विचार

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Published / 2023-03-20 18:08:04
लोगों का मनोरंजन करती कठपुतलियां...

विश्व कठपुतली दिवस/ 21 मार्च विशेष 

रमेश सर्राफ धमोरा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हम हर साल 21 मार्च को विश्व कठपुतली दिवस मनाते हैं। इसका उद्देश्य कठपुतली को वैश्विक कला के रूप में मान्यता देना है। यह दुनिया भर के कठपुतली कलाकारों का सम्मान करने का एक प्रयास भी है। एक समय कठपुतली को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम समझा जाता था। आज कठपुतली कला मनोरंजन के साथ लोगों को जागरूक भी कर रही है। प्राचीनकाल से ही जादू टोनों एवं कुदरती प्रकोपों से बचने के लिए मानव जीवन में पुतलों का प्रयोग होता रहा है। भारत में ही नहीं बल्कि अन्यत्र भी काष्ठ, मिट्टी व पाषाण से निर्मित ये पुतले जातीय एवं पारिवारिक देवताओं के रूप में प्रतिष्ठित होते रहे हैं। 

कठपुतलियों का इतिहास बहुत पुराना है। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में पाणिनी की अष्टाध्यायी के नटसूत्र में पुतला नाटक का उल्लेख मिलता है। कुछ लोग कठपुतली के जन्म को लेकर पौराणिक आख्यान का जिक्र करते हैं कि शिवजी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर पार्वती का मन बहलाकर इस कला की शुरुआत की थी। सतवर्द्धन काल में भारत से पूर्वी एशिया के देशो इंडोनेशिया, थाइलैंड, म्यांमार, जावा, श्रीलंका आदि में इसका विस्तार हुआ। आज यह कला चीन, रूस, रूमानिया, इंग्लैंड, चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका व जापान आदि अनेक देशों में पहुंच चुकी है। इन देशों में इस विधा का सम-सामयिक प्रयोग कर इसे बहुआयामी रूप प्रदान किया गया है। वहां कठपुतली को मनोरंजन के अलावा शिक्षा, विज्ञापन आदि अनेक क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा रहा है। 

भारतीय कठपुतलियों का पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है। महाभारत में अर्जुन द्वारा ब्रहन्नला को कठपुतलियों का खेल सिखाने का उल्लेख है। महाभारत में रूपजीवन शब्द का भी काफी प्रयोग हुआ है और वह भी पुतलियों के खेल-तमाशों के संदर्भ में। पंचतंत्र नामक ग्रन्थ में ऐसी कठपुतलियों का जिक्र है जो लकड़ी की खूटियों के सहारे नाना प्रकार के मानवी करतब दिखलाती थीं। विक्रमादित्य के समय सिंहासन बत्तीसी नामक एक ऐसा सिंहासन था जो दिन में सम्राट के बैठने के काम आता था और रात को उसकी बत्तीस कठपुतलियां विभिन्न प्रकार से रागरंग कार्यक्रम कर सम्राट को रिझाती थी। 

राजस्थान की स्ट्रिंग कठपुतलियां दुनिया भर में मशहूर हैं। इसके अलावा ओडिशा, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी कठपुतलियों की यही कला प्रचलित है। राजस्थानी कठपुतलियों का ओवल चेहरा, बड़ी आंखें, धनुषाकार भौंहें और बड़े होठ इन्हें अलग पहचान देते हैं। 5-8 स्ट्रिंग्स से बंधी ये कठपुतलियां राजस्थानी संगीत के साथ नाटक पेश करती हैं। राजस्थान में कठपुतलियों का प्रचलन काफी समय से हो रहा है। यहां कठपुतलियां नटों तथा भाटों द्वारा प्रयुक्त होती हैं। ये नट नाटक भी करते थे, नाचते भी थे एवं विभिन्न प्रकार के शारीरिक करतब भी दिखलाते थे। यह रस्सियों पर भी चलते थे ओर कठपुतलियां भी नचाते थे। नट जाति में प्रचलित एक किवदंती के आधार पर ब्रह्मा के वरदान से एक आदि नट की उत्पत्ति हुई थी। इन नटों के पूर्वज ही विक्रमादित्य के समय में सिंहासन बत्तीसी नामक कठपुतली नाटक के सर्जक थे। भारत की पुरातन संस्कृति का केन्द्रस्थल उत्तर भारत का राजस्थान एवं सिंध क्षेत्र रह चुका है। 

राजस्थान के नट जो पहले राजा-महाराजाओं के दरबारों की शोभा बढ़ाते थे। धीरे-धीरे सामाजिक एवं आर्थिक कारण से पिछड़ते चले गये और छोटी-छोटी जातियों के याचक बन गये। जिन राजाओं तथा विशिष्टजनों ने उन्हें प्रोत्साहन एवं संरक्षण प्रदान किया उन्हीं की जीवन-गाथायें इनकी पुतलियों का विषय बन गयी। जैसे विक्रमादित्य के काल की सिंहासन बत्तीसी, पृथ्वीराज चौहान के समय की पृथ्वीराज संयोगिता व अमर सिंह राठौड़ का खेल प्रमुख थी। परंपरा एवं जातीय बन्धनों में बंधे ये भाट आज भी अपनी पुतलियों में संशोधन आदि का सुझाव नहीं मानते हैं। राजस्थान में आज इस जाति के लगभग सोलह हजार भाट मौजूद हैं। इनमें से लगभग आठ हजार किसी न किसी ढंग से कठपुतलियां नचाने का काम करते हैं। कुछ खेती बाड़ी के धन्धे में भी लगे हुये हैं तो कुछ ने नाच गाने को अपना पेशा बना लिया है। कुछ अपने यजमानों के घर व शादी विवाह के अवसर पर ढोल बजाकर याचक का काम करते हैं। 

राजस्थान में कठपुलियों का खेल दिखाने का मंच बहुत ही सादा होता है। गांव में कठपुतली का खेल दिखाने हेतु दो खाट खड़ी कर उसको ऊपर-नीचे से बांसों से जकड़कर मंच की शक्ल दे दी जाती है। आगे की तरफ बारादरीनुमा ताजमहल नामक पर्दा लगा दिया जाता है। पृष्ठ भूमि में एक रंगीन काली चादर लगा दी जाती है जिसके पीछे से ये कठपुतलियों का संचालन करते हैं। इनकी कठपुतलियों का आकार लगभग डेढ़ फुट का होता है। इन कठपुतलियों की वेशभूषा पारम्परिक राजस्थानी होती है। 

30 वर्षों से निरंतर प्रचलन में होने से राजस्थानी कठपुतलियों का मूल नाटक बिल्कुल ही विकृत हो गया है। अब तो दर्शक संचालन शैली तथा नाट्य-विधि के कारण ही कठपुतली का खेल देखते हैं। आज भी राजस्थानी कठपुतलियों में दर्शकों को बांधने की ताकत देखने का मिलती है जो कदाचित अन्य किसी में नहीं है। कठपुतली संचालक द्वारा अपने मुंह से ही सीटीनुमा आवाज निकालकर भाव व्यक्त किया जाता है। आमतौर पर आजकल कठपुतली निर्माण कार्य कठपुतली संचालक स्वयं ही करता है क्योंकि पारम्परिक कठपुतली निर्माता बढ़ई बहुत कम संख्या में रह गये हैं। इन कठपुतलियों को भाट बड़े आदर-भाव से देखते हैं। आज भी इनकी पारंपरिक कठपुतलियों के लंहगों की अनेक परतें इनकी पुरातन प्रियता की द्योतक है। कठपुतलियों के मुंह निर्मित होते हैं तथा अन्य सब अंग रूई व कपड़ों से बनाये जाते हैं। प्रयोग में नहीं आने वाली कठपुतलियों को ये लोग फेंकते नहीं बल्कि आदर पूर्वक जल में प्रवाहित करते हैं। 

राजस्थानी कठपुतलियों में चेहरे का आकार शरीर से बड़ा, आंखें काफी बड़ी, वक्षस्थल अत्यंत लघु एवं उभरा हुआ तथा पांवों का न होना इनकी अपनी विशेषता है। इससे कठपुतलियों का संचालन अत्यन्त सजीव बन जाता है। कठपुतलियों के खेल दिखाने वाले दल में दो या तीन व्यक्ति होते हैं। औरतें ढालक बजाती हैं व मर्द कठपुतलियां चलाते हैं। इनके दोनों हाथ मशीन की तरह चलते हैं। सीटी द्वारा उत्पन्न विविध ध्वनियां, वाचन के साथ पैर से पैदा की गयी आवाजें तथा ढोलक की विचित्र थापें समस्त नाटक को प्राणवान बना देती हैं। राजस्थानी कठपुतलियां पिछले सैकड़ों वर्षों से समाज की अवहेलना व उदासीनता की शिकार रही हैं। इन्हें सरकार से किसी प्रकार का कोई संरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है। इन कठपुतली परिचालक भाटों को उनका पिछड़ापन, अंधविश्वास तथा इनकी परम्परागतता ने भी इन्हें काफी हानि पहुंचाई है। सरकार को इन सर्वाधिक पुरातन कठपुतली कला को आधुनिक बनाने के लिए नये कथानक, नये विचार तथा नवजीवन प्रदान करने में सहयोग करना चाहिये ताकि हमारे लोक जीवन का अंग बन चुकी कठपुतली कला सदैव हमारे साथ रहकर मनोरंजन करती रहे। 

जीविकोपार्जन के लिए कठपुतली कलाकारों को गांव-कस्बों से पलायन करना पड़ रहा है। कलाकारों ने नाच-गाना और ढोल बजाने का काम शुरू कर लिया है। रोजगार की तलाश ने ही कठपुतली कलाकारों की नई पीढ़ी को इससे विमुख किया है। जन उपेक्षा व उचित संरक्षण के अभाव में नई पीढ़ी इस लोक कला से उतनी नहीं जुड़ पा रही है जितनी जरूरत है। उनके परिवार के सदस्य आज भी अन्य किसी व्यवसाय की बजाय कठपुतली बनाना पसंद करते हैं। वह कहते हैं कि कठपुतली से उनके पूर्वजों की यादें जुड़ी हुई हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति व कला को बचाने और प्रोत्साहन देने के तमाम दावों के बावजूद कठपुतली कला को बचाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। हमारे देश में कठपुतली कला के स्वरूप में खासे बदलाव देखे जा सकते हैं। आज इनमें महिला शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, परिवार नियोजन जैसे विषयों पर आधारित कार्यक्रम, हास्य-व्यंग्य और शैक्षणिक कार्यक्रम भी दिखाये जाते हैं।

Published / 2023-03-17 19:08:11
योगी के चरखा दांव से विपक्ष के फूले हाथ-पांव

मृत्युंजय दीक्षित 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के एक निर्णय से छद्म धर्मनिरपेक्ष दल बेचैन और व्यग्र हैं। चिंता में हैं कि अब उनकी तुष्टिकरण की राजनीति का क्या होगा? प्रदेश की राजनीति में अभी तक कहा जाता रहा है कि दिवंगत सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव चरखा दांव चलते थे। 

इस बार असली चरखा दांव योगी आदित्यनाथ ने चला है। इसने मुस्लिम तुष्टिकरण और जातिवादी नेताओं को चित कर दिया है। जो लोग रामचरित मानस जैसे दिव्य व पवित्र ग्रंथ की कुछ चौपाइयों का गलत अर्थ निकालकर हिंदू समाज में जातिभेद व विवाद उत्पन्न कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास कर रहे थे वो अब सकते में हैं। 

यह लोग सोच रहे थे कि प्रदेश में भगवा लहर को सनातन धर्म और सनातन संस्कृति के आस्था के केंद्र और धर्मग्रंथों का दुष्प्रचार करके और सामाजिक समरसता का वातावरण दूषित करके रोका जा सकता है। 

प्रदेश सरकार ने 22 मार्च से 30 मार्च तक दुर्गा मंदिरों और शक्तिपीठों में दुर्गा सप्तशती के पाठ, देवी जागरण व गायन के कार्यक्रम कराने का आदेश तो जारी किया ही है साथ ही अष्टमी और श्रीरामनवमी के दिन अखंड रामायण का पाठ कराने का आदेश भी जारी किया है। 

नवरात्रि के पावन अवसर पर इन कार्यक्रमों में महिलाओं एवं बालिकाओं सहित जनसहभगिता को बढ़ाने पर बल दिया गया है। इन सभी कार्यक्रमों के अवसर पर मंदिर परिसरों में विकास कार्यों एवं बुनियादी सुविधाओं की होर्डिंग भी लगेंगी। 

इन आयोजनों को भव्यता प्रदान करने के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति चयनित देवी मंदिरों, शक्तिपीठों में कलाकारों के माध्यम से कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। प्रदेश में पहली बार प्रशासन स्तर पर देवी मंदिरों एवं शक्तिपीठों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होने जा रहे हैं। 

वर्तमान परिदृश्य में सामाजिक व राजनीतिक दृष्टिकोण से यह आयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण हैं, क्यांकि अभी तक प्रदेश में जितनी भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकारें रहीं उनके कार्यकाल में केवल और केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का विकृत दौर ही देखा गया है। 

सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि सरकार के इस निर्णय का आज वही दल विरोध कर रहे हैं जिनके कार्यकाल में राजभवन व मुख्यमंत्री आवास रोजा इफ्तार का केंद्र बन जाते थे। आज सपा सरकार के इस फैसले का विरोध कर रही है। याद करिये सपा के कार्यकाल में कब्रिस्तानों के निर्माण के लिए 1200 करोड़ रुपये जारी हुए थे। 

मंदिरों में रामायण पाठ का विरोध वो लोग कर रहे है जिन्होंने या तो भगवान राम को काल्पनिक बता रखा है या रामचरित मानस का अपमान किया है। यह वही लोग हैं जिनके मुखिया दिवंगत मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में निहत्थे राम भक्तों का नरसंहार करवाया था। 

सरकार के निर्णय का आदेश आने के बाद समाजवादी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर जहरीला बयान दिया। मौर्य ने कहा है कि आम जनमानस ने स्वत: रामचरित मानस का पाठ करना बंद कर दिया है तब सकरार अपने धन से मंदिरों में रामायण पाठ कराने जा रही है। 

स्वामी प्रसाद का यह बयान बहुत ही विकृत व झूठा है। स्वामी प्रसाद ने कहा है- इस प्रकार का आयोजन महिलाओं, दलितों, पिछड़ों का अपमान है। यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण व राजनीतिक ईर्ष्या वश दिया गया बयान है। तथ्य यह है कि आज प्रदेश की राजनीति में स्वामी प्रसाद जैसे तथाकथित जातिवादी राजनीतिक नेताओं को कोई कोई भाव नहीं दिया जा रहा है। 

स्वामी प्रसाद जैसे नेताओं को यह पता ही नहीं है कि जब से उन्होंने रामचरित मानस का झूठा विमर्श गढ़ा है तब से हिंदू समाज ही नहीं अन्य विद्वान व नागरिक वर्ग भी रामचिरत मानस को एक बार फिर पढ़ रहा है। गीता प्रेस जो रामचरित मानस के प्रकाशन और विपणन का प्रमुख संस्थान है, के अनुसार स्वामी प्रसाद के मानस विरोधी कृत्य के पश्चात मानस की बिक्री में वृद्धि हुई है।

विगत दिनों दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय पुस्तक मेले में भी लोगों ने रामचरित मानस में रुचि दिखाई और पहले ही दिन 200 से अधिक प्रतियां बिक गयीं। 

समाजवादी पार्टी के सभी मुस्लिम सांसद, मुस्लिम लीग, कांग्रेस, बहुजन समाजवादी पार्टी और एआइएएम सरकार के निर्णय का कड़ा विरोध कर रहे हैं। यह लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं कि आप रमजान में मुस्लिम समाज के लिए क्या कर रहे हैं? 

इन तथाकथित दलों की नजर में यह संविधान विरोधी कदम है। सपा मुखिया बयान दे रहे हैं कि यह रकम तो बहुत कम है अपितु इस काम के लिए सरकार को कम से कम दस करोड़ देने चाहिए थे। 

भाजपा सरकार की ओर से मंत्री जयवीर सिंह का बयान आया है कि सरकार भारतीय संस्कृति व परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए इस प्रकार के कदम उठाती रहेगी। अगर आवश्यकता पड़ी तो ऐसे आयोजनों के लिए सरकार और अधिक धन जारी करेगी। 

प्रदेश सरकार ने इस प्रकार का आयोजन करके हिंदू समाज को एक बहुत बड़ा उपहार दिया है और वह भी उस समय जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण तीव्र गति से चल रहा है। 

योगी के इस दांव से यह सिद्ध हुआ है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष विरोधी दल असल में हिंदू विरोधी हैं। यह सभी दल अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पचा नहीं पा रहे हैं। यह आगामी एक जनवरी से पहले प्रदेश में फिर वर्ग का रंग घोलना चाहते हैं क्यों कि इसी दिन राम मंदिर का भव्य उद्घाटन होना है। इनकी कोशिश है कि इसमें खलल पड़े।

Published / 2023-03-14 21:42:11
बड़ी शुरुआत का बड़ा फायदा...

विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस/15 मार्च विशेष 

योगेश कुमार गोयल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट, नाप-तोल में गड़बड़ी, मनमाने दाम वसूलना, बगैर मानक वस्तुओं की बिक्री, ठगी, सामान की बिक्री के बाद गारंटी अथवा वारंटी के बावजूद सेवा प्रदान नहीं करना इत्यादि समस्याओं से ग्राहकों का सामना अक्सर होता रहता है। ऐसी ही समस्याओं से निजात दिलाने और अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। 

वास्तव में यह उपभोक्ताओं को उनकी शक्तियों और अधिकारों के बारे में जागरूक करने का एक महत्वपूर्व अवसर है। उपभोक्ता आन्दोलन की नींव सबसे पहले 15 मार्च, 1962 को अमेरिका में रखी गई। 15 मार्च, 1983 से यह दिवस हर साल मनाया जाता है। 

भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरूआत मुंबई में वर्ष 1966 में हुई। तत्पश्चात पुणे में 1974 में ग्राहक पंचायत की स्थापना के बाद कई राज्यों में उपभोक्ता कल्याण के लिए संस्थाओं का गठन किया गया। इस प्रकार उपभोक्ता हितों के संरक्षण की दिशा में यह आन्दोलन आगे बढ़ता गया। उपभोक्ताओं को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए कई कानून भी बनाए गए। 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद से उपभोक्ताओं को शीघ्र, त्वरित एवं कम खर्च पर न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस दिवस को मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए और अगर वे धोखाधड़ी, कालाबाजारी, घटतौली इत्यादि के शिकार होते हैं तो वे इसकी शिकायत उपभोक्ता अदालत में कर सकें। 

ग्राहकों के साथ आए दिन होने वाली धोखाधड़ी को रोकने और उपभोक्ता अधिकारों को ज्यादा मजबूती प्रदान करने के लिए देश में 20 जुलाई 2020 को ह्यउपभोक्ता संरक्षण कानून-2019ह्ण (कन्ज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट-2019) लागू किया गया। यह कानून अब साढ़े तीन दशक पुराने ह्यउपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986ह्ण का स्थान ले चुका है।

भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्पष्ट किया गया है कि प्रत्येक वह व्यक्ति उपभोक्ता है, जिसने किसी वस्तु या सेवा के क्रय के बदले धन का भुगतान किया है या भुगतान करने का आश्वासन दिया है और ऐसे में किसी भी प्रकार के शोषण अथवा उत्पीड़न के खिलाफ वह अपनी आवाज उठा सकता है तथा क्षतिपूर्ति की मांग कर सकता है। 

खरीदी गई किसी वस्तु, उत्पाद अथवा सेवा में कमी या उसके कारण होने वाली किसी भी प्रकार की हानि के बदले उपभोक्ताओं को मिला कानूनी संरक्षण ही उपभोक्ता अधिकार है। यदि खरीदी गई किसी वस्तु या सेवा में कोई कमी है या उससे आपको कोई नुकसान हुआ है तो आप उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। 

उपभोक्ताओं का शोषण होने और ऐसे मामलों में उनके द्वारा उपभोक्ता अदालत की शरण लिए जाने के बाद मिले न्याय के कुछ मामलों पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि उपभोक्ता अदालतें उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए कितना बड़ा काम कर रही हैं। एक उपभोक्ता ने एक दुकान से बिजली का एक पंखा खरीदा लेकिन एक वर्ष की गारंटी होने के बावजूद थोड़े ही समय बाद पंखा खराब होने पर भी जब दुकानदार उसे ठीक कराने या बदलने में आनाकानी करने लगा तो उपभोक्ता ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया। 

अदालत ने अपने आदेश में नया पंखा देने के साथ उपभोक्ता को हजार्ना देने का भी फरमान सुनाया। एक अन्य मामले में एक आवेदक ने सरकारी नौकरी के लिए अपना आवेदन अंतिम तिथि से पांच दिन पूर्व ही स्पीड पोस्ट द्वारा संबंधित विभाग को भेज दिया लेकिन आवेदन निर्धारित तिथि तक नहीं पहुंचने के कारण उसे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया। 

आवेदक ने डाक विभाग की लापरवाही को लेकर उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया और उसे न्याय मिला। चूंकि स्पीड पोस्ट को डाक अधिनियम में एक आवश्यक सेवा माना गया है, इसलिए उपभोक्ता अदालत ने डाक विभाग को सेवा शर्तों में कमी का दोषी पाते हुए डाक विभाग को मुआवजे के तौर पर आवेदक को एक हजार रुपये की राशि देने का आदेश दिया। 

ऐसी ही छोटी-बड़ी समस्याओं का सामना जीवन में कभी न कभी हम सभी को करना ही पड़ता है लेकिन अधिकांश लोग अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं लड़ते। इसका एक प्रमुख कारण यही है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अशिक्षित है, जो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञ है लेकिन जब शिक्षित लोग भी अपने उपभोक्ता अधिकारों के प्रति उदासीन नजर आते हैं तो आश्चर्य होता है।

यदि आप एक उपभोक्ता हैं और किसी भी प्रकार के शोषण के शिकार हुए हैं तो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर न्याय पा सकते हैं। कोई वस्तु अथवा सेवा लेते समय हम धन का भुगतान तो करते हैं पर बदले में उसकी रसीद नहीं लेते। शोषण से मुक्ति पाने के लिए सबसे जरूरी है कि आप जो भी वस्तु, सेवा अथवा उत्पाद खरीदें, उसकी रसीद अवश्य लें। यदि आपके पास रसीद के तौर पर कोई सबूत ही नहीं है तो आप अपने मामले की पैरवी सही ढंग से नहीं कर पाएंगे। 

पिछले कुछ वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें उपभोक्ता अदालतों से उपभोक्ताओं को पूरा न्याय मिला है लेकिन आपसे यह अपेक्षा तो होती ही है कि आप अपनी बात अथवा दावे के समर्थन में पर्याप्त सबूत तो पेश करें।

 उपभोक्ता अदालतों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इनमें लंबी-चौड़ी अदालती कार्रवाई में पड़े बिना ही आसानी से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। यही नहीं, उपभोक्ता अदालतों से न्याय पाने के लिए न तो किसी प्रकार के अदालती शुल्क की आवश्यकता पड़ती है और मामलों का निपटारा भी शीघ्र होता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2023-03-13 20:37:46
और वो सुबह आ गयी...

  • द एलिफेंट व्हिस्परर्स और नाटु-नाटु ने आस्कर ही नहीं करोड़ों प्रशंसकों का दिल भी जीता 

मुकुंद 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अमेरिका के लॉस एंजिल्स में भारतीय समयानुसार आज की सुबह कभी न भूलने वाली रही। हॉलीवुड के मशहूर डॉल्बी थियेटर में आयोजित आस्कर अवार्ड समारोह में भारत का नाम ऊंचा हो गया। भारतीय वृत्तचित्र द एलिफेंट व्हिस्परर्स ने डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट श्रेणी में आस्कर जीतकर इतिहास रच दिया। इसे भारतीय सिनेमा के अमृतकाल का सबसे खास उपहार ही माना जाना चाहिए। यह तमिल भाषा में बनाया गया वृत्तचित्र है। इस दौड़ में और भी दिग्गज खिलाड़ी रहे। मगर कार्तिकी गोंजाल्विस निर्देशित ओटीटी मंच नेटफ्लिक्स के इस वृत्तचित्र ने इस श्रेणी में सबको मात दी। 

यह वृत्तचित्र अपने प्रतिद्वंद्वियों हॉलआउट, हाउ डू यू मेजरमेंट ए ईयर, द मार्था मिशेल इफेक्ट और स्ट्रेंजर एट द गेट को मात देकर सबसे आगे रहा। कार्तिकी पर नाज इसलिए भी है कि उन्होंने इस पुरस्कार को अपनी मातृभूमि भारत को समर्पित किया। उन्होंने बहुत ही खूबसूरत संदेश दिया है। उन्होंने कहा-मैं आज यहां हमारे और प्रकृति के बीच के पवित्र बंधन, मूल निवासी समुदाय के लोगों के सम्मान और अन्य जीवित प्राणियों के प्रति सहानुभूति और अंतत: सह-अस्तित्व की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी। 

इस वृत्त चित्र के निमार्ता गुनीत मोंगा हैं। बड़ी बात यह है कि नेटफ्लिक्स ने इस वृत्तचित्र पर भरोसा जताते हुए अपना मंच प्रदान किया। द एलिफेंट व्हिस्परर्स हाथियों और उनकी देखभाल करने वालों के बीच के अटूट बंधन पर आधारित है। इसे सही मायने में हाथी मेरे साथी भी कहा जा सकता है। 

वहीं इस बार का आस्कर समारोह भारतीय फिल्म आरआरआर के गीत नाटु नाटु के लिए भी खासे महत्व का रहा। नाटु नाटु ने भी आस्कर जीतकर इतिहास में नाम दर्ज करा लिया। नाटु नाटु ने अकादमी पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ मूल (तेलुगु मूल) गीत की श्रेणी में यह अवार्ड जीतकर फिल्म टेल इट लाइक अ वुमन के गीत अपलॉज, टॉप गन: मावेरिक के गीत होल्ड माई हैंड, ब्लैक पैंथर: वाकांडा फॉरएवर के लिफ्ट मी अप और एवरीथिंग एवरीवेयर आल एट वन्स के दिस इज ए लाइफ को शिकस्त दी। 

तेलुगु गीत नाटु नाटु के संगीतकार एमएम कीरावानी गदगद हैं। इसे सुरों से पिरोने वाले काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज भी खुशी से नाच रहे हैं। नाटु नाटु का मतलब ही होता है नाचना। इस गाने को अभिनेता राम चरण और जूनियर एनटीआर पर फिल्माया गया है। पहले चर्चा थी कि अवार्ड समारोह में यही दोनों इसी गीत पर परफार्मेंस देंगे। लेकिन काल भैरव और राहुल सिप्लीगुंज ने समारोह में अपने इस गीत की बेहतरीन प्रस्तुति देकर दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों को खड़े होकर तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। इस प्रस्तुति के दौरान आयोजकों ने मंच पर गीत के सेट को दिखाने की कोशिश की। बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है कि इस गीत की शूटिंग यूक्रेन की राजधानी कीव स्थित राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में हुई थी।

Published / 2023-03-12 20:59:38
महिला सशक्तिकरण : अभी तो बस शुरुआत है...

सत्यनारायण गुप्ता

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक 4 दिन पहले महिला आईपीएल शुरू हुआ है। जिसमें यह नारा लगा "यह तो बस शुरुआत है।" लेकिन शुरुआत तो बहुत पहले से हो चुकी थी। रजिया सुल्तान (महिला शासिका) झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (स्वतंत्रता सेनानी) देविका रानी (फिल्मों में अभिनय) इंदिरा गांधी (राजनीति) शकुंतला देवी (गणितज्ञ) पीटी उषा (एथलिट) कल्पना चावला (अंतरिक्ष) रीता फारिया और सुष्मिता सेन (सौंदर्य प्रतियोगिता) की उपलब्धियों से आज की भारतीय महिला बहुत आगे निकल चुकी हैं।

पिछले वर्ष जब देश में अमृत महोत्सव वर्ष की शुरुआत हुई देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिली। खेल के मैदान में पीवी सिंधु, रिचा घोष, मीराबाई चानू, निखत जरीन, प्रियंका नूटक्की (शतरंज ग्रैंडमास्टर) प्रियंका मोहिते (800 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पांच पर्वत चोटियों पर चढ़ने वाले पर्वतारोही) ने देश का गौरव बढ़ाया। साथ ही पीटी ऊषा का भारतीय ओलंपिक संघ का पहली महिला अध्यक्ष बनना भी  मील का पत्थर  रहा।

वर्ष 2022 में हिंदी लेखिका गीतांजलि श्री को "रेत समाधि" के लिए बुकर पुरस्कार मिला। वहीं भारतीय लेखिका मीनाकंडा सामी को इंटरनेशनल" हर्मन कैस्टन पुरस्कार 2022" पुरस्कार प्राप्त हुआ।

वर्ष 2023 में उमी कमानी और अनुपमा रामचंद्रन की जोड़ी ने स्नूकर विश्व कप जीतकर तथा शेफाली वर्मा की कप्तानी में अंडर -19 टी 20 महिला विश्वकप जीतकर खेल जगत में भारत का परचम लहराया। वहीं भारत में जन्मी गीता गोपीनाथ आईएमएफ में चीफ़ इकाॅनोमिस्ट के पद पर नियुक्त होने वाली पहली महिला बनीं। केरल की सोम क्रिश्चियन कैलिफोर्निया कम्युनिटी कॉलेज सिस्टम का 11वां स्थाई चांसलर चुनी गयी। उधर अमेरिका से ही खबर है कि हो सकता है अगले राष्ट्रपति चुनाव में दो भारतीय मूल की महिलाओं में ही भिड़ंत हो। निकी हिली और कमला हैरिस के बीच।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत आज से 115 वर्ष पहले 1908 में हुई। 1908 में 8 मार्च के दिन अमेरिका में महिलाओं ने एक परेड का आयोजन किया था। उनकी मांग थी कि महिलाओं के काम के घंटे कम हो, वेतन अच्छा मिले और महिलाओं को वोट डालने का हक भी मिले। इसके एक वर्ष बाद अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का ऐलान किया। इसे अंतरराष्ट्रीय बनाने का ख्याल सबसे पहले क्लारा जेटकिन नाम की एक महिला के ध्यान में आया था। 

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का सुझाव 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं के सम्मेलन में दिया था। पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2011 में मनाया गया। 2017 में रुस की महिलाओं के प्रदर्शन के बाद वहां के जार को पद से हटना पड़ा। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को औपचारिक मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1975 में दी गयी।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पहचान जामुनी रंग से होती है इसे इंसाफ और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। कई देशों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रीय अवकाश रहता है। चीन में राष्ट्रीय परिषद के सुझाव पर बहुत से महिलाओं को 8 मार्च के को आधे दिन की छुट्टी दी जाती है। इटली में महिलाओं को 8 मार्च को सीमौसा फूल देकर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। 

अमेरिका में मार्च का महीना महिलाओं का महीना होता है। राष्ट्रपति की तरफ से घोषणा जारी की जाती है जिसमें अमेरिकी महिलाओं की उपलब्धियों का बखान किया जाता है। वर्ष 2023 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए संयुक्त राष्ट्र की थीम है : "एम्ब्रैस  इक्विटी" जिसका अर्थ है लैंगिक समानता पर ध्यान देना।

Published / 2023-02-25 23:37:57
जातियों की स्वाभाविक विदाई शुभ संकेत...

हृदयनारायण दीक्षित

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जाति खासी चर्चा में है। डॉ लोहिया और डॉ अंबेडकर सहित अनेक चिंतकों ने भारत की जातीय संरचना को राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध बताया है। डॉ लोहिया ने जाति तोड़ो का नारा भी दिया था। डॉ अंबेडकर ने भी जाति के समूल नाश का ध्येय लेकर लगातार काम किया था। जाति खात्मा सभी महान नेताओं का स्वप्न रहा है। लेकिन जाति की अस्मिता बढ़ाने का गलत काम जारी है। जाति की कोई संवैधानिक परिभाषा नहीं है। बेशक भारत में सैकड़ों जातियां हैं। जाति का अस्तित्व है। जाति की राजनीति है। जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक रही हैं। मूलभूत प्रश्न है कि आखिर जातियां हैं क्या?

फ्रांसीसी विद्वान सेनार्ट के अनुसार ये एक निकाय जैसी हैं। अनुवांशिकता से प्रतिबद्ध है। कतिपय उत्सवों के अवसर पर इनके लोग इकट्ठे होते हैं। समान धंधों व्यवसायों के कारण आपस में जुड़े रहते हैं। कुछ जातियों में परंपरागत जाति मनवाने के लिए जातिवाह्य घोषित करने की परंपरा भी रही है। भारत की वर्तमान जाति व्यवस्था में यह विवेचन लागू नहीं होता। एक विद्वान एच मस्ले के अनुसार- जाति परिवारों का समूह होती हैं। प्रायः व्यवसाय विशेष की सूचक होती हैं। प्रत्येक जाति का एक पौराणिक पुरुष होता है। पौराणिक पुरुष अदृश्य देवता भी हो सकता है। जाति के सभी सदस्य स्वयं को उस पुरुष या देवता के प्रति निष्ठावान रखते हैं। जाति की यह परिभाषा भी भारतीय जाति व्यवस्था का पूरा अर्थ नहीं प्रकट करती।

हिस्ट्री ऑफ कास्ट इन इंडिया में डॉ केतकर ने लिखा है- यह एक सामाजिक समूह होती हैं। इसकी सदस्यता संतति और इस प्रकार जन्मे लोगों तक ही सीमित रहती है। इसके सदस्यों पर कठोर सामाजिक नियमों के अधीन समाज के बाहर विवाह न करने पर पाबंदी रहती है। यहां जाति का सबसे प्रमुख गुण है कि जाति समूह के बाहर विवाह करने पर पाबंदी रहती है। एक विद्वान नेस्फील्ड ने लिखा है- जाति समाज का ऐसा समूह होती हैं जो अन्य वर्ग से किसी प्रकार का सम्बंध स्वीकार नहीं करती। इसके सदस्य अपने जाति समूह के बाहर अन्य जाति समूह से विवाह का रिश्ता नहीं जोड़ते। 

वे अन्य जातियों से खानपान का रिश्ता भी नहीं जोड़ते। लेकिन भारत में खानपान के बंधन टूट गए हैं। स्वाधीनता संग्राम के पहले से ही भारत में जातियों की अस्मिता को राष्ट्रीय एकता में बाधक माना गया था। संविधान निर्माता भी जातियों की समाप्ति चाहते थे। इसीलिए संविधान की उद्देशिका में जातियों का उल्लेख भी नहीं है। उद्देशिका संविधान का सारतत्व है। उद्देशिका का प्रारम्भ, हम भारत के लोग से होता है। पूरे देश के जन गण मन को हम भारत के लोग के दायरे में रखना और अभिज्ञात करना संविधान निर्माताओं का स्वप्न रहा है। उद्देशिका संविधान का प्राण है। संविधान की उद्देशिका में राष्ट्र के स्वप्न अन्तर्निहित हैं। जाति समाप्ति और हम भारत के लोग में विलय संविधान निर्माताओं का स्वप्न रहा है।

जातियां राष्ट्रीय एकता में बाधक है। लेकिन दुर्भाग्य से समाज में उनकी गहन उपस्थिति व अस्मिता है। विचारहीन राजनीति जाति अस्मिता को मजबूत करने पर आमादा है। दुनिया के प्रत्येक संविधान का एक दर्शन होता है। दर्शन विहीन संविधान राष्ट्र के अंतःकरण का भाग नहीं बनता। भारत के संविधान का एक दर्शन है। 

संविधान निर्माण के प्रारम्भ में पंडित नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य संकल्प का प्रस्ताव रखा था। यह प्रस्ताव 22 जनवरी, 1947 को पारित हुआ। संकल्प में कहा गया था- संविधान सभा भारत को स्वतंत्र, प्रभुत्व सम्पन्न गणराज्य के रूप में घोषित करने के अपने सत्यनिष्ठ संकल्प की और भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है। आगे कहा है- प्रभुत्व सम्पन्न स्वतंत्र भारत की सभी शक्तियां और अधिकार उसके संगठक भाग और शासन के सभी अंग लोक से उत्पन्न हैं। 

जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रतिष्ठा और अवसर की तथा विधि के समक्ष समता, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, उपासना, व्यवसाय, संगमन और कार्य की स्वतंत्रता, विधि और सदाचार के अधीन होगी। महत्वपूर्ण बात यह कही गई थी- यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए स्वेच्छा से अपना पूरा सहयोग देगी। यहां प्राचीन भूमि शब्द ध्यान देने योग्य है। भूमि का अर्थ धरती नहीं है। प्राचीन भूमि का अर्थ प्राचीन संस्कृति है। इसी संकल्प से उद्देशिका की रचना हुई थी। उद्देशिका में जाति इकाई नहीं है। लेकिन राजनीति मरणासन्न जाति अस्मिता को बार बार पुनर्जीवन देती है।

भारत जातियों का संगठन नहीं है। संविधान में जातियों की अस्मिता नहीं है। डॉ अंबेडकर ने कहा था- जाति अप्राकृतिक है और यह बहुत दिन तक जीवित नहीं रह सकती। वैदिक काल में जातियां नहीं थीं। वर्ण व्यवस्था भी नहीं थी। उस समय सामाजिक समानता थी। राजनीति में मार्क्सवाद, पूंजीवाद, समाजवाद की तरह ब्राह्मणवाद शब्द प्रयोग भी चलता है। ब्राह्मणवाद का संकेत जाति व्यवस्था से है। जाति की समाप्ति के लिए अनेक महान नेताओं ने परिश्रम किये थे और अनेक संगठनों ने भी। कोलकाता के ब्रह्म समाज, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुछ समाजवादी विचारक भी जाति समाप्ति के पक्षधर थे। सबका उद्देश्य जाति समाप्ति था। शूद्र शब्द बहुत चलता है। सामूहिक रूप में शूद्र सैकड़ों व्यवसायों से जुड़े समूहों का साझा नाम हो सकता है। 

डॉ अंबेडकर के अनुसार अंतर्विवाह ही जाति उत्पत्ति का कारण है। कुछ वर्गों ने अपने लिए दूसरे वर्गों के सदस्यों के साथ विवाह पर रोक लगायी। डॉ अंबेडकर ने प्रश्न उठाया है- जाति उद्भव के अध्ययन से हमें इस प्रश्न का उत्तर मिलना चाहिए कि वो कौन सा वर्ग था जिसने अपने लिए बाड़ा खड़ा किया। डॉ अंबेडकर ने कहा है- मैं इसका प्रत्यक्ष उत्तर देने में असमर्थ हूं। ब्राह्मण वर्ग ने स्वयं की घेराबंदी एक जाति के रूप में क्यों कर ली। डॉ अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में जाति व्यवस्था पर शोधपूर्ण भाषण दिया था- मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं कि जाति धर्म का नियम मनु प्रदत्त नहीं है। 

वह ब्राह्मणों को जाति व्यवस्था का जन्मदाता नहीं मानते। कहते हैं- ब्राह्मण अनेक गलतियां करने के दोषी रहे हों और मैं कह सकता हूं वे ऐसे थे। लेकिन जाति व्यवस्था को गैर ब्राह्मणों पर लाद देने की उनकी क्षमता नहीं थी। अपनी तर्कपटुता से उन्होंने भले ही इस प्रक्रिया को सहायता प्रदान की हो। लेकिन अपनी ऐसी योजना को निश्चित रूप से अपने सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ा सकते थे। समाज को अपने स्वरूप के अनुरूप ढालना कितना गौरवशाली और कितना कठिन कार्य होता है।

 ऐसा कार्य करने में किसी को भी आनंद प्राप्त हो सकता है और वह इस प्रशस्ति कार्य को कर सकता है। लेकिन वह इसे बहुत आगे तक नहीं ले जा सकता। जाति समाप्ति के लिए कठिन परिश्रम की आवश्यकता है। राज बदलना आसान होता है। समाज बदलना कठिन। संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जातियों को चिह्नित कर विशेष रक्षोपाय देने की व्यवस्था की थी। पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए आयोग बनाने की भी व्यवस्था की गई थी। जातियां स्वाभाविक रूप में विदा हो रही हैं। यह शुभ है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-02-22 18:40:34
खरीद-फरोख्त की भट्ठी में जलता बचपन

मुकुंद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सूडान में इस साल पहली जनवरी को दुनिया का सबसे कुख्यात और अमीर मानव तस्कर किडेन जेकारियास हब्टेमरियाम इंटरपोल के हत्थे चढ़ चुका है। वह अफ्रीकी देश इरीट्रिया का रहने वाला है। हब्टेमरियाम के लीबिया में संचालित शिविर में यूरोप जाने के लिए लालायित हजारों पूर्वी अफ्रीकी प्रवासियों को बंधक बनाकर रखा जाता था। खुलासा हुआ था कि इस शिविर में बंधक बनाकर रखी गई महिलाओं और बच्चों का यौन शोषण कराया जाता था। देश-दुनिया में फलते-फूलते इस उद्योग की जड़े कितनी गहरी हैं, इसका खुलासा 24 घंटे पहले जयपुर में जारी की गई रेलवेज-मेकिंग द ब्रेक इन ट्रैफिकिंग नामक रिपोर्ट से भी होता है। 

इस रिपोर्ट को नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी और रेलवे सुरक्षा बल के महानिदेशक संजय चंदर ने जयपुर में 18वीं यूआईसी विश्व रेलवे सुरक्षा कांग्रेस में सार्वजनिक किया है। इसमें कहा गया है कि आज मानव तस्करी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित आपराधिक उद्योग है। यह रिपोर्ट हर संवेदनशील, विकासशील, प्रगतिशील व्यक्ति और राष्ट्र को चुनौती देती है। कैलाश सत्यार्थी इस दिशा में 1980 से बचपन बचाओ आंदोलन के माध्यम से काम कर रहे हैं।

बचपन बचाओ आंदोलन और रेलवे सुरक्षा बल का संयुक्त अध्ययन रेलवेज-मेकिंग द ब्रेक इन ट्रैफिकिंग आंखें खोलने के लिए काफी है। बचपन बचाओ आंदोलन अब तक 1,13,500 बच्चों को क्रूर पंजों से छुड़ा चुका है। सत्यार्थी अब यह अभियान रेलवे सुरक्षा बल के साथ मिलकर चला रहे हैं। उनका मानना है कि इस घिनौने और बर्बर उद्योग से जुड़े खूंखार मानव तस्कर आमतौर पर रेलगाड़ियों का प्रयोग करते हैं। इस संगठित आपराधिक उद्योग की कमर तोड़ने में यह बल महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। 

बचपन बचाओ आंदोलन के इस मकसद को पूरा करने में रेलवे सुरक्षा बल से काफी मदद मिल रही है। जनवरी, 2020 से अब तक 1600 से ज्यादा बच्चों को मानव तस्करों के चंगुल से छुड़ाया जा चुका है। इन बच्चों को रेलवे स्टेशन और ट्रेन के डिब्बों से अपराधियों को दबोचकर मुक्त कराया गया। खुशी की बात है कि बचपन बचाओ आंदोलन और रेलवे सुरक्षा बल कई साल से ऐसे अपराधियों के चेहरों से नकाब हटा रहे हैं। यह उद्योग अरबों डॉलर की कमाई का साधन बन चुका है।

इन बच्चों से जबरन मजदूरी, वेश्यावृत्ति और भीख मंगवाई जाती है। किशोरियों को शादी के लिए बेच दिया जाता है। यह कितना दुखद है कि कोविडकाल में लॉकडाउन इन मानव तस्करों के लिए उत्सव की तरह रहा। यह किसी से छिपा नहीं है कि इस काल ने लाखों लोगों को गरीबी की ओर धकेला और इन अपराधियों ने इन बेवश परिवारों को शिकार बनाया। रेलवे सुरक्षा बल ने जनवरी, 2020 से अब तक संयुक्त छापामार कार्रवाई में 337 मानव तस्करों को गिरफ्तार भी किया गया है। सत्यार्थी कहते हैं कि संभवत: यह दुनिया में मानव तस्करों के खिलाफ सबसे बड़ा अभियान है। 

रेलवे सुरक्षा बल के महानिदेशक संजय चंदर की भूमिका इस अभियान में स्वप्नदर्शी जैसी है। वह इंटरनेशनल यूआईसी सेक्योरिटी प्लेटफॉर्म के चेयरमैन भी हैं। इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के मौके पर आयोजित समारोह में इस प्लेटफॉर्म के 22 सदस्य देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। 

इन प्रतिनिधियों ने बचपन बचाओ आंदोलन और रेलवे सुरक्षा बल के इस अभिनव अभियान को अपने यहां लागू करने पर सहमति जताई है। सभी का मानना है कि बच्चों को सुरक्षित रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अच्छी बात यह है कि इस समय दुनियाभर में नई बाल सुरक्षा नीति की जरूरत महसूस की जा रही है। सत्यार्थी और चंदर ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में 2021 में रोजाना आठ बच्चों की तस्करी और उनका उत्पीड़न होने संबंधी आंकड़ा दिया गया है। इस आकंड़े के मुताबिक इस साल भारत में मानव तस्करी के कुल 2,189 मामले दर्ज किये गये। 2020 में यह संख्या 1,714 थी। विशेषज्ञों ने रिपोर्ट पर चिंता जताते हुए देश में सख्त मानव तस्करी रोधी कानून लागू करने की मांग की थी। कहते हैं बाल शोषण दुनिया का सबसे बुरा काम है। बुरे काम का नतीजा भी बुरा ही होता है। 

मशहूर फाइनेंशर अमेरिका का जेफरी एप्सटिन यौन संतुष्टि के लिए बच्चों की खरीद-फरोख्त के लिए दुनिया में कुख्यात रहा है। एप्सटिन को सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे किया था। अगस्त 2019 में उसने मैनहटन की जेल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। उसके आत्मघाती अंत से क्रूर अपराधियों को सबक लेने की जरूरत है। जेफरी एपस्टीन पर सेक्स रैकेट चलाने और अमेरिका के कई बड़े राजनेताओं को लड़कियां सप्लाई करने का आरोप भी रहा है।

Published / 2023-02-17 23:50:45
मानवता के पुजारी थे रामकृष्ण परमहंस

फरवरी जयन्ती पर विशेष

रमेश सर्राफ धमोरा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्वामी रामकृष्ण परमहंस भारत के सुप्रसिद्ध संत, महान विचारक व मानवता के पुजारी थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सभी धर्मों को एक बताते हुए उनकी एकता पर जोर दिया था। उनका मानना था कि सभी धर्मों का आधार प्रेम है। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति की। अपनी साधना से रामकृष्ण इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुंचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।

इनका जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में कामारपुकुर नामक गांव में 18 फरवरी 1836 को एक निर्धन निष्ठावान ब्राहमण परिवार में हुआ था। इनके जन्म पर ही ज्योतिषियों ने रामकृष्ण के महान भविष्य की घोषणा कर दी थी। ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सुन इनकी माता चन्द्रा देवी तथा पिता खुदिराम अत्यन्त प्रसन्न हुए। इनको बचपन में गदाधर नाम से पुकारा जाता था। पांच वर्ष की उम्र में ही वो अदभुत प्रतिभा और स्मरणशक्ति का परिचय देने लगे। अपने पूर्वजों के नाम व देवी-देवताओं की स्तुतियां, रामायण, महाभारत की कथायें इन्हे कंठस्थ याद हो गयी थी।

1843 में इनके पिता का देहांत हो गया तो परिवार का पूरा भार इनके बड़े भाई रामकुमार पर आ पड़ा था। रामकृष्ण जब नौ वर्ष के हुए इनके यज्ञोपवीत संस्कार का समय निकट आया। उस समय एक विचित्र घटना हुई। ब्राह्मण परिवार की परम्परा थी कि नवदिक्षित को इस संस्कार के पश्चात अपने किसी सम्बंधी या किसी ब्राह्मण से पहली शिक्षा प्राप्त करनी होती थी। एक लुहारिन जिसने रामकृष्ण की जन्म से ही परिचर्या की थी। बहुत पहले ही उनसे प्रार्थना कर रखी थी कि वह अपनी पहली भिक्षा उसके पास से प्राप्त करे। लुहारिन के सच्चे प्रेम से प्रेरित हो बालक रामकृष्ण ने वचन दे दिया था।

अतः यज्ञोपवित के पश्चात घर वालों के लगातार विरोध के बावजूद इन्होंने ब्राह्मण परिवार में प्रचलित प्रथा का उल्लंघन कर अपना वचन पूरा किया और अपनी पहली भिक्षा उस लुहारिन से प्राप्त की। यह घटना सामान्य नही थी। सत्य के प्रति प्रेम तथा इतनी कम उम्र में सामाजिक प्रथा के इस प्रकार उपर उठ जाना रामकृष्ण की आध्यात्मिक क्षमता और दूरदर्शिता को ही प्रकट करता है।

रामकृष्ण का मन पढ़ाई में न लगता देख इनके बड़े भाई इन्हे अपने साथ कलकत्ता ले आये और अपने पास दक्षिणेश्वर में रख लिया। यहां का शांत एवं सुरम्य वातावरण रामकृष्ण को अपने अनुकूल लगा। 1858 में इनका विवाह शारदा देवी नामक पांच वर्षीय कन्या के साथ सम्पन्न हुआ। जब शारदा देवी ने अपने अठारहवें वर्ष मे पदार्पण किया तब श्री रामकृष्ण ने दक्षिणेश्वर के अपने कमरे में उनकी षोड़शी देवी के रुप में आराधना की। यही शारदा देवी रामकृष्ण संघ में माताजी के नाम से परिचित हैं।

रामकृष्ण के जीवन में अनेक गुरु आये पर अन्तिम गुरुओं का उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। एक थी भैरवी जिन्होने उन्हे अपने कापालिक तंत्र की साधना करायी और दूसरे थे श्री तोतापुरी उनके अन्तिम गुरु। गंगा के तट पर दक्षिणेश्वर के प्रसिद्व मंदिर में रहकर रामकृष्ण मां काली की पूजा किया करते थे। गंगा नदी के दूसरे किनारे रहने वाली भैरवी को अनुभुति हुई कि एक महान संस्कारी व्यक्ति रामकृष्ण को उसकी दीक्षा की आवश्यकता हैं। गंगा पार कर वो रामकृष्ण के पास आयी तथा उन्हे कापालिक दीक्षा लेने को कहा। रामकृष्ण ने भैरवी द्वारा बतायी पद्धति से लगातार साधना कर मात्र तीन दिनों में ही सम्पूर्ण क्रिया में निपुण हो गये।

रामकृष्ण के अन्तिम गुरु तोतापुरी थे जो सिद्ध तांत्रिक तथा हठ योगी थे। उन्होने रामकृष्ण को दीक्षा दी। रामकृष्ण को दीक्षा दी गई परमशिव के निराकार रुप के साथ पूर्ण संयोग की। पर आजीवन तो उन्होंने मां काली की आराधना की थी। वे जब भी ध्यान करते तो मां काली उनके ध्यान में आ जाती और वे भावविभोर हो जाते। जिससे निराकार का ध्यान उनसे नहीं हो पाता था।

तोतापुरी ध्यान सिद्ध योगी थे। उनको अनुभव हुआ कि रामकृष्ण के ध्यान में मां काली प्रतिष्ठित हैं। उन्होने शक्ति सम्पात के द्वारा रामकृष्ण को निराकार ध्यान में प्रतिष्ठित करने के लिके बगल में पड़े एक शीशे के टुकड़े को उठाया और उसका रामकृष्ण के आज्ञाचक्र पर आघात किया जिससे रामकृष्ण को अनुभव हुआ कि उनके ध्यान की मां काली चूर्ण-विचूर्ण हो गई हैं और वे निराकार परमशिव में पूरी तरह समाहित हो चुके हैं। वे समाधिस्थ हो गये। ये उनकी पहली समाधी थी जो तीन दिन चली। तोतापुरी ने रामकृष्ण की समाधी टूटने पर कहा। मैं पिछले 40 वर्षो से समाधि पर बैठा हूं पर इतनी लम्बी समाधी मुझे कभी नही लगी।

रामकृष्ण परमहंस के पास जो कोई भी जाता वह उनकी सरलता, निश्चलता, भोलेपन और त्याग से इतना अभिभूत हो जाता कि अपना सारा पांडित्य भूलकर उनके पैरों पर गिर पड़ता था। गहन से गहन दार्शनिक सवालों के जवाब भी वे अपनी सरल भाषा में इस तरह देते कि सुनने वाला तत्काल ही उनका मुरीद हो जाता। इसलिए दुनियाभर की तमाम आधुनिक विद्या, विज्ञान और दर्शनशास्त्र पढ़े महान लोग भी जब दक्षिणेश्वर के इस निरक्षर परमहंस के पास आते तो अपनी सारी विद्वता भूलकर उसे अपना गुरु मान लेते थे।

इनके प्रमुख शिष्यों में स्वामी विवेकानन्द, दुर्गाचरण नाग, स्वामी अद्भुतानंद, स्वामी ब्रह्मानंदन, स्वामी अद्यतानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी प्रेमानन्द, स्वामी योगानन्द थे। श्री रामकृष्ण के जीवन के अन्तिम वर्ष कारुण रस से भरे थे। 15 अगस्त 1886 को अपने भक्तों और स्नेहितों को दुख के सागर में डुबाकर वे इस लोक में महाप्रयाण कर गये।

रामकृष्ण परमहंस महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। रामकृष्ण का सारा जीवन अध्यात्म-साधना के प्रयोगों में बीता। वे लगातार कई घंटों तक समाधि में लीन हो जाते थे। चैबीस घंटे में बीस-बीस घंटों तक वे उनसे मिलनेवाले लोगों का दुख-दर्द सुनते और उसका समाधान भी बताते।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के भोले प्रयोगवाद में वेदांत, इस्लाम और ईसाइयत सब एक रूप हो गए थे। निरक्षर और पागल तक कहे जाने वाले रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन से दिखाया था कि धर्म किसी मंदिर, गिरजाघर, विचारधारा, ग्रंथ या पंथ का बंधक नहीं है। रामकृष्ण परमहंस मुख्यतः आध्यात्मिक आंदोलन के प्रणेता थे। जिन्होंने देश में राष्ट्रवाद की भावना को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती हैं।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के लिये उनके परम् शिष्य स्वामी विवेकानन्द ने एक मई 1897 को बेलुड़ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इस मिशन की स्थापना के केंद्र में वेदान्त दर्शन का प्रचार-प्रसार है। रामकृष्ण मिशन के उद्देश्य मानवता के सर्वांगीण कल्याण के लिए काम करना, विशेष रूप से गरीबों और दलितों के उत्थान के लिए। मार्च 2022 तक रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ के पूरे विश्व में 265 केंद्र कार्यरत हैं।

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