विचार

View All
Published / 2022-08-13 12:23:19
जिया और खुशी : कभी सुनती थी ताने, फिर बनीं अफसर बिटिया...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (त्रिपुरारी पाण्डेय)। महेंद्रपुर गांव में भोला नाम का एक किसान रहता था। उसकी दो बेटियां थीं जिया और खुशी। उसकी दोनों बेटियां बहुत ही सुंदर, सुशील, आज्ञाकारी और मेहनती थी। भोला अपनी बेटियों को गांव के ही स्कूलों में शिक्षा ग्रहण हेतु भेजता था। जिया और खुशी अपनी पढ़ाई के साथ-साथ खेती के कामों में भी अपने पिताजी को सहयोग करती थी। भोला को बेटा न होने की कमी ये दोनों बेटियां खलने नहीं देती थी। भोला भी अपनी दोनों बेटी जिया और खुशी को बहुत प्यार करता था। जब भी गांव के लोग भोला को बेटा न होने का ताना देते थे, तब वह कहता- मेरी दोनों बेटियां बेटों से कम नहीं है। जिया और खुशी अपने बापू के साथ खेत की मिट्टी काटती और हल भी चलाती थी। दोनों बेटियों के साथ भोला को खेत पर काम करते देख लोग ताने भी मारते थे। मगर... इन सब बातों से इतर भोला एक मेहनती किसान की तरह अपने खेती कार्यों में लगा रहता था। जिया और खुशी काफी लगनशील लड़की थी। दोनों समय पर स्कूल जाती और पढ़ाई में लगी रहती थी। भोला की पत्नी पार्वती भी अपनी दोनों बेटियों को खूब दुलार-प्यार करती थी। समय बीतता गया। जिया और खुशी बड़ी हो गयी। साथ ही दोनों ऊंचे वर्गों में पहुंच गयी। उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय उसके गांव से दूर था। अब दोनों गांव से दूर कॉलेज जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करने लगी। गांव की औरतें भोला की पत्नी को कोसती और कहती, सुनो...। तुम्हारी बेटियां अब शयानी हो गयी हैं। ये पढ़ाई वगैरह छोड़ो और अच्छा सा लड़का देखकर दोनों का ब्याह करा दो। गांव से दूर शहर जाकर पढ़कर आना ठीक बात नहीं? जिया और खुशी की मां बस चुपचाप सब बातें सुनती और कहती। मेरी बेटियां अफसर बनेंगी। गांव की औरतें ये बातें सुनते ही मुंह बनाकर चली जाती थी। गांव के पुरुष साथी भी भोला को कहते- अरे भोलवा...। गांव की कोई लड़की गांव से बाहर नहीं है और एक तुम हो, जो अपनी बेटियों को शहर भेजते हो पढ़ने के लिए? कहीं तुम्हारी बेटियां गांव की सभी बेटियों को बिगाड़ न दें? भोला चुपचाप सुनता और धीरे से कहता था, मेरी बेटी जिया और खुशी एक दिन मेरा नाम रोशन करेगी। भोला के साथी भोला की बातें सुनकर ठहाके लगाकर हंसते थे और कहते थे... ये सपना छोड़ और अपने जैसा खेतीबाड़ी करने वाला कोई लड़का देखकर दोनों की शादी कराकर दोनों को घर से विदा कर दो। शयानी लड़की को घर में कुंवारी रखना अच्छी बात नहीं है? अब तुम ही बताओ भोलवा तुम्हारी बेटियों की उम्र की कोई लड़की इस गांव में कुंवारी है? भोला ये सब सुनकर मुस्कुराकर अपने खेत की और चल देता है। इधर, जिया और खशी दिन-रात मेहनत कर पढ़ाई कर रही थी। देखते-देखते जिया और खुशी स्नातक प्रतिष्ठा की परीक्षा बहुत अच्छे अंकों के साथ प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण भी हो गयी। जिया और खुशी के माता-पिता अपनी बेटियों की सफलता पर काफी खुश थे। दूसरी ओर, गांव के लोग अपने मन की भड़ास और जलन जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। भोला की दोनों बेटियां प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगी। एक दिन दोनों बेटियों की मेहनत रंग लायी। दोनों बेटियों के परीक्षा परिणाम जैसे ही सामने आये, तो पूरा घर हर्षोल्लास से झूम उठा। क्योंकि भोला की बेटियां राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर दोनों अफसर बन चुकी थी। भोला की पत्नी पार्वती अपने आंचल से अपने खुशी की आंसू पोछते हुए बोली... तुम दोनों हम सब का मान बढ़ाया है। मेरी बेटियां अब अफसर बन गयी है। गांव के वे लोग बस मुंह लटकाये खड़े थे, जो बेटियों की शिक्षा के विरोधी थे। जिया और खुशी अब तो पूरे गांव की आंखों का तारा बन चुकी थीं। वे दोनों जिधर से गुजरती लोग कहते... वह देखो, हमारी अफसर बिटिया। इन दोनों बेटियों की सफलता ने पूरे गांव का दृश्य ही बदलकर रख दिया। उस गांव में बेटा और बेटी के बीच में जो असमानताएं मौजूद थी वो बिलकुल अब समाप्त हो चुकी थी। लोग अब अपनी बेटियों को घर से दूर शिक्षा प्राप्ति हेतु भेजने लगे। गांव के लोग शिक्षा के प्रति अब बहुत जागरूक हो चुके थे, जिसका परिणाम यह हुआ कि अब महेंद्रपुर गांव सबसे शिक्षित गांव हो गया। भोला की दोनों बेटियां पूरे गांव के लिए आदर्श थी। जब भी ये दोनों बिटिया अपनी नौकरी की छुट्टियों पर घर आती थी, तो गांव के लोग बड़े ही उमंग के साथ कहते थे, लो आ गयी हमारी अफसर बिटिया...। (लेखक मलयपुर, जमुई बिहार के निवासी हैं।)

Published / 2022-08-11 18:03:33
विश्व हिन्दू परिषद के 58 वर्ष और सामाजिक समरसता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (विनोद बंसल)। हिन्दू समाज की एकता व अखंडता को तार-तार कर उसे जातिवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी व मत-पंथ-संप्रदाय वादी विभेदों में बांट कर ही मुगलों ने और फिर अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया। विपत्ति चाहे अनगिनत आईं किन्तु, यहां के बहुसंख्यक हिन्दू समाज में ना तो ज्ञान की ना वीरता व पौरुष की, ना धैर्य की और ना धर्म की कभी न्यूनता हुई। हां कभी आक्रमण सहे तो कभी उसके विरुद्ध क्षमता से भी अधिक भी प्रतिकार व वीरता का परिचय दिया। किन्तु हमारा विविध प्रकार का विखराव ही हमारा अभिशाप बना। 29 अगस्त 1964 को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पवई, मुम्बई स्थित पूज्य स्वामी चिनमयानन्द जी के आश्रम सांदीपनि साधनालय में बुलाई गई एक बैठक में पूज्य स्वामी चिनमयानन्द, राष्ट्रसंत तुकडो जी महाराज, सिख सम्प्रदाय से माननीय मास्टर तारा सिंह, जैन सम्प्रदाय से पूज्य सुशील मुनि, गीता प्रेस गोरखपुर से हनुमान प्रसाद पोद्दार, केएम मुंशी तथा पूज्य श्री गुरुजी सहित 40-45 अन्य महानुभाव भी उपस्थित थे। इसी दिन इन महापुरुषों ने विश्व हिंदू परिषद के गठन की घोषणा कर दी। इसी बैठक में हिन्दू समाज को संगठित और जागृत करने, उसके स्वत्वों, मानबिन्दुओं तथा जीवन मूल्यों की रक्षा व संवर्धन करने तथा विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित कर उन्हें सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ बनाने व उनकी सहायता करने सम्बन्धी विश्व हिंदू परिषद के तीन मुख्य उद्देश्य भी तय कर दिए गए। हिन्दू की परिभाषा करते हुए कहा गया कि जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है या जो व्यक्ति स्वयं को हिन्दू कहता है वह हिन्दू है। 22 से 24 जनवरी 1966 को कुम्भ के अवसर पर 12 देशों के 25 हज़ार प्रतिनिधियों की सहभागिता के साथ प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग में आयोजित किया गया। 300 प्रमुख संतों की सहभागिता के साथ पहली बार भारत के प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मांतरण पर रोक तथा परावर्तन (घर-वापसी) का संकल्प लिया गया। मैसूर के महाराज चामराज वाडियार को अध्यक्ष व दादासाहब आप्टे को पहले महामंत्री के रूप में घोषित कर विहिप की प्रबंध समिति की घोषणा भी हुई। इस सम्मेलन में जहां परावर्तन को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ वहीँ विहिप के बोध वाक्य धर्मो रक्षति रक्षितः और बोध चिह्न अक्षय वटवृक्ष भी तय हुआ। हिन्दू समाज में व्याप्त अस्पृश्यता समाज के सामने एक बड़ी चुनौती थी। इस चुनौती को स्वीकारते हुए एक समरस समाज के पुन: निर्णय हेतु विहिप ने अपनी व्यापक कार्ययोजना बनाई। इस दुर्गम लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु संगठन ने अपने 58 वर्षों की तपश्चर्या में अनेक कार्य किए जो तत्कालीन परिस्थियों में बेहद दुरूह कहे जा सकते थे किन्तु उनकी सफलता ने आज हिन्दू समाज की दशा व दिशा दोनों को बदलने में अभूतपूर्व योगदान किया है। गत लगभग छ: दशकों में समाज के सहयोग से किए गए इन प्रयासों में से कुछ निम्न लिखित हैं : 13-14 दिसम्बर 1969 के उडुपी धर्म संसद में संघ के तत्कालीन सर-संघचालक श्री गुरूजी के विशेष प्रयासों के परिणाम स्वरूप, भारत के प्रमुख संतों ने एकस्वर से हिन्दव: सोदरा सर्वे, ना हिन्दू पतितो भवेत के उद्घोष के साथ सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया।1994 में काशी में हुई धर्म संसद का निमंत्रण डोम राजा को देने पूज्य संत ना सिर्फ स्वयं चलकर गए बल्कि उनके घर का प्रसाद ग्रहण किया तथा अगले दिन डोम राजा धर्म संसद के अधिवेशन में संतों के मध्य बैठे और संतों ने उन्हें पुष्प हार पहनाकर स्वागत किया। इस धर्म संसद में 3500 संत उपस्थित थे। वनवासी, जनजाति, अति पिछड़ी व पिछड़ी जाति के हज़ारों लोगों को ग्राम पुजारी के रूप में प्रशिक्षण देकर उनका समय समय पर अभिनन्दन व मंदिरों में पुरोहित के रूप में नियुक्ति विहिप के ग्राम पुजारी प्रशिक्षण अभियान के कारण ही संभव हुई। 9 नवम्बर 1989 में श्रीराम जन्मभूमि का शिलान्यास एक अनुसूचित जाति के कार्यकर्ता कामेश्वर चौपाल द्वारा कराए जाने के अतिरिक्त, देश भर में आयोजित समरसता यज्ञ, समरसता यात्राएं, समरसता गोष्ठियां, हिन्दू परिवार मित्र योजना, अनुसूचित जाति व जन जातियों के लिए छात्रावास इत्यादि अनेक योजनाओं व कार्यक्रमों के माध्यम से हिन्दू समाज के बीच व्याप्त छूआछूत के अभिशाप से मुक्ति हेतु अभूतपूर्व कार्य किए हैं। सन् 2003 से लगातार देशभर में भगवान वाल्मीकि, संत रविदास तथा संविधान निर्माता डॉ भीमराव अम्बेडकर इत्यादि महापुरुषों, जिन्होंने देश की समरसता में योगदान दिया, की जयन्तियां व्यापक रूप से मनाई जा रही हैं। इन सब कार्यक्रमों के परिणाम स्वरूप अब संत समाज सहज रूप से वंचित बस्तियों में प्रवास, प्रवचन व सह भोज सहजता से करते हैं। देश के वनवासी, गिरिवासी व नगरवासियों के कुम्भ के रूप में असम के जोरहाट में 27 से 29 मार्च 1970 में देश की सभी प्रमुख तीर्थों व 45 नदियों के जल से एकात्म हुए इस सम्मेलन में अनेक पूज्य संत-महात्माओं व पूर्वोत्तर के विचारकों के साथ नागारानी गाइडिन्ल्यु ने यह घोषणा की कि प्रकृति पूजक वनवासी समाज जिसे ईसाई मिशनरियां अपने चंगुल में फंसा रही हैं, हिन्दू समाज का ही अभिन्न अंग है। 1982 में श्री अशोक सिंघल विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी बने। व्यापक जन जागरण के कार्यक्रम होने लगे। हिन्दू समाज को एकाकार करने वाली 1983 में हुई एकात्मता यात्रा में तो देश के 6 करोड़ लोगों ने सहभाग किया। अप्रैल 1984 में धर्म संसद का प्रथम अधिवेशन नई दिल्ली में संपन्न हुआ। इसमें विविध मत-पंथ-संप्रदायों के प्रतिनिधि व पूज्य वरिष्ठ संतों की सहभागिता रही। समग्र ग्राम विकास अभियान जिसे एकल अभियान के रूप में भी जानते हैं के अंतर्गत एक पंचमुखी परियोजना से अब तक 55 लाख से अधिक बच्चे लाभान्वित हो चुके हैं तथा लगभग 30 लाख विद्यार्थी अभी भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें एक साथ दी जा रही प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, ग्राम विकास (गौ-पालन, जैविक कृषि, कौशल विकास), संस्कार (हरिकथा व सत्संग) व जागरण शिक्षा (ग्रामीण विकास योजनाओं की जानकारी व उनका उपयोग) के माध्यम से देश के सुदूर क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन देखने को मिले हैं। इसमें आने वाले अधिकांश विद्यार्थी वंचित समाज से ही आते हैं। 26 फरवरी 2019 को भारत के राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविंद एवं माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एकल अभियान को "गांधी शांति पुरस्कार-2017" द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मानित कर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। देश के मठ-मंदिरों में पुरोहित प्रशिक्षित हों तथा ऊनमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी हो। इस संबंध में विहिप के प्रयास अनुकरणीय हैं। देश भर में अब तक हजारों अर्चक-पुरोहित या पुजारियों को धार्मिक कर्मकांडों की शिक्षा-दीक्षा देकर विभिन्न मठ-मंदिरों में भगवान की सेवार्थ लगाया गया है। 50 हजार प्रशिक्षणार्थियों में से लगभग 60% अनुसूचित जाति के तथा 15% अनुसूचित जनजाति के बंधु भगिनियां हैं जो, आज भी अनेक छोटे-बड़े मंदिरों के माध्यम से समाज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ब्राह्मण समाज के लोग ना सिर्फ इन सभी को पांडित्य में दक्ष करते हैं अपितु, बाद में भी उनकी हर प्रकार की मदद करते हैं। एक गांव, एक मंदिर, एक कुआ व एक शमसान का नारा भी विहिप ने ही दिया था। विद्वान व समाज चिंतक कहते हैं कि हर मंदिर की समिति में कम से कम एक संस्कृत का विद्वान हो, तो वहीं, एक प्रतिनिधि वंचित समाज से भी हो। विश्व हिंदू परिषद द्वारा समाज के सहयोग से देश भर में 90 हजार से अधिक अन्य सेवा प्रकल्प भी चलाए जा रहे हैं। इनमें से लगभग 70 हजार संस्कार केंद्र, दो हजार से अधिक शिक्षा केंद्र, 1800 स्वास्थ्य केन्द्र, 1500 स्वावलंबन केंद्र तथा शेष लगभग 15 हजार केन्द्रों में आवासी छात्रावास, अनाथालय, चिकित्सा केंद्र, कम्प्यूटर, सिलाई, कढ़ाई प्रशिक्षण केंद्र, विवाह केंद्र, महा-विद्यालय, कॉलेज इत्यादि प्रमुख हैं। ये सभी केंद्र सामाजिक समरसता के अनुपम उदाहरण हैं। सामाजिक चेतना के जागरण का ही परिणाम है कि विहिप ने अभी तक लगभग 63 लाख हिन्दुओं के धर्मांतरण को रोकने के साथ-साथ लगभग 9 लाख की घर-वापसी भी हुई है। अनुसूचित जाति, जनजाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलंबन के मंत्र के साथ देश दर्जन भर राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं। भारत धर्म यात्राओं का देश है जिसकी आत्मा तीर्थों में वास करती है। इन यात्राओं के माध्यम से ही देश, धर्म व समाज की एकता, अखण्डता और समरसता प्रतिबिम्बित होती है। बात चाहे कांवड़ यात्रा की हो या कैलाश मान सरोवर की, अमर नाथ यात्रा हो या गोवर्धन परिक्रमा, जगन्नाथ की नव कलेवर यात्रा हो या सिन्धु यात्रा, श्रीराम जानकी विवाह बारात यात्रा हो या बाबा अमरनाथ की यात्रा, इन सभी को सस्ती, सफल, सुखद, संस्कारित व आध्यात्मिक स्वरूप देने में विश्व हिन्दू परिषद् के धर्मं यात्रा महासंघ ने वर्ष 1995 से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शासन-प्रशासन व सम्बन्धित सरकारों के साथ अनवरत संपर्क के माध्यम से इन्हें व्यवस्थित भी किया गया और समरस भी बनाया गया। 1984 में प्रारम्भ हुए श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आन्दोलन ने देश के 3 लाख गांवों के 16 करोड़ लोगों को जोड़ा। सड़क से संसद व सर्वोच्च न्यायालय तक अपनी आवाज बुलंद कर 492 वर्षों के संघर्ष के उपरांत, देश के स्वाभिमान की पुन: प्रतिष्ठा करते हुए, 5 अगस्त 2020 के अयोध्या में भूमि पूजन के ऐतिहासिक दिवस को स्वर्णाक्षरों में दर्ज करा दिया। अगले वर्ष तक रामलला अपने भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो जाएंगे। इस आंदोलन ने विश्व भर के हिंदुओं को एक कर समरसता का एक नया बीजमंत्र दिया। 1995 में जब आतंकियों ने बाबा अमरनाथ की यात्रा बंद करने की धमकी देते हुए यह कहा कि यदि कोई आएगा तो वापस नहीं जाएगा। बजरंग दल के आह्वान पर 51 हजार बजरंगी व एक लाख अन्य शिव भक्तों ने जय भोले की हुंकार भरते हुए उस दुर्गम यात्रा की ओर जब कूच किया तो उस यात्रा को रोकने का कोई आज तक दुस्साहस नहीं कर पाया। पूंछ जिले के सीमांत क्षेत्र को हिन्दू विहीन करने के जिहादी षड्यंत्र को भांपते हुए बजरंग दल ने 2005 में बाबा बूढ़ा अमरनाथ की यात्रा को जब पुन: प्रारम्भ कराया तो वहां से हिन्दुओं का पलायन भी रुका और समाज व सुरक्षा कर्मियों का आत्मविश्वास भी बढ़ा। हरियाणा के मेवात में गत वर्ष पुन: प्रारंभ हुई बृजमण्डल (मेवात) जलाभिषेक यात्रा भी समरस भारत की दिशा में एक अनुपम प्रयास है। विहिप की युवा शाखा बजरंग दल तथा दुर्गा वाहिनी ने 1984 से लेकर आज तक देश-धर्म संस्कृति व राष्ट्र-रक्षा व समरस समाज के निर्माण हेतु अग्रणी भूमिका निभाई है। सेवा, सुरक्षा व संस्कार इनके मूल मंत्र रहे हैं। विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा समरस समाज की दिशा में किए गए इन विभिन्न कार्यों के कारण हिन्दू दर्शन आज सम्पूर्ण विश्व के केंद्र में आ चुका है। अब विश्व को लगने लगा है कि हिन्दू दर्शन ही अब विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा। (लेखक विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

Published / 2022-08-10 03:12:36
बिहार की राजनीति... दूध की प्याली छिनते ही बिल्ली की तरह खिसियाई भाजपा

टीम एबीएन, पटना/रांची (बासुकीनाथ पाण्डेय)। नीतिश कुमार ने बिहार में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इस खबर से अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्होंने राजद से समझौता कर फिर से सीएम बनने का रास्ता भी साफ कर लिया है। वे आठवीं बार बिहार का मुख्यमंत्री बन रहें हैं। अगर महाराष्ट्र की तर्ज पर अंतिम समय में वे तेजस्वी यादव को आगे कर सीएम बना दें तो यह बहुत चौकाने वाला होगा जिसकी उम्मीद न के बराबर है। नीतिश कुमार भाजपा गठबंधन के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते थे। जब इससे पहले वे भाजपा को छोड़ कर गये थे और राजद से गठबंधन किया था, तब भाजपाई सरकार में शामिल राजद के मंत्रियों पर ही अधिक हमला करके अपनी राजनैतिक संभावना बचाकर रखते थे। आखिर ऐसा क्या हुआ जो भाजपा को नीतिश ने किनारे कर दिया? निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी 2024 की तैयारी में लग गयी है। यह मोदी की गतिशीलता का परिचायक है। लेकिन दुर्भाग्य से मोदी के सिपहसलार अधिक उत्साह में सेल्फ गोल करने से नहीं चूक रहें हैं। सरकार बनाना और गिराना राजनीति का खेल है और इस खेल में कौन कितना माहिर है यह सत्ता में रहते और सत्ता के बाहर रहते नेताओं की चतुराई पर निर्भर करता है। महाराष्ट्र में आॅपरेशन लोटस सफल होने के बाद उत्साहित भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह ने पटना में आयोजित भाजपा के कार्यक्रम में जो नारा लगाया वह उनका अति आत्मविश्वास है या फिर सुनियोजित योजना यह समय तय करेगा लेकिन अभी बिहार उनके हाथ से निकल चुका है। बिहार एक गरीब राज्य है। समस्याग्रस्त भी। लेकिन बिहार के बारे में कहा जाता है कि बिहार जो सोचता है राजनीति में वह देश वर्षो बाद सोचता है। भाजपा ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के शिव सेना को जिस प्रकार से छिन्न-भिन्न कर दिया उससे नीतिश कुमार के कान खड़ें हो चुके थे। नीतिश विधानसभा चुनाव में ही चिराग पासवान की सिर्फ जद यू के खिलाफ उम्मीदवार उतारकर जिस प्रकार जद यू के उम्मीदवारों को हराने का काम किया उसी प्रकरण से नीतिश की नाराजगी बढ़ा दी। उसके बाद से लगातार नीतिश की परेशानी बढ़ती गयी। दो उप मुख्यमंत्री के घेरे में से उनके अतिविश्वसनीय सुशील मोदी को हटाकर भाजपा ने उन्हें छोटे-छोटे झटके देने आंरभ कर दिया। दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल का राजनैतिक दबाव और सबसे बड़ी पार्टी होने से उत्पन्न स्थिति में नीतिश का असहज होना स्वाभाविक था। इतिहास के पन्नों को तत्काल घट रही घटनाओं से जोड़ें तो एक महत्वाकांक्षी और राजनीति में बिहार के चाणक्य नीतिश को आरसीपी सिंह के ब्यान से भी समझा जा सकता है? आरसीपी सिंह ने कहा कि नीतिश सात जनमों ने पीएम नहीं बनेंगे सपने में भी न सोचें। सवाल यह है कि पीएम बनने की बात आखिर आई कहां से? इसके पहले जब पीएम के लिये भाजपा ने नरेन्द्र मोदी का नाम सामने किया था तब सबसे अधिक विरोध नीतिश कुमार ने किया था और इसी मुद्दें पर साथ छोड़ दिया था। तब यह कयास लगाये जा रहे थे कि केन्द्र में पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं बनेगी और भाजपा किसी भी हाल में सत्ता में नहीं आने जा रही है। ऐसे मेें एक गैर भाजपाई ईमानदार और सशक्त राजनेता के रुप में नीतिश कुमार अपनी संभावना तलाश रहे थे। लेकिन मोदी मैजिक ने इनके सपनों को समाप्त कर दिया। उसके बाद की राजनीति में 2024 एक ऐसा साल होगा, जिसमें भाजपा अति आत्मविश्वास के कारण बहुत कठिनाई में हो सकती है। भाजपा सत्ता में उस ताकत का प्रदर्शन नहीं कर पाई है जिसकी उम्मीद आम लोगों को है। भाजपा का सबसे बड़ा संकट बिहार-झारखंड में है नेत्त्व की कमी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उसी राजनीतिकरण का शिकार है जिसका शिकार कभी कांग्रेस रही थी। अब जब डेढ़ साल पहले भाजपा 2024 की तैयारी कर रही है उसमें बिहार जैसे राज्य को खोना उसके लिये कड़वी घूट की तरह है। अंदर खाने से आती आवाज यह भी कह रही है कि भाजपा किस दंभ से 2024 में जीत का दावा कर रही है? क्या नीतिश को आरसीपी सिंह ने जो पीएम के सपने देखने से मना किया है वह सपना फिर से नीतिश नहीं देख सकते हैं। सात बार बिहार का सीएम बनने के बाद अब राजनीति की महत्वाकांक्षा क्या हो सकती है? आखिर राजनीति इसी का नाम है। सड़क पर झंडा ढोने की चर्चा भाजपा के कई नेता लगातार करते हैं और सड़क के आदमी को पीएम बनने की कहानी भी सुनाते हैं। फिर नीतिश कुमार का एक कोण यह भी जिंदा है। बिहार में भाजपा के पास नेता ही नहीं है। भूपेंद्र यादव नित्यानंद राय का नाम अवश्य आगे करते रहे लेकिन तेजस्वी का राजनीतिक सितारा अधिक उज्जवल जान पड़ता है अगर उन पर चल रहे मामलों को छोड़ दिया जाए। बिहार में एक मजबूत महागठबंधन की सरकार बन रही है। इस सरकार में तमाम विरोधाभास होगा यह भी तय है। लेकिन जिस प्रकार छोटे से बहुमत जिसमें सिर्फ छह सीटों का संतुलन था और भाजपा की प्रताड़ना दोनों सहना पड़े तो नीतिश का निर्णय 2024 के लोकसभा चुनाव भी प्रभावित करेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा भी विशेषकर बिहार झारखंड सहित कई बड़ें राज्यों में अब जनता का विश्वास खो रही है। भाजपा के नेता भी बयान बहादुर हो गये हैं और उनका भरोसा सिर्फ मोदी और हिंदुत्व पर है जिसकी एक सीमा है। बिहार में भाजपा को कभी बहुमत नहीं मिला क्योंकि वह जद यू के सहारे ही अपना पालन करती रही। भाजपा की हालत खिसियाई बिल्ली की तरह हो गयी है जिससे दूध की प्याली छीन ली गयी है। आखिर पार्टी विथ डिफरेंस का जो तगमा भाजपा ने अपने गले में लटका रखा था वह टूट चुका है। नीतिश ने जिस गठबंधन को कबूल किया है वह बिहार की राजनीति नहीं देश की राजनीति को भाजपा के खिलाफ एक बड़ी मजबूती देगा। राजद, कांग्रेस, तीनों साम्यवादी दल का विशुद्ध सेक्यूलर गठबंधन से बिहार में नेता विहिन भाजपा कैसे ठकरा सकेगी इसकी चिंता भाजपा को करना चाहिए। नीतिश की इस झटके को झेलना आसान नहीं होगा। (Editor @ abnnews24.com)

Published / 2022-08-10 02:49:07
अहंकार सबसे कष्टदायक, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती)। अहंकार अन्तिम अवरोध है। अहंकार सबसे अधिक कष्ट देता है, क्योंकि यह हमें स्वयं के प्रति सजग बनाता है, हमें हमारे नाम, यश, पद और प्रतिष्ठा का ख्याल कराता है। यह हमें पूरी तरह स्व-केन्द्रित बना देता है। और यह अहंकार ही है जो हमें कर्मों के बंधन में जकड़ देता है और हमें धर्म से विमुख कर देता है। इसी वजह से हम कर्म को जिम्मेदारी के बजाय बोझ समझते हैं। और यह अहंकार इच्छाओं और कामनाओं द्वारा पोषित होता रहता है। अहंकार को सम्भालने के लिए अपने आप से समझौता करना आवश्यक है, क्योंकि जब तक अहं भाव बना रहेगा तब तक अपने परिवेश के साथ तुम्हारी क्रिया-प्रतिक्रिया चलती रहेगी, दूसरों के साथ संघर्ष होता रहेगा। तुम्हारी प्रतिक्रियाओं में मन की नकारात्मक वृत्तियां ही अभिव्यक्त होंगी। तुम दूसरों के कथनों पर प्रतिक्रिया करोगे और उनसे बदला लेने की कोशिश करोगे। जब तक अहंकार नियंत्रण में नहीं आता, तब तक समझौता नहीं होता। और जब अहंकार नहीं रहता, तब समझौता आसानी से हो जाता है और कर्म कर्मयोग में बदल जाता है। मानव धर्म का पालन करते जाओ, अहंकार को सिर मत उठाने दो, दूसरों की परिस्थिति, चिन्तन और आवश्यकताओं को समझने का प्रयास करो, और जिस तरह अपनी भलाई के लिए काम करते हो, वैसे ही दूसरों के उत्थान के लिए भी प्रयासरत रहो। ये कर्मयोगी के लक्षण हैं। कर्मयोग एक आन्तरिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अपने चरित्र को विक्षेपरहित और परिष्कृत बना सकते हैं। जब हम कर्म के साथ योग शब्द को जोड़ते हैं, तब इसका तात्पर्य एक ऐसी क्षमता से होता है जिसके द्वारा हम मन और अहंकार के थपेड़ों से अप्रभावित रहते हुए अपनी जीवन-यात्रा सहजता और सुगमता से संपन्न करते हैं, अपने कर्मों को सकारात्मक, सृजनात्मक और उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करते हैं। यही कर्मयोग की संपूर्ण प्रक्रिया है। (साभार : कर्म और कर्मयोग)

Published / 2022-08-08 17:38:20
मौद्रिक नीति को सामान्य बनाना आरबीआइ का लक्ष्य

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने गत सप्ताह नीतिगत रीपो दर को 50 आधार अंक बढ़ाकर 5.4 फीसदी करके अच्छा कदम उठाया। स्थायी जमा सुविधा और सीमांत स्थायी सुविधा दरों को समायोजित करके क्रमश: 5.15 तथा 5.65 फीसदी कर दिया गया। बाजार का एक हिस्सा यह आशा कर रहा था कि दरें तय करने वाली समिति धीमी गति से आगे बढ़ेगी। नीतिगत बैठक से पहले उच्च बॉन्ड कीमतों में यह परिलक्षित भी हुआ था। बहरहाल, एमपीसी ने जो कुछ किया वह करने की उसके पास मजबूत वजह थी। हालांकि खुदरा महंगाई दर में हाल के महीनों में कमी आई है लेकिन यह अभी भी काफी ऊंचे स्तर पर तथा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा तय दायरे से ऊंचे स्तर पर है। जून में खुदरा मुद्रास्फीति दर 7 फीसदी थी। यह लगातार छठा महीना था जब यह दर आरबीआई के तय दायरे के ऊपरी स्तर से भी ऊंची थी। चूंकि एमपीसी का अनुमान है कि मुद्रास्फीति चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही तक तय दायरे से ऊपर रहेगी इसलिए नीतिगत दर बढ़ाने में धीमापन अनुमानों को प्रभावित कर सकता था। वास्तविक नीतिगत दर अभी भी काफी हद तक ऋणात्मक है और ऐसे में समझदारी इसी में है कि जल्द से जल्द जरूरी कदम उठाए जाएं। गत सप्ताह के नीतिगत कदम के बाद रीपो दर महामारी के पहले के 5.15 फीसदी के स्तर से ऊपर निकल गई और यहां से एमपीसी को दरों से संबंधित कदम उठाने में कुछ समझदारी का परिचय देना होगा। हालांकि समिति ने इस वर्ष मुद्रास्फीति को लेकर अपने पूवार्नुमान नहीं बदले हैं लेकिन उसे उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में दरें कम होकर 5.8 फीसदी हो जाएंगी और 2023-24 की पहली तिमाही में यह 5 फीसदी हो जाएगी। साफ कहा जाए तो मुद्रास्फीतिक परिदृश्य अनिश्चित बना हुआ है और निष्कर्ष कई कारकों पर निर्भर करेंगे। हालांकि वैश्विक जिंस कीमतें हाल के सप्ताहों में कम हुई हैं लेकिन यूक्रेन युद्ध के कारण ईंधन कीमतों पर दबाव बना रहेगा। उदाहरण के लिए गैस आपूर्ति में अचानक गिरावट एक बार फिर वैश्विक ईंधन कीमतों में तेजी की वजह बन सकती है। अगर वैश्विक मुद्रास्फीति लगातार ऊंची बनी रहती है तो यह भी एक जोखिम है। वहीं अगर विकसित देशों में अनुमान से अधिक नीतिगत सख्ती बरती जाती है तो इससे मुद्रा बाजार लंबे समय तक अस्थिर होगा और इसका असर भारत में मुद्रास्फीति पर भी दिखेगा। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू जोखिमों मसलन मॉनसून की प्रगति आदि के अलावा आने वाले महीनों में नीतिगत निर्णय ब्याज की अनुमानित स्वाभाविक दर, मुद्रास्फीति के लिए समायोजित नीतिगत दर और वास्तविक दर आदि पर भी निर्भर करेंगे। रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रियों ने प्रकाशित एक हालिया शोध आलेख में कहा कि महामारी के बाद स्वाभाविक दर में कमी आई है और अनुमान है कि 2021-22 की तीसरी तिमाही में यह दर 0.8 फीसदी से एक फीसदी के दरमियान रहेगी। चूंकि इस दर का निर्धारण करना मुश्किल है, खासतौर पर उच्च अनि?श्चितता के दौर में इसलिए यह मानते हुए कि आरबीआई के अनुमान सही साबित होंगे, नीतिगत दरों को अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही तक 6 फीसदी के स्तर तक जाना होगा। ऐसे में मौद्रिक नीति समिति को यह तय करना होगा कि कितनी जल्दी वह उस स्तर पर पहुंचना चाहती है। यह निर्णय साफतौर पर इस बात पर निर्भर करेगा कि समिति की अगली बैठक में मुद्रास्फीतिक हालात कैसे उभरते हैं। ऊपरी स्तर पर कोई चकित करने वाली स्थिति संभवत: तभी बनेगी जब सितंबर में 50 आधार अंकों का इजाफा किया जाए। वहीं दूसरी ओर मुद्रास्फीतिक दबाव में कमी आने से एमपीसी के पास अवसर होगा कि वह दरों में कम इजाफा करे। तब वह यह तय कर सकेगी कि आने वाली तिमाहियों में वह क्या हासिल करना चाहती है।

Published / 2022-08-06 17:58:19
नौ अगस्त को किस तरह याद करे आदिवासी समुदाय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिवशंकर उरांव)। अंतरराष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस नौ अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन विश्व भर के आदिवासियों के हित और अधिकार को अपने में समेटे है। इस अवसर पर पूरे देश में छोटे बड़ें कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। इन कार्यक्रमों का सिलसिला 1993 से जोर पकड़ता गया है। इसी वर्ष से नौ अगस्त को अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाने की घोषणा हुई। विश्व मूल आदिवासी दिवस मनाने के कारणों पर जाए तो यह एक मर्माहत करने वाला अंदरूनी विषय है जिस पर चर्चा कम ही होती है। लेकिन इस सच को देश ही दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को जानना आवश्यक है। आज से 524 साल पहले 1498 ई में यूरोप के एक छोटे से देश स्पेन निवासी कोलंबस नामक नाविक अपने लाव लश्कर के साथ समुद्री यात्रा पर निकला। उसने भारत की संपन्नता और एर्श्वय के बारे में सुन रखा था। लेकिन समुद्री तुफान के कारण रास्ता भटक कर वह अमेरिका पहुंच गया। तब अमेरिका में गोरे लोग नहीं थे। काले और निर्धन आबादी का वहा जमावड़ा था। लेकिन वे अपनी संस्कृति रीति रिवाज और परम्पराओं के साथ ही जीते थे। कोलंबस भारत की खोज में निकला था लेकिन उसने एक नयी भूमि की खोज कर ली थी जो अमेरिका था। जिस दिन कोलंबस अमेरिका की धरती को छुआ था यानि उस धरती पर पहुंचा था वह तारीख नौ अगस्त 1498 थी। कोलंबस को लगा कि वह इंडिया की खोज करने में सफल हो गया है इसलिये उसने वहां स्थित लोगों को इंडियन कहकर संबोधित किया। वही लोग आगे चलकर रेड इंडियन कहलाये। कोलंबस के बाद यूरोप के कई देशों के नाविक और समुद्री अभियान में लगे जन समूह भी अमेरिका पहुंचे। धीरे-धीरे यूरोप के गोरों ने अमेरिका पर कब्जा जमा लिया। इन गोरों ने वहां के मूलवासी रेड इंडियन्स पर अंतहीन अमानवीय अत्याचार किये जिसके कारण उनकी स्थिति अत्यंत खराब होती हुई लुप्त प्राय हो गयी। जो थोड़ें बच गये उनके पास सनातन पद्धति रीति रिवाज और धार्मिक समाजिक बोध कराने वाले हरेक तत्व से उन्हें अलग कर दिया। उनके हाथ में बाइबिल थमा दिया गया। उनके नेटिव्स के आस्तित्व को ही समाप्त करने की साजिश रची गयी जिसमें एक हद तक उन्हें सफलता भी मिली।बाद के काल खंड में जो हुआ उसे याद कर दुनिया सिहर उठती है। रंगभेद और नरसंहार का खेल शायद सबसे पहले यही हुआ था। यूरोप के गोरों के द्धारा अमेरिका में यह खेल किया गया ऐसा नहीं था। पूरी दुनिया में जहां-जहां उन्हें अवसर मिला उन्होंने यही खेल किया। अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में भी ऐसे ही दुष्कृत्य किये गये। गोरे जहां भी गये एक ही प्रकार से अत्याचार का काम किया और हमारे पूर्वज इसके शिकार हुए। अफ्रीका में हमारे पूर्वजों ने इन गोरों का प्रसन्नता पूर्वक स्वागत किया लेकिन इन लोगों ने कुटिल चालचल कर हमारे धर्म और संस्कृति को समाप्त करने की दिशा में चाल चल दी। हमारे पूर्वजों के हाथ में बाइबिल थमा दी। जब तक हम आंख खोलते तब तक हमारी धरती हमारे आकाश और हमारा सब कुछ उनलोगों ने कब्जा कर लिया था। हम प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर पर्वत और पठारों पर सीमित साधनों के साथ निवास कर रहे थे। उनकी कुटिल नजर इस पर भी गयी और हमारे खनिज संपदा को भी जमकर लूट लिया गया। आस्ट्रेलिया के मूल निवासी माबो के साथ ऐसा ही कुछ किया गया। यही कारण था कि यूरोप के मूल निवासी आस्ट्रेलिया के पीएम ने अपने वंशजों के अत्याचार के कार्य पर वर्षो बाद क्षोभ व्यक्त किया। 24 फरवरी को उन्होंने पूरी दुनिया से अपने पूर्वजों द्वारा आदिवासियों पर किये गये अत्याचार के लिये दुनिया से माफी मांगी। अब मीडिया के त्वरित प्रसार के युग में नौ अगस्त का महत्व और उसके पीछे छिपे दर्द का पर्दाफाश हो चुका है और यह सच आदिवासी दिवस पर सभी लोगों को जानना चाहिए। मेरा मानना है कि यह दिन आक्रोस और दुख प्रकट करने का दिन है। इस पर हम खुशी मनाकर इस दिवस की गरिमा और हमारे समाज की पीड़ा को सही ढंग से याद नहीं करते हैं। इतिहास के पन्नों से सच निकाल कर उसका विश्लेषण कर दिया गया है। हमें इस दिन किसी भी हाल में खुशियां नहीं मनानी चाहिए। हमारे देश में 15 नवंबर जो हमारे स्वाभिमानी मूलवासी के आदर्श भगवान बिरसा मुंडा का जन्म दिन और वर्तमान मादी सरकार ने जिसे आदिवासी स्वाभिमान दिवस घोषित किया है उस दिन हमें गर्व और खुशी मनाना चाहिए। यूरोप के गोरों के लिये नौ अगस्त का दिन खुशी का दिन हो सकता है क्योंकि इसी दिन उन्होंने अमेरिका की धरती पर पैर रखा था लेकिन विश्व भर के मूलवासियों के लिये यह पीड़ा का दिन है। यूरोपीय देश नये नये नरेटिव पैदा कर उसे पूरी दुनिया में फैलाने के लिये तत्पर है और वे उसमें सफल भी हो जाते हैं। उनके द्वारा पोषित एजेन्सियां भारत में विभिन्न संगठनों के माध्यम से अपने एजेंडा को पूरे देश में लागू कर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। इनका काम जनजातिय संगठन को तोड़ मरोड़ कर अपने आप को स्थापित करना है। विश्व आदिवासी दिवस के नाम पर ऐसे संगठन विगत चार दशकों से सक्रिय हैं। यूरोप और दुनिया के विभिन्न देशों से धन प्राप्त कर अपनी कुत्सित दुकानदारी चलाने वाले इन संगठनोंने ही आदिवासी दिवस को प्रायोजित किया है। आखिर आदिवासी यातना के इस बुरे दिन नौ अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने के पीछे क्या तर्क है? देश के भोले और सरल आदिवासी समुदाय और समाज इनके गलत चालों का अनजाने में शिकार हो गया है और कथित आदिवासी दिवस के नाम पर इतराता, इठलाता, झूमता अपने सभ्यता की बर्बादी के दिवस की तारीख नौ अगस्त में अपना अस्तित्व और पहचान तलाश रहा है। यह गंभीर चिंतन का विषय है। (लेखक पूर्व विधायक गुमला विस सह अध्यक्ष जनजातीय मोर्चा झारखंड हैं।)

Published / 2022-08-05 16:33:22
बैंकों की सबसे बड़ी समस्या है ‘एनपीए’

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अश्विनी महाजन)। पिछले लंबे समय से एनपीए (नॉन परफार्मिंग एस्सेट्स) की समस्या से जूझ रहे बैंकों की मुश्किलों को आसान करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। फरवरी माह में केन्द्रीय बजट में सुझाया गया एस्सेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी), यानी बैड बैंक का प्रावधान भी उसी श्रृंखला में इस समस्या के समाधान का एक और प्रयास कहा जा सकता है। सबसे पहले सरकार इन्सालवेंसी एवं बैंकरप्सी (आईबीसी) एक्ट लेकर आई और पहली बार दिवालियापन के लिए कोई ठोस कानूनी पहल की गई। माना गया कि इससे ईज आफ डूईंग बिजनेस में सुधार होगा, क्योंकि नुकसान के कारण देनदारिया चुका नहीं पाने की स्थिति में परिसंपत्तियों को आसानी से बेचकर व्यक्ति छुटकारा पा सकता है, लेकिन साथ ही इसका लाभ यह था कि बैंकों के लिए भी अपनी बैलेंस शीट साफ रखना संभव हो पाएगा। उसके उपरांत देखा गया कि पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्ज की अदायगी में कोताही होने के कारण बैंकों की आर्थिक हालत बिगड़ने के कारण उन्हें पूंजीगत मदद की भी जरूरत है। ऐसे में अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में होने के कारण उनकी पूंजीगत जरूरतों की पूर्ति हेतु भी सरकार को ही मदद देनी जरूरी थी। केन्द्र ने पिछले वर्षों में अपने खजाने से अभी तक 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है ताकि बैंकों के घाटे की भरपाई हो सके। हालांकि इन सभी प्रयासों से बैंकों को डूबने से तो बचा लिया गया, लेकिन उनकी एनपीए की समस्या बदस्तूर बनी रही। हालांकि बैंकों के एनपीए जो 2017-18 तक आते-आते 11.2 प्रतिशत तक पहुंच गए थे, सितंबर 2020 तक वे 7.5 प्रतिशत तक कम हो गए थे, लेकिन पिछले वर्ष में कोविड महामारी के कारण व्यवसायों को नुकसान के चलते ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि सितंबर 2021 तक वे फिर से बढ़ जाएंगे। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के हवाले से पता चलता है कि वे 13.5 प्रतिशत तक भी बढ़ सकते हैं। हालांकि कोर्ट के आदेश के अनुसार जिन ऋणों की अदायगी कोरोना के चलते आगे बढ़ा दिया गया था, उच्चतम न्यायालय ने उन ऋणों को एनपीए घोषित करने के लिए रोक लगा दी थी, लेकिन अब चूंकि न्यायालय ने इस रोक को हटा दिया है, अब बैंकों को उन ऋणों जिनकी वापसी नहीं हो रही, को एनपीए घोषित करना पड़ेगा। इससे एनपीए की प्रमाण में भारी वृद्धि हो सकती है। जानकारों का मानना है कि कोविड के कारण उत्पन्न अन्य समस्याओं का भी प्रभाव एनपीए पर पड़ सकता है। वर्ष 2021-22 का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों की एनपीए की समस्या से निपटने के लिए एआरसी यानी बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। बैंकों की विषम एनपीए स्थिति के चलते पहले से ही बैड बैंक का प्रस्ताव आर्थिक जगत से जुड़े लोगों की ओर से आ रहा था। चूंकि भविष्य में एनपीए की समस्या बढ़ सकती है, ऐसे में बैड बैंक की अवधारणा और उससे जुड़े अन्य पहलुओं की जांच जरूरी हो जाती है कि क्या बैड बैंक बैंकों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकेगा। बैड बैंक की अवधारणा विदेशों से आई है। गौरतलब है कि जब अमेरिका में 2007-08 में बैंक धराशायी हो रहे थे, उस समय अमेरिका के राजस्व विभाग ने बैंकों के उन ऋणों को खरीद लिया, जिनकी वापसी नहीं हो पा रही थी। बाद में बाजार स्थितियां ठीक होने के बाद उन्हें बाजार में बेहतर कीमत पर बेच दिया। पूर्ण लॉकडाउन की तरफ न बढ़े देश लगभग वैसा ही कदम भारत सरकार भी उठाने जा रही है, जिसे एआरसी का नाम दिया गया है। यह कंपनी सेक्यूरटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन एंड एनफोर्समेंट और सेक्यूरिटीज इंटरेस्ट एक्ट (सरफायेसी एक्ट) 2002 के अंतर्गत स्थापित होगी। इस एआरसी की स्थापना हेतु उस कंपनी के पास स्वयं स्वामित्व की 100 करोड़ की राशि का फंड होना जरूरी है। जिन दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को यह कंपनी खरीदेगी, उसके 15 प्रतिशत के बराबर उसके पास पूंजी अनुपात का होना जरूरी होगा। यह एआरसी बैंकों के पास दबावग्रस्त परिसंपत्तियों को उचित कीमत पर खरीदेगी। बैंकों को उस परिसंपत्ति के मूल्य का 15 प्रतिशत नकद प्राप्त होगा और शेष 85 प्रतिशत राशि उसे बॉन्ड और ऋण पत्र के रूप में प्राप्त होगी, जिसकी देयता अधिकतम 6 वर्ष की होगी। अपने कार्य को करने हेतु एआरसी डिबेंचर और बॉन्ड तो जारी कर ही सकता है, इसके साथ वह प्रतिभूति (सिक्योरिटी) रसीद भी जारी कर सकता है। सिक्योरिटी रसीद धारक के पास उस वित्तीय परिसंपत्ति का अधिकार होगा। वित्त की मदद से बैड बैंक (एआरसी) दबावग्रस्त ऋणों को खरीद सकेगा। इन दबावग्रस्त ऋणों को बट्टे पर खरीदने के बाद एआरसी के पास वो तमाम अधिकार होंगे जो बैंक के पास थे। यानी वह उन ऋणों का पुनर्गठन या पुननिर्धारण कर सकता है, समाधन कर सकता है, ऋणी के व्यवसाय को बेच सकता है या लीज पर दे सकता है अथवा प्रबंधन को बदल सकता है, लेकिन इस प्रकार की कार्यवाही को अंजाम देने के लिए ऋण दाताओं के 75 प्रतिशत और एआरसी की सहमति जरूरी होगी। यदि ऋण प्रतिभूति रहित है तो ऐसी हालत में ऋणी पर मुकदमा करने का भी अधिकार एआरसी के पास रहेगा। यह भी प्रश्न उठता है कि इंसोलवेंसी और बैकरप्सी कोड और एआरसी में अंतर क्या है? दोनों में ही अंतोत्गत्वा उद्देश्य एनपीए से छुटकारा पाना ही है, लेकिन समझना होगा कि आईबीसी उधारी के समाधान के लिए बनाया गया है। गौरतलब है कि आईबीसी से पहले इस काम को वर्षों लग जाते थे। दूसरी तरफ एआरसी का मकसद एनपीए ऋणों को बेचकर बैंकों की बैलेंस शीट को जल्द साफ करने का है, लेकिन देखा जाए तो दोनों के माध्यम से बैंकों की समस्याओं को कम करने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बैड बैंक से भी एनपीए की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। अधिकांश बैंक सरकारी क्षेत्र में हैं और एआरसी भी सरकारी स्वामित्व में होंगे। लेकिन समझना होगा कि बैंकों के आत्मविश्वास को बढ़ाने हेतु उनके एनपीए का हस्तांतरण दूसरी संस्था को करना एक अच्छा कदम हो सकता है।

Published / 2022-07-31 14:53:39
हौसले की उड़ान... पीवी सिंधु

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुधांशु कुमार)। हाथ में रैकेट लेकर जब वह बैडमिंटन कोर्ट में उतरती हैं तो सवा सौ करोड़ लोगों की निगाहें उन पर होती हैं। जोश, जज़्बा और जुनून का वह पर्याय हैं। ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम बड़ी-बड़ी उम्मीदों के साथ उतरती रही हैं। टोक्यो ओलंपिक में कई बड़े नामों ने निराश किया पर उन्होंने आशा के दीप को जलाए रखा। अपनी आक्रामक शैली से प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों को मात देती हुई जब वह सेमीफाइनल तक पहुंचीं तो करोड़ों देशवासियों की निगाहों में सोने की चमक दिखने लगी। रियो ओलंपिक में उन्हें रजत मिला था। ऐसे में यदि इस बार सोना की चाहत सब रख रहे थे तो वह गलत भी नहीं था। लेकिन, सेमीफाइनल मैच में चीनी ताइपे की खिलाड़ी तायी जू यिंग की आक्रामकता ने पीवी सिंधु के स्वर्णिम इरादों पर पानी फेर दिया। वह निराश हुईं। करोड़ों भारतीय भी निराश हुए। लेकिन, पिता पी रमन्ना के लिए सब कुछ खत्म नहीं हुआ था। उन्होंने अपनी विश्व चैंपियन बेटी से लंबी बातचीत की। उन्हें प्रेरित किया कि इतिहास रचने का मौका अब भी है। ओलंपिक मेडल के लिए तरसते भारत देश की यदि वह कांस्य पदक भी जीत लेती हैं, तो सारा देश उनको सिर आंखों पर बिठाएगा। पिता के शब्दों से उपजी प्रेरणा लेते हुए उन्होंने अपनी ताकत को फिर से बटोरा। कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में उन्होंने अपने आक्रमण को और तीक्ष्ण किया। जोरदार स्मैश लगाए। दक्षिण कोरिया के कोच पार्क ताइ सेंग के कुशल मार्गदर्शन में पीवी सिंधु ने कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में चीन की खिलाड़ी हे बिंग जियाओ को पराजित करते हुए इतिहास रच दिया। ओलंपिक खेलों में दो पदक जीतने वाली वह भारत की प्रथम महिला खिलाड़ी बन गई हैं। यही नहीं व्यक्तिगत स्पधार्ओं में दो ओलंपिक पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों की सूची में उनका नाम तीसरे स्थान पर अंकित हो गया है। उनसे पहले नॉर्मन प्रिचार्ड और सुशील कुमार को ओलंपिक खेलों में भारत के लिए दो पदक जीतने का गौरव प्राप्त हुआ है। पीवी सिंधु टोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय खिलाड़ी बनी हैं। भारतीय रेल में कार्यरत उसके माता-पिता वॉलीबॉल के नामी खिलाड़ी रहे हैं। उनके पिता पी रमन्ना ने सियोल एशियाड में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व भी किया। विरासत में मिले खेल में पहचान बनाना पीवी सिंधु के लिए आसान था। लेकिन, आॅल इंग्लैंड चैंपियनशिप में पुलेला गोपीचंद की सफलता ने पूरे परिवार को बैडमिंटन की ओर आकर्षित किया। माता-पिता की सहमति से पीवी सिंधु ने 5 वर्ष की उम्र में ही रैकेट थाम लिया और हैदराबाद स्थित भारतीय रेल सिग्नल एवं दूरसंचार अकादमी के स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में खेलने लगी। नैसर्गिक प्रतिभा, माता-पिता के कुशल निर्देशन और पीवी सिंधु की लगन से सकारात्मक संदेश मिलने लगे कि यह लड़की आगे चलकर बड़ा खिलाड़ी बन सकती है। फिर क्या था? पूरे परिवार ने अपने सपनों के आकार को बड़ा कर लिया जिससे बड़े संघर्ष की भूमिका तैयार हुई। जरूरत को देखते हुए मां ने सरकारी सेवा छोड़ दी तो पिता ने लंबे-लंबे अवकाश लिए। पुलेला गोपीचंद का ट्रेनिंग सेंटर उसके घर से करीब 50 किलोमीटर दूर था। प्रतिदिन सिंधु को उस ट्रेनिंग सेंटर तक समय से पहुंचाने की जिम्मेदारी पिता ने अपने कंधों पर ली। छोटी सी सिंधु को स्कूटर पर बैठाने के बाद वह उसे अपनी पीठ के साथ कपड़े से बांध देते थे ताकि सिंधु स्कूटर से गिर न पड़े। तमाम मुश्किलों के बाद भी उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिंधु प्रतिदिन समय पर प्रशिक्षण के लिए मौजूद रहे। प्रशिक्षण के दौरान सिंधु ने भी मेहनत से कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। लगातार अपने आप को मजबूत बनाती चली गईं। 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों में साइना नेहवाल ने जब कांस्य पदक जीता तो पीवी सिंधु के बाजूओं में भी फौलादी ताकत आ गई। उन्हें विश्वास हो गया कि बैडमिंटन के कोर्ट में भारत के सुनहरे दिनों की शुरूआत हो चुकी है। अधिकारियों और स्पॉन्सरों ने भी जब इस ओर अपनी निगाहें घुमाईं तो पीवी सिंधु की ताकत और बढ़ गई। पूरी दुनिया का बैडमिंटन कोर्ट उनके लिए खुल गया। एक के बाद एक लगातार वह सभी महत्वपूर्ण टूर्नामेंट जीतती चली गईं। 14 वर्ष से पहले जूनियर वर्ग की सभी प्रमुख भारतीय प्रतियोगिताओं में अपनी चमक बिखेरने के बाद पीवी सिंधु ने इंटरनेशनल सर्किट में कदम रखा। जीवन में अत्यंत सहज रहने वाली पुसर्ला वेंकट सिंधु जब बैडमिंटन कोर्ट पर उतरती हैं तब अपनी शानदार सर्विस और आक्रमक अंदाज से सबका मन मोह लेती है और प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को घुटने टेकने पर बाध्य कर देती हैं। ओलंपिक में दो पदक जीतने के अलावा वह विश्व चैंपियनशिप में भी पाँच पदक जीत चुकी हैं। 2019 के बासेल विश्व चैंपियनशिप में पीवी सिंधु ने स्वर्ण पदक जीता था। 2017 के ग्लासगो विश्व चैंपियनशिप तथा 2018 के नानजिंग विश्व चैंपियनशिप में उन्हें रजत पदक मिला था। 2013 के कोपनहेगन विश्व चैंपियनशिप तथा 2014 के ग्वांगझू विश्व चैंपियनशिप में उन्हें कांस्य पदक मिला। ओलंपिक तथा विश्व चैंपियनशिप मिलाकर सात पदक जीतने वाली वह विश्व की तीसरी खिलाड़ी हैं। पीवी सिंधु ने एशियाई खेलों में भी दो पदक जीते हैं। जकार्ता एशियाई खेलों में उन्हें रजत पदक और इचियोन एशियाई खेलों में कांस्य पदक मिला था। गोल्ड कोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में पीवी सिंधु ने मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण पदक और एकल स्पर्धा में रजत पदक प्राप्त किया जबकि ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल में उन्हें कांस्य पदक मिला। उन्होंने चीन, इंडोनेशिया,हांगकांग, ब्रिटेन सहित कई देशों में सफलता के झंडे गाड़े हैं। उनके नेतृत्व में भारत में उबेर कप की टीम स्पर्धा में कांस्य पदक भी जीता है। बैडमिंटन कोर्ट पर सिंधु की उपलब्धियां अपार हैं। एक व्यक्ति के रूप में पीवी सिंधु भारतीय सभ्यता और संस्कृति की प्रतिनिधि हैं। अपने माता-पिता का खूब सम्मान और उनके हर आदेश का पालन, खेल के प्रति पूरी निष्ठा, अनुशासन, गुरु के निर्देशों के प्रति समर्पण तथा भारतीय परंपराओं और तीज-त्योहारों का अंगीकरण पीवी सिंधु को विशिष्ट बनाता है। बैडमिंटन कोर्ट पर वह एक स्टार खिलाड़ी होती हैं जिसकी चीख सुन सामने वाले खिलाड़ी की कंपकंपी छूट जाती है।

Page 42 of 63

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse