विचार

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Published / 2023-01-10 22:54:21
आरक्षण का आधार जाति नहीं सिर्फ गरीबी हो...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भोपाल में करणी सेना ने एक अपूर्व प्रदर्शन आयोजित किया और मांग की कि सरकारी नौकरियों, चुनावों और शिक्षण संस्थाओं में, जहां भी आरक्षण की व्यवस्था है, वहां सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यह करणी सेना राजपूतों का संगठन है। इसने जातीय आरक्षण के विरुद्ध सीधी आवाज नहीं उठायी है, क्योंकि यह खुद ही जातीय संगठन है लेकिन इस समय देश में जहां भी आरक्षण दिया जा रहा है, वह प्रायः जातीय आधार पर ही दिया जा रहा है। यदि सिर्फ गरीबी के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था बन जाये तो जाति भेदभाव के बिना भी देश के सभी कमजोर लोगों को आरक्षण मिल सकता है।

यह मांग तो भारत के कम्युनिस्टों को सबसे ज्यादा करनी चाहिए, क्योंकि कार्ल मार्क्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में सबसे ज्यादा हिमायत इसी गरीब वर्ग की है। उन्होंने इसे सर्वहारा (प्रोलेटेरिएट) कहा है। कम्युनिस्टों की क्या कहें, देश की सभी पार्टियां थोक वोटों की गुलाम हैं। थोक वोटों का सबसे बड़ा श्रोत जातियां ही हैं। इसीलिए देश के किसी नेता या पार्टी में इतना दम नहीं है कि वह जातीय आरक्षण का विरोध करे। बल्कि कई अन्य जातियों के नेता आजकल अपने लिए आरक्षण के आंदोलन चला रहे हैं। 

यदि करणी सेना के राजपूत लोग अपने आंदोलन में सभी जातियों को जोड़ लें (अनुसूचित जातियों को भी) तो वह सचमुच महान राष्ट्रीय आंदोलन बन सकता है। अनेक अनुसूचित लोग, जो स्वाभिमानी हैं और दूसरों की दया पर निर्भर रहना गलत मानते हैं, वे भी करणी सेना के साथ आ जायेंगे।

करणी सेना की यह मांग भी सही है कि किसी भी परिवार की सिर्फ एक पीढ़ी को आरक्षण दिया जाये ताकि अगली पीढ़ियां आत्मनिर्भर हो जायें। करणी सेना की यह मांग भी उचित प्रतीत होती है कि उस कानून को वापस लिया जाये, जिसके मुताबिक किसी भी अनुसूचित व्यक्ति की शिकायत के आधार पर किसी को भी जाँच किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसमें शक नहीं है कि देश के अनुसूचितों ने सदियों से बहुत जुल्म सहे हैं और उनके प्रति न्याय होना बेहद जरूरी है लेकिन हम भारत में ऐसा समाज बनाने की भूल न करें, जो जातीय आधार पर हजारों टुकड़ों में बंटता चला जाये। 

भारत और पड़ोसी देशों के तथाकथित अनुसूचित और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाने का उपाय जातीय आरक्षण नहीं है। उन्हें और तथाकथित ऊंची जातियों के लोगों को भी जन्म के आधार पर नहीं, जरूरत के आधार पर आरक्षण दिया जाये। यदि हम आरक्षण का आधार ठीक कर लें तो देश में समता और संपन्नता का भवन तो अपने आप ही खड़ा हो जायेगा। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-09 22:43:47
आखिर कैसे सुधरेगा हमारा लोकतंत्र...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। कई देशों में लोकतंत्र खत्म हुआ और तानाशाही आ गयी लेकिन भारत का लोकतंत्र जस का तस बना हुआ है लेकिन क्या इस तथ्य से हमें संतुष्ट होकर बैठ जाना चाहिए? नहीं, बिल्कुल नहीं। भारतीय लोकतंत्र ब्रिटिश लोकतंत्र की नकल पर गढ़ा गया है। लंदन का राजा तो नाम मात्र का होता है लेकिन भारत में पार्टी-नेता सर्वेसर्वा बन जाते हैं। 

सभी पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह या तो कुछ व्यक्तियों या कुछ परिवारों की निजी संपत्तियां बन गयी हैं। उनमें आंतरिक लोकतंत्र शून्य हो गया है। चुनाव से जो सरकारें बनती हैं, वे बहुमत का प्रतिनिधित्व क्या करेंगी? उन्हें कुल मतदाताओं के 20 से 30 प्रतिशत वोट भी नहीं मिलते और वे सरकारें बना लेती हैं। हमारी संसद और विधानसभाओं को पक्ष और विपक्ष के दल एक अखाड़े में तब्दील कर डालते हैं। चुनाव में खर्च होने वाले अरबों-खरबों रुपये नेताओं को भ्रष्टाचारी बना डालते हैं। तब क्या किया जाये?

पिछले दिनों मैंने इन समस्याओं पर आचार्य कृपलानी स्मारक व्याख्यान दिया था। उसके कुछ बिंदु संक्षेप में देश के सुधिजन के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं। सबसे पहले तो हम चुनाव-प्रणाली ही बंद कर दें। इसकी जगह हर पार्टी को उसकी सदस्य-संख्या के अनुपात में सांसद और विधायक भेजने का अधिकार मिले। इसके कई फायदे होंगे। चुनाव खर्च बंद होगा। भ्रष्टाचार मिटेगा। 

करोड़ों लोग राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जायेंगे। अभी सभी पार्टियों की सदस्य-संख्या 15-16 करोड़ के आसपास है। फिर वह 60-70 करोड़ तक हो सकती है। इस नई प्रणाली का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो भी सरकार बनेगी, उसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिल जायेगा। वह सरकार राष्ट्रीय सरकार होगी, दलीय नहीं, जैसी कि आजादी के तुरंत बाद बनी थी। इस क्रांतिकारी प्रणाली की कई कमियों को कैसे दूर किया जा सकेगा, यह विषय भी विचारणीय है।

जब तक यह नई प्रणाली शुरू नहीं होती है, हमारी वर्तमान प्रणाली में भी कई सुधार किए जा सकते हैं। सबसे पहला सुधार तो यही है कि जब तक किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलें, उसे चुना नहीं जाये। इसी प्रकार चुने हुए सांसदों की सरकार सचमुच बहुमत की सरकार होगी। उम्मीदवारों की उम्र 25 साल से बढ़ाकर 40 साल की जाये और 50 साल के होने पर ही उन्हें मंत्री बनाया जाये।

संसद सदस्यों की संख्या 1 हजार से डेढ़ हजार तक बढ़ाई जाये। सभी जन-प्रतिनिधियों की आय और निजी संपत्तियों का ब्यौरा हर साल सार्वजनिक किया जाये। देश में रेफरेन्डम और रिकाल की व्यवस्था भी लागू की जानी चाहिए। सारे कानून राजभाषा में बनें और सभी अदालतें अपने फैसले स्वभाषाओं में दें। सांसदों और विधायकों की पेंशन खत्म की जाये। उनके, अफसरों और मंत्रियों के खर्चों पर रोक लगायी जाये। अन्य सुझाव, कभी और। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-09 22:37:41
कृपया हिन्दी के शब्दों की हत्या न करें...

  • विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष

डॉ वंदना सेन

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी संस्कृति के कई बिन्दु हैं। इन्हें सुनकर या देखकर हम सभी को गौरव की अनुभूति होती है। इनमें से एक बिन्दु हमारी हिन्दी भाषा है। यह हमारे मूल से प्रस्फुटित है। सही मायनों में हिन्दी भारत का गौरव गान है। जिसे हम जितना आचरण में लाएंगे, उतना ही हम सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते जायेंगे। यह सर्वकालिक सत्य है कि कोई भी देश अपनी भाषा में ही अपने मूल स्वत्व को प्रकट कर सकता है। निज भाषा देश की उन्नति का मूल होता है। निज भाषा को नकारना अपनी संस्कृति को विस्मरण करना है। जिसे अपनी भाषा पर गौरव का बोध नहीं होता, वह निश्चित ही अपनी जड़ों से कट जाता है और जो जड़ों से कट गया उसका अंत हो जाता है। 

भारत का परिवेश नि:संदेह हिन्दी से भी जुड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिन्दी भारत का प्राण है, हिन्दी भारत का स्वाभिमान है, हिन्दी भारत का गौरवगान है।आज हम जाने अनजाने में जिस प्रकार से भाषा के साथ मजाक कर रहे हैं, वह अभी हमें समझ में नहीं आ रहा होगा, लेकिन भविष्य के लिए यह अत्यंत दुखदायी होने वाला है। वर्तमान में प्राय: देखा जा रहा है कि हिन्दी की बोलचाल में अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का समावेश बेखटके हो रहा है। इसे हम अपने स्वभाव का हिस्सा मान चुके हैं, लेकिन हम विचार करें कि क्या यह हिन्दी के शब्दों की हत्या नहीं है? हम विचार करें कि जब भारत में अंग्रेजी नहीं थी, तब हमारा देश किस स्थिति में था। 

हम अत्यंत समृद्ध थे, इतने समृद्ध कि विश्व के कई देश भारत की इस समृद्धि से जलन रखते थे। इसी कारण विश्व के कई देशों ने भारत की इस समृद्धि को नष्ट करने का तब तक षड्यंत्र किया, जब तक वे सफल नहीं हो गये। हमें एक बात ध्यान रखना होगा कि हम अंग्रेजी को केवल एक भाषा के तौर पर स्वीकार करें। भारत के लिए अंग्रेजी केवल एक भाषा ही है। जब हम हिन्दी को मातृभाषा का दर्जा देते हैं तो यह भाव हमारे स्वभाव में प्रकट होना चाहिए। हिन्दी हमारा स्वत्व है। इसलिए कहा जा सकता है कि हिन्दी हृदय की भाषा है।

भाषाओं के मामले में भारत को विश्व का सबसे बड़ा देश निरूपित किया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। भारत दक्षिण के राज्यों में अपनी एक भाषा है, जिसे हम विविधता के रूप में प्रचारित करते हैं। कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि राजनीतिक कारणों के प्रभाव में आकर दक्षिण भारत के कुछ लोग हिन्दी का विरोध करते हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में जो भाषा बोली जाती है, उसका हिन्दी भाषियों ने सदैव सम्मान किया है। भाषा और बोली तौर पर भारत की एक विशेषता यह भी है कि चाहे वह दक्षिण भारत का राज्य हो या फिर उत्तर भारत का, हर प्रदेश का नागरिक अपने शब्दों के उच्चारण मात्र से यह प्रदर्शित कर देता है कि वह किस राज्य का है। 

प्राय: सुना भी होगा कि भाषा को सुनकर हम उसका राज्य या अंचल तक बता देते हैं। यह भारत की बेहतरीन खूबसूरती ही है। जहां तक राष्ट्रीयता का सवाल आता है तो हर देश की पहचान उसकी भाषा भी होती है। हिन्दी हमारी राष्ट्रीय पहचान है। दक्षिण के राज्यों के नागरिकों की प्रादेशिक पहचान के रूप में उनकी अपनी भाषा हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय पहचान की बात की जाए तो वह केवल हिन्दी ही हो सकती है। 

हालांकि आज दक्षिण के राज्यों में हिन्दी को जानने और बोलने की उत्सुकता बढ़ी है, जो उनके राष्ट्रीय होने को प्रमाणित करता है। आज पूरा भारत राष्ट्रीय भाव की तरफ कदम बढ़ा रहा है। हिन्दी के प्रति प्रेम प्रदर्शित हो रहा है।

आज हमें इस बात पर भी मंथन करना चाहिए कि भारत में हिन्दी दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। भारत में अंग्रेजी दिवस और उर्दू दिवस क्यों नहीं मनाया जाता। इसके पीछे यूं तो कई कारण हैं, लेकिन वर्तमान का अध्ययन किया जाये तो यही परिलक्षित होता है कि आज हम स्वयं ही हिन्दी के शब्दों की हत्या करने पर उतारू हो गये हैं। ध्यान रखना होगा कि आज जिस प्रकार से हिन्दी के शब्दों की हत्या हो रही है, कल पूरी हिन्दी भाषा की भी हत्या हो सकती है। हम विचार करें कि हिन्दी भारत के स्वर्णिम अतीत का हिस्सा है। हिन्दी हमारी संस्कृति का हिस्सा है। ऐसा हम अंग्रेजी के बारे में कदापि नहीं बोल सकते।

आज हिन्दी को पहले की भांति वैश्विक धरातल प्राप्त हो रहा है। विश्व के कई देशों में हिन्दी के प्रति आकर्षण का आत्मीय भाव संचरित हुआ है। वे भारत के बारे में गहराई से अध्ययन करना चाह रहे हैं। विश्व के कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम संचालित किए जाने लगे हैं। विश्व के कई देशों के नागरिक हिन्दी के प्रति अनुराग दिखा रहे हैं। इतना ही नहीं आज विश्व के कई देशों में हिन्दी के संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं। जो वैश्विक स्तर पर हिन्दी की समृद्धि का प्रकाश फैला रहे हैं। 

भारत के साथ ही सूरीनाम फिजी, त्रिनिदाद, गुआना, मॉरीशस, थाईलैंड व सिंगापुर में भी हिन्दी वहां की राजभाषा या सह राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। इतना ही नहीं आबूधाबी में भी हिन्दी को तीसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता मिल चुकी है। आज विश्व के लगभग 44 ऐसे देश हैं जहां हिन्दी बोलने का प्रचलन बढ़ रहा है। सवाल यह है कि जब हिन्दी की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, तब हम अंग्रेजी के पीछे क्यों भाग रहे हैं। हम अपने आपको भुलाने की दिशा में कदम क्यों बढ़ा रहे हैं। (लेखिका, पीजीवी महाविद्यालय ग्वालियर में सहायक प्राध्यापक हैं।)

Published / 2023-01-07 06:39:37
कोविड प्रबंधन का मोदी मॉडल विश्व के लिए मिसाल...

श्याम कुमार पाण्डेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कोविड ने फिर से दस्तक दे दी है। पिछले तीन हफ्तों में चीन में लगभग 25 करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं। लाखों लोगो की मृत्यु के समाचार आ रहे हैं। हर तरफ त्राहि-त्राहि मची है। जापान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी आदि में भी रोज लाखों लोग संक्रमित हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि पिछले दो भयावह वर्षों की पुनरावृत्ति होने को है। पूरा विश्व सहमा हुआ है पर भारतवासी लगभग सामान्य जीवन जी रहे हैं और देशों के आंकड़ों के सामने, हमारे यहां संक्रमितों की संख्या मात्र कुछ सौ और हजार में है। यहां ऐसा लगता है जैसे कि देश में कोविड पूरी तरह से समाप्त हो गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के कोविड डैशबोर्ड के अनुसार 26 दिसंबर को देश में संक्रमित लोगों की संख्या मात्र 3428 थी। इसकी तुलना में विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में 25 दिसंबर को समाप्त हुए हफ्ते में ही 35 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए।

यह क्या संयोग मात्र है कि हम आज इतनी बेहतर स्थिति में हैं या यह भारत सरकार का कुशल प्रबंधन है, जिसने सदी की सबसे भयावह महामारी से डटकर लोहा लिया और देश को एक बड़े खतरे से बचा लिया? याद कीजिये 2020 के वे शुरुआती दिन जब बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया संस्थान यह भविष्यवाणी कर रहे थे की भारत इस विपदा से निपट नहीं पायेगा। लाशों के अंबार लग जायेंगे। शायद उनके जहन में 2014 से पहले का भारत था। पर जिस तरह से भारत ने अपने संसाधनों को विकसित किया, अत्यंत कम समय में अत्यंत प्रभावी वैक्सीन बनायी और न केवल देश में 220 करोड़ डोज सफलतापूर्वक और कुशल प्रबंधन से लगायी बल्कि दुनिया के अनेक देशों में भी वैक्सीन-मैत्री के माध्यम से अनेक जिंदगियां बचाईं।

इसने पूरे विश्व को हतप्रभ कर दिया। देशवासियों को विश्वास हो गया कि ऐसी महामारी में भी हम सुरक्षित हैं और इसी विश्वास ने न केवल देश की सामान्य जिंदगी को बल्कि अर्थव्यवस्था को भी तेजी से पटरी पर वापस लौटाने में बड़ी भूमिका निभायी।

आज यही विश्वास है जो हमें सुरक्षित रखे हुए हैं और इस विश्वास के पीछे है भारत का असीम अनुभव और कुशल नेतृत्व। अपने पिछले तीन वर्षो के अनुभव और संघर्ष की वजह से हम पहले से कही ज्यादा तैयार हैं। हमारी वैक्सीन दुनिया की सबसे प्रभावी वैक्सीन में से एक है। अमेरिका में व्हाइट हाउस के मुख्य चिकित्सीय सलाहकार डॉ फॉची का तो यह कहना है कि भारत की कोवैक्सीन कोविड के 617 वैरिएंट को निष्क्रिय करने में सक्षम है।

ज्ञात हो कि देश के 90 फीसद लोगों को देश में बनी वैक्सीन की डबल डोज लग चुकी है। प्रसिद्ध डॉक्टर देवी शेट्टी के अनुसार देश के 90 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं जिसकी वजह से हममें अच्छी हाइब्रिड इम्यूनिटी विकसित हो गयी है, जो कि कोरोना के किसी भी रूप के विरुद्ध हमारा सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। पर इसके साथ ही हमारा स्वास्थ्यगत ढांचा भी आज 2020 की तुलना में कही अधिक मजबूत है। अब देश में पहले की तुलना में अधिक हॉस्पिटल बेड, सैकड़ों गुना अधिक ऑक्सीजन युक्त बेड हैं।

 महामारी के लिए चिह्नित आइसोलेशन बेड तो पहले के 10,180 की तुलना में अब 18 लाख से ज्यादा हैं। इसी तरह से आईसीयू बेड की संख्या भी सैकड़ों गुना बढ़ गई है। पीपीटी किट, वेंटिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर आदि अब सभी देश में ही तैयार हो रहे हैं और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। टेस्टिंग सेंटर भी अब पहले के 30 हजार प्रतिदिन की जगह 20 लाख टेस्ट प्रतिदिन करने में सक्षम हैं।

आज भी जहां देश में लगभग 90 हजार वैक्सीनेशन और 35 हजार टेस्ट प्रतिदिन हो रहे हैं और देश भर का पूरा डेटा संभल कर रखा जा रहा है और अब ऐतिहातन भारत सरकार के निर्देशानुसार देश के सभी एयरपोर्ट और सार्वजनिक स्थानों पर यादृच्छिक (रैंडम) टेस्टिंग शुरू हो गयी है वहीं प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार संक्रमित व्यक्तियों के सैंपल की जिनोम टेस्टिंग भी करायी जा रही है जिससे नये बीएफ 7 वैरिएंट का पता चल सके।

सरकार की यह सामायिक पहल देशवासियों के लिए भी संकेत है कि जहां हम भले ही शेष दुनिया के तुलना में बहुत बेहतर स्थिति में हों, हमें फिर भी सावधानी रखने की पूरी जरूरत है। भले ही हमारी प्रतिरोधक क्षमता अब बहुत बढ़ गयी है और देश में कोरोना लगभग पूरी तरह से समाप्त हो गया है, फिर भी बहुत सतर्क रहने की आवश्यकता है। देशवासियों को सरकार के निर्देशों का पालन करना चाहिए, अगर बूस्टर डोज नहीं लगवाई है, तो लगवाना चाहिए। सार्वजानिक स्थानों पर मास्क का उपयोग अनिवार्यतः करना चाहिए।

हमारा तीन सालों का अनुभव, हमारे मेहनती स्वास्थ्यकर्मी, हमारा पहले से कहीं बेहतर स्वास्थ्य तंत्र और सबसे ऊपर हमारे अभिभावक स्वरूप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कुशल नेतृत्व हमें इस बात की गारंटी देता है कि अब पहले जैसे किसी भी दुःस्वप्न की पुनरावृत्ति नहीं होगी। फिर भी हमें एक बार फिर से याद रखना और दोहराना होगा- दो गज दूरी, मास्क है जरूरी...। इसके पहले भी कई प्रसंगों में मोदी जी ने मिसाल के रूप में विश्व को बता दिया है। हर संकट या चुनौतियों को अवसर में परिवर्तित करने का मादा वो रखते हैं। इस संकट से बाहर आकर पूरे विश्व को उन्होंने यही संदेश दिया है-

नहीं रुकेंगे बढ़े कदम
मंजिल पर ही लेंगे दम

(लेखक, भारतीय जनता पार्टी के निवर्तमान राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-07 06:29:15
गढ़े जा रहे शब्द और निराशा की आहट

डॉ राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्व की प्रमुख डिक्शनरियां हर साल शामिल किये गये प्रमुख शब्द जारी करती हैं। यह शब्द दुनिया की हकीकत बयां करने के लिए काफी होते हैं। इसको साल के पहले नंबर के एक शब्द से ही नहीं आंका जा सकता। साल के अन्य शब्दों को भी देखना होता है। इनसे साफ हो जाता है कि दुनिया जा किधर रही है। लोगों में क्या हलचल है। सकारात्मकता या नकारात्मकता कहां तक पहुंच रही है। इनमें भविष्य का संदेश छिपा होता है। साल 2022 के प्रमुख शब्द गैसलाइटिंग हो या परमाक्राइसिस या कीव हो या पार्टीगेट, कोविड हो या वार्महाउस यह सभी शब्द प्रमुख शब्दों के रूप में चयनित किये गये हैं। यह वैश्विक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।

ब्रिटेन के अंग्रेजी शब्दकोष कोलिन्स द्वारा इस वर्ष के लिए घोषित वर्ड ऑफ द ईयर परमाक्राइसिस हो या अमेरिका की डिक्शनरी मेरियम वेबस्टर का गैसलाइटिंग। इन दोनों से आज की दुनिया के हालात साफ हो जाते हैं। यह कोई शब्दमात्र नहीं हैं। यह अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना घर कर रहे लोगों की मनोदशा को दर्शाते हैं। परमाक्राइसिस परमानेंट और क्राइसिस दो शब्दों से बना लगता है। साफ है कि परमानेंट के मायने स्थाई है तो क्राइसिस का अर्थ है संकट। इसी तरह से गैसलाइटिंग भी दरअसल व्यक्ति के मानसिक रूप से कुंठाग्रस्त और हीनभावना की ओर इंगित करता है। 

दोनों ही डिक्शनरियों द्वारा खोजे गये साल के प्रमुख दस शब्द हालात की गंभीरता को दर्शाते हैं। कहीं दूर-दूर तक आशा की झलक दिखायी ही नहीं देती। दुनिया के देश आज जिस हालात से दोचार हो रहे हैं, यह उसी को दर्शाते हैं। ब्रिटेनका यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला ब्रेक्जिट हो या रूस-यूक्रेन युद्ध हो। जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते हालात हों या दुनिया के देशों के सामने अर्थव्यवस्था का संकट। साल 2023 में भी इन संकटों से मुक्ति आसान नहीं दिख रही।

फ्रांसीसी दार्शनिक एडगर मोरिन की माने तो दुनिया इंटरलॉकिंग के दौर में जा रही है। लाख प्रयासों के बावजूद कोरोना से पूरी तरह से मुक्ति नहीं मिली है। ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अभी हालात ज्यादा अच्छे नहीं हैं। कोरोना के बाद संकट का जो दौर आया उसके बाद भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं आयी है। एक-दूसरे देशों के प्रति वैमनस्यता भी कम नहीं हो रही है। लोगों को लगने लगा है कि दुनिया अब ऐसे संकट के दौर से गुजर रही है जिसका स्थायी समाधान निकट भविष्य में दिख नहीं रहा।

कोलिंस द्वारा इस साल सामने लाए गए अन्य शब्दों में कीव है। इसके अलावा दूसरा शब्द पार्टीगेट है। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जानसन द्वारा जून 20 को कोविड पाबंदियों के बावजूद जन्मदिन की पार्टी करना और उसके बाद के हालातों से पार्टीगेट शब्द चल निकला है। इसी तरह से स्पोर्ट्सवाकिंग शब्द प्रमुख दस शब्दों में शुमार है। वार्मबैंक का चलन भी काफी रहा। यह जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में हो रहे बदलाव से चिंतित दुनिया की पीड़ा व्यक्त करता है। खास बात यह है 2022 में सामने आए दस प्रमुख शब्दों में से निराशा से आशा का संचार करता एक भी शब्द सामने नहीं आया है। इससे स्वतः ही आज की दुनिया के हालात बयां हो जाते हैं।

1938 में जब पहली बार पैट्रिक हैमिल्टन द्वारा लिखित नाटक गैसलाइटिंग खेला गया होगा तब इसकी कल्पना नहीं की गई होगी। इस नाटक पर दो फिल्में बन चुकी हैं। गैसलाइटिंग कोई गैस जलाने वाला लाइटर नहीं होकर मानसिक व मनोवैज्ञानिक रूप से अंदर तक जला देने वाली क्रिया हैं। होना तो यह चाहिए कि कोई व्यक्ति मानसिक या सामाजिक रूप से कमजोर है तो उसे संबल दिया जाए पर होने लगा उल्टा है। 21 वीं सदी में यह सब होना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। प्रतिस्पर्धा का दौर ऐसा चल निकला है कि दूसरे को नीचा दिखाना हमारी आदत में आ गया है।

 यह सब तब है जब अभी हम कोरोना के संकट से पूरी तरह से निजात नहीं पा सके हैं। कोरोना का नया वेरियंट सामने हैं। चीन में हालात बदतर होते जा रहे हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-07 06:21:55
अब लगातार नीचे गुड़क रही है अंग्रेजी...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत से अंग्रेजों को विदा हुए तो 75 वर्ष हो गये लेकिन भारत के भद्रलोक पर आज भी अंग्रेजी सवार है। देश का राज-काज, संसद का कानून, अदालतों के फैसलों और ऊंची नौकरियों में अंग्रेजी का वर्चस्व बना हुआ है। ज्यों ही इंटरनेट, मोबाइल फोन और वेबसाइट का दौर चला, लोगों को लगा कि अब हिंदी और भारतीय भाषाओं की कब्र खुद कर ही रहेगी।

ये सब आधुनिक तकनीकें अमेरिका और यूरोप से उपजी हैं। वहां अंग्रेजी का बोलबाला है। ये तकनीकें भारत में भी तूफान की तरह फैल रही थीं। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते थे लेकिन मोबाइल फोन, इंटरनेट या वेबसाइटों का इस्तेमाल करना चाहते थे, उन्हें मजबूरन अंग्रेजी (कामचलाऊ) सीखनी पड़ती थी लेकिन भारत के भद्रलोक को अब पता चला है कि उल्टे बांस बरेली पहुंच गये हैं। हिंदी के एक अखबार ने जो ताजातरीन सर्वेक्षण छापा है, वह भारतीय भाषा प्रेमियों को गदगदायमान कर रहा है। उसके अनुसार देश के 89 प्रतिशत लोग स्वभाषाओं का प्रयोग करते हैं।

अंग्रेजी लिखने, बोलने, समझनेवालों की संख्या देश में सिर्फ 12.85 करोड़ यानी मुश्किल से 10 प्रतिशत है। सिर्फ ढाई लाख लोगों ने अपनी मातृभाषा अंग्रेजी बता दी है। कितने शर्म की बात है कि हमारे देश में इन ढाई लाख लोगों की मातृभाषा भारत के 140 करोड़ लोगों की दादीभाषा बनी हुई है? लेकिन खुशी की बात यह है कि 90 के दशक में इंटरनेट की 80 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी में होती थी, अब वह 50 प्रतिशत के आस-पास लुढ़क गई है यानी लोग स्वभाषाओं का इस्तेमाल बड़ी फुर्ती से बढ़ाने लगे हैं।

इंटरनेट ने अनुवाद को इतना सरल बना दिया है कि आप दुनिया की प्रमुख भाषाओं की सामग्री कुछ क्षणों में ही अपनी भाषा में बदल सकते हैं। अनुवाद का उद्योग आजकल अकेले भारत में 4.27 लाख करोड़ रुपये का हो गया है। जाहिर है कि भारत में सिर्फ विदेशी भाषाओं से ही देशी भाषाओं में अनुवाद नहीं होता, स्वदेशी भाषाओं में भी एक-दूसरे का अनुवाद होता है। भारत में दर्जनों भाषाएं हैं, इसीलिए यह दुनिया का सबसे बड़ा अनुवाद उद्योग घराना शीघ्र ही बन जायेगा। इससे भारत की एकता सबल होगी और पारस्परिक भाषाई विद्वेष भी घटेगा।

भारत की फिल्में भारत में ही नहीं, पड़ोसी देशों में भी बड़े उत्साह से देखी जाती हैं। यदि उनका रूपांतरण भी उनकी भाषाओं में सुलभ होगा तो इन सब देशों की एकता और सांस्कृतिक समीपता में वृद्धि होगी। भारतीय जनता को भी पड़ोसी देशों के अखबारों और फिल्मों का लाभ इस अनुवाद प्रक्रिया के जरिए जमकर मिलता रहेगा। यदि संपूर्ण दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में हम भाषाई सेतु खड़ा कर सकें तो कुछ समय में ही हम संपूर्ण आर्यावर्त्त क्षेत्र को यूरोप से अधिक संपन्न और शक्तिशाली बना सकते हैं। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-04 20:57:04
राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के हर कदम पर नफरत के बीज

सुरेश हिन्दुस्थानी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को यह कहकर प्रचारित किया जा रहा है कि यह यात्रा नफरत नहीं सद्भाव के लिए है, लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अब सद्भाव की बातें केवल नारा ही बनकर रह गई हैं। यात्रा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, ठीक वैसे ही यात्रा का उद्देश्य भी सामने आता जा रहा है। हालांकि यात्रा के प्रथम दिन से ही ऐसे लोगों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है, जो किसी न किसी रूप में देश की संस्कृति के लिए विरोधात्मक रवैया अपनाते रहे हैं। 

भारत जोड़ो यात्रा में कभी देश तोड़ने के समर्थक शामिल होते हैं, तो कभी वामपंथी एजेंडा के तहत राजनीति करने वाले राहुल गांधी के साथ चलते दिखाई देते हैं। जहां तक सद्भाव की बात है तो यह शब्द भारत के लिए नया नहीं है और न ही इसे कांग्रेस की उपज कहा जा सकता है। लेकिन यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने अपनी नीतियों के माध्यम से हमेशा हिन्दू समाज मानबिंदुओं पर कुठाराघात ही किया है, चाहे वह राम मंदिर का मामला हो या फिर सांप्रदायिक हिंसा अधिनियम प्रस्ताव, यह दोनों ही हिंदुओं की भावनाओं का कुचलने का एक दुस्साहसिक प्रयास ही था।
हम भली भांति जानते हैं कि भारत की संस्कृति कभी भी नफरत के वातावरण का समर्थन करने वाली नहीं रही, इसलिए सवाल यह है कि देश में नफरत के भाव का बीजारोपण किसने किया। क्या इसके लिए लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस की सत्ता जिम्मेदार नहीं है? क्या टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने में कांग्रेस नेताओं की भूमिका नहीं रही? इसमें तो स्वयं राहुल गांधी ही उनका समर्थन करने पहुंचे थे। 

इन बातों से लगता है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। वे बात कुछ और करते हैं, लेकिन उनकी बातों का असर उनकी कार्यशैली में दिखाई नहीं देता। वर्तमान में राहुल गांधी की केवल एक ही शैली दिखाई देती है, वह है केवल देश को नीचा दिखाने की शैली। सांप्रदायिक सद्भाव तो भारत का मूल है, लेकिन राहुल गांधी को आज यह बात समझ में आई है। लेकिन इसके बाद भी सवाल यह आता है कि उनकी यात्रा में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाले नेता या अन्य व्यक्ति क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इससे कांग्रेस के चरित्र का पता नहीं चलता? अगर कांग्रेस नेता वास्तव में सद्भाव के वातावरण का उत्थान चाहते हैं तो इसमें नफरत फैलाने वाले लोगों को शामिल नहीं करना चाहिए था। 

कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी यात्रा में ऐसे लोगों को शामिल करने का प्रयास करे, जिनकी पहचान शांति स्थापित करने वाली रही हो। ऐसे प्रयासों के लिए राजनीतिक विचार को तिलांजलि देना पड़े तो दे देना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक विचार ही नफरत की भावना को बढ़ावा देने का कार्य करता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कांग्रेस नेताओं के मन में वर्तमान केंद्र सरकार के प्रति द्वेष भाव भरा हुआ है। द्वेष भाव को धारण करने वाला व्यक्ति कभी भी सद्भाव नहीं ला सकता। देश भावना यही कहती है कि हम अच्छी बातों का दिल खोलकर स्वागत करें और भारतीय संस्कृति के विरोध में उठने वाले हर कदम का विरोध करें। कांग्रेस की अवधारणा के बारे में कुछ लोगों में यह सवाल उठता है कि कांग्रेस ईसाई और मुसलमानों के बारे कभी विरोधात्मक शैली नहीं अपनाती। इनके गलत कामों पर भी कांग्रेस के नेता मौन साध लेते हैं। 

हो सकता है कि यह सहजता में होता हो, लेकिन जितने मुंह उतनी बातें तो होती ही हैं। अभी यात्रा के बारे में भी यह सवाल उठने लगा है कि कांग्रेस ने इसी समय भारत जोड़ो यात्रा को विराम क्यों दिया है? कहने वाले तो यहां तक कहने लगे हैं कि यह यात्रा केवल क्रिसमस और अंग्रेजी नया साल मनाने में कोई व्यवधान न हो, इसलिए ही रोकी गई है। यह सभी जानते हैं कि अंग्रेजी नव वर्ष प्राकृतिक त्योहार नहीं है और न ही इसका प्रकृति से कोई संबंध ही है, फिर क्यों इसको बढ़ावा देने का कार्य किया जा रहा है। यह भी सर्वविदित ही है कि हम प्रकृति का साथ देंगे तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी। 

आज समाज का बहुत बड़ा वर्ग यह कहने का साहस जुटाने लगा कि एक जनवरी वाला नव वर्ष भारत का नहीं है। लेकिन कांग्रेस के नेता इस भारतीय धारणा को बदलने का प्रयास करते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी अगर अपने आपको हिंदू मानते हैं तो उन्हें हिन्दू होने का परिचय अपनी कृति से देना ही होगा। अगर ऐसा होगा तो वह सांप्रदायिक सद्भाव को सही मायने में समझने लगेंगे। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा निसंदेह एक तपस्या है। देश में एकता स्थापित करने के लिए ऐसी यात्राएं पहले भी हो चुकी हैं। आद्य शंकराचार्य ने भी भारत में सांस्कृतिक ज्ञान का संदेश प्रवाहित करने के लिए ऐसी ही यात्रा की थी। हम तो चाहते हैं कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के माध्यम से देश को मजबूत करने का कार्य करें, लेकिन ऐसी यात्राओं के लिए निकलने से पहले मन में विरक्ति का भाव भी होना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी के मन में चल रहे विचारों को देखकर ऐसा लगता नहीं है कि उनके स्वभाव में विरक्ति है। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान महाराष्ट्र में वीर सावरकर का उल्लेख करते समय नफरत का ही परिचय दिया। इसलिए कहा जा सकता है कि जब नफरत के बीजों का अंकुरण उनके मन में ही हो रहा है तो सद्भाव के फूल कैसे खिलेंगे। 

कांग्रेस नेताओं के मन में जब तक ऐसा भाव रहेगा, तब तक कितनी भी यात्राएं निकाल लें, वे देश का मन नहीं जीत सकते। देश का मन जीतने के लिए भारत की संस्कृति को मन और मस्तिष्क में धारण करना होगा। तभी भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सफल होगा। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2023-01-04 20:54:02
दो गज की दूरी, मास्क जरूरी

ऋतुपर्ण दवे

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दुनिया एक बार फिर कोरोना की दहशत में है। नए वेरिएंट बीएफ.7 की तबाही का मंजर डरावना है। सबसे ज्यादा खौफ चीन से आ रही तस्वीरों और वीडियो ने है। चीन की विफल जीरो कोविड पॉलिसी से सारी दुनिया में एक बार फिर गुस्सा और नफरत है। व्यापार को बढ़ाने के लिए हल्के-फुल्के, बेअसर और सस्ते उत्पादों को बनाकर इंसानियत को भी नहीं बख्शने वाले चीन ने जिस तेजी से पहले 6 वैक्सीन बनाकर खूब वाहवाही लूटी बाद में इनके धड़ाधड़ बेअसर होने की सच्चाई ने दुनिया को हैरान और परेशान कर दिया है। 

जल्दबाजी में बनी चीन की वैक्सीन जिफिवैक्स, कॉन्विडेसिया, कॉनवेक, कोविलो, वेरो सेल और कोरोनावैक दुनिया में खूब बिकी। जब ये वैसा असर नहीं दिखा पाईं तो हो हल्ला मचा। सच तो यह है कि चीन खुद अपने हल्के और घटिया उत्पादों को लेकर न केवल घिर गया बल्कि सकते में है। सबसे ज्यादा बेअसर दो वैक्सीन कोविलो और वोरो सेल रहीं। इसे एक ही कंपनी सिनोफॉर्म ने बनाया था। जीरो कोविड पॉलिसी के चलते लगातार लॉकडाउन जैसी तानाशाही भरी चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिन की सख्ती ने वहां गृह युद्ध जैसे हालात बना दिए। महीनों से घरों में कैद लोगों के सब्र का बांध भी टूटा। मौत का मंजर और लाशों का ढेर अब चीन छुपा नहीं पा रहा। वैसे चीन अपनी करतूतों को छुपाने और सच को बाहर न आने देने के लिए पहले से ही दुनिया में बदनाम है। उसने कोरोना जैसे मामलों पर भी विश्व स्वास्थ्य संगठन तक को गच्चा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

साल के आखिरी दिन भी डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोन गेब्रेयेसस ने चीन को फटकारते हुए सच्चाई साझा करने और भारत से सीख लेने की नसीहत दी। वुहान से निकले चीनी शैतान के इलाज की खातिर उसकी वैक्सीन के खरीदार देश बेचैन हैं। इस बीच चीन का यह अहम भी टूटा है कि कोरोना फैलाना और काबू करना उसके लिए चुटकियों का खेल है। भारत पहले भी सतर्क था और अब भी है। तब और अब में फर्क इतना है कि महामारी का खौफनाक मंजर और मौतों के सच से सीख लेकर इस बार वैसा कुछ नहीं होने देने की कवायद है जो घट चुका है। कोरोना से दुनिया भर में बीते 26 महीनों के दौरान करीब साढ़े 57 लाख लोगों की जान गई है। 

चंद आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका में 9,24,530, ब्राजील में 6,31,069, भारत में 5,30,702, रूस में 3,34,753, मैक्सिको में 3,08,829, पेरू में 2,06,646, यूके में 1,57,984, इटली में 1,48,167, इंडोनेशिया में 1,44,453, ईरान में 1,32,681 लोग जान गंवा चुके हैं। अभी भारत में दैनिक संक्रमण दर करीब 0.17 प्रतिशत है। साल के आखिरी दिन 1,57,671 टेस्ट किए गए। नए साल की शुरुआत के साथ ही भारत में ओमिक्रोन के नए सब वेरिएंट एक्सबीबी.1.5 के मिलने से चिंता बढ़ गई है। पहला मामला गुजरात में मिला है। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन यानी सीडीएस के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका भर में इसके 40 प्रतिशत से ज्यादा मामले सामने आए हैं। बहरहाल भारत में नए साल की सुबह तक कोरोना के 265 मामले सामने आए और सक्रिय मामलों की संख्या 3,653 रही। 

विदेशी हवाई यात्रियों की रैंडम जांच में संक्रमण मिलना और पहले आ चुके कुछ यात्रियों का कोरोना संक्रमित होना चिंताजनक है। शंघाई के देजी अस्पताल का वी चैट मैसेज बताता है कि केवल शहर में बीते हफ्ते 54.3 लाख पॉजिटिव मामले थे। अब यह संख्या सवा करोड़ से ज्यादा पहुंच गई होगी। यही सच छुपाना पहले भी पूरी दुनिया पर भारी पड़ा और दोबारा भारी पड़ने वाला है? ऐसे में पड़ोसी होने के चलते भारत की चिंता जरूरी है। जापान, दक्षिण कोरिया और अमेरिका समेत कई देशों में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उच्चस्तरीय बैठक लेना गंभीरता को बताता है। भारत में एक बार फिर एहतियात का दौर शुरू होना तय है। निश्चित रूप से व्यापार जगत चिंतित है। दोबारा मास्क जरूरी होगा, सेनिटाइजर, साबुन से हाथ धोना, सामाजिक दूरी का पालन करना तथा भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचने की एडवायजरी जारी हो सकती है। हालांकि भारत में दोनों खुराक और बूस्टर डोज मिलाकर अब तक 220 करोड़ लोगों का वैक्सीन लेना रहात की बात है। भारत में बीती लहर में तेजी से संक्रमित हो चुके लोगों में हाइब्रिड इम्युनिटी के चलते खतरा कम है लेकिन सतर्कता जरूरी है। 

शायद सारी कवायद इस बार इसी पर ज्यादा है। अब भी कइयों ने बूस्टर डोज नहीं ली है जिसे विशेषज्ञ जरूरी बता रहे हैं। इसलिए क्यों न हम अभी से दो गज की दूरी, मास्क जरूरी पर अमल कर पुराने अनुभवों से कोरोना के लिए खुद ही चुनौती बन जायें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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