विचार

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Published / 2022-05-25 15:42:16
देश के विकास में अडानी-अंबानी-टाटा सहित पूंजीपतियों की देन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आकाश प्रकाश)। ऐंबिट कैपिटल की सलाहकार, अर्थशास्त्री ऋतिका मांकड़ मुखर्जी ने एक दिलचस्प रिपोर्ट लिखी है जिसका शीर्षक है-स्काउटिंग फॉर जाइंट्स। रिपोर्ट भारतीय कंपनियों में परिमाण की कमी से संबंधित है। उन्होंने अलग-अलग दौर और देशों की कंपनियों के आंकड़ों का राजस्व के आधार पर अध्ययन किया और पाया कि भारतीय कंपनियां अन्य देशों की कंपनियों की तुलना में छोटी हैं। देश में छोटी कंपनियां बहुत हैं जबकि वैश्विक आकार की कम। उनके विश्लेषण में बहुत विस्तृत ब्योरे और कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं। उनकी रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा भारतीय कंपनियां अपना आकार बढ़ाने में सक्षम नहीं हैं। 7 फीसदी की वास्तविक (और 13 फीसदी की नॉमिनल) जीडीपी और 2.8 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था के बावजूद हमारी कंपनियां उभरते बाजारों की तुलना में भी बहुत छोटी हैं। उन्होंने बैंकिंग, वित्तीय सेवा और बीमा कंपनियों (बीएफएसआई) को छोड़कर 2,865 सूचीबद्ध कंपनियों का अध्ययन किया और पाया कि करीब 40 प्रतिशत कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है। अर्थव्यवस्था के विकास के बावजूद बीते दशक में यह अनुपात नहीं बदला और न ही छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी घटी। देश की सूचीबद्ध कंपनियों में से 55 प्रतिशत का राजस्व एक अरब से 100 अरब रुपये के बीच है। जबकि 5 प्रतिशत से भी कम कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है। केवल 12 कंपनियों का राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है। बीएफएसआई में भी ऐसा ही है। गैर सूचीबद्ध कंपनियों में भी औसत आकार छोटा है। भारत की तुलना अन्य उभरते बाजारों से की जाए तो अंतर और स्पष्ट है। एक ओर जहां देश की 40 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक अरब रुपये से कम है, वहीं उभरते बाजारों में यह 12 फीसदी है। हमारी 55 फीसदी कंपनियों का राजस्व एक से 100 अरब रुपये के बीच है लेकिन उभरते बाजारों में ऐसी कंपनियां 64 फीसदी हैं। हमारी 4 फीसदी कंपनियों का राजस्व 100 अरब रुपये से अधिक है जबकि उभरते बाजारों में यह 15 प्रतिशत है। छोटी कंपनियां बड़ी क्यों नहीं हो पा रहीं? क्या इसका कोई अर्थ है? इस पर ध्यान क्यों दें? हमारी नीति ऐतिहासिक रूप से आकार और परिमाण के खिलाफ रही है। 1991 से पहले देश में एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग (एमआरटीपीसी) के रूप में नियामकीय ढांचा था। हम आर्थिक शक्ति के चुनिंदा हाथों में सिमटने को लेकर चिंतित रहते थे। इसके बाद श्रम कानून, लघु उद्योगों को संरक्षण या अप्रत्यक्ष कराधान आदि के रूप में कानून ने हमेशा छोटी कंपनियों को प्रोत्साहित किया और बड़ी कंपनियों को हतोत्साहित। नियामकीय जटिलताओं के कारण कंपनियों का आकार बढ़ाना कठिन बना रहा। न्यायिक और नियामकीय माहौल भी स्थिर नहीं रहा है। ऐसे में बड़ी कंपनियों में निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिला। चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़कर हमारा घरेलू बाजार आज इतना बड़ा नहीं है कि वैश्विक परिमाण का समर्थन कर सके। एक लाख करोड़ रुपये से अधिक राजस्व वाली 12 कंपनियों पर नजर डालें तो ये सभी कंपनियां या तो ऊर्जा क्षेत्र की सरकारी कंपनियां हैं, टाटा स्टील और टाटा मोटर्स जैसी कंपनियां या फिर रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और महिंद्रा समूह जैसे बड़े कारोबारी समूह। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज इकलौता अपवाद है जो अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर शीर्ष पर है। कुछ ही ऐसी कंपनियां हैं जिनका आकार भी बढ़ा है और जो घरेलू तौर पर एक उद्योग पर केंद्रित हैं। हमारी कंपनियां शोध एवं विकास पर भी अधिक व्यय नहीं करतीं। इस विषय पर पहले भी बात हो चुकी है। कंपनियों का आकार छोटा होने के कारण वे शोध एवं विकास पर अधिक खर्च नहीं कर पातीं लेकिन यह कमी नवाचार को प्रभावित करती है। हम वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा भी नहीं बन सके। यदि हम स्मार्टफोन के मामले में वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा होते तो कई कंपनियों का स्वरूप बदल सकता था। ताइवान का इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र इसका उदाहरण है जो ऐपल कंपनी की आपूर्ति शृंखला पर आधारित है। प्रतिस्पर्धा और निर्यात को लेकर हमारे झुकाव की कमी जाहिर करता है। उत्पादकता और परिमाण में सीधा संबंध है। बड़ी फर्म के पास निवेश के लिए संसाधन होता है और वे आधुनिक तकनीक और प्रबंधन अपना सकती हैं। यदि हमारा कारोबारी क्षेत्र छोटा बना रहा तो प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। तकनीक जिस तरह उद्योगों को बदल रही है उसे देखते हुए निवेश ओर आधुनिकीकरण की कमी तथा नए व्यवहार से दूर रहना हमें गैर प्रतिस्पर्धी बनाएगा। दो ऐसे रुझान हैं जो इसे बदल सकते हैं। पहला तो यही कि स्टार्टअप का परिदृश्य बहुत अच्छा है। अमेरिका और चीन के बाद भारत सबसे बड़ा स्टार्टअप वाला देश है। सरकार ने इस क्षेत्र में मदद का वास्तविक प्रयास किया है। देश में करीब 30 यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर का कारोबार) और 2-3 डेकाकॉर्न (10 अरब डॉलर का कारोबार) कंपनियां हैं। इनमें से अधिकांश अगले दो वर्ष तक अपनी जगह बनी रहेंगी। इनमें से ज्यादातर का कारोबारी मॉडल तकनीक आधारित है। तकनीक की मदद से कारोबार का परिमाण तेजी से बढ़ाया जा सकता है। वैश्विक कारोबारी मॉडल वाली अन्य कंपनियां या तो एनालिटिक्स में हैं या सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में। इनका विकास तेजी से हो सकता है क्योंकि ये डिजिटल हैं और इनकी भौतिक जरूरतें उतनी नहीं हैं। जीएसटी और नोटबंदी के साथ अर्थव्यवस्था तेजी से औपचारिक हुई है। ऐसे में आशा यही करनी चाहिए कि बड़ी भारतीय कंपनियां तेजी से स्वरूप विस्तार करेंगी। जोखिम से बचने की प्रवृत्ति आम है और पूंजी केवल बड़े और सुरक्षित कर्जदारों के पास जा रही है। तमाम क्षेत्रों में हमें यही देखने को मिल रहा है कि बड़े कारोबारी मजबूत हो रहे हैं और सुदृढ़ीकरण कर रहे हैं। इससे जहां उनका आकार तेजी से बढ़ेगा और आर्थिक प्रतिफल तथा मुनाफा बढ़ेगा। वहीं इसकी कमियां भी हैं। कॉपोर्रेट मुनाफे की कमजोरी तथा बैलेंस शीट की हालत और वित्तीय तंत्र में जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को देखते हुए कहा जा सकता है कि आने वाले समय में 2-3 बड़े कारोबारी समूहों का उभार होगा जिनके पास विसंगतिपूर्ण ढंग से संपत्ति की ज्यादा हिस्सेदारी होगी। इस पर ध्यान देना होगा। शायद हम नहीं चाहेंगे कि ऐसा हो और 2-3 घराने कारोबारी जगत पर नियंत्रण रखें। भारतीय कारोबारी जगत में परिमाण की समस्या विद्यमान है। यह उत्पादकता और शोध एवं विकास को प्रभावित करता है। यह समय के साथ सुधर जाएगा लेकिन हमें इस बात को लेकर सावधान रहना होगा कि हम कहीं ऐसी आर्थिक शक्ति न बन जाएं जहां शक्ति एक ही जगह पर एकत्रित हो।

Published / 2022-05-22 15:29:51
2024 में होगी कांग्रेस की दमदार वापसी!

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (एनके ठाकुर)। कांग्रेस में कई बार उतार-चढ़ाव आए, लेकिन हर बार कांग्रेस और मजबूती से उभरकर सामने आई। वर्षों तक इस दल का शासन देश पर रहा। वर्षों से इस पर मनन किया जाता रहा है कि सवा सौ वर्ष पुरानी इस पार्टी को अभी पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में मुंह की क्यों खानी पड़ी! कहीं भी कांग्रेस की सरकार क्यों नहीं बन सकी! पिछले दिनों जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें एक पंजाब ही कांग्रेस के कब्जे में था। वहां उसकी सरकार थी, लेकिन एक सड़ी मछली ने पूरे तालाब को गंदा कर दिया जिससे पंजाब भी कांग्रेस के हाथ से फिसल गया। पंजाब, जहां भाजपा की आंधी में भी अपनी पार्टी की सरकार को बचाकर रखने वाले कद्दावर नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को सत्ताच्युत करके अपने ही हाथों उस राज्य को आम आदमी पार्टी के हाथों में सौंप दिया। दूसरा राज्य उत्तराखंड था, जहां कांग्रेस को कुछ उम्मीद थी कि हो सकता है कि भाजपा के हाथों से सत्ता खिसक जाए, लेकिन भाजपा की नीति के सामने उसकी एक नहीं चली और फिर से सरकार भाजपा की ही बनी। भाजपा के नीति-निमार्ताओं ने इन राज्यों की जनता की मानसिकता को पढ़कर अच्छी तरह समझ लिया था और उसके अनुसार ही अपनी नीतियों पर काम करके जनमानस के मन में अपने दल के प्रति विश्वास जगाया और फिर से सरकार बनाकर जनता में अपना विश्वास बरकरार रखने में कामयाब रहे। इन पांच राज्यों के चुनाव में यही लगा कि शायद विपक्ष का कोई ऐसा चेहरा ही नहीं है जो इन राज्यों में चुनाव में अपनी पार्टी को जीत दिला सकें। इन राज्यों के बड़े-बड़े कांग्रेस के नेता राज्य में अपनी सरकार बनाने की बात कौन करे, वह अपनी सीट भी नहीं बचा सके। ऐसा लगता है कि मतदाताओं के मन में कांग्रेस के प्रति उदासीनता का भाव आ गया है और उसकी समझ में यह बात आ गई कि भाजपा का कोई विकल्प आज कांग्रेस के पास नहीं है। अभी चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस की स्थिति पर एक प्रस्ताव पार्टी हाईकमान के समक्ष रखा। इसके तुरंत बाद से कांग्रेस के असंतुष्ट नेता इस बात को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं कि कोई उसकी कमी को दूर करने के लिए उसे सलाह दे, उनसे राय-मशविरा करे। इसलिए प्रशांत किशोर के हाई कमान को प्रस्ताव देने के बाद से ही असंतुष्ट खेमा अपनी पार्टी के अंदर मरने-कटने और दल को छिन्न-भिन्न करने के लिए तैयार हो गए हैं। ऐसे असंतुष्ट नेता प्रशांत किशोर को कांग्रेस में शामिल करने और उनके प्रस्ताव को ढकोसला मानते हुए यह भी कह रहे हैं कि इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वह इस बात पर अडिग होकर कहते हैं कि पार्टी की ध्वस्त हो चुकी जमीन को वापस हासिल करना कोई जादू का खेल नहीं है कि एक रणनीतिकार के जादुई नुस्खे से अचानक सब कुछ सही हो जाएगा। उनका यह भी कहना है कि कांग्रेस की राजनीतिक वापसी की चाबी इसके लाखों कार्यकतार्ओं के पास है, लेकिन दुर्भाग्यवश जमीन से आ रही इस आवाज को भी नजरंदाज किया जा रहा है। वे यह भी कहते हैं कि बैठक में उनको अलग रखकर उनके भरोसे को तोड़ा गया। बैठक में सबसे संवाद करते हुए प्रस्ताव पर कांग्रेस अध्यक्ष को विचार करना चाहिए था, जो नहीं किया गया। वे यह भी कहते हैं कि इस तरह कुछ चुनिंदा लोगों के साथ बैठक करना पार्टी के लिए अहितकारी ही होगा। इसे पार्टी के फायदे की बात कहना निहायत बेवकूफी है। यह भी कहा जा रहा है कि असुंतुष्ट गुटों का गुस्सा इतना बढ़ गया है कि कुछ नेता इस प्रकरण पर बातचीत के मूड में भी नहीं हैं तथा अंदर-ही-अंदर पार्टी में बड़े विस्फोट की तैयारी में जुट गए हैं। यहां तक कि केरल से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. जे. कुरियन के इस बयान का हवाला देते हुए कहा गया है कि नेहरू गांधी परिवार को पार्टी नेतृत्व छोड़ देना चाहिए। हो सकता है कि इस मामले पर चिंतन शिविर के बाद इस दिशा में कुछ बड़ी बात हो। ज्ञात हो कि 13 मई से राजस्थान के उदयपुर में तीन दिनों के लिए चिंतन शिविर होने जा रहा है, जिसमें देश के विभिन्न भागों से लगभग 400 नेता हिस्सा लेंगे। इसकी तैयारी में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राज्य के प्रभारी अजय माकन जुटे हुए हैं और उदयपुर का दौरा भी कर चुके हैं। जो भी हो, प्रशांत किशोर ने जो सुझाव दिया है उस पर कांग्रेस अध्यक्ष ने आठ कमेटी बनाकर उसकी मजबूती को परख कर उसपर अपने वरिष्ठ नेताओं को रिपोर्ट देने को कहा है, इसलिए प्रशांत किशोर का कांग्रेस में शामिल होने का बाजार गर्म था, उस पर विराम लग गया है, क्योंकि चुनावी राजनीतिकार प्रशांत किशोर स्वयं कांग्रेस में जाने का खण्डन कर दिया है। आइए, अब देखते हैं कि पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर का कांग्रेस के उत्थान के लिए जो प्रस्ताव दिया उसका लब्बो-लुआब क्या है। बताया जाता है कि प्रशांत किशोर ने पार्टी बैठक में एक प्लान बताया है जिसके मुताबिक कांग्रेस 370 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। इतना ही नहीं, कुछ राज्यों में गठबंधन को लेकर भी फॉमूर्ला सामने रखा गया है। प्रशांत किशोर ने यह भी सुझाव दिया है कि कांग्रेस को यूपी, बिहार और ओडिशा में अकेले चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि तमिलनाडु, प. बंगाल और महाराष्ट्र में गठबंधन करना चाहिए। पीके के इस प्लान पर राहुल गांधी ने भी सहमति जताई है। पीके ने एक विस्तृत प्रेजेंटेशन के जरिये बताया था कि कैसे कांग्रेस को चुनाव की रणनीति तैयार करने की जरूरत है। उन्होंने बताया है कि कांग्रेस को राज्य-दर-राज्य चुनावी रणनीति पर आगे बढ़ने की जरूरत है। इसके अलावा पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की जरूरत पर भी बल दिया गया है। प्रशांत किशोर ने कहा कि पार्टी के वैसे राज्यों में गठबंधन के लिए ज्यादा हाथ-पांव नहीं मारना चाहिए जहां उसकी उपस्थिति नगण्य है, बल्कि यहां पार्टी को नई शुरुआत के बारे में सोचना चाहिए। इसके अलावा कांग्रेस को वैसे साझीदार को चुनने को प्राथमिकता देनी चाहिए जो अपना वोट ट्रांसफर करवा सके, तभी चुनावी गठबंधन सफल होगा।

Published / 2022-05-20 14:29:07
उम्मीद जगाती नयी शिक्षा नीति...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। मोदी सरकार कोरोना संक्रमण में बगैर किसी बहानेबाजी के अपने सुधार कार्यक्रम में लगी है। अभी 1986 में बनी शिक्षा नीति के अनुसार ही शिक्षा व्यवस्था को संचालित किया जा रहा था। 1992 में इस नीति में कुछ बदलाव जरूर किया गया, पर उसे पर्याप्त नहीं माना जा रहा था। इसलिए भाजपा ने 2014 के अपने चुनाव घोषणा-पत्र में नई शिक्षा नीति लाने का भी अहम वादा किया था। सत्ता में आने के बाद उसने इस दिशा में कदम भी उठा दिया था। आखिरकार व्यापक सलाह-मशविरों और सुझावों के बाद के. कस्तूरीरंगन समिति द्वारा तैयार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित कर दी गई है। स्वाभाविक ही इससे शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित बदलाव की उम्मीद जागती है। नई शिक्षा नीति का मकसद स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक समय की मांग के अनुसार पाठ्यक्रमों में बदलाव और उसके जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को प्रतस्पिर्धी परिवेश के लिए तैयार करना है। इससे युवाओं में कौशल विकास, नवोन्मेषी अनुसंधान और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है। नई शिक्षा नीति का जोर विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और कौशल विकास के लिए शिक्षकों के प्रशिक्षण पर भी है। इसके अलावा शिक्षा खर्च को छह फीसद तक ले जाने का संकल्प है। अब मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल कर फिर से शिक्षा मंत्रालय हो गया है। हमारी प्रतिस्पर्धा अब वैश्विक हो गयी है। यूपीए सरकार के समय ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने की बात उठी थी। उसके अनुसार शिक्षा क्षेत्र में बदलाव लाने और रोजगारोन्मुख शिक्षा प्रणाली बनाने का संकल्प लिया गया था। मगर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई थी। फिर हमारे देश में जिस तरह शिक्षा क्षेत्र में विषमता बढ़ती गई है, उसमें बुनियादी शिक्षा और फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर व्यावहारिक बदलाव करने की मांग उठती रही है। फिलहाल सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों की पढ़ाई-लिखाई के स्तर और सुविधाओं में बहुत बड़ा अंतर नजर आता है। इसे लेकर व्यापक सामाजिक असंतोष भी देखा जाता है। इस अंतर को पाटना बहुत जरूरी है। फिर उच्च शिक्षा के स्तर पर हमारे देश के विश्वविद्यालय पढ़ाई-लिखाई के तरीके, अनुसंधान, सुविधाएं आदि के पैमाने पर दुनिया के विश्वविद्यालयों के सामने फिसड्डी साबित होते रहे हैं। इस स्थिति से उबरने की जरूरत भी रेखांकित की जाती रही है। अब उच्च शिक्षा केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों के तहत विद्यार्थियों को एक से दूसरे देशों में भेजने का मामला नहीं रह गया है। यह व्यावसायिक मामला भी है। नई शिक्षा नीति में इसे ध्यान में रखते हुए सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहित और विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है। नई शिक्षा नीति में इस बिंदु पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। फिर पाठ्यक्रमों का स्वरूप रोजगार और विशेष योग्यता अर्जित करने, अनुसंधान आदि के आधार पर तैयार करने पर जोर दिया गया है। दरअसल, अब शिक्षा प्रणाली को न सिर्फ अपने देश की, बल्कि वैश्विक जरूरतों के मुताबिक ढालना बहुत जरूरी है, ताकि विज्ञान, तकनीकी शिक्षा, सामाजिक विज्ञान आदि क्षेत्रों में प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का मौका मिल सके। नई शिक्षा नीति से यह मकसद सध सकता है। संघ भी खुश और शिक्षाविद भी...: नई एजुकेशन पॉलिसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की कमेटी ने देशभर की अलग-अलग संस्थाओं से जानकारियां लीं। इनमें एक बड़ी आवाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भी रही। बताया गया है कि आरएसएस से जुड़े कुछ लोगो भी शिक्षा नीति की ड्राफ्टिंग में शामिल रहे हैं। इसके लिए बकायदा संघ के कार्यकतार्ओं, भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सरकार के प्रतिनिधि और शिक्षा नीति के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष की मुलाकात भी हुई। भाषा के फॉर्मूले पर: हालांकि, केंद्रीय कैबिनेट ने जिस शिक्षा नीति को मंजूरी दी है, उसमें सरकार बीच का रास्ता अपनाती दिखी है। माना जा रहा है कि संघ के सुझाव के मुताबिक ही एचआरडी मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय करने पर सहमति बनी। संघ की अन्य कई मांगों पर केंद्र सरकार ने दूरी बना ली। खासकर बच्चों के लिए एक स्टेज पर तीन भाषाओं के फॉमूर्ले के प्रस्ताव पर। केंद्र सरकार ने उस प्रावधान को महत्व नहीं दिया है, जिसमें हिंदी को 6वीं क्लास के बाद अनिवार्य भाषा करार दिया गया था। खासकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के विरोध के बाद, जिन्होंने इसे हिंदी को थोपने की तरकीब बताया था। लेकिन केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जिस ड्राफ्ट को मंजूरी दी, उसमें भाषाई मामलों के लिए राज्यों को ज्यादा छूट दी गई है और कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यानी छात्र जो भाषा सीखेंगे वो राज्य सरकार, क्षेत्र और खुद छात्रों का चुनाव होगा, जब तक तीन में से दो भाषाएं स्थानीय ही होंगी। विदेशी यूनिवर्सिटी के फॉर्मूले पर: दूसरी तरफ आरएसएस से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच के कड़े विरोध के बावजूद नई शिक्षा नीति में विदेशी यूनिवर्सिटियों के लिए भारत में कैंपस खोलने का प्रावधान जोड़ा गया है। हालांकि, इसके साथ ही आरएसएस की भारत के प्राचीन ज्ञान पर जोर देने की बात को नई नीति में रखा गया है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि इस तरह के तत्व छात्रों को स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए सही और वैज्ञानिक जरियों से ही पढ़ाए जाएंगे। नई शिक्षा नीति पर आरएसएस से जुड़े लोगों ने कहा कि उनकी मांगों को माना गया और वे नई नीति से काफी खुश हैं। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज की प्राचार्या हैं।)

Published / 2022-05-19 16:53:12
एलआईसी के लिए मैक्वेरी का लक्ष्य 1,000 रुपये

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (निकिता वशिष्ठ)। पॉलिसीधारकों व खुदरा भागीदारों समेत निवेशकों ने भारतीय जीवन बीमा निगम में 47,000 करोड़ रुपये की रकम गंवा दी क्योंंकि बीमा दिग्गज का बाजार पूंजीकरण कारोबारी सत्र के आखिर में 5.53 लाख करोड़ रुपये रह गया जबकि आईपीओ मूल्यांकन 6 लाख करोड़ रुपये का था। बीएसई पर कंपनी का शेयर 8.6 फीसदी की गिरावट के साथ 867 रुपये पर सूचीबद्ध हुआ और कारोबारी सत्र में 860 रुपये के निचले स्तर तक गया। हालांकि अंत में यह थोड़ा सुधरा और इश्यू प्राइस 949 रुपये के मुकाबले 8 फीसदी गिरकर 875 रुपये पर बंद हुआ। इसकी तुलना में बेंचमार्क सूचकांकों में मंगलवार को 2.5-2.5 फीसदी की उछाल दर्ज हुई। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी ने इस शेयर पर कवरेज शुरू किया है और इसे तटस्थ रेटिंग दी है क्योंंकि आने वाले समय में कंपनी की बढ़त को लेकर कई चुनौतियां दिख रही हैं। ब्रोकरेज ने 17 मई की रिपोर्ट में कहा है, एलआईसी मोटे तौर पर एक ही योजना पार्टिसिपेटिंग पॉलिसीज बेचती है। प्रबंधन ने पहले न्यू बिजनेस मार्जिन के लिहाज से योजनाओं के लाभ पर कभी भी नजर नहीं डाला और एम्बेडेड वैल्यू के रिटर्न पर भी। ऐसे में बिक्री का तरीका बदलने और उच्च मार्जिन वाली योजनाएं बेचने की शुररुआत हमारी नजर में मुश्किल नजर आ रही है। एलआईसी के लिए टिकट साइज भी निजी क्षेत्र के मुकाबले पाचवां हिस्सा है, जो लक्षित सेगमेंट अलग रहने की बात करता है। साथ ही छोटे टिकट साइज वाले सेगमेंट में नॉन पार सेविंग्स प्रॉडक्ट्स की बिक्री आसान नहीं होगी। दूसरा, बैंकएश्योरेंस बिजनेस को बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंंकि तीन सबसे बड़े बैंक एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई बैंकएश्योरेंस के लिए पार्टनर नहीं है। विश्लेषक हालांकि इस शेयर के लंबी अवधि के परिदृश्य को लेकर तेजी का नजरिया बनाए हुए हैं क्योंंकि एलआईसी भारत में सबसे बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधक है और 31 दिसंबर 2021 को एकल आधार पर उसका एयूएम 40.1 लाख करोड़ रुपये था। विश्लेषकों ने हालांकि कहा कि कम कीमत पर सूचीबद्धता इस शेयर को और भी सस्ते स्तर पर खरीदने का मौका है।

Published / 2022-05-18 13:39:42
सोनिया गांधी ने तो पार्टी का कर्ज उतारने को कहा था, मगर नेता कांग्रेस छोड़ रहे हैं...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नीरज कुमार दुबे)। 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हाल ही में उदयपुर में संपन्न कांग्रेस के चिंतन शिविर से पहले पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेसियों से कहा था कि पार्टी का कर्ज उतारने का समय आ गया है। सोनिया गांधी के इस आह्वान के बाद कितने कांग्रेसियों ने कर्ज उतारा इसका तो कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन कांग्रेस का पटका उतार कर पार्टी छोड़ने का ऐलान दो बड़े नेता सुनील जाखड़ और अब हार्दिक पटेल कर चुके हैं। जी हाँ, गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार में उतर चुके राहुल गांधी को झटका देते हुए हार्दिक पटेल ने कांग्रेस छोड़ने का ऐलान कर दिया है। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से उभरे नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस की गुजरात इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष पद और पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देकर गुजरात की राजनीति में नये समीकरण बना दिये हैं। हार्दिक पटेल का कहना है कि वह कांग्रेस के ऐसे वर्किंग प्रेसिडेंट थे जिसके पास कोई वर्क नहीं था। हार्दिक कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं इस बात की खबरें तो बहुत दिनों से चल रही थीं। माना जा रहा था कि वह गुजरात में अपना आधार बनाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। लेकिन हार्दिक शायद अब अपने राजनीतिक कैरियर के साथ और प्रयोग नहीं करना चाहते इसलिए कांग्रेस छोड़ते समय उन्होंने जो पत्र लिखा है वह दर्शा रहा है कि हार्दिक पटेल जल्द ही भाजपा में शामिल होकर इस साल के अंत में होने वाला विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। संभवत: आने वाले दिनों में भाजपा जल्द ही कहे- हार्दिक स्वागत। क्योंकि हार्दिक की युवाओं के बीच अच्छी पकड़ और पटेलों के बीच समर्थन का लाभ उस पार्टी को होना ही है जिसके साथ हार्दिक जायेंगे। वैसे तो गुजरात में भाजपा का अपना जनाधार है लेकिन फिर भी वह कभी भी जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखती। हार्दिक ने किन कारणों से कांग्रेस छोड़ी : 2019 में कांग्रेस में शामिल हुए हार्दिक पटेल ने पार्टी छोड़ने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे एक पत्र में दावा किया कि कांग्रेस ने देश में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है और उसने हर चीज का महज विरोध ही किया है। हार्दिक पटेल ने बिना कोई नाम लिए कहा कि उन्होंने जब भी गुजरात के लोगों के हितों से जुड़े मुद्दे उठाये, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता फोन पर अपने संदेश देखने में मसरूफ होते और कुछ नेता जब पार्टी और देश को उनकी जरूरत होती तब विदेश में मजे कर रहे होते थे। हम आपको बता दें कि कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेता यही आरोप लगाते रहे हैं कि जब-जब उन्होंने वरिष्ठ नेताओं के समक्ष अपने मुद्दे उठाये तो उनकी बात पर ध्यान देने की बजाय नेता या तो कुत्ते को बिस्किट खिलाने, मोबाइल फोन पर गेम खेलने, मोबाइल फोन पर मैसेज देखने आदि में बिजी रहते थे। कांग्रेस की क्या प्रतिक्रिया है : वहीं, कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के इस्तीफे को लेकर आरोप लगाया है कि उनके त्यागपत्र में इस्तेमाल शब्द भारतीय जनता पार्टी के हैं और अब भाजपा के आका तय करेंगे कि हार्दिक का अगला कदम क्या होगा। पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने यह दावा भी किया कि गुजरात में भाजपा अपने खिसकते जनाधार के कारण कांग्रेस को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने संवाददाताओं से कहा, गुजरात में राहुल गांधी की हालिया रैली के बाद भाजपा में डर पैदा हो गया है। उसका आधार खिसक रहा है। गोहिल ने कहा कि डरी और बौखलाई भाजपा कांग्रेस के आधार को कमजोर बनाने के लिए सिर्फ साम, दाम, दंडभेद का सहारा ही नहीं ले रही है, बल्कि निम्न स्तर पर जाकर वार कर रही है। दूसरी तरफ हार्दिक ने अपने पत्र में कांग्रेस के बारे में जो कुछ कहा है वह विधानसभा चुनावों में पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है। क्योंकि गुजरात की राजनीति में एक तो हिंदुत्व का प्रभाव है साथ ही गुजराती गौरव की भावना भी प्रबल है। इसलिए हार्दिक पटेल के यह दो आरोप कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाले होंगे- 1. चाहे, अयोध्या में राम मंदिर हो, जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाना, जीएसटी लागू करना, भारत लंबे समय से इन मुद्दों का समाधान चाहता था और कांग्रेस ने केवल एक अवरोधक की भूमिका निभाई है। 2. वरिष्ठ नेता ऐसे बर्ताव करते हैं, जैसे वे गुजरात और गुजरातियों से नफरत करते हों। कांग्रेस कैसे गुजरात के लोगों से अपेक्षा करती है कि वे उन्हें हमारे राज्य का नेतृत्व करने के एक विकल्प के रूप में देखें? बहरहाल, राहुल गांधी की विदेश यात्राओं पर तंज कसते हुए हार्दिक पटेल का यह कहना कि जब भी हमारा देश परेशानियों का सामना कर रहा होता है और कांग्रेस को नेतृत्व की जरूरत होती है, तो पार्टी के नेता विदेश में मजे कर रहे होते हैं महज एक आरोप भर नहीं है। याद कीजिये इस साल के शुरू में जब सभी राजनीतिक दल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटे हुए थे तब राहुल गांधी विदेश में थे, इसके चलते कांग्रेस की तैयारियां काफी देर से शुरू हो पाई थीं और देर से शुरू होने वाली तैयारियों का हश्र चुनाव परिणाम ने बता ही दिया है।

Published / 2022-04-22 18:04:32
वीरता की मिसाल तेलंगा खड़िया को नमन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ दुलार योताम कुल्लू)। वीर सपूत शहीद तेलंगा खड़िया का जन्म 9 फरवरी 1806 ई. में झारखंड राज्य के ग्राम मुरगू, थाना सिसई, जिला गुमला में हुआ था। वे एक साधारण किसान के बेटे थे। इनके पिता का नाम ठुईया खड़िया और माता का नाम पेती खड़िया था। उनके दादा का नाम सिरू खड़िया तथा दादी का नाम बुच्ची खड़िया था। उनका परिवार मुरगू गांव का पहान तथा जमींदार तथा पाहन परिवार था। उनके दादा सिरू सामाजिक, धार्मिक, सरल तथा साहित्यिक विचार के व्यक्ति थे। तेलंगा बचपन से ही साहसी, ईमानदार तथा अधिक बोलने वाले थे। वे बिलुंग गोत्र से संबंध रखते थे। कृषि और पशुपालन का कार्य से जीवनयापन किया करते थे। उनका व्यक्तित्व मिलनसार, समाजसेवी ईमानदार एवं कर्मठ नेता जैसा था। वे सभी जाति धर्म, समुदाय का आदर करते थे। वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, परंतु अपने विचार, तेजस्वी स्वभाव एवं कर्मठ समाजसेवी थे। उनकी शादी 1846 ई. में कुमारी रत्नी खड़िया से हुई थी। तेलंगा खड़िया के मुख्य कार्य कृषि तथा पशुपालन करना था। इसके साथ-साथ अखाडे़ में अपने अनुयायियों को तीर-धनुष, तलवार एवं गदा चलाने की कला का प्रशिक्षण देना भी था। तेलंगा से इस कला का प्रशिक्षण लेने के लिए हर क्षेत्र से उनके अनुयायी अखाड़े में आते थे। इनकी सेना की संख्या लगभग 900 से 1500 तक बतायी जाती है। शहीद तेलंगा के पिता ठुईयाखड़िया छोटानागपुर नागवंशी महाराजा के भंडारपाल थे। तेलंगा खड़िया अपने पिता के साथ कभी - कभी महाराजा के दरबार में जाते थे। वहां सामाजिक तथा राजनीतिक बातों की जानकारी प्राप्त करते थे। 1849-50 ई. तक छोटानागपुर में अंग्रेजों का शासन पूरी तरह कायम हो चुका था। उस समय छोटानागपुर में राजतंत्र था। राजा और जमींदारों का शासन कायम था। अन्याय, शोषण, जुल्म, बेगारी अपनी चरम सीमा पर थी। वस्तुत: प्राचीनकाल से ही जनजाति समुदाय अपनी परंपरागत स्वशासन व्यवस्था में स्वतंत्र जीवन-यापन करने के आदि थे। आदिवासी समुदाय की यह स्वतंत्रता ब्रिटिश सरकार के शासन प्रणाली में छिन्न-भिन्न हो गयी थी। इस प्रणाली के अंतर्गत मुंडा, संथाल, हो, उरांव, खड़िया एवं चेरो अपनी प्रकृति के विरूद्ध गुलामी का दंश झेल रहे थे। इन जनजातियों के विद्रोह का प्रमुख कारण ब्रिटिश सरकार की शासन व्यवस्था थी। तेलंगा खड़िया भी मानसिक रूप से अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ाई लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार थे और समाज में लोगों को अपने अधिकार के लिए आगे आने को प्रेरित भी कर रहे थे। वे गांव-गांव जाकर जागरूक तथा एकता कायम करने के लिए प्रचार करने लगे। वे गांव में जाकर जूरी पंचायत का संगठन बनाने लगे। लोगों के मस्तिष्क में अंग्रेजों से लोहा लेने का बीज बोने लगे। अनुसंधान से ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक क्षेत्रों में जूरी पंचायत का गठन कर बहुत सारे केन्द्रों की स्थापना की थी। तेलंगा का प्रमुख हथियार तलवार, तीर-धनुष था।अंग्रेजों की बंदूक एवं रायफल को तेलंगा तीर-धनुष से ही रोक लेते थे। मानो उन्हें ईश्वर का अशीष प्राप्त हो। उनकी तीर-धनुष की शक्तियों के सामने अंग्रेजी हुकूमत को भी झुकना पड़ता था। ग्राम जूरी पंचायत की स्थापना करने के बाद धीरे-धीरे तेलंगा के अनुयायियों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी होती गयी। जब तेलंगा खड़िया के संगठनात्मक कार्य के बारे में अंग्रेजी हुकूमत को पता चला तो उन्हें पकड़ने का आदेश जारी किया गया। तेलंगा ग्राम से बाहर रहकर ही संगठन का कार्य किया करते थे। अनुसंधान से पता चलता है कि इस इलाके में तेलंगा खड़िया ने 1850-60 ई. के आस-पास अंग्रेजी तथा देशी सिपाहियों के दलालों के विरूद्ध उलगुलान किया था। इस उलगुलान का कारण था, खड़िया सहित अन्य लोगों की जमीन का दलालों, साहूकारों और सरकार द्वारा छीन लिया जाना। जमीन की नापी हुई, परचा पप्ता बना और ऋण का कागज दिखा कर साहूकारों ने उनकी जमीन हथिया ली।उन्हें समझ में नहीं आया कि जिस जमीन को उनके बाप-दादाओं ने बनाया था, वह सरकार की कैसे हो गयी ? जब तेलंगा सहित अन्य लोग जमीन से बेदखल हो गये तो पिंजड़े की बाघ की तरह छटपटाने लगे। पुलिस और उनके समर्थकों को वे खदेड़ने लगे।अंग्रेज सपने में भी कभी नहीं सोचे थे कि जमीन से बेदखल लोग भी उनका विरोध करेंगे। अब तेलंगा की अगुवाई में लोग घायल बाघ की तरह आक्रमण कर दिये। जब तेलंगा और उनके साथियों ने इसका विरोध किया तो प्रशासन को बड़ी नाराजगी हुई। तेलंगा और दलालों तथा सिपाहियों के बीच उलगुलान बढ़ने लगा। तेलंगा का आक्रमण गुरिल्ला युद्ध की तरह था। विरोध हुआ तो तेलंगा और उनके साथियों ने अपने-अपने घरों को त्याग दिये। वे बारी घोरना के पीछे एवं जंगलों तथा वन कंदराओं में रहने लगे थे। ग्रामवालों ने इनके समूह को राटा टेटेंगा का नाम दिया था।तेलेंगा रूपी टेटेंगा को लोगों ने गीतों के माध्यम से सूचना देने का माध्यम बनाया था। उदारहण स्वरूप गीत देखा जा सकता है- वे सावधान हो जाये अपनी रक्षा को।वे मौका देखकर आक्रमण भी करें। प्रथम बार तेलंगा और उसके सैनिकों ने सिपाहियों तथा दलालों पर आक्रमण किये। इस पर कुडुख और नागपुरी में भी गीतों का उल्लेख है। तेलंगा और उनके साथियों के अचानक आक्रमण को सिपाही झेल नहीं पाये। वे खदेड़ दिये जाते। दूसरी बार डोम्बा के मैदान में लड़ाई हुई। असल में तेलंगा अपने अनुयायियों के साथ लड़ भी रहे थे और आंदोलन सर्वसाधारण रूप ले चुका था, लेकिन इसी बीच जमीन दलालों के चलते अंगे्रजों के द्वारा वे गिरफतार कर लिये गये। उन्हें लोहरदगा मुख्यालय जेल में रखा गया। लोहरदगा जेल में कुछ दिनों रखने के बाद तेलंगा खड़िया को कलकत्ता जेल भेज दिया गया। कहा जाता है कि उन्हें 14-18 साल की कठोर जेल सजा मिली। कलकत्ता जेल से रिहा होने के बाद तेलंगा गांव आये और सिसई के अखाड़े में अपने समर्थकों से मिले और विचार-विमर्श करने के बाद नये सिरे से उलगुलान करने में लग गये। इसकी भनक दुश्मनों को लग गयी। इसके बाद उन्होंने उन्हें मार डालने की योजना बनायी। 23 अप्रैल 1830 ई. को सिसई बाजार टांड़ मैदान में वे अपने समर्थकों के साथ ईश्वर की पूजा उपासना कर रहे थे। उसी समय उधर बड़े चप्तान के आड़ में झाड़ियों के पीछे अंग्रेजों के दलाल बोधन सिंह और उनके साथी छिपे हुए थे। भगवान के सामने जैसे ही तेलंगा खड़िया हाथ जोड़कर खड़े हुए बोधन सिंह ने उन पर गोली चला दी और वहीं तेलंगा शहीद हो गये। घनघोर जंगल होने के कारण कोयल नदी पार करके ग्राम सोसो नील टोली तथा चंदाली सीमा के बीच में उन्हें दफना दिया गया। उनकी समाधि के अवशेषअभी भी विद्यमान है। आज इस टांड़ को तेलंगा तोपाटांड़ के नाम से जाना जाता है। अनुसंधान में पता चला है कि पूरब बरगां निवासी बोधन सिंह को अंग्रेजों ने तेलंगा की हत्या करने के लिए 400 रुपए दिये थे। इसी प्रलोभन के चलते तेलंगा की जान ले ली थी, लेकिन कहा जाता है कि हत्यारे बोधन सिंह का वंश भी नहीं चला। वे निर्वंश होकर मर गये। (डॉ दुलार योताम कुल्लू, मानव शास्त्री एवं खड़िया समाज के चिंतक सह मानव शास्त्र विभाग, गोस्सनर महाविद्यालय रांची से जुड़े हैं।)

Published / 2022-04-21 13:45:15
हनुमान जयंती पर हिंसा की हो निष्पक्ष जांच...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ रमेश ठाकुर)। हनुमान जयंती के दिन निकाली जा रही शोभायात्रा के दौरान राजधानी दिल्ली में जो हिंसा हुई उसने कई सवालों को जन्म दिया है। इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। राजधानी की हिंसा सुनियोजित थी या नहीं? ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। घटना वाला इलाका ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं। राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी सच सामने आएगा। क्या दिल्ली हिंसा पहले से सुनियोजित थी? या फिर ये ट्रेलर मात्र है, पिक्चर अभी शेष है? या इसकी नींव राजनीतिक स्वार्थ को ध्यान में रखकर राजनीतिक शास्त्र ने रखी। ऐसे कुछ सवाल घटना थमने के बाद दिल्लीवासियों के जेहन में उठ रहे हैं। सवाल उठने भी चाहिए, आखिर ऐसा क्या है जो किस्तों में कुछ अंतराल के बाद राजधानी में ऐसे फसाद होते रहते हैं और तब तो और जब चुनावों की सुगबुहाट होने लगती है। कुछ समय बाद दिल्ली में एमसीडी चुनाव होने भी हैं, इसलिए कड़ियां आपसे में काफी हद तक मेल खाती भी हैं? खैर, ये तो आम इंसान के लिए सारे काल्पनिक अंदेशे मात्र हैं, जो होना होता है वो क्षण में हो ही जाता है। कमोबेश, वैसा हो भी रहा है, लेकिन हिंसा के राजनीतिक शास्त्र को अब आम आदमियों को बुनियादी रूप से समझने की जरूरत है। ये सवाल पुलिस पर छोड़ देते हैं, पर दूसरे सवाल हम खुद में खोजेंगे, आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है हमारे सौहार्दपूर्ण माहौल में, कौन है जो ये जहर घोल रहा है। 16 अप्रैल की शाम को जब दिल्ली में हिंसा हो रही थी, उसी वक्त सोशल मीडिया पर दो बेहद खूबसूरत तस्वीरें हम सबको दिख रही थी जिसमें हनुमान जन्मोत्सव के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग रैली में शामिल लोगों पर फूल बरसा रहे थे, कोल्ड ड्रिंक और पानी की बोतलों का वितरण कर रहे थे। ये तस्वीरें उत्तर प्रदेश के शामली और नोएडा की हैं। शामली में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कई समय बाद दिखा। दरअसल हमें ऐसा ही तो हिंदुस्तान चाहिए, जो आजादी से पहले था, जब एक ही थाली में सभी धर्म के लोग खाना खाते थे, पर अब न जाने अब ऐसा क्या हो गया है कि दोनों धर्म के लोग एकदूसरे के खून के प्यासे बने हुए हैं। घटना वाला इलाका जहांगीरपुरी दिल्ली का ऐसा आवासीय क्षेत्र है जहां बेहद गरीब तबके के लोग रहते हैं, दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं, उन्हें राजनीति, दंगा-फसादों से कोई मतलब नहीं, लेकिन हनुमान जन्मोत्सव के दिन लोगों ने उन्हें उकसाकर ये कारनामा कर दिया। जहां हिंसा हुई, वहां दोनों तरफ आमने-सामने मंदिर और मस्जिद हैं, हिंदु-मुस्लमान आपस में प्यार से रहते हैं। एक दूसरे के बनी-बिगड़ी और सुख-दुख में साथी होते हैं, आपस में हाथ बंटाते हैं। किसी तरह की कोई आज तक दिक्कतें नहीं हुई। घटना कैसे हुई, इस बात को वहां के लोग समझ नहीं पाए हैं, आखिर ये हुआ कैसे? हिंसक घटना के बाद से समूचा इलाका भयभीत है। हर तरह के काम धंधे बंद हैं, पुलिस ने सबको घरों में कैद किया हुआ है। सुरक्षा की दृष्टि से कोई कहीं आ-जा न सके इसके लिए केंद्र सरकार ने इलाके को छावनी में तब्दील कर धारा 144 लगा दी है। गलियों के गेट पर ताला जड़ दिया है। स्कूल, प्रतिष्ठान, दुकानें, बाजार सब बंद पड़े हैं। लोग घरों में सहमे हुए हैं। बहरहाल, घटना के पीछे किसका समाजशास्त्र था, उसकी तस्वीर अब दिखने लगी है। हिंसा को लेकर जमकर सियासत होनी शुरू गई है। पक्ष-विपक्ष की ओर से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल पड़ा है, जबकि इस वक्त सिर्फ और सिर्फ समाधान की बात होनी चाहिए, पर नहीं, लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में हैं। कोई एक दल नहीं, बल्कि सभी पार्टियां मौके का फायदा उठाना चाहती हैं। धरातल पर अंदरखाने राजधानी के हालात अच्छे नहीं हैं। इसके बाद भी कुछ अंदेशे ऐसे दिखते हैं जो सुखद नहीं? आगे भी हालात बिगड़ते नजर आते हैं। ये तय है कि जो हिंसा हुई, वह अचानक से घटने वाली घटना नहीं थी, बल्कि उसकी पटकथा पहले ही लिखी गई थी। इलाके के कई लोग तो खुलेआम बोल ही रहे हैं कि अगर पुलिस सतर्क होती तो घटना होती भी नहीं? प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं जब लोग हिंसक हो रहे थे, तब पुलिसकर्मी तमाशबीन बने हुए थे। लोगों के हाथों में धारदार हथियार थे, पत्थर थे। दोनों तरफ से जब पथराव शुरू हुआ तो सबसे पहले लोगों ने पुलिसकर्मियों को ही निशाना बनाया, जिसमें कई पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग घायल हुए। घायलों का इलाज पास के बाबू जगजीवन राम अस्पताल में हो रहा है। फिलहाल पुलिस ने पूरे मामले पर एफआईआर दर्ज की हैं जिसमें मुस्लिम समुदाय के 14 लोगों को नामजद किया गया है जिसमें प्रमुख नाम मोहम्मद अंसार है जिसने सबसे पहले विरोध करना शुरू किया था। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। ये बंदा इलाके का कुख्यात है, कई मुकदमे दर्ज हैं, गैंगस्टर के तरह चार बार जेल जा चुका है। समय का तकाजा यही है, घटना की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। फिलहाल हिंसा को लेकर केंद्र सरकार की नजर बनी हुई है, क्योंकि दिल्ली की सुरक्षा का जिम्मा उन्हीं के कंधों पर है। घटना की जानकारी के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने पुलिस कमिश्नर तलब कर जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एलजी से बात करके दंगाइयों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। गृह मंत्रालय में घटना को लेकर बड़ी बैठक भी हुई। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा हर घटना के बाद होता ही है, पर इस बार सिर्फ मामला शांत होने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। ड्रोन कैमरों भी लगे हैं जिन घरों से पथराव शुरू हुआ, उनकी जांच हो। हर एंगल से जांच की जाए। ईमानदारी से और राजनीतिक चश्मे के बिना कड़ाई से जांच होगी, तभी प्रत्येक वर्ष होने वाले दंगों से राजधानी मुक्त हो पायेगी। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Published / 2022-04-20 15:40:37
गंगा की निर्मलता से ही संभव है सांस्कृतिक विकास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अशोक कुमार)। गंगा नदी में प्रदूषण को कम करने के लिए 1985 में गंगा कार्य योजना (जीएपी) का शुभारंभ किया गया था। इसके जल के बिना सनातन धर्म के किसी अनुष्ठान की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। गंगा नदी अपनी सहायक नदियों के साथ 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के अति विशाल उपजाऊ मैदान की रचना करती है। सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से उर्वर यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है। लगभग 3 किलोमीटर चौड़ी और 100 फीट यानी 31 मीटर की अधिकतम गहराई वाली यह नदी भारत में बेहद पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना मां और देवी के रूप में की जाती है। हिंदू धर्म में कहा जाता है कि यह नदी श्र्गंगा नदी की प्रधान शाखा भागीरथी है, जो उत्तराखंड स्थित कुमायूं में हिमालय के गोमुख नामक स्थान पर गंगोत्री हिमनदी से निकलती है। इस नदी की तुलना मिस्र की नील नदी के महत्व से की जाती है। इस पवित्र पावन नदी में मछलियों तथा सर्पों की अनेक प्रजातियां पाई ही जाती हैं। मीठे पानी वाले दुर्लभ डॉल्फिन भी यहां पाए जाते हैं। यह कृषि, पर्यटन, खेल तथा उद्योगों-कारोबारों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। लेकिन इसकी पहचान दुनिया की सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में से एक के रूप में की गई है। उदाहरणतया, हरिद्वार में गंगा जल में 55 सौ से अधिक कोलिफॉर्म है, जबकि कृषि के लिए माने डी श्रेणी के लिए मानक 5000 से कम कोलिफॉर्म हैं। भारत की सबसे पावन नगरी वाराणसी में कोलिफॉर्म जीवाणु गणना, संयुक्त राष्ट्र संघ नियंत्रित विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्थापित सुरक्षित मानक से, कम से कम 3000 गुना अधिक है। पर्यावरण जीव विज्ञान प्रयोगशाला, प्राणी विज्ञान विभाग, पटना विश्वविद्यालय द्वारा किये गए एक अध्ययन में वाराणसी शहर में गंगा नदी में पारे की उपस्थिति पाई गई है। यहां नदी के पानी में पारे की वार्षिक सघनता 0.00023 पीपीएम थी। इन सबका असर यह है कि भारत के सबसे मूल्यवान संसाधनों में से एक गंगा नदी की क्रमिक हत्या हो रही है। इस योजना के अंतर्गत 200 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं। फिर भी प्रदूषण स्तर कम करने में अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। जानकारी के मुताबिक, दिसंबर 2019 में गंगा नदी की सफाई के लिए विश्व बैंक एक अरब डॉलर उधार देने पर सहमत हुआ। यह धन भारत सरकार की 2020 तक गंगा में उपस्थित अवशिष्ट का अंत करने की पहल का हिस्सा है। सर्वप्रथम, हमें यह तय करना होगा कि किसी भी कीमत पर मलजल और उद्योगों का गंदा पानी गंगा में नहीं जा पाए। इसके लिए कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, पटना, भागलपुर इत्यादि बड़े शहरों में बड़ा ड्रेन बनाया जाए, जिसमें वाहित मल और औद्योगिक कचरा युक्त जल का ट्रीटमेंट व रिसाइकिल कर उस जल को कृषि कार्य के उपयोग में लाया जाए। तीसरा, प्रत्येक स्नान घाट के किनारे शौचालय और चेंजिंग रूम की व्यवस्था होनी चाहिए और उसकी साफ-सफाई का पूर्ण ध्यान रखा जाना चाहिए। चतुर्थ, हरिद्वार से लेकर हल्दिया तक गंगा की चौड़ाई कहीं भी 3 किलोमीटर से कम नहीं रहे, इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इस 3 किलोमीटर की चौड़ाई में बीच का 1 किलोमीटर जहाज आदि के आवागमन के लिए शिपिंग कारपोरेशन आॅफ इंडिया को सौंपा जाए, जिससे कानपुर से हल्दिया तक वाटर ट्रांसपोर्टेशन का मार्ग प्रशस्त हो सके। पांचवां, गंगा की चौड़ाई के दोनों ओर कम से कम फोरलेन सड़क का निर्माण किया जाए, जिससे हरिद्वार से हल्दिया तक एक नया कॉरिडोर, जो काफी उपयोगी होगा और आवागमन को आसान करेगा। छठा, उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा का पानी की गहराई इतनी अवश्य होनी चाहिए कि युद्ध आदि विशेष परिस्थितियों में बोइंग विमान आदि इस पर उतारा जा सके। वहीं, गंगा के स्ट्रेच की चौड़ाई ज्यादा होने से टाल क्षेत्र की समस्या भी अपने आप दूर हो जाएगी। सातवां, बिहार में बक्सर के टेल पॉइंट से सोन, गंडक आदि नदियों को जोड़कर दक्षिण-उत्तर बिहार अर्थात भभुआ, सासाराम, औरंगाबाद, गया, नवादा की ओर एक अलग चैनल बना दिया जाए तो इन जिलों में पटवन का एक बड़ा साधन विकसित किया जा सकता है। इस चैनल को कोसी, कमला, बागमती और बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ देने पर खगड़िया और दक्षिण-पूर्व बिहार के कई हिस्सों को पटवन आदि का साधन सहज ही मुहैया कराया जा सकता है। आठवां, गंगा के तट पर विकसित धार्मिक स्थल और तीर्थ भारतीय सामाजिक व्यवस्था के विशेष अंग हैं। गंगा आरती भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। अत: उन सभी प्राचीन नगरों और शहरों यथा वाराणसी, बक्सर, पटना, सुल्तानगंज, भागलपुर आदि में नियमित रूप से गंगा आरती का कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। इससे क्षेत्रीय पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। नवम, गंगा की घाटी में एक ऐसी सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ, जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवमयी और वैभवशाली है। जहां ज्ञान, धर्म, अध्यात्म एवं सभ्यता- संस्कृति की ऐसी किरण प्रस्फुटित हुई, जिससे न केवल भारत बल्कि समस्त संसार आलोकित हुआ। इसी घाटी में रामायण और महाभारत कालीन युग का उद्भव और विकास हुआ। प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव गंगा घाटी में ही हुआ, जहां से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का स्वर्ण युग विकसित हुआ, जब मौर्य और गुप्त वंश के राजाओं ने यहां पर शासन किया। दशम, और सबसे अंतिम प्रयास के रूप में गंगा सफाई अभियान को न केवल सरकारी योजना के रूप में प्रचारित किया जाए बल्कि इसे जन-आंदोलन का व्यापक रूप दिया जाए। इसमें जनता के साथ-साथ राजनेताओं और अधिकारियों को आवश्यक रूप से जोड़ा जाए। मुझे उम्मीद है कि समन्वित प्रयास से ही गंगा को भागीरथी के पुरातन रूप में पाया जा सकता है। (लेखक बिहार सरकार के पूर्व नगर विकास एवं आवास मंत्री हैं।)

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