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Published / 2022-10-07 09:52:31
अमृत काल में शहरीकरण से जुड़ी संभावनाओं की पड़ताल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्ष 2030 तक भारत में शहरी आबादी 63 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। शहरीकरण के विभिन्न पहलुओं और देश के विकास में उसकी भूमिका की महत्ता बता रहे हैं अमित कपूर और विवेक देवरॉय। बीते दिनों भारत ने ब्रिटेन को पछाड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की उपलब्धि हासिल की है। इसके साथ ही दुनिया की नजरें इस ओर टिक गई हैं कि अगले 25 वर्षों में भारत किस दिशा में आगे बढ़ता है। इन 25 वर्षों के दौरान भारत ने एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य तय किया है। हालांकि, इस लक्ष्य की पूर्ति में एक निर्णायक पहलू यही होगा कि भारत में शहरीकरण किस रफ्तार से होता है। वैसे तो 1950 के दशक से ही भारत में शहरीकरण की गति में निरंतर तेजी का रुख कायम रहा है। भले ही इस मोर्चे पर वह अपने साथियों-समकक्षों से पिछड़ गया हो, किंतु भारत ने अपनी विकास रणनीति में नियोजित शहरीकरण को प्राथमिकता दी है। विश्व शहरीकरण संभावनाओं (वर्ल्ड अर्बनाइजेशन प्रॉस्पेक्ट्स के 2018 में संशोधन) के अनुसार 2010 से 2018 के बीच शहरीकरण में 2.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2022 तक भारत के शहरीकरण में 35.9 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था और वर्ष 2047 तक इसमें 50.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। ब्रिक्स देशों की तुलना में इस मंद शहरीकरण के बावजूद अगले 25 वर्षों के दौरान अपनी विकास यात्रा में विभिन्न चुनौतियों का सामना करने को लेकर भारत की धारणा मजबूत बनी हुई है। विकास के वाहक के रूप में शहरों का कायाकल्प करने की दिशा में शहरीकरण की केंद्रीय भूमिका से भारत भलीभांति अवगत होने के साथ ही समग्र प्रगति के अपने लक्ष्य की पूर्ति के प्रति तत्पर भी है। हालांकि, जब शहरीकरण की गति बढ़ाने की बात आती है तो अनिच्छा उसमें उतनी बड़ी चिंता नहीं दिखती। इसमें बड़ी चिंता की बातें यही हैं कि देश के शहर तमाम समस्याओं के अंबार से जूझ रहे हैं। सीवेज शोधन, शहरी नियोजन, भूजल का गिरता स्तर और वायु गुणवत्ता में कमी सुगम जीवन की राह में बाधक बन रही हैं। इस संदर्भ में हम भारत की शहरीकरण यात्रा में दो तात्कालिक मुद्दों को चिह्नित कर सकते हैं। एक तो शहरीकरण का असममित या विषम प्रारूप और दूसरा नियोजित शहरीकरण। भारत के अधिकांश हिस्सों में आर्थिक विकास के साथ ही शहरीकरण होता गया। इस प्रकार कहें तो आर्थिक वृद्धि के साथ कदमताल करते हुए शहर विकसित होते गए। हालांकि, इसका परिणाम असममित-असंगत शहरीकरण के रूप में निकला। जिन राज्यों में तेजी से आर्थिक वृद्धि हुई, वहां शहरीकरण की रफ्तार भी तेज रही। जैसे कि 2022 तक केरल में 73.19 प्रतिशत शहरी आबादी हो गई, जिसके 2036 तक बढ़कर 96 प्रतिशत होने के आसार हैं। इसकी तुलना यदि असम और बिहार जैसे राज्यों से करें तो 2022 में असम में 15.4 प्रतिशत और बिहार में 12.2 प्रतिशत शहरीकरण का ही अनुमान है। यह लचर स्थिति ही कही जाएगी, जिसमें सुधार के आसार भी नहीं दिखते, क्योंकि 2036 तक भी असम के शहरीकरण में 17.16 फीसदी और बिहार में 13.2 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी का ही अनुमान है। वहीं दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे केंद्रशासित क्षेत्रों की बात करें तो इसी अवधि में वहां शत प्रतिशत शहरीकरण होने की उम्मीद जताई जा रही है। शहरीकरण का असममित स्वरूप भारत के शहरीकरण अभियान के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस शिथिलता और भिन्नता की जड़ें भारत की उस अनूठी सामाजिक संरचना और नाते-रिश्तेदारियों में चित्रित होती हैं, जो आवाजाही को बाधित करती है। बहरहाल, क्या भारत इस रवायत को जारी रखना गवारा कर सकता है? भारत अपने अमृत काल में प्रवेश कर गया है और इस दौर में जब अपने अपेक्षित विकास के स्तर को प्राप्त पर उसका ध्यान केंद्रित है तो उसे अपने समकक्षों के यहां कायम शहरीकरण की रफ्तार से ताल मिलाने का सुस्पष्ट लक्ष्य भी बनाना है। हालांकि, उसे सूक्ष्म स्तर तक शहरीकरण के प्रभाव पर ध्यान देने की आवश्यकता है और यह राह जिलों तक जाती है, क्योंकि वही देश की व्यापक आर्थिक स्थानिकता को आकार देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो देश के कुल जिलों में शहरी जिलों की संख्या करीब 30 प्रतिशत है, लेकिन वही 45 प्रतिशत रोजगार सृजन और 55 प्रतिशत से अधिक पारिश्रमिक का भुगतान करते हैं। ये आंकड़े कॉ​म्पिटेटिवनेस रोडमैप फॉर इंडिया एट हंड्रेड यानी भारत के सौवें पड़ाव पर प्रतिस्पर्धी रोडमैप में सामने आए हैं, जो व्यापक स्तरीय और साझा वृद्धि की संकल्पना को आगे बढ़ाते हैं। वस्तुतः भारत को पिछड़े हुए जिलों पर ध्यान देने की आवश्यकता के साथ ही नियोजित शहरीकरण की रफ्तार को भी बढ़ाना होगा। इसके अतिरिक्त एक पहलू यह भी है कि आंतरिक प्रवासन के सीमित स्तर को देखते हुए शहरीकरण की एकतरफा-असंतुलित गति संसाधनों के अपर्याप्त वितरण की चिंता बढ़ाती है। देश में आंतरिक आवाजाही पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा हुआ है। इसके बावजूद देश में हुई पिछली जनगणना (2011) के आंकड़े यही दर्शाते हैं कि इस आवाजाही या पलायन का एक बड़ा हिस्सा कुछ विशिष्ट राज्यों या एक जिले से दूसरे जिले के उसी समान रुझान को दोहराता है। वर्ष 2030 तक देश में शहरी आबादी का आंकड़ा 63 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है तो पूरा जोर केवल और केवल शहरीकरण पर न होकर, बल्कि नियोजित शहरीकरण पर भी होना चाहिए। नियोजित शहरीकरण से यही आशय है कि शहर के डिजाइन, नियोजन और गवर्नेंस पर बराबर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। सुनियोजित ढंग से बसे हुए शहर संसाधनों के महत्तम वितरण और उपयोग के माध्यम से मूल्य वर्धन की ओर उन्मुख करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये अपनी सतत वृद्धि और आर्थिक उत्पादकता के जरिये जीवन सुगमता और समृद्धि को प्रोत्साहन देते हैं, जिससे उनके रहवासी लाभ उठा सकते हैं। कई मायनों में शहरीकरण से जुड़ी मुश्किलें सतत उद्देश्यों और सामाजिक-आर्थिक वृद्धि के नजरिये से शहरों के ढांचे को नए सिरे से गढ़ने के शानदार अवसर प्रदान करती हैं, जिसका परिणाम अधिक स्थायित्वपूर्ण सामाजिक ढांचे के रूप में निकलता है। ऐसे में भारत को प्रमुख सुधारों को लक्षित करने की जरूरत होगी, जिसमें शहरों की शासन प्रणाली को नए सिरे से तैयार करने से लेकर उन्हें अधिक जन-केंद्रित बनाना होगा। हालांकि कुछ बड़े शहरों में जनाधिक्य के सैलाब को रोकने के लिए शहरीकरण की रफ्तार का विनियमन भी किया जाना चाहिए। साथ ही शहरीकरण की गति पर करीबी निगाह रखना भी आवश्यक है, क्योंकि यह देश में सामाजिक-आर्थिक विकास के सतत मार्ग निर्माण की प्रक्रिया में सहायक होगी। नियोजित एवं सार्वभौमिक-एकसमान शहरीकरण वाले दोहरे फोकस को भारत की शहरी गाथा को वैश्विक स्वीकृति दिलाने में लंबा सफर तय करना होगा। बहरहाल, यदि अब लक्षित एवं निरंतर प्रयास किये जाते हैं तो अगले दो दशक 2047 तक इन लक्ष्यों और उच्च सामाजिक प्रगति के स्तर की प्राप्ति में निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।

Published / 2022-10-06 13:06:04
जंगल बचाने का दायित्व निभाती महिलाएं...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सुनीता नारायण)। मैंने महिलाओं के समूह से सवाल पूछा, क्यों आप गांव के पास के जंगल का निरीक्षण करने के लिए रोजाना जाती हैं और क्यों ऐसा बीते 30 सालों से कर रही हैं। क्यों यह आपके लिए इतना मायने रखता है? ऐसे सवाल पूछने पर महिलाओं ने मेरी तरफ आश्चर्य भरी नजर से देखा। मैं कोडलपाली में हूं। यह गांव ओडिशा के नयागढ़ जिले में है। मैं कोडलपाली गांव से मीलों तक फैला घना जंगल देख सकती हूं। यह गांव दूर-दराज के इलाके में है। इस गांव को आर्थिक नजरिये से गरीब की श्रेणी में रखा जा सकता है। गांव में पुराने तरीके के शौचालय हैं और नल से पानी की आपूर्ति नहीं होती है। गांव में एक स्कूल था लेकिन वह भी औचित्य की विचित्र नीति की भेंट चढ़ गया। इस नीति के कारण 25 से कम छात्रों वाले स्कूल के बच्चों को अब तीन किलोमीटर दूर के स्कूल तक पैदल जाना पड़ता है। लेकिन इस गांव और समीपवर्ती गांवों की महिलाएं पूरे उत्साह के साथ बीते तीन दशकों से गांव की सुरक्षा कर रही हैं। रोजाना बिना नागा किए चार महिलाओं का समूह जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाता है। समूह यह देखता है कि किसी ने पेड़ को काटा तो नहीं है। समूह की महिलाएं अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहीं हैं। ये महिलाएं पेड़ काटने वालों से भिड़ जाती हैं और पेड़ काटने वालों की कुल्हाड़ी व साइकिल बेखौफ होकर जब्त कर लेती हैं। उन्होंने मुझे बताया कि जब्त किया गया सामान वापस करने के लिए वे जुमार्ना मांगती हैं। मेरी जहां तक नजर जा रही है, हरे-भरे जंगल ही है। यह बयां करता है कि जंगलों की सुरक्षा का काम अच्छे तरीके से किया जा रहा है। इस आदिवासी जिले के 217 गांव सटे हुए 60,000 हेक्टेयर जंगल की रक्षा कर रहे हैं। इन 60 गांवों में मुख्य तौर पर महिलाओं ने ही जंगल की सुरक्षा के लिए समितियों का गठन किया है। ये महिलाएं बारी-बारी से जंगल का निरीक्षण करने के लिए जाती हैं। इस क्षेत्र में बीते कई सालों से आदिवासी अधिकारों के लिए गैर लाभकारी संस्था वसुंधरा काम कर रही है। इन लोगों ने ब्लॉक और जिला स्तरों तक गांव की सुरक्षा समितियों का संघ बनाया है। इन समितियों में ज्यादातर कार्यकारी महिलाएं हैं। ये महिलाएं हर महीने बैठक आयोजित करती हैं। इन बैठकों में महिलाएं गांवों के आपसी झगड़े और अन्य मसले सुलझाती हैं। जब से जंगल की सुरक्षा समिति बनी है तब से उसमें शशि प्रधान है। उनकी उम्र 80 साल से अधिक है और लोग उन्हें शशि मौसी कहते हैं। उन्होंने मुझे बताया कि उन लोगों के लिए जिंदा रहने के वास्ते जंगल जरूरी हैं। इसे समझना बहुत आसान है। हमारी सभी जरूरतें जंगल पूरी करता है। जंगलों से जलाऊ लकड़ी से लेकर इमारती लकड़ी मिलती है। खाने के लिए कंदमूल मिलते हैं। दवाई के लिए जड़ी-बूटियां मिलती हैं। इस बातचीत के दौरान उनकी युवा साथी कुंतला नायक ने भी तपाक से कहा कि कोविड -19 के दो खौफनाक सालों के दौरान उन्हें किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं पड़ी और गांव में कोई भी बीमार नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, यह हमारे जीवन का आधार है। इसलिए हम इसकी रक्षा करते हैं। सभी पर जंगल की सुरक्षा के नियम कानून लागू होते हैं। इसके तहत रविवार को ही केवल जलावन लकड़ी एकत्रित की जाती है। हरे पेड़ों को काटा नहीं जाता है। मॉनसून के दौरान जंगल में मवेशियों को चरने नहीं दिया जाता है। जंगल से छोटे उत्पादों जैसे बांस और केडू (बीड़ी की पत्तियां) को केवल गांव के लोग ही एकत्रित करते हैं और किसी बाहरी व्यक्ति इसकी अनुमति नहीं है। बड़े स्तर पर किया गया अनुभव एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। कई सालों के संघर्ष के बाद बीते साल नवंबर में 24 गांवों के समुदाय को जंगल के अधिकार दिए गए हैं। जंगल के अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत यह उपबंध है कि गांव के लोग जिस जंगल का पारंपरिक रूप से उपयोग कर रहे हों, उसके एक छोटे से हिस्से (पैच) के संसाधनों व संरक्षण का अधिकार इन लोगों को दिया जा सकता है। जनजातीय मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक 45 लाख हेक्टेयर के लिए समुदायों को अधिकार दिए जा चुके हैं। इन समुदायों को सरकार के अधीन जंगल का 8 फीसदी क्षेत्र अधिकार दिया गया है। मंत्रालय के अनुसार इसके तहत सभी सामुदायिक अधिकार हैं। इनमें जल जल निकायों या लघु वन उपज के उपयोग के अधिकार भी शामिल हैं।इस मामले में जंगल की भूमि के प्रबंधन का मामला सामूहिक रूप से दो गांवों कोडलपाली और सिंदूरिया को दिया गया है। इस पत्र के अंतर्गत लगभग 300 हेक्टेयर जमीन का प्रबंधन दिया गया है। गांव वालों को अधिकार मिल गया है कि वे जंगल के लघु उत्पादों को एकत्रित, प्रसंस्कृत, इस्तेमाल और बेच सकते हैं। इसके तहत इन लोगों को मूल्यवर्धन, भंडारण और गांव के अंदर व बाहर उत्पादों को परिवहन करने का अधिकार भी मिला है। इससे स्पष्ट रूप से पासे पलट गये हैं। इसका मतलब यह है कि गांव वाले अब सुरक्षा मुहैया कराने के अगले चरण की ओर आगे बढ़ेंगे। इसमें हरित संपदा से हरित नौकरियों का सृजन होगा। इससे हरित अर्थव्यवस्था की ओर कदम बढ़ेगा। ग्रामीण को पेड़ के विविधता वाले क्षेत्र का प्रबंधन करने के लिए योजना बनाने की जरूरत होगी। इससे उन्हें केवल इमारती लकड़ी ही नहीं मिलेगी बल्कि उन्हें जंगल की अन्य समृद्धि भी मिलेगी। यह उनके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद रहेगी। अनुभव यह बताता है कि पेड़ तब ही जिंदा रहे पाते हैं, जब उसमें गांव का समुदाय शामिल रहता है या उसका जंगल पर नियंत्रण रहता है। यह अनुभव कोडलपाली में जंगल के नियंत्रण के मामले में खरा साबित होता है। ऐसा होने पर ही हम लकड़ी पर आश्रित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकते हैं। हमारा पर्यावरण खतरे में है, ऐसे में असलियत में हमारे लिए संभावनाएं कहां हैं। हमें मालूम है कि विश्व को हरियाली (ग्रीन कवर) बढ़ानी होगी। इससे हम कार्बन डाइआॅक्साइड के दायरे पर लगाम लगा पाएंगे। कार्बन डाइआॅक्साइड को नियंत्रित करने के प्राकृतिक तरीके लोगों की जुबान पर आ गए हैं। लेकिन कोडलपाली, सिंदूरिया और आसपास के गांवों की महिलाओं का कहना है कि ये जंगल उनके घर हैं। वे जंगलों पर आधारित अर्थव्यवस्था ने केवल अपने भविष्य बल्कि पूरी दुनिया के लिए बना सकती हैं। (लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं।)

Published / 2022-10-03 06:20:01
हे मां! सदबुद्धि दो, ताकि कोई गर्भ में पल रहा शिशु कोख से सुरक्षित बाहर आकर अपनी मां का चेहरे देख सकें...

टीम एबीएन, हजारीबाग (रंजन चौधरी)। शक्ति और भक्ति की देवी आदिशक्ति मां दुर्गा के पूजनोत्सव का त्योहार शारदीय नवरात्र चल रहा है। नवरात्र के पावन मौके पर मां दुर्गे के विभिन्न स्वरूपों की हम पूजा करते हैं। नारी को नारियानी मानकर नौ कन्या का आवाहन करते हैं और नारी सम्मान का संकल्प लेते हैं। मां दुर्गे से पीड़ित और शोषितों के कष्टों को निवारण करने के साथ समाज के कुंडित मानसिकता वालों, पापियों, दुराचारियों को सतमार्ग पर लाने की आराधना करते हैं। बावजूद इसके नवरात्र के पावन अवसर पर हजारीबाग जिले की दो यौवन गर्भवती महिलाओं की निर्मम मौत ने हर किसी के भक्तिमय मन को झकझोर दिया। नवरात्र शुरू होने के दूसरे दिन मंगलवार को जिले के बड़कागांव प्रखंड की नापोखुर्द गांव से एक खबर आई जिसने हर किसी को दहला दिया। यहां एक 20 वर्षीय नवविवाहिता को उसके ही पति ने गोली मार दी। मौत का कारण दहेज की मांग बताया जाता है। नवविवाहिता गर्भवती थी। गर्भ में पल रहे बच्चे की भी मां के साथ ही मौत हो गई। हालांकि नापोखुर्द के ग्रामवासियों ने इस घटना का सामाजिक रूप से पुरजोर विरोध कर आरोपी के घर पर जमकर प्रदर्शन कर भारी रोष भी व्यक्त किया। ठीक इसी प्रकार की घटना नवरात्र के छठे दिन शनिवार को कटकमदाग प्रखण्ड क्षेत्र से प्रकाश में आया, जिसमें बेस गांव में एक 7 माह की गर्भवती महिला की बेरहमी से हत्या कर दी गयी। यह महिला पहले घर से गायब होती है और फिर काफी खोजबीन के बाद गांव के समीप छोटी नाला जंगल में इनका शव मिलता है। इनके शव में सिर व दोनों आंखों पर गंभीर चोट के निशान देखा गया। इस घटना में भी मौत का कारण दहेज की मांग बताया जाता है। वर्तमान समय में भी दहेज लोभियों की लालच और प्रताड़ना का शिकार न जाने कितनी महिलाएं होती होंगी। दहेज के कारण इन दो नवविवाहित गर्भवती की असमय मौत और उनके गर्भ में पल रहें बच्चे को धरती पर कदम भी नहीं रखने देने वाले मनुष्य रूपी हैवानों को ईश्वर कभी माफ नहीं करेगा। समाज को भी ऐसी वीभत्स और दर्दनाक घटनाओं पर सामाजिक मंथन करने की जरूरत है, ताकि ऐसी कुत्सित घटना की पुनरावृति समाज में न हो। इन दोनों मृतक महिलाओं को देखने के बाद हम आदिशक्ति, मां जगदम्बा देवी दुर्गा से बस यही अराधना करते हैं की समाज में सभी को सद्बुद्धि दो मां, ताकि कोई बेकसूर नारी असमय काल के गाल ना समां सकें, कोई गर्भ में पल रहा बच्चा अपनी मासूमियत धरती पर कदम रखकर मां के आंचल तले बीता सके, समाज में महिलाओं के प्रति अत्याचार व क्रूरता कम हो सकें। कोई घर-आंगन किसी नारी की रक्त से रंजिश न हो, कोई परिवार बिखर कर बर्बाद न हो जायें। (लेखक हजारीबाग सदर विधायक के मीडिया प्रतिनिधि हैं।)

Published / 2022-09-29 11:07:18
प्रौद्योगिकी समर्थित ग्रामीण विकास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (शिव ‌कुमार मिश्रा)। भारत में बहुसंख्यक आबादी अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है लिहाजा ग्रामीण विकास को भारत की प्रगति की कहानी का पर्याय माना जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों का विकास हमेशा से हमारी प्राथमिकता में रहा है डिजिटलीकरण की शुरुआत के बाद ग्रामीण क्षेत्र समावेशी और संवहनीय विकास के दौर से गुजर रहे हैं। जन धन योजना जैसी योजनाएं ग्रामीण भारत में अत्यंत सफल रही हैं। कृषि की गतिविधियों का आधुनिकीकरण हो रहा है और इनमें पर्यावरण के अनुकूल तौर तरीके अपनाए जा रहे हैं। प्रौद्योगिकी से ग्रामीण विकास को बल मिला है। प्रौद्योगिकी समर्थित ग्रामीण विकास के लिए सरकारी योजनाएं:- 1. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन(तारा) - इस योजना को कौशल संवर्धन शिक्षा और विकास कार्यक्रम के तहत चलाया गया है ग्रामीण और अन्य पिछड़े क्षेत्रों में विज्ञान आधारित स्वयंसेवी संगठनों और क्षेत्रीय संस्थाओं को दीर्घकालिक बुनियादी समर्थन मुहैया कराने में इसकी अहम भूमिका है। यह योजना इन संस्थाओं को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी भवन केंद्रों और सक्रिय क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं के तौर पर बढ़ावा देती और पारितोषिक करती है ताकि यह आजीविका सृजन और सामाजिक लाभ के लिए प्रौद्योगिकीए समाधान और प्रौद्योगिकियों की प्रभावी डिलीवरी मुहैया करा सकें। 2. आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन - इसका उद्देश्य भारत की समेकित डिजिटल स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना के लिए जरूरी ढांचे का विकास है। यह स्वास्थ्य सेवा उद्योग में विभिन्न पक्षों के बीच दूरी को खत्म करने के लिए डिजिटल हाईवे का इस्तेमाल करती है। 3. आयुष्मान भारत स्वच्छ खाता (आभा) - इसके जरिए भागीदार स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच सुरक्षित और ज्यादा प्रभावी ढंग से डिजिटल स्वास्थ्य कार्ड का आदान प्रदान किया जा सकता है। एबीडीएम में शामिल होने और डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड रखने के इच्छुक भी व्यक्ति को सबसे पहले अपना आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता बनाना होगा। व्यक्ति की पहचान और प्रमाणन के बाद उसकी सहमति से ही उसके स्वास्थ्य कार्ड को विभिन्न प्रणालियों और हित धारकों को मुहैया कराया जाता है। 4.ई श्रम - इस प्लेटफार्म को श्रम और रोजगार मंत्रालय ने उन असंगठित कामगारों के लाभ के लिए बनाया है। जो कर्मचारी राज्य बीमा निगम या कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सदस्य नहीं हैं श्रमिक योजना में शामिल होने और ई श्रम कार्ड हासिल करने के अनेक लाभ हैं इसके जरिए सरकार के सामाजिक सुरक्षा के उपायों से कामगारों की मदद की जाती है। 5. राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क - सभी राज्यों में राजधानियों जिला मुख्यालयों और प्रखंड स्तर तक ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी मुहैया कराई गई है। यह काम भारत संचार निगम लिमिटेड रेलटेल और पावर ग्रिड जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के फाइबर ओके उपयोग से किया जा रहा है। 6. सार्वजनिक सेवा केंद्र - या डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत मिशन के तौर पर चलाई जा रही एक परियोजना है सीएससी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं के लिए पहुंच के बिंदु के तौर पर काम करता है गांवों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले नागरिक इसके जरिए समाज कल्याण स्वास्थ्य वित्त शिक्षा कृषि और व्यवसाय से संबंधित कार्यक्रमों और उपभोक्ता सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। इसको देशव्यापी नेटवर्क क्षेत्रीय भौगोलिक भाषाई और सांस्कृतिक विविधताओं की जरूरतों को पूरा करता है। 7. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम - यह देश को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और डिजिटल तौर पर सशक्त समाज में बदलने के लिए प्रमुख पहल है। इसमें तीन आवश्यक क्षेत्र सभी नागरिकों के लिए उपयोगिता के रूप में डिजिटल अवसंरचना मांग पर सेवाएं तथा डिजिटल प्रौद्योगिकी के माध्यम से नागरिकों का सशक्तिकरण शामिल हैं। 8. डिजिटल इंडिया भूमिका रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम किस केंद्रीय योजना का उद्देश्य से जमीन के रिकार्डों की मौजूदा समानता ओं का इस्तेमाल कर एक शाम उचित है। समेकित भूमि सूचना प्रबंधन प्रणाली विकसित करना है इसमें विभिन्न राज्य अपनी विशेष आवश्यकताओं को भी जोड़ सकते हैं। (लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता व पलामू जिला प्रभारी हैं।)

Published / 2022-09-28 17:31:02
भारतीय उम्मीदों को जगाती सेमीकंडक्टर स्पर्धा...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (ए. सानी)। वेदांता ग्रुप ने घोषणा की है कि वह भारत में सेमीकंडक्टर, डिस्पले उत्पादन इकाई और सेमीकंडक्टर असेंबलिंग-कम-टेस्टिंग सुविधा गुजरात के अहमदाबाद जिले में स्थापित करेगा। इस घोषणा ने दो वजहों से ध्यान खींचा है। निवेश की मात्रा (1.54 लाख करोड़ रुपये) और नई इकाई लगाने के लिए गुजरात का चुनाव, जबकि पहले महाराष्ट्र में लगाने के संकेत थे। तथापि, अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वेदांता ने ताईवान के हॉन हाइ टेक्नोलॉजी ग्रुप (फॉक्सकॉन) को बतौर साझीदार जोड़ा है। फिलहाल ताईवान दुनियाभर में सेमीकंडक्टर उत्पादन का धुरा है और कोविड महामारी से चिप्स आपूर्ति व्यवधान ने वैश्विक स्तर पर अनेकानेक उद्योगों का उत्पादन ठप कर दिया था। इस आपूर्ति शृंखला भंग और विभिन्न क्षेत्रों पर इसके असर ने दुनिया को सेमीकंडक्टर आपूर्ति में केवल एक-दो स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की हकीकत से जगा डाला, चाहे यह कार हो या वॉशिंग मशीन में प्रयुक्त सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट। इसलिए मुख्य उपभोक्ता वस्तु निर्माताओं ने ताईवानी इकाइयों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने का मन बनाया। मौजूदा चिप डिजाइनिंग के डिसएग्रिगेटेड मॉडल और फैब्रिकेशन पर पुनर्विचार किया जा रहा है। जुलाई माह में, अमेरिका सरकार ने चिप्स (क्रिएटिंग हेल्पफुल इन्सेंटिव टू प्रोड्यूस सेमीकंडक्टर्स) एक्ट से अमेरिकी कंपनियों को 52 बिलियन डॉलर की सब्सिडी देकर सेमीकंडक्टर निर्माण, अनुसंधान एवं विकास प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया है। यूरोपियन यूनियन भी चिप उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना बना रही है। उधर दक्षिण कोरिया ने 540 बिलियन डॉलर सब्सिडी योजना से दुनिया में सेमीकंडक्टर निर्माण का मुख्य केंद्र बनाने की शुरुआत की है। भारत के सेमीकंडक्टर मिशन में सरकार चिप एवं डिस्पले निर्माण इकाइयों को 10 बिलियन डॉलर (76000 करोड़ रुपये) सब्सिडी देगी। निजी कंपनियों को उत्पादन इकाई स्थापित करने में आए खर्च का 50 फीसदी तक अनुदान मिल सकता है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की यात्रा वर्ष 1974 में पंजाब से शुरू हुई थी, जब इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने महसूस किया कि देश के अंदर सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण होना चाहिए, पहले-पहल विदेशी मदद से सही। केंद्रीय मंत्रिमंडल के अनुमोदन के बाद सेमीकंडक्टर कॉम्पलैक्स लिमिटेड (एससीएल) बनाना स्वीकृत हुआ। 1976 में विशेषज्ञ पैनल ने दो संभावित जगहें सुझाईं झ्र मोहाली और मद्रास। इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग की तरजीह हवाई अड्डे की सुविधा वाले मद्रास पर थी। किंतु पंजाब के मुख्यमंत्री जैल सिंह को भनक लगी और उन्होंने प्रधानमंत्री पर जोर डालकर निर्णय मोहाली के पक्ष में करवा लिया। हालांकि इंदिरा गांधी ने इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अधिकारी अशोक पार्थसारथी को मुख्यमंत्री जैल सिंह को यह समझाने का काम सौंपा कि इस इकाई से पंजाब के स्थानीय लोगों को शायद ही रोजगार मिले क्योंकि इसमें बहुत अधिक प्रवीणता की जरूरत होती है। लेकिन जैल सिंह अड़े रहे और मोहाली को देश की पहली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई मिली। इस परियोजना पर 15 करोड़ रुपये लगे थे और 1983 में उत्पादन शुरू हुआ, अमेरिका की माइक्रोसिस्टम्स इन्कॉपोर्रेशन से प्राप्त तकनीक से चिप्स बनने लगीं। लगभग उसी समय, एससीएल की तरह, किंतु स्वतंत्र सेमीकंडक्टर डिजाइन गतिविधियां भारत में शुरू हुईं। इसकी अगुवाई आईआईटी कानपुर से पढ़े प्रभाकर गोयल ने की थी, जिन्होंने अमेरिका में बतौर चिप डिजाइनर अच्छा-खासा नाम कमाया था। उनके स्टार्टअप गेटवे डिजाइन आॅटोमेशन (जीडीए) की विशेषज्ञता चिप्स उत्पादन में प्रयुक्त टेस्टिंग टूल वेरीलॉग बनाने में थी। इसने करोड़ों डॉलर्स की आमदनी करवाई और गोयल के ग्राहकों में जापान और ताईवान के उच्चतम चिप निर्माण उद्योग थे। चूंकि वेरीलॉग बनाने में कुछ कामों जैसे कि लाइब्रेरीज में बहुत श्रम खपता था, इसलिए उन्होंने इकाई भारत में स्थानांतरित करने की सोची और इंजीनियरों की एक छोटी टीम बनाकर 1985 में नोएडा में उत्पादन शुरू किया। चार साल बाद सिलिकॉन वैली, अमेरिका की कंपनी काडेन्स डिजाइन सिस्टम्स ने जीडीए का अधिग्रहण कर लिया, इसमें नोएडा वाली इकाई भी थी। इस तरह भारत में काडेन्स के रूप में अग्रणी कंपनी का आगमन हुआ। इसके बाद दो और सेमीकंडक्टर डिजाइन कंपनियों, टेक्सास इंस्ट्रूमेंट्स और एसटी माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स ने 1980 के दशक के आखिर में भारत में अपने दफ्तर खोले। आगे लगभग एक दशक में इंटेल समेत उच्चतम कोटि की 25 चिप्स डिजाइन कंपनियों में 17 ने भारत में केंद्र खोले और देश चिप्स डिजाइनिंग क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति बन गया। बढ़ती मांग पूरी करने हेतु अमेरिकी और यूरोपियन सेमीकंडक्टर कंपनियों ने भारतीयों की डिजाइन प्रतिभा और ताईवान में व्यापक स्तर की उत्पादन क्षमता का फायदा लेकर चिप्स निर्माण किया। लेकिन दूसरी ओर, भारत चिप्स उत्पादन में पिछड़ता गया क्योंकि एससीएल में उत्पादन तकनीक को अपग्रेड करने की प्रक्रिया के दौरान भयंकर आग लग गई। नए सिरे से सबकुछ बनाने में लंबा वक्त लगा और कंपनी पूरी तरह उबर नहीं पाई। हालांकि भारत पर लगे तकनीक-हस्तांतरण प्रतिबंध वाले काल के दौरान सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं जैसे कि अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में प्रयुक्त सेमीकंडक्टरों की आपूर्ति करती रही। अब भारत ने एससीएल को व्यावसायिक इकाई की तरह से चलाने का फैसला लिया है। किंतु इसके लिए धन, तकनीक और नेतृत्व प्रदान करने की जरूरत है। शुरुआत काफी पहले करने के बावजूद भारत सेमीकंडक्टर लहर का पूरी तरह फायदा उठाने से चूक गया। गैरवाजिब निवेश, कमजोर स्वदेशी मांग, वैश्विक धंधे की बदलती गतिशीलता इत्यादि से हम पिछड़ते गए। इस क्षेत्र में तकनीक बहुत तेजी से बदलती है और इससे कदम मिलाना एक सामरिक जरूरत है। वेदांता की प्रस्तावित इकाई 28 नैनो नॉड्स तकनीक पर आधारित होगी। इससे सीपीयू, ग्राफिक प्रोसेसर्स, नेटवर्क चिप्स, स्मार्टफोन्स, कार और इंटरनेट में प्रयुक्त होने वाली चिप्स बनाई जा सकेंगी। हालांकि ताईवान और दक्षिण कोरियाई कंपनियां पहले ही कहीं ज्यादा सूक्ष्म नॉड्स यानि 3 नैनोमीटर पर काम कर रही हैं। एससीएल ने काम 5 माइक्रॉन्स (5000 नैनोमीटर) से शुरू किया था और स्वदेशी संवर्धन तकनीक से 1.2 माइक्रॉन (1200 नैनोमीटर) करने की प्रक्रिया चली हुई थी, जब आग लगी। उस समय विश्व की अग्रणी चिप्स निर्माण इकाई केवल एक पीढ़ी आगे यानी 0.8 माइक्रॉन (800 नैनोमीटर) पर काम कर रही थी। अगले एक दशक से कम समय में एससीएल ने विदेशी तकनीक अपनाई और तकनीक-अंतर कम होता गया क्योंकि आरंभ से ही इसका अपना अनुसंधान एवं विकास विभाग बहुत सुदृढ़ था। इस विधा में किसी इकाई का खुद की तकनीकी क्षमता के बिना बाजार की दौड़ के मुताबिक चाल बनाए रखना संभव नहीं है। इसके लिए बहुत बड़े स्तर पर अनुसंधान एवं विकास पर निवेश की आवश्यकता होती है। फिलहाल वेदांता का प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम अनुसंधान एवं विकास को लेकर खामोश है। अभी यह ज्ञान नहीं है कि क्या इसमें किसी तरह का तकनीक-हस्तांतरण है या नहीं। उम्मीद करें कि भारत दूसरी बार मौका नहीं चूकेगा। (लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं।)

Published / 2022-09-26 15:17:48
अमृतकाल में देश के बदलाव पर जरूरी है विमर्श...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ मेरी ग्रेस)। आजादी के अमृतोत्सव पर युवाओं से ‘देश के अतीत और वर्तमान’ विषय पर संवाद कार्यक्रम में उर्सूलाइन इंटर कॉलेज के सभागार में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुरलीधर नंदकिशोर ने हमारी ढाई हजार से अधिक छात्राओं को आजादी के अमृत उत्सव पर जिस प्रकार से देश की स्थिति से अवगत कराया, इसके लिए मैं abnnews24.com का शुक्रगुजार हूं। श्री मुरलीधर ने बताया कि पुणे के एक स्कूल को जिस प्रकार विश्व श्रेष्ठ स्कूल में चयनित किया गया है, उससे मेरा भी मन प्रसन्नचित हुआ। उन्होंने जानकारी दी कि नयी शिक्षा नीति बच्चों को विशेष क्षेत्रों के विशेषज्ञ ने विमर्श और उद्बोधन को शामिल किया है। लेकिन मैं विगत 20 वर्षों से अधिक से विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को बुलाकर छात्राओं को हर क्षेत्र की जानकारी के लिये प्रयास करती रही हूं। इसी क्रम में आजादी के अमृत उत्सव पर हमने पूरे साल ऐसे कार्यक्रम को आयोजित कर 75 साल पर 75 कार्यक्रम का एक संकल्प लिया है। इस कार्यक्रम में देश के अतीत से लेकर अबतक के उतार चढ़ाव की पूरी जानकारी छात्रों को दी गयी। एनके मुरलीधर ने इस कार्यक्रम में बच्चों को पूरे मनोयोग और उनके सवाल का जवाब भी दिया। कार्यक्रम में श्री मुरलीधर ने कहा कि आज देश जहां है उससे आगे ले जाने की जवाबदेही हमारे युवाओं की ही है। देश में 30 वर्ष से कम उम्र के 50 फीसदी लोग है जो पूरी दुनिया में भारत को सबसे युवा आबादी के तौर पर साबित करता है। एक युवा देश आजादी के 75 साल बाद तमाम कठिनाईयों से जूझते हुए जहां खड़ा है उसके आगे एक भव्य भारत का दृश्य उपस्थित होता है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद देश ने जिस प्रकार बाहरी आक्रमण को झेला और एक जुट रहते हुए विकास के रास्ते पर बढ़ता गया उससे हमारी निष्ठा से दुनिया कायल हो गयी। भारत दुनिया का सबसे समृद्ध देश था इस बात को मानने में कोई कठिनाई नहीं है लेकिन आज फिर से उस स्थान को पाने का संघर्ष कर रहा है यह बात भी सही है। आजादी और सेक्यूलर राष्टÑ के रुप में जिस प्रकार भारत ने अपनी गरीबी से लड़ाई लड़ी वह पूरे दुनिया के लिये अध्ययन का विषय है। ऐसा नहीं है कि यह आर्थिक स्थिति हमें सहजता से मिल गयी। आजादी के समय हमारा पहला बजट मात्र दौ सो करोड़ का था जबकि रक्षा पर 50 करोड़ खर्च करना होता था। हमारी चीन से शर्मनाक हार से हमारा मनोबल गिर गया लेकिन 1971 कि पाकिस्तान पर जीत के बाद भारत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हर दशक हम कुछ न कुछ विकास करते रहें लेकिन हमारी मिश्रत अर्थव्यवस्था का प्रयोग 1990 में बुरी तरह से विफल हो गया। फिर हमारी देश की सरकार ने नयी आर्थिक नीति अपनाकर देश को मात्र दस साल में एक आर्थिक शक्ति में बदल दिया। हमने दुनिया की सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चतुर्भुज आरंभ किया गया। बैंकिंग सेवा को विश्व स्तरीय बना दिया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, व्यापार, रक्षा, आइटी सहित हर क्षेत्र में विकास की गति तेज की गयी। आज का भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रुप में स्थापित हो चुका है। एक लंंबे समय तक देश गरीबी, युद्ध, हिंसा और अतंरराष्टÑीय षडयंत्र में उलझें रहने के बाद आज विश्व शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। आज हमारे युवाओं के लिये जो देश बना है उसमें सुपर पॉवर बनने की पूरी क्षमता है। इस कारण आज युवा पहले से अधिक दायित्वबोध वाले बुद्धिमान होने चाहिए। युवा छात्राओं के मन में उठते सवाल : सवाल : बेरोजगारी की सबसे लगातार बढ़ती जा रही है? जवाब : हम बेरोजगारी की बात क्यों करते हैं? हम रोजगार की बात करें। यह सही है कि एक बड़ी संख्या ऐसी है जो काम नहीं कर रही है लेकिन दूसरी ओर देश में योग्य लोगों का भी अभाव है जो संकेत कर रहा है बेरोजगारी से ज्यादा परेशानी हमें स्किल्ड युवाओं की कमी का है। आज बंगलूरं में 88 हजार युवाओं को एक शहर में 60 लाख से अधिक पैकेज मिला है अगर हम अपने करियर की तैयारी पूरी मेहनत से करते हैं तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में भारतीय युवाओं की संभावना लगातार बढ़ रही है। सवाल : भ्रष्टाचार से पीड़ा होती है? जबाव- हां यह पीड़ा दायक है। लेकिन विकासशील देश में भ्रष्टाचार कैसे कम हो इस पर अतंरराष्टÑीय स्तर पर रिसर्च हो रहा है और काम हो रहा है। भ्रष्टाचार से समाज और देश कमजारे होता है। जैसे-जैसे समाज जागरुक होगा यह कम होता जा रहा है साथ ही आइटी के प्रयोग, सीधे पैसों के हंस्तातरण से भी स्थिति सुधरी है। सवाल : क्या धार्मिक उन्माद सही है? जवाब : नहीं धार्मिक उन्माद सही नहीं है। यह केवल एक राजनैतिक हथकंडा है। भारत की संस्कृति और समाज सहयोग की रही है। राजनीति में चुनाव जीतने के हथकंडा ही धार्मिक उन्माद को हवा देता है। लेकिन यह लगातार कम होता जा रहा है यह अलग बात है कि मीडिया में अधिकांश समय नकरात्मकता को महत्व दिया जाता है जिससे यह समस्या हमारे दिमाग में बैठ जाती है। अपराध एक मानसिकता है जिसे ्रकिसी धर्म से जोड़ा जाना गलत है। अपराधी किसी भी धर्म जाति या समुदाय का हो उसे सजा हो, समाज उसे सामाजिक दंड दे कानून उसे कानूनी दंड दे। सवाल : देश की राजनीति में अच्छे लोगों का अभाव है? जवाब : हां ऐसा है। लेकिन अब राजनीति में समाज के हर तबके के उच्च शिक्षा प्राप्त, अनुभवी और योग्य लोग आ रहें हैं साथ ही वे अनुभवी भी है। जैसे हमारे देश के रेल मंत्री अश्विणी वैष्णव आइआइटीयन हैं, प्रशासनिक अधिकारी रहे और अब फिर राजनेता बने वर्तमान में देश के रेल मंत्री है। देश में नयी शिक्षा नीति आ रही है जिससे हम कुछ बेहतर होने की उम्मीद कर सकते हैं। अशिक्षा तुलनात्मक कम हुई है। सकरात्मक सोच को बढ़ाने और नकरात्मक चिंता को कम करने समाप्त करने का एक बेहतर और सार्थक प्रयास। आजादी के अमृत काल पर सभी को शुभकामनाएं। (लेखिका उर्सूलाइन इंटर कॉलेज, रांची की प्राचाार्या हैं।)

Published / 2022-09-23 03:35:04
भारत के युवा और भविष्य का धुंधलाता परिदृश्य...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (नन्दकिशोर)। भारत की आबादी अभी भी बहुत युवा है और करीब 55 प्रतिशत लोग 30 वर्ष से कम आयु के जबकि 25 फीसदी आबादी 15 वर्ष से कम उम्र की है। देश की एक अरब से अ​धिक की श्रम योग्य आयु की आबादी के पास रोजगार और आ​र्थिक वृद्धि को लेकर जबरदस्त क्षमता और संभावना है। मैंने 19 वर्ष पहले आगाह किया था कि यह जनांकीय लाभ सही ​नीतियों के अभाव में विफल हो सकता है। तब से अब तक तमाम सरकारों की नीतियां और क्रियान्वयन के तरीके गलत या कमजोर रहे। इनमें एक कमजोर सार्वजनिक ​शिक्षा और कौशल व्यवस्था शामिल है। श्रम कानून जटिल हैं और रोजगार निर्माण के लिए मददगार नहीं हैं, विदेशी व्यापार और विनिमय दर नीतियां श्रम आधारित निर्यात और आयात प्रतिस्पर्धी घरेलू उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। बुनियादी ढांचा भी कमजोर है और वह उत्पादकता तथा संचार और नोटबंदी जैसे टाले जा सकने वाले नीतिगत झटकों को प्रभावित करता है। इस बात के प्रमाण बहुत बढ़ रहे हैं कि लाभांश का क्षय हो रहा है और यह युवा भारत के लिए खराब परिणाम ला सकता है। इसी समाचार पत्र में प्रका​​शित एक आलेख में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के प्रमुख महेश व्यास ने कहा था कि विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 15 से 24 आयु वर्ग के युवाओं के लिए रोजगार दर 2020 में 23.2 फीसदी थी जबकि उत्तरी अमेरिका में यह 50.6 फीसदी, ओईसीडी देशों में 42 फीसदी, पाकिस्तान में 38.9 फीसदी और बांग्लादेश में 35.3 फीसदी थी। इन्हीं आंकड़ों से पता चला कि 15 से 24 की आयु के युवाओं की रोजगार दर भी 1994 के 43.4 प्रतिशत से कम होकर 2005 में 40.5 प्रतिशत और 2020 में 23.2 प्रतिशत हो गई। व्यास के मुताबिक विश्व बैंक राष्ट्रीय, आ​धिकारिक आंकड़ों पर भरोसा करता है और इन आंकड़ों में रोजगार की परिभाषा भी काफी ​शि​थिल होती है। सीएमआईई के अपने आंकड़े कहीं अधिक सख्त परिभाषा पर यकीन करते हैं जो बताते हैं कि सभी आयु वर्ग के लिए रोजगार दर तेजी से गिरी और वह 2016-17 के 20.9 फीसदी से घटकर 2021-22 में 10.4 फीसदी रह गई। आइये अब बात करते हैं आ​धिकारिक आंकड़ों की जो राष्ट्रीय सां​​​ख्यिकी कार्यालय से लिये गये हैं। इस कार्यालय की स्थापना 2019 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय तथा केंद्रीय सां​ख्यिकी कार्यालय के विलय से की गई थी। 2017-18 तक ये सर्वे हर पांच-सात वर्ष पर किये जाते थे। तब से इन्हें सालाना कर दिया गया। इस स्रोत से जारी ताजा आंकड़े 2020-21 के हैं तथा वे 15-29 वर्ष के लोगों का जिक्र करते हैं जो वास्तव में युवाओं की कहीं अ​धिक व्यापक परिभाषा है। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार युवाओं में रोजगार की दर ने समय के साथ ऐसा ही रुझान दर्शाया है। यह 2004-05 के 53.3 फीसदी से गिरकर 2017-18 में और उसके बाद 30 फीसदी या उससे भी कम हो गई। कोविड से प्रभावित वर्ष 2020-21 में अवश्य इसमें थोड़ा सुधार नजर आया। इन्हीं आंकड़ों में खुली बेरोजगारी के आंकड़ों में परेशान करने वाली तेजी भी नजर आई और यह 2004-05 के पांच-छह प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 और 2018-19 में 17-18 फीसदी हो गई। हालांकि 2019-20 और 2020-21 में इसमें कुछ कमी आई जिसकी वजह स्वरोजगार और कभी कभार श्रम करने वालों की तादाद में इजाफा मानी जा सकती है। यह बात शहरों की खुली बेरोजगारी से ग्रामीण इलाकों की छिपी बेरोजगारी को भी दर्शाती है क्योंकि कोविड के कारण लगे लॉकडाउन के बाद लाखों लोग अपने घरों को लौटे। इस जानकारी का श्रेय मेरी सहयोगी रा​धिका कपूर को है। इस बात पर जोर देना आवश्यक है कि युवाओं के लिए तेजी से बिगड़ते रोजगार संकेतकों में महिला श्रमिकों की ​स्थिति और भी खराब है। उदाहरण के लिए महिला श्रमिकों की रोजगार दर 2004-05 के 34.9 फीसदी से बिगड़कर 2017-18 में 13.5 फीसदी रह गई। शहरी महिला युवाओं में खुली बेरोजगार भी 2004-05 के 14.9 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 27.2 फीसदी हो गई। अगर आज के युवाओं के सामने रोजगार के अवसर नहीं हैं तो क्या भविष्य में बेहतर ​शिक्षा, कौशल और प्र​शिक्षण के साथ रोजगार बाजार में आने वाले बच्चे-​ब​च्चियों के लिए रोजगार के बेहतर अवसर हैं? आशा करना तो हमेशा बेहतर होता है लेकिन हमें एक नजर अपने सरकारी स्कूलों में ​शिक्षा की ​स्थिति पर भी डालनी होगी। प्रथम ​शिक्षा फाउंडेशन द्वारा जारी की जाने वाली सालाना ​शिक्षा रिपोर्ट सर्वे (असर) में भी यह जानकारी सामने आती है। हर वर्ष जारी की जाने वाली यह 500 से अ​धिक जिलों के 15,000 से ज्यादा गांवों के पांच लाख से अ​धिक बच्चों पर आधारित होती है। ऐसी पहली रिपोर्ट 2005 में जारी की गई थी और नवीनतम सर्वे कोवि​ड के कारण स्कूल बंद होने के पहले यानी 2018 में की गई थी। 2019 में यह रिपोर्ट केवल युवा बच्चों की ​​शिक्षा पर केंद्रित थी। साक्षरता को मापने के लिए असर ने एक सामान्य परीक्षा यह तय की थी कि कक्षा पांच के कितने बच्चे कक्षा दो की किताब पढ़ सकते हैं। 2008 में सरकारी स्कूलों में यह आंकड़ा 53.1 फीसदी था लेकिन 2018 में यह स्तर और अ​धिक गिरकर 44.2 फीसदी हो गया। यानी आधे से अधिक बच्चे इसमें नाकाम रहे। यह विडंबना ही है कि ​शिक्षा का अ​धिकार कानून के लागू होने के बाद इसमें और गिरावट आई। हालांकि बाद में कुछ स्थानों पर सुधार भी हुआ जिसमें हिमाचल प्रदेश, केरल, पंजाब और महाराष्ट्र आदि का प्रदर्शन बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से बेहतर है। इसी प्रकार बुनियादी ग​णित की परीक्षा में पांचवीं के बच्चों से सामान्य भाग करने को कहा गया। यहां भी सफल होने वालों का अनुपात 2008 के 34.4 फीसदी से घटकर 2018 में 22.7 फीसदी हो गया। इसका मतलब यह हुआ कि 2018 में सरकारी स्कूलों में कक्षा पांच के तीन चौथाई से अ​धिक बच्चे सही ढंग से सामान्य विभाजन को अंजाम नहीं दे पा रहे थे। यहां तक कि कक्षा सात के बच्चों में भी सफलता का प्रतिशत केवल 40 फीसदी था जबकि 2008 में यह 65 प्रतिशत था। तेजी से डिजिटलीकृत होते अलगोरिद्म, रोबोटिक्स, थ्रीडी प्रिंटिंग और कृत्रिम मेधा के इस दौर में भारत के युवाओं के सामने क्या संभावनाएं हैं? संक्षेप में कहा जाये तो हालात मु​श्किल हैं।

Published / 2022-09-22 03:27:29
राजू श्रीवास्तव जैसे कलाकार कभी मरते नहीं...

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बात उन दिनों की है जब गीत, डायलॉग आदि सुनने के लिए टेपरिकॉर्डर पर कैसेट चलते थे। मेरे पास एक टेपरिकॉर्डर था और नए कैसेट खरीदने का शौक था। एक दिन जब मैं कुछ नये कैसेट खरीदने दुकान पर गया तो वहाँ टेपरिकॉर्डर पर फ़िल्मी कलाकारों की आवाज में कुछ डायलॉग वाला कैसेट प्ले हो रहा था। अशोक कुमार की आवाज में #चलो_झुमरीतिलैया....सुनाई दिया। मैंने दुकानदार से पूछा- अंकल, यह कौन सा कैसेट आया है, जिसमें हमारे शहर का नाम है? उन्होंने कहा- पूरा सुनो। फिर आवाज आई- तुमलोग मुझे वहां ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहां इंतजार कर रहा हूं। अमिताभ की आवाज में दीवार का संवाद सुनकर मैं दंग रह गया। चूंकि अमिताभ की दीवानगी सर चढ़कर बोलती थी और एकदम हूबहू आवाज सुना तो चकित रह गया। दुकानदार ने कहा- ये राजू श्रीवास्तव हैं, किसी भी हीरो की आवाज निकाल लेते हैं। मैंने कैसेट खरीद ली और लगातार सुनता रहता था। फिर आया ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेन्ज। सिद्धू और शेखर सुमन के सामने राजू जी की कॉमेडी देखी। उनकी एक कॉमेडी शेयर करना चाहूंगा। उन्होंने कहा कि मान लीजिए आज से सौ दो सौ साल बाद जब धरती की खुदाई होगी तो आज की उपयोग वाली चीजें मिलेंगी। तब केवल सीडी मिलेंगे। लोग आपस में बात करेंगे, यह क्या है भाई? तो पुरातत्व वाले कहेंगे, यह उस ज़माने की थाली थी, लोग इसी में खाते थे। तब बाकी लोग पूछेंगे, इसके बीच में छेद क्यों है? तो पुरातत्व का अधिकारी बतायेगा कि उस समय का आदमी ऐसा ही था, जिस थाली में खाता था, उसी में छेद करता था। एक हास्य कलाकार की इतनी शानदार सोच के साथ हंसाने की अदा ने मुझे उनका मुरीद बना दिया। फिर मुझे उनकी स्टैंडअप कॉमेडी देखने का नशा छा गया। चाहे वह शोले के विभिन वर्जन की कॉमेडी हो, राजनेताओं की मिमिक्री हो या विवाह के दृश्य पर मस्ती या फिर बुफे पर उनकी कल्पनाशीलता। वे मेरी दिनचर्या में शामिल हो गये। जब यूट्यूब का दौर आया तो फिर कहना क्या, रोज उनकी एक कॉमेडी देखकर चार्ज होना आदत- सी हो गई। मैं देखता था, वे जब भी माइक पकड़ते, उनके हाथ कांपते थे। मैं कहता था, शायद कुछ कमजोर हो गये हैं। मगर यह नहीं जानता था, कमजोर वे नहीं, हम थे। क्योंकि उनकी नई कॉमेडी की हंसी के बिना रहना मुश्किल लग रहा है। पिछले डेढ़ महीने तक जब वे कोमा में रहे, कभी नहीं लगा रिकवर नहीं होंगे। कल दिनभर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती रही, मैं हिम्मत न जुटा पाया कुछ लिखने का। अटैच था उनसे। कल से आज तक मैंने अमिताभ का ट्वीट ढूंढा, मुझे मिला नहीं। पीएम सहित कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी, अमिताभ का नहीं दिखा। हालांकि राजू जी हमारी रिप से बहुत ऊपर थे, मगर जिनकी नकल करके वे ख्यात हुए, उनकी श्रद्धांजलि तो बनती ही है। अफ़सोस कहीं दिखा नहीं। राजू जी एक कलाकार ही नहीं, हम सबके जीवन के खास अंग थे क्योंकि गमों पर उनकी कॉमेडी की गुदगुदाहट कैप्सूल का काम करती थी। हम उन्हें कोरम पूरा करने के लिए भावुक होकर श्रद्धा पुष्प अर्पित कर रहे हैं, मगर सच यह है कि राजू कभी मरा नहीं करते। नमन राजू भाई, आपकी हंसी के सत्य का प्रकाश सदैव फैला रहेगा। (साभार : मनोहर रुद्र पांडेय के फेसबुक वॉल से)

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