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Published / 2026-04-21 12:27:22
जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

  • जनजातीय दर्शन में छुपा है प्रकृति संरक्षण

डॉ मंजूषा पूर्ति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज जब विश्व पर्यावरणीय संकट के गंभीर दौर से गुजर रहा है तब जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास, जल संकट और प्रदूषण जैसी समस्याएँ पृथ्वी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही हैं, तब समाधान के लिए हमें आधुनिक तकनीकों के साथ-साथ अपनी जड़ों की ओर लौटने की आवश्यकता है। यह जड़ें हमें जनजातीय (आदिवासी) दर्शन में मिलती हैं, जहाँ प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार, पूज्य तत्व और सह-अस्तित्व का साथी है।

जनजातीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की शैली है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंश है। यही विचार भारतीय ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कृति में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। इस प्रकार, जनजातीय और वैदिक दर्शन दोनों ही एक ही मूल चेतना से प्रेरित हैं—प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व।जनजातीय समाज में प्रकृति को जीवंत माना जाता है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी—सभी को आत्मा युक्त और सम्माननीय समझा जाता है।

जंगल उनके लिए केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदाता है। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि माँ के रूप में पूजनीय हैं। पशु-पक्षियों को परिवार का हिस्सा माना जाता है। यह दृष्टिकोण पारिस्थितिकी (Ecology) का सबसे व्यावहारिक रूप है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है। जनजातीय समाज उतना ही लेता है जितनी उसे आवश्यकता होती है, जिससे संसाधनों का संरक्षण स्वतः सुनिश्चित होता है।

भारतीय वैदिक साहित्य में भी प्रकृति को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः यह मंत्र स्पष्ट करता है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। ऋषियों ने पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवन का आधार माना। उन्होंने इन तत्वों के संरक्षण को धर्म का हिस्सा बनाया। यज्ञ के माध्यम से पर्यावरण शुद्धि का विचार किया। वृक्षों और नदियों की पूजा को जीवन का आधार बनाया। जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा अपना कर उसे अपना परिवार बनाया। 

ये सभी सिद्धांत जनजातीय जीवन में भी सहज रूप से देखने को मिलते हैं। स्पष्ट है कि जनजातीय और वैदिक दर्शन में कोई विरोध नहीं, बल्कि गहरा सामंजस्य है। आदिवासी समाज का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर आधारित है, और उनका हर कार्य पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखकर किया जाता है।

  1. सीमित उपभोग (Sustainable Use) आदिवासी समुदाय केवल उतना ही संसाधन उपयोग करते हैं, जितना आवश्यक होता है। अत्यधिक संग्रह या दोहन उनकी संस्कृति के विरुद्ध है। 
  2. सामूहिकता और साझेदारी के कारण वन, जल और भूमि को व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक धरोहर माना जाता है। इससे संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और संरक्षण सुनिश्चित होता है। 
  3. पारंपरिक ज्ञान प्रणाली के कारण औषधीय पौधों का ज्ञान, मौसम की पहचान, खेती के पारंपरिक तरीके ये सभी पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। 
  4. उत्सव और अनुष्ठान में भी सरहुल, करमा जैसे त्योहार प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम हैं। इन अवसरों पर वृक्षों, जल स्रोतों और धरती की पूजा की जाती है। देवी-शक्ति और प्रकृति संरक्षण होने से भारतीय संस्कृति में देवी-शक्ति को प्रकृति का प्रतीक माना गया है दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी ये सभी शक्तियाँ प्रकृति के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसी प्रकार जनजातीय समाज में भी धरती माता, जाहेर आयो, वन देवी जैसे रूपों में प्रकृति की पूजा की जाती है। यह आस्था केवल धार्मिक नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम है। जब हम किसी तत्व को देवी मानते हैं, तो उसके प्रति हमारा व्यवहार स्वतः संवेदनशील हो जाता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संकट और चुनौतियाँ लगातार बढ़ती जा रही हैं आज आधुनिकता और विकास के नाम पर जो अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उसने प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है। 

जंगलों की कटाई, जल स्रोतों का प्रदूषण, खनन और औद्योगीकरण, वन्यजीवों का विलुप्त होना इन सबका सबसे अधिक प्रभाव जनजातीय समाज पर पड़ रहा है, क्योंकि उनका जीवन प्रकृति से जुड़ा हुआ है। विडंबना यह है कि जो समाज प्रकृति का सबसे बड़ा रक्षक है, वही आज विस्थापन और उपेक्षा का शिकार है। जनजातीय समाज में भी अपने ऋषि या ज्ञान परंपरा के संरक्षक होते हैं बुजुर्ग, पाहन,  ओझा, पुजारी जो पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं।

 वे सिखाते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, जरूरत से ज्यादा मत लो, हर जीव के साथ सह-अस्तित्व में रहो यह ज्ञान आज के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी मेल खाता है और सतत विकास (Sustainable Development) का आधार बन सकता है। तो फिर बात यहीं आकर रूकती है कि हम जनजातीय समाज से क्या सीखें और क्या करें? 

  1. जनजातीय ज्ञान को अपनाना होगा। हमें आदिवासी जीवन शैली से सीख लेकर उसे आधुनिक संदर्भ में लागू करना होगा। 
  2. नीतिगत बदलाव करके सरकारों को विकास परियोजनाओं में पर्यावरण और जनजातीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  3. शिक्षा में समावेशन होने से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय दर्शन और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए। 
  4. सामुदायिक भागीदारी होने से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए, क्योंकि वे प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। 
  5. आध्यात्मिक दृष्टिकोण का विकास होने से प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानने की मानसिकता विकसित करनी होगी। जनजातीय दर्शन हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी का संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यह दर्शन न केवल पर्यावरणीय संकट का समाधान प्रस्तुत करता है, बल्कि हमें एक संतुलित, शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन की दिशा भी दिखाता है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने अहंकार को त्यागकर प्रकृति के साथ जुड़ें, उससे सीखें और उसे बचाने का संकल्प लें। यदि हम जनजातीय और वैदिक ज्ञान को अपनाते हैं, तो निश्चित ही हम अपनी पृथ्वी को सुरक्षित और समृद्ध बना सकते हैं। यह केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न है और इसका उत्तर हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद है। (लेखिका बिरसा महाविद्यालय खूंटी के दर्शनशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष हैं।) 

Published / 2026-04-19 13:59:16
ठंडे बस्ते में जाता महिला आरक्षण

  • महिला आरक्षण का ठंडा ( Freeze) हो जाना...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। केंद्र की मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तथा सभी राज्यों में 50% लोकसभा सीट बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लाया वह मत विभाजन में विपक्ष के विरोध के कारण पारित नहीं किया जा सका। 

विपक्ष सदन में इस घटना को अपनी जीत समझ कर मेज तो थपथपा सकता है, लेकिन देश को कैसे समझ पाएगा कि आधी आबादी के लिए किए जा रहे आरक्षण को उसने आखिर क्यों रोका। दिनांक 18 अप्रैल 2026 को रात्रि 8:30 बजे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश की नारी शक्ति से क्षमा याचना की और आरक्षण बिल के नहीं पारित होने पर अपना दुख साझा किया। 

मोदीजी ने विधेयक नहीं पास होने के लिए कांग्रेस सपा रिमूव कांग्रेस और डीएमके को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि देश की महिलाएं इन राजनीतिक दलों को कभी माफ नहीं करेगी। मोदीजी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कांग्रेस आरंभ से ही सुधार विरोधी, लटकने और भटकाने वाली पार्टी रही है। महिला आरक्षण  का विरोध करके समाजवादी पार्टी ने लोहिया जी के सपनों को रौंद दिया है जिसे अप की महिला कभी भूल नहीं पाएगी। 

मोदीजी ने यह भी कहा कि परिवारवादी पार्टियों ने अपने भय के कारण कि यदि देश की महिलाएं सशक्त हो जाएंगी तो उनके परिवार के महिलाओं का राजनीति में प्रभुत्व समाप्त हो जाएगा, वे कभी नहीं चाहते हैं कि उनके परिवार के बाहर की कोई भी महिला राजनीति में स्थापित हो सके।

Published / 2026-04-18 21:03:58
क्या गलत नीति ही नासिक टीसीएस प्रकरण में समस्या की जड़ है!

डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासिक स्थित टीसीएस मामले में हिंदुओं और हिंदू महिलाओं के खिलाफ सामने आए भयावह खुलासों ने सच्चाई का पिटारा खोल दिया है। विभिन्न कंपनियों के कई कर्मचारियों ने अपने कार्यस्थलों पर इसी तरह की समस्याओं को उजागर किया है। इस बात का विश्लेषण जरुरी है कि वामपंथी इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को क्यों निशाना बना रहे हैं। इसके प्रमुख कारणों में से एक विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) की गलत नीति है। इसकी आड़ में वामपंथी विचारधारा के समर्थक कई कंपनियों में महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच गये हैं। 

वे अपने पद का उपयोग कंपनी या संगठन के निर्माण के लिए नहीं बल्कि भारत में स्थापित कंपनियों में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लिए कर रहे हैं। वामपंथी विचारधारा के लिए कंपनी और प्रबंधन उनके हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक हथियार मात्र हैं, जो अंतत: अविश्वास, दबाव, धर्मांतरण, उत्पीड़न और यौन शोषण के माध्यम से कॉरपोरेट जगत और भारत को कमजोर करते हैं। 

कर्मचारियों की कार्यकुशलता, प्रभावशीलता और कार्य की गुणवत्ता पर अत्यधिक तनाव, नैतिक मानकों के विरुद्ध कार्य करने और जन्म से ही उनमें समाहित भारतीय संस्कृति का प्रभाव के विरुद्ध काम तणाव निर्माण करता है। टीसीएस मामला सभी कॉरपोरेशनों के लिए एक चेतावनी है; अब समय आ गया है कि वे अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन करें और उचित कानूनी कार्रवाई करें। अगला कदम कंपनी में डीईआई नीति को सही तरीके सें लागू करना है। डीईआई रणनीति को सर्वे भवन्तु सुखिन: और वसुधैव कुटुंबकम जैसे भारतीय आदर्शों के अनुरूप पूरी तरह से संशोधित करने की आवश्यकता है। 

कई कॉरपोरेशनों में मौजूदा डीईआई प्रणाली इन मानवीय आदर्शों का उल्लंघन करती है। वर्तमान सिद्धांत विभाजन और ध्यान भटकाने के लिए विविधता, प्रवर्तन के लिए समानता और इस्लाम के लिए समावेशन हैं। अंतत:, मानवता का ऐसा विकृत दृष्टिकोण कॉरपोरेट विनाश का कारण बनेगा। कॉपोर्रेट सामाजिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में आप जो भी अच्छा काम करें, आपकी विविधता और समावेशन नीति आपकी प्रतिष्ठा और विकास सहित सब कुछ बर्बाद कर देगी। 

पिछले कुछ दशकों में डीईआई की अवधारणा एक प्रतीकात्मक महत्वाकांक्षा से विकसित होकर नियोक्ता की विश्वसनीयता, संस्कृति और अनुपालन परिपक्वता के आकलन के लिए एक परिभाषित मानक बन गई है, जिसका उपयोग उसके स्वयं के कर्मचारियों के साथ-साथ नियामकों, हितधारकों और आम जनता द्वारा भी किया जाता है।

हालांकि कई संगठनों ने औपचारिक डीईआई प्रतिबद्धताएं की हैं, जैसा कि आंतरिक नीतियों, नेतृत्व के बयानों और सार्वजनिक घोषणाओं के साथ-साथ समावेशी भर्ती, मातृत्व सहायता, सुलभता अवसंरचना, उचित समायोजन और लैंगिक विविधतापूर्ण नेतृत्व की दिशा में उठाये गये कदमों से स्पष्ट है, फिर भी कार्यबल प्रणालियों में डीईआई का व्यावहारिक एकीकरण असमान बना हुआ है, क्योंकि कई कंपनिया हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रह का विशिष्ट एजेंडा अपना रहे हैं। 

विविधता, समानता, समावेशन और संवेदनशीलता डीईआई एक व्यापक शब्द है जिसका उद्देश्य हमारा ध्यान एक स्वस्थ और अधिक खुली कॉर्पोरेट संस्कृति की ओर आकर्षित करना है जो लोगों को उनके वर्ग, जाति, बोली, लिंग, पंथ, शारीरिक विशेषताओं आदि की परवाह किए बिना समान अवसर प्रदान करती है। हालांकि, अच्छे इरादों के बावजूद, वामपंथी विचारधारा ने इसका दुरुपयोग अपने स्वार्थी लाभों और उद्देश्यों के लिए किया है, जो कॉर्पोरेट सिद्धांतों और मानवता के बिल्कुल विपरीत हैं। 

अमेरिका में विविधता, समानता और समावेशन 

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के अनुसार, अमेरिका में डीईआई प्रशिक्षण कार्यक्रम हिंदू विरोधी भावना को बढ़ावा दे रहे हैं। फाउंडेशन ने न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग पर इस अध्ययन को छिपाने का आरोप भी लगाया है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने दो प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थानों, न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग पर एक रिपोर्ट को छिपाने का आरोप लगाया है, जिसमें यह खुलासा किया गया है कि अमेरिका में जाति-आधारित विविधता, समानता और समावेशन (डीईआई) प्रशिक्षण कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप हिंदुओं को किस प्रकार पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है। 

नेटवर्क कंटैजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट ने रटगर्स विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी में यह अध्ययन किया, जिसमें विशेष रूप से इक्वालिटी लैब्स के जाति-विरोधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जांच की गई और पाया गया कि ऐसे कार्यक्रम हिंदू विरोधी भेदभाव और घृणा को बढ़ाते हैं। नेटवर्क कंटैजियन रिसर्च इंस्टीट्यूट और रटगर्स विश्वविद्यालय द्वारा किये गये इस अध्ययन में दलित नागरिक अधिकार संगठन इक्वालिटी लैब्स की सामग्री का विश्लेषण किया गया। 

इस शोध में पाया गया कि इन प्रशिक्षणों में शामिल प्रतिभागियों द्वारा ब्राह्मणों को परजीवी या वायरस के समान बताने जैसी अमानवीय शब्दावली का प्रयोग करने की संभावना काफी अधिक थी। एचएएफ ने यह भी दावा किया कि शोध से पता चलता है कि इस तरह के डीईआई कार्यक्रम नस्लीय भेदभाव को कम करने के बजाय उसे और बढ़ा सकते हैं। प्रमुख मीडिया संगठनों की रुचि जताने के बावजूद, एचएएफ का आरोप है कि हिंदुओं के प्रति दंडात्मक प्रतिशोध और बढ़ती शत्रुता के सबूतों को इन मुख्यधारा के मंचों ने लगभग अनदेखा कर दिया है। 

भारत पर प्रभाव 

विविधता, समानता और समावेशन के नाम पर चल रहे वोक के औजार भारत तक भी पहुंच रहे हैं। सभ्यता अध्ययन के क्षेत्र में प्रख्यात शोधकर्ता, लेखक और अग्रणी राजीव मल्होत्रा ने अपनी पुस्तकों में कहा है कि वोक तंत्र अब विविधता और समावेशन को बढ़ावा देने के बहाने भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों, जैसे कि आईआईटी को निशाना बना रहा है। 

भारतीय संदर्भ में, वोक लॉबी द्वारा दलितों के अधिकारों की वकालत करने का दिखावा तथाकथित उच्च जातियों को बदनाम कर रहा है और दलितों, अनुसूचित जनजातियों और अल्पसंख्यकों को उनके खिलाफ खड़ा कर रहा है। यह एक घातक प्रयोग है, और भारत पहले से ही इसका परीक्षण स्थल बन रहा है। इसी प्रकार, जैसा कि राजीव मल्होत्रा चेतावनी देते हैं, विविधता और समावेशन की बयानबाजी भारत के सॉफ्टवेयर व्यवसायों में भी अपना प्रभाव दिखा रही है, जिससे हिंदुओं को विभाजित करने और योग्यता-आधारित व्यवस्था को नष्ट करने के प्रयास में जातिगत मुद्दा और भी गंभीर हो रहा है। 

प्रेम जिहाद और धर्मांतरण ने कई कंपनियों पर गहरा प्रभाव डाला है, जो हिंदुओं, व्यावसायिक विकास और भारतीयता के लिए अत्यंत चिंताजनक है। जो लोग यह मानने से इनकार करते हैं कि ऐसी घटनाएं नहीं होतीं, उन्हें प्रेम जिहाद और धर्मांतरण के पीड़ितों से मिलना चाहिए। यदि उन्हें कुछ भी गलत नहीं लगता, तो यह स्पष्ट है कि वे मनुष्य नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता के राक्षस हैं। 

भावी पीढ़ियों और भारतीयता को इस विषैली पारिस्थितिकी से बचाने के लिए विश्वविद्यालयों को भी इस मुद्दे को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से संबोधित करना चाहिए। कंपनियों, सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), कर्मचारियों और प्रबंधन के लिए अब समय आ गया है कि वे सक्रिय रूप से काम करना शुरू करें और उचित कदम उठाएं। डीईआई पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए, सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जानी चाहिए और फिर इसे अंतिम रूप दिया जाना चाहिए। 

व्यवहार में, डीईआई को अनुसंधान और नवाचार क्षमताओं को मजबूत करना चाहिए, कार्यस्थल संस्कृति में सुधार करना चाहिए, तनाव को कम करना चाहिए और बिना किसी भेदभाव के व्यावसायिक और राष्ट्रीय लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-04-18 18:52:43
नारी वंदन अधिनियम और मोदी सरकार...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वर्तमान एनडीए गठबंधन की केंद्रीय सरकार का संख्याबल सरकार बनाने लायक तो है, परंतु दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण बिना विपक्षी सांसदों के समर्थन के कोई भी संशोधन विधेयक पारित नहीं करा सकती है। विपक्ष के समर्थन नहीं मिलने के कारण 131वां संशोधन विधेयक पारित नहीं किया जा सका।  

मोदीजी की सरकार ने 2023 में आम चुनाव में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का बिल विपक्षी दलों के समर्थन से पारित कराया था। केंद्रीय सरकार की नियत थी कि इसे 2029 के आम चुनाव में ही लागू कर दिया जाए। इसके लिए जनगणना के आधार पर लोकसभा क्षेत्र का परिसीमन आवश्यक था, इसीलिए प्रत्येक राज्य में परिसीमन करते हुए 50% सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रावधान था। 

वैसे तो जनगणना शुरू कर दी गयी है और इसे पूर्ण होने में समय लगेगा और 2029 तक परिसीमन की क्रिया शायद नहीं हो पायेगी। राजनीति के क्षेत्र में किसी भी राजनीतिज्ञ के लिए उसका अपना स्वार्थ सर्वोपरि होता है। और यही कारण है कि राजनीतिक हितों के कारण आधी आबादी के लिए 33% आरक्षण का विधेयक लोकसभा के पटल पर गिर गया।  

संसद के लोकसभा में पक्ष विपक्ष के द्वारा 21 घंटे का विमर्श चला। 130 सांसदों ने बहस में भाग लिया जिनमे 56 महिला सांसदों ने अपने-अपने तर्क रखे। गृह मंत्री अमित शाहजी ने सरकार का पक्ष रखते हुए विधेयक के समर्थन में स्थिति को स्पष्ट किया।  पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क हैं। संसद की कार्यवाही से देश भर में एक संदेश गया है जो राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण है। 

जन-सामान्य रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त रहते हैं। सामान्यत: इस प्रकार के विषयों में उनकी अभिरुचि नहीं के बराबर होती है, फिर भी चुनाव में इस विषय का प्रभाव डालने का प्रयास पक्ष विपक्ष दोनों ही करेगा, जिसकी संभावना बंगाल एवं तमिलनाडु के विधानसभा के चुनाव में पड़ने की संभावना का अनुमान लगाया जा रहा है। विधानसभा चुनाव के परिणाम 4 मई को आने वाले हैं। देखना दिलचस्प होगा कि महिला वंदन अधिनियम के नहीं पास होने का प्रभाव चुनाव में कितना पड़ने वाला है। 

Published / 2026-04-17 20:54:07
हजारीबाग में मयंक-प्रिंस चला रहे सट्टेबाजी का साम्राज्य

सट्टेबाजों का काला जाल! करोड़ों का सट्टा, बर्बाद होती युवा पीढ़ी 

अभय कुमार सिंह  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हजारीबाग में आईपीएल का रोमांच अब खतरनाक मोड़ ले चुका है। क्रिकेट के नाम पर चल रहा सट्टेबाजी का हाई-टेक नेटवर्क युवाओं को रातों-रात अमीर बनाने का सपना दिखाकर बबार्दी के दलदल में धकेल रहा है। कुम्हारटोली नालापर का युवा मयंक और प्रिंस मिलकर ऐसा काला साम्राज्य चला रहे हैं, जिसकी जड़ें अब बड़े शहरों तक फैल चुकी हैं। 

शहर के कानी बाजार, दिपुगढ़ा, हरनगंज, बुच्चड़ टोली रोड और रामनगर जैसे इलाके सट्टेबाजी के हॉटस्पॉट बन चुके हैं। व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए रेट तय हो रहे हैं, जबकि पैसों का लेन-देन पूरी तरह आॅनलाइन हो रहा है। इस नेटवर्क में वही युवा सक्रिय हैं, जो सालभर साइबर अपराध जैसे बैंक अकाउंट हैकिंग, डिजिटल अरेस्ट और सेक्सटॉरशन में लिप्त रहते हैं और आईपीएल के दौरान सट्टेबाजी में कूद पड़ते हैं। 

सूत्र बताते हैं कि इस अवैध धंधे की कमान मयंक और प्रिंस के हाथों में है, जो रांची के बिट्टू और केडी नामक बड़े सट्टेबाज के लिए काम कर रहे हैं। इनके नीचे दीपक, प्रदीप और अहमद जाकारिया जैसे कई आपरेटर सक्रिय हैं। यह गिरोह नये लड़कों को जोड़कर नेटवर्क को लगातार विस्तार दे रहा है। पिछले वर्ष पुलिस ने इचाक में छापेमारी कर चतरा निवासी राहुल कुमार को गिरफ्तार किया था, जिसके पास से मिले मोबाइल ने चौंकाने वाला खुलासा हुआ था। वह आईपीएल के जरिए करीब डेढ़ करोड़ रुपये का सट्टा संचालित कर रहा था। 

इस मामले में उस वक़्त 12 अन्य युवाओं पर भी केस दर्ज हुआ था, जिनमें कई संपन्न परिवारों के लड़के शामिल थे। इतना होने के बावजूद ये खेल कभी रुकता नहीं है, सालो भर इसका संचालन होता है। आईपीएल के दौरान सट्टेबाजी चरम पर पहुंच जाती है। सट्टेबाजी की चमक-दमक ने कई युवाओं को महंगी गाड़ियां, जमीन और गहनों तक पहुंचाया, लेकिन जल्द ही यह सब कर्ज और बर्बादी में बदल गया। 

जो कल लाखों में खेलते थे, आज सैकड़ों रुपये के लिए मोहताज हैं। लेकिन अपने पोजीशन पर सरगना ठाठ से राज कर रहा है।  जरुरत है साइबर सेल को इसपर ध्यान देने की। क्योकि हजारीबाग की यह सट्टा नेटवर्क अब जयपुर और दिल्ली तक फैल चुका है। सवाल बड़ा है कि क्या प्रशासन इस काले साम्राज्य को जड़ से खत्म कर पाएगा, या आईपीएल के हर सीजन के साथ युवा पीढ़ी यूं ही इस जाल में फंसती रहेगी, बर्बाद होती रहेगी?

Published / 2026-04-17 20:46:50
हजारीबाग : खपिया कोतीझरना में 25 लाख के इनामी समेत चार कुख्यात नक्सली ढेर

खपिया कोतीझरना में गूंजे गोलियों के धमाके, हथियारों का जखीरा बरामद 

अभय कुमार सिंह 

एबीएन न्यूज नेटवर्क, केरेडारी। हजारीबाग-चतरा सीमा पर नक्सल विरोधी अभियान में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली है। केरेडारी थाना क्षेत्र के बुंडू पंचायत स्थित खपिया कोतीझरना के जंगलों में शुक्रवार दोपहर हुई भीषण मुठभेड़ में चार खूंखार नक्सली मार गिराये गये। इस संयुक्त आॅपरेशन को कोबरा बटालियन और पिपरवार पुलिस ने अंजाम दिया। 

मारे गये नक्सलियों में 15 लाख के इनामी कुख्यात नक्सली सहदेव महतो उर्फ अनुज (आरसीएम) शामिल है, जो केरेडारी थाना क्षेत्र के कुठान गांव का निवासी था। उसके साथ उसकी पत्नी नताशा, जो सब जोनल कमेटी सदस्य (एसजेडसीएम) थी और मूल रूप से छत्तीसगढ़ की रहने वाली बतायी जा रही है भी मारी गयी। इसके अलावा 1 लाख के इनामी एरिया जोनल कमांडर बुद्धदेव उर्फ बुधन करमाली और 10 लाख के इनामी रंजीत गंझू भी ढेर हुए हैं। 

पुलिस के अनुसार, गुप्त सूचना के आधार पर इलाके में सर्च आपरेशन चलाया जा रहा था। इसी दौरान जंगल में छिपे नक्सलियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी। जवाब में सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभालते हुए ताबड़तोड़ कार्रवाई की, जिसमें चारों नक्सली मारे गए। 

मुठभेड़ स्थल से भारी मात्रा में हथियार और नक्सली सामग्री बरामद की गई है, जिसमें 2 एके राइफल, 1 कोल्ट एआर-15 राइफल और 1 इंसास राइफल शामिल हैं। घटना के बाद पूरे इलाके में सघन सर्च आॅपरेशन जारी है और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गयी है। पुलिस अधिकारियों ने मुठभेड़ की पुष्टि करते हुए कहा कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, लेकिन इलाके में अभियान अभी भी जारी है। 

Published / 2026-04-17 11:36:07
पीएम मोदी और नारी शक्ति वंदन अधिनियम...

  • पीएम मोदी और नारी शक्ति वंदन अधिनियम...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय महिलाएं स्वभाव से ही ममता, करुणा तथा त्याग की प्रतिमूर्ति होती हैं। परिवार एवं समाज के निर्माण के लिए वे स्वयं को तिल-तिल खपा देने की साहस रखती हैं।

इस समय देश का संसद 3 दिवसीय विशेष सत्र में महिलाओं के लिए संसद एवं विधानसभाओं में 33% आरक्षण के युगांतरकारी विधेयक पर चर्चा कर रही है, जो विकसित भारत को साकार करने के लिए क्रांतिकारी निर्णय के रूप में स्थापित होने वाला है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने संबोधन में कहा कि महिला आरक्षण के विरोध को देश याद रखेगा और विरोधियों को इसकी भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

महिलाओं को आरक्षण देने के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि इस कार्य के लिए परिसीमन की कार्यवाही आवश्यक है। किसी भी राज्य के साथ परिसीमन करते समय कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और उसके वर्तमान सीटों के आवंटन में 50% की वृद्धि की जाएगी, जिससे महिलाओं को सरलता से आरक्षण का लाभ मिल पाएगा। 

प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि हम देश के महिलाओं को उनका अधिकार दे रहे हैं, यह उनके ऊपर एहसान करने जैसा कोई कृत्य नहीं है। दशकों तक महिलाओं के अधिकारों को रोका गया है।

अब तकनीकी बहानेबाजी से रोकने की क्रिया को पुनः दोहराने का प्रयास किया जा रहा है, जिसे देश की जागरूक नारी अब बर्दाश्त नहीं करेगी। आज शुक्रवार को संध्या विधेयकों के ऊपर मतदान होना है। देखना दिलचस्प होगा कि नारी का वंदनीय होना कितना महत्वपूर्ण है।

Published / 2026-04-12 12:31:26
रविवार छुट्टी की उपज जातिगत जनगणना

रविवार छुट्टी की उपज जातिगत जनगणना

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्कूल के दिनों में हम यही पढ़ते और परीक्षा में निबंध लिखते रहे थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, लेकिन जैसे-जैसे लेकिन दिमाग पकते गया वैसे-वैसे जानते चले गए की चले गए कि एक्चुअली हमारा देश तो जाति प्रधान देश है और शायद इसी के चलते ही शुरू हो चुकी जनगणना में जाति बताना अनिवार्य तथा परम कर्तव्य निर्धारित कर दिया गया है।

नो डाउट भारत एक बड़ा देश है, मगर यहां उससे भी बड़ी यहां जातियों की संख्या है। जन्मजात जातिगत जनसंख्या तो है ही साथ ही साथ पेशे पर आधारित जाति की भी गणना जानना कोई सरल काम नहीं है।

जाति के आधार पर जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त है उनकी सावधानी देखते ही बन रही है। कास्ट सर्टिफिकेट प्राप्त करना उत्सव बन गया है, जबकि स्वर्ण उत्साहित नहीं दिख रहे हैं क्योंकि उनका नुकसान उनके नफा में बदलने वाला नहीं है। 

जातिगत भेदभाव को बढ़ावा दिया जाना राजनीति का आदर्श सिद्धांत बन गया है। राजनीतिक दलों के संगठन में वोटो का संतुलन बना रहे इसके लिए जाति के अनुपात में पद बांटे जा रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए जाति के अनुपात में टिकट बांटे जा रहे हैं। विधान परिषद एवं राज्यसभा के इनडायरेक्ट चुनाव में जातिगत संतुलन मुख्य आधार बन गया है।

संत कबीर दास ने कहा था कि

जात-पात पूछे नहीं कोई 

हरि को भजे सो हरि को होई।।

लेकिन अपने कृषि प्रधान देश में; 

जात-पात पूछे सब कोई 

बिन जाति वैल्यू नहीं कोई।।

हमारा सौभाग्य है कि हम जन्म ही किसी जाति को लेकर पैदा होते हैं। जब तक मासूम रहते हैं इस भेदभाव से तो दूर रहते हैं लेकिन जैसे-जैसे मासूमियत दूर होती जाती है हम जाति के कैदखाना में कैद होते चले जाते हैं, जो किसी के लिए सौभाग्य बन जाता है तो किसी के लिए दुर्भाग्य।

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