योगेश कुमार गोयल
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के लिए देश में प्रतिवर्ष 24 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य उपभोक्ता अधिकारों के प्रति लोगों को जागरूक करना और कानून की जानकारी देना है। दरअसल आनलाइन खरीदारी हो या आॅफलाइन, ग्राहकों को कई बार सामान की गड़बड़ी अथवा अन्य प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसी तरह की समस्याओं से निजात दिलाने के लिए उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।
2020 तक विभिन्न ई-कॉमर्स साइटों से आॅनलाइन खरीदारी को लेकर उपभोक्ताओं को कोई संरक्षण प्राप्त नहीं था लेकिन उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) में ई-कॉमर्स को भी दायरे में लाकर उपभोक्ताओं को और मजबूती देने का प्रयास किया गया है। पुराना उपभोक्ता संरक्षण कानून करीब साढ़े तीन दशक पुराना हो चुका था, जिसमें समय के साथ बड़े बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही थी।
इसीलिए ग्राहकों के साथ अक्सर होने वाली धोखाधड़ी को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों को ज्यादा मजबूती प्रदान करने के लिए 20 जुलाई 2020 को उपभोक्ता संरक्षण कानून-2019 (कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) लागू किया गया।
राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस वास्तव में उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों के बारे में जागरूक करने का महत्वपूर्व अवसर है। भारत में उपभोक्ता आन्दोलन की शुरूआत मुंबई में वर्ष 1966 में हुई थी। तत्पश्चात पुणे में वर्ष 1974 में ग्राहक पंचायत की स्थापना के बाद कई राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिए संस्थाओं का गठन किया गया।
इस प्रकार उपभोक्ता हितों के संरक्षण की दिशा में यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर 09 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक पारित किया गया, जिसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बार 24 दिसंबर 1986 को देशभर में लागू किया गया। पिछले कई वर्षों से भारत में प्रतिवर्ष इसी दिन राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण दिवस मनाया जा रहा है। यह दिवस मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें।
उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट उल्लेख है कि प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है और ऐसे में किसी भी प्रकार के शोषण अथवा उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है।
खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। यदि खरीदी गयी किसी वस्तु या सेवा में कोई कमी है या उससे आपको कोई नुकसान हुआ है तो आप उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
अगर उपभोक्ताओं का शोषण होने और ऐसे मामलों में उनके द्वारा उपभोक्ता अदालत की शरण लिए जाने के बाद मिले न्याय के कुछ मामलों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता अदालतों का उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण में क्या योगदान है। एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का एक पंखा खरीदा लेकिन एक वर्ष की गारंटी होने के बावजूद थोड़े ही समय बाद पंखा खराब होने पर भी जब दुकानदार उसे ठीक कराने या बदलने में आनाकानी करने लगा तो उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने अपने आदेश में नया पंखा देने के साथ उपभोक्ता को हजार्ना देने का भी फरमान सुनाया।
एक अन्य मामले में एक आवेदक ने सरकारी नौकरी के लिए अपना आवेदन अंतिम तिथि से पांच दिन पूर्व ही स्पीड पोस्ट द्वारा संबंधित विभाग को भेज दिया लेकिन आवेदन निर्धारित तिथि तक नहीं पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया। आवेदक ने डाक विभाग की लापरवाही को लेकर उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और उसे न्याय मिला। चूंकि स्पीड पोस्ट को डाक अधिनियम में एक आवश्यक सेवा माना गया है, इसलिए उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को सेवा शर्तों में कमी का दोषी पाते हुए डाक विभाग को मुआवजे के तौर पर आवेदक को एक हजार रुपये की राशि देने का आदेश दिया।
ऐसी ही छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना जीवन में कभी न कभी हम सभी को करना पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते। इसका प्रमुख कारण यही है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञ है। हालांकि जब शिक्षित लोग भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन नजर आते हैं तो हैरानी होती है। यदि आप एक उपभोक्ता हैं और किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हुए हैं तो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर न्याय पा सकते हैं। कोई वस्तु अथवा सेवा लेते समय हम धन का भुगतान तो करते हैं पर बदले में उसकी रसीद नहीं लेते।
शोषण से मुक्ति पाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप जो भी वस्तु, सेवा अथवा उत्पाद खरीदें, उसकी रसीद अवश्य लें। यदि आपके पास रसीद के तौर पर कोई सबूत ही नहीं है तो आप अपने मामले की पैरवी सही तरीके से नहीं कर पायेंगे। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उपभोक्ता अदालतों से उपभोक्ताओं को पूरा न्याय मिला है लेकिन आपसे यह अपेक्षा तो होती ही है कि आप अपनी बात अथवा दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत तो पेश करें। उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनमें लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना ही आसानी से शिकायत दर्ज करायी जा सकती है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक एवं शासन में सुशासन के प्रेरक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। भारतीय राजनीति के महानायक, अजातशत्रु, हिंदी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी के 96 वर्षीय दिग्गज नेता, अटल विहारी वाजपेयी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे।
उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिंदे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटलजी का जन्म हुआ था। महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटलजी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करते रहे। अटलजी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी- हिंदू तन-मन हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित, राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व की तरफ था।
राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता, जिजीविषा, व्यापक दृष्टि आद्योपांत प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति से जुड़े विचार उनके काव्य में सदैव ही दिखाई देते थे। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से उनको अलंकृत किया। वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे।
आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गये और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे।
इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाये गये लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।
दुनिया के सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चर्तुभुज का निर्माण कर पूरे देश को एक विश्व स्तरीय सड़क से जोड़ने का काम किया। आज वह सड़क देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से देश के पांच लाख गांवों के विकास को मानों पंखअटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष- बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गुजरात के मेहसाणा जिले के मोढेरा गांव में 8,000 लोग रहते हैं। यह गांव पुष्पावती नदी के किनारे बसा हुआ है। अहमदाबाद से सड़क मार्ग के जरिये दो घंटे से कम समय में इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। अभी तक यह गांव नामचीन सूर्य मंदिर के लिए जाना जाता था। इस मंदिर को चालुक्य राजाओं ने बनाया था। अब यह भारत के पहले सौर ऊर्जा गांव के रूप में प्रसिद्ध है। यह कोई संयोग नहीं है कि सूर्य देव के मंदिर वाले इस गांव ने यह तमगा हासिल किया है।
गुजरात पावर कॉरपोरेशन ने सूर्य ग्राम परियोजना के तहत गांव के सभी घरों में नि:शुल्क सौर ऊर्जा रूफ टॉप सिस्टम स्थापित किए। बीईएसएस ने मोढेरा से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित सुजानपुरा गांव में 15 मेगावॉट आवर की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के साथ 6 मेगावॉट का ग्राउंड माउंटेड सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया।
मोढेरा के 1,400 घरों की छतों पर 1 किलोवॉट आवर के सौर पैनल स्थापित किये गये हैं। गांव के सभी सार्वजनिक व शिक्षण संस्थानों की इमारतों जैसे बस स्टैंड, पुलिस स्टेशन, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत कार्यालय में भी सौर ऊर्जा संयंत्र लगाये गये हैं। गांव में विद्युत वाहनों के चार्जिंग स्टेशन भी हैं। सौर ऊर्जा से गोधूलिका के समय सूर्य मंदिर भी जगमगाता है। दिन में मोढेरा की ऊर्जा की पूरी मांग सौरऊर्जा परियोजना से पूरी हो जाती है। रात में बीईएसएस से बिजली की आपूर्ति की जाती है।
गांव में एक दिन में सौर ऊर्जा से औसतन 30,000 यूनिट बिजली तैयार होती है। इसमें से 5,500 यूनिट का इस्तेमाल दिन में होता है और 6,000 यूनिट बीईएसएस में रखी जाती है। अतिरिक्त यूनिट बिजली की आपूर्ति रोजाना राज्य के ग्रिड को कर दी जाती है। गांव के बाशिंदों ने पुष्टि की कि उनके बिजली बिल में भारी कटौती हुई है। आमतौर पर प्रति माह 3,000 रुपये का बिजली बिल अदा करने वाले घर को अब 1,000 रुपये प्रति माह अदा करने की जरूरत है। गांव के लोग अब अधिक बिजली के उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को आरामदायक बना रहे हैं।
इस तरह मोढेरा न केवल नेट जीरो समुदाय बन गया है बल्कि यह हरित ऊर्जा के ग्रिड का आपूर्तिकर्ता भी बन गया है। मोढेरा ने मिसाल पेश की है। लेकिन यह याद रखना होगा कि सौर ऊर्जा नि:शुल्क नहीं है। इसके लिए कीमत केंद्र और राज्य सरकार ने अदा की है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 81 करोड़ रुपये है। लिहाजा यह स्पष्ट रूप से भारत के सभी छह लाख से अधिक गांवों के लिए संभव नहीं है।
असलियत यह भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर घरों की छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल लगने का क्रियान्वयन भी कम रहा है जो निराशाजनक है। हालांकि जनवरी 2010 से सौर ऊर्जा का राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन लागू होने के बाद भी सौर ऊर्जा की वृद्धि तेजी से हो रही है। साल 2021-22 तक 20 गीगा वॉट सौर ऊर्जा को ग्रिड से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था।
हालांकि 2015 में इस लक्ष्य की पुनर्समीक्षा कर 100 गीगावॉट कर दिया गया था। इसमें से 40 गीगावॉट रूफ टॉप फोटोवॉलटिक (आरटीपीवी) से प्राप्त की जानी थी। शेष 60 वॉट यूटिलिटी-स्केल परियोजनाओं से प्राप्त होनी थी। हालांकि निराशाजनक यह रहा कि वित्त वर्ष 22 तक आरटीपीवी से नाममात्र की 11.8 गीगावॉट की क्षमता प्राप्त हुई।
आरपीटीवी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए अतिरिक्त जमीन पर पूंजीगत व्यय की आवश्यकता नहीं होती है। उपभोक्ता अपने आवासीय परिसर का इस्तेमाल कर बिजली पैदा कर सकता है। इस तरह उपभोक्ता ही स्वयं निमार्ता व ग्राहक प्रोज्यूमर बन जाता है। हालांकि घरेलू उपभोक्ता कई कारणों से आरटीपीवी निवेश से दूरी बनाकर रखते हैं।
इसका एक कारण संयंत्र को लगाने की लागत और उसके लिए वित्तीय संसाधन जुटाने की असमर्थता है। इसके अलावा खुदरा स्तर पर घरों में कम बिजली उपयोग करने वालों के लिए नि:शुल्क / अत्यधिक रियायत उपलब्ध होना है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती किराये का घर होता है। दूसरी तरफ रूफ टॉप परियोजना के डेवलपर के लिए छोटे आवासीय उपभोक्ताओं की मांग को पूरा करना महंगा सौदा साबित होता है। ऐसे में संयंत्र लगाने वाले एजेंटों को बिक्री चक्र को बंद करने में लंबी अवधि, कई स्थानों पर डिस्कॉम की अनुमति मिलने में होने वाली परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
डिस्कॉम छतों से सौर ऊर्जा के जरिये बिजली उत्पादन को हतोत्साहित करती हैं। डिस्कॉम नियम व विनियम को बदलने से परहेज कर लॉबिंग करती हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि छतों से तैयार सौर ऊर्जा की बिक्री ग्रिड को होती है और डिस्कॉम को नकदी अदा करने वाले ग्राहकों को भी खोना पड़ता है। जैसे उदाहरण के तौर पर ज्यादातर राज्यों ने मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए आरटीपीवी की क्षमता के आकार को अब सीमित कर दिया है।
ज्यादातर राज्यों में अब इस तरीके से तैयार होने वाले सिस्टम को 500 किलोवॉट से कम पर सीमित कर दिया गया है। ऐसे में बड़ी छत वाले वाणिज्यिक व संस्थान वाले उपभोक्ता जो बड़े संयंत्र लगा सकने में समर्थ हों, उन पर सीमाएं लगा दी गई हैं। आरटीपीवी को ट्रांसमिशन इंटरकनेक्शन के लिए कम निवेश की जरूरत होती है लेकिन इसमें डिस्कॉम की रुचि नहीं है। आरटीपीवी का अनुपात अच्छा होने पर स्थानीय ग्रिड को समुचित व स्थिर ढंग से आपूर्ति हो सकती है।
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने आवासीय क्षेत्रों में आरटीपीवी बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राजकोषीय सह प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया गया था। परियोजना के आकार के आधार पर एक ग्रेडेड योजना के अंतर्गत स्थानीय उपभोक्ताओं को केंद्रीय वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसके तहत तीन किलोवॉट तक की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 40 फीसदी तक और 3 से 10 किलोवॉट के बीच की परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 20 प्रतिशत तक का अग्रिम पूंजी अनुदान शामिल है। इसके अलावा डिस्कॉम को प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाती है। यह प्रोत्साहन राशि मुख्य रूप से डिस्कॉम द्वारा सहायक बुनियादी ढांचा प्रदान करने, डिस्कॉम कर्मचारियों की क्षमता निर्माण, अतिरिक्त मानवशक्ति और उपभोक्ता जागरूकता पैदा करने के किये गये अतिरिक्त व्यय की प्रतिपूर्ति करने के लिए है।
मोढेरा ने गांवों में आम भारतीयों के जीवन में संभावित परिवर्तन को स्पष्ट रूप से कर दिखाया है। वैश्विक स्तर पर आरटीपीवी को गरीबी उन्मूलन के एक साधन के रूप में मान्यता दी गयी है। यह घरों पर पड़ने वाली धूप से नि:शुल्क कमाई करता है और ग्रीन डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के रूप में कार्य करता है। आदर्श रूप से यह आंदोलन भारत के दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक फैल जाना चाहिए। एक नई योजना तैयार किए जाने की आवश्यकता है जो अब तक की सभी जानकारियों पर आधारित हो।
इसे व्यावहारिक तरीके से विद्युत और जल के कनेक्शनों की तरह इस मौद्रिक कमाई और गरीबी उन्मूलन के अवसर को पूर्ण शक्ति के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए। तभी भारत का हरेक गांव सूर्य गांव बन पायेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। रफ्तार, स्पीड, गति ये कुछ नाम हैं आज के मेरे विषय के। जीवन में रफ्तार का होना, हमारे प्रगतिशील होने का सूचक है। आदिकाल में मनुष्य पैदल चलता था। अपनी रफ्तार बढ़ाने के लिए घोड़े, हाथी, ऊंट, बैलगाड़ी का इस्तेमाल करने लगा। कुछ और तरक्की की और मशीनों का अविष्कार किया। आधुनिक वाहन बनाये। कई कई दिनों के बल्कि कई बार महीनों के लगने वाले यात्रा समय को चंद घंटों तक मे सीमित कर दिया। ये मनुष्य ने अपनी जीवन यात्रा को आरामदायक बनाने के लिए किया। जरूरी था। सही था। फिर गलती कहां हुई?
चलिये, अब सिक्के के दूसरे पहलू पर चलते हैं। मैं एक मां हूं। बेटा छोटा था, 3 पहियों वाली साइकिल घर में चलाया करता था। कमरा छोटा लगने लगा तो आंगन में आ गया। थोड़ा समझदार हुआ तो 2 पहियों वाली साइकिल दिला दी गयी। आंगन से निकल कर कॉलोनी की गली में चलाने लगा। अपने बेटे की सफलता पर खुश हो रही थी मैं। पल भर भी आंखों से दूर नहीं होने देती थीं। मां हूं ना, मन घबराता था। फिर भी घर की छत पर खड़ी हो कर दूर तक उसको सही सलामत जाते हुए देखती रहती थी। जब तक घर नहीं आ जाता, मन विचलित सा होता रहता था। ट्यूशन की टीचर को फोन कर के पुछ लेती थी। वो भी मेरे मन की दशा समझती थी, शायद। वो भी मां थी। समस्या तो अब आयी जब बेटा कॉलेज जाने लगा। किशोर वय में आधुनिक गाड़ियों को देख कर उसका भी मन ललचाने लगा अच्छे माता पिता काफर्ज निभाते हुए उसे एक अच्छी स्कूटर दिलाई गयी। अब वो पलक झपकते ही कॉलोनी की गली से निकल कर, बड़ी सड़क पर तेजी से भीड़ में गुम हो जाता है। छत पर खड़ी हो कर भी ज्यादा दूर तक नहीं देख पाती हूँ। छटपटाती हूं। कोई तो मां होगी, जो आगे के रास्ते पर उसका खयाल रख रही होगी। क्या इस समस्या को केवल मैं ही अनुभव कर रही हूं या हर मां अपने बच्चों को भगवान के भरोसे इस अंधी रफ्तार की भीड़ में भेज रही हैं?
हमने अपने बच्चे को सारे नियम कायदे सिखाये हैं। वो उनका पालन भी करता है। मगर जिनके पास तेज रफ्तार वाहन है वो कभी कभी इन नियमों का और कायदों का पालन चाह कर भी नहीं कर पाते। कंही उनकी गलती की सजा हमारे बच्चे को ना झेलनी पडे, ये सोच कर मन अशांत हो जाता हैं। जब भी कभी कोई अनजान बच्चा गलती करता है तो मैं उसे अपना जान कर सही गलत समझाने लगती हूं। इसी उम्मीद में कई यदि कभी मेरा बच्चा कोई गलती करें तो कोई दूसरी मां उसे सही राह दिखा दे। आज उच्च शिक्षा के लिए बच्चे दूसरे बड़े शहरों में और दूसरे देशों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। वहां मैं, कैसे अपने बच्चे की सलामती रखूंगी? क्या वहां की मम्मियां, मेरा साथ देंगी, उनकी इस रफ्तार को नियंत्रित करने में?
इस पूरे लेख में मैने अब तक माताओ को ही सम्मिलित किया है। क्या कोई पिता अपने बच्चों को सुरक्षित नही देखना चाहता होगा? क्या उसको अपने बच्चों की फिकर नही होती होगी? और यदि इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है तो क्यों इतनी रफ्तार हम बना रहे है? कुछ पल में ही 100 किमी की रफ्तार और शायद इससे भी ज्यादा। इन वाहनों को बनाने वाली ंआॅटो और बाईक कंपनियां नए नए मॉडल बना कर आये गए तेज गति की गाड़ियां बाजार में ला रही है। फलां गाड़ी की रफ्तार से कई गुना तेज रफ़्तार वाली गाड़ियों के बारे में सुनकर नई पीढ़ी अकर्षित हो रही है। अपने घर वालों से साम, दाम , दंड , भेद, कोई भी नीति अपना कर उस वहन को प्रप्त भी कर लेती है। मेरा सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि उस वाहन की तेज गति का, परीक्षण क्या उस भीड़ भाड़ वाली बड़ी सड़क पर किया गया था... जहां हमारे बच्चों को रोजाना गाड़ी चलानी है? उन ऊंची नीची, टेढी मेढ़ी, गड्डो से भरी, अतिक्रमण से पटी और जहां सुरक्षा के नाम पर की गई चालाकियां हैं। जवाब है, नहीं।
इन तेज रफ्तार गाड़ियों की रफ्तार मापने के लिए कम्पनियां किसी सुनसान इलाके की, हवाईजहाज के रन वे की, किसी बड़े नेशनल हाईवे की, सीधी, चिकनी, रोशनी से भरी और पूरे सुरक्षा उपकरणों की देख रेख में, पल दो पल के लिए उस रफ्तार को माप कर, उस आंकड़े को भुनाती हैं। वो रफ्तार हमारे पूरे जीवन काल में हमें कभी काम नहीं आतीं। बल्कि अब तक वह अंधी रफ्तार ना जाने कितने ही मासूम, उत्साहित और झूठी चकाचौंध में आकर्षित बच्चों का जीवन समाप्त कर चुकी हैं। रफ्तार को नियंत्रित करने के लिए दूसरे उपकरण लगाये जाते हैं। पर मनुष्य इस तेज रफ्तार का इतना दीवाना हो जाता है के ये जानते हुए भी की इस रफ्तार से जान को खतरा है, वो अपनी रफ्तार धीमी ही नहीं करना चाहता। क्या सिर्फ इस लालच के लिए पूरा दोष ग्राहक के सर मढ़ देना उचित होगा? हमारे बड़े बुजुर्ग हमेशा अपने अनुभवों से यही समझाते आये हैं कि, अति हमेशा बुरी होती हैं। हर वो चीज जो जरूरत से ज्यादा हो वो खतरनाक है। आटोमोबाइल कम्पनियां जो नयी नयी, तेज रफ्तार बना रहे हैं, वो भी अपने बच्चों को एक तरह से संकट में ही डाल रहे हैं। क्या जरूरत है ऐसी रफ्तार की? हम अपने ही बच्चों को खतरनाक, जानलेवा बारूद के ढेर पर बैढाने को आधुनिकीकरण क्यों समझ रहे हैं?
उनको एक सीमित और सुरक्षित रफ्तार का सही इस्तेमाल करना सिखाया जा सकता है। उनको 10 मिनट जल्दी घर से निकल कर धीरे धीरे और सफर का मजा लेते हुए चलना सिखाया जाये। एक ही जगह जाने के लिए अलग-अलग वाहनों पर जाने के बजाय मिल जुल कर एक ही वाहन को शेयर करना सिखाया जाये। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना सिखाया जाए। इससे एक दूसरे की सुरक्षा और साथ का मजा भी मिलने लगेगा और माता पिता को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। क्या आप मेरे इस विचार से सहमत हैं?
एबीएन डेस्क। देश में शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण पर केंद्रित फिल्म पठान के गीत बेशर्म रंग के रिलीज होते ही बवंडर आ गया है। इस गीत को भद्दा और अश्लील कहकर निशाने पर लिया गया है। पठान पर प्रतिबंध लगाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। आधुनिकता की चादर ओढ़ चुका समाज का एक तबका आक्रामक है। सच तो यह है कि फिल्मों और धारावाहिकों में अश्लीलता परोसने का सिलसिला पुराना है। यह धारणा स्थापित की गई है कि सिनेमा अपने दौर के समाज का आईना होता है। और इसी अवधारणा के नाम पर विज्ञापनों तक में नीली फंतासियां तारी हो रही है।
मनोरंजन का यह संसार भी निराला है। अश्लील और द्विअर्थी संवादों को सफलता की गारंटी माना जा रहा है। इनको इससे मतलब नहीं कि यह सब समाज पर कितना दुष्प्रभाव डालता है। इसकी बानगी देखिये यौवन की दहलीज पर पैर रखते ही किशोरियां उन्मुक्त होकर आसमान में उड़ने लगती हैं। फिल्मों की नीली दुनिया का यह असर युवा पीढ़ी को अनैतिक भावनाओं की अंधी सुरंग में ले जा रहा है। बढ़ते यौन अपराध इसकी तसदीक करते हैं। सहजीवन की अवधारणा में हुआ श्रद्धा हत्याकांड इसकी पराकाष्ठा है।
हर कोई जानता है कि जिस्म दिखाऊ वस्त्र पहनने की शिक्षा न ही कोई माता-पिता अपने बच्चों को देता है और न ही कोई गुरु अपने शिष्य को। तब सवाल उठता है कि फिर समाज का परिदृश्य क्यों बिगड़ रहा है। इसका जवाब बहुत तक साफ है। इसके लिए बहुत हद तक बड़ा और छोटा परदा जिम्मेदार हैं। फिल्म पठान का बेशर्म रंग सोशल मीडिया में लोक-लाज की परिधि को लांघकर पसंद (लाइक्स) का रिकार्ड तोड़ने की ओर बढ़ रहा है। ऐसी फिल्मों पर सेंसर बोर्ड को गंभीर होने की जरूरत है। अश्लीलता का यह व्यापार बंद होना चाहिए।
समाज का एक हिस्सा सिनेमा और रंगमंच से उम्मीद करता है कि वह कुरीतियों के उन्मूलन में योगदान देगा। हालांकि समाज सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में भारतीय फिल्मों ने योगदान दिया भी है पर पिछले दो दशकों में इसके प्रति अपेक्षाओं को धक्का लगा है। द्विअर्थी संवाद से अश्लीलता परोसती फिल्मों से सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण हुआ है। इसके बाद आया छोटा परदा। शुरू में इसने पारिवारिक समस्याओं और रिश्तों में उलझन सुलझाने में सकारात्मक भूमिका निभाई। यह सब करते-करते यह भी अश्लीलता में कब तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला। परिवारिक धारावाहिकों में नायक-नायिकाओं के निजी पलों का प्रदर्शन तो इस समय अनिवार्य सा हो गया है। सौभाग्य से जिस परदे को समाज सुधार के एक बड़े रहनुमा के तौर पर देखा गया, अब वही पथभ्रष्ट हो गया है।
हालांकि इस संबंध में भारतीय दंड संहिता में साफ है। समाज पर गलत असर डालने पर इसमें कठोर दंड का प्रावधान है। इस संहिता की धारा 292 कहती है कि कोई भी व्यक्ति अश्लील वस्तु जैसे-पुस्तक, कागज, रेखाचित्र, रंगचित्र, आकृति, मूर्ति आदि को नहीं बेच सकता। न ही किराये पर दे सकता है, न ही वितरण कर सकता है, न ही लोक प्रदर्शित कर सकता है। अश्लील विज्ञापन को जानबूझकर पोस्ट नहीं कर सकता। न ही अश्लील माइक्रो वीडियो या फिल्म बना सकता है। इस धारा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि ऐसा करने वाला व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत दोषी होगा। कुछ दिन पहले चर्चित मॉडल उर्फी जावेद के खिलाफ अश्लीलता फैलाने के आरोप में मुंबई में शिकायत दर्ज हुई है। अपनी शिकायत में एडवोकेट अली काशिफ खान ने आरोप लगाया है कि उर्फी जावेद अपनी पोशाक से सार्वजनिक स्थान और सोशल मीडिया पर कथित तौर पर अश्लीलता फैलाती हैं।
अब देखना बाकी है कि इस पर क्या होता है। यह सबको पता है कि भारत में अश्लीलता अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293 और 294 के तहत अश्लीलता फैलाने पर सजा हो सकती है। दोषी पाये जाने पर दो साल की सजा का प्रावधान है। अच्छी बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मुद्दे पर बेहद संजीदा हैं। वह बेशर्म रंग की कड़ी आलोचना कर चुके हैं। पिछले साल भोजपुरी फिल्मों में दिखाये गये दृश्यों और गानों के सहारे फैलाई जा रही अश्लीलता पर कड़ा रुख अपना चुके हैं। वो ऐसी फिल्मों को अनुदान को देने से इनकार कर कड़ा संदेश दे चुके हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरिलय डेस्क (अजयदीप बाधवा)। जीएसटी कंपनसेशन सेस क्या है जब भारत में सरकार ने वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लाने की बात आरंभ की थी तो कुछ राज्यों और राजनीतिज्ञों द्वारा उसका विरोध किया गया। कुछ राज्यों के विरोध के पीछे उनका अपनी आमदनी कम होने का भय था। ऐसा भारत के विकसित राज्य, जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात आदि ज्यादा सोच रहे थे। इस सोच के पीछे कारण भी गलत न था। वस्तुत: भारत में दो प्रकार के राज्य थे, (या आज भी हैं)। एक वो जिनके यहां बहुत उद्योग धंधे थे और हैं वा विकसित हैं, और दूसरे ओर वैसे राज्य, जहां औद्योगिक विकास काफी कम था, पर जनसंख्या बहुत ज्यादा थी, जैसे बिहार, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि। पहले प्रकार के राज्यों को भय था कि जीएसटी आने के बाद ना सिर्फ विक्रय कर (सेल्स टैक्स / वैट) और एक्साइज ड्यूटी बंद हो जाएगी जो उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा थी, साथ ही जीएसटी की कमाई भी कम होगी क्योंकि जीएसटी एक डेस्टिनेशन आधारित कर प्रणाली है जिसका इसका मतलब था उत्पादों को बनाने वाले राज्यों के स्थान पर उन राज्यों को अधिक जीएसटी आय मिलेगी जहां ये उत्पाद बिकेंगे।
उनका मानना था कि वैसे राज्य जो स्वयं ज्यादा उत्पादन नहीं करते, बल्कि दूसरे राज्यों के उत्पादों का उपभोग करते है, की आमदनी बढ़ जायेगी क्योंकि उनकी जनसंख्या ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह माना जा रहा था जो राज्य मेहनत कर औद्योगिक विकास बढ़ा रहे है उनकी आमदनी घट जायेगी और निकम्मे राज्यों की बढ़ जायेगी। चूंकि यह बात कुछ हद तक सही भी थी तो भारत सरकार ने इसके लिए जीएसटी कंपनसेशन (क्षतिपूर्ति) सेस का रास्ता निकाला। भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि वह कुछ वैसे उत्पादों और सेवाओं पर सामान्य जीएसटी के अलावा जीएसटी सेस लगाएगी जिनका प्रयोग आम व्यक्ति नहीं करता है और उस से होने वाली आमदनी से वैसे राज्यों को भरपाई करेगी जिनकी आमदनी जीएसटी आने के बाद कम हो जाएगी।
जीएसटी आने के बाद भारत सरकार ने ऐसा ही किया और कई उत्पादों पर जीएसटी कंपनसेशन सेस भी लगा दिया और उस से होने वाली आमदनी राज्यों के बीच उनको होने वाली हानि के हिसाब से वितरित करनी आरंभ कर दी। आरंभ में यह सेस 1 जुलाई 2017 से पांच वर्ष के लिया लगाया गया था पर इस वर्ष 1 जुलाई 2022 से इसे और आगे पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (योगेश कुमार गोयल)। देश में क्रिप्टो करंसी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) सुरक्षित और आसान डिजिटल करंसी लाने की योजना पर काफी समय से कार्य कर रहा था और अब 01 दिसंबर से आम लोगों के लिए ई-रुपये का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जा चुका है। इससे पहले आरबीआई ने 01 नवंबर से डिजिटल करंसी ई-रुपये की शुरूआत सरकारी प्रतिभूतियों के थोक कारोबार के लिए की थी। फिलहाल खुदरा ई-रुपये के परीक्षण में चार बैंकों (आईसीआईसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, आईडीएफसी बैंक तथा यस बैंक) और चार शहरों (दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरू, भुवनेश्वर) को शामिल किया गया है। पहले ही दिन डिजिटल रुपये से करीब पौने दो करोड़ रुपये मूल्य का लेनदेन हुआ।
दरअसल इन चार बैंकों की ओर से कुल 1.71 करोड़ रुपये डिजिटल मुद्रा की मांग की गई थी। मांग के मुताबिक आरबीआई ने इनको डिजिटल रुपया जारी किया। आरबीआई के मुताबिक आने वाले दिनों में बैंकों की बढ़ती जरूरत के हिसाब से जारी की जाने वाली रकम में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। आरबीआई से जारी किया गया डिजिटल रुपया भारत की पहली वर्चुअल करंसी है। इसे सेंट्रल बैंक डिजिटल करंसी (सीबीडीसी) रेग्युलेट करेगा। डिजिटल करंसी डिजिटल फॉर्मेट में है और यह हार्ड कैश की जगह लेगी। डिजिटल करंसी सीबीडीसी के तहत काम करती है और सीबीडीसी को भारत सरकार की मान्यता प्राप्त है।
सीबीडीसी को बराबर मूल्य पर कैश में एक्सचेंज किया जा सकेगा। डिजिटल करंसी को जलाया या डैमेज नहीं किया जा सकता। इसलिए एक बार जारी किए जाने के बाद यह हमेशा रहेगी जबकि करंसी नोट कुछ सालों में खराब हो जाते हैं। डिजिटल करंसी के इस्तेमाल से लोगों को अपनी नकदी की सुरक्षा की चिंता से मुक्ति मिलेगी और जिन लोगों का बैंक में खाता नहीं हैं, वे भी इसके जरिये बैंकिंग प्रणाली में शामिल हो सकेंगे। अभी हमारी जेब में जो करंसी नोट या सिक्के रहते हैं, डिजिटल करंसी में वही डिजिटल रूप में हमारे मोबाइल फोन या वॉलेट में रहेंगे और हमें लेनदेन के लिए बैंक की जरूरत नहीं पड़ेगी। हम फिलहाल जिस प्रकार नकद में पैसों का लेनदेन करते हैं बिल्कुल उसी प्रकार डिजिटल रुपये से भी कर पाएंगे।
यह भी जान लें कि ई-रुपया किस तरह काम करेगा। ई-रुपया पूरी तरह से कैशलैस और कांटैक्टलैस भुगतान प्रणाली है। इसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। ई-रुपया वास्तव में टोकन आधारित होगा, जो एक ई-मेल जैसा हो सकता है और पैसे भेजने के लिए पासवर्ड डालना होगा, जो बिना इंटरनेट के कार्य करेगा। ई-रुपये से मोबाइल फोन के जरिये चंद सेकेंडों में ही लेनदेन संभव होगा और इस लेनदेन को इलेक्ट्रॉनिक रूप से देखा भी जा सकेगा। इसकी सबसे खास बात यही है कि इसके माध्यम से लेनदेन डिजिटल भुगतान प्रणाली की तुलना में ज्यादा रीयल टाइम और कम लागत में होगा और इसमें बैंकों की तरह निपटान की जरूरत भी नहीं होगी। सीबीडीसी में नकद देते ही इंटरबैंक सैटलमेंट की जरूरत नहीं रह जाएगी, जिससे लेनदेन कम लागत में होगा।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ई-रुपये से देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और ज्यादा मजबूत होगी और इससे देश की भुगतान प्रणाली को पारदर्शी बनाने में भी मदद मिलेगी। देश में डिजिटल करंसी का प्रचलन बढ़ने पर रुपये छापने की लागत बहुत कम हो जाएगी और इससे धन भेजना भी सस्ता होगा। वास्तव में यह क्रिप्टो करंसी से बिल्कुल अलग है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आरबीआई द्वारा जारी की गई डिजिटल करंसी अन्य वर्चुअल करंसी से अलग कैसे है? डिजिटल करंसी को लेकर आरबीआई स्पष्ट कर चुका है कि यह एक डिजिटल या आभासी मुद्रा है लेकिन इसकी तुलना उन निजी आभासी मुद्राओं अथवा क्रिप्टो करंसी से नहीं की जा सकती, जिनका चलन हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है। दरअसल बिट कॉइन या अन्य क्रिप्टो करंसी डीसेंट्रलाइज्ड होती है, जिन पर किसी भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता जबकि आरबीआई द्वारा जारी की गई डिजिटल करंसी सेंट्रलाइज्ड है। इसे भारत सरकार से मान्यता प्राप्त है और इसे आरबीआई ही जारी करेगा। इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित है। इसे आसानी से एक मोबाइल से दूसरे पर भेजा जा सकेगा और इससे हर प्रकार का सामान खरीदा जा सकेगा तथा प्रत्येक सेवाओं के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा।
सामान्य शब्दों में कहा जाए तो डिजिटल करंसी का इस्तेमाल हम अपने सामान्य रुपये-पैसे के रूप में कर सकेंगे लेकिन ये रुपये-पैसे डिजिटल फॉर्म में होंगे। यही कारण है कि डिजिटल करंसी में निवेश करना दुनियाभर में प्रचलित अन्य वर्चु्अल करंसी के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है। डिजिटल करंसी में ब्लॉक चेन टैक्नोलॉजी तथा अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। ब्लॉक चेन को डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर टैक्नोलॉजी (डीएलटी) के रूप में भी जाना जाता है और इस टैक्नोलॉजी को क्रिप्टो करंसी का बैकबोन भी कहा जाता है। डिजिटल करंसी से भारत की अर्थव्यवस्था को काफी बढ़ावा मिलने और डिजिटल वित्तीय क्षेत्र में स्थिति मजबूत होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल करंसी देश में डिजिटल इकोनॉमी को नया आयाम प्रदान करेगी। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ फिलहाल डिजिटल करंसी को लेकर कुछ सवाल भी उठा रहे हैं। मसलन, बैंकों में जमा पूंजी को देश की अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण रीढ़ माना जाता है, ऐसे में यदि डिजिटल करंसी को बैंक खातों से ज्यादा सुरक्षित माना गया तो कहीं इससे बैंकिंग व्यवस्था पर असर न पड़े। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा यूपीआई के जरिये लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, उस पर भी डिजिटल करंसी से बड़ा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सीबीडीसी के चलन से बैंक में जमा के लिए लेनदेन की मांग कम हो जाएगी, जिससे उनकी जमा कम होगी।
इसके अलावा यदि बैंक जमा राशि खो देते हैं तो क्रेडिट बनाने की उनकी क्षमता सीमित हो जाएगी क्योंकि केन्द्रीय बैंक निजी क्षेत्र को लोन प्रदान नहीं कर सकते। एक बड़ी चिंता यह भी है कि एक ओर जहां भारत डिजिटलीकरण तथा डिजिटल लेनदेन के मामले में दुनिया में एक प्रमुख देश के रूप में उभरा है, वहीं देश में वित्तीय साक्षरता की स्थिति संतोषजनक नहीं है। डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलने के साथ ही हाल के वर्षों में आॅनलाइन धोखाधड़ी के मामले तेजी से बढ़े हैं। चिंताओं को दूर करने के लिए कारगर कदम उठाते हुए देश में वित्तीय साक्षरता के लिए भी पुरजोर तरीके से अभियान चलाना चाहिए। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ वेदप्रताप वैदिक)। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ आजकल जिस तरह के आंदोलन जगह-जगह हो रहे हैं, वे 1989 में थ्यानमेन चौराहे पर हुए भयंकर नरसंहार की याद ताजा कर रहे हैं। पिछले 33 साल में इतने जबरदस्त प्रदर्शन चीन में दुबारा नहीं हुए। ये प्रदर्शन तब हो रहे हैं जबकि यह माना जा रहा है कि माओत्से तुंग के बाद शी सबसे अधिक लोकप्रिय और शक्तिशाली नेता हैं। अभी-अभी उन्होंने अपने आपको तीसरी बार राष्ट्रपति घोषित करवा लिया है लेकिन चीन के लगभग 10 शहरों के विश्वविद्यालयों और सड़कों पर उनके खिलाफ नारे लग रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? सारे अखबार और टीवी चैनल मानकर चल रहे हैं कि ये प्रदर्शन कोरोना महामारी के दौरान जारी प्रतिबंधों के खिलाफ हो रहे हैं।
मोटे तौर पर यह बात सही है। चीन में कोरोना की शुरूआत हुई और वह सारी दुनिया में फैल गया लेकिन दुनिया से तो वह विदा हो लिया किंतु चीन में उसका प्रकोप अभी तक जारी है। ताजा सूचना के मुताबिक 40 हजार लोग अभी भी उस महामारी से पीड़ित पाये गये हैं। चीनी सरकार ने इस महामारी का मुकाबला करने के लिए दफ्तरों, बाजारों, कारखानों, स्कूल-कालेजों और लगभग हर जगह कड़े प्रतिबंध थोप रखे हैं। उनकी वजह से बेरोजगारी बढ़ी है, उत्पादन घटा है और मानसिक बीमारियां फैल रही हैं। इसीलिए लोग उन प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहे हैं। उन्हें हटाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन वे अब इससे भी ज्यादा आगे बढ़ गए हैं।
वे नारे लगा रहे हैं कि शी जिनपिंग तुम गद्दी छोड़ो। इसका कारण क्या है? वह कारण महामारी से भी अधिक गहरा है। वह है- चीनी लोगों का तानाशाही से तंग होना। वे अब लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए यह संदेश घर-घर पहुंच रहा है। इस मांग का सबसे ज्यादा असर शिनच्यांग (सिंक्यांग) प्रांत में देखने को मिल रहा है। उसकी राजधानी उरूमची में 10 लोगों की जान जा चुकी है। शिनच्यांग में उइगर मुसलमान रहते हैं। उनकी जिंदगी चीन के हान मालिकों के सामने गुलामों की तरह गुजरती है। इस प्रांत में लगभग 30 साल पहले मैं काफी लोगों से मिल चुका हूं। वहां हान जाति के चीनियों के विरुद्ध लंबे समय से आंदोलन चल रहा है।
उइगर मुसलमानों के इस बगावती तेवर को काबू करने के लिए लगभग 10 लाख मुसलमानों को सरकार ने यातना शिविरों में डाल रखा है। गैर हान तो चीन की सरकार के विरुद्ध हैं ही, अब हान चीनी भी खुलेआम तानाशाही के खात्मे की मांग कर रहे हैं। लेकिन चीन की सरकार का कहना है कि यदि वह तालाबंदी खोल देगी तो 80 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 50 करोड़ लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। यदि महामारी ने विकराल रूप धारण कर लिया तो लाखों लोग मौत के घाट उतर जाएंगे। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं लेकिन यह आंदोलन बेकाबू हो गया तो कोई आश्चर्य नहीं कि चीन का भी रूस की तरह, शायद कम्युनिस्ट पार्टी से छुटकारा हो जाये। (लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।)
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