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Published / 2026-07-08 11:33:50
पीएम नरेंद्र मोदी को प्राप्त 35वां सर्वोच्च विदेशी नागरिक सम्मान

  • पीएम नरेंद्र मोदी को प्राप्त 35वां सर्वोच्च विदेशी नागरिक सम्मान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल मंगलवार को इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान वितांक एडिपुरना ऑफ द रिपब्लिक इंडोनेशिया से जकार्ता में आयोजित एक विशेष सम्मान समारोह में सम्मानित किया। 

यह सम्मान इंडोनेशिया की एकता, निरंतरता एवं समृद्धि के लिए योगदान करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। यह मोदीजी को प्राप्त 35वां विदेशी नागरिक सम्मान है। मोदीजी के बारे में भ्रामक प्रचार किया जाता रहा है कि वे इस्लाम विरोधी सोंच रखने वाले व्यक्ति हैं, जबकि इंडोनेशिया मुस्लिम बहुल आबादी वाला देश है। 

इसके पहले मुस्लिम आबादी वाले देश सऊदी अरब, फिलिस्तीन, मालदीव, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान मिस्र ने भी अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदीजी को दिया है। दुनिया के भर के देशों के मध्य मतभेदों में मोदीजी के नेतृत्व में भारत को एक सेतु की भूमिका में स्वीकार किया जाना, मोदीजी को प्राप्त हो रहे हैं नागरिक सम्मान से स्वत: सिद्ध हो रहा है। 

मोदीजी का सम्मान वास्तव में भारत का सम्मान है। विश्व के मंच पर कभी भारत की अनदेखी की जाती थी लेकिन आज भारत को एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, सुदृढ़ विकसित अर्थव्यवस्था, ज्ञान विज्ञान कला साहित्य से समृद्ध एक विश्वसनीय राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। 

Published / 2026-07-01 10:50:46
सबको साथ लेकर चलने की नीति पर अडिग पीएम मोदी

  • सबको साथ लेकर चलने की नीति पर अडिग पीएम मोदी

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद से मोदीजी के कार्यकाल में भारत दुनिया के मंच में एक दूरदर्शी खिलाड़ी/ Proactive Player के स्वरूप में स्थान बनाया है। आज की तिथि में डोनाल्ड ट्रंप, व्लादिमीर पुतिन, शी जिनपिंग, नितिनयाहू, अयातुल्ला मोजतबा ख़ामेनेई से उनके बीच तनाव एवं विवाद के रहते मोदी जी सबसे बात कर सकते हैं। 

रस से बात कर सकते हैं तो यूक्रेन से भी उनकी बात होती है। भारत की छवि उन्होंने एक विश्वसनीय देश के रूप में स्थापित करने की सफलता प्राप्त की है। दुनिया के कई देशों में अपने यहां के सबसे प्रतिष्ठित सम्मान से मोदीजी को सम्मानित किया है।

अभी हाल में ही मोदी जी ने सबसे लंबे निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है, जो 144 करोड़ जनता के मध्य उनकी लोकप्रियता को सिद्ध करता है। मोदीजी का मूल मंत्र सबका साथ, सबका विकास, और सब का प्रयास उनकी गारंटी को जनसामान्य का विश्वासपात्र बनाया है।

मोदी की आयु 75 वर्ष की हो चुकी है। प्रधानमंत्री रहते हुए पिछले 12 वर्षों में वे कभी थके हुए दिखाई नहीं दिए, उन्होंने कभी छुट्टी नहीं ली और दुनिया के प्रतिस्पर्धा में आशा एवं आत्मविश्वास से नित्य नए-नए मिल के पत्थरों को स्थापित करते जा रहे हैं। 

राजनीतिक दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) को उन्होंने सशक्त बनाया है परिणाम यह है कि आज देश के 20 राज्यों से अधिक राज्य में डबल इंजन की सरकार चल रही है। परिवारवादी क्षेत्रीय दलों के अधिकांश नेता मोदीजी की कार्य पद्धति और विश्वसनीयता से प्रभावित होकर उनके साथ काम करने की इच्छा रखते हुए उनकी ओर आकर्षित हो रहे हैं। 

भारत में लोकतंत्र के संविधान में मोदीजी की गहरी आस्था है, राष्ट्र प्रथम उनकी भावनाओं में प्रवाहित है और उनका व्यक्तिगत जीवन अत्यंत सधा एवं कसा हुआ है; और यही वे मूल कारक हैं जिसके आधारशिला पर मोदी जी का व्यक्तित्व खड़ा हुआ है। (लेखक स्वतन्त्र स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

Published / 2026-06-29 22:04:14
अंग्रेज समझे हूल दब गया, इतिहास ने कहा- संघर्ष अभी जिन्ंदा है...

हजारीबाग से उठी चुनौती, वर्षों तक बेचैन रहा ब्रिटिश प्रशासन 30 जून : हूल दिवस पर विशेष 

डॉ शत्रुघ्न कुमार पाण्डेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 30 जून को देश संताल हूल दिवस मनाता है। अधिकांश स्मरण 1855 के भगनाडीह और सिदो-कान्हू, चांद तथा भैरव मुर्मू के नेतृत्व में फूटे उस महान विद्रोह तक सीमित रह जाते हैं, जिसने अंग्रेजी शासन को आदिवासी भारत की संगठित शक्ति का परिचय कराया। किंतु हूल केवल एक दिन, एक वर्ष या एक क्षेत्र की घटना नहीं था। उसकी ज्वाला दामिन-ए-कोह से निकलकर छोटानागपुर, विशेषकर हजारीबाग की धरती पर लंबे समय तक धधकती रही। हूल का वास्तविक इतिहास उसकी निरंतरता में छिपा है। 

हूल के दमन के बाद बड़ी संख्या में संताल योद्धाओं और नेताओं को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया। अंग्रेज अधिकारियों को लगा कि नेतृत्व को कैद कर देने से प्रतिरोध समाप्त हो जायेगा। लेकिन कुछ ही महीनों बाद यह विश्वास टूट गया। अप्रैल 1856 में सैकड़ों संताल अपने बंदी साथियों को मुक्त कराने के लिए हजारीबाग जेल पर टूट पड़े। जेल भवन में आग लगा दी गई। जेल अस्पताल, मालखाना और संतरी चैकी पर तीरों की बौछार हुई। प्रशासन ने पहले इसे कुछ बरकंदाजों की शरारत मानकर टालना चाहा, किंतु शीघ्र ही स्पष्ट हो गया कि यह किसी छोटे समूह की दुस्साहसिक घटना नहीं, बल्कि जीवित प्रतिरोध की उद्घोषणा थी। संताल अपने नेताओं को मुक्त नहीं करा सके, पर अंग्रेजी शासन को यह संदेश अवश्य दे गए कि हूल अभी जिंदा है। 

लगभग एक वर्ष बाद वही हजारीबाग फिर इतिहास के केंद्र में था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में जब विद्रोही सैनिकों ने जेल पर धावा बोला और फाटक तोड़ा, तब सबसे बड़ी संख्या उन संताल बंदियों की थी जिन्हें हूल और उसके पहले और बाद के संघर्षों में कारावास मिला था। जेल से बाहर निकलते ही वे अपने गाँवों और समुदायों में लौटे। उन्होंने एक बार फिर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध हथियार उठा लिए। इस प्रकार हूल और 1857 का महासमर हजारीबाग की धरती पर एक-दूसरे से जुड़ गए।  

अब संघर्ष का स्वरूप भी बदल चुका था। यह केवल हथियारों का प्रतिरोध नहीं रहा। संतालों ने फसल-दखल आंदोलन आरंभ किया। जिन जमींदारों और महाजनों को वे अंग्रेजी शासन का सहायक मानते थे, उनके खेतों से अनाज अपने अधिकार में लेना शुरू कर दिया। रूपु मांझी के नेतृत्व में यह आंदोलन गोला, चितरपुर, गोमिया, पेटरवार, चास और मानभूम तक फैल गया। यह केवल अन्न प्राप्त करने का प्रयास नहीं था, यह उस भूमि पर अधिकार की घोषणा थी जिसे संतालों अपने श्रम से उपजाऊ बनाया था।  

इन घटनाओं ने ब्रिटिश प्रशासन की चिंता को चरम पर पहुंचा दिया। उनका भय था कि यदि संताल ग्रैंड ट्रंक रोड तक पहुंच गए या उसे पार कर गए, तो कलकत्ता और उत्तर भारत के बीच साम्राज्य का सबसे महत्त्वपूर्ण संपर्क मार्ग संकट में पड़ जाएगा। इसी आशंका में बगोदर और बरही के बीच सैनिक बढ़ाये गये, यूरोपीय और सिख सैनिकों की टुकड़ियां भेजी गयीं, टेलीग्राफ कार्यालय को बगोदर से बरही स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया और शेरघाटी में कटते तारों की खबरों ने औपनिवेशिक शासन के होश उड़ा दिये थे।  

यह केवल सुरक्षा-व्यवस्था नहीं थी, यह उस भय का प्रमाण था, जो संताल प्रतिरोध ने औपनिवेशिक शासन के भीतर पैदा कर दिया था। उधर रूपू मांझी और उनके साथियों की गतिविधियां रुक नहीं रही थीं। ब्रिटिश समर्थक जमींदार उनके निशाने पर थे। गांवों में अनाज जब्त किया जा रहा था। राजा रामगढ़ स्वयं चिंतित थे और अतिरिक्त सैनिकों की मांग कर रहे थे। अंतत: अंग्रेजी शासन ने स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों, सिख सैनिकों और यूरोपीय टुकड़ियों की सहायता से व्यापक सैन्य अभियान चलाया। गांव जलाये गये, नेताओं के घर नष्ट किए गए, इनाम घोषित हुए और सैकड़ों संताल एक बार फिर से गिरफ्तार किये गये। तब जाकर यह प्रतिरोध धीरे-धीरे दबाया जा सका।  

हूल दिवस केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, यह इतिहास को उसकी संपूर्णता में समझने का भी दिन है। यदि हम हूल को केवल 30 जून 1855 की घटना मानते हैं, तो उसके सबसे महत्त्वपूर्ण अध्याय हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं। हजारीबाग जेल पर हमला, 1857 के महासमर में संताल बंदियों की निर्णायक भूमिका, फसल-दखल आंदोलन और ब्रिटिश शासन की बढ़ती प्रशासनिक घबराहट इस तथ्य के साक्ष्य हैं कि हूल ने औपनिवेशिक सत्ता को वर्षों तक चुनौती दी। संताल हूल भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का केवल प्रारंभिक विद्रोह नहीं, बल्कि उस दीर्घ प्रतिरोध परंपरा का आधार स्तंभ है, जिसने अंतत: विदेशी शासन की जड़ों को हिला दिया। आज हूल दिवस पर उन ज्ञात-अज्ञात संताल वीरों को स्मरण करने का सबसे सार्थक तरीका यही है कि उनके संघर्ष को इतिहास के सीमित अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय स्वाधीनता चेतना की सतत् और जीवंत धारा के रूप में देखा जाए। (लेखक इतिहास के प्रोफेसर, क्षेत्रीय इतिहास के अध्येता-शोधकर्ता और दर्जन भर पुस्तकों के लेखक हैं।) 

Published / 2026-06-23 13:34:48
जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते थे डॉ श्यामा प्रसाद

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते थे। जम्मू कश्मीर में शेष भारतीयों के लिए प्रवेश के लिए परमिट, अलग झंडा और वहां के लिए विशेष कानून अनुच्छेद 370 का वे प्रबल विरोधी थे।

जम्मू कश्मीर के जमीन से अपना विरोध प्रकट करने के लिए वे 11 मई 1953 को बिना परमिट बनवाए श्रीनगर गए तो वहां की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल में बंद करते हुए नजरबंद कर दिया। बताया गया कि जेल में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी और 23 जून 1953 को जेल में रहते हुए उनकी रहस्य में मृत्यु की घोषणा कर दी गई। उस समय डॉक्टर साहब की आयु मात्र 52 वर्ष की थी।

भारतीय जनता पार्टी 23 जून को उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण, देशभक्ति एवं बलिदान के सम्मान में बलिदान दिवस के रूप में मानती चली आ रही है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, राष्ट्रभक्त, दूरदर्शी, अमर शहीद, भारत को उसके पुरातन संस्कृति एवं दिशा की और उन्मुख करने वाले राजनीतिज्ञ डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रेरणादायक स्मृति को शत-शत नमन। 

Published / 2026-06-17 18:35:59
पीएम मोदी की अगली चुनौती भविष्य को संवारने की

पीएम मोदी की अगली परीक्षा इतिहास को दोहराने की नहीं, बल्कि भविष्य को संवारने की चुनौती  

मोदी और उनके विशाल समर्थक वर्ग के लिए अब समय आ गया है कि वे इस सोच से बाहर निकलें कि प्रधानमंत्री ने किसी की तुलना में देश के लिए क्या किया है 

शेखर गुप्ता 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। बीते सप्ताह यही बात खबरों में रही कि नरेंद्र मोदी ने निरंतर सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मोदी और नेहरू के बीच यह तुलना खूब होती रही है कि दरअसल किसने भारत के लिए क्या किया। अब वक्त आ गया है कि हम भविष्य की बात करें क्योंकि मोदी अभी भी पद पर हैं। उनके इस कार्यकाल में तीन वर्ष का समय बचा है और यकीनन वह 2029 का चुनाव भी लड़ेंगे और कौन जाने शायद 2034 का भी। 

आखिर ट्रंप भी तमाम संवैधानिक सीमाओं के बावजूद अतीत में तीसरे कार्यकाल की बात कर ही चुके हैं, जबकि इसी महीने वह 80 वर्ष के होने वाले हैं। इसके अलावा व्लादीमिर पुतिन को पेइचिंग में तीन सितंबर 2025 को दूसरे विश्वयुद्ध की 80वीं सालगिरह पर आयोजित सैन्य परेड में माइक पर शी चिनफिंग से यह कहते सुना गया कि वर्तमान चिकित्सकीय प्रगति के साथ कोई चाहे तो 150 साल की उम्र तक शासन कर सकता है। 

यह अनुमान उचित है कि मोदी इतने लंबे समय तक बने रहेंगे कि हम आगे आने वाली चुनौतियों पर विचार कर सकें। मैं पांच चुनौतियां सामने रखने वाला हूं। पहली चुनौती स्पष्ट है कि उन्हें अतीत से छुटकारा पाना होगा। नेहरू, इंदिरा या अन्य किसी से तुलना अब समाप्त होनी चाहिए। जब नेहरू का निधन हुआ तब मोदी 14 वर्ष के थे और मैं सात वर्ष का भी नहीं था। 

अब से मोदी को उनके अपने युग से परिभाषित किया जाना चाहिए न कि उस युग से जो भारत में बहुत पहले आया था। सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में तुलना अब उनके पहले 12 वर्षों में किये गये कार्यों से होनी चाहिए। यदि वह एक स्थायी विरासत बनाना चाहते हैं, तो यह भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़े नेहरू-विरोधी के रूप में नहीं हो सकती। यह उनके अपने नाम पर एक विरासत होगी। 

इसके लिए उन्हें अतीत पर निर्भर रहना बंद करना होगा। आज का चालू या पूंजी खाता संकट, कमजोर होता रुपया अब इस तरह नहीं समझाया जा सकता कि क्या आप भूल गये कि 1991 या 2013 में संकट कितना बुरा था। क्या मोदी और भाजपा अब आगे बढ़ सकते हैं? यह अब मोदी की पहली चुनौती है।किसी भी लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री की तरह मोदी ने भी अपने हिस्से के संकट देखे हैं। 

इनमें से तीन वैश्विक थे: कोविड, यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्ध। उनकी दूसरी चुनौती तीसरे से जुड़ी है। इतना शक्तिशाली नेता डॉनल्ड ट्रंप के शेष कार्यकाल से कैसे निपटेगा? अब तक वे उनसे समभाव से निबटते रहे हैं। मोदी यूरोप, और अमेरिका के दूसरे मित्र देशों से संकेत लेते हुए शांत रहने और किसी उकसावे में न आने की नीति अपनाते रहे हैं। 

लेनदेन वाला पहलू और मजबूत होगा और भारत इसका प्रबंधन कर सकता है। जैसा कि पश्चिम एशिया का युद्ध दिखाता है, भारत ने पहले ही इजरायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के रूप में अपना पक्ष चुन लिया है। कोई ऐसा कहेगा नहीं लेकिन तथ्य यही बताते हैं। जल्दी ही अमेरिका के साथ कारोबारी समझौता हो सकता है। कारोबारी रिश्ते और व्यापार भारत के कारोबारी प्रमुखों के सक्रिय सहयोग से जारी रहेंगे। 

आमतौर पर आप यह मानकर चल सकते हैं कि ट्रंप चाहे जितना उकसाएं, मोदी के आलोचक चाहे जितने ताने दें लेकिन मोदी उकसावे में नहीं आएंगे। हां, लेकिन बड़ा संकट कभी न कभी उभर सकता है। पाकिस्तान ने ट्रंप के लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए वह केवल अपने फील्ड मार्शल की तारीफों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। वह चाहता है कि कश्मीर का उल्लेख किया जाए चाहे वह जितने अस्पष्ट तरीके से आये। 

चाहे वह केवल ट्रुथ सोशल की पोस्ट में आये। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और पश्चिमी मोर्चे पर संघर्ष छिड़ा हुआ है। उन्हें इन सबसे निजात पाने की जरूरत है। मुनीर की नजर में यह कश्मीर मुद्दे को उभार कर और घड़ी की सुइयों को वापस 5 अगस्त, 2019 की ओर ले जाने में है। मोदी इस चुनौती को लेकर क्या प्रतिक्रिया देंगे? उसका समय आ गया है और इसके लिए करीब ढाई साल का रणनीतिक धैर्य रखना होगा। 

इसे उचित ठहराने के लिए और रणनीतिक धैर्य बनाए रखने के लिए हमें सैन्य शक्ति की जरूरत है। अगर मोदी अपने 12 साल के कार्यकाल की ओर पलट कर देखते हैं तथा नेहरू और 1962 को भूल जाते हैं तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने रक्षा पर बहुत अधिक खर्च नहीं किया है। यहां तक कि उपलब्ध राशि को भी पूरी तरह खर्च नहीं किया गया क्योंकि खरीद को लेकर दिक्कतें मौजूद हैं। 

काफी सुधार नजर आने वाला है। खासकर निजी क्षेत्र में खुलापन आने वाला है। लेकिन परिणाम आने में समय लगेगा। तब तक एक तात्कालिकता का भाव होना चाहिए क्योंकि मुनीर कभी भी फिर से संकट खड़ा कर सकते हैं। इसके लिए छह महीने, दो साल और पांच साल की योजना की आवश्यकता है। रणनीतिक और सामरिक शक्ति की नींव अर्थव्यवस्था है। 

लंबे समय से भारत ने यह दावा करके खुद को सांत्वना दी है कि वह सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए यह पर्याप्त नहीं है। प्रधानमंत्री को अपने न्यूनतम सरकार के वादों पर खरा उतरना होगा और वह स्पष्ट बयान भी सही साबित करना होगा जो उन्होंने महामारी के बाद दिया था। 

उन्होंने कहा था कि चूंकि सरकार का कारोबार में कोई काम नहीं है इसलिए वह कुछ रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर सभी क्षेत्रों से बाहर निकल जाएगी। इन वर्षों में इसका उल्टा हुआ है। कई नई सरकारी कंपनियां स्थापित की गयी हैं और आईडीबीआई की बिक्री जैसे सामान्य अवसर भी लंबित हैं। संकट के समय सरकार ने अपनी गलतियों को वापस लेने की क्षमता दिखाई है।

हम इसे मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़, बॉन्ड में विदेशी निवेश पर करों की वापसी और अब एक नयी उदार द्विपक्षीय निवेश संधि (बीआईटी) की चर्चा में देखते हैं जबकि पहले की सभी संधियां समाप्त कर दी गई थीं। किसी संकट से सीखने वाली और अपनी नीतियों को इतनी नाटकीय रूप से बदलने की इच्छा दिखाने वाली सरकार का होना एक अच्छा संकेत है। भारत को इसकी और भी ज्यादा जरूरत है। 

खनन, हाइड्रोकार्बन अन्वेषण, शहरीकरण और यहां तक कि साधारण चीजों जैसे छत पर सौर ऊर्जा। इस क्षेत्र में पाकिस्तान हमसे कहीं आगे है। हमें प्रधानमंत्री द्वारा फरवरी 2024 में घोषित योजना (पीएम सूर्य घर योजना) को गति देने के लिए इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। हिंदुत्व के साथ मिलकर यह वृद्धि दर जिसे हम हिंदुत्व वृद्धि दर कह सकते हैं शायद चुनाव जितवा दे। लेकिन यह भारत के लिए कमजोर प्रदर्शन होगा। 

चौथी चुनौती, तब, वास्तव में सरकार को कारोबार से दूर करने की होगी। पांचवीं और अंतिम चुनौती राजनीतिक होनी चाहिए। मोदी-शाह संयोजन ने अब तक उल्लेखनीय कौशल दिखाया है। लोक सभा में 240 सीटों के अल्पमत से शुरू करके भी वे भारत को लगभग एक-दलीय प्रणाली में बदलने में सफल रहे। लेकिन राजनीति में चीजें हमेशा एक सी नहीं होतीं। 

इस शक्ति का बड़ा हिस्सा नये सहयोगियों पर निर्भर है या अन्य छोटे दलों को तोड़ने पर। किसी समय कोई सहयोगी असंतोष दिखा सकता है, कोई मुख्यमंत्री बड़ी गड़बड़ी कर सकता है। खासकर राज्य की राजधानियों में पार्टी द्वारा चुने गये कुछ प्रतिभाशाली नेताओं को देखते हुए। भले ही भाजपा में कोई उत्तराधिकार की बात नहीं करे लेकिन 2029 के करीब आते-आते पार्टी में किसी प्रकार की प्राथमिक प्रक्रिया की फुसफुसाहट अनिवार्य रूप से शुरू होगी। 

कम से कम चार दावेदार 2034 के लिए मौजूद होंगे, हालांकि तब वे भी अपनी उम्र के पांचवें या छठे दशक में होंगे। विपक्ष की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कह सकते हैं कि मोदी की राजनीतिक चुनौतियां भाजपा के भीतर से उठेंगी। मोदी के सामने आने वाली पांच सबसे बड़ी चुनौतियां यही हैं। और याद रखिए कि इसमें सबसे पहले अतीत को भूलने की बात है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-06-12 20:49:29
आयुर्वेद : भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति, आधुनिक जीवन की संजीवनी

ऐश्वर्या सिंघानिया 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्- अर्थात शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रथम साधन है। हजारों वर्ष पहले भारत के ऋषि-मुनियों ने इस सत्य को समझा और स्वस्थ शरीर के लिए एक सम्पूर्ण विज्ञान विकसित किया, जिसका नाम है आयुर्वेद। आयुर्वेद दो शब्दों से बना है- आयु: यानी जीवन और वेद यानी ज्ञान। अर्थात आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ है जीवन का विज्ञान। यह केवल रोगों की चिकित्सा नहीं, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का शमन करने की समग्र पद्धति है। 

आयुर्वेद का इतिहास और मूल सिद्धांत   

आयुर्वेद की उत्पत्ति वैदिक काल में हुई। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय इसके तीन प्रमुख ग्रंथ हैं। महर्षि चरक को चिकित्सा का पितामह और महर्षि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है। सुश्रुत संहिता में 300 से अधिक शल्य क्रियाओं और 120 शल्य उपकरणों का वर्णन मिलता है, जो दर्शाता है कि 2500 वर्ष पहले भी भारत में सर्जरी कितनी उन्नत थी। 

आयुर्वेद का मूल आधार है त्रिदोष सिद्धांत- वात, पित्त और कफ। ये तीनों दोष पंचमहाभूतों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने हैं। जब ये तीनों दोष संतुलन में रहते हैं, तो शरीर स्वस्थ रहता है। असंतुलन ही रोग का कारण बनता है। आयुर्वेद हर व्यक्ति की प्रकृति को अलग मानता है। किसी की वात प्रकृति है, किसी की पित्त या कफ। इसलिए एक ही रोग की दवा हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। यह वैयक्तिक चिकित्सा की अवधारणा आज का आधुनिक विज्ञान भी अपना रहा है। 

रोकथाम पर जोर, उपचार पर नहीं   

आधुनिक एलोपैथी मुख्यत: रोग होने के बाद उपचार करती है। आयुर्वेद का मूल मंत्र है- स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं। यानी पहले स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करो, फिर रोगी का इलाज करो। इसके लिए आयुर्वेद ने दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार के नियम बताए हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, योग, तिल के तेल से अभ्यंग, सात्विक आहार, समय पर सोना- ये सब रसायन की तरह काम करते हैं और रोगों को पास नहीं आने देते। 

कोविड के बाद बढ़ी प्रासंगिकता   

कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को फिर से प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी का महत्व समझाया। उसी दौर में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा बताये गये काढ़े, हल्दी वाला दूध, गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी जैसे आयुर्वेदिक उपाय घर-घर में अपनाए गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी 2022 में गुजरात के जामनगर में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना की, जो आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। आज 2026 में आयुर्वेदिक उत्पादों का वैश्विक बाजार 10 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है। 

आधुनिक जीवन में आयुर्वेद की भूमिका   

आज की भागदौड़, तनाव, जंक फूड और प्रदूषण ने मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा जैसी लाइफस्टाइल डिजीज को जन्म दिया है। एलोपैथी इनमें लक्षणों को नियंत्रित करती है, पर आयुर्वेद जड़ पर काम करता है। पंचकर्म जैसी शोधन चिकित्सा शरीर से विषाक्त तत्व निकालकर दोषों को संतुलित करती है। शिरोधारा, अभ्यंग, नस्य जैसी क्रियाएं तनाव और माइग्रेन में अत्यंत लाभकारी हैं। त्रिफला, अश्वगंधा, ब्राह्मी, शतावरी जैसे रसायन शरीर और मन दोनों को बल देते हैं। 

चुनौतियां और आगे का मार्ग   

आयुर्वेद के सामने सबसे बड़ी चुनौती है मानकीकरण और वैज्ञानिक प्रमाण की। हर काढ़ा, हर भस्म एक जैसी गुणवत्ता की हो, इसके लिए आधुनिक शोध, क्लिनिकल ट्रायल और गुणवत्ता नियंत्रण जरूरी है। अच्छी बात है कि आईआईटी, एम्स और सीएसआईआर जैसे संस्थान अब आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं। नयी शिक्षा नीति में भी आयुर्वेद को स्कूली पाठ्यक्रम से जोड़ा जा रहा है ताकि नयी पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ सके। 

निष्कर्ष   

आयुर्वेद कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभव और परीक्षण पर आधारित विज्ञान है। यह हमें सिखाता है कि हम प्रकृति का हिस्सा हैं, प्रकृति से अलग नहीं। जब हम प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाते हैं, तो रोग आते हैं। आज जब पूरी दुनिया होलिस्टिक हेल्थ और सस्टेनेबल लिविंग की बात कर रही है, तो आयुर्वेद के पास हर प्रश्न का उत्तर है। आवश्यकता है इसे अंधानुकरण नहीं, बल्कि विवेक और विज्ञान के साथ अपनाने की। जैसा कि चरक संहिता में कहा गया है — धर्मार्थ काम मोक्षाणा मारोग्यं मूलमुत्तमम्। अर्थात धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल आधार आरोग्य ही है। आइये, आयुर्वेद को अपनाकर हम स्वस्थ भारत, समर्थ भारत के स्वप्न को साकार करें।

Published / 2026-06-11 21:42:07
आखिर वर्ल्ड कप आते ही क्यों दौड़ पड़ता है भारतीय शेयर बाजार?

  • 36 साल के आंकड़े कर देंगे हैरान 
  • फीफा वर्ल्ड कप के वर्षों में भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन ज्यादातर सकारात्मक रहा है, जिससे 2026 को लेकर उम्मीदें बढ़ गई हैं। 

पुनीत वाधवा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन फीफा वर्ल्ड कप के वर्षों में आमतौर पर मजबूत रहा है। पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि वर्ल्ड कप आयोजित होने वाले अधिकांश वर्षों में बीएसई सेंसेक्स ने निवेशकों को सकारात्मक रिटर्न दिया है। 

2006 में मिला सबसे ज्यादा रिटर्न 

आंकड़ों के अनुसार, वर्ल्ड कप वाले वर्षों में सेंसेक्स का रिटर्न 3.5 फीसदी से लेकर 46.7 फीसदी तक रहा है। वर्ष 2002 में जापान और दक्षिण कोरिया की संयुक्त मेजबानी में आयोजित टूर्नामेंट के दौरान सेंसेक्स ने करीब 3.5 फीसदी की बढ़त दर्ज की थी। 

वहीं 2006 में जर्मनी में हुए फीफा वर्ल्ड कप के दौरान भारतीय बाजार ने सबसे शानदार प्रदर्शन किया और सेंसेक्स लगभग 46.7 फीसदी उछल गया। हालांकि इस ट्रेंड में एक बड़ा अपवाद वर्ष 1998 रहा। उस साल सेंसेक्स में करीब 16.5 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। बाजार पर उस समय कई घरेलू और वैश्विक घटनाओं का असर देखने को मिला था। 

मई 1998 में भारत द्वारा किये गये पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका, जापान सहित कई देशों ने आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध लगाये थे। इन घटनाओं से निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई और बाजार दबाव में आ गया। बाद में ये प्रतिबंध हटा लिये गये, लेकिन उस वर्ष बाजार पर इसका असर साफ दिखाई दिया। 

राजनीतिक बदलाव भी रहा चर्चा में 

वर्ष 1998 भारतीय राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का गठन हुआ। राजनीतिक और आर्थिक घटनाक्रमों के बीच शेयर बाजार ने उस वर्ष कमजोर प्रदर्शन किया। 

1998 जैसी राह पर बढ़ रहा बाजार? सेंसेक्स में 13% गिरावट ने बढ़ायी निवेशकों की चिंता 

वर्ष 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन 1998 की याद दिलाता नजर आ रहा है। सेंसेक्स साल की शुरुआत से करीब 13 फीसदी तक टूटकर 73,900 के आसपास पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट ऐसे समय आयी है जब पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं को बढ़ा दिया है। 

पश्चिम एशिया संकट का बाजार पर असर 

विश्लेषकों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। तेल महंगा होने से भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ा है, वहीं रुपये में कमजोरी भी देखने को मिली है। इसके साथ ही विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने बाजार की गिरावट को और तेज कर दिया है। 

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर संशय 

बाजार की धारणा पर भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता भी भारी पड़ रही है। निवेशक फिलहाल किसी स्पष्ट दिशा का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी वैश्विक तेजी में भारतीय बाजार में बड़े एआई-आधारित निवेश अवसरों की कमी भी निवेशकों को उत्साहित नहीं कर पा रही है। 

वैश्विक और घरेलू चुनौतियां दोनों चिंता का कारण 

मॉर्गन स्टेनली के प्रबंध निदेशक और मुख्य भारत इक्विटी रणनीतिकार रिधम देसाई तथा नयंत पारेख की सह-लेखित रिपोर्ट के अनुसार, भू-राजनीतिक तनावों ने निवेशकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। 

उनका कहना है कि भारत के लिए प्रमुख जोखिम फिलहाल बाहरी कारकों से जुड़े हैं, जिनमें वैश्विक तनाव और दुनिया की धीमी आर्थिक वृद्धि शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू स्तर पर कृषि क्षेत्र की कम उत्पादकता और एम्बॉडीड एआई जैसी उभरती तकनीकों का श्रम बाजार पर संभावित प्रभाव भविष्य की प्रमुख चिंताओं में शामिल है। 

जून 2027 तक सेंसेक्स 89,000 के स्तर पर पहुंचने का अनुमान 

विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनी रहती है, निजी निवेश में तेजी आती है और आर्थिक वृद्धि दर ब्याज दरों की तुलना में मजबूत बनी रहती है, तो बीएसई सेंसेक्स जून 2027 तक 89,000 अंक के स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद और कॉरपोरेट आय में संभावित सुधार को ध्यान में रखकर लगाया गया है। 

पश्चिम एशिया तनाव से अगले छह महीने चुनौतीपूर्ण 

अल्फानिटी फिनटेक के सह-संस्थापक और निदेशक व यू आर भट्ट का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जल्द नहीं सुलझता है, तो अगले छह महीनों तक भारतीय बाजार सीमित दायरे में कारोबार कर सकते हैं। उनके अनुसार निफ्टी 22,800 से 23,400 अंकों के बीच घूमता रह सकता है। 

भट ने कहा कि मौजूदा समय में कई ऐसे कारक हैं जो बाजार की दिशा तय करेंगे। ऐसे में वर्ष के अंत तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है और उनके आधारभूत अनुमान के अनुसार 2026 के आखिर तक सूचकांक मौजूदा स्तरों के आसपास ही रह सकते हैं। 

युद्ध खत्म होने और कच्चे तेल में गिरावट से बन सकता है नया रिकॉर्ड 

यू. आर. भट के मुताबिक यदि अगले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया का संघर्ष समाप्त हो जाता है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो भारतीय शेयर बाजार नए रिकॉर्ड स्तर छू सकते हैं। तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक मानी जाती है, जिससे निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सकता है। 

वैश्विक ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने वर्ष के अंत तक निफ्टी के 26,000 अंक तक पहुंचने का अनुमान बरकरार रखा है। यह मौजूदा स्तरों की तुलना में करीब 12 प्रतिशत की संभावित बढ़त दर्शाता है। हालांकि फर्म का अनुमान है कि 2026 के अंत तक कुल रिटर्न लगभग स्थिर रह सकता है। 

बर्नस्टीन के प्रबंध निदेशक वेणुगोपाल गैरे का कहना है कि मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र में तनाव कम होने से बाजार में राहत की तेजी देखने को मिल सकती है, लेकिन यह लंबे समय तक टिकने वाली नहीं होगी। उनका मानना है कि कमजोर व्यापक आर्थिक संकेतक और इक्विटी इश्यूंस में संभावित बढ़ोतरी बाजार की तेजी को सीमित कर सकती है। इसी वजह से उन्होंने निफ्टी के लिए 26,000 का लक्ष्य बनाए रखते हुए अपनी न्यूट्रल रेटिंग बरकरार रखी है। 

फीफा वर्ल्ड कप और आर्थिक उथल-पुथल का पुराना संबंध 

दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में शामिल फीफा वर्ल्ड कप कई बार ऐसे दौर में आयोजित हुआ है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था किसी न किसी बड़े संकट से गुजर रही थी। बैंक आॅफ अमेरिका सिक्योरिटीज की एक रिपोर्ट में इस दिलचस्प पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया गया है। 

मेक्सिको में वर्ल्ड कप और कर्ज संकट का दौर 

रिपोर्ट के मुताबिक, 1986 में मेक्सिको में आयोजित फीफा वर्ल्ड कप का समय लैटिन अमेरिकी कर्ज संकट के दौर से मेल खाता था। 1980 के दशक में कई लैटिन अमेरिकी देशों को भारी ऋण और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा था, जिसका असर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर लंबे समय तक देखने को मिला। 

जापान को मेजबानी मिलने के बाद आया एशियाई वित्तीय संकट 

इसी तरह, 2002 फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी जापान को देने की घोषणा मई 1996 में की गई थी। इसके कुछ ही समय बाद 1997-98 के दौरान एशियाई वित्तीय संकट ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया। इस संकट का असर दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया समेत पूरे एशिया पर पड़ा था। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन अमेरिका, मेक्सिको और कनाडा में होना है। हालांकि, टूर्नामेंट से पहले ही वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता का माहौल बन गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे दुनियाभर के शेयर बाजारों में बिकवाली देखने को मिली है। 

भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल की कीमतें लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गयी हैं। वहीं सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती अनिश्चितता और ऊर्जा कीमतों में उछाल वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

Published / 2026-05-28 18:02:20
किसी भी टीम की बल्लेबाजी को तहस-नहस कर सकता है वैभव सूर्यवंशी

पवन कुमार पाण्डेय 

एबीएन स्पोर्ट्स डेस्क। उसके छक्कों पर हरभजन सिंह, इरफान पठान और अश्विन जैसे दिग्गज स्टैंडिंग ओवेशन देते हैं। आउट हो जाता है तो अनिल कुंबले, संजय बांगड़ जैसे पूर्व खिलाड़ी अपना माथा पीट लेते हैं। उसकी पारी की सराहना करने के लिए पूरा स्टेडियम खड़े होकर ताली बजाता है। 

जिस टीम की पूरी बॉलिंग को एक 15 साल के लड़के ने तहस-नहस कर डाला हो, उसकी मालकिन भी सम्मान में खड़ी हो जाए तो मतलब आपने कुछ अद्भुत किया है। आपने अविश्वसनीय पारी खेली है। द गॉड आफ क्रिकेट मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर आपके बैट स्विंग और टेंपरामेंट की तारीफ करते हैं। 

युवराज सिंह आपको बेबी बॉस की उपाधि देते हैं। सहवाग जैसे खिलाड़ी आपको विराट कोहली, रोहित शर्मा और एमएस धौनी जैसे खिलाड़ियों की लीक में खड़ा करते हैं। इनमें से किसी के नाम एक सीजन में सबसे छक्के लगाने का रिकॉर्ड नहीं है, आपने आईपीएल के अपने दूसरे ही सीजन में 65 छक्कों के साथ सर्वाधिक सिक्सर का रिकॉर्ड अपने नाम किया है, तो सचमुच स्पेशल हैं आप।  

आपको गॉड गिफ्टेड टैलेंट कहना आपकी तपस्या की तौहीन होगी। आपके पिता के त्याग का अपमान होगा। आपने मेहनत की आग में खुद को जलाया है, तब कहीं जाकर यह मुकाम पाया है। पैट कमिंस, जसप्रीत बुमराह, जॉस हेजलवुड, कगिसो रबाडा, भुवनेश्वर कुमार, मोहम्मद सिराज और मोहम्मद शमी जैसे गेंदबाजों को जैसे आपने तड़ी दी है, ये मेहनत के बूते कमाये गये यकीन से ही संभव है।  

सुनील नारायण, कुलदीप यादव, युजवेंद्र चहल, राशिद खान और मोहम्मद नूर जैसे स्पिनर्स के सामने आपकी टांगें कांपी नहीं है। वे आपकी चक्करघिरनी नहीं बना पाये हैं। आप जब कहते हैं कि मुझे गेंदबाजों से डर नहीं लगता चाहे वो फास्टर्स हों कि स्पिनर्स तो ये घमंड नहीं है। उसने मॉडर्न डे क्रिकेट के महान तेज गेंदबाजों का न केवल सामना किया है, बल्कि बखूबी खेला भी है।  

वैभव सूर्यवंशी साफ कहते हैं कि मैं गेंदबाजों के बारे में ज्यादा नहीं सोचता। मैं गेंद पर ध्यान देता हूं और उसके हिसाब से अपना शॉट मैन्युफैक्चर करता हूं।वैभव केविन पीटरसन से कहते हैं कि मुझे बल्लेबाजी पसंद है, चाहे इनिंग पहली हो कि मेरी टीम चेज कर रही हो। अगला टार्गेट टी-20 क्रिकेट में 200 रन बनाने का है। 

लड़का बना लेगा एक दिन वो भी। कल ही 29वें गेंद पर छक्का लग जाता तो एक रिकॉर्ड और बनना तय था।  वैभव सूर्यवंशी सीजन में सर्वाधिक स्कोर बनाने वाले पहले अनकैप्ड खिलाड़ी बने हैं। सीजन में 230+ का स्ट्राइक रेट भी एक रिकॉर्ड है। 

उन्होंने 65 छक्कों के साथ सीजन से सर्वाधिक छक्के लगाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है। 29 मई को क्वालीफायर 2 में मौका मिलेगा। वहां जीते तो फाइनल भी है। इसे हम कीर्तिमान अलर्ट कह सकते हैं...।

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