विचार

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Published / 2023-01-18 08:17:08
देश में बढ़ती गरीबी-अमीरी की खाई

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजकल हम भारतीय लोग इस बात से बहुत खुश होते रहते हैं कि भारत शीघ्र ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। लेकिन दुनिया के इस तीसरे सबसे बड़े मालदार देश की असली हालत क्या है? इस देश में गरीबी भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है, जितनी तेजी से अमीरी बढ़ रही है। अमीर होने वालों की संख्या सिर्फ सैकड़ों में होती है लेकिन गरीब होनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। 

ऑक्सफॉम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो साल में सिर्फ 64 अरबपति बढ़े हैं। सिर्फ 100 भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 54.12 लाख करोड़ रुपेय है यानी उनके पास इतना पैसा है कि वह भारत सरकार के डेढ़ साल के बजट से भी ज्यादा है।

सारे अरबपतियों की संपत्ति पर मुश्किल से दो प्रतिशत टैक्स लगता है। इस पैसे से देश के सारे भूखे लोगों को अगले तीन साल तक भोजन करवाया जा सकता है। यदि इन मालदारों पर थोड़ा ज्यादा टैक्स लगाया जाए और उपभोक्ता वस्तुओं का टैक्स घटा दिया जाए तो सबसे ज्यादा फायदा देश के गरीब लोगों को ही होगा। अभी तो देश में जितनी भी संपदा पैदा होती है, उसका 40 प्रतिशत सिर्फ एक प्रतिशत लोग हजम कर जाते हैं जबकि 50 प्रतिशत लोगों को उसका तीन प्रतिशत हिस्सा ही हाथ लगता है। अमीर लोग अपने घरों में चार-चार कारें रखते हैं और गरीबों को खाने के लिए चार रोटी भी ठीक से नसीब नहीं होती।

ये जो 50 प्रतिशत लोग हैं, इनसे सरकार जीएसटी का कुल 64 प्रतिशत पैसा वसूलती है जबकि देश के 10 प्रतिशत सबसे मालदार लोग सिर्फ तीन प्रतिशत टैक्स देते हैं। इन 10 प्रतिशत लोगों के मुकाबले निचले 50 प्रतिशत लोग छह गुना टैक्स भरते हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को अपनी रोजमर्रा के जरूरी चीजों को खरीदने पर बहुत ज्यादा टैक्स भरना पड़ता है, क्योंकि वह बताए बिना ही चुपचाप काट लिया जाता है। इसी का नतीजा है कि देश के 70 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति देश के सिर्फ 21 अरबपतियों से भी कम है।

साल भर में उनकी संपत्तियों में 121 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। अब जो नया बजट आने वाला है, शायद सरकार इन ताजा आंकड़ों पर ध्यान देगी और भारत की टैक्स-व्यवस्था में जरूर कुछ सुधार करेगी। देश कितना ही मालदार हो जाए लेकिन यदि उसमें गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ती गई तो वह संपन्नता किसी भी दिन हमारे लोकतंत्र को परलोकतंत्र में बदल सकती है। यह हमने पिछली दो सदियों में फ्रांस, रूस और चीन में होते हुए देखा है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-17 06:44:31
धंसती जमीन और जोशीमठ...

पवन कुमार पांडेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हिमालय के गढ़वाल इलाके में स्थित तीर्थ जोशीमठ में मिट्टी के धसकने की खबरें लगातार सामने आयीं। इसकी वजह से घरों को नुकसान पहुंचा और लोगों की जिंदगी का भी खतरा उत्पन्न हुआ है। इस विषय में प्रकाशित खबरों और टिप्पणियों में उचित ही कहा गया कि अतीत में इससे संबंधित चेतावनियों की अनदेखी की गयी।

 हिमालय के एक हिस्से में भूस्खलन का खतरा पहले से मौजूद है और वहां इसके अलावा भी कई खतरे हैं क्योंकि वनों की जमकर कटाई हुई है। ऐसे में वहां महत्त्वाकांक्षी रेल, सड़क, जलविद्युत परियोजनाओं तथा अन्य परियोजनाओं के कारण पर्यावरण को हुई क्षति के बारे में भी उचित ही बातें कही गयी हैं।

जोशीमठ के हालात तथा उसे मिली मीडिया कवरेज के साथ ही पर्यावरण को लेकर एक बड़ी चिंता उत्पन्न हुई है: उत्तर भारत के मैदानी शहरों और कस्बों में ठंड के दिनों में हवा की गुणवत्ता खराब हो जाती है, शहरों में बीते वर्षों के दौरान कचरे के पहाड़ खड़े हो गये हैं, पानी जैसे अहम और दुर्लभ संसाधन का जमकर दुरुपयोग, जलवायु परिवर्तन के कारण हो चुका नुकसान मसलन हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना, औद्योगिक कचरे का समुचित निपटान न होना, आदि कई समस्याएं हमारे सामने हैं।

कुल मिलाकर संदेश यही है कि उपरोक्त बातों को लेकर जो चिंता जताई जा रही है वह प्रभावी कदमों में रूपांतरित नहीं हो पा रहा है, सुधार की बात तो छोड़ ही दी जाये। इस प्रकार देश की हवा, पानी, जमीन और वन आदि प्राकृतिक संपदा तथा पानी एवं खनिज आदि को जो भी नुकसान पहुंचा है उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है। कई पाठकों को यह बात चकित कर सकती है कि हरित अंकेक्षण जो टिकाऊ वृद्धि का आकलन सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी तथा जीडीपी वृद्धि को हासिल करने में प्राकृतिक पर्यावरण को हुए नुकसान के आधार पर करता है, वह दिखाता है कि भारत के समग्र हरित प्रदर्शन में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।

गत अक्टूबर में भारतीय रिजर्व बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित एक पर्चे में यही संदेश था लेकिन मीडिया ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हकीकत में पारंपरिक जीडीपी और हरित जीडीपी के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। यानी हरित जीडीपी पारंपरिक जीडीपी की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो हम अपनी खोई हुई जमीन दोबारा हासिल कर रहे हैं। अगर आपको लगता है कि यह नजर के सामने दिख रही हकीकत के उलट है तो पर्चा कई सरकारी पहलों को भी रेखांकित करता है जिनकी बदौलत सुधार आया है।

उनमें शामिल हैं: नवीकरणीय ऊर्जा को महत्त्वाकांक्षी गति, जीडीपी की प्रति यूनिट के हिसाब से घटी भौतिक खपत, एलईडी बल्ब और ऊर्जा खपत वाली गतिविधियों में अनिवार्य ऊर्जा अंकेक्षण जैसी गतिविधियों की बदौलत कम ऊर्जा घनत्व हासिल करना, पदार्थों के पुनर्चक्रण में इजाफा, स्वच्छ भारत पहल के तहत ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन, नमामि गंगे परियोजना आदि। इस पर्चे के लेखक मानते हैं कि हाल के वर्षों में आया कुछ सुधार आंकड़ों की बेहतर उपलब्धता के कारण है।

अगर गैर विशेषज्ञ के नजरिये से देखें तो आरबीआई बुलेटिन ग्रीन जीडीपी के आकलन की दिशा में पहला कदम है। इसमें आकलन के लिए जो प्रविधि अपनायी गयी है और जिसकी बदौलत निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनमें सुधार आएगा अगर आकलन और परिभाषाओं के क्षेत्र में और अधिक लोग काम करें। पर्चे में सकारात्मक संदेश निहित है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या हरित जीडीपी यह भी दर्शाता है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों के साथ क्या हो रहा है। इसे बैलेंस शीट संबंधी रुख में आंकना जरूरी है। समुचित आकलन ही सुधार की दिशा में पहला कदम है। सवाल यह है कि पारंपरिक जीडीपी के अनुमानों के साथ हरित जीडीपी के आंकड़े क्यों नहीं पेश किये जा सकते हैं? तब शायद सतत विकास को सही संदर्भ में समझा जा सके और उस पर बहस की जा सके।

इस बीच कुछ चयन करने होंगे और कुछ सवालों को भी हल करना होगा। जोशीमठ के आसपास के इलाकों में फिलहाल विनिर्माण गतिविधियां बंद कर दी गई हैं लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं के दोहराव को किस प्रकार रोका जायेगा। हिमालय तथा अन्य इलाकों में पर्यावरण को पहुंच रही क्षति को लेकर दी जा रही चेतावनियों की अनदेखी के परिणामों से कैसे बचा जायेगा? क्या पानी की खपत वाली धान और गन्ना जैसी फसलें हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे पानी की कमी वाले इलाकों में उगाई जानी चाहिए?

चूंकि खेती में अभी भी सबसे अधिक पानी लगता है इसलिए क्या किसानों को समझाया जा सकेगा कि वे इस कदर भूजल का दोहन न करें या धान जैसी फसलों की खेती के लिए कम पानी की खपत वाले विकल्प आजमाएं? क्या इंजीनियरों और विनिर्माण उद्योगों के गठजोड़ को तोड़ा जा सकेगा? क्या हम मजबूत नियामकीय तथा संबद्ध संस्थान बना सकते हैं जो पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित कर सकें? अगर ऐसा नहीं किया गया तो जोशीमठ से लगा झटका एक सप्ताह से ज्यादा नहीं टिकेगा।

Published / 2023-01-15 20:08:02
योगी पर उद्योग जगत का विश्वास...

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति से सत्ता तो नसीब हो सकती है, किन्तु इसका नुकसान अंततः सम्बन्धित प्रदेश को उठाना पड़ता है। ऐसी सरकारों में समीकरण महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनको दुरुस्त बनाये रखना सत्ता पक्ष की प्राथमिकता रहती है। इससे निवेश का मार्ग बाधित हो जाता है। उद्योग जगत की अनेक अपेक्षायें होती हैं। जिस प्रदेश में उन्हें सुविधाएं मिलती हैं, वह उधर का ही रुख करते हैं। इसमें कानून-व्यवस्था की स्थिति का सुदृढ़ होना पहली शर्त होती है। इसके साथ ही सिंगल विंडों सिस्टम, इज ऑफ डूइंग बिजनेस और बिजली की पर्याप्त आपूर्ति, बेहतर कनेक्टिविटी, लैंड बैक की स्थापना आदि की आवश्यकता होती है।

 उत्तर प्रदेश में करीब छह वर्ष पहले तक इन्हीं तत्वों का अभाव था। पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कुछ राज्य आज भी उसी दौर में हैं। भाजपा जदयू गठबंधन सरकार ने बिहार की छवि में सकरात्मक सुधार किया था। लेकिन नीतीश कुमार ने राजद से गठबंधन करके बिहार को एक बार फिर जंगल राज के दौर में पहुंचा दिया है।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने निवेश के अनुरूप माहौल बनाने का प्रभावी कार्य किया है। इसके लिए अपेक्षित सभी मोर्चों पर अभूतपूर्व सुधार हुआ है। यहां इनवेस्टर्स समिट और प्रस्तावों के शिलान्यास से अनेक अध्याय कायम हुए।अब उत्तर प्रदेश ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के लिए तैयार हो रहा है। इस संबंध में योगी आदित्यनाथ की मुंबई यात्रा उल्लेखनीय रही। 

योगी आदित्यनाथ पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने दिलायी थी। तब उन्होंने विश्वास व्यक्त किया था कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी उत्तम प्रदेश बनेगा। उनका कथन साकार हो रहा है। यह संयोग था कि इस बार मुंबई में योगी आदित्यनाथ की मुलाकात राम नाईक से भी हुई। योगी ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट के संदर्भ में मुंबई गये थे। उद्योगपतियों से उनकी सार्थक बैठक हुई। सभी ने उत्तर प्रदेश में निवेश के प्रति उत्साह दिखाया।

योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा सभा में कहा था कि पहले उत्तर प्रदेश की पहचान दंगे वाले, देश के विकास में बाधक बनने वाले प्रदेश के रूप में थी। लेकिन पिछले साढ़े पांच सालों में यूपी ने खुद को विकास के साथ जोड़ा है। बेहतरीन कानून-व्यवस्था लागू करके देश को एक नया मॉडल दिया। यूपी इज ऑफ डूइंग बिजनेस में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। राज्य बजट करीब साढ़े छह लाख करोड़ पहुंच गया है। 

छह लाख पंद्रह हजार करोड़ के बजट के बाद तैंतीस हजार करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया गया था। जिन राज्यों की आबादी कम है, वह घाटे का बजट पेश करते हैं। यूपी सरप्लस राजस्व वाला प्रदेश है। उत्तर प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था का इंजन बन रहा है। आज यूपी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश है। एक ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी वाला प्रदेश बनाने के लिए काम किया जा रहे है। पांच सालों में साढ़े चार लाख करोड़ से अधिक के निवेश आये हैं। अगले महीने समिट का आयोजन किया जा रहा है।

योगी सही कहते हैं कि यूपी में डेढ़ लाख करोड़ से अधिक का निवेश हुआ है। पांच वर्ष पहले करीब अस्सी हजार करोड़ निवेश हुआ था। वर्तमान सरकार विकास का विजन लेकर आगे बढ़ रही है। इसमें कोई दोराय नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि यूपी डेटा सेंटर का हब बन रहा है। पहली डिस्प्ले यूनिट चीन से यूपी में आयी। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में विभिन्न सेक्टर में तमाम ऐसे कार्य शुरू होने जा रहे हैं जिनसे उत्तर प्रदेश की पहचान को नया आयाम मिलेगा। इसमें चिकित्सा, कानून व्यवस्था, पर्यटन, शिक्षा और इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट पर खासा फोकस किया गया है। 

योगी आदित्यनाथ के एजेंडे में प्रदेश की कानून व्यवस्था शुरू से ही प्रमुखता पर रही है। इसी का नतीजा है कि प्रदेश में पिछले साढ़े पांच वर्षों में कानून का राज पूरी तरह से स्थापित हुआ है और अपराध की घटनाओं में काफी गिरावट दर्ज की गयी है।

नये साल पर अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने के साथ प्रदेश में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार ने पुलिस को अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस करने को लेकर ड्रोन की खरीदारी के लिए बजट जारी कर दिया है। करीब दो हजार बॉडी वार्न कैमरे आने वाले हैं। सभी थानों को सीसीटीवी से लैस किया जाना है। यूपीसीडा ने प्रदेश को वन ट्रिलियन इकोनॉमी बनाने व इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए पंद्रह हजार एकड़ से अधिक का लैंडबैंक तैयार कर लिया है। 

इसका मकसद है कि ग्लोबल समिट में आने वाली वैश्विक कंपनियों को यहां प्लांट और अपने प्रोजेक्ट लगाने में कोई असुविधा न हो। यूपीसीडा ने लैंडबैंक से कनेक्टिविटी को बेहतर करने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिये हैं। यूपीसीडी ने अन्य लैंडबैंक के लिए स्पिनिंग मिल्स की बंद इकाइयों की भूमि, स्कूटर इंडिया लखनऊ की डेढ़ सौ एकड़, गाजियाबाद की पांच एकड़, हरदोई की ढाई सौ एकड़ एवं अन्य ग्राम समाज इत्यादि की भूमि लेने की कार्रवाई शुरू कर दी है। 

औद्योगिक क्षेत्र के श्रमिकों के रहने के लिए डोरमेट्री तथा कम्युनिटी टॉयलेट्स का निर्माण युद्धस्तर पर किया जा रहा है। मुंबई में योगी आदित्यनाथ ने बैंकों व वित्तीय संस्थाओं से प्रदेश के विकास में सहभागी बनने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मादी ने देश को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर का आकार देने का निर्णय लिया है। इस सम्बन्ध में अलग-अलग सेक्टर चिह्नित करते हुए प्रदेश सरकार द्वारा सभी सेक्टरों में कार्रवाई की जा रही है। यूपी ग्लोबल समिट के सम्बन्ध में मुम्बई में विभिन्न बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के वरिष्ठ अधिकारियों से योगी ने संवाद किया है।

 उन्होंने बैंक अधिकारियों को आश्वस्त किया कि प्रदेश सरकार न केवल आपके पूरे सिस्टम और पूंजी की सुरक्षा की गारंटी लेगी, बल्कि हर प्रकार का सुरक्षित वातावरण भी प्रदेश में उपलब्ध कराने में अपना योगदान देगी। प्रदेश का पर्सेप्शन बदला है। प्रदेश का राजस्व बढ़ा है। आज उत्तर प्रदेश राजस्व सरप्लस स्टेट है। इस सदी की सबसे बड़ी महामारी का सामना और वित्तीय अनुशासन का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश ने सबका ध्यान आकर्षित किया है। आज देश व दुनिया के उद्यमी और निवेशक प्रदेश में निवेश करना चाहते हैं। 

ऐसा पहली बार हुआ कि राज्य में निवेश को आकर्षित करने के लिए प्रदेश सरकार की टीम देश से बाहर विश्व के अन्य देशों में गयी। इस टीम को लगभग साढ़े सात लाख करोड़ रुपये के निवेश के प्रस्ताव प्राप्त हुए। एक बिलियन डॉलर का जापान से भी निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। करीब एक लाख एमएसएमई यूनिटों के साथ उत्तर प्रदेश में देश का सबसे बड़ा आधार मौजूद है। 

इस सेक्टर को प्रमोट करने की एक जनपद, एक उत्पाद योजना संचालित है। यह देश की एक लोकप्रिय योजना है। इंटरनेशनल एयरपोर्ट अगले साल तक क्रियाशील हो जायेंगे। दस एयरपोर्ट पर वर्तमान सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है। पांच एयर, पोर्ट बनकर तैयार हो गये हैं। प्रदेश के पांच शहरों का मेट्रो की सुविधा से जोड़ा गया है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-15 10:01:21
संविधान ब्रह्मवाक्य नहीं है...

डॉ वेदप्रताप वैदिक

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयान पर हमारे विपक्षी नेता बुरी तरह से बिफर पड़े हैं। कांग्रेस के नेता उन्हें भाजपा सरकार का भोंपू बता रहे हैं और उन्हें उपराष्ट्रपति पद की प्राप्ति ममता-विरोध के फलस्वरूप बता रहे हैं और कुछ विपक्षी नेता उन्हें आपातकाल की जननी इंदिरा गांधी का वारिस बता रहे हैं। जैसे इंदिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय की इज्जत को 1975 में तहस-नहस कर दिया था, वैसा ही आरोप धनखड़ पर लगाया जा रहा है।

 इस तरह के आरोप लगाने वाले यह बतायें कि इंदिरा गांधी की तरह धनखड़ को क्या किसी अदालत ने कटघरे में खड़ा कर दिया है? वे अपना कोई मुकदमा तो सर्वोच्च न्यायालय में नहीं लड़ रहे हैं। वे स्वयं प्रतिभाशाली वकील रहे हैं। वे प्रखर वक्ता भी हैं। उन्होंने यदि संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन में संसद की सर्वोच्चता पर अपने दो-टूक विचार व्यक्त कर दिए तो यह उनका हक है। यदि वे गलत हैं तो आप अपनी बात सिद्ध करने के लिए जोरदार तर्क क्यों नहीं देते? आप तर्क देने की बजाय शब्दों की तलवार क्यों चला रहे हैं? संविधान की पवित्रता और मान्यता पर धनखड़ ने प्रश्न चिह्न नहीं लगाया है। उन्होंने जो मूल प्रश्न उठाया है, वह यह है कि सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है या संसद सर्वोच्च है?

देश के सारे न्यायालयों में तो सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है। इसमें किसी को कोई शक नहीं है। लेकिन वह संसद से भी ऊंचा कैसे हो गया? संसद चाहे तो एक ही झटके में सारे जजों को महाभियोग चलाकर पदमुक्त कर सकती है। संविधान ने ही उसे यह अधिकार दिया हुआ है। जहां तक संविधान के मूल ढांचे का प्रश्न है, किस धारा में उसे अमिट, अटल, और अपरिवर्तनीय लिखा है? वसंत साठे और मैंने तो लगभग 30 साल पहले देश में अध्यक्षीय शासन लाने का अभियान भी चलाया था। मैं तो आजकल चुनाव पद्धति का भी विकल्प ढूंढ रहा हूं। आप मूल ढांचे पर आंसू बहा रहे हैं, संसद चाहे तो पूरे संविधान को ही रद्द करके नया संविधान बना सकती है। क्या हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय ने बनाकर संसद को थमाया है?

सर्वोच्च न्यायालय तो अपने न्यायालयों के और अपने ही कई फैसले रद्द करता रहता है। उसके अपने फैसलों में सारे जजों की सर्वानुमति नहीं होती है। मूल ढांचे के फैसले में भी सात जज एक तरफ और छह जज दूसरी तरफ थे। भारतीय संविधान का मूल ढांचा क्या है, इसे सिर्फ अदालत को तय करने का अधिकार किसने दिया है? यदि संसद चाहे तो वह एकदम नया संविधान ला सकती है, जैसा कि हमारे कई पड़ोसी राष्ट्रों में हुआ है। हिटलर के मरने के बाद जर्मनी ने डर के मारे जो प्रावधान अपने संविधान के लिए किया था, उसकी अंधी नकल हमारे नेता और न्यायाधीश क्यों करें? 

हमारे देश में हिटलरी चल ही नहीं सकती और हमारा संविधान इतना लचीला है कि पिछले सात दशकों में उसमें लगभग सवा सौ संशोधन हो चुके हैं। इसीलिए इतने उत्थान-पतन के बावजूद वह अभी तक टिका हुआ है लेकिन संविधान संविधान है, कोई ब्रह्मवाक्य नहीं है। (लेखक, भारतीय विदेश परिषद नीति के अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-01-13 22:53:06
अपनी गलत नीतियों कारण तबाही के कगार पर है पाकिस्तान

डॉ अनिल कुमार निगम

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शासकों की गलत नीतियों के चलते आज पाकिस्तान तबाही के मुहाने पर खड़ा है। महंगाई आसमान छू रही है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है। वह विदेशी कर्ज तले दबा हुआ है। जनता रोजी और रोटी के लिए न केवल तरस रही है बल्कि एक दूसरे की जान लेने पर अमादा है। पड़ोसी देश श्रीलंका की तरह ही पाकिस्तान के कंगाली में डूबने से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। अगर पाकिस्तान की स्थिति और खराब होती है तो यहां पर चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप बढ़ सकता है, और अगर ऐसा होता है तो यह भारत के लिए प्रतिकूल स्थिति होगी। इसलिए भारत को इस स्थिति से कूटनीतिक तरीके से निबटना होगा।

वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान के शासकों की नीतियां अपने देश के जन्म के साथ ही विकास की जगह विध्वंसात्मक रही हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान में कभी लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सका और आजादी के बाद आधे से अधिक अवधि के दौरान पाकिस्तान पर सेना का शासन रहा है। गौरतलब है कि अंग्रेजों की चालबाजी एवं कुछ नेताओं के राजनीतिक स्वार्थ के परिणामस्वरूप अन्तत: भारत का विभाजन हुआ। विभाजन के बाद भी दोनों देशों के संबंधों में हमेशा तनाव बना रहा है। इस खटास ने दोनों देशों के बीच ऐसी खाईं पैदा कर दी है, जिसकी भरपाई होना नामुमकिन सा लगता है।

भारत के प्रति पाकिस्तान का रवैया प्रारंभ से ही कटुतापूर्ण रहा है। स्वतंत्रता वर्ष में ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया था। इसमें उसकी शिकस्त हुई थी। चूंकि स्वतंत्रता के पूर्व ही अंग्रेजी हुकूमत ने यह घोषणा कर दी थी कि भारत की रियासतों को आजादी है कि वह अपने विवेकानुसार भारत या पाकिस्तान में शामिल हो सकते हैं अथवा वे खुद को स्वतंत्र रख सकते हैं। इसी का लाभ उठाते हुए कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत का विलय भारत व पाकिस्तान में करने की जगह खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। लेकिन पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए उस पर हमला कर दिया। इस पर महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर का विलय भारत के साथ किया और भारत ने पाकिस्तान सेना को वहां से खदेड़ दिया।

पाकिस्तान के शासकों और सत्ता में रहे तनाशाहों की विदेश नीति हमेशा भारत विरोध की ही रही है। अप्रैल, 1965 में जब पाकिस्तानी सेना की दो टुकड़ियों ने कच्छ के रन तथा कश्मीर में घुसपैठ प्रारम्भ की, तो दोनों देशों के मध्य युद्ध प्रारम्भ हो गया। हालांकि संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के कारण 22 सितम्बर, 1965 को युद्ध विराम हो गया। युद्ध की समाप्ति के बाद सोवियत रूस के प्रयत्नों के फलस्वरूप दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ। हालांकि इस समझौते के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई, जिसके पीछे राजनीतिक षड्यन्त्र होने की बात भी कही गई।

पाकिस्तान की गलत नीतियों के चलते ही वर्ष 1971 में भारत-पाक के संबंधों की कटुता में पुन: बढ़ गई। इस वर्ष पूर्वी पाकिस्तान में याहवा खां के अत्याचारों के फलस्वरूप गृह-युद्ध छिड़ गया और लाखों की संख्या में पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लाभाषी लोग अपनी जान बचाने के लिए भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए। भारत में शरणार्थियों की संख्या लगभग 1 करोड़ तक पहुंच गई। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान के शरणार्थियों के साथ मानवीय व्यवहार किया तथा उनके लिए भोजन एवं आश्रय की व्यवस्था की।

इससे क्षुब्ध होकर 2 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी वायुयानों ने भारत के हवाई अड्डों पर भीषण बमबारी शुरू कर दी। विवश होकर भारत को जवाबी हमला करना पड़ा। कई दिनों तक दोनों देशों के बीच भयंकर युद्ध चलता रहा। अन्तत: पाकिस्तान की पराजय हुई एवं भारतीय प्रयासों से पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश के रूप में अस्तित्व में आया। इसके बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष को समाप्त करने के उद्देश्य से 3 जुलाई, 1972 को शिमला समझौता हुआ।

शिमला समझौते के बाद 1976 में दोनों देशों के बीच फिर से राजनीतिक एवं व्यापारिक सम्बन्ध कायम होने शुरू हुए, किन्तु 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत रूस के आक्रमण के बाद स्थिति पहले जैसी हो गई, क्योंकि भारत सोवियत रूस का पक्षधर था एवं पाकिस्तान अफगानिस्तान का। इसके बाद 1985 में दोनों देशों के बीच मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के कुछ प्रयास हुए, किन्तु सफलता नहीं मिली।

फरवरी, 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐतिहासिक लाहौर बस यात्रा के माध्यम से भारत की ओर से मित्रता की पहल करने की कोशिश की, किन्तु उसी वर्ष अप्रैल में पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ कर अपनी मंशा जता दी। कारगिल में पाकिस्तान को तो उसके आक्रमण का जवाब मिल गया, किन्तु दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। पाकिस्तान ने एक साजिश के तहत 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद पर आतंकी हमला किया। इस हमले के बाद लंबे समय तक दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अत्यन्त तनावपूर्ण रहे।

यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान कश्मीर सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देता रहा है। वहां जो भी प्रशासक आया, वह पाकिस्तान की जनता का ध्यान विकास से भटकाने के लिए हमेशा भारत से खुद को खतरा बताते हुए सीमा में ही नहीं बल्कि भारत के अंदर आतंकी गतिविधियों को प्रायोजित करता रहा। यही कारण है कि वहां की अर्थव्यवस्था बद से बदतर होती गई और वहां की स्थिति अत्यंत गंभीर हो चुकी है। आर्थिक संकट से उबरने के लिए पाकिस्तान ने 30 अरब रुपये का अतिरिक्त कर लगाने का निर्णय किया है। तेल और गैस के भुगतान में चूक से बचने के लिए सरकार 100 अरब रुपये जुटाने का प्रयास कर रही है। इस संबंध में उसने आईएमएफ से एक समझौता कर लिया है। बीते कुछ महीनों में देश के कर्ज में 15 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है।

कर्ज तले दबा पाकिस्तान अब कर्ज के लिए अपने कुछ इलाकों और कंपनियों को भी दांव पर लगाने की तैयारी में है। पाकिस्तान यूएई का दो अरब डालर का कर्जदार बना हुआ है। पाकिस्तान इसकी अदायगी नहीं कर पाया है। यूएई ने इसकी अदायगी की अवधि को मार्च 2022 में एक साल के लिए बढ़ाकर मार्च 2023 कर दिया है। दूसरी तरफ चीन द्वारा दिए गए कर्ज को पाकिस्तान को 27 जून से 23 जुलाई के बीच अदा करना था। पाकिस्तान को दो अरब डालर के कर्ज का भुगतान चीन को करना है। फिलहाल कुछ समय के लिए चीन ने इसे स्थगित कर दिया है जो पाकिस्तान के लिए राहत की बात है।

चीन ने इस धनराशि की अदायगी के लिए अतिरिक्त समय दे दिया है। विदेशी मुद्रा भंडार बचाने एवं नकदी के संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को हाल ही में चीन ने एक बार फिर 2.3 अरब डालर का ऋण मुहैया कराया है। इससे पहले भी चीन ने 4.5 अरब डालर का कर्ज दिया था। पाक की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने, आजीविका में सुधार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए चीन पाकिस्तान का समर्थन करता है। परंतु यह रणनीति दीर्घकाल में अब पाकिस्तान के लिए नुकसानदेह साबित होती दिख रही है। चूंकि पाकिस्तान भारत का निकटतम पड़ोसी है, लिहाजा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की बदहाली को देखते हुए भारत की चिंता स्वाभाविक है। यहां ध्यातत्व है कि चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप भारतीय उप महाद्वीप में बढ़ने से पहले भारत को इस गंभीर समस्या के लिए एक सशक्त कार्य योजना तैयार कर उसे लागू करना होगा ताकि भारत की अस्मिता और संप्रभुता अक्षुण्य बनी रह सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-13 07:48:34
स्वामी विवेकानंद ने समाचारपत्रों को बनाया वेदांत के प्रसार का माध्यम

लोकेन्द्र सिंह

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मां भगवती की कृपा से स्वामी विवेकानंद सिद्ध संचारक थे। उनके विचारों को सुनने के लिए भारत से लेकर अमेरिका तक लोग लालायित रहते थे। लेकिन हिन्दू धर्म के सर्वसमावेशी विचार को लेकर स्वामीजी कहां तक जा सकते थे? मनुष्य देह की एक मर्यादा है। 

भारत का विचार अपने वास्तविक एवं उदात्त रूप में सर्वत्र पहुंचे, वह गूंज उठे और उस पर सार्थक चर्चा हो, इसके लिए वह पुण्यभूमि भारत से निकलकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य देशों में प्रवचन करने के लिए पहुंच गये। उन्होंने वहांके समाचार-पत्रों में अपने व्याख्यानों पर केंद्रित समाचार प्रकाशित होने के बाद समाज के गुणीजनों पर उसके प्रभाव को अनुभव किया। स्वामी विवेकानंद ने समाचारपत्र एवं पत्रिकाओं की भूमिका को पहचान कर वेदों के विचारों के प्रसार के लिए उनका उपयोग करने पर जोर दिया। स्वामीजी की प्रेरणा एवं योजना से दो प्रमुख समाचारपत्र प्रकाशित हुए- ब्रह्मवादिन एवं प्रबुद्ध भारत। उन्होंने दोनों ही पत्रों की सब प्रकार से चिंता की। समाचारपत्रों के संपादन, रूप-सज्जा एवं प्रसार पर उनकी बारीक दृष्टि रहती थी।

स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका से 1894 में अपने शिष्य आलासिंगा पेरुमल को कई पत्र लिखे, जिनमें उन्होंने समाचारपत्र-पत्रिकाओं को लेकर चर्चा की है। एक पत्र में स्वामीजी लिखते हैं- यदि तुम वेदांत के आधार पर एक पत्रिका निकाल सको तो हमारे कार्य में सहायता मिलेगी। एक अन्य पत्र में स्वामीजी लिखते हैं- एक छोटी-सी समिति की स्थापना करो और उसके मुखपत्रस्वरूप एक नियतकालिक पत्रिका निकालो। तुम उसके संपादक बनो। पत्रिका प्रकाशन तथा प्रारंभिक कार्य के लिए कम से कम कितना व्यय होगा, इसका विवरण मुझे भेजो तथा समिति का नाम एवं पता भी लिखना। इस कार्य के लिए न केवल मैं स्वयं सहायता करूंगा वरन यहां के और लोगों से भी अधिक से अधिक वार्षिक चंदा भिजवाने की व्यवस्था करूंगा। 

इस तरह अमेरिका में जब उन्हें अधिक समय हो गया और शिष्यों को अपने गुरु से दूर रहने की बेचैनी होने लगी और उन्होंने स्वामीजी से भारत लौटने का आग्रह किया। तब स्वामीजी ने आलासिंगा को लिखा- मुझे कुछ काम करके दिखाओ- एक मंदिर, एक प्रेस, एक पत्रिका और हम लोगों के ठहरने के लिए एक मकान। ध्यान दें कि उन्होंने वेदांत के प्रसार-प्रचार के लिए अपने शिष्यों से एक प्रेस की अपेक्षा की।

स्वामीजी के निर्देश उनके शिष्यों ने ब्रह्मवादिन एवं प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन तो प्रारंभ कर दिया, लेकिन समाचारपत्रों के प्रकाशन का पर्याप्त अनुभव नहीं होने के कारण अनेक प्रकार की समस्याएं खड़ी होने लगीं। जब स्वामीजी के ध्यान में यह बात आई तब उन्होंने कहा भी कि भले ही हमारे पत्र व्यावसायिक दृष्टि से नहीं निकाले जा रहे हैं लेकिन यह है तो एक व्यवसाय ही। इसलिए समाचारपत्र के व्यावसायिक पक्ष को ध्यान में रखना होगा। 

यद्यपि स्वामी विवेकानंद भारत से प्रकाशित अपने समाचारपत्रों के लिए अमेरिका में धन संग्रह करते थे। परंतु इस बात को भी भली प्रकार समझते थे कि अमेरिका के धनिकों के बल पर लंबे समय तक भारत के समाचारपत्रों को संचालित नहीं किया जा सकता। भारत के लोग ही अपने समाचारपत्रों की चिंता करेंगे, तभी वांछित परिणाम प्राप्त होंगे। इसलिए वे अपने शिष्यों को कहते थे कि भारत से प्रकाशित समाचारपत्रों के आर्थिक प्रबंधन की चिंता वहीं के लोगों को करनी चाहिए।

स्वामी विवेकानंद पत्रिका के उद्देश्य को ध्यान में रखकर उसमें प्रकाशित सामग्री के चयन एवं उनकी भाषा-शैली को लेकर भी सचेत रहते थे। ब्रह्मवादिन के एक अंक में कठोर भाषा में लिखा एक पत्र प्रकाशित हो गया। इस पर स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका से ही आलासिंगा को लिखा कि- तुमने ब्रह्मवादिन में क का एक पत्र प्रकाशित किया है, उसका प्रकाशन न होना ही अच्छा था।

थियोसॉफिस्टों ने क की जो खबर ली है, उससे वह जल–भुन रहा है। साथ ही उस प्रकार का पत्र सभ्यजनोचित भी नहीं है, उससे सभी लोगों पर छींटाकशी होती है। ब्रह्मवादिन की नीति से वह मेल भी नहीं खाता। अतः भविष्य में यदि कभी किसी संप्रदाय के विरुद्ध चाहे वह कितना ही खब्ती और उद्धत हो, कुछ लिखे तो उसे नरम करके ही छापना। कोई भी संप्रदाय, चाहे वह बुरा हो या भला, उसके विरुद्ध ब्रह्मवादिन में कोई लेख प्रकाशित नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि प्रवंचकों के साथ जानबूझकर सहानुभूति दिखानी चाहिए। 

स्वामीजी ब्रह्मवादिन के माध्यम से समाज में सकारात्मक वातावरण चाहते थे, इसलिए उनका मत था कि पाठकों के पास जो सामग्री पहुंचे उसमें किसी प्रकार नकारात्मकता, कठोरता या द्वेष के भाव न हों।

एक बात ध्यान रखें कि स्वामी विवेकानंद भारतीय विचार के प्रसार लिए समाचारपत्रों का उपयोग करने के हामी थे परंतु वे उन पर आश्रित नहीं थे। उनके शिष्य संगठन खड़ा करने का कार्य छोड़कर पूरी तरह सिर्फ समाचारपत्रों के प्रकाशन एवं प्रचार-प्रसार पर ही ध्यान केंद्रित करने लगें, यह स्थिति निर्मित न हो, इस ओर भी उनका ध्यान था। स्वामीजी 28 मई 1894 को आलासिंगा को लिखते हैं– समाचार–पत्र चलाना निस्संदेह ठीक है, पर अनंत काल तक चिल्लाने और कलम घिसने की अपेक्षा कण मात्र भी सच्चा काम कहीं बढ़कर है।

 भट्टाचार्य के घर पर एक सभा बुलाओ और कुछ धन जमाकर मैजिक लैंटर्न, कुछ मानचित्र और कुछ रासायनिक पदार्थ खरीदो, एक कुटिया किरायेे पर लो और काम में लग जाओ! यही मुख्य काम है, पत्रिका आदि गौण हैं। जहां एक ओर वे समाचारपत्रों की भूमिका को समझकर उनके प्रकाशन एवं विस्तार पर जोर देते हैं, वहीं दूसरी ओर अपने शिष्यों को चेताते हैं कि यह मूल कार्य नहीं है, मूलकार्य तो जनता के बीच प्रत्यक्ष कार्य करना है। समाज से प्रत्यक्ष साक्षात्कार के अभाव में न तो समाज की चुनौतियों की अनुभूति होती है और न ही कार्य ठीक दिशा में आगे बढ़ता है।

अमेरिका की शिकागो इंटीरियर पत्रिका का रुख विशेषरूप से स्वामी विवेकानंद को लेकर निंदात्मक था। स्वामीजी इसे पागल इंटीरियर कहते थे। आलोचनात्मक या कहें निंदात्मक लेखन से शिष्य निराश न हों और इस प्रकार की सामग्री को अनदेखा कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें, इसलिए भी स्वामीजी समझाइश देते रहते थे– मेरे संबंध में कुछ दिनों के अंतर में ईसाई मिशनरी पत्रिकाओं में दोषारोपण किया जाता है परंतु उसे पढ़ने की मुझे कोई इच्छा नहीं है।

 यदि तुम भारत की ऐसी पत्रिकाएं भेजोगे तो मैं उन्हें भी रद्दी कागज की टोकरी में डाल दूंगा। मेरे विषय में लोग क्या कहते हैं, इसकी ओर ध्यान न देना, चाहे वे अच्छा कहें या बुरा। तुम अपने काम में लगे रहो.... मिशनरी ईसाइयों के झूठे वर्णन की ओर तुम्हें ध्यान ही नहीं देना चाहिए। पूर्ण मौन ही उनका सर्वोत्तम खंडन है।

इस तरह हम देखते हैं कि सिद्ध संचारक होने के साथ ही स्वामी विवेकानंद को समाज जागरण के लिए संचार माध्यमों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने की भी सिद्धता थी। स्वामीजी समाचारपत्रों की शक्ति, समाचारपत्रों के सदुपयोग एवं दुरुपयोग के प्रति अपने शिष्यों को भली प्रकार अवगत कराते रहते हैं। इस दिशा में स्वामीजी की दृष्टि का अध्ययन करें तो ध्यान आता है कि वे समाचारपत्रों को नकारात्मक विचारों से मुक्त करके उन्हें सकारात्मक साधन बनाने पर जोर देते हैं। (लेखक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

Published / 2023-01-12 09:56:37
देश के विकास की रीढ़ होते हैं युवा

  • राष्ट्रीय युवा दिवस (12 जनवरी) पर विशेष

योगेश कुमार गोयल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। युवा पीढ़ी किसी भी राष्ट्र के विकास की रीढ़ होती है। ऐसी रीढ़, जो यदि क्षतिग्रस्त हो जाए तो शरीर का सीधे खड़े रहना भी असंभव हो जाता है अर्थात रीढ़ के क्षतिग्रस्त होने पर शरीर का विकास होना भी संभव नहीं। ठीक इसी प्रकार देश के विकास के लिए विकास की रीढ़ यानी युवा वर्ग की मानसिकता का स्वस्थ रहना बेहद जरूरी है। वर्तमान परिवेश में समाज में चारों तरफ अपराधों तथा भ्रष्टाचार का जो मकड़जाल फैल चुका है, वह घुन बनकर न सिर्फ देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है बल्कि युवा वर्ग भी भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के इस दूषित माहौल में हताश व निराश है।

ऐसे में युवा वर्ग सही मार्ग से न भटके, इसके लिए युवा शक्ति को जागृत कर उसे देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराते हुए सही दिशा में प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना और उचित मार्गदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में राष्ट्रीय युवा दिवस की प्रासंगिकता बहुत बढ़ जाती है, जो प्रतिवर्ष स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर 12 जनवरी को मनाया जाता है।

हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश की आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ बलिदान कर लोगों में क्रांति का बीजारोपण करने वाले अधिकांश युवा ही थे। स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु इत्यादि देश के अनेक युवाओं ने देश की आन-बान और शान के लिए अपने निजी जीवन के समस्त सुखों का त्याग कर दिया था और अपना समस्त जीवन देश के लिए न्यौछावर कर दिया था लेकिन आधुनिक युग में हम स्वार्थी बनकर ऐसे क्रांतिकारी युवाओं की जीवन गाथाओं को भूल रहे हैं और हम सब धीरे-धीरे भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन रहे हैं। 

ऐसे ही क्रांतिकारी युवा महापुरुषों की जीवन गाथाओं के जरिये देश की युवा पीढ़ी को समाज में व्याप्त गंदगी से बचाकर देश के विकास में उसका सदुपयोग किया जा सके, इसी उद्देश्य से आधुनिक भारत के महान चिंतक, दार्शनिक, समाज सुधारक, युवा संन्यासी स्वामी विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी को ही प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो बहुत कम आयु में अपने विचारों के चलते समस्त जगत में अपनी एक विशेष पहचान बनाने में सफल हुए थे।

स्वामी विवेकानंद के वक्तव्यों का आम जनमानस और खासकर युवाओं के मन-मस्तिष्क पर कितना प्रभाव पड़ता था, इसका उनके शिकागो भाषण से बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता। 11 सितम्बर, 1893 को जब शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म पर अपने प्रेरणात्मक भाषण की शुरुआत उन्होंने मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों के साथ की थी तो बहुत देर तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही थी। अपने उस भाषण के जरिये उन्होंने दुनियाभर में भारतीय अध्यात्म का डंका बजाया था।

 विदेशी मीडिया और वक्ताओं द्वारा भी स्वामीजी को धर्म संसद में सबसे महान व्यक्तित्व और ईश्वरीय शक्ति प्राप्त सबसे लोकप्रिय वक्ता बताया जाता रहा। यह स्वामी विवेकानंद का अद्भुत व्यक्तित्व ही था कि वे यदि मंच से गुजरते भी थे तो तालियों की गड़गड़ाहट होने लगती थी। उन्होंने 01 मई 1897 को कोलकाता (तब कलकत्ता) में रामकृष्ण मिशन तथा 9 दिसंबर 1898 को कोलकाता के निकट गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। 04 जुलाई 1902 को इसी रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण किए वे चिरनिद्रा में लीन हो गये।

स्वामी विवेकानंद सही मायनों में युवाओं के प्रेरणास्रोत और आदर्श व्यक्त्वि के धनी थे, जिन्हें उनके ओजस्वी विचारों और आदर्शों के कारण ही जाना जाता है। विवेकानंद सदैव कहा करते थे कि उनकी आशाएं देश के युवा वर्ग पर ही टिकी हुई हैं। वे आधुनिक मानव के आदर्श प्रतिनिधि थे और खासकर भारतीय युवाओं के लिए उनसे बढ़कर भारतीय नवजागरण का अग्रदूत अन्य कोई नेता नहीं हो सकता। 

अपने 39 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में स्वामी जी अलौकिक विचारों की ऐसी बेशकीमती पूंजी सौंप गये, जो आने वाली अनेक शताब्दियों तक समस्त मानव जाति का मार्गदर्शन करती रहेगी। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। उन्होंने देश को सुदृढ़ बनाने और विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए हमेशा युवा शक्ति पर भरोसा किया। उनका कहना था कि मेरी भविष्य की आशाएं युवाओं के चरित्र, बुद्धिमत्ता, दूसरों की सेवा के लिए सभी का त्याग और आज्ञाकारिता, खुद को और बड़े पैमाने पर देश के लिए अच्छा करने वालों पर निर्भर है। युवा शक्ति का आह्वान करते हुए उन्होंने अनेक मूलमंत्र दिये। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-01-12 09:51:32
खेतड़ी के राजा अजीत और स्वामी विवेकानन्द...

युवा दिवस/ 12 जनवरी विशेष 

रमेश सर्राफ धमोरा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजस्थान के झुंझुनू जिले के खेतड़ी नरेश राजा अजीत सिंह धार्मिक और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे। गर्मी के दिनों में राजा अजीतसिंह माउंट आबू स्थित अपने खेतड़ी महल में थे। उसी दौरान 4 जून, 1891 को युवा संन्यासी विवेकानन्द से उनकी पहली बार मुलाकात हुई। इस मुलाकात में अजीत सिंह उस युवा संन्यासी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपना गुरु बना लिया और अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया। 

स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त, 1891 को पहली बार खेतड़ी पहुंचे। खेतड़ी में विवेकानन्द 27 अक्टूबर, 1891 तक रहे। यहीं स्वामी विवेकानन्द ने राज पण्डित नारायणदास शास्त्री के सहयोग से पाणिनी का अष्टाध्यायी व पतंजलि का महाभाष्याधायी का अध्ययन किया। स्वामीजी ने व्याकरणाचार्य और पाण्डित्य के लिए विख्यात नारायणदास शास्त्री को लिखे पत्रों में उन्हें मेरे गुरु कहकर सम्बोधित किया है।

अमेरिका जाने से पूर्व 21 अप्रैल, 1893 को स्वामी विवेकानंद दूसरी बार खेतड़ी पहुंचे। इस बार वह 10 मई, 1893 तक खेतड़ी में ठहरे। इस दौरान एक दिन राजा अजीत सिंह और स्वामीजी फतेहविलास महल में बैठे शास्त्र चर्चा कर रहे थे। तभी राज्य की नर्तकियों ने वहां आकर गायन वादन का अनुरोध किया। इस पर संन्यासी होने के नाते स्वामीजी उठकर जाने लगे। नर्तकियों की दल नायिका मैनाबाई ने स्वामी जी से आग्रह किया कि वो विराजें। उन्हें वो भजन सुनायेगी। 

मैनाबाई ने महाकवि सूरदास रचित प्रसिद्ध भजन प्रभु मोरे अवगुण चित न धरो, समदरसी है नाम तिहारो चाहे तो पार करो... सुनाया। इस सुनकर स्वामीजी की आंखों में आंसुओं की धारा बह निकली। उन्होंने उस पतिता नारी को ज्ञानदायिनी मां कहकर सम्बोधित किया और कहा कि आपने आज मेरी आंखें खोल दी हैं।

इस भजन को सुनकर ही स्वामीजी संन्यासोन्मुखी हुए। 10 मई, 1893 को स्वामीजी ने मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में खेतड़ी से अमेरिका जाने को प्रस्थान किया। महाराजा अजीत सिंह के आर्थिक सहयोग से ही स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में शामिल हो वेदान्त की पताका फहराकर भारत को विश्व धर्मगुरु का सम्मान दिलाया। अमेरिका जाते वक्त खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह ने अपने मुंशी जगमोहन लाल व अन्य कर्मचारियों को बम्बई तक स्वामी जी की यात्रा की तैयारियों व व्यवस्था करने के लिए भेजा था।

इस बात की बहुत कम लोगों को जानकारी है कि स्वामीजी का स्वामी विवेकानन्द नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था। इससे पूर्व स्वामीजी का नाम विविदिषानन्द था। शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीत सिंह ने स्वामीजी से कहा आपका नाम बड़ा कठिन है। उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है। उसी दिन राजा अजीत सिंह ने उनके सिर पर भगवा साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया, जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया।

शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आये। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किये व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया। उनके स्वागत में पूरे खेतड़ी में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक जलवाये थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर खेतड़ी जगमगा उठा था।

20 दिसम्बर, 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया गया । शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था। उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द ने खेतड़ी में सावजनिक रूप से भाषण दिया। भाषण सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीत सिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुए थे। 21 दिसम्बर, 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गए। यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी यात्रा थी।

स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर स्वीकार किया था कि यदि खेतड़ी के राजा अजीतसिंह से उनकी भेंट नहीं हुई होती तो भारत की उन्नति के लिए उनके द्वारा जो थोड़ा बहुत प्रयास किया गया उसे वे कभी नहीं कर पाते। स्वामी जी, राजा अजीत सिंह को समय-समय पर पत्र लिखकर जनहित कार्य जारी रखने की प्रेरणा देते रहते थे। स्वामी विवेकानन्द ने ही राजा अजीत सिंह को खगोल विज्ञान की शिक्षा दी थी। उन्होंने खेतड़ी के संस्कृत विद्यालय में अष्ठाध्यायी ग्रंथों का अध्ययन भी किया था। स्वामी विवेकानन्द के कहने पर ही राजा अजीत सिंह ने खेतड़ी में शिक्षा के प्रसार के लिए जय सिंह स्कूल की स्थापना की थी।

राजा अजीत सिंह और स्वामी विवेकानन्द के अटूट सम्बन्धों की अनेक कथाएं आज भी खेतड़ी के लोगों की जुबान पर सहज ही सुनने को मिल जाती हैं। स्वामीजी का मानना था कि यदि राजा अजीतसिंह नहीं मिलते तो उनका शिकागो जाना संभव नहीं होता। स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी, 1863 में व मृत्यु 4 जुलाई 1902 को हुई थी। इसी तरह राजा अजीत सिंह जी का जन्म 10 अक्टूबर 1861 और मृत्यु 18 जनवरी 1901 को हुई थी। दोनों का निधन 39 वर्ष की आयु में हो गया था व दोनों के जन्म व मृत्यु का समय में भी ज्यादा अन्तर नहीं था। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है।

स्वामी विवेकानंद के जन्मदिन 12 जनवरी को ही राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस मनाये जाने का प्रमुख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत, आध्यात्मिक विचार और उनके आदर्श है। जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन नामक सेवा भावी संगठन की स्थापना की थी। उसकी पहली शाखा खेतड़ी में 1958 में खोली थी। 

मिशन द्वारा खेतड़ी में गरीब तथा पिछड़े बालक-बालिकाओं के लिए श्री शारदा शिशु विहार नाम से एक बालवाड़ी, सार्वजनिक पुस्तकालय, वाचनालय एवं एक मातृ सदन तथा शिशु कल्याण केन्द्र भी चलाया जा रहा है। खेतड़ी में रामकृष्ण मिशन ने करोड़ों रुपये की लागत से स्वामी विवेकानन्द राष्ट्रीय संग्रहालय बनवाया है। यह देश का पांचवां और राजस्थान का पहला संग्रहालय है। (लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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