विचार

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Published / 2022-09-01 03:35:34
2024 में भाजपा आलाकमान की उम्मीदों पर कितना खरा उतर पायेंगे भूपेंद्र चौधरी...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अजय)। भूपेंद्र चौधरी 1989 से 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे। 1991 में भाजपा में शामिल होने के बाद सक्रिय राजनीति शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चौधरी बीते 31 सालों से लगातार संगठन और सरकार में किसी ना किसी दायित्व पर रहे हैं। उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी हालांकि अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही चुनौतियों का सामना करते रहे हैं लेकिन मिशन-2024 को सफल बनाने की जिम्मेदारी उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि भूपेन्द्र चौधरी की काबलियत को आलाकमान ने पहचान कर ही उन्हें यह पद सौंपा है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को नया अध्यक्ष मिला यह तो औपचारिकता थी, लेकिन सबसे खास बात यह रही कि भाजपा आलाकमान की सोच तक कोई नेता या मीडिया कर्मी पहुंच नहीं सका। संभवतः मीडिया में जो नाम चल रहे थे, उसमें से कोई भी या तो शीर्ष नेतृत्व की कसौटी पर खरा नहीं उतरा अथवा आलाकमान की लिस्ट में यह नाम होगा ही नहीं। दिल्ली के तख्त पर 2024 में तीसरी बार मोदी की ताजपोशी करने के लिए यह जरूरी था कि उत्तर प्रदेश में सियासी गोटियां कायदे से बिछाई जाएं। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी को दो-दो बार पीएम बनाने में उत्तर प्रदेश की बड़ी भूमिका रही थी। तीसरी बार भी यूपी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। 80 लोकसभा सीट वाले उत्तर प्रदेश में 2014 और उसके बाद जितने भी चुनाव हुए जनता ने बीजेपी की झोली वोटों से भर दी थी। 2024 के आम चुनाव में भाजपा अपना सौ फीसदी परफॉरमेंस देना चाहती है। वैसे पार्टी के लिए 2014 के बाद से यूपी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हो रही है, लेकिन उसे चिंता इस बात की भी है कि कहीं वोटों का अंडा देने वाली मुर्गी वोट रूपी अंडे देना बंद नहीं कर दे। ऐसा न हो इसीलिए भाजपा आलाकमान ने काफी सोच विचार के बाद योगी सरकार के पंचायतीराज मंत्री और पश्चिमी यूपी के बड़े जाट नेता भूपेंद्र सिंह चौधरी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। चौधरी की नियुक्ति से ना केवल पश्चिमी यूपी में भाजपा को मजबूती मिलेगी बल्कि इसके अलावा उसके इस फैसले से जाट वोट बैंक का रुझान भी भाजपा की तरफ बढ़ सकता है। शीर्ष नेतृत्व ने लगातार दूसरी बार पिछड़े वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर पश्चिम से पूर्वांचल तक पिछड़े और अति पिछड़े वोट बैंक को भी साधे रखने की कोशिश की है। चौधरी भले ही भाजपा के 14वें प्रदेश अध्यक्ष हों, लेकिन पहले ऐसे जाट नेता जरूर बन गए हैं जिसने यूपी में भाजपा की कमान संभाली है। भाजपा ने पहली बार किसी जाट नेता को संगठन की कमान सौंपी है। 54 वर्षीय भूपेंद्र चौधरी का जन्म मुरादाबाद के महेंद्री सिकंदरपुर गांव में हुआ था। चौधरी की जाट समाज के साथ पश्चिमी यूपी में गुर्जर, ब्राह्मण, त्यागी समाज में मजबूत पकड़ है। लोकसभा चुनाव 2019 से पहले जाटों के आरक्षण आंदोलन और कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलन के समय चौधरी ने पश्चिमी यूपी में जाट समाज के साथ किसानों के बीच सरकार की बात पहुंचाकर संकट मोचक की भूमिका भी निभाई थी। जानकारों का मानना है कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के करीबी भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से पार्टी को लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में जाट वोट बैंक को साधने में आसानी होगी। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी को प्रदेश अध्यक्ष के रूप में एक अनुभवी और कद्दावर नेता के साथ ऐसे नेता की तलाश थी जो वोट बैंक के लिहाज से भी मुफीद हो। साथ ही सरकार और संगठन में तालमेल बनाने के साथ आरएसएस और विचार परिवार के संगठनों की अपेक्षाओं पर भी खरा उतर सकता हो। प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर विभिन्न दावेदारों के बीच तीन चार महीने से चलती अध्यक्ष पद की दौड़ के बीच पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संघ ने चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त माना। उल्लेखनीय है कि भाजपा के निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का तीन वर्ष का कार्यकाल 16 जुलाई को समाप्त हो गया था। स्वतंत्र देव ने 27 जुलाई को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से ही प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर लखनऊ से दिल्ली तक चर्चाओं और अटकलों का दौर चल रहा था। भूपेंद्र चौधरी 1989 से 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन में विश्व हिंदू परिषद में सक्रिय रहे। 1991 में भाजपा में शामिल होने के बाद सक्रिय राजनीति शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। चौधरी बीते 31 सालों से लगातार संगठन और सरकार में किसी ना किसी दायित्व पर रहे हैं। 1993 में मुरादाबाद में भाजपा की जिला कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए। 1996 में भाजपा के जिला कोषाध्यक्ष और 1998 में मुरादाबाद के जिलाध्यक्ष बनाए गए। चौधरी ने 1999 के लोकसभा चुनाव में संभल सीट से सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के सामने चुनाव भी लड़ा था। 2006 में चौधरी भाजपा के पश्चिम क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री बने। 2012 से 2017 तक उन्हें लगातार तीन बार पश्चिम क्षेत्र का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया। उल्लेखनीय है कि पार्टी में जिलाध्यक्ष, क्षेत्रीय अध्यक्ष या प्रदेश अध्यक्ष पद का दायित्व अधिकतम दो बार मिलता है लेकिन चौधरी को तीन बार क्षेत्रीय अध्यक्ष बनाया गया। 2016 में भूपेंद्र चौधरी विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए। 2017 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने पर उन्हें योगी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार बनाते हुए पंचायतीराज विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। 2019 में उन्हें पदोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2022 विधानसभा चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार 2.0 में चौधरी को पुनः कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 13 जून 2022 को चौधरी पुनः विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए हैं। भाजपा में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत है। लिहाजा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद उन्हें प्रदेश सरकार के पंचायतीराज मंत्री के पद से इस्तीफा देना होगा। भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने अपनी रणनीति का खुलासा करते हुए कहा कि वह पार्टी और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं के अनुसार काम करेंगे। उत्तर प्रदेश में भाजपा का संगठन बूथ स्तर तक खड़ा है इसलिए 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यूपी की सभी 80 लोकसभा सीटों पर भाजपा जीतेगी। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चौधरी ने कहा कि बहुत से ऐसे कार्यकर्ता थे जो उनसे ज्यादा अच्छा काम कर सकते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें मौका दिया है, विश्वास जताया है। उन्होंने कहा कि वह पार्टी नेतृत्व की अपेक्षाओं के अनुसार काम करेंगे। उन्होंने कहा कि 2014, 2017, 2019 और 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपार सफलता मिली है। भाजपा को ओर आगे ले जाने के लिए काम करेंगे। उन्होंने कहा कि भाजपा में असंख्य कार्यकर्ता हमेशा चुनाव के मोड़ में रहते हैं। कार्यकर्ताओं ने मेहनत से अच्छे परिणाम दिए हैं।

Published / 2022-08-26 17:29:59
बिना अपराध के अपराधी ठहराना खतरनाक चलन...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शेखर गुप्ता)। क्या आपको एचसी गुप्ता का नाम कुछ सुना हुआ सा नहीं लगता। यदि नहीं, तो तीन पहलुओं पर गौर कीजिये। एक यही कि आप अखबारों को ध्यान से नहीं पढ़ते। दूसरा, यह कि आपको इसकी कोई परवाह नहीं कि ईमानदार लोक सेवकों की क्या नियति हो, जबकि भ्रष्ट लोग बड़े आराम से बच निकल जायें। और तीसरा, यही कि अगर ऐसा है तो आपको यह शिकायत बंद कर देनी चाहिए कि अफसरशाही अवरोध आर्थिक सुधारों में बाधक बनते हैं। यहां मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि एचसी गुप्ता मेरे कोई रिश्तेदार भी नहीं। वैसे, वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वह 1971 बैच के आईएएस अधिकारी हैं, जो कोयला सचिव के पद तक पहुंचे और उन पर तथाकथित कोयला खदान आवंटन घोटाले में दर्ज कुल 12 में से 11 मामलों में आरोप सिद्ध हुए और जेल की सजा सुनाई जा चुकी है। यहां चार बिंदुओं को समझने की आवश्यकता है। पहला, यही कि जिन 11 मामलों में उन्हें दोषी सिद्ध किया गया है, उनमें से किसी में भी उन्होंने स्वयं के लिए कोई वित्तीय या भौतिक लाभ नहीं लिया और न ही अपराध की उनकी कोई मंशा रही। दूसरा, इन सभी 11 मामलों में वही अंतिम निर्धारक नहीं थे। आवंटन का अंतिम निर्णय स्क्रीनिंग कमेटी ने लिया था। इसलिए अगर वह अनुचित आवंटन को हरी झंडी दिखाने के दोषी हैं तो कमेटी के सभी सदस्य और तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह भी इसके दोषी हैं। तीसरा, उनके पास से कोई अकूत संपदा नहीं मिली। असल में जो भी उन्हें जानता है या उनसे मिला है, वह देख सकता है कि उनके पास कुछ नहीं बचा। यहां तक कि उन्हें एक बार अदालत में यह कहना पड़ा कि उनके पास अपराध स्वीकार करने के अलावा कोई अन्य विकल्प शेष नहीं, क्योंकि उनके पास वकीलों के भुगतान के लिए पैसे ही नहीं बचे। चौथा, और सबसे महत्त्वपूर्ण कि जब कोई भ्रष्टाचार के मामलों में फंस जाए और उस पर दोष सिद्ध हो जाएं तब अमूमन करीबी एवं सहकर्मी ऐसे व्यक्ति को उसके हाल पर छोड़ देते हैं, लेकिन इसके उलट इस मामले में वे न केवल गुप्ता के पक्ष में मुखरता से आवाज बुलंद करते रहे, बल्कि उन्होंने उनकी कानूनी लड़ाई के लिए वित्तीय संसाधन भी जुटाए। कारण स्पष्ट है कि गुप्ता सेवानिवृत्त हैं और 74 साल की उम्र में कंगाली के शिकार हो गए हैं। गुप्ता के पक्ष में मुहिम चलाने वालों में उनके बैचमेट और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, उनके बाद कोयला सचिव बने अनिल स्वरूप और पूर्व भारी उद्योग सचिव राजन कटोच शामिल हैं। कुरैशी तो यह भी याद दिलाते हैं कि गुप्ता निष्कलंक रिकॉर्ड वाले शानदार अधिकारी थे और अपने चुने हुए विषयों में 600 में से 600 अंक प्राप्त कर टॉपर बने थे। यह 2010 से 2013 के बीच घोटाले से जुड़े उन मामलों के पुनरावलोकन का बिल्कुल माकूल समय है, जिन मामलों की छाया आज भी भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ती रहती है। आप शायद यही कहें कि राजनीति की भला किसे पड़ी है। नेता अपना ख्याल खुद रख सकते हैं या जैसा बोते हैं, वैसा काटते हैं। यहां महत्त्वपूर्ण यही है कि इसने हमारी अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक अभिशप्त किया। यह कितना भारी था, इसकी झलक इसी महीने 5जी स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए नीलामी में स्पष्ट रूप से दिखी। नीलामी में कुल बोलियां 1.5 लाख करोड़ रुपये से कम रहीं। विपक्ष इस पर बिफर पड़ा और उसने भाजपा को याद दिलाया कि उनके प्रिय नायक पूर्व राष्ट्रीय लेखाकार विनोद राय ने अपनी चर्चित सीएजी रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम में ही 1.76 लाख करोड़ रुपये के घोटाले का उल्लेख किया था। विपक्ष का आरोप है कि यदि 2007 में 2जी स्पेक्ट्रम 1.76 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है तो 15 वर्ष बाद उससे कहीं ऊंची क्षमता वाला 5जी स्पेक्ट्रम से कम राशि क्यों जुटती है, जबकि इस दौरान समूची अर्थव्यवस्था और दूरसंचार क्षेत्र में खासी वृद्धि हुई है और डॉलर लागत भी करीब दोगुनी है। विपक्ष को इसमें घोटाले की बू आ रही है। यहां मैं दो-टूक कहूंगा कि इस नीलामी में कोई घोटाला नहीं हुआ है। अभी तक के साक्ष्य इसमें किसी गड़बड़ी का संकेत नहीं देते। वैसे तर्क दिया जाए तो अगर निष्पक्ष नीलामी के माध्यम से प्राप्त इस आंकड़े में कोई घोटाला नहीं तो क्या 2007 में ऐसी ही परिसंपत्ति के एक हिस्से का इतना ऊंचा मूल्यांकन किया जाना घोटाला नहीं? भारत के दूरसंचार क्षेत्र और अर्थव्यवस्था ने इस कपोल-कल्पित गणित से जुड़ी बेहूदा हरकत की क्या कीमत चुकाई है? अगर यह फंतासी नहीं है तो फिर पैसा कहां है? तब इस नीलामी से 10 लाख करोड़ रुपये जुटने चाहिए। दस लाख करोड़? आप कह सकते हैं कि क्या यह आपे से बाहर होने वाली बात है, लेकिन मैं कहूंगा कि ऐसा नहीं है। यह 2012 की बात है। तब सीएजी रिपोर्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जारी होती थी। जबकि परंपरा के अनुसार उसे खामोशी से संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए। ऐसी ही एक कॉन्फ्रेंस में बड़े जोर-शोर से घोषणा हुई कि सीएजी ने 2जी स्पेक्ट्रम से भी कई गुना बड़ा घोटाला पकड़ा है। इसे कोयला घोटाला या "कोल-गेट" का नाम दिया गया। आरंभिक स्तर पर यह घोटाला 10.7 लाख करोड़ रुपये का बताया गया। इसीलिए अब 5जी बिक्री में 10 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े की कल्पना मेरे लिए बेमानी नहीं होगी। इसके लिए बस आपको कुछ दुस्साहसिक लेखा परीक्षण की दरकार होगी। बहरहाल, कोल-गेट की ओर लौटें तो उच्चतम न्यायालय इसमें कूद पड़ा और उसने 1993 के बाद से आवंटित सभी कोयला खदानों का आवंटन रद्द कर नई नीलामी और सीबीआई को जांच का आदेश दिया। उस भंवर में केवल एचसी गुप्ता अकेले नहीं फंसे थे। आईएएस क्रोफा सहित कुछ अन्य अधिकारी भी धरे गए। वहीं शीर्ष नेता और लाभार्थी करोड़पति मुख्य रूप से बच निकले। सीएजी की सक्रियता के चरम काल में इन "घोटालों" में से किसी में भी कोई रिकवरी नहीं हो पाई। 2जी मामले में सभी बरी हो गये थे। इसी प्रकार राष्ट्रमंडल खेलों के 75,000 करोड़ रुपये के घोटाले में भी अभी तक किसी पर दोष सिद्ध नहीं हो पाया। ऐसे ही 9 लाख करोड़ रुपये के ऐंट्रिक्स-देवास घोटाले की बात सामने आई। उसमें कोई रिकवरी तो हुई नहीं, उलटे भारत के विरुद्ध 1.2 अरब डॉलर का अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अवार्ड का फैसला सामने आया। उस सौदे में अनियमितता के आरोपी इसरो के पूर्व मुखिया 2018 में भाजपा में शामिल हो गए। केवल कोल-गेट में ही कुछ दोषी सिद्ध हुए और उनमें भी जो पीड़ित हैं वे निर्णयन प्रक्रिया के निचले स्तर पर रहे। एचसी गुप्ता उनमें प्रमुख हैं। उनकी नियति-दुर्गति को देखते हुए कोई अफसरशाह निजीकरण या किसी प्रमुख सुधार से जुड़े दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने का साहस दिखा पायेगा? कारण यही कि अगर किसी निर्णय के कारण आपको जेल जाना पड़ सकता है और सेवानिवृत्ति के बाद आपका जीवन और गरिमा पर आघात हो तो आप ऐसा फैसला क्यों ही करेंगे? इसे एचसी गुप्ता के नजरिये से देखिए। उन्हें 11 मामलों में जेल की सजा सुनाते समय न्यायाधीश भी इस बात को लेकर स्पष्ट रहे कि उनके पास धन-संपदा नहीं है और न ही उन्होंने कोई अनुचित निजी फायदा उठाया। बस उनसे एक गलती हुई और संभव है कि वही सबसे आसान और सुविधाजनक बलि का बकरा बने। समस्या असल में पुराने भ्रष्टाचार निषेध अधिनियम में निहित है, जिसे एक के बाद एक सरकारों विशेषकर संप्रग सरकार ने अण्णा आंदोलन के दबाव में और सख्त बना दिया। इस अधिनियम की धारा 13(1) (डी) (iii) एक प्रकार से किसी अधिकारी को बिना किसी दोष के ही दोषी बना सकती है। गुप्ता के साथ बिल्कुल यही हुआ है। उनकी आरंभिक सजा के बाद चर्चित आईएएस एसोसिएशन ने मोदी सरकार से पैरवी की और उक्त धारा को 2018 में नए सिरे से लिखा गया। अब इस धारा के अनुसार कोई अधिकारी तभी दोषी होगा, यदि उसने अपने कार्यकाल के दौरान स्वयं को अवैध रूप से फायदा पहुंचाया हो या यदि उसने अपने लाभ के लिए बेईमानी और धोखाधड़ी का सहारा लिया हो आदि, यह उचित ही है। इसके बावजूद न्यायाधीश एक के बाद एक मामलों में गुप्ता को पुराने कठोर कानून के तहत दोषी ठहराते रहे। "सिस्टम" कुछ इसी तरह काम करता है। और अगर यही "सिस्टम" है तो आज कोई अधिकारी किसी सरकारी बैंक के निजीकरण प्रस्ताव पर क्यों हस्ताक्षर करेगा? इसीलिए हमें सुधारों पर अफसरशाही अवरोधों को लेकर झल्लाना बंद करना चाहिए। क्या कोई भी सेवानिवृत्त होने के बाद तिहाड़ जेल में ​जिंदगी गुजारना चाहेगा?

Published / 2022-08-26 13:53:50
गुलाम हुए आजाद...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (मुरलीधर)। देश की राजनीति में कांग्रेस का साथ छोड़ने वालों में कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नवी आजाद का नाम भी शुमार हो गया। आजाद के कांग्रेस छोड़ने से कांग्रेस में एक बड़ा स्थान खाली हो गया है। निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिये इसे एक बड़ा झटका माना जा सकता है। उनके कांग्रेस से इस्तीफा के बाद असम के मुख्यमंत्री विस्व शर्मा ने सबसे बड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मैंने जिन कारणों से कांग्रेस का त्याग किया था ठीक वही स्थिति आज भी बनी है या कहें कि आज स्थिति और बदत्तर हो गयी है। गुलाम नवी ने राहुल गांधी को एक अपरिपक्व और चापलूसों से धिरे कांग्रेस उपाध्यक्ष बताते हुए कहा कि अब वह कांग्रेस नहीं रही जिसमें सभी का सम्मान था। कांग्रेस में एक ऐसा ग्रुप है जो लगातार कांग्रेस में पार्टी के नीतियों और हार को लेकर सवाल खड़ा करता रहा है। अभी अध्यक्ष के चुनाव का मामला हो या फिर कश्मीर का विषय कांग्रेस कहीं भी मजबूती से खड़ी होती दिखाई नहीं दे रही है। आजाद ने अपने इस्तीफे में कई गंभीर आरोप लगाये है और संभावना व्यक्त किया जा रहा है कि वे कश्मीर में अपनी पार्टी बना कर चुनाव की तैयारी कर सकते हैं। 1977 से पार्टी में सक्रिय रहे इंदिरा गांधी, राहुल गांधी, संजय गांधी सहित वर्तमान में सोनिया गांधी के साथ रहे आजाद कांग्रेस के एक महत्वपूर्ण स्तंभ थे। उनके जाने से कांग्रेस में जो जगह खाली होगी उसे भरा जाना कठिन होगा। 2024 के चुनाव के पहले अगर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपने आप को अपने दल से मजबूती से नहीं जोड़ पाता है तो कांग्रेस की स्थिति जो एक क्षेत्रिय दल जैसी होती जा रही है वह और अधिक खराब होगी। शीर्ष नेताओं की खींचतान और दल छोड़ने से पार्टी लगातार कमजोर हो रही है।

Published / 2022-08-25 17:19:08
बैंकिंग तंत्र के उत्पीड़न से ग्राहकों को मिले आजादी

एबीएन सेंट्रल डेस्क। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीयकरण बैंकिंग उद्योग के लिए सबसे बड़ा पड़ाव रहा। 19 जुलाई, 1969 की मध्यरात्रि को कम से कम 50 करोड़ रुपये की जमा पूंजी वाले 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। फिर 1980 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला, जिसमें न्यूनतम 200 करोड़ रुपये की जमा पूंजी वाले छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। राष्ट्रीयकरण के पहले दौर से ठीक पहले जून 1969 में 73 वाणिज्यिक बैंक थे, जिनकी 8,262 शाखाएं थीं। अब देश में 100 बैंक हैं। इनमें 12 सार्वजनिक क्षेत्र, 21 निजी क्षेत्र, तीन स्थानीय क्षेत्र बैंक, 12 स्मॉल फाइनैंस बैंक, छह पेमेंट बैंक और 46 विदेशी बैंक हैं। इनके अलावा 43 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक भी हैं। वे भी अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की श्रेणी में आते हैं। गत वर्ष दिसंबर के आंकड़ों के अनुसार उनकी 2,11,332 शाखाएं हैं। जून 1969 में बैंकों की जमा राशि 4,646 करोड़ रुपये और उनके द्वारा दिया गया कर्ज 3,599 करोड़ रुपये था। इस साल जुलाई में जमा राशि बढ़कर 169.7 लाख करोड़ रुपये हो गई, जबकि बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज का आंकड़ा 123.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वैसे तो भारत में बैंकिंग का संदर्भ कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय से ही मिलता है, लेकिन आधुनिक इतिहास की बात करें तो भारत में वाणिज्यिक बैंकिंग की शुरूआत 1720 में बैंक आॅफ बॉम्बे से हुई। फिर 1770 में ‘बैंक आॅफ हिंदोस्तान’ ने कलकत्ता में शुरूआत की। यहीं पहले प्रेसिडेंसी बैंक- बैंक आॅफ बंगाल-की नींव भी रखी गई। उसे 1823 में करेंसी नोट जारी करने का अधिकार मिला। फिर 1840 में बैंक आॅफ बॉम्बे के रूप में दूसरे प्रेसिडेंसी बैंक की स्थापना हुई। उसके बाद जुलाई 1843 में बैंक आॅफ मद्रास नाम से तीसरा प्रेसिडेंसी बैंक शुरू हुआ। इन तीनों का 1921 में इंपीरियल बैंक में विलय हो गया। इसी बैंक ने 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना से पहले तक केंद्रीय बैंक की भूमिका निभाई। जहां इन बैंकों की स्थापना के पीछे अंग्रेज रहे, वहीं पहला भारतीय बैंक इलाहाबाद बैंक 1865 में अस्तित्व में आया। उसके बाद 1895 में पंजाब नैशनल बैंक (लाहौर में) बना। उसके 11 वर्ष उपरांत 1906 में बैंक आॅफ इंडिया की स्थापना हुई। वर्ष 1906 से 1913 के बीच कई बैंक फलते-फूलते गए। इस दौरान सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, बैंक आॅफ बड़ौदा, केनरा बैंक और इंडियन बैंक जैसे नाम उभरे। दिसंबर 1913 तक विभिन्न किस्म के 56 बैंक और सामने आए। उनमें 12 विनिमय बैंक भी थे, जो विदेशी विनिमय कारोबार में सक्रिय थे। वर्ष 1930 तक तक वाणिज्यिक बैंकों की संख्या करीब दोगुनी बढ़कर 107 हो गई। इस अवधि में दो विश्व युद्धों और महामंदी ने तमाम बैंकों को धराशायी कर दिया। फिर भी 1947 तक समूचा बैंकिंग उद्योग निजी स्वामित्व के दायरे में था और उनमें छह में से प्रत्येक के पास कम से कम 100 करोड़ रुपये का पोर्टफोलियो था। तबसे बैंकिंग के मोर्चे पर हमने खासी प्रगति की है। फिर भी परिसंपत्तियों की दृष्टि से मात्र एक ही भारतीय बैंक विश्व के शीर्ष 50 बैंकों में जगह बना पाया है। हमारा क्रेडिट-जीडीपी अनुपात विकसित देशों को तो छोड़िए भूटान से भी कम है। इतना ही नहीं विश्व बैंक की एक ताजा रपट के अनुसार विश्व के सात देशों में 140 करोड़ वयस्क अभी भी औपचारिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच से वंचित हैं। इन देशों में से एक भारत भी है। रपट के अनुसार भारत में 13 करोड़ लोग ऐसे हैं। जिन लोगों की बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच भी है, उनका भी एक दमनकारी वित्तीय प्रणाली में शोषण-उत्पीड़न हो रहा है। ऐसा कहने के पक्ष में मेरे पास अपने तर्क हैं। श्रीमान ए की एक निजी बैंक में सावधि जमा (एफडी) है। उन्हें एक क्रेडिट कार्ड दिया गया और बैंक में बचत खाता खुलवाने के लिए भी राजी कर लिया, जिसमें खाते में न्यूनतम बैलेंस रखने के पहलू की ओर उनका ध्यान आकृष्ट ही नहीं कराया गया। दो साल बाद परिपक्व होने पर ब्याज अर्जित करने के बजाय श्रीमान ए की एफडी और सिकुड़ गई। क्यों? क्योंकि, बचत खाते में न्यूनतम बैलेंस नहीं था और हर तिमाही पर एफडी की एक निश्चित राशि हजार्ने के तौर पर ली जाती रही। श्रीमान ए को कभी इसकी सूचना नहीं दी गई। श्रीमान बी का एक बड़े सरकारी बैंक के साथ दो दशक पुराना नाता रहा। उनका बचत खाता, एफडी और पारिवारिक सदस्यों के कई खातों के साथ ही बैंक में उनका एक लॉकर भी था। जब 82 वर्षीय श्रीमान बी उसी शहर के दूसरे इलाके में रहने चले गए तो उनके सभी खाते तो करीबी स्थानीय इलाके की शाखा में स्थानांतरित हो गए, लेकिन लॉकर नहीं हो पाया। नई शाखा में उन्हें लॉकर सुविधा तभी मिलती जब वह एक लाख रुपये सालाना वाली बाजार-लिंक्ड पॉलिसी लेते। तीसरा उदाहरण और दिलचस्प है। इसमें ग्राहक अमेरिका में रहने वाला एनआरआई है। यहां मिस्टर सी का मुंबई के एक निजी बैंक की शाखा में एनआरओ खाता है। बंबई उच्च न्यायालय ने वसीयतनामे की पुष्टि के बाद उनकी बेटी को माता-पिता की संपत्ति का अधिकार प्रदान किया। कर अदायगी के बाद कायदे से इसमें राशि को लाभार्थी के खाते में डाल दिया जाता। पंरतु शाखा ने खाते को ही फ्रीज कर दिया, क्योंकि बैंक वित्तीय वर्ष के समापन से पहले राशि निर्गत नहीं करना चाहता। क्यों? इससे जमा राशि जुटाने का लक्ष्य पीछे रह जाता। आखिरकार पैसे अप्रैल के पहले सप्ताह में जारी हुए। इस प्रकार लाभार्थी को कर अदा करने के लिए एक और वित्तीय वर्ष की प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि यहां लेनदेन 31 मार्च के पहले नहीं हो पाया था। चौथा उदाहरण तो सबसे विचित्र है। श्रीमान डी की एक निजी बैंक के संबंध प्रबंधक से गाढ़ी दोस्ती थी, जिन पर वह आंख मूंदकर भरोसा किया करते थे। प्रबंधक ने मिस्टर डी को 2019 से सितंबर 2001 में उनकी मृत्यु के बीच नौ बीमा पॉलिसी बेचीं। प्रबंधक इस बात से पूरी तरह अवगत थे कि सभी बीमित व्यक्ति अमेरिकी नागरिक हैं। चतुर बैंकर ने पॉलिसी के समयबद्ध भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सर्विस (ईसीएस) का प्रावधान किया। उनके निधन के बाद जब उनकी पत्नी को यह पता लगा तो संपर्क प्रबंधक ने आश्वस्त किया कि तीन वर्षों तक प्रीमियम अदा करने के बाद पॉलिसी को सरेंडर किया जा सकता है और मूल राशि वापस हो जायेगी। इस बीच बीमाकर्ता ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी व्यक्ति के निधन की स्थिति में दावा खारिज हो जाएगा, क्योंकि इसमें बीमित व्यक्ति की नागरिकता आड़े आ जाएगी। उन नौ बीमा पॉलिसी का सालाना प्रीमियम पता है कितना था? तकरीबन 11,40,000 रुपये। मैं ऐसे तमाम मामले गिना सकता हूं। ऐसे में स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने की अवधि एक आदर्श अवसर है, जब हम ग्राहकों को बैंकों के उत्पीड़न से आजादी दिलाएं। ईमानदार बैंकिंग को प्रोत्साहन दिया जाए और ग्राहक अपनी आजादी का आनंद उठाएं।

Published / 2022-08-23 15:14:42
विवेकानंद शिला स्मारक के शिल्पी एकनाथ रानडे

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (संतोष)। एकनाथ रानडे का जन्म 19 नवम्बर, 1914 को ग्राम टिलटिला (जिला अमरावती, महाराष्ट्र) में हुआ था। पढ़ने के लिए वे अपने बड़े भाई के पास नागपुर आ गये। वहीं उनका सम्पर्क डा. हेडगेवार से हुआ। वे बचपन से ही बहुत प्रतिभावान एवं शरारती थे। कई बार शरारतों के कारण उन्हें शाखा से निकाला गया; पर वे फिर जिदपूर्वक शाखा में शामिल हो जाते थे। इस स्वभाव के कारण वे जिस काम में हाथ डालते, उसे पूरा करके ही दम लेते थे। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर उन्होंने संघ के संस्थापक डा हेडगेवार के पास जाकर प्रचारक बनने की इच्छा व्यक्त की; पर डा जी ने उन्हें और पढ़ने को कहा। अत: 1936 में स्नातक बनकर वे प्रचारक बने। प्रारम्भ में उन्हें नागपुर के आसपास का और 1938 में महाकौशल का कार्य सौंपा गया। 1945 में वे पूरे मध्य प्रदेश के प्रान्त प्रचारक बने। 1948 में गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। संघ के सभी प्रमुख अधिकारी पकड़े गये। ऐसे में देशव्यापी सत्याग्रह की जिम्मेदारी एकनाथ जी को दी गयी। उन्होंने भूमिगत रहकर पूरे देश में प्रवास किया, जिससे 80,000 स्वयंसेवकों ने उस दौरान सत्याग्रह किया। एकनाथ जी ने संघ और शासन के बीच वार्ता के लिए मौलिचन्द्र शर्मा तथा द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे प्रभावशाली लोगों को तैयार किया। इससे सरकार को सच्चाई समझ में आयी और प्रतिबंध हटा लिया गया। इसके बाद वे एक साल दिल्ली रहे। 1950 में उन्हें पूर्वोत्तर भारत का काम दिया गया। 1953 से 56 तक वे संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और 1956 से 62 तक सरकार्यवाह रहे। इस काल में उन्होंने संघ कार्य तथा स्वयंसेवकों द्वारा स॰चालित विविध संगठनों को सुव्यवस्था प्रदान की। प्रतिबन्ध काल में संघ पर बहुत कर्ज चढ़ गया था। एकनाथ जी ने श्री गुरुजी की 51वीं वर्षगांठ पर श्रद्धानिधि संकलन कर उस संकट से संघ को उबारा। 1962 में वे अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख बने। 1963 में स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी मनायी गयी। इसी समय कन्याकुमारी में जिस शिला पर बैठकर स्वामी जी ने ध्यान किया था, वहां स्मारक बनाने का निर्णय कर श्री एकनाथ जी को यह कार्य सौंपा गया। दक्षिण में ईसाइयों का काम बहुत बढ़ रहा था। उन्होंने तथा राज्य और केन्द्र सरकार ने इस कार्य में बहुत रोड़े अटकाये; पर एकनाथ जी ने हर समस्या का धैर्यपूर्वक समाधान निकाला। इसके स्मारक के लिए बहुत धन चाहिए था। विवेकानन्द युवाओं के आदर्श हैं, इस आधार पर एकनाथ जी ने जो योजना बनायी, उससे देश भर के विद्यालयों, छात्रों, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और धनपतियों ने इसके लिए पैसा दिया। इस प्रकार सबके सहयोग से बने स्मारक का उद्घाटन 1970 में उन्होंने राष्ट्रपति श्री वराहगिरि वेंकटगिरि से कराया। 1972 में उन्होंने विवेकानन्द केन्द्र की गतिविधियों को सेवा की ओर मोड़ा। युवक एवं युवतियों को प्रशिक्षण देकर देश के वनवासी अ॰चलों में भेजा गया। यह कार्य आज भी जारी है। केन्द्र से अनेक पुस्तकों तथा पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन भी हुआ। इस सारी दौड़धूप से उनका शरीर जर्जर हो गया। 22 अगस्त 1982 को मद्रास में भारी हृदयाघात से उनका देहान्त हो गया। कन्याकुमारी में बना स्मारक स्वामी विवेकानन्द के साथ श्री एकनाथ रानडे की कीर्त्ति का भी सदा गान करता रहेगा।

Published / 2022-08-22 17:15:38
आखिर पठारी शहर रांची में बाढ़ की स्थिति क्यों?

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अशोक नाग)। विगत दिनों की बरसात में देश के शहरों में बाढ़ और जल जमाव की स्थिति भयावह हो गयी है। सौभाग्य से झारखंड एक ऐसा राज्य है जो पठारी होने के कारण बाढ़ की समस्या से मुक्त है। लेकिन विगत कुछ वर्षो से होने वाले जलवायु परिवर्तन और शहरों के बिना किसी योजना के विकास के कारण हमारी रांची में जल जमाव और बाढ़ की स्थिति देखी जा रही है। अगर ध्यान से सोचा जाए तो रांची में ड्रेनेज सिस्टम नाम की कोई चीज है ही नहीं। अगर ऐसी स्थिति रही तो आने वाले समय में हमें भारी कठिनाई का सामना करना होगा। जैसी की खबर आ रही है कि हमारी नदियों के किनारे पर पूर्ण अतिक्रमण हो चुका है। जमशेदपुर में बाढ़ से सैकड़ों घर डूब चुके हैं। अब इस बार की बरसात को ही देखें। झमाझम वारिश बीते 3-4 दिनों से रांची में हो रही है और रांची के अधिकांश शहरी इलाके में बाढ़ जैसी हालात हो गये हैं। आज तक करीब 1200 करोड़ खर्च करके भी पठारी इलाके रांची में बाढ़ के हालात पैदा हो गये हैं। पुराने लोगों से पूछिये आज से 25-30 साल पहले जब आज के जैसा बिना प्लानिंग का शहर नहीं पनपा था, घनघोर बारिश के आधे घंटे में ही पूरी रांची और साफ होकर पानी अपना रास्ता ढूंढ़ता स्वर्णरेखा नदी में मिल जाता था, पानी के निकासी के अपने रास्ते थे। हिनू पुल, डोरण्डा पुल, कोकर डिस्टलरी पुल, कांके पुल, चुटिया पुल, करमटोली पुल, बरियातु रोड, कलवेट, आदि का निर्माण ही पानी को सुगमता से निकालने के लिए हुआ था। सभी तालाब आपस में जुड़े थे। उदाहरण के लिए भुतहा तालाब (वर्तमान जयपाल सिंह स्टेडियम), जेल तालाब, लालपुर तालाब, गुदड़ी तालाब सभी एक दूसरे से जुड़े थे। पानी निकासी का स्थान नियत था, आज भी देखें तो जिन इलाकों में जल निकासी के स्थानों को भरकर फ्लैट, अपार्टमेंट, घर जोे अधिकांश बिना रजिस्ट्री, म्यूटेशन के हैं, में ही पानी अधिक जमता है और बाढ़ की स्थिति आ जाती है। जयपाल सिंह स्टेडियम के ऊपर अपर बाजार की स्थिति देखिए, कोकर, लालपुर की स्थिति देखिए, बरियातु, मोराहाबादी, हरिहर सिंह रोड की स्थिति देखिए कमोवेश पूरी रांची की स्थिति दिनोदिन नारकीय होती जा रही है। इसके जिम्मेवार कौन हैं? आज के दिन भी रांची नगर निगम के 2037 मास्टर प्लान को अपने मोबाइल में खोलिए इसमें पानी निकासी के रास्ते प्लाट नं0 सहित दिखाई देंगे, पर उन प्लॉटों पर अवैध मकान बनकर तैयार हैं जिसके कारण पानी निकासी के रास्ते अवरूद्घ होते हैं और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। रांची नगर निगम बिना प्लानिंग के करोड़ों रूपये खर्च करता है और सिर्फ पक्की नालियों का निर्माण, बिना ये समझे कि पानी कहां जायेगा? तालाब जीर्णोद्घार के नाम पर तालाब का सीमेंटीकरण कर तालाब को सिमेंट का हॉज बनाया जा रहा है। हम बरसात में बाढ़ सदृश्य विभीषिका झेलते हैं और उसको अपनी नियति समझते हैं, पर सच्चाई यह है कि यह कुछ अदूरदर्शी प्रशासनिक अधिकारियों और प्लानर की करस्तानी है। 1200 करोड़ में स्थिति सुधार नहीं सके, इन सबकी मंशा, नियत और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। इन सबका हल आज भी कठिन नहीं है, आवश्यकता है ईमानदार और सख्त पहल की। भगवान बिरसा मुण्डा की समाधि कोकर में डिस्टलरी पुल के पास क्यों है? कभी सोचा इसके बारे में, इसका कारण है कि जब भगवान बिरसा की मृत्यु कारागार में हुई तो लोगों में आक्रोश दंगा न फैले, इसलिए रातों-रात उनके शव को डिस्टलरी पुल के समीप फेंक दिया गया, ताकि जलप्रपात के रूप में बहते करम नदी से होकर भगवान बिरसा का शव स्वर्णरेखा नदी में मिल जाए? आज वहां क्या स्थिति है, वर्षों साल पहले बने डिस्टलरी पुल को ढहा कर करम नदी, जिससे मोराहाबादी, बरियातु, लालपुर, मेन रोड का पानी निकलता था, के मुहाने पर नगर निगम द्वारा पार्क बना दिया गया जो हर बरसात में डूब जाता है। करमटोली तालाब से होकर बहने वाली करम नदी का अस्तित्व ही अवैध निर्माण कर खत्म कर दिया गया है। जबकि आज भी मास्टर प्लान 2037 जो रांची नगर निगम के वेबसाईट में उपलब्ध है में पानी निकासी या पानी का इलाका करमटोली चौक से होकर डिस्टलरी पुल दिखा रहा है। कौन है जिम्मेवार? प्रशासनिक अक्षमता का खामियाजा जनता क्यों भुगते। हमारी रांची शहर के हर पानी निकासी इलाकों को धड़ल्ले से बेचा जा रहा और अवैध निर्माण कर पानी निकासी के रास्ते को अवरूद्घ कर बाढ़ की स्थिति लाई जा रही है। इन सबका समाधान क्या है? इन सबका समाधान है दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्लानिंग कर कठोरता के साथ उसे लागू कराना। इन उपायों को तुरंत करें : पूरे शहर का पानी जिन जगहों से निकलता हो उसे चिह्नित करें। (जैसे कोकर डिस्टलरी पुल से होकर, जुमार नदी से होकर, चुटिया नदी से होकर, स्वर्णरेखा नदी की ओर) पानी ट्रीटमेंट प्लान्ट उन स्थानों पर लगायें ताकि गंदा पानी साफ होकर नदी में जाए। निचली और ऊंची भूमि को चिह्नित करें और कम से कम 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन को चिह्नित कर अधिग्रहित करें और अतिक्रमण को बलपूर्वक हटाये जायें। इस मुख्य 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन में अतिक्रमण किसी कीमत पर न हो और 5 फीट दोनों तरफ वृक्ष लगाए जायें। इस मुख्य 50 फीट निकासी हेतु जमीन को शहर की हर नालियों से जोड़ा जाए। जहां नाली सम्भव न हो वहां पाइपलाईन बिछायी जाए, पर टोपोग्राफी (ऊंची-नीची जमीन की माप) का विशेष ध्यान रखा जाए। इन 5 बिन्दुओं पर ही अमल कर हम अपनी पठारी रांची में बाढ़ आने से बचा सकते हैं। उपाय आसान है पर दृढ़-इच्छाशक्ति और सही प्लानिंग कर ही हम अपनी रांची को फिर से पुरानी रांची बना सकते हैं। रांची की स्वर्णरेखा, हरमू, पोटपोटो सहित सभी नदियों के तट पर वृक्षारोपण होने के साथ ही गंदे पानी नदियों में डाले जाए इसके लिये भी व्यवस्था हो जाए। यह सही सिस्टम से ही संभव है। (लेखक समाजसेवी, पर्यावरणविद हैं।)

Published / 2022-08-20 15:34:01
अनूठे व्यक्ति थे झुनझुनवाला...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (टीएन नाइनन)। यदि मैं दो दशक पहले की एक घटना याद करना चाहूं तो वह मौका था मुंबई के ताज महल होटल में रघुराम राजन की किताब ‘सेविंग कैपिटलिज्म फ्रॉम दी कैपिटलिस्ट’ पर एक चर्चा कार्यक्रम का। अचानक हॉल के एक ओर से एक अतिरिक्त भारी आवाज उभरी कि भारत और उसका शेयर बाजार ऐतिहासिक तेजी हासिल करने वाले हैं। यह बात उस स्थान और संदर्भ से एकदम अलग थी। पता चला कि वह आवाज राकेश झुनझुनवाला की है जिनसे मेरी बाद में ड्रिंक्स पर कुछ मुलाकात हुईं। कुछ नहीं ब?ल्कि हमारी कई मुलाकात हुईं और इनमें से कुछ दक्षिण मुंबई में उनके पसंदीदा बार ज्योफ्रेस में भी हुईं। जानें झुनझुनवाला का सफर : इस एकतरफा बातचीत में आमतौर पर अक्सर ऐसी रंगीन बातें होतीं जो शेयर बाजारों को कहीं न कहीं महिलाओं से जोड़कर कही जातीं। झुनझुनवाला भारतीय शेयर बाजार में आने वाली तेजी को लेकर अपनी वजहों के बारे में विस्तार से बात करते। उनका आशावाद बुनियादी आंतरिक सोच से संचालित था जिसमें कोई खास प्रभावित करने वाली बात नहीं होती। लेकिन वह पहले ही कुछ पैसा कमा चुके थे और आगे चलकर पता चला कि भविष्य में जो होने वाला था उसकी तुलना में वह कुछ नहीं था। राकेश अक्सर बहुत उत्साहित होकर बात किया करते थे। राकेश अपनी शेयरों के चयन की रणनीति को लेकर बहुत सरल ढंग से बात नहीं करते थे। वह शायद जानबूझकर बहुत संक्षेप में बात करते थे। बस एक बार उन्होंने मुझे निवेश की सलाह दी थी और कहा था कि मैं टाटा मोटर्स के शेयर खरीद लूं। हालांकि मैंने उनकी सलाह नहीं मानी। बाद में उन्होंने मुझे संदेश भेजकर बताया कि कंपनी के शेयरों की कीमत कितनी तेज हो गई है। यह बस इसलिए कि मैं भूल न जाऊं। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसने शेयर बाजार से किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में अधिक पैसा कमाया, वह बाजार की तुलना में भारत को लेकर अधिक आशावादी थे। वह अपनी संपत्ति से अधिक देश के बारे में बात करने को उत्सुक रहते थे। उनका राजनीतिक नजरिया कट्टर हिंदू आग्रह की ओर मुड़ गया था और हमेशा की तरह उनका न तो अपनी भाषा पर नियंत्रण था और न ही अपने हावभाव पर कोई लगाम। मेरा मानना रहा कि उनके अधपके राजनीतिक विचारों से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था, वह अपनी बात कह देते थे। दिलचस्प बात यह है कि अच्छे काम के लिए दिए जाने वाले उनके दान में राजनीतिक नजरिये से कोई भेदभाव नहीं होता था। वह एक पारिवारिक व्यक्ति थे। उनके पिता और पत्नी अक्सर उनकी बातचीत में आते। वह बच्चों की चाह रखते थे और जब उनके बच्चे हुए तो वह बेहद खुश हुए। उन्हें फिल्में पसंद थीं और उन्होंने कुछ फिल्मों में पैसा भी लगाया। अपने 60वें जन्मदिन पर उन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर जो नृत्य किया था वह उनके निधन के बाद वायरल हो गया। वह वीडियो उनकी जिजीविषा का प्रतीक है। उन्होंने मालाबार हिल पर एक बड़ा सा भूखंड खरीदा था और एक शानदार रिहाइश बनायी थी लेकिन उन्होंने उदारतापूर्वक दान देना भी शुरू कर दिया था और वह और अधिक दान देना चाहते थे। वह लोगों पर यकीन करते थे। उन्होंने उस विश्वविद्यालय में जाने से इनकार कर दिया था जिसमें उनका पैसा लगा था। वह कहते थे कि उसे चलाने के लिए लोग हैं। उनका दावा था कि उन्होंने आकाश एयर में 40 फीसदी शेयर अहम लोगों को उनकी मेहनत के बदले दिए हैं। उन्होंने कहा था, उनके पास पर्याप्त हिस्सेदारी है इसलिए मुझे चिंता करने की जरूरत नहीं है। मैं किसी को जवाब देना नहीं चाहता। वह सही थे और उन्होंने हमेशा केवल अपने पैसे का निवेश किया। इसके बावजूद विमानन कंपनी के साथ निवेशक राकेश आखिरकार एक उद्यमी बन गए थे। उनके करीबी मित्र और मृदुभाषी व्यक्ति राधाकृष्ण दमाणी ने उनसे पहले यही राह अपना ली थी। दमाणी के डीमार्ट रिटेल चेन शुरू करने के पहले वे संयोग से दलाल स्ट्रीट पर मिले थे और अब उनकी चेन का बाजार मूल्य 2.8 लाख करोड़ रुपये है। एक दिलचस्प बातचीत में राकेश ने एक बार कहा था कि उनका समुदाय देश का मालिक है। जब उनसे अपनी बात स्पष्ट करने को कहा गया तो उन्होंने कहा कि वह बनियों के अग्रवाल वंश से हैं यानी उसी वंश से जिससे जिंदल, बंसल, गोयल, मित्तल, सिंघल और कई अन्य गोत्र आते हैं। इसके बाद उन्होंने अग्रवाल वंश से ताल्लुक रखने वाले बड़े कारोबारियों की सूची निकाली और कहा कि अब बताइये कि हम इस देश पर मालिकाना रखते हैं या नहीं। हमारी आखिरी मुलाकात दिल्ली में हुई थी जहां वह प्रधानमंत्री तथा अन्य बड़े राजनेताओं से मिलने आए थे। दोपहर के भोजन पर उन्होंने मुझे और शेखर गुप्ता को आमंत्रित किया था। वह व्हीलचेयर पर थे और उनकी स्थिति ठीक नहीं लग रही थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका स्वास्थ्य ठीक है लेकिन उनमें वह पुरानी बात नजर नहीं आ रही थी। समय-समय पर एक सेवक उन्हें दवाएं दे रहा था। वहां से विदा होते समय इस विशाल व्यक्तित्व के भविष्य को लेकर कुछ पूवार्भास हो रहा था।

Published / 2022-08-20 12:49:15
पीएम के संबोधन में नारी का सम्मान...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (पवन)। 75वें स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ संकल्प, आजादी के सौवें साल में भारत की तस्वीर और विरासत पर गर्व जैसी कुछ बातें इस बार कहीं। महंगाई, बेरोजगारी, काला धन जैसी समस्याएं देश में नहीं हैं, ऐसा वे मानते होंगे, इसलिए इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा। परिवारवाद उन्हें दंश की तरह चुभता है, सो इस बारे में उन्होंने जरूर कुछ बातें कहीं। आजादी के अमृतकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने देश से कुछ अमृत वचन कहे, जिसमें एक महत्वपूर्ण बात नारी शक्ति के सम्मान की थी। यह बात अपने आप में बड़ी अजीब और दुखदायी है कि महिला का आदर जैसी बातें जो स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाकर बच्चों को शुरू से पढ़ाई जानी चाहिए, उनका ज्ञान नागरिकों को लाल किले से देने की जरूरत पड़ रही है। वैसे मोदी सरकार जो नयी शिक्षा नीति लेकर आई है, उसमें अगर अभी से प्राथमिक कक्षा में स्त्री सम्मान, महिलाओं से बराबरी का व्यवहार जैसी बातों की सीख दी जाए, तो शायद आजादी के सौवें बरस में ऐसी कोई नसीहत लालकिले से देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि किसी न किसी वजह से हमारे अंदर यह सोच आ गई है कि हम अपनी वाणी से, अपने व्यवहार से, अपने कुछ शब्दों से महिलाओं का अनादर करते हैं। उन्होंने लोगों से रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाओं को अपमानित करने वाली हर चीज से छुटकारा पाने का संकल्प लेने का आग्रह किया। इसके साथ ही उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महान महिला नेताओं के योगदान की भी सराहना की और लोगों से ‘मानसिकता में बदलाव’ की अपील की। हमें नहीं पता कि मोदीजी की अपील में इतनी ताकत है कि नहीं कि रातों रात मानसिकता में बदलाव आ जाए। प्रधानमंत्री इससे पहले बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे नारे भी दे चुके हैं। उत्तरप्रदेश चुनाव के वक्त उन्होंने मातृशक्ति महाकुंभ का आयोजन भी प्रयागराज में किया था। इन सबके बावजूद महिलाओं के साथ छेड़खानी, अपराध या हिंसा में कोई कमी आयी हो, ऐसे आंकड़े नहीं आए हैं। कांग्रेस समेत कई दलों ने तो प्रधानमंत्री मोदी के भाषण में नारीशक्ति की बात सुनकर उनकी पिछली कई बातों का लेखा-जोखा सोशल मीडिया पर फिर से याद दिला दिया। अभी पिछली बातों का राजनैतिक हिसाब-किताब चल ही रहा था कि इस बीच खबर आई कि गोधरा कांड के बाद बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या करने वाले 11 अभियुक्तों को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत 15 अगस्त के दिन रिहा कर दिया गया है। इन 11 लोगों की रिहाई के बाद उन्हें तिलक लगाकर, मिठाई खिलाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चल रही हैं, जिन्हें देखकर रुह कांप जाती है। क्या एक समाज के तौर पर हमारा इतना नैतिक पतन हो चुका है कि अब बलात्कारियों और हत्यारों का जेल के बाहर स्वागत होने लगेगा। 2008 में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने इन 11 लोगों को उम्र कैद सुनाई थी। जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट की मुहर भी लगी थी। ये सभी अभियुक्त 15 साल की सजा काट चुके हैं, इस आधार पर इनमें से एक ने सजा में छूट की अपील की थी। गौरतलब है कि उम्रकैद की सजा पाए कैदी को कम से कम चौदह साल जेल में बिताने ही होते हैं। इसके बाद कैदी की फाइल की समीक्षा की जाती है। उम्र, अपराध की प्रकृति, जेल में व्यवहार वगैरह के आधार पर सजा घटाई जा सकती है। अगर सरकार को ऐसा लगता है कि कैदी ने अपने अपराध के मुताबिक सजा पा ली है, तो उसे रिहा भी किया जा सकता है। बिलकिस बानो के परिवार, शरीर और आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाले इन 11 लोगों की माफी की मांग पर बाकायदा कमेटी बनाकर, विचार-विमर्श कर रिहाई का फैसला लिया गया। कानूनन इसमें कमियां नहीं निकाली जा सकतीं। लेकिन क्या कानून के फैसले नैतिकता से परे लिए जाने लगे हैं, इस पर तो समाज में मंथन हो ही सकता है। बिलकिस बानो ने अपने साथ हुए गंभीर अपराध और अत्याचार के बावजूद दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। छलनी शरीर और मन के साथ उन्होंने इंसाफ की लौ अपने मन में जलाए रखी। लंबे संघर्ष के बाद पहले बिलकिस बानो के दोषियों को सजा हुई और फिर अप्रैल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो को 50 लाख रुपये का मुआवजा, सरकारी नौकरी और आवास देने का आदेश दिया था, उस समय बिलकीस ने कहा था, सुप्रीम कोर्ट ने मेरे दर्द, मेरी पीड़ा और 2002 की हिंसा में गंवाए गए मेरे संवैधानिक अधिकारों को वापस पाने के संघर्ष को समझा। किसी भी नागरिक को सरकार के हाथों पीड़ा नहीं झेलनी चाहिए, जिसका कर्तव्य हमारी रक्षा करना है। अब अपने दोषियों के माथे पर तिलक लगा देखकर बिलकिस फिर खुद को हारा हुआ महसूस कर रही होंगी। लेकिन ये अकेले उनकी हार नहीं है। ये एक सभ्य समाज के तौर पर हम सब के पतन की पराकाष्ठा है।

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