एबीएन एडिटोरियल डेस्क (फिरदौस खान)। दुनियाभर में मधुमेह का खतरा लगातार बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इस समय दुनियाभर में 24 करोड़ 60 लाख लोग मधुमेह से पीड़ित हैं और वर्श 2025 तक यह तादाद बढ़कर 38 करोड़ को पार कर जाएगी। अकेले भारत में करीब चार करोड़ मधुमेह के मरीज हैं और 2025 तक सात करोड़ होने की आशंका है। हर दसवें सेकेंड में मधुमेह से एक व्यक्ति की मौत होती है और तीसवें सेकेंड में एक नया व्यक्ति इसकी चपेट में आता है। गौरतलब है कि हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाया जाता है। 14 नवंबर को फ्रैडरिक बेंटिग का जन्मदिन है, जिन्होंने चार्लीज हर्बर्ट बेस्ट के साथ मिलकर 1921 में इंसुलिन की खोज की थी। उनके इस योगदान को याद रखने के लिए इंटरनेशनल डायबिटीज फैफेडरेशन (आईडीएफ) द्वारा 1991 से हर साल 14 नवंबर को विश्व मधुमेह दिवस मनाने की प्रथा शुरू की गई। इस दिन दुनिया के 140 देषों में कार्यक्रमों का आयोजन कर जनमानस को मधुमेह के प्रति जागरूक किया जाता है। हर साल इसकी थीम अलग रहती है। साल 1991 की थीम इसकी थी-मधुमेह पर जनता को जागरूक करें। साल 1992 में मधुमेह विश्वव्यापी एवं सभी उम्र की समस्या, 1993 में किशोरावस्था में मधुमेह की देखभाल, 1994 में बढ़ती उम्र मधुमेह का रिस्क फैक्टर है, इसे कम कर सकते हैं, 1995 में बिना जानकारी मधुमेह के मरीज का भविष्य खतरे में होगा, 1996 में इंसुलिन ही जीवन का अमृत है, 1997 में विश्वव्यापी जागरूकता जरूरी है, 1998 में मधुमेह मरीजों के अधिकार सुरक्षित हैं, 1999 में मधुमेह के कारण राष्ट्रीय बजट पर खतरा है, 2000 में सही जीवन शैली से रोकें मधुमेह को, 2001 में मधुमेह में करें हृदय की देखभाल, 2002 में मधुमेह में करें आंखों की देखभाल, 2004 में मोटापा छुड़ाएं, मधुमेह से बचें, 2003 में मधुमेह मरीजों को गुर्दे की खराबी पर जागरूक करें, 2005 में मधुमेह में पैरों की देखभाल जरूरी है, 2006 में बच्चों को मधुमेह से बचायें, 2007 264 कदम चलें, 2008 में अब कुछ अलग कर दिखाने का समय है। बच्चों और किशोरों को मधुमेह से बचाएं और 2009 से 2010 तक मधुमेह की शिक्षा व रोकथाम से संबंधित हैं। विश्व मधुमेह दिवस 2021-23 का थीम डायबिटीज केयर तक पहुंच, अगर अभी नहीं, तो कब है। संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव पारित कर साल 2007 में मधुमेह अभियान के लिए एक लोगो जारी किया गया था। यह लोगो नीले रंग का है, जो वैश्विक मधुमेह समाज की एकता को प्रदर्शित करता है। चिकित्सकों के मुताबिक मधुमेह तीन प्रकार का होता है, टाइप 1 डायबिटीज, टाइप 2 डायबिटीज और गर्भावधि मधुमेह। यह एक असंक्रामक रोग है। इसमें रोग का प्रभाव जब शरीर के लिए लड़ने वाले संक्रमण, प्रतिरक्षा प्रणाली के खिलाफ होता है तो उसे टाइप 1 डायबिटीज कहा जाता है। टाइप 2 डायबिटीज सामान्य मधुमेह है। करीब 95 फीसद लोग इससे पीड़ित हैं। यह वृद्धावस्था में पाया जाता है। 80 फीसद से ज्यादा टाइप 2 डायबिटीज के मामले मोटापे की वजह से होते हैं, जो मधुमेह संबंधी मौत का कारण भी बनते हैं। बीएमआई और टाइप 2 डायबिटीज के बीच उतार चढ़ाव वाला संबंध है। सबसे कम खतरा उनमें होता है जिनका बीएमआई यानी शरीर का वजन और लंबाई का अनुपात 22 किलोग्राम/2 होता है। अगर बीएमआई 35 किलोग्राम/एम2 से ज्यादा होता हो तो उनमें मधुमेह का खतरा 61 साल की उम्र तक रहता है। यह खतरा बैठकर जिन्दगी बिताने वालों में बढ़ सकता है, जबकि व्यायाम करके इसमें कमी लाई जा सकती है। महिलाओं में 18 की उम्र और पुरुषों में 20 के बाद वजन के बढ़ने से टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। द नर्सेज हेल्थ स्टडी में 18 की उम्र के बाद जिन महिलाओं का वजन स्थिर यानी जिन्होंने 5 किलोग्राम वजन या इससे कम बढ़ाया या फिर वजन कहीं ज्यादा बढ़ाया, दोनों में तुलना की गई। जिन महिलाओं में वजन 5 से 7.9 किलोग्राम बढ़ा उनमें डायबिटीज का खतरा 1।9 गुना बढ़ा और जिन महिलाओं में 8 से 10.9 किलोग्राम वजन बढ़ा उनमें यह खतरा 2.7 गुना ज्यादा हो गया। इसी तरह पुरुषों पर भी अध्ययन किया गया। थोड़े से वजन बढ़ने पर भी मधुमेह का खतरा बढ़ता देखा गया। वजन बढ़ने का मतलब भविष्य में मधुमेह की समस्या के रूप में देखा गया। टाइप 2 डायबिटीज वाले उच्च आशंकित समूह वाले भारतीयों में वजन धीरे-धीरे 30 किलोग्राम तक बढ़ जाता है यानी यह 60 से 90 पहुंच जाता है, जिससे सालों तक उन्हें डायबिटीज से जूझना होता है। इसके विपरीत वजन में कमी करने से टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कम होता है। मोटापे के साथ ही इंसुलिन में रुकावट व हाइपर इंसुलिनेमिया मोटापे से होता है और हाइपरग्लाइसेमिया से पहले ही नजर आ जाता है। मोटापे की वजह से ग्लूकोज गड़बड़ा जाता है और इंसुलिन रुकावट बढ़ जाती है जिसकी वजह से हाइपरइंसुलिनेमिया की समस्या होती है। हाइपर इंसुलिनेमिया में हीपेटिक वेरी लो डैनसिटी ट्राइग्लाइसराइड सिंथेसिस, प्लासमिनोजेन एक्टिवेटर इनहिबिटर-1 सिंथेसिस, सिम्पैथिक नर्वस सिस्टम एक्टिविटी और सोडियम रीएब्जार्पशन का घनत्व बढ़ने लगता है। इन बदलावों की वजह से मोटे लोगों में हाइपलीपीडेमिया और हाइपरटेंशन की समस्या होती है। कुछ महिलाओं में गर्भावधि मधुमेह गर्भावस्था में देर से विकसित होता है। हालांकि शिशु के जन्म के बाद यह प्रभाव खत्म हो जाता है। इस मधुमेह का कारण गर्भावस्था में हार्मोन्स का असंतुलन या इंसुलिन की कमी से होता है। काबिले-गौर है कि साल 1924 में पहली बार इंसुलिन का इस्तेमाल मधुमेह पीड़ित 14 वर्षीय लोनार्ड थाम्सन के इलाज में किया गया। जिन मरीजों में इंसुलिन नहीं बनता, उनमें दवाइयों के जरिये इसे बनाया जाता है। जिन मरीजों में इंसुलिन बनता है, लेकिन काम नहीं करता, उनमें दवाइयों के जरिये इंसुलिन को सक्रिय किया जाता है। चिकित्सकों का कहना है कि खून में शुगर की मात्रा अगर 126 प्वाइंट या इससे ज्यादा है तो इसे मधुमेह माना जाता है, जबकि 98 प्वाइंट के नीचे हो तो इसे सामान्य माना जाता है। अगर शुगर की मात्रा 98 प्वाइंट और 126 प्वाइंट के बीच है तो इसे प्री-डायबिटीज स्टेज माना जायेगा। मधुमेह एक ऐसा रोग है जिसमें मेटाबॉलिज्म और हारमोन असंतुलित हो जाता है। यह एक कॉम्पलैक्स डिसआॅर्डर है। थकावट, वजन बढ़ना या कम होना, बेहद प्यास लगना और चक्कर आना इसके लक्षण हैं। मधुमेह आनुवांशिक हो सकता है, लेकिन खान-पान का विशेष ध्यान रखकर इसे काबू किया जा सकता है। बदलते लाइफ स्टाइल और फास्ट फूड की बढ़ती दीवानगी मधुमेह को बढ़ावा दे रही है। खाने में अत्यधिक वसा, कोल्ड ड्रिंक्स और एल्कोहल से मोटापा बढ़ रहा है, जिससे मधुमेह की आशंका बढ़ जाती है। एल्कोहल हार्मोन असंतुलन को बढ़ाती है और इससे भी मधुमेह का खतरा पैदा हो जाता है। मधुमेह को खत्म करने का अभी तक कोई इलाज नहीं है। जो इलाज है वह सिर्फ इसे नियंत्रित करने तक ही सीमित है। इसलिए बेहतर है कि इससे बचा जाये। व्यायाम और खानपान पर विशेष ध्यान देकर मधुमेह के खतरे को कम किया जा सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का कौन स्वागत नहीं करेगा कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण का आधार सिर्फ गरीबी होगी। यह 10 प्रतिशत आरक्षण अतिरिक्त है। यानी पहले से चले आ रहे 50 प्रतिशत आरक्षण में कोई कटौती नहीं की गई है। फिर भी पांच में से दो जजों ने इस आरक्षण के विरुद्ध फैसला दिया है और तमिलनाडु की सरकार ने भी इसका विरोध किया है। उनका कहना है कि 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण देना संविधान का उल्लंघन करना है। संविधान की किसी धारा में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत निश्चित नहीं की गई है। 1992 का सुप्रीम कोर्ट में आया इंदिरा साहनी प्रकरण बेहद महत्वपूर्ण है। उसी समय नरसिंहराव सरकार ने गरीबी के आधार पर लोगों को आरक्षण देने की घोषणा की थी। उसी घोषणा को 2019 में भाजपा सरकार ने संविधान का अंग बना दिया। अब कांग्रेस और भाजपा दोनों इसका श्रेय लूटने की प्रतिस्पर्धा में हैं लेकिन मैं तो जन्म के आधार पर दिए गए सारे आरक्षणों के एकदम विरुद्ध हूं, चाहे वह अनुसूचितों या पिछड़ों या तथाकथित अल्पसंख्यकों को दिया जाये। मेरी राय में आरक्षण जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर दिया जाना चाहिए। मुझे खुशी थी कि नरसिंहराव और मनमोहनसिंह सरकार ने उस दिशा में कदम बढ़ाये और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस मामले में ठोस निर्णय का साहस दिखाया। लेकिन यह काम अभी भी अधूरा है। संसद में 2019 में जब गरीबी को आरक्षण का आधार बनाकर सरकार विधेयक लाई थी, तब 323 सांसदों ने उसका समर्थन किया था और सिर्फ 3 सांसदों ने विरोध। लेकिन किसी नेता या पार्टी की आज हिम्मत नहीं है कि वह डाॅ अंबेडकर की इच्छा को मूर्त रूप दे सके। उन्होंने कहा था कि जन्म के आधार पर दिया गया आरक्षण दस साल के लिए काफी है। अब तो इसको पैदा हुए दर्जनों साल हो गये हैं। यह देश में अयोग्यता, अकर्मण्यता, भेदभाव, जातिवाद और मलाईदार वर्ग को प्रोत्साहित करने का साधन बन गया है। इसी कारण सरकारें रेवड़ी-संस्कृति की शिकार हो रही हैं। यदि नौकरियों के बजाय शिक्षा और चिकित्सा में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया गया होता तो सरकारी भीख पर कौन जिंदा रहना चाहता? गरीबी के आधार पर दिया गया आरक्षण जातीय और सांप्रदायिक आरक्षण से कहीं बेहतर सिद्ध होता। वह भारत में एकता और समानता का मूलाधार बनता और 75 साल में भारत की गिनती दुनिया के महासंपन्न और महाशक्तिशाली राष्ट्रों में हो जाती। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक अधूरी लेकिन बहुत सराहनीय शुरुआत है। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (आरके सिन्हा)। उत्तर भारत के ईसाई समाज के लिए पिछली 2 नवंबर की तारीख विशेष रही। उस दिन जब सारी दुनिया के ईसाई ऑल सोल्स डे मना रहे थे, तब हरियाणा के शहर रोहतक में कैथोलिक और प्रोटेस्टेट पादरी समुदाय के लोग मिल-जुलकर इस त्यौहार पर एक साथ बैठे। इन्होंने तय किया कि वे देश और अपने समाज के हित के लिके मिलकर प्रयास करते रहेंगे। ईसाई इस दिन कब्रिस्तानों में जाते हैं और अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। ऑल सोल्स डे हिन्दुओं के पितृ पक्ष के श्राद्ध से मिलता-जुलता है। दरअसल ईसाई धर्म के दो मुख्य संप्रदायों- कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट में कुछ बिन्दुओं पर मतभेद रहे हैं। कैथोलिक मदर मैरी की पूजा में भी विश्वास करते हैं। प्रोटेस्टेंट उन पर विश्वास नहीं करते हैं और उनके लिए मैरी केवल यीशु की भौतिक मां है। हां, दोनों संप्रदायों के लिए ईसा मसीह तथा बाइबिल परम आदरणीय हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों के लिए पवित्र दिन क्रिसमस और ईस्टर ही हैं। भारत में कैथोलिक ईसाइयों की आबादी अधिक है। ईसाइयों का भारत में आगमन चालू हुआ 52 ईसवी में। माना जाता है कि तब ईसा मसीह के एक शिष्य सेंट थॉमस केरल आए थे और ईसाई धर्म का विस्तार होने लगा। कहा तो यह भी जाता है कि सेंट थामस बनारस भी आये थे। देखिए भारत में 1757 में पलासी के युद्ध के बाद गोरों ने दस्तक दी। गोरे पहले के आक्रमणकारियों की तुलना में ज्यादा समझदार थे। वे समझ गए थे कि भारत में धर्मांतरण करवाने से ब्रिटिश हुकुमत का विस्तार संभव नहीं होगा। भारत से कच्चा माल ले जाकर वे अपने देश में औद्योगिक क्रांति की नींव रख सकेंगे। इसलिए ब्रिटेन, जो एक प्रोटेस्टेंट देश हैं, ने भारत में 190 सालों के शासनकाल में धर्मांतरण शायद ही कभी किया हो। इसलिए ही भारत में प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुत कम हैं। भारत में ज्यादातर ईसाई कैथोलिक हैं। इनका धर्मांतरण करवाया आयरिश,पुर्तगाली स्पेनिश ईसाई मिशनरियों ने। प्रोटेस्टेंट चर्च तो ज्यादातर समाज सेवा में ही लगी रही। भारत में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ईसाइयों के बीच दूरियों को कम करने के स्तर पर दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी लगातार प्रयासरत है। इसी संगठन से गांधी जी और गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगौर के परम मित्र दीनबंधु सीएफ एंड्रूज भी जुड़े थे। वे दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से 1916 में मिले थे। उसके बाद दोनों घनिष्ठ मित्र बने। उन्होंने 1904 से 1914 तक राजधानी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाया। उन्हीं के प्रयासों से ही गांधी जी पहली बार 1915 में दिल्ली आये थे। वे भारत के स्वीधनता आंदोलन से भी जुड़े हुए थे। उनके समय से भारत के ईसाइयों के अलग-अलग संप्रदायों में एकता और भाईचारे की छिट-पुट पहल होने लगी थी। महत्वपूर्ण है कि प्रोटेस्टेंट चर्च ने भारत में कभी धर्मांतरण की भी कोई ज्यादा कोशिशें नहीं की। यह बेहद महत्वपूर्ण तथ्य है। देखिये, मोटा-मोटी यह कह सकते हैं जहां कैथोलिक ईसाइयों के परम आदरणीय रोम के पोप हैं, वहीं प्रोटेस्टेंट उन्हें अपना धर्मगुरु मानने से इंकार करते हैं। हां, उनका आदर तो सब करते हैं। दुनियाभर में लगभग 7.2 अरब लोग ईसाई धर्म को मानते हैं। भारत में भी एक बड़ी आबादी इस धर्म को मानती है, हालांकि ईसाई धर्म के बारे में सामान्य लोगों में जानकारी का अभाव नजर आता है। ईसाई धर्म एकेश्वरवादी धर्म है, जिसमें ईश्वर को पिता और ईसा मसीह को ईश्वर की संतान माना जाता है। इसके अलावा इसमें पवित्र आत्मा की भी अवधारणा है। इन तीनों को मिलाकर ट्रिनिटी बनती है, जो ईसाइयों के लिए सबसे पवित्र है। भारतीय ईसाई अनेक संप्रदायों में बिखरे हुए हैं और उनका पुरातन इतिहास भी विविधता से भरा है। मुख्य रूप से ईसाई संप्रदाय संख्या के हिसाब से कैथोलिक हैं। इसके अलावा यह ओर्थोडोक्स, प्रोटेस्टेंट्स, ईवेन जेलिकल और पेंटेकोस्टल समूह और अनेक असंगठित समूह में फैला है। भारत में ईसाइयों का पहला प्रभावकारी स्वरूप कैथोलिक देश पुर्तगाल से 1498 ई. में पुर्तगालियों के आने से हुआ और ब्रिटिश, मूलत: एंग्लीकन या प्रोटेस्टेंट, का प्रभाव ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन 1757 से हुआ। उपर्युक्त सभी समूह स्वतंत्र हैं, परंतु अधिकांश लोगों के द्वारा एक आस्था रखने वाले समूह के रूप में देखे जाते हैं। जब कभी भारतीय ईसाइयों की तरफ देखा जाए तो इन वास्तविकताओं को समझना चाहिए। ईसाई धर्म के विद्वानों का कहना है कि भारत में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट के बीच की दूरियों को कम करने की कोशिशें गुजरे पचास सालों से तेज होती गईं। हालांकि प्रयास पहले भी चल रहे थे। दक्षिण भारत इस बाबत आगे रहा। वहां पर कैथोलिक चर्च तथा प्रोटेस्टेंट चर्च ने प्राकृतिक आपदा के समय मिल-जुलकर काम किया। मसलन केरल में कुछ साल पहले आई बाढ और सुनामी के समय दोनों चर्च मिलकर पीड़ितों के पुनर्वास के लिये काम कर रहे थे। यह सुखद पहल है। यह भी महत्वपूर्ण है कि कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच उस तरह की कतई कटुतापूर्वक स्थिति नहीं है जैसी हम मुसलमानों के सुन्नी और शिया संप्रदायों में देखते हैं। वहां पर तो कटुता न होकर जानी दुश्मनी है। उनमें आपस में हमेशा तलवारें खिंची रहती हैं। इस्लाम के नाम पर बने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में शियाओं की लगातार हत्यायें हो रही हैं। उन्हें दोयम दर्जे का इंसान माना जाता है। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने हजारों शिया मुसलमानों का कत्लेआम किया है। ईरान और सऊदी अरब में शिया –सुन्नियों में कुत्ते-बिल्ली वाला बैर का मुख्य कारण यही है कि ईरान शिया और सऊदी सुन्नी मुसलमानों का मुल्क है। देखिए अगले महीने क्रिसमस है और उससे दो-तीन हफ्ते पहले ही देश के अलग-अलग भागों में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट ईसाइयों की तरफ से सर्वधर्म सभाएं आयोजित की जाने लगेंगी। उनमें विभिन्न धर्मों–संप्रदायों के विद्वान आपसी भाईचारे तथा सदभाव को मजबूत करने के लिए अपने विचार रखेंगे। प्रोटेस्टेंट संप्रदाय की तरफ से कुछ कार्यक्रम दिल्ली ब्रदरहुड़ सोसायटी आयोजित कर रही है। इसमें चर्च के आगे के कार्यक्रम तथा योजनाएं बनेंगी। इसी संगठन ने विश्व विख्यात सेंट स्टीफंस कॉलेज तथा दशकों से दीन-हीन रोगियों का मुफ्त इलाज कर रहे सेंट स्टीफंस अस्पताल की स्थापना की है। ये देश के विभिन्न भागों में धार्मिक,सामाजिक, शिक्षण संस्थानों को चलाता भी है। कैथोलिक चर्च भी इस तरह के आयोजन करेगा। निश्चित रूप से यह देश के लिये अच्छी खबर है कि ईसाइयों के दो मुख्य संप्रदाय आपस में करीब आ रहे हैं। इन्हें देश और समाज कल्याण के कार्यक्रमों पर अधिक फोकस करना होगा। खैर, यह मानना होगा कि कोई भी इस तरह का मसला नहीं है जिसका हल संवाद से संभव न हो। इस रोशनी में कैथोलिक- प्रोटेस्टेंट के मौजूदा संबंधों को देखना होगा। इनसे शिया- सुन्नी संप्रदायों को भी इनसे कुछ सीखना चाहिए। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (इंद्रजीत सिंह)। हर बड़ा साहित्यकार अपने समय और समाज के मौन को मुखरित करने का काम करता है। चुप्पियों के पहाड़ को अपने कलम के हथौड़े से तोड़ता है। हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज को परवाज देने का काम भी लेखक की जिम्मेदारी होती है। जड़ता को तोड़ने और जड़ों से जोड़ने का काम भी संवेदनशील रचनाकार करता है। फ्रांस की मशहूर लेखिका एनी एनॉक्स (अर्नाक्स) ने भी सामाजिक सरोकारों को अपनी संवेदनशील लेखनी का आधार बनाया। नोबेल पुरस्कार समिति ने एनी के योगदान को इन शब्दों में रेखांकित किया है- एनी को यह पुरस्कार उनके साहस, नैदानिक विलक्षणता के साथ व्यक्तिगत स्मृति की जड़ों, मनमुटाव और सामूहिक पाबंदियों को उजागर करने के लिए दिया गया है। वर्ष 1940 में फ्रांस में जन्मी एनी ने अपने जीवन के खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों को निर्भय होकर समाज तक पहुंचाया। कबीर साहब के शब्दों में जो लड़े दीन के हेतु सूरा सो ही, हर अच्छा-सच्चा लेखक समाज की कुरीतियों, बुराइयों और सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने का काम साहस के साथ बेखौफ होकर करता है। एनी ने भी निर्भयता के साथ सरल, सहज भाषा में सामाजिक असमानता को रेखांकित किया। वह अपने लेखन में राजनीति को अलग नहीं करतीं। उनका लेखन राजनैतिक कर्म है। 1974 में उन्होंने अपनी पहली रचना क्लीन्ड आउट में अवैधानिक गर्भपात की पीड़ा को समाज के साथ साझा किया। वर्ष 1983 में उन्होंने ‘ला प्लेस’ लिखकर एक बड़े लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाई। इस पुस्तक के बाद उनकी लोकप्रियता फ्रांस के साथ-साथ पूरे विश्व में होने लगी। उनकी रचनाओं के विश्व की अन्य भाषाओं में अनुवाद होने लगे। ए वूमेंस स्टोरी, ए गर्ल्स स्टोरी, ला प्लेस, सिंपल पैशन, ए फ्रोजन वूमन, हैपनिंग, द इयर्स आदि रचनाओं ने एनी की कीर्ति को देश-विदेश में बढ़ाया। एनी ने स्त्री अस्मिता पर बेखौफ लेखन किया। अपने माता-पिता की अनबन और घरेलू हिंसा पर आधारित उनका उपन्यास शेम उन्होंने बिना संकोच के साहस और साफगोई के साथ लिखा। स्त्री की गरिमा के लिए उन्होंने खूब लिखा। एनी की रचनाओं पर फिल्मों का निर्माण भी हुआ जिसमें हैपनिंग और सिम्पल पैशन प्रमुख है। हैपनिंग फिल्म को 2021 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में सर्वोत्तम फिल्म का गोल्डन लायन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। 2022 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करना एनी के लिए आसान नहीं था। इस प्रतिस्पर्धा में फ्रांस के 10 और लेखक नामांकित थे। इंग्लैंड से भारतीय मूल के सलमान रश्दी और भारत की तरफ से अमिताव घोष भी नामांकित थे। सलमान रश्दी पर हमले ने भी उन्हें सुर्खियों में ला दिया था। लगभग 74 नामांकित रचनाकारों में एनी का चुना जाना एक सम्मान और सौभाग्य की बात है। वर्ष 2018 में उनका आत्म कथात्मक संस्मरण द ईयर्स प्रकाशित हुआ। इसका काल खंड 1941 से 2006 तक फैला हुआ है। दूसरा विश्व युद्ध, वैश्वीकरण, स्त्रियों के साथ सामाजिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न, गर्भपात, भूख, गरीबी और बेरोजगारी जैसे अनेक मुद्दों पर आधारित है यह किताब, जिसे एनी ने बेहद सरल सहज भाषा में बेखौफ और बेबाक तरीके से लिखा है। सामाजिक सरोकार, संवेदना और सच्चाई के साथ यथार्थ परक लेखन के कारण ही एनी को विश्व में एक बड़े लेखक के रूप में पहचान मिली। द ईयर्स को बुकर प्राइज के लिए नामांकित किया गया था। एनी साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली 17वीं महिला हैं। सबसे पहले 1909 में स्वीडन की सेल्मा लेगरलोफी को यह सम्मान हासिल हुआ। पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि यह सम्मान जिम्मेदारी को बढ़ाने वाला है। नोबेल पुरस्कार निर्विवाद रूप से दुनिया का प्रतिष्ठित पुरस्कार है। इस पुरस्कार से पूरी दुनिया में लेखक की लोकप्रियता बढ़ती है। विभिन्न भाषाओं में अनुवाद के जरिये लेखक पूरी दुनिया के सुधी पाठकों तक पहुंचता है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री (जिनकी विदाई से शायद ही किसी को रंज हुआ) लिज ट्रस ने कम कर, उच्च वृद्धि की संरचना का नाम खराब किया। यह उचित ही है क्योंकि वास्तव में आय कर दरों और आर्थिक वृद्धि के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं है। आमतौर पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर की दर उभरती पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कर की उच्चतम दर 35 फीसदी के आसपास है। ब्रिटेन की 45 फीसदी की उच्चतम आय कर दर यूरो क्षेत्र के औसत से बहुत अधिक नहीं है। यह दर अमेरिका से कुछ अधिक और जापान से कुछ कम है। सिंगापुर जैसे देशों को छोड़ दिया जाये तो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केवल कनाडा की उच्चतम कर दर 33 फीसदी है। पूर्वी एशिया के उच्च आय वाले देशों दक्षिण कोरिया और ताइवान में उच्चतम दरें यूरो क्षेत्र के औसत के करीब रहीं जबकि उनकी आर्थिक वृद्धि दर एकदम अलग रही। अगर कोई ध्यान देने लायक रुझान है तो वह अमीर अर्थव्यवस्थाओं के लिए है जहां से अधिक ऊंचा कर वसूल किया जाए क्योंकि महत्त्वाकांक्षी कल्याण योजनाओं के लिए भुगतान वहीं से होता है। तुलनात्मक रूप से बड़े सामाजिक सुरक्षा ढांचे के बिना अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ने का नतीजा जीडीपी की तुलना में कम सरकारी व्यय के रूप में सामने आता है। इस बात को पूर्वी एशिया की सफल मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में देखा जा सकता है जहां सरकारों का आकार छोटा है, उनका बजट कम है और जीडीपी की तुलना में देखा जाए तो उनके घाटे का स्तर भी अन्य देशों की तुलना में कम है। यहां तक कि अत्यधिक सफल दक्षिण कोरिया में भी सरकारी व्यय जीडीपी के एक चौथाई के बराबर है और घाटा जीडीपी के महज 2.8 फीसदी के बराबर। मलेशिया, थाईलैंड, फिलिपींस और वियतनाम में भी हालात दक्षिण कोरिया जैसे ही हैं। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो भारत सरकार का आकार काफी बड़ा है यानी जीडीपी के करीब एक तिहाई के बराबर। घाटे की बात करें तो केंद्र और राज्य का समेकित घाटा करीब 10 फीसदी है। सरकारी कर्ज की बात करें तो कोरिया का कर्ज उसके जीडीपी के आधे से भी कम है जबकि भारत में यह 85 प्रतिशत है। ताइवान की सरकार का आकार दक्षिण कोरिया से भी छोटा है। उसका कर्ज भी काफी कम है। इससे यह संकेत मिल सकता है कि वास्तविक फर्क उच्च कर दर से नहीं बल्कि सरकार के आकार से पड़ता है। यह बात बहुत पहले त्याग दी गई थैचर-रीगन की दलील के भी अनुरूप है जिसमें उन्होंने छोटी सरकार की वकालत की थी। परंतु क्या ब्रिटेन या कोई अन्य विकसित देश कम कल्याणकारी बजट के लिए मानेगा और कम कर दरों तथा छोटी सरकार के बदले स्वास्थ्य सेवाओं के छोटे आकार को स्वीकार करेगा? अमेरिका के वर्तमान और पिछले राष्ट्रपतियों ने भी नई महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं के साथ सरकारी व्यय बढ़ाने को लेकर प्रतिबद्धता जताई। ऋषि सुनक ने भी अपनी ओर से भारी भरकम वादे किए हैं लेकिन किसी को नहीं पता कि वह यह कैसे करेंगे। भारी भरकम घाटे और बढ़े हुए सरकारी ऋण (कई बार तो भारत से भी अधिक) के साथ शायद विस्तारवादी रुख अमीर देशों में टिकाऊ न साबित हो। जैसा कि ट्रस को पता चला वे इसे राजनीतिक या वित्तीय आत्मघात भी कह सकते हैं। भारत की बात करें तो चीन और जापान को छोड़कर शेष पूर्वी एशिया की तुलना में भारत की सरकार का आकार जीडीपी की तुलना में काफी बड़ा है। इसके बावजूद हमारे यहां सरकारी सेवाओं की हालत बहुत खराब है और रक्षा क्षेत्र पर हम जरूरत से कम व्यय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि पूर्वी एशियाई देश कम बजट के साथ भी बेहतर प्रदर्शन कैसे कर रहे हैं? बांग्लादेश की वृद्धि दर भी तुलनात्मक रूप से अच्छी है और कुछ सामाजिक संकेतकों पर तो वह हमसे भी आगे है। वहां कर दर कम है और बजट का आकार भारत से आधा यानी जीडीपी के 15 फीसदी के बराबर है। वहां सरकारी ऋण जीडीपी के 34 फीसदी के बराबर है। क्या भारत की सरकार का आकार अनावश्यक रूप से बड़ा है और उसका प्रदर्शन आकार के अनुरूप नहीं है? इसके अलावा यह बात भी एक चेतावनी की तरह होनी चाहिए कि सर्वाधिक समस्याग्रस्त मध्य आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में से कुछ की सरकारों का आकार बड़ा है, उनका घाटा भी काफी अधिक है, कर्ज का स्तर बढ़ा हुआ है और वहां भ्रष्टाचार भी काफी ज्यादा है। ब्राजील और दक्षिण कोरिया इसके उदाहरण हैं। भारत को सावधान रहना होगा कि वह उस राह पर न बढ़ जाये। शायद वित्त मंत्रालय या नीति आयोग इस बात पर विस्तार से नजर डाल सकें कि सरकारें वास्तव में क्या करती हैं, किस कीमत पर करती हैं, कैसे उनकी सेवाओं में सुधार किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर विस्तार किया जा सकता है, चीजों को अलग ढंग से अंजाम देकर कितना पैसा बचाया जा सकता है और सरकार अपने कितने काम निजी क्षेत्र के हवाले कर सकती है। शुरुआत करने के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय मानक सही रहेंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (अयोध्या से लौटकर मुरलीधर)। अयोध्या में श्री राम का जन्म और अयोध्या में ही भगवान राम की जल समाधि। मैं सोचता हूं आखिर गुप्तार घाट नाम क्यों है? क्या राम नहीं है यह मानना अयोध्यावासियों के लिये कठिन था, असंभव सा। इसलिये उनके मन ने माना कि राम गप्त हो गये सरयू में। इस जल समाधि के स्थान पर जाकर रामत्व का अनुभव होता है। जब मैंने वहां जाने की बात कही तब आॅटो वाला बोला घाट पर बाढ़ है डूबा है। मैंने कहा जहां हमारे राम डूबें हो वहां ही तो जाना है शेष जीवन तो रामलीला करता ही रहा हूं। कैंट इलाके से होता वहां पहुंचा। पानी घट रहा था। शाम का वक्त। सरयू मईया की आरती। मकई बेचती लड़की। और मंदिर के पुजारी कहते हैं कि 1955 के बाद ऐसी बाढ़ नहीं देखी। मंदिर से पानी आज ही अभी निकला है। अचानक पानी बढ़ता है दस मिनट तक अफरा तफरी फिर शांति। घाट से सटा उपर तक सरयू मानसरोबर से निकल कर छपरा में गंगा से मिलने तक अयोध्या की धरा को राम के स्मृतियों में अपने ऊंचे स्थान पर जैसे गर्व कर रही हो। लगा सरयू कह रही हो अवश्य देखिये देखन योगा। रामनगरी अयोध्या का जिक्र आते ही आपके दिल-दिमाग में भगवान राम के जन्मस्थली की तस्वीर कौंध जाएगी, जहां वह बाल लीलायें किया करते थे। भगवान की स्मृतियों को समेटे राम नगरी में वैसे तो कई दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन गुप्तार घाट की अपनी अलग ही विशेषता है। यह वह घाट है, जहां भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। सरयू नदी के किनारे स्थित गुप्तार घाट पर कई छोटे-छोटे मन्दिरों के साथ यहां का सुन्दर दृश्य मन को मोह लेने वाला है। मुक्ति पाने की इच्छा लेकर इस स्थान पर दर्शनार्थी आते हैं। 19वीं सदी में राजा दर्शन सिंह द्वारा गुप्तार घाट का नवनिर्माण करवाया गया था। इस घाट पर राम जानकी मंदिर, पुराने चरण पादुका मंदिर, नरसिंह मंदिर और हनुमान मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र हैं। गुप्तार घाट के पास ही मिलिट्री मन्दिर, कम्पनी गार्डन, राजकीय उद्यान और अन्य प्राचीन मन्दिर पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। नौका विहार और लम्बे रेतीले मैदानों के इर्द-गिर्द हरियाली व शान्त वातावरण और सूर्यास्त की निराली छटा लोगों को बरबस अपनी ओर खींच लेती है। बक्सर की युद्ध विजय के बाद तत्कालीन नवाब शुजा-उद-दौला द्वारा निर्मित ऐतिहासिक किला, गुप्तार घाट से चंद कदमों की दूरी पर स्थित है। ...जब अयोध्या उजड़ सी गई थी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के साथ ही कीट-पतंग तक उनके दिव्य धाम चले गये, जिसके चलते अयोध्या उजड़ सी गई थी। बाद में उनके पुत्र कुश ने इस नगरी को फिर से बसाया। प्राचीन इतिहास के मुताबिक, महाराज विक्रमादित्य ने अयोध्या नगरी को बसाया था। अयोध्या में गुप्तार घाट के अलावा ऋणमोचन घाट, लक्ष्मण घाट, शिवाला घाट, जटाई घाट, अहिल्याबाई घाट, धौरहरा घाट, नया घाट और जानकी घाट काफी मशहूर हैं। जीवन का आंरभ यानी आपका जन्म आपके वश में नहीं लेकिन अंत तो महान जनों का भगवान राम का निश्चित ही दुनिया का श्रेष्ठ स्थल ही होगा इस पर बहस कहां है? जिन्होंने बहस किया तर्क किया कुतर्क किया उन्हें पता नहीं हमारे राम तो तर्कातिक हैं, वश गुप्त हुए है अयोध्या के गुप्तार घाट पर।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आरएसएस के मोहन भागवत का सभी के लिए समान कानून वाली एक वक्तव्य पर विविध क्षेत्रो में कई तरह की परिचर्चा आरंभ हुई, कुछ पक्ष में और कुछ विपक्ष में अपनी दलील देते नजर आये। आइये जानने की कोशिश करते हैं कि कॉमन सिविल कोड क्यों आवश्यक है पूर्ववर्ती सरकारों ने छद्म अंतरराष्ट्रीय वाहवाही लूटने के चलते बहुत सारे गलत प्रयास किये। हमारे संविधान के अनुसार, राज्य का कोई धर्म नहीं है और इसको सभी धर्मों के लोगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। संविधान सभा की बहस के उल्लेखों से स्पष्ट है कि बहुसंख्यकों के लिए स्वीकृत अधिकारों में अल्पसंख्यकों को केवल विभाजन के बाद की असाधारण परिस्थितियों में ही उपस्थित होने के रूप में स्पष्ट किया गया था। यह स्वीकार किया जा सकता है भारत के संविधान निर्माताओं का उद्देश्य नहीं था कि अल्पसंख्यकों को दिये गये अधिकारों से बहुसंख्यकों को वंचित किया जाए। 1970 दशक के बाद अनुच्छेद 25 से 30 की व्याख्याओं ने अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक समुदाय के बीच भेदभाव की बुरी भावना पैदा करने वाल लगभग बना ही दिया। बहुसंख्यकों के अधिकारों को वंचित कर दिया गया। कुछ पूर्व के प्रयास : सोशल मीडिया या मीडिया में छपी रिपोर्ट पर आप खोजें तो मिल जाएगा कि स्वर्गीय सैयद शहाबुद्दीन ने बहुसंख्यक हिंदुओं पर संवैधानिक रूप से लगाये गये प्रतिबंधों की समस्या को समझते हुए, 1995 के लोकसभा में एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 36 को संविधान के अनुच्छेद 30 के दायरे को व्यापक करने के लिए पेश किया ताकि अल्पसंख्यक वर्ग शब्द को नागरिकों के सभी वर्गों से प्रतिस्थापित करके नागरिकों के सभी समुदायों और वर्गों को शामिल करने के लिए उचित संशोधन किया जा सके। धर्म की परवाह किये बिना इस देश के सभी नागरिकों के बीच समानता बहाल करने के लिए, इस भेदभावपूर्ण कानूनी व्यवस्था को समाप्त करने की अनिवार्य आवश्यकता है तथा संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 के उचित संशोधन द्वारा उनके धर्म के बावजूद लोगों के सभी वर्गों में संवैधानिक और कानूनी समानता प्रदान की जा सके ताकि हिंदुओं के मामलों में अल्पसंख्यकों के समान कानूनों के समान अधिकार, विशेषाधिकार और सुरक्षा का लाभ ले सकें। पूजा स्थलों का प्रबंधन (मंदिर और धार्मिक अनुदान), सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्ति, लाभ आदि से विभिन्न लाभों के लिए पात्रता, शैक्षिक संस्थानों में पारंपरिक भारतीय ज्ञान और भारत के प्राचीन ग्रंथों के शिक्षण में सक्षम करना तथा सरकार और इसकी एजेंसियों के अनुचित हस्तक्षेप के बिना अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रबंधन। इस संबंध में डॉ सत्यपाल सिंह सांसद (मंत्री बनने से पहले) ने 2016 के लोकसभा में संविधान के अनुच्छेद 26 से 30 में संशोधन करने के लिए एक निजी सदस्य के विधेयक संख्या 226 पेश किया। हम फिर से कहते हैं कि इस विधेयक में जो प्रस्तावित संशोधन हैं वो किसी भी समुदाय या समूहों से कोई अधिकार नहीं छीनते हैं, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि हिंदुओं सहित सभी वर्ग समान अधिकारों और विशेषाधिकारों का लाभ उठायें जो इस समय केवल अल्पसंख्यकों के लिए ही उपलब्ध हैं तथा कानून के तहत सभी समान रूप से माने जाते हैं। कारण : यह दोहराना जरूरी है कि विदेशी वाह वाही एवं कई सुरक्षा एजेंसियों के दबाव में सरकारें दब गई या समझ नहीं पाई। लगातार पांच केंद्रीय शिक्षा मंत्रियों ने अल्पसंख्यकों का ही ऐतिहासिक महिमामंडन किया। नीतियों में होते परिवर्तनों की दूरगामी मार पर पूर्व के शासकों ने ध्यान ही नहीं दिया। इसके विपरीत अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति ने शिक्षा-संस्कृति की धारा पर कब्जा करने की कोशिश की, सर्वविदित है कि सामाजिक बदलाव के मूल स्रोत वही होता है। केंद्रीय सत्ता पर काबिज हुए बिना भी कम्युनिस्टों ने देश की शिक्षा-संस्कृति पर वर्चस्व बनाया और हिंदू ज्ञान-परंपरा को बेदखल कर दिया इसका उदाहरण गांधी जेएनयू यानि जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में आप देख सकते हैं। कुछ दिन पूर्व तक हिंदू धर्म-समाज डूबता जहाज समझा जाता था, 2011 तक ऐसा महसूस होता था कि इससे निकल कर ही जान बचाई जा सकती है। इन सच्चाइयों की अनदेखी कर अनेक हिंदूवादी खुद अपनी वाहवाही करते रहे, मैंने खुद देखा है कि कुछ नेता बहुत श्रद्धा से हिन्दू पर्व मनाते हैं यहां तक कि सूत्र बताते हैं कि एक दो रेलवे भवन के सामने विश्वकर्मा भगवान के मंदिर का भी स्थापना हुआ लेकिन जब नीति निर्धारण करने का समय आता है तो अल्पसंख्यक तुष्टीकरण हेतु कानून बना। पूर्व के दशकों में भारत में ही बहुसंख्यक हिंदू धर्म का चित्रण जातिवादी, उत्पीड़क, दकियानूस आदि जैसा प्रचलित हुआ है। यही विदेशों में भी प्रचारित किया गया। किसी पार्टी की सत्ता बनने से इसमें अंतर नहीं पड़ा, यह विविध घटनाओं से देख सकते हैं।1972 जनवरी के बाद कांग्रेस-कम्युनिस्ट परोक्ष संधि और हिंदू संगठनों के निद्रामग्न होने से संविधान के अनुच्छेद 25 से 31 को मनमाना अर्थ दिया जाने लगा। संविधान की उद्देशिका में जबरन सेक्युलर शब्द जोड़ने से लेकर दिनों-दिन विविध अल्पसंख्यक संस्थान, आयोग, मंत्रालय आदि बना-बना कर अधिकाधिक सरकारी संसाधन मोड़ने जैसे अन्यायपूर्ण कार्य होते गये। विडंबना यह कि इनमें कुछ कार्य स्वयं हिंदूवादी कहलाने वाले नेताओं ने किए। वे केवल सत्ता कार्यालय, भवन, कुर्सी आदि की चाह में रहे। निष्कर्ष : विश्व के किसी भी देश में चले जाएं तो यह साफ पता चलेगा कि बहुसंख्यकों की बातें हर तरफ से मानी जाती हैं, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इजरायल चाहे कोई भी देश हो केवल भारत ही एक ऐसा देश है जहां अल्पसंख्यक हमेशा ही अपरहैंड में रहते आए हैं। अगर राष्ट्रवादी सरकार केंद्र में नहीं रहती तो धीरे-धीरे यहां के बहुसंख्यक को का हाल वही होता जो पाकिस्तान में हिंदुओं का हुआ या बांग्लादेश में हो रहा है। आज आज देखिये कि कैसी विडंबना है अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार मिले हैं जबकि वह अधिकार भारत में रहने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं का होना चाहिए था। आज दुर्भाग्य की यह बात है कि बहुसंख्यक को को अपने अधिकार के लिए भारत में लड़ना पड़ रहा है। बहुसंख्यक बराबरी की मांग कर रहे हैं जो पूर्ववर्ती सरकारों ने उन्हें नहीं दिया, यह लोग बराबरी में आ कर रहना चाहते हैं। पता नहीं कितने षड्यंत्र होंगे, यह अधिकार भारत के बहुसंख्यक को को मिल भी पायेगा या नहीं। फिर भी यह स्पष्ट है कि नागरिकों, बहुसंख्यकों या अल्पसंख्यकों के किसी भी वर्ग द्वारा राज्य के खिलाफ किसी वास्तविक या कथित शिकायत की निगरानी देश की अखंडता और एकता के लिए हानिकारक होगी ही। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (सत्यनारायण गुप्ता)। 24 अक्टूबर 1945 को गठित संयुक्त राष्ट्र संघ इस वर्ष अपनी 77 वीं वर्षगांठ मना रहा है।193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र संघ का कार्य अंतरराष्ट्रीय शांति -सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, मानवीय सहायता पहुंचाना,सतत विकास को बढ़ावा देना और देशों से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन कराना आदि हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा के अधिवेशन में इसकी प्रासंगिकता और संरचना पर जारी बहस फिर एक बार मुखर हुई। मुख्य रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अलोकतांत्रिक संरचना पर फिर से प्रकाश डाला गया है। भारत , ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए सारी योग्यता रखते हैं, को इसकी स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए इस बात पर भी जोर दिया गया। गत 21 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कि अब समय आ गया है कि इस संस्था को और समावेशी बनाया जाए ताकि वो वर्तमान विश्व की आवश्यकताओं को और भी अच्छे ढंग से पूर्ण कर सके। बाइडेन ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका सहित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी देशों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की रक्षा करनी चाहिए और और बिल्कुल विषम परिस्थितियों में ही वीटो का प्रयोग करना चाहिए, ताकि परिषद विश्वसनीय और प्रभावी बनी रहे। उनके अनुसार इन्हीं वजहों से अमेरिका सुरक्षा परिषद में स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ाने का समर्थन करता है। वहीं अमेरिका का धुर विरोधी देश रूस ने भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में नए देशों को भी प्रतिनिधित्व देने की बात कही है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण के दौरान कहा कि सुरक्षा परिषद की शक्तियों को कुछ देश कमजोर कर रहे हैं, जिसको लेकर रूस चिंतित है। इसमें कोई शक नहीं है कि सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह से आज की वास्तविकताओं के साथ समायोजित किया जाना चाहिए।हम संयुक्त राष्ट्र की गतिविधियों में लोकतांत्रीककरण की संभावनाएं देख सकते हैं।खास तौर से जिसमें अफ्रीकी एशियाई और लातिन अमेरिकी देशों का व्यापक प्रतिनिधित्व हो। रूसी विदेश मंत्री ने कहा उनका देश भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र में मुख्य भूमिका में देखना चाहते हैं। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर जिनकी संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए भाषण की काफी प्रशंसा हो रही है, ने भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग को फिर से उठाया। हालांकि उन्होंने सीधे सीधे तौर पर इस पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने भारत को एक बेहद जिम्मेदार देश बतलाते हुए कहा कि यह बड़ी जिम्मेदारियां लेने के लिए तैयार हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि दुनिया में दक्षिण (देशों) के साथ हो रहे अन्याय को सही तरीके से देखा जाये। भारत की अपील है कि महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर ईमानदारी के साथ गंभीर बातचीत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए और विकासशील देशों को संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रियात्मक रणनीति से रोका नहीं जाना चाहिए। ऊपर कही गईं बातें आदर्श रूप में तो ठीक हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यथार्थ कुछ और और ही है।जी - 4 देश (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में की मांग करता रहा है। ये चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए एक दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं। लेकिन सफलता अब तक नहीं मिली है। इसका कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों को मिला वीटो का अधिकार ही है। सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव के पारित होने के लिए इसके पांच स्थाई सदस्यों के सकारात्मक मत की जरूरत होती है। इसलिए जब तक पांचों स्थाई सदस्य सुरक्षा परिषद में नये स्थाई सदस्यों को शामिल कर उसकी सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए सहमत नहीं होते, यह मुहिम सफल नहीं हो सकता। यदि भारत को स्थाई सदस्यता देने का प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में रखा जाये तो लगभग तय है कि चीन उस पर वीटो कर दे। वैसे जी- 4 का विरोध क्षेत्रीय असंतुलन का हवाला देकर यूनाइटिंग फोर कंसेंसस नामक समूह कर रहा है, जिसके सदस्य पाकिस्तान, दक्षिण कोरिया, इटली और अर्जेंटीना हैं। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो या रूस यूक्रेन संकट, संयुक्त राष्ट्र संघ जिस तरह मूक दर्शक बना रहा, इसे देखते हुए आज इसकी प्रासंगिकता पर फिर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में इसका लोकतांत्रीकरण होना बहुत जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)
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