही में सऊदी अरब द्वारा भारतीय कम्पनी रिलायंस के साथ ही अन्य भारतीय कम्पनियों में भी भारी मात्रा में विदेशी निवेश करने की इच्छा व्यक्त की गई है। अरब खाड़ी के देशों में लगभग 130 लाख भारतीय निवास कर रहे हैं और इन समस्त देशों के नागरिकों तथा भारतीय नागरिकों का आपस में पहले से ही बहुत अच्छा समन्वय है। अरब खाड़ी के देशों की आय का मुख्य स्त्रोत पेट्रोलियम पदार्थों से है परंतु संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी निर्भरता पेट्रोलियम पदार्थों पर कम करते हुए अन्य आर्थिक क्षेत्रों पर ध्यान देना शुरू किया है जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज संयुक्त अरब अमीरात के सकल घरेलू उत्पाद में पेट्रोलियम पदार्थों का योगदान केवल 21 प्रतिशत रह गया है अर्थात 79 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद अन्य आर्थिक क्षेत्रों से प्राप्त हो रहा है, जोकि अपने आप में बहुत बड़ा परिवर्तन है। अरब खाड़ी के ही एक अन्य देश बहरीन ने अपनी निर्भरता पेट्रोलियम पदार्थों पर बहुत कम कर ली है एवं इसी प्रकार के प्रयास सऊदी अरब द्वारा भी किए जा रहे हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों के चलते खाड़ी के देश अब भारत से अपने व्यापार को बढ़ाना चाहते हैं एवं इन देशों के बड़े बड़े फण्ड एवं घराने अपने निवेश को भारत की मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
एबीएन डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्कूल-कालेजों में हिजाब पर प्रतिबंध को सही ठहरा दिया है। मेरी राय में हिजाब पहनना और हिजाब पर प्रतिबंध, दोनों ही गैर-जरूरी हैं। हमें उससे आगे की सोचना चाहिए। मुसलमान औरतें हिजाब पहनें, हिंदू चोटी-जनेऊ रखें, सिख पगड़ी-दाढ़ी-मूंछ रखें और ईसाई अपने गले में क्रास लटकाएं- ये निशानियां धर्म का अनिवार्य अंग कैसे हो सकती हैं? धर्म तो शाश्वत और सर्वकालिक होता है और इस तरह की ये बाहरी निशानियाँ देश-काल से बंधी होती हैं। आप जिस देश में जिस काल में रहते हैं, उसकी जरूरतों को देखते हुए इन बाहरी चीजों का प्रावधान कर दिया जाता है। इन्हें सार्वकालिक और सार्वदेशिक बना देना तो बड़ा ही हास्यास्पद है। यदि कनाडा की भयंकर ठंड में कोई पुरोहित सिर्फ धोती या लुंगी पहनकर पूजा-पाठ कराए या विवाह-संस्कार करवाए तो उसे ढेर होने से उसका परमात्मा भी नहीं बचा सकता। कनाडा में सिख पगड़ी पहनें तो वहां के मौसम में वह धक सकती है लेकिन अरब देशों में वह आरामदेह रहेगी क्या? इसी तरह पैगंबर मोहम्मद के जमाने में श्रेष्ठी महिलाओं को दुष्कर्मियों से बचाने के लिए और चालू औरतों से अलग दिखाने के लिए हिजाब का चलन शुरू किया गया था। अब उसी परंपरा को डेढ़ हजार साल बाद दुनिया के सभी देशों की मुसलमान औरतों पर थोप देना कहां तक उचित है? दुनिया के कई मुस्लिम और यूरोपीय देशों ने हिजाब पर प्रतिबंध लगा रखा है, क्योंकि चेहरे को छिपाने के पीछे दो गलत कारण काम करते हैं। एक तो अपराधियों को शै मिलती है और दूसरा सामूहिक अलगाव प्रकट होता है। सांप्रदायिकता पनपती है। मैं तो सोचता हूं कि हिंदू पर्दा और मुस्लिम हिजाब, दोनों ही औरतों के अधिकारों का हनन भी है। ऐसी असामयिक और अनावश्यक प्रथाओं का त्याग करवाने का अभियान धर्मध्वजियों को आगे होकर चलाना चाहिए। स्कूल-कालेजों में यदि विशेष वेश-भूषा का प्रावधान है तो उसे सबको मानना चाहिए लेकिन यदि कोई छात्रा हिजाब पहनकर कक्षा में आना चाहती है तो वह अपने आप को खुद मजाक का केंद्र बनाएगी। उसका हिजाब अपने आप उतर जाएगा। उसकी अक्ल पर पड़े हिजाब को आप अपने आप क्यों नहीं उतरने देते? तीन-चार हजार छात्र-छात्राओं के कालेज में पांच-छह लड़कियां हिजाब पहनकर आती रहें तो उससे क्या फर्क पड़ना है? यह हिजाबबाजी घोर सांप्रदायिकता, घोर अज्ञान और घोर पोंगापंथ के कारण भी हो सकती है। हमारी मुसलमान माँ-बहनें स्कूलों में ही नहीं, सर्वत्र इससे बचें, इसके लिए कानून से भी ज्यादा जिम्मेदारी है, हमारे मुल्ला मौलवियों की। वे यदि इस्लाम को आधुनिक बनाने और उसके बुनियादी सर्वहितकारी सिद्धांतों को मुसलमानों में लोकप्रिय करने का जिम्मा ले लें तो किसी कानून की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (महेश व्यास)। भारत में जून 2021 से उपभोक्ताओं की धारणा लगातार मजबूत हो रही है। जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ता धारणा सूचकांक (आईसीएस) 31.9 प्रतिशत ऊपर चढ़ा है। मार्च में समाप्त हुए पहले तीन सप्ताहों में सूचकांक में 8.2 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इस तरह कोविड महामारी की दूसरी लहर के बाद उपभोक्ताओं की धारणा को पहुंची चोट के बाद सूचकांक में शानदार तेजी आई है। दूसरी लहर के दौरान मार्च और जून 2021 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा में 15.5 प्रतिशत की कमी आई थी। जून के बाद जारी तेजी ने नुकसान की भरपाई कर ली है। उपभोक्ता धारणा में तेजी वैसे परिवारों की वजह से आई है जिनकी आय में एक वर्ष पहले की तुलना में इजाफा हुआ है। उन परिवारों का भी योगदान रहा है जिन्हें लगता है कि आने वाले वर्ष में उनकी आय बढ़ जाएगी। उन परिवारों की संख्या में भी इजाफा हुआ है जिन्हें लगता है कि एक वर्ष पहले की तुलना में उपभोक्ता वस्तुएं (कंज्यूमर ड्यूरेबल्स) खरीदने का यह बेहतर समय है। मगर चिंता की एक बात यह रही है कि यह आशावाद देश के सभी परिवारों के विचार में एक समान रूप से परिलक्षित नहीं हुआ। लोग अल्प एवं दीर्घ अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच उपभोक्ताओं की धारणा गरीब परिवारों में अधिक सुधरी है। वास्तव में इन परिवारों में धारणा में सुधार का महत्त्व थोड़ा इसलिए फीका पड़ जाता है क्योंकि कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के बीच गरीब परिवारों की धारणा पर सबसे अधिक चोट पड़ी थी। यानी में उनकी धारणा में सुधारा काफी निचले स्तर से हुआ है। सालाना 1 लाख रुपये से कम आय वाले परिवारों में उपभोक्ता धारणा 49.5 प्रतिशत मजबूत हुई। इससे पहले इसमें 28.7 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वैसे तो यह एक शानदार सुधार है मगर भारत में कुल परिवारों की धारणा के लिहाज से यह बहुत मायने नहीं रखता है। इन परिवारों का अनुपात कम है और भारतीय उपभोक्ता बाजार में इनकी हिस्सेदारी छोटी है। महामारी से पहले 2019-20 में इन परिवारों के समूह की कुल परिवारों की संख्या में हिस्सेदारी 9.8 प्रतिशत और सभी परिवारों की कुल आय में हिस्सेदारी 3.1 प्रतिशत थी। 2020-21 में कोविड महामारी के दौरान इस समूह की हिस्सेदारी बढ़ गई क्योंकि इस दौरान वृहद पारिवारिक स्तर पर आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी। कुल परिवारों और उनकी आय में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर क्रमश: 16.6 प्रतिशत और 5.7 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2020-21 में इन अनुपातों में कोई खास बदलाव नहीं देखा गया। वर्ष 2021-22 में 1 लाख से 2 लाख रुपये सालाना आय वाले परिवारों की संख्या घटती प्रतीत हो रही है। इससे पहले 2017-18 और 2020-21 में ऐसे परिवारों की हिस्सेदारी देश के कुल परिवारों में 44-45 प्रतिशत हुआ करती थी। मगर 2021-22 की पहली छमाही में उनकी हिस्सेदारी कम होकर 25 प्रतिशत रह गई। कुल आय में उनकी हिस्सेदारी भी 31 प्रतिशत से कम होकर 14 प्रतिशत रह गई। इस समूह की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 31 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसा लग रहा है कि कई परिवार अब 1-2 लाख रुपये आय के दायरे से ऊंची आय वाले दायरे में आ रहे हैं। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि 2021-22 की पहली छमाही में इस दायरे में परिवारों की संख्या में कमी आई है मगर कम आय श्रेणी में आने वाले परिवारों की संख्या अपरिवर्तित रही है जबकि ऊंची आय श्रेणी में परिवारों की संख्या बढ़ी है। इस वर्ष की पहली छमाही में परिवारों की आय में सुधार के संकेत स्पष्ट थे। शेष महीनों के आंकड़े अभी नहीं आए हैं। मगर उपभोक्ताओं की धारणा में लगतार सुधार से संकेत मिलते हैं कि पारिवारिक आय में 2021-22 की दूसरी छमाही में भी सुधार जारी रह सकता है। सालाना 2 लाख से 5 लाख आय वाले परिवारों की उपभोक्ता धारणा जून 2021 और फरवरी 2022 के बीच 28.3 प्रतिशत बढ़ गई। यह आय दायरा भारतीय उपभोक्ता बाजार का सबसे महत्तवपूर्ण खंड बन गया है। देश में कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 50 प्रतिशत है और कुल परिवारों की आय में इनका हिस्सा 56 प्रतिशत है। हाल तक कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 33 प्रतिशत और कुल आय में 45 प्रतिशत हुआ करती थी। पूर्ण रूप से कहें तो उपभोक्ता धारणा सूचकांक इस आय समूह में दूसरे आय समूहों की तुलना में सबसे ऊंचे स्तर पर है। सालाना 5 लाख से 10 लाख रुपये अर्जित करने परिवारों में उपभोक्ता धारणा सूचकांक जून 2021 के बाद 8.1 प्रतिशत तक बढ़ गई। कोविड महामारी की दूसरी लहर में इस आय वर्ग में आने वाले परिवार प्रभावित नहीं हुए थे। उनकी धारणा स्थिर हो गई थी मगर दूसरे समूहों की तरह नीचे नहीं गई थी। ऐसे परिवारों का अनुपात अपेक्षाकृत छोटा है। सभी परिवारों में इनकी हिस्सेदारी केवल 7.1 प्रतिशत है मगर कुल परिवारों की आय में इनकी हिस्सेदारी 19.7 प्रतिशत है। भारत के कुल उपभोक्ता बाजार में सालाना 10 लाख से अधिक आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या छोटी है। 2021-22 की पहली छमाही में देश के कुल परिवारों में इनकी हिस्सेदारी 0.9 प्रतिशत और कुल आय में हिस्सेदारी 5.2 प्रतिशत थी। दूसरी लहर में ऐसे परिवारों की उपभोक्ता धारणा में 3.9 प्रतिशत की कमी आई थी। तब से इनमें सुधार 1.2 प्रतिशत के साथ उत्साजनक नहीं रहा है। दिसंबर 2021 में इस समूह की उपभोक्ता धारणा शिखर पर पहुंच गई थी मगर जनवरी और फरवरी 2022 दोनों में इनमें गिरावट आई है। ऐसे समूह की आय का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा बचत मद में चला जाता है। ऐसा लगता है कि शेयर बाजार में गिरावट की वजह से इस समूह की धारणा पर असर हुआ है। मध्य-आय वर्ग वाले लोगों की आय में सुधार हो रहा है और यह बात उनकी मजबूत होती धारणा में भी परिलक्षित होती है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शैली सेठ मोहिले)। शनिवार मध्य रात से भारत से अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शुरू हो जाएंगी, ऐसे में गर्मी की छुट्टियों में लोग घरेलू बाजार के बजाय विदेश में छुट्टियां मनाने जा सकते हैं। लेकिन इसकी वजह से घूमने वाली कोई भी जगह कम आकर्षक नहीं होगी। पर्यटन और होटल कारोबार के लोगों के लिए इस वक्त काफी गर्मजोशी का माहौल है क्योंकि देश और विदेश की यात्रा में मांग बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि लोग गर्मी के महीने में ठंडी जगहों पर जाएंगे। एक अति लक्जरी होटल ब्रांड पोस्टकार्ड होटल के संस्थापक कपिल चोपड़ा का कहना है कि घरेलू पर्यटन बाजार, विदेशी बाजार की तुलना में 10 गुना बड़ा है। उनका कहना है कि पोस्टकार्ड के नियमित मेहमान निश्चित तौर पर यूरोप जैसी जगहों पर छुट्टियां मनाने के लिए जाएंगे लेकिन इसका असर कारोबार पर नहीं पड़ेगा क्योंकि प्रॉपर्टी की मांग अधिक रही है। पोस्टकार्ड को उम्मीद है कि घरेलू पर्यटकों से फायदा मिलेगा। वह दावा करते हैं, घरेलू पर्यटकों के लिए लोग हमें चुनेंगे। मांग से उत्साहित पोस्टकार्ड होटल ने इस गर्मी में सालाना 35 फीसदी वृद्धि की उम्मीद की है। लीजर होटल ग्रुप के निदेशक विभास प्रसाद का कहना है कि घरेलू पर्यटक काफी लंबे समय तक घरों में बंद थे ऐसे में वे बड़ी तादाद में मशहूर जगहों पर इक_ा हो रहे हैं और उन्होंने एक नया ट्रैवल सर्किट तैयार किया है। उन्होंने कहा, हमारा पूरा जोर पहाड़ों में प्रायोगिक लक्जरी पर रहा है जिसके चलते यह बात सुनिश्चित हुई कि ज्यादा रकम चुकाने वाले ग्राहकों के लिए यह तरजीही होटल चेन है। ईजमाईट्रिप के सह संस्थापक प्रशांत पिट्टी के मुताबिक पिछले दो सालों में घरेलू पर्यटन की हिस्सेदारी महामारी से पहले के दौर के 66 फीसदी से बढ़कर 96 फीसदी हो गई है। वह कहते हैं, हम यह मानते हैं कि मई, जून और जुलाई महीने में मांग में भारी बढ़ोतरी होगी। पर्यटकों की तादाद अधिक बढ़ने पर हवाई किराये में भी बढ़ोतरी होगी। ज्यादा मांग और सीमित आपूर्ति के चलते औसत रोजाना दर में तेजी रहेगी और पर्यटकों को अधिक प्रीमियम का भुगतान उसी तरह करना पड़ेगा जिस तरह सर्दी की छुट्टियों के दौरान उन्होंने किया था। चोपड़ा और प्रसाद की तरह रोजिएट होटल्स ऐंड रिजॉर्ट्स के मुख्य कार्याधिकारी अधिकारी खुश कपूर भी इस गर्मी में मांग में बढ़ोतरी देख रहे हैं। हालांकि उन्हें घरेलू लोकेशन की मांग बढ़ने की उम्मीद है। उनका कहना है, यूक्रेन के युद्ध के चलते और महामारी के डर से आशंका की स्थिति बनी हुई है। कोई भी अपने परिवार और घर को छोड़कर विदेश यात्रा नहीं करना चाहता है। ऐसे में घरेलू यात्रा के रुझान में ही तेजी आएगी। रोजिएट ने अप्रैल और मई महीने के लिए खूब बुकिंग की है। कपूर का कहना है, ऋषिकेश में हमारी प्रॉपर्टी पहले ही बेची जा चुकी है। विदेशी यात्रियों के लिए कॉरपोरेट बुकिंग की शुरूआत हो चुकी है। करीब 160,000 ब्रांडेड होटल रूम में से लीजर होटल की हिसस्सेदारी केवल 4 फीसदी है। नोएसिस कैपिटल ऐंड एडवाइजर्स के सीईओ नंदीवर्धन जैन का कहना है, मांग-आपूर्ति में असंतुलन बने रहने की उम्मीद है जब तक कि पाइपलाइन की सभी नई इन्वेंट्री तैयार है। नतीजतन ब्रांडेड प्रॉपर्टी महंगी बनी रहेगी। देश भर में पोस्टकार्ड की 23 निर्माणाधीन प्रॉपर्टी है। चोपड़ा का कहना है, प्रत्येक तीन महीने में एक नए पोस्टकार्ड की ओपनिंग हो रही है। उत्तर भारत में लीजर होटल्स की 29 प्रॉपर्टी है और इसने चार और प्रॉपर्टी उत्तराखंड, भीमताल, नौकुचियाताल और मसूरी में प्रॉपर्टी तैयार करने की योजना बनाई है। इसके अलावा इसने गोवा और राजस्थान में भी नई प्रॉपर्टी स्थापित करने के लिए बातचीत की है। रोजिएट ने भी परिसंपत्ति डेवलपरों के साथ बातचीत करनी शुरू कर दी है और यह विस्तार की योजना बना रही है। भारत में सरकार ने रेल नेटवर्क और सड़क में निवेश की योजना के साथ-साथ छोटे शहरों में हवाईअड्डे के निजीकरण पर जोर दिया है जिससे कई क्षेत्रीय पर्यटन स्थलों तक संपर्क स्थापित होगा। थॉमस कुक इंडिया और इसकी समूह कंपनी एसओटीसी ट्रैवल ने अल्ट्रा फ्लेक्सीबल हॉलिडे की योजना बनाई है जिसकी लागत 99,000 रुपये है। आठ दिनों के टूर पैकेज में पांच दिन स्विटजरलैंड के साथ तीन दिन फ्रांस, इटली या आॅस्ट्रेलिया में बिताने का विकल्प है। इसके अलावा दक्षिण पूर्व एशिया के लोकप्रिय स्थानों जैसे कि सिंगापुर और थाईलैंड में पर्यटन बोर्ड भी रोडशो का आयोजन कर रहे हैं और वे भारतीय पर्यटकों के लिए आकर्षक ट्रैवल पैकेज की शुरूआत कर रहे हैं।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (श्याम पोनप्पा)। यह भारत में दूरसंचार क्षेत्र और मोबाइल फोन की विकास कहानी शुरू होने के पहले की बात है। उस समय दूरसंचार क्षेत्र अटकी हुई हालत में था। करीब 15 दूरसंचार आॅपरेटर ऊंचे लाइसेंस शुल्क के बोझ, उपभोक्ताओं की सीमित संख्या और तगड़ी प्रतिद्वंद्विता में फंसे हुए थे। भारी कर्ज तले दबे आॅपरेटरों के पास अधिक राजस्व कमाने के लिए नेटवर्क स्थापित करने के पैसे भी नहीं बचे थे। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी टीम ने उद्योग जगत एवं पेशेवरों के साथ मिलकर साहसिक कदम उठाया और उसका जादुई नतीजा निकला। कुछ रचनात्मक नीतियां लागू करने से दूरसंचार जगत में जबरदस्त वृद्धि का रास्ता खुला और बाजार एवं व्यवहार में व्यापक बदलाव भी आए। इस दिशा में घटनाक्रम की शुरुआत 1998 में हुई जब प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने दूरसंचार क्षेत्र की समस्याओं पर गौर करने का निर्णय लिया। आईसीआईसीआई और औद्योगिक लागत एवं कीमत ब्यूरो की तरफ से किए गए अध्ययनों पर गौर करने के बाद पीएमओ ने सरकार के भीतर और बाहर के पेशेवरों, उद्योग जगत के हितधारकों और वित्तीय संस्थानों से सलाह-मशविरा किया। इस तरह एनटीपी-99 का खाका तैयार हुआ। भले ही ये नीतियां सर्वोत्कृष्ट नहीं थीं क्योंकि उद्देश्य-उन्मुख प्रक्रियाओं के साथ राजनीतिक अनुकूलन का भी मेल था लेकिन एक बुनियादी प्रगति यह थी कि सरकार ने लाइसेंस के लिए लगाई बोली पर अग्रिम भुगतान के बजाय अर्जित राजस्व के हिस्से के तौर पर आॅपरेटरों से ही शुल्क एकत्रित किए। यह एक मुश्किल राजनीतिक निर्णय था क्योंकि लोगों के बीच यह गलत धारणा थी इसे आॅपरेटरों को मुफ्त में ही दे दिया गया। लेकिन अदालत में घसीटे जाने के बावजूद सरकार अपने फैसले पर अडिग रही और नतीजों ने साबित कर दिया कि यह फैसला पूरी तरह से सार्वजनिक हित में लिया गया था। वैसे राजस्व में सरकारी हिस्सेदारी काफी अधिक रखे जाने से शुरूआत में उतनी सफलता नहीं मिली। लेकिन वर्ष 2004 में हुई दो घटनाओं ने हालात बदल दिए। अर्जित राजस्व में सरकार की हिस्सेदारी को घटाकर आठ फीसदी कर दिया गया और किसी कॉल के लिए कॉलर एवं रिसीवर दोनों को भुगतान करने के बजाय सिर्फ कॉलर पर ही उसका बोझ डालने का फैसला लिया गया। इस कदम से मांग एवं आपूर्ति दोनों को ही बढ़ावा मिला और मोबाइल फोन की संख्या में विस्फोटक वृद्धि का रास्ता तैयार हो गया। नतीजा यह हुआ कि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते एवं सबसे आकर्षक बाजारों में से एक बन गया। आगे चलकर सरकार ने नीलामी को बोली से कहीं अधिक राजस्व हिस्सेदारी के जरिये इकट्ठा कर लिया। ऐसा होने के बावजूद यह बात समझ से बाहर है कि आगे की सरकारों ने अपना राजस्व बढ़ाने के लिए दूरसंचार क्षेत्र पर ध्यान नहीं दिया और इसे पतन की राह पर डाल दिया। आज का दूरसंचार संकट काफी कुछ 1998 जैसा ही है। हमारी नियामकीय नीतियों का परिणाम शुल्क दरों को लेकर जंग छिड़े एवं अपने पड़ोसी को गरीब बनाने की रणनीति के रूप में सामने आया। ऐसा तब है जब अधिकतर लोगों को अच्छी एवं भरोसेमंद सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस तरह भारत में दूरसंचार सेवाओं की दरें बेहद कम होने की वजह से लंबे समय तक नहीं टिक सकती हैं। उच्चतम न्यायालय के उस फैसले ने दूरसंचार आॅपरेटरों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं जिसमें स्पेक्ट्रम धारकों पर पिछली तारीख से समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) लगाने के सरकारी रुख को सही बताया है। मौजूदा सरकार को वाजपेयी सरकार की तरह कदम उठाने के लिए संकल्प जुटाने की जरूरत है। दूरसंचार क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए सरकार को एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप करना होगा। स्पेक्ट्रम उपयोग के लिए नीलामी शुल्क के बजाय राजस्व-हिस्सेदारी का तरीका अपनाया जाए। वर्ष 1999 में भी स्पेक्ट्रम लाइसेंस शुल्क के लिए राजस्व हिस्सेदारी का रास्ता अपनाया गया था। ऐसा होने पर स्पेक्ट्रम का महज सरकारी राजस्व के बजाय संपर्क एवं प्रगति के एक सार्वजनिक संसाधन के तौर पर अधिक तर्कसंगत उपयोग हो सकेगा। अतिरिक्त स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क खत्म कर देने से विकास एवं वृद्धि के लिए संचार सेवाएं मुहैया कराई जा सकेगी और बाकी दुनिया की तुलना में भारत में क्षमता की खामी भी सुधार सकेगी। अगर अत्यधिक लाभ होता है या फंड को अनुचित राह पर डाला जाता है तो एक अप्रत्याशित लाभ का प्रावधान भी रखा जा सकता है। नई तकनीकों को लागू करने वाली नीतियां लागू हों। मसलन, गूगल पिक्सल फोन का नवीनतम संस्करण भारत में इसलिए नहीं जारी किया जा सका है कि यहां पर 60 गीगाहर्ट्ज सीमित बैंडविड्थ पर ही उपलब्ध है। इसी तरह 5जी तकनीक के मामले में भारत पहले ही पिछड़ चुका है और स्पेक्ट्रम संपर्क में बड़ा बदलाव लाए बगैर उसे 5जी का लाभ उठाने में वर्षों लगेंगे। बढ़े हुए उत्पादन के लिए ब्रॉड बैंड मुहैया कराने के लिए स्पेक्ट्रम पूलिंग की जाए। इसे भू-स्थिति डेटाबेस चालित साझा स्पेक्ट्रम के जरिये अंजाम दिया जा सकता है जैसा कि यूरोप में लाइसेंसशुदा साझा स्पेक्ट्रम (एलएसए) या अमेरिका में प्राधिकृत साझा स्पेक्ट्रम (एएसए) के दौरान हुआ है। संभवत: स्पेक्ट्रम साझेदारी को ढांचागत क्षेत्र के प्रति कंसोर्टियम नजरिया और डिलीवरी के लिए बिना बंडल एवं उपयोग-आधारित लागत अपनाया जाए। नेटवर्क विकास एवं प्रबंधन जैसे आधारभूत ढांचे को सेवा से अलग कर ऐसा किया जा सकता है। एक और संभावना यह है कि दो-तीन एकीकृत कंसोर्टियम मौजूद हों जिसमें से हरेक के पास अपना आधारभूत ढांचा हो। इसके लिए अधिक पूंजी निवेश की जरूरत होगी।दूरसंचार कारोबार में विविध सरकारी एजेंसियां शामिल होती हैं, मसलन दूरसंचार विभाग, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, ट्राई, वित्त और कानून मंत्रालय के अलावा राज्य सरकारें भी इसका हिस्सा होती हैं।मोबाइल टेलीफोनी के बगैर काम करना आज अविश्वसनीय नजर आता है। अपने लाभ के लिए दूरसंचार का इस्तेमाल करने वाले नेताओं के बजाय मौजूदा संदर्भों में ये मौके वर्षों तक छूट जाने की संभावना है, जब तक कि सरकार ठोस कार्रवाई का साहस एवं संकल्प न दिखाए।
एबीएन डेस्क (भरत झुनझुनवाला)। यूक्रेन के युद्ध ने ईंधन तेल की समस्या को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। कुछ माह पूर्व विश्व बाजार में कच्चे तेल का दाम 80 रुपए प्रति बैरल था जो बढ़कर वर्तमान में 110 रुपये हो गया है। आगे इसके 150 डॉलर तक चढ़ने की संभावना बन रही है। ऐसी परिस्थिति में वर्तमान में पेट्रोल का दाम 100 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 130 रुपये प्रति लीटर तक होने की संभावना है। हमारे लिए यह संकट है; क्योंकि हम अपनी खपत का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करते हैं। यूक्रेन युद्ध अथवा ऐसे ही अन्य संकट के कारण यदि तेल की सप्लाई कम हो गई और इसके दाम बढ़ गए तो हमारी पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। हमारे पास ऊर्जा के दूसरे स्रोत भी नहीं हैं। तेल यूं ही कम है। कोयला हमारे पास लगभग आने वाले 150 वर्ष की सामान्य जरूरत के लिए है परंतु जैसे-जैसे हम कोयले का खनन करते हैं वैसे-वैसे उसकी गुणवत्ता कम होती जाती है और इसलिए हम वर्तमान में ही कोयले का भारी मात्रा में आयात कर रहे हैं। यूरेनियम भी अपने देश में कम है, जिसके कारण हम परमाणु ऊर्जा नहीं बना सकते हैं। हमारे पास केवल दो स्रोत बचते हैं- सोलर एवं हाइड्रो पॉवर। सोलर के विस्तार के लिए सरकार ने प्रभावी कदम उठाए हैं और इसमें तेजी से वृद्धि भी हुई है परंतु आकलनों के अनुसार इस तीव्र वृद्धि के बावजूद 2050 में सोलर ऊर्जा से हम केवल अपनी 14 प्रतिशत जरूरतों की पूर्ति कर सकेंगे। इसलिए सोलर पॉवर हमारी ऊर्जा सुरक्षा का स्तंभ नहीं बन सकता है। हाइड्रो पॉवर की भी सीमा है क्योंकि तमाम नदियों के ऊपर बंपर से बंपर जुड़े हुए हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट पहले ही लग चुके हैं। बची हुई नदियों के ऊपर हम हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट लगा भी दें तो भी इनके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भारी हैं। जैसे पाया गया है कि हाइड्रो पावर के बड़े तालाबों में मच्छर पैदा होते हैं और उन क्षेत्रों में मलेरिया का प्रकोप अधिक होता है। पानी की गुणवत्ता का ह्रास होता है। नदी का सौंदर्य जाता रहता है। मछलियां मरती हैं और जैव विविधता समाप्त होती है। अतः जब हम हाइड्रो पॉवर बनाते हैं तो हमारे जीवन स्तर पर एक साथ दो विपरीत प्रभाव पड़ते हैं। एक तरफ हमें बिजली उपलब्ध होती है, जिससे जीवन स्तर में सुधार होता है तो दूसरी तरफ स्वास्थ्य, पानी और सौंदर्य का ह्रास होता है जिससे हमारे जीवन स्तर में गिरावट आती है। अंतत: हाइड्रो पॉवर से कोई विशेष लाभ होता है ऐसा नहीं दिखता। फर्क सिर्फ इतना है कि हाइड्रो पॉवर से बनी हुई ऊर्जा का उपयोग अमीर ज्यादा करते हैं जबकि पर्यावरणीय दुष्प्रभाव आम आदमी पर अधिक पड़ता है। इसलिए देश के लिए हानिप्रद होते हुए भी हाइड्रो पॉवर को बढ़ाया जा रहा है परंतु इससे हमारी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं होती क्योंकि इसकी सीमा है। एक और घरेलू स्रोत बायो डीजल अथवा एथेनॉल का है। यहां संकट खाद्य सुरक्षा का है। जब हम खेती की जमीन पर बायो डीजल बनाने के लिए गन्ने का उत्पादन बढ़ाते हैं तो उसी अनुपात में गेहूं, चावल और अन्य फल, सब्जी का उत्पादन घटता है जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा प्रभावित होती है। पानी का भी संकट बनता है क्योंकि गन्ने के उत्पादन में गेहूं की तुलना में लगभग 10 गुना पानी अधिक प्रयोग होता है। लगभग संपूर्ण देश में भूमिगत जल का स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है जिसके कारण हम बायो डीजल का उत्पादन भी नहीं बढ़ा सकेंगे। परमाणु ऊर्जा की भी समस्या है क्योंकि यूरेनियम अपने देश में है ही नहीं। इसका एक विकल्प थोरियम है। लेकिन थोरियम से यूरेनियम बनाने में हम फिलहाल बहुत पीछे हैं। चीन इसी वर्ष थोरियम से चलने वाले एक प्रायोगिक परमाणु रिएक्टर को शुरू करने जा रहा है जबकि हम केवल अभी ड्राइंग बोर्ड पर ही सीमित हैं। इसलिए अगले 20-30 वर्षों में हम थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा बनाएंगे इसकी संभावना नहीं के बराबर है। इस परिस्थिति में हम ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाकर किसी भी तरह से अपनी ऊर्जा सुरक्षा स्थापित नहीं कर सकते हैं। हमारे पास केवल एक उपाय है कि हम अपनी खपत को कम करें। नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में बताया गया कि विश्व के ऊपरी 10 प्रतिशत लोग 50 प्रतिशत ऊर्जा की खपत करते हैं। अतः यदि हम ऊर्जा के दाम में भारी वृद्धि करें तो इसका अधिक प्रभाव ऊपरी वर्ग पर पड़ेगा और यदि इस पर लगाए गए टैक्स का उपयोग हम आम आदमी के हक में करें तो आम आदमी के जीवन स्तर पर कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। जितना अधिक खर्च उसके द्वारा महंगी ऊर्जा की खरीद में किया जाएगा उससे ज्यादा लाभ उसे सार्वजनिक सुविधाओं जैसे बस की उपलब्धता से हो सकता है। इसलिए सरकार को तेल और बिजली दोनों पर भारी "ऊर्जा सुरक्षा" टैक्स आरोपित करना चाहिए। इनके दाम में भारी वृद्धि करनी चाहिए। तेल पर प्रति लीटर और बिजली पर प्रति यूनिट का ऊर्जा सुरक्षा टैक्स लागू कर देना चाहिए। साथ-साथ जिस प्रकार आम आदमी पार्टी ने जनता को 300 यूनिट तक की बिजली की खपत मुफ्त करा दी है उसे सम्पूर्ण देश में लागू करना चाहिए जिससे आम आदमी पर तेल और बिजली के बढ़े हुए दाम का प्रभाव न पड़े। ऊर्जा सुरक्षा स्थापित करने का दूसरा उपाय है कि हम मैन्युफैक्चरिंग के आधार "मेक इन इंडिया" को बढ़ाने के स्थान पर सेवा क्षेत्र के आधार पर "सर्वड फ्रॉम इंडिया" के विस्तार पर ध्यान दें। बताते चलें कि 100 रुपये की आय बनाने में जितनी ऊर्जा मैन्युफैक्चरिंग में लगती है उसका केवल दसवां हिस्सा सेवा क्षेत्र में लगता है। सेवा क्षेत्र में सॉफ्टवेयर, संगीत, ट्रांसलेशन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आते हैं जहां पर कम ऊर्जा में अधिक उत्पादन किया जाता है। यदि हम अपनी आय को सेवा क्षेत्र से हासिल करें तो हम कम ऊर्जा में अधिक आय हासिल कर सकते हैं। अतः सरकार को उत्पादित माल जैसे कार, एल्यूमीनियम, स्टील आदि के निर्यात पर भी भारी निर्यात टैक्स लगाना चाहिए, जिससे इनका उत्पादन कम हो और देश में ऊर्जा की खपत कम हो। साथ-साथ सेवा क्षेत्र को प्रोत्साहन देना चाहिए जिससे कि हम कम ऊर्जा में भी पर्याप्त आय को हासिल कर सकें। ऊर्जा का संकट आगे गहराने की स्थिति है। इस दिशा में सरकार को शीघ्र कदम उठाने चाहिए। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।)
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