विचार

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Published / 2023-01-02 09:57:47
मुफ्त राशन और वर्षांत की हकीकत

टीएन नाइनन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सरकार ने कोविड संबंधी कार्यक्रम के तहत नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण योजना को बंद कर दिया और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के माध्यम से वितरित करने की घोषणा की है। अब तक पी​डीएस के तहत चावल तीन रुपये किलोग्राम, गेहूं दो रुपये किलोग्राम और मोटा अनाज एक रुपये किलोग्राम की दर पर बेचा जाता रहा है। 

इन पर औसतन 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। यानी यह लगभग मुफ्त बिकता है। इस आवरण के परे देखने पर पता चलता है कि नि:शुल्क या 90 फीसदी स​ब्सिडी के साथ वितरित किये जाने वाले अनाज की कुल मात्रा में कमोबेश 50 फीसदी की कमी आ रही है। केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो इसके आवंटन में काफी कमी आयेगी। नि:शुल्क अनाज की पेशकश करने वाले राज्यों की भी काफी बचत होगी क्योंकि पूरा बिल केंद्र चुका रहा है।

राजकोषीय अनुशासन की बात करें तो जो हो चुका उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार की खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को एक साथ रखकर देखा जाये तो वह जीडीपी का 2.5 फीसदी है। यह स्तर एक दशक पहले भी था। यह आं​शिक तौर पर इसलिए है कि पेट्रोलियम स​​ब्सिडी (जो कुल सब्सिडी बिल का एक तिहाई था) बिल काफी कम हुआ है। ताजा निर्णय के बाद अगले वर्ष खाद्य स​ब्सिडी बिल भी जीडीपी की तुलना में कम होगा। उर्वरक स​ब्सिडी में कमी आयेगी या नहीं यह बात काफी हद तक यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर निर्भर करेगी। अनुमान तो यही है कि स​ब्सिडी बिल में काफी कमी आयेगी।

सरकार के निर्णय की बात करें तो दिक्कत राजकोषीय ग​णित में नहीं ब​ल्कि इस बात में है कि यह दो हकीकतों से किस प्रकार निपटता है। एक का संबंध खेती की आ​र्थिकी से है और दूसरे का रिश्ता देश की अ​धिसंख्य कामगार आबादी के आय के स्तर से है। कृ​षि की बात करें तो अ​धिकांश किसानों को उर्वरक पर भारी स​ब्सिडी, नि:शुल्क पानी और बिजली आदि मिलते हैं। भारत कृ​षि के मामले में दुनिया में सबसे कम मेहनताना देने वाले देशों में शामिल है। इसका भी फायदा मिलता है। 

कुछ सर्वा​धिक महत्त्वपूर्ण फसलों के लिए किसानों को खरीदार और मूल्य की गारंटी भी मिलती है। ऐसे में खेती से जुड़ा स्वा​भाविक जो​खिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि महंगे और किफायती कच्चे माल के इस्तेमाल में किफायत बरतने को खास प्रोत्साहन नहीं मिलता। कई फसलों की बात करें तो उनकी उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। थोक स​ब्सिडी के कारण एक ऐसा क्षेत्र व्यवहार्य नहीं बन पा रहा है जो बहुत कम वेतन स्तर पर देश के आधे रोजगार मुहैया कराता है।

आय के स्तर की बात करें तो असंगठित क्षेत्र के जो 27.7 करोड़ श्रमिक सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उनमें से 94 प्रतिशत की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। बमु​श्किल 1.5 फीसदी की मासिक आय 15,000 रुपये प्रति माह से अ​धिक है। देश की कुल श्रम श​क्ति में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। इनमें से दो-तिहाई कृ​षि कार्य में संलग्न हैं। वहीं सर्वे बताते हैं कि आय का स्तर गैर कृ​षि आय के स्तर के ए​क चौथाई के बराबर है। 

हकीकत में देखें तो मुद्रास्फीति समायोजित कृ​षि वेतन भत्ते बीते पांच वर्षों में काफी कम हुए हैं। मेहनताने का स्तर एक स्वघो​षित आंकड़ा होता है जो बीते चार दशकों में प्रति व्य​क्ति आय में हुए पांच गुना इजाफे से टकरा सकता है। अतिरिक्त आय में से पूरी की पूरी उच्चतम स्तर के समूह के पास तो नहीं गई होगी।

गरीबी के घटते स्तर से यह बात साबित भी होती है। खपत की आदतों और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को लेकर भी विरोधाभासी आंकड़े हैं जो बढ़ती मध्यवर्गीय श्रेणी की ओर इशारा करते हैं। अगर हालात उतने बुरे हैं जितना बताया जा रहा है तो भी क्या मुफ्त अनाज ही समस्या का हल है? अ​धिकांश कामगारों को पीडीएस दर पर परिवार के लिए एक माह का राशन खरीदने में एक दिन से अ​धिक का मेहनताना नहीं लगता है। अनाज को नि:शुल्क करने से कोई खास बदलाव नहीं आता। नि​श्चित रूप से इससे एक लोकलुभावन चक्र अवश्य शुरू हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दल पहले ही नि:शुल्क बिजली समेत तमाम मुफ्त चीजें दे रहे हैं।

अगर हम विकल्पों की बात करें तो हमारी खोज व्यापक आ​र्थिक नीति की दिशा में जायेगी। कृ​षि क्षेत्र के वेतन भत्तों की बात करें तो उनकी कमजोरी के कारण गैर कृ​षि आय के साथ उसके अंतर में कमी नहीं आयेगी जब तक कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में और रोजगार तैयार करके लोगों को कृ​षि से इतर रोजगार नहीं मुहैया कराया जाता। तब तक गरीबों को लिए आय समर्थन आवश्यक है। तीसरी बात, रोजगार गारंटी योजना जैसा स्वचयन वाला कार्यक्रम अपने बारे में काफी कुछ बताता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, ​स्कूली ​शिक्षा और रोजगारपरक प्र​शिक्षण में अ​धिक निवेश पर भी यही बात लागू होती है। स​ब्सिडी और नि:शुल्क तोहफे अक्सर जरूरी कामों पर से ध्यान हटा देते हैं।

Published / 2023-01-01 17:35:56
राजधर्म निर्वाह की मिसाल मोदी-योगी

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन में कर्मयोग और संन्यास का वृहत विश्लेषण है। इन पर अमल करने वालों की अनवरत परंपरा रही है। अनगिन शासकों और राजनेताओं ने समाज के लिए निजी हित और पारिवारिक जीवन का परित्याग किया। नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसे राजनेता आज भी इस महान विरासत को चरितार्थ कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने विधिवत संन्यास ग्रहण किया है। वह संन्यास धर्म की मर्यादाओं में रहते हुए समाज सेवा के पथ पर चल रहे हैं। अपने पूर्व आश्रम पिता के निधन का समाचार सुनते हैं। लेकिन कोरोना आपदा प्रबंधन के कार्यों में लगे रहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आध्यात्मिक रूप से संन्यास आश्रम ग्रहण नहीं किया है। वह भारतीय चिन्तन के अनुरूप सामाजिक संन्यास पर अमल करते हैं। अपनी मां की अंतिम यात्रा में जाते हैं। इसके बाद उनका राजधर्म निर्वाह शुरू हो जाता है। पहले से तय कार्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया जाता है। बाईस वर्ष के संवैधानिक दायित्व निर्वाह में एक भी दिन अवकाश न लेने की परम्परा कायम रहती है।मुख्यमंत्री रहे तो पूरे गुजरात को परिवार समझा। प्रधानमंत्री बने तो उनके परिवार में पूरा भारत आ गया। वह उदार चरित्र का परिचय देते हैं।

यह मेरा है और यह पराया, इस तरह की सोच संकीर्ण विचारधारा वालों की होती है लेकिन विस्तृत विचारधारा वालों के लिए तो यह सम्पूर्ण पृथ्वी ही परिवार के समान होती है। अच्छे जनसेवक पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। मोदी ने जब जनसेवा का मार्ग अपनाया तो उन्होंने इसी सिद्धांत का अनुसरण किया। नरेन्द्र मोदी की कार्य शैली विलक्षण है। राष्ट्र और समाज की सेवा में सम्पूर्ण समर्पण। इसी के अनुरूप परिवार भावना का विस्तार। एक बार उनकी मां ने कहा था कि हमारे परिवार ने नरेन्द्र मोदी को समाज के लिए समर्पित मान लिया था, न परिवार ने कभी उनसे कोई अपेक्षा की, न नरेन्द्र मोदी ने अपने को सीमित दायरे में रखा। मुख्यमंत्री के रूप में वहां के छह करोड़ लोगों को अपना परिवार मानते रहे, उन्हीं के हित में कार्य करते रहे। प्रधानमंत्री बने तो 130 करोड़ लोगों तक उनका परिवार विस्तृत हो गया। आठ वर्षों तक बिना विश्राम के इस परिवार की सेवा में समर्पित हैं। यह कार्यशैली और चिंतन ही उनको विशिष्ट बनाता है। बिल्कुल अलग।

नरेन्द्र मोदी के लिए जन्म दिवस और पर्व आदि भी समाज सेवा के अवसर होते हैं। नरेन्द्र मोदी दीवाली सैनिकों के बीच मनाते हैं। उनके ये आयोजन व्यक्तिगत नहीं होते। नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र को प्राथमिकता दी है व गरीब कल्याण के संकल्प से असंभव कार्यों को संभव करके दिखाया है। गरीब कल्याण, सुशासन, विकास, राष्ट्र सुरक्षा व ऐतिहासिक सुधारों के समांतर समन्वय से नरेन्द्र मोदी ने मां भारती को पुनः सर्वोच्च स्थान पर आसीन करने के अपने संकल्प को धरातल पर चरितार्थ किया है। यह निर्णायक नेतृत्व जनता के अटूट विश्वास के कारण ही सम्भव हो पाया है। एक सुरक्षित, सशक्त व आत्मनिर्भर नए भारत के निर्माता मोदी का जीवन सेवा और समर्पण का प्रतीक है।

 आजादी के बाद पहली बार करोड़ों गरीबों को उनका अधिकार देकर उनमें आशा और विश्वास का भाव जगाया है। भारतीय संस्कृति के संवाहक नरेन्द्र मोदी ने देश को अपनी मूल जड़ों से जोड़ हर क्षेत्र में आगे ले जाने का काम किया है। उनकी दूरदर्शिता व नेतृत्व में नया भारत एक विश्वशक्ति बनकर उभरा है। वैश्विक नेता के रूप में उनकी विशेष पहचान और छवि है। वह दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं।

वह कहते भी हैं कि अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी विरोधाभासी नहीं है। देश की प्रगति में सभी का योगदान और महत्व होता है। पर्यावरण की रक्षा से देश की प्रगति हो सकती है। यह भारत ने दुनिया को करके दिखाया है। प्रकृति, पर्यावरण, पशु, पक्षी भारत के लिए केवल स्थिरता सुरक्षा के विषय नहीं हैं, यह हमारी संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता का भी आधार हैं। अपने पिछले जन्मदिन पर नरेन्द्र मोदी मध्य प्रदेश के श्योपुर में स्वयं सहायता समूह सम्मेलन में सहभागी हुए। उन्होंने कहा था कि आमतौर पर वह अपने जन्मदिन पर मां से मिलते हैं। उनका आशीर्वाद लेते हैं। 

आज मैं उनके पास नहीं जा सका, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों और गांवों में कड़ी मेहनत करने वाली लाखों माताएं आज यहां मुझे आशीर्वाद दे रही हैं। यह दृश्य देखकर मेरी मां को संतोष होगा कि भले बेटा आज यहां नहीं आया, लेकिन लाखों माताओं ने आशीर्वाद दिया है। नये भारत में पंचायत भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक नारीशक्ति का परचम लहरा रहा हैं।

विगत आठ वर्षों के दौरान देश में ग्यारह करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाये गये। नौ करोड़ से ज्यादा उज्जवला के गैस कनेक्शन प्रदान किए गए। करोड़ों परिवारों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध कराई गई। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण हो रहा है। पिछले आठ सालों में स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने की दिशा में अनेक कदम उठाये गये। आठ करोड़ से अधिक महिलाएं इस अभियान से जुड़ी हैं। सरकार का लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार से कम से कम एक महिला को इस अभियान से जोड़ने का है। गांव की अर्थव्यवस्था में, महिला उद्यमियों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार निरंतर काम कर रही है। एक जिला एक उत्पाद के माध्यम से हर जिले के लोकल उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। 

नरेन्द्र मोदी महापुरुषों द्वारा देखे गये सपनों को साकार कर रहे हैं। ब्रिटेन को पछाड़ कर भारत आज दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था व्यवस्था वाला देश बन गया है। अपनी मां के अंतिम संस्कार से खाली होने के तुरंत बाद मोदी वर्चुअल माध्यम से सरकारी कार्यक्रम में सहभागी हुए। हावड़ा और न्यू जलपाईगुड़ी के बीच वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। मोदी ने कहा इस सदी में देश का तेजी से विकास करने के उद्देश्य से भारतीय रेलवे के बुनियादी ढांचे को विकसित करने का अभियान पूरे देश में जारी रहेगा।

पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इस दिन प्रधानमंत्री को कोलकाता आना था, जहां हावड़ा स्टेशन पर उनका मूल कार्यक्रम आयोजित था। इस बीच सुबह के समय जब हीरा बा के निधन की खबर आई तो इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि कार्यक्रम को टाला जा सकता है। थोड़ी देर बाद ही आधिकारिक तौर पर बताया गया कि प्रधानमंत्री वर्चुअल तरीके से कार्यक्रम में शामिल होंगे। मां के अंतिम संस्कार के बाद प्रधानमंत्री अहमदाबाद के राजभवन पहुंचे। वहां वर्चुअल माध्यम से वह कार्यक्रम में शामिल हुए। हावड़ा न्यू जलपाईगुड़ी के बीच ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के बाद अपने सम्बोधन में उन्होंने बंगाल की जनता से माफी मांगते हुए कहा कि वह निजी कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके, इसके लिए वह क्षमाप्रार्थी हैं। जिस धरती से वंदे मातरम का जय घोष हुआ वहां वंदे भारत को हरी झंडी दिखाई गई। 30 दिसंबर, 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान में तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का बिगुल फूंका था। इसके बाद प्रधानमंत्री दूसरी राष्ट्रीय गंगा परिषद की बैठक में भी शामिल हुए।

वह अपनी मां की तबियत बिगड़ने पर देररात से ही जाग रहे थे। करीब साढ़े तीन बजे भोर में उनका निधन हुआ। नरेन्द्र मोदी ने अपनी माता को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी माता की सीख थी कि काम करो बुदि्ध से और जीवन जियो शुद्धि से। हीरा बा का जन्म 18 जून, 1923 को मेहसाणा जिले की विसनगर तहसील में हुआ था। बचपन में ही हीरा बा की माता चल बसी थीं। बिन माता की हीरा बा का बचपन बहुत गरीबी में बिता। संघर्षों के कारण कम उम्र में ही उनके पास अनुभव का खजाना था। घर में बड़ी होने के कारण पूरे परिवार की जिम्मेदारी भी उठाती रहीं। बाद में छोटी उम्र में ही वडनगर के मोदी परिवार में उनकी शादी हो गई। वहां भी वे परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं। यहां भी उनपर जिम्मेदारी बड़ी थी, लेकिन उन्होंने तनिक भी विचलित हुए बिना इसे उठाते हुए परिवार को एकजुट रखा। वडनगर के एक छोटे से घर में वो रहती थीं, जहां एक भी खिड़की नहीं थी। 

घर पर आर्थिक संकट के दौर में हीरा बा ने दूसरे घरों में जूठे बर्तन भी मांजे। चरखा चलाने का भी उन्होंने काम किया। वे रुई कातने का भी काम करती रहीं। उनके पांच पुत्र और एक पुत्री हैं। वे छोटे पुत्र पंकज मोदी के साथ ही रहती थीं। नरेन्द्र मोदी वर्ष 2016 में अपनी माता हीरा बा को अपने साथ दिल्ली लेकर गए थे। वह कुछ दिन यहां रहीं थीं।

Published / 2023-01-01 17:06:09
हीरा बा को ममता की श्रद्धांजलि

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां हीरा बा के निधन पर कई देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने शोक व्यक्त किया लेकिन यह देखकर आश्चर्य हुआ कि कांग्रेस से सोनिया गांधी और राहुल ने कोई एक शब्द तक नहीं कहा। यह भी हो सकता है कि उन्होंने कहा हो और अखबारों ने उसे छापा न हो। लेकिन जरा हम सोचें कि भारतीय राजनीति में आपसी कड़वाहट किस स्तर तक नीचे पहुंच गई है। 

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने तो शोक व्यक्त किया है और उन्होंने अपनी श्रद्धांजलि भी दी है लेकिन हमारे कई अत्यंत मुखर विरोधी नेता बिल्कुल मौन रह गये। क्या हमारे विरोधी दलों के नेता, जहां तक मोदी का सवाल है, वे किसी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से भी ज्यादा खफा हैं?

राहुल गांधी का अटलजी की समाधि पर जाना मुझे अच्छा लगा। यह उदारता और राजनीतिक शिष्टाचार का परिचायक है। इंदिराजी के निधन पर अटलजी ने भी जो शब्द कहे थे, उसे मार्मिक श्रद्धांजलि ही कहा जा सकता है। लोकतंत्र की यह खूबी है कि आप चुनाव के दौरान, संसद में, प्रदर्शनों में और बयानों में अपने विरोधियों का डटकर विरोध करते रहें लेकिन शोक के ऐसे अवसरों पर आप इंसानियत का परिचय दें।

इस मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अद्भुत उदारता का परिचय दिया है। मोदी का जितना कट्टर विरोध ममता ने किया है और उनके तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ को उन्होंने जितना सताया है, किसी अन्य राज्यपाल को नहीं सताया गया है, लेकिन मोदी की माताजी के निधन पर जो वाक्य उन्होंने कहे हैं, वे अत्यंत मार्मिक हैं।

ममता ने कहा कि आपकी माताजी के निधन पर आपको कैसे सांत्वना दी जाये। आपकी मां भी तो हमारी मां हैं। मोदी ने अपनी मां की अंत्येष्टि के तुरंत बाद हावड़ा-जलपाईगुड़ी वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई। वे चाहते तो इस कार्यक्रम को स्थगित भी कर सकते थे। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि उनकी मां ने उनको कितने पवित्र संस्कार दिये थे। उनका आचरण एक अनासक्त कर्मयोगी की तरह रहा। उन्होंने अन्य नेताओं की तरह अपनी मां और अपने भाई-बहनों को सत्ता की चाशनी को चखने का भी मौका नहीं दिया जबकि हमारे नेताओं के रिश्तेदार उस चाशनी में अक्सर लथपथ हो जाते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे विरोधी नेता मोदी की खुशामद करें। मोदी का जो भी काम या भाषण उन्हें अप्रिय लगे, उसकी आलोचना वे बेखटके जरूर करें लेकिन शोक के ऐसे मौकों पर सभी नेता एक-दूसरे के प्रति सहज सहानुभूति व्यक्त करें तो उनके बीच सद्भाव तो पैदा होगा ही, भारत का लोकतंत्र भी मजबूत होगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2022-12-30 22:43:37
कैसे कोई बनता है मेसी या एम्बाप्पे

आरके सिन्हा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। खेल का मैदान किस तरह से देश की सीमाओं से लेकर वर्गभेद मिटा देता है, यह सारी दुनिया ने बीते रविवार को देखा। फीफा विश्व कप के फाइनल को देखने का भारत से लेकर दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले खेल प्रेमी इंतजार कर रहे थे। जाहिर है कि जो फाइनल मैच को देख रहे थे, उनमें से अधिकतर का संबंध न तो फ्रांस से था और न ही अर्जेंटीना से। पर इन दोनों देशों के खिलाड़ियों ने अपने श्रेष्ठ खेल और खेल भावना से सबका दिल जीता। 
खेल देशों-दुनिया को जोड़ता है। एक सूत्र में पिरोता है। हमने कब मोहम्मद अली, पेले, माराडोना, लारा, रोजर फेडरर या उसेन बोल्ट को अपना नहीं माना। 

इसी तरह से हमारे सफल खिलाड़ियों जैसे दादा ध्यानचंद, मिल्खा सिंह, विश्वनाथन आनंद को देश और देश से बाहर खेल प्रेमियों का भरपूर प्यार मिलता रहा। कुछ समय पहले महान टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने टेनिस की दुनिया से संन्यास लिया था। तब सारी दुनिया के खेल प्रेमी उनके चमत्कारी करियर को याद कर रहे थे। उनमें भारतीय भी तो कोई कम नहीं थे।

कोई खिलाड़ी मेसी, एम्बाप्पे, रोजर फेडरर, डिएगो माराडोना, मोहम्मद अली या कपिल देव कैसे बन जाता है? इस सवाल का उत्तर तलाश करने के लिए बहुत मेहनत करने की जरूरत नहीं है। सभी खिलाड़ी मेहनत करते हैं। पर अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी सब महान नहीं कहे जाते। वे ही महान माने जाते हैं जो बिग मैच प्लेयर होते थे। वे बड़े और अहम मैचों में छा जाते थे। तब उनका जलवा देखते ही बनता था। बड़े खिलाड़ी का यही सबसे बड़ा गुण होता है कि वे खास मैचों या विपरीत हालात में छा जाते हैं।

 मेसी तथा किलियन एम्बाप्पे ने फीफा कप के फाइनल मैच में लाजवाब खेल का प्रदर्शन किया। मेसी और एम्बाप्पे ने कुल जमा तीन और चार गोल किये। ये गुण होता है कि किसी बड़े खिलाड़ी में जो उसे महान बनाता है। मतलब जब टीम को आपकी सर्वाधिक जरूरत होती है तब ही आप अपने जौहर दिखाते हैं। कई बेहतरीन खिलाड़ी कमजोर प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपने जौहर नहीं दिखा पाते थे। लेकिन, ये फाइनल या अन्य खास मैचों के समय अपने जलवे बिखरते हैं।
मेसी और एम्बाप्पे जैसे खिलाड़ी विश्व नागरिक बन चुके हैं। उन्हें सारी दुनिया प्यार करती थी। बड़े प्लेयर के साथ यही होता है। वह सबका होता है और सब उसके होते हैं। अब धावक उसेन बोल्ट को लें। उन्हें भारत में उतना ही अपना माना जाता है जितना किसी अन्य देश में। वैसे वे हैं तो जमैका से। 

रोजर फेडरर दिसंबर, 2015 में दिल्ली में कुछ प्रदर्शनी मैच खेलने आये थे। भारत के टेनिस के शैदाइयों को लीजैंड बन चुके रोजर फेडरर को साक्षात देखने का मौका मिल रहा था। रोजर फेडरर को खेलते हुए देखकर दर्शक झूम रहे थे। फेडरर बार-बार दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हुए हाथ हिला रहे थे। हार्ड, क्ले और ग्रास तीनों कोर्ट में एक जैसा शानदार प्रदर्शन करने वाले फेडरर जब कोर्ट में उतरे तो फिटनेस का चरम लग रहे थे। उनके चेहरे पर एक सुपर स्टार वाली गरिमा को देखा जा सकता था।

मुझे याद आ रही है 1976 की गणतंत्र दिवस की वह परेड। तब वहां पर महानतम मुक्केबाज मोहम्मद अली आये थे। उस समय इमरजेंसी का दौर चल रहा था। परेड शुरू होने में कुछ पल शेष थे। तब ही लाउड स्पीकर से घोषणा हुई कि विश्व हैवीवेट मुक्केबाज चैंपियन मोहम्मद अली राजपथ पर पधार रहे हैं। यह जानकार राजपथ पर मौजूद हजारों लोग प्रसन्न हो गये थे। मोहम्मद अली तब अपने करियर के शिखर पर थे। वे विश्व नायक थे। वे परेड शुरू होने से पहले राजपथ पर आ गये थे। उनके चाहने वाले उनका नाम लेकर उनका अभिवादन कर रहे थे। लंबे-ऊंचे कद के मोहम्मद अली जवाब में अपने मुक्के को हवा में घुमा रहे थे। 

मोहम्मद अली देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ बैठे थे। दुर्भाग्य से वह दौर सेल्फी का नहीं था। बहरहाल, लियोनेल मेसी का विश्व विजेता बनने का सपना आखिरकार पूरा हो गया। 2014 में खिताब चूकने वाले मेसी की टीम ने फीफा वर्ल्ड कप इतिहास के सबसे रोमांचक फाइनल में फ्रांस को फुल टाइम में 3-3 से स्कोर बराबर रहने के बाद पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से हरा दिया। यह अर्जेंटीना का तीसरा खिताब है। इससे पहले उसने 1978 और 1986 में ट्रॉफी अपने नाम की थी। पेनल्टी शूटआउट में अर्जेंटीना के गोलकीपर मार्टिनेज ने कमाल कर दिया। उन्होंने दो मौके बचाए और मेसी का सपना पूरा कर दिया। इसके साथ ही मेसी का नाम माराडोना के साथ सुनहरे अक्षरों में लिख दिया गया है।

भारत को भी मेसी, एम्बाप्पे, फेडरर और नीरज चोपड़ा जैसे सैकड़ों विश्वास से लबरेज खिलाड़ियों की दरकार है। अभी तो बस शुरूआत है। किसी भी देश का विकास इस बात से साबित होता है कि उधर खेलों की दुनिया में किस तरह की उपलब्धियां अर्जित की जा रही हैं। भारत की पुरुष बैडमिंटन टीम का भी इस साल इतिहास रचना। आप जानते हैं कि भारत ने थामस कप के फाइनल में 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को 3-0 के अंतर से हराकर ये उपलब्धि हासिल की। 

लक्ष्य सेन, किदांबी श्रीकांत, सात्विक साईराज और चिराग शेट्टी ने भारत को थामस कप जितवाया। इसे बैडमिंटन की विश्व चैंपियनशिप माना जाता है। थामस कप में विजय से पहले भारत के बैडमिंटन सेंसेशन लक्ष्य सेन आॅल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंच गए थे। और बात भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन की भी। वह इस्तांबुल में महिला विश्व चैंपियनशिप के फ्लाइवेट (52 किग्रा) वर्ग के एकतरफा फाइनल में थाईलैंड की जिटपोंग जुटामस को 5-0 से हराकर विश्व चैंपियन बनीं। 

तेलंगाना की मुक्केबाज जरीन ने पूरे टूर्नामेंट के दौरान प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाए रखा और फाइनल में थाईलैंड की खिलाड़ी को सर्वसम्मत फैसले से हराया। छह बार की चैंपियन एमसी मैरीकोम (2002, 2005, 2006, 2008, 2010 और 2018), सरिता देवी (2006), जेनी आरएल (2006) और लेखा केसी इससे पहले विश्व खिताब जीत चुकी हैं।

Published / 2022-12-30 20:35:26
सनातन हिंदू धर्म-संस्कृति के रक्षक अमर शहीद धर्म योद्धा...

  • धर्म रक्षा दिवस पर विशेष (21 से 31 दिसंबर) 

डॉ बिरेन्द्र साहू  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शुद्धि आंदोलन : शुद्धि आंदोलन में स्वामी श्रद्धानंद (1856- 1926) का स्थान अमर है। आगरा में 13 फरवरी, 1923 की क्षत्रिय उपकारिणी सभा की बैठक में उन्हें बुलाया गया था। इसमें सनातनी, आर्यसमाजी, सिख, जैन भी आए थे। यहीं भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा का गठन हुआ। इसी के दस दिन बाद स्वामी जी की महत्वपूर्ण पुस्तिका ह्यसेव द डाइंग रेसह्ण प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने नव-मुस्लिमों को शीघ्र अपने पुराने कुटुम्ब में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। अगले दो महीनों में वे लगभग सौ गांवों में गए। पहले महीने में ही लगभग पांच हजार मलकानों को वापस लाया गया। 

उस वर्ष के अंत तक यह संख्या तीस हजार हो गई थी। इस कार्य पर जमीयत उलेमा और कांग्रेस के नेताओं ने आपत्ति भी की, लेकिन स्वामी जी अडिग रहे। 31 मार्च 1923 को भारत धर्म महामंडल और दरभंगा महाराज की ओर से काशी के पंडितों, पंजाब और महाराष्ट्र की विविध धर्म-सभाओं एवं जाति संगठनों ने भी स्वामी जी का समर्थन दिया। 4-5 अप्रैल 1923 को बनारस के सभाओं में भी इस विषय को रखा गया। फलत: काशी के कुछ रुढ़िवादी पंडितों ने भी मलकानों में काम करने का संकल्प लिया। मलकाना मुस्लिम राजपूतों की शुद्धि का काम पूरे हिन्दू समाज ने अपना लिया। स्वयं डॉअंबेदकर ने शुद्धि आंदोलन से अपनी सहानुभूति लिखित रूप से जताई थी। स्वामी श्रद्धानन्द ने 1924 ई. में दनकौर, बुलंदशहर में कई मुस्लिमों को शुद्ध किया। 

मेरठ, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में वे लगभग डेढ़ सौ ईसाइयों को भी पुन: हिन्दू समाज में ले आये। उन के सहयोगी रामभज दत्त और मंगल सेन इसी कार्य के लिए अन्य स्थानों पर गए। दिल्ली में मार्च 1926 में कराची से आई हुई महिला असगरी बेगन अपने बच्चों के साथ शुद्ध हुईं और उन्हें शान्ति देवी नाम दिया गया। इस पर असगरी के परिवारवालों ने स्वामी श्रद्धानन्द पर मुकदमा भी किया, किन्तु अदालत ने स्वामी जी को निर्दोष करार दिया। इसके बाद कुछ कट्टरपंथी मुसलमानों ने स्वामी जी को इस्लाम का शत्रु घोषित किया। इसी प्रचार के वशीभूत एक मतांध मुस्लिम ने 23 दिसंबर, 1926 को स्वामी जी को उन के घर में बीमार अवस्था में धोखे से मार डाला। यह निस्संदेह, शुद्धि के लिए ही स्वामी जी का बलिदान था। 30 दिसंबर, 1922 को गया (बिहार) में कांग्रेस के पंडाल में आयोजित हिन्दू महासभा के वार्षिक अधिवेशन में मोपला के पीड़ित हिंदुओं के प्रति संवेदना प्रकट की गई। मलाबार के लोगों से धर्मांतरित लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में स्वीकार करने के लिए भी आह्वान किया गया। 

इस अधिवेशन के अध्यक्ष पंडित मदन मोहन मालवीय तथा स्वागताध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। बहरहाल, भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा के प्रयासों से सन 1923 से 1931 के बीच लगभग 18,33,422 नव-मुस्लिमों को शुद्ध किया गया। इसी दौरान लगभग साठ हजार अछूत कहलाने वाले लोगों को हिन्दू धर्म छोड़ने से भी बचाया गया। 127 शुद्धि सम्मेलन हुए, 156 पंचायतें हुईं और 81 छोटे-बड़े सहभोज किए गए। सभा की ओर से शुद्धि समाचार नामक एक मासिक पत्र भी निकलता था, जिसके चौदह हजार ग्राहक थे। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा का सातवां अधिवेशन मालवीय जी की अध्यक्षता में 19-20 अगस्त 1923 को बनारस में हुआ था। उन्होंने अध्यक्षीय भाषण में शुद्धि कार्य का जोरदार समर्थन किया। वहां बाबू भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक, थियोसोफिस्ट, 1955 ई में भारत-रत्न से सम्मानित) ने भी शुद्धि के समर्थन में अतिविद्वतापूर्ण भाषण दिया था। सर्वसम्मति से अहिन्दुओं के हिंदू धर्म में प्रवेश संबंधी प्रस्ताव पास हुए। 

हिन्दू महासभा का आठवां अधिवेशन 11 अप्रैल, 1925 को कोलकाता में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुआ था। लालाजी ने इस्लाम में बलात धर्मांतरित हिंदुओं की शुद्धि का समावेश किया। महासभा के नौ उद्देश्यों में इसे भी शामिल किया गया। बाद में भी हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से कई महापुरुषों ने शुद्धि का समर्थन किया। वीर सावरकर ने भी इस तथा अन्य मंचों से शुद्धि का समर्थन और प्रत्यक्ष शुद्धि का कार्य भी किया। वीर सावरकर ने अंडमान के भयावह सेल्यूलर जेल में अपने भाइयों गणेश तथा बाबाराव के साथ मिलकर शुद्धि कार्य किया था। वहां कुछ मुस्लिम कारापाल अल्पवयस्क हिंदू बंदियों को फुसलाकर या यातना देकर मुसलमान बनाते थे। उनमें से अनेक को सावरकर बंधुओं ने विधिपूर्वक शुद्ध कराया था। इसका पता चलने पर बाबाराव सावरकर पर जानलेवा हमला भी हुआ, किन्तु वे अडिग रहे। डॉ हेगडेवार के संपादकत्व में स्वातंत्य दैनिक में शुद्धि संबंधी लेख व एक नाटक संगीत उ: शाप भी लिखा तथा सार्वजनिक व्याख्यान भी दिए। 

वेद धर्म छोडूं नहीं, कोसिस करो हजार 
तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार 

लगभग सवा छ: सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें वाली प्रथम पीढ़ी के प्रतिनिधि संत कह सकतें है। संत रैदास संत कबीर के गुरुभाई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे। उनकें कालजयी लेखन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उनकें रचित 40 दोहे गुरु ग्रन्थ साहब जैसे महान ग्रन्थ में सम्मिलित किये गए हैं।  

भारतीय समाज में आजकल धर्मांतरण और हिन्दू धर्म में घर वापसी एक बड़ा विषय चर्चित और उल्लेखनीय हो चला है। यह विषय राजनैतिक कारणों से चर्चित भले ही अब हो रहा हो कि किंतु सामाजिक स्तर पर धर्मांतरण हिन्दुस्थान में सदियों से एक चिंतनीय विषय रहा है। इस देश में धर्मांतरण की चर्चा और चिंता पिछले 2 हजार एवं 14 सौ  वर्षों पूर्व प्रारम्भ हो गई थी, समय-काल-परिस्थिति के अनुसार यह चिंता कभी मुखर होती रही तो अधिकांशत: आक्रान्ताओं और आतताइयों के अत्याचार से दबे-कुचले स्वरुप में अन्दर ही अन्दर और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही। बारहवीं सदी में जब मुस्लिम आक्रांता भारत की ओर बढ़े तब वे धन लूटनें और धर्म के प्रचार के स्पष्ट और घोषित एजेंडे के साथ ही आये थे। इन बाहरी आक्रान्ताओं और शासकों को भारत की जनता का बहला फुसलाकर या जबरदस्ती बलात धर्मांतरण करानें में किसी प्रकार का कोई सामाजिक या सांस्कृतिक अपराध बोध नहीं लगता था, बल्कि ऐसा करके वे अपनें को गौरान्वित ही महसूस करते थे। भारतीय दर्शन से धुर विपरीत ढर्रा चलानें वाले ये मुस्लिम आक्रान्ता कभी भी भारतीय समाज में समरस और एकरस अपनें इन दो गुणों के कारण ही नहीं हो पाए। उस दौर में स्वाभावत: ही हिंदुस्थानी परिवेश में धर्मांतरण को लेकर भय, चिंता और इससे छुटकारे की प्रवृत्ति उपजने लगी थी। पुनश्च यह कि समय के साथ साथ धर्मान्तारण कारी शक्तियों से छुटकारा पानें की यह प्रवृत्ति समय-काल-परिस्थिति के अनुसार कभी उभरती और कभी दबती रही किन्तु सदैव जीवित अवश्य रही। 

संत रैदास ने जब समाज में तत्कालीन आततायी विदेशी मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी का आतंक देखा तब वे दुखी हो बैठे। उस समय लोदी ने हिंदुस्थानी जनता को सताना-कुचलना और डराकर धर्म परिवर्तन कराना प्रारम्भ कर दिया था। हिन्दुओं पर विभिन्न प्रकार के नाजायज कर जैसे तीर्थ यात्रा पर जजिया कर, शव दाह करनें पर जजिया कर, हिंदू रीति से विवाह करनें पर जजिया कर जैसे आततायी आदेशों से देश का हिन्दू समाज त्राहि-त्राहि कर उठा था। भारतीय-हिंदू परंपराओं और आस्थाओं के पालन करनें वालों से कर वसूल करनें और मुस्लिम धर्म माननें वालों को छूट, प्राथमिकता वरीयता देनें के पीछे एक मात्र भाव यही था कि हिन्दू धर्मावलम्बी तंग आकर इस्लाम स्वीकार कर लें। उस समय में स्वामी रामानंद ने अपनें भक्ति भाव के माध्यम से देश में देश भक्ति का भाव जागृत किया और आततायी मुसलमान शासकों के विरुद्ध एक आन्दोलन को जन्म दिया था। स्वामी रामानंद ने तत्कालीन परिस्थितियों को समझकर कर विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि संतों को जोड़कर द्वादश भगवत शिष्य मण्डली स्थापित की। विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व करनें वाली इस द्वादश मंडली के सूत्रधार और प्रमुख, संत रविदास जी थे। 

संत रैदास ने हिन्दू संस्कारों के पालन पर मुस्लिम शासकों द्वारा लिए जानें वाले जजिया कर का अपनी मंडली से विरोध किया और इस हेतु जागरण अभियान चला दिया। इस मंडली ने सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर देशज भाव और स्वधर्म भाव के रक्षण और उसके जागरण का दूभर कार्य करना प्रारम्भ किया। संत रैदास के नेतृत्व में उस समय समाज में ऐसा जागरण हुआ कि उन्होंने धर्मांतरण को न केवल रोक दिया बल्कि उस कठिनतम और चरम संघर्ष के दौर में मुस्लिम शासकों को खुली चुनौती देते हुए देश के अनेकों क्षेत्रों में धर्मान्तरित हिन्दुओं की घरवापसी का कार्यक्रम भी जोरशोर से चलाया। संत रविदास न केवल देश भर की पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार्य संत हो गए अपितु अगड़ी जातियों के शासकों और राजाओं ने भी उन्हें राजनैतिक कारणों से अपनें अपनें दरबार में सम्मानपूर्ण स्थान देना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार संत रविदास को मिलनें वाले सम्मान के कारण देश की पिछड़ी और अगड़ी जातियों एतिहासिक समरसता का वातावरण निर्मित हो चला था। संत रविदास भारतीय सामाजिक एकता के प्रतिनिधि संत के रूप में स्थापित हो गए थे क्योंकि मुस्लिम शासकों को चुनौती देनें का जो दुष्कर कार्य ये शासक नहीं कर पाए थे वह समाज शक्ति को जागृत करनें के बल पर एक संत ने कर दिया था। 

पिछड़ी जातियों में आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन के बाद भी स्वधर्म सम्मान का भाव जागृत करनें में रैदास सफल रहे और इसी का परिणाम है कि आज भी इन जातियों में मुस्लिम मतांतरण का बहुत कम प्रतिशत देखनें को मिलता है। निर्धन और अशिक्षित समाज में धर्मांतरण रोकनें और घर वापसी का जो अद्भुत, दूभर और दुष्कर कार्य उस काल में हुआ वह इस दिशा में प्रतिनिधि रूप में संत रविदासजी का ही सूत्रपात था। इससे मुस्लिम शासकों में उनकें प्रति भय का भाव हो गया। मुस्लिम आततायी शासक सिकंदर लोदी ने सदन नाम के एक कसाई को संत रैदास के पास मुस्लिम धर्म अपनानें का सन्देश लेकर भेजा। यह ठीक वैसी ही घड़ी थी जैसी कि वर्तमान काल में बोधिसत्व बाबा साहेब आंबेडकर के समय आन खड़ी हुई थी। यदि उस समय कहीं संत रैदास आततायी लोदी के दिए लालच में फंस जाते या उससे भयभीत हो जाते तो इस देश के हिंदुस्थानी समाज की बड़ी ही एतिहासिक हानि होती। यदि उस दिन संत रैदास झुक जाते तो निस्संदेह आज इतिहास कुछ और होता किन्तु धन्य रहे पूज्य संत रविदास कि वे टस से मस भी न हुए, अपितु दृढ़ता पूर्वक पुरे देश को धर्मांतरण के विरुद्ध अलख जलाए रखनें का आव्हान भी करते रहे। 

उन्होंने अपनी रैदास रामायण में लिखा : 

वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान  
फिर क्यों छोड़ इसे पढ लूं झूठ कुरआन  
वेद धर्म छोडूं नहीं कोसिस करो हजार  
तिल-तिल काटो चाहि,गला काटो कटार 
देश ने अचंभित होकर यह दृश्य भी देखा कि संत रैदास को मुस्लिम हो जानें का सन्देश लेकर उनकें पास आनें वाला सदन कसाई स्वयं वैष्णव पंथ स्वीकार कर विष्णु भक्ति में रामदास के नाम से लीन हो गया। यह वह समय था जब शक्तिशाली किन्तु निर्मम और बर्बर शास्सक सिकंदर लोदी कु्रद्ध हो बैठा और उसनें संत रैदास की टोली को चमार या चांडाल घोषित कर दिया। इनकें अनुयाइयों से जबरन ही चर्मकारी का और मरे पशुओं के निपटान का कार्य अत्याचार पूर्वक कराया जानें लगा। भारत में चमार जाति का नाम इस घटना क्रम और सिकंदर लोदी की ही उपज है। संत रविदास उस काल में हिन्दू शासकों में इतनें लोकप्रिय और सम्मानीय हुए कि प्रसिद्द मारवाड़ चित्तोड़ घरानें की महारानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु धारण किया। महारानी मीरा से रैदास की भक्ति में वे मीरा बाई कहलानें लगी। भक्त मीरा नें स्वरचित पदों में अनेकों बार संत रैदास का स्मरण गुरु स्वरूप किया है -  

गुरु रैदास मिले मोहि पूरे, धुरसे कलम भिड़ी। सत गुरु सैन दई जब आके जोत रली। 
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै। 

इसका अर्थ है कि ईश्वर भक्ति अहोभाग्य होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशाल हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है, जबकि लघु शरीर की पिपीलिका यानि चींटी इन कणों का सहजता से भक्षण कर लेती है। इस प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर भक्त हो सकता है। 

अपने सहज-सुलभ उदाहरणों वाले और साधारण भाषा में दिए जानें वाले प्रवचनों और प्रबोधनों के कारण संत रैदास भारतीय समाज में अत्यंत आदरणीय और पूज्यनीय हो गए थे। वे भारतीय वर्ण व्यवस्था को भी समाज और समय अनुरूप ढालनें में सफल हो चले थे। वे अपनें जीवन के अन्तकाल तक धर्मांतरण के विरोध में समाज को जागृत किये रहे और वैदिक धर्म में घर वापसी का कार्य भी संपन्न कराते रहे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ जिया और अत्यंत सम्मान पूर्वक चैत्र शुक्ल चतुर्दशी संवत 1584 को वे गौलोक वासी हो गये। संत रैदास ने भारतीय समाज को मन चंगा तो कठौती में गंगा जैसी कालजयी लोकोक्ति दी जिसके बड़े ही सकारात्मक अर्थ वर्तमान परिवेश में भी निकलतें हैं। आज  उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि केवल यह होगी कि इस भारत भूमि पर सभी वर्णों, जातियों, समाजों और वर्गों के मतावलंबी राष्ट्रहित में एक होकर वैदिक मार्ग अपनाएँ रहें। स्वामी विवेकानंद ने एक धर्मांतरण से एक राष्ट्र शत्रु के जन्म का जो विचार वर्तमान काल में प्रकट किया उसे संत रैदास नें 600 वर्ष पूर्व समझ लिया था और राष्ट्र को समझाने बताने हेतु देश के हर हिस्सें में जाकर जागरण भी किया था। नमन इस अद्भुत संत को, राष्ट्रभक्त को और अनुपम भविष्यदृष्टा को। 

हिंद दी चादर कहलाने वाले गुरु तेगबहादुर जी

नौवें गुरु तेगबहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके बचपन का नाम त्यागमल था। उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद सिंह जी था। वे बाल्यावस्था से ही संत स्वरूप गहन विचारवान, उदार चित्त, बहादुर व निर्भीक स्वभाव के थे। जिन्होंने धर्म व मानवता की रक्षा करते हुए हंसते-हंसते अपने प्राणों की कुबार्नी दी। गुरु तेगबहादुर जी की शिक्षा-दीक्षा मीरी-पीरी के मालिक गुरु-पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब की छत्र छाया में हुई। इसी समय इन्होंने गुरुबाणी, धर्मग्रंथों के साथ-साथ शस्त्रों तथा घुड़सवारी आदि की शिक्षा प्राप्त की। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी की अकाल मृत्यु हो जाने की वजह से गुरु तेगबहादुर जी को गुरु बनाया गया था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेगबहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। एक समय की बात है। औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया किंतु उसे उन श्लोकों के बारे में बताना भूल गया जिनका अर्थ वहां नहीं करना था। 

उसके बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया जिससे औरंगजेब को यह स्पष्ट हो गया कि हर धर्म अपने आपमें एक महान धर्म है। पर औरंगजेब खुद के धर्म के अलावा किसी और धर्म की प्रशंसा नहीं सुन सकता था। उसके सलाहकारों ने उसे सलाह दी कि वह सबको इस्लाम धारण करवा दे। औरंगजेब को यह बात समझ में आ गई और उसने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दिया और कुछ लोगों को यह कार्य सौंप दिया। उसने कहा कि सबसे कह दिया जाये कि इस्लाम धर्म कबूल करो या मौत को गले लगाओ। जब इस तरह की जबरदस्ती शुरू हो गई तो अन्य धर्म के लोगों का जीना मुश्किल हो गया। इस जुल्म के शिकार कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस तरह इस्लाम धर्म स्वीकार ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और न करने वालों को तरह-तरह की यातनाएं दी जा रही हैं। हमारी बहू-बेटियों की इज्जत को खतरा है। जहां से हम पानी भरते हैं वहां हड्डियां फेंकी जाती है। हमें बुरी तरह मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। जिस समय यह लोग समस्या सुना रहे थे उसी समय गुरु तेगबहादुर के नौ वर्षीय सुपुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहां आए और पिताजी से पूछा- पिताजी यह लोग इतने उदास क्यों हैं? आप इतनी गंभीरता से क्या सोच रहे हैं? 

गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्या बताई तो बाला प्रीतम ने कहा- इसका निदान कैसे होगा? गुरु साहिब ने कहा- इसके लिए  किसी महान व्यक्ति को बलिदान देना होगा। बाला प्रीतम ने कहा कि आपसे महान पुरुष मेरी नजर में कोई नहीं है, भले ही बलिदान देना पड़े पर आप हिन्दू धर्म को बचाइए। उसकी यह बात सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने पूछा- अगर आपके पिता जी बलिदान दे देंगे तो आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा हो जाएगी। बालक ने कहा कि अगर मेरे अकेले के अनाश होने से लाखों लोग अनाथ होने से बच सकते हैं और अकेले मेरी मां के विधवा होने से लाखों मां विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है। फिर गुरु तेगबहादुर ने उन पंडितों से कहा कि जाकर औरंगजेब से कह दो  अगर गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धारण कर लिया तो हम भी कर लेंगे और अगर तुम उनसे इस्लाम धारण नहीं करा पाए तो हम भी इस्लाम धारण नहीं करेंगे और तुम हम पर जबरदस्ती नहीं कर पाओगे। औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया। गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं चलकर गए। वहां औरंगजेब ने उन्हें तरह-तरह के लालच दिए। किंतु बात नहीं बनी तो उन पर बहुत सारे जुल्म किए। उन्हें कैद कर लिया गया, उनके दो शिष्यों को मारकर उन्हें डराने की कोशिश की, पर गुरु तेगबहादुर टस से मस नहीं हुए। 

उन्होंने औरंगजेब को समझा दी कि अगर तुम जबरदस्ती करके लोगों को इस्लाम धारण करने के लिए मजबूर कर रहे हो तो यह जान लो कि तुम खुद भी सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि तुम्हारा धर्म भी यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म किया जाए। औरंगजेब को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु साहिब के शीश को काटने का हुक्म दे दिया और गुरु साहिब ने हंसते-हंसते अपना शीश कटाकर बलिदान दे दिया। इसलिए गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके शहीदी स्थल पर एक गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। हिन्दुस्तान और हिन्दू धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हुए गुरु तेगबहादुरजी को प्रेम से कहा जाता है- 

हिन्द की चादर, गुरु तेगबहादुर

प्राण त्याग दिये परंतु धर्म नहीं बदला

गुरु गोबिंद सिंह के चारों साहिबजादों की शहादत का इतिहास

जिनके बलिदान पर मनाया जाएगा वीर बाल दिवस। 

मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से बदला लेने के लिए जब सरसा नदी पर हमला किया तो गुरु जी का परिवार उनसे बिछड़ गया था। छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह और माता गुजरी अपने रसोईए गंगू के साथ उसके घर मोरिंडा चले गए। वजीर खां ने छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी जी को पूस महीने की तेज सर्द रातों में तकलीफ देने के लिए ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया। यह चारों ओर से खुला और ऊंचा था। इस ठंडे बुर्ज से ही माता गुजरी जी ने छोटे साहिबजादों को लगातार तीन दिन धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाने और धर्म न बदलने का पाठ पढ़ाया था। यही शिक्षा देकर माता गुजरी जी साहिबजादों को नवाब वजीर खान की कचहरी में भेजती रहीं। 7 व 9 वर्ष से भी कम आयु के साहिबजादों ने न तो नवाब वजीर खां के आगे शीश झुकाया और न ही धर्म बदला। इससे गुस्साए वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों साहिबजादों को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। जब छोटे साहिबजादों की कुबार्नी की सूचना माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज में मिली तो उन्होंने भी शरीर त्याग दिया। 
 

इसी स्थान पर आज गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब बना है। इसमें बना ठंडा बुर्ज सिख इतिहास की पाठशाला का वह सुनहरी पन्ना है, जहां साहिबजादों ने धर्म की रक्षा के लिए शहादत दी थी। मासूम साहिबजादों की इस शहादत ने सभी को हिला कर रख दिया था। कहा जाता है छोटे साहिबजादों की शहादत ही आगे चलकर मुगल हकूमत के पतन का कारण बनी थी। श्री गुरु गोबिंद सिंह के चार साहिबजादों में दो अन्य चमकौर की जंग में शहीद हुए थे। गुरु गोबिद ने अपने दो पुत्रों को स्वयं आशीर्वाद देकर जंग में भेजा था। चमकौर की जंग में 40 सिखों ने हजारों की मुगल फौज से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी। 6 दिसंबर, 1705 को हुई इस जंग में बाबा अजीत सिंह (17) व बाबा जुझार सिंह (14) ने धर्म के लिए बलिदान दिया था। (लेखक झारखंड विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री हैं।)

Published / 2022-12-29 21:28:33
देश के लिए एक प्रचंड बल है आइएनएस मोरमुगाओ...

योगेश गोयल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अरुणाचल के तवांग सेक्टर में भारत-चीन के बीच एकाएक बढ़ी तनातनी और हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल के बीच भारत की समुद्री क्षमता को बढ़ावा देने के लिए रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने 18 दिसंबर को मुम्बई में नौसेना डॉकयार्ड में स्वदेश निर्मित पी15बी स्टील्थ गाइडेड मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत आईएनएस मोरमुगाओ का जलावतरण किया। मौके पर रक्षा मंत्री ने समुद्री सुरक्षा में नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए पुराणों का भी हवाला दिया। रक्षामंत्री के मुताबिक भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन और मुम्बई के मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएसएल) द्वारा तैयार किया गया यह युद्धपोत भारत में निर्मित सबसे शक्तिशाली युद्धपोत में से एक है, जो भारत की समुद्री क्षमता में बढ़ोतरी करेगा और इसके जरिये हिन्द महासागर में भारतीय नौसेना की पहुंच बढ़ेगी तथा देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और चाक-चौबंद होगी। 

आईएनएस मोरमुगाओ वॉरशिप पहली बार गोवा मुक्ति दिवस के अवसर पर भारतीय नौसेना के दूसरे स्वदेशी विध्वंसक युद्धपोत के रूप में 19 दिसम्बर 2021 को ट्रायल के लिए समुद्र में उतारा गया था, इसी दिन गोवा के पुर्तगाली शासन से मुक्ति पाने के 60 वर्ष पूरे हुए थे। पिछले एक वर्ष से समुद्र में इस युद्धपोत का परीक्षण जारी था। जहां तक इस युद्धपोत का नाम मोरमुगाओ रखे जाने की बात है तो नौसेना में शहरों के नाम पर ही जहाजों के नाम रखने की परम्परा है और यह नाम पश्चिमी तट पर गोवा के ऐतिहासिक बंदरगाह शहर के नाम पर रखा गया है। मोरमुगाओ गोवा का सबसे पुराना बंदरगाह है, जिस पर आजादी से पहले सदैव विदेशी ताकतों की नजरें गड़ी रही। 

आईएनएस मोरमुगाओ भारत द्वारा निर्मित सबसे घातक युद्धपोतों में शामिल है। एंटी सबमरीन वॉरफेयर (एएसडब्ल्यू) क्षमता वाला यह युद्धपोत स्वदेशी रॉकेट और टारपीडो लांचर से लैस है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही कि इसकी बाहरी परत को विशेष स्टील से बनाया गया है ताकि दुश्मन के रडार लाख प्रयासों के बाद भी इसे ट्रैक नहीं कर पाएं। यह युद्धपोत चार विशाखापत्तनम श्रेणी के विध्वंसकों में से दूसरा है, जो परिष्कृत अत्याधुनिक हथियारों, सेंसरों, दूरसंवेदी उपकरणों, आधुनिक निगरानी रडार के अलावा सतह से सतह और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लैस है और हथियार प्रणालियों को लक्ष्य डेटा प्रदान करता है, जिसकी वजह से यह सदैव दुश्मन देश के जहाजों पर भारी पड़ेगा। आधुनिक रडार की मदद से इस पर बेहद खराब मौसम के दौरान भी नौसेना के हेलीकॉप्टर लैंड कर सकते हैं। 127 मिलीमीटर गन से लैस इस युद्धपोत में एके-630 एंटी मिसाइल गन सिस्टम भी लगा है। 

163 मीटर लंबे, 17 मीटर चौड़े और 7400 टन वजनी आईएनएस मोरमुगाओ को 4 शक्तिशाली गैस टर्बाइन से गति मिलती है, जिनकी मदद से यह युद्धपोत 30 समुद्री मील से भी अधिक की रफ्तार से दौड़ते हुए एक ही झटके में दुश्मन का काम तमाम कर सकता है तथा परमाणु, जैविक और रासायनिक युद्ध स्थितियों में भी दुश्मनों को धूल चटा सकता है। युद्धपोत में लगी मिसाइलें आसमान में उड़ान भरते विमान पर 70 किलोमीटर और जमीन या समुद्र पर मौजूद लक्ष्य पर 300 किलोमीटर दूर से निशाना लगाने में सक्षम हैं। भारतीय नौसेना के अनुसार मोरमुगाओ युद्धपोत की पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमताओं को देश में ही विकसित किया गया है, जिसमें रॉकेट लांचर, तारपीडो लांचर और एएसडब्ल्यू हेलीकॉप्टर की व्यवस्था है। इसके साथ ही इसमें एंटी सबमरीन रॉकेट लांचर भी लगे हैं। निर्देशित मिसाइल प्रणाली से लैस आईएनएस मोरमुगाओ पर ब्रह्मोस तथा बराक-8 जैसी बेहद खतरनाक और अत्याधुनिक आठ मिसाइलें लगायी जायेंगी। मोरमुगाओ पर लगे रडार सिस्टम से दुश्मन को ट्रैक किया जा सकता है और ये आधुनिक रडार दुश्मन के हथियारों की जानकारी देने में सक्षम हैं। 

यह युद्धपोत दुश्मन की पनडुब्बियों को ढूंढ़कर उन्हें तबाह करने की विलक्षण क्षमता रखता है। इस युद्धपोत के मिलने से भारतीय नौसेना की ताकत में काफी बढ़ोतरी हुई है। आईएनएस मोरमुगाओ युद्धपोत को प्रोजेक्ट 15बी के तहत निर्मित किया गया है, जिसमें चार विध्वंसक युद्धपोतों का निर्माण किया जा रहा है। इसी प्रोजेक्ट के पहले युद्धपोत आईएनएस विशाखापत्तनम को 2021 में ही भारतीय नौसेना में शामिल किया गया था और दो अन्य युद्धपोतों आईएनएस इम्फाल तथा आईएनएस सूरत का निर्माण तेज गति से अभी मझगांव डॉकयार्ड में ही हो रहा है। प्रोजेक्ट 15बी के तहत भारत विश्वस्तरीय मिसाइल विध्वंसक तैयार कर रहा है, जिनकी गुणवत्ता अमेरिका और यूरोप के विख्यात युद्धपोत निमार्ताओं को टक्कर देती है। प्रोजेक्ट 15बी से पहले शुरू हुए प्रोजेक्ट 15ए के तहत प्रमुख रूसी प्रणालियों को स्वदेशी प्रणालियों से बदला गया था। प्रोजेक्ट 15ए के तहत आईएनएस कोलकाता, आईएनएस कोच्चि तथा आईएनएस चेन्नई अस्तित्व में आये थे। 

नौसेना प्रमुख एडमिरल आर हरि कुमार के मुताबिक यह उपलब्धि पिछले दशक में युद्धपोत डिजाइन और निर्माण क्षमता में हमारी ओर से उठाए गए बड़े कदमों का बड़ा संकेत है। एमडीएसएल द्वारा तैयार यह युद्धपोत हमारी स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता का बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता है और इसमें कोई संदेह नहीं कि आने वाले समय में हम न केवल अपनी जरूरतों के लिए बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों की जरूरतों के लिए भी ऐसे युद्धपोतों तथा अन्य रक्षा सामग्री का निर्माण करेंगे। आईएनएस मोरमुगाओ युद्धपोत की विशेषता यह है कि आत्मनिर्भर भारत के तहत निर्मित किए गए इस युद्धपोत में करीब 75 फीसदी हिस्से पूर्ण रूप से स्वदेशी हैं। फिलहाल आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण के दृढ़ निश्चय के साथ 44 पोतों और पनडुब्बियों में से 42 का निर्माण भारतीय शिपयार्ड में ही किया जा रहा है। इसके अलावा 55 पोतों और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए आदेश जारी हो चुके हैं, जिनका निर्माण भी भारतीय शिपयार्ड में ही किया जायेगा।

Published / 2022-12-28 21:30:19
राष्ट्रवादी ईसाइयों पर भी है भारत को नाज...

आर के सिन्हा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मान्यता है कि भारत में इसाई धर्म की शुरुआत सबसे पहले केरल से हुई थी। माना जाता है कि ईसा मसीह के 12 प्रमुख शिष्यों में से एक सेंट थॉमस केरल में आये थे। भारत आने के बाद सेंट थॉमस ने 7 चर्च बनावाये। बहरहाल, यह क्रिसमस इस तरह का अनुपम अवसर है, जब हम जीवन के अलग-अलग भागों में भारत में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राष्ट्रवादी ईसाइयों की बात करें। इस लिहाज से पहला नाम डॉ टेसी थॉमस का जेहन में आता है। उन्हें भारत में मिसाइल वुमन के नाम से जाता है। वह अग्नि मिसाइल प्रोग्राम की अहम जिम्मेदारी संभालने वालीं देश की पहली महिला साइंटिस्ट हैं। अभी वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में महानिदेशक एयरोनॉटिकल प्रणाली हैं। टेसी मिसाइल के क्षेत्र में महिलाओं के लिए पथप्रदर्शक साबित हुई हैं। टेसी थॉमस 1988 में डीआरडीओ में शामिल हुईं। यहां उन्होंने नई पीढ़ी की बैलिस्टिक मिसाइल, अग्नि के डिजाइन और विकास पर काम किया। उन्हें पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने अग्नि परियोजना के लिए नियुक्त किया था। टेसी 3,000 किमी रेंज की अग्नि-ककक मिसाइल परियोजना की सहयोगी परियोजना निदेशक भी रहीं। साल 2018 में वह डीआरडीओ में वैमानिकी प्रणाली की महानिदेशक बनीं।  

यह जानकारी कम लोगों को ही है कि प्रख्यात वकील हरीश साल्वे का संबंध भी एक ईसाई परिवार से है। वे बेहद प्रखर वक्ता भी हैं। जिरह के दौरान उन्हें इसका भरपूर लाभ मिलता है।  वे कान्स्टिटूशनल लॉ और कॉरपोरेट लॉ से जुड़े मामलों पर खासतौर पर महारत रखते हैं। हरीश साल्वे को इस समय देश के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में एक माना जाता है। वे लगभग उसी स्थान पर विराजमान है, जिस पर कभी नानी पालकीवाला, सोली सोराबजी या फली नरीमन जैसे दिग्गज विद्यामान रहे थे। वे मुकेश अंबानी से लेकर रतन टाटा के लिए सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर चुके हैं। वे टैक्स विवाद में वोडाफोन के लिए भी लड़े। साल्वे ने इतालवी सरकार के लिए दो इतालवी मरीनों के हक में भी सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा था। पर जब इतालवी राजदूत ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे का उल्लंघन किया है तो उन्होंने आगे केस को लड़ने से मना भी कर दिया था। आपको याद होगा कि इतालवी सरकार ने दो भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी दो इतालवी मरीनों को सुनवाई के लिए भारत वापस भेजने से मना कर दिया था। इसके बाद साल्वे ने इतालवी सरकार के वकील का पद छोड़ा था। 

भारत के हरेक शब्दों के शैदाइयों के लिए रस्किन बॉण्ड का कालजयी काम उन्हें विशेष बना देता है। वे अंग्रेजी भाषा के विश्वप्रसिद्ध भारतीय लेखक हैं। बॉन्ड ने बच्चों के लिए सैकड़ों लघु कथाएं, निबंध, उपन्यास और किताबें लिखी हैं। बच्चों में उनकी जान बसती है। वे कभी कोई पुरस्कार ग्रहण करने के लिए नहीं लिखते हैं। वर्ना बहुत से कथित लेखक तो पुरस्कार पाने के लिए ही लिखते हैं। लिखना रस्किन बॉण्ड के जीवन का अभिन्न अंग है। उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2014 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। रस्किन बॉण्ड के पिता भारत में तैनात रॉयल एयरफोर्स के अधिकारी थे। अगर बात खेल जगत की करें तो लिएंडर पेस को आजाद भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों की सूची में रखा जाएगा। लिएंडर पेस के पिता वीस पेस भारत की हॉकी टीम में रहे और मां जेनिफर पेस भारत की बास्केटबॉल टीम का हिस्सा रहीं। उन्होंने 1990 जूनियर विंबलडन जीता था। उन्होंने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य का पदक जीता। इसके बाद पेस ने महेश भूपति के साथ भारतीय टेनिस के इतिहास में कुछ यादगार पल जोड़ दिये।  

मीडिया की सुर्खियों से दूर रहने वाले जॉर्ज सोलोमन राजघाट, विजय घाट, शांतिवन और सरकार द्वारा आयोजित होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभाओं का अनिवार्य अंग हैं। महात्मा गांधी  जबदक्षिण अफ्रीका में रहते थे। जॉर्ज सोलोमन राजधानी की कई चर्चों में पादरी भी रहे हैं।  जॉर्ज सोलोमन कहते हैं कि कि गांधीजी को बाइबिल और ईसाई धर्म के संबंध में करीब से जानने का अवसर मिला दीनबंधु सीएफ एंड्रूज से। दीनबंधु एंड्रूरज राजधानी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाते थे। उन्हीं के प्रयासों से गांधीजी पहली बार 1915 में दिल्ली आए थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज की स्थापना दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी ने की थी। इससे ही दीनबंधु एन्ड्रूरज जुड़े थे और अब जॉर्ज सोलोमन इसका हिस्सा हैं। पूर्वोत्तर भारत से आने वाली मैरी कॉम की उपलब्धियों पर सारा देश गर्व महसूस करता है। उन्होंने मुक्केबाजी की दुनिया में अनेक बड़ी उपलब्धियां दर्ज की। मैरी कॉम ने 2012 में हुए ओलंपिक खेलों में ब्रोंज मेडल हासिल किया था। उन्होंने 5 बार वर्ल्ड बॉक्सर चैम्पियनशिप जीती है। खेल की दुनिया में इनके कोच चार्ल्स अत्किनसन, गोपाल देवांग, रोंगमी जोसिया, एम नरजीत सिंह रहे है, जिन्होंने मैरी कॉम को शिखर तक पहुंचाने में योगदान दिया। 

भारत में ईसाइयों की आबादी हिन्दू और मुसलमानों के बाद सबसे अधिक है। देश इसाई समाज से उम्मीद करता रहेगा कि वहां से देश का चौतरफा विकास करने वाली शख्सियतें निकलती रहें। अगर बात स्वाधीनता के बाद की करें तो ईसाई समाज से जॉर्ज फर्नांडीज, भारतीय वायु सेना के चीफ अनिल ब्राउन, चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंग्दोह, पुलिस अफसर जूलियस रिबेरो, भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल एसएन रोडग्रिस जैसी शानदार शख्सियतों ने देश को समृद्ध किया। आशा की जानी चाहिए कि ये आगे भी चलता रहेगा। 
और अंत में बात कर लें फादर कामिल बुल्के की। फादर बुल्के के अंग्रेजी-हिंदी शब्द कोष को कौन नहीं जानता? जिंदगी भर रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में हिंदी पढ़ाते रहे। रामचरित-मानस के महान विद्वान थे। प्रतिवर्ष तुलसी जयंती पर देशभर के अनेकों लोग तुलसीदास और उनकी कालजयी कृति रामचरितमानस पर फादर कामिल बुल्के की गूढ़ विवेचनात्मक व्याख्यान को सुनने रांची पहुंचते थे। कई वर्ष मैं भी गया हूं। इन महान ईसाई हस्तियों को सलाम...।

Published / 2022-12-23 23:20:14
कोरोना की लहर से खतरा हर पहर...

कमलेश पांडेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लीजिये... देश-दुनिया पर कोरोना संक्रमण का खतरा फिर मंडराने लगा है। चीन में लगातार बढ़ते मामलों के लिए जिम्मेदार कोविड 19 के ओमीक्रोन स्वरूप के सब-वेरिएंट बीएफ.7 के कई मामले भारत के गुजरात और ओडिशा आदि में भी सामने आए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है भारत को इससे ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है, क्यों कि प्राकृतिक और टीकाकरण से प्राप्त हाइब्रीड इम्युनिटी के चलते देश को खतरा सबसे न्यूनतम होगा। यह बात अलग बात है कि यदि कोई नया वेरिएंट जन्म लेता है तो फिर भारत में भी चुनौती बढ़ सकती है। भारत अब तक कोरोना की तीन लहरों का सामना कर चुका है। इसके लिए अल्फा, डेल्टा और ओमीक्रोन वेरिएंट जिम्मेदार थे।

चीन में हाहाकार के लिए ओमीक्रोन के सब-वेरिएंट बीएफ.7 को जिम्मेदार माना गया है। चीन के साथ अमेरिका, जापान, अर्जेंटीना, दक्षिण कोरिया और ब्राजील में भी कोरोना के केस बढ़ने लगे हैं। बीएफ.7 पर डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला वेरिएंट है। यह कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में आर346टी म्यूटेशन से बना है। इसी की वजह से बीएफ.7 पर एंटीबॉडी का असर नहीं होता। यह एंटीबॉडी को हराकर शरीर में घुसने की क्षमता रखता है। इससे बचने के लिए टीकाकरण को अब भी सबसे अच्छा हथियार माना जा रहा है। इसलिए ब्रिटेन ने हाल में मॉडर्ना के टीके बायवैलेंट बूस्टर्स को मंजूरी दी है। यह कोरोना के सभी सब-वेरिएंट को खत्म करने में कारगर है।
कोरोना की मौजूदा वैश्विक स्थिति पर केंद्र सरकार सतर्क हो चुकी है। उसने अधिकारियों को सजग रहने और अपने निगरानी तंत्र को मजबूत करने को कहा है। दिल्ली समेत सभी राज्यों में सतर्कता बढ़ा दी गई है। भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भले ही देश में लगातार कोरोना मामलों में गिरावट का रुझान है और गत सप्ताह रोजाना औसतन 158 संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। लेकिन कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है। इसलिए आप घबरायें नहीं, क्योंकि सरकार किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। उसने लोगों को सुझाव दिया है कि भीड़ में मास्क पहनें और कोरोना टीके की तीसरी यानी एहतियाती खुराक जरूर लें।

जहां तक दुनिया के अन्य देशों की बात है तो यहां पर यह बताना जरूरी है कि वैश्विक स्तर पर पिछले 6 सप्ताहों के दौरान कोरोना मरीजों में लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व में रोजाना औसत संक्रमण 5.9 लाख है। अनुमान है कि अगले कुछ महीनों में चीन में 80 करोड़ लोग संक्रमित हो सकते हैं। मात्र तीन माह में 10 लाख लोगों की मौत की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि भारत के हवाई अड्डों पर चीन और अन्य देशों से आने वाले यात्रियों की औचक कोरोना जांच शुरू कर दी गई है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक अध्ययन से पता चलता है कि जब भी कोई कोरोना लहर देश में आई तो लगभग 65-70 फीसदी लोग उससे प्रभावित हुए। कई राज्यों में यह आंकड़ा 90 फीसदी तक रहा है। मोटे तौर पर देश के 80-90 फीसदी लोग कोरोना का सामना कर चुके हैं। यानी कि उनमें प्राकृतिक रूप से प्रतिरोधक क्षमता आ चुकी है। इसी प्रकार 102 करोड़ से अधिक लोग कोरोना टीके की पहली खुराक और 95 करोड़ लोग दूसरी खुराक ले चुके हैं। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच साल से छोटे बच्चों को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन 95 फीसदी आबादी का टीकाकरण हो चुका है।
कोरोना संक्रमण के बचाव में प्राकृतिक रूप से हासिल प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। कुछ अलग-अलग अध्ययन में यह दावा किया गया था कि प्राकृतिक और टीके दोनों की मिली-जुली हाइब्रीड प्रतिरोध क्षमता लंबे समय तक टिकाऊ रहती है। भारतीय आबादी ने दोनों तरीकों से यह क्षमता हासिल की है। इस हिसाब से भारतीयों में कोरोना के नए संक्रमणों का खतरा न्यूनतम हो सकता है।
अब यदि कोई नया वेरिएंट आता है और वह पहले के वेरिएंट से काफी अलग होता है तो चौथी लहर का खतरा बढ़ सकता है। यदि चीन की अनदेखी भी कर दें तो अमेरिका व फ्रांस में कोविड के मामलों का बढ़ना चिंताजनक है क्योंकि वहां पहले अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इन देशों में ज्यादातर फाइजर के टीके इश्तेमाल हुए थे।जो एमआरएनए तकनीक पर था। यह तकनीक टीके में पहलीबार प्रयुक्त हुई, इसलिए इसकी प्रभावकारिता को लेकर भी पूराने अध्ययन नहीं हैं। वहीं भारतीय टीकों में समूचे निष्क्रिय वायरस का इस्तेमाल किया गया है जो सबसे पुरानी व प्रभावी टीका पद्धति है।

उल्लेखनीय है कि साल 2019 में दिसंबर में ही चीन में कोरोना वायरस नाम की नई महामारी ने दस्तक दी थी। इसके बाद पूरी दुनिया में इस वायरस ने तबाही मचाई। ऐसे में दुनिया को ये चिंता सताने लगी है कि क्या एक बार फिर से नए साल की खुशियों पर कोरोना वायरस नाम का ग्रहण लगने वाला है? याद दिला दें कि दिसंबर-जनवरी 2019 में कोरोना के बढ़े मामलों में क्रिसमस-न्यू ईयर पर होने वाली भीड़भाड़ का भी बड़ा योगदान था, क्योंकि यह वायरस एक-दूसरे के संपर्क में आने से फैलता है। क्रिसमस-न्यू ईयर 2022 के समय कोरोना के मामले बढ़ने से दुनिया वापस उसी जगह पर आकर खड़ी हो गई है जहां तीन साल पहले थी। एक्सपर्ट ने चिंता जताई है कि अगर दिसंबर के आखिरी सप्ताह और जनवरी में आने वाले फेस्टिवल पर सावधानी नहीं बरती गई तो कोरोना विस्फोट भी हो सकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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