विचार

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Published / 2023-05-06 13:21:51
समलैंगिक शादी या सांस्कृतिक बर्बादी

विनोद बंसल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय ज्ञान विज्ञान, परंपराएं, रीति रिवाज व सांस्कृतिक मान्यताएं आज विश्व पटल पर स्वीकार की जाने लगी हैं। भोगवादी जीवन से तंग लोग अपनी पाश्चात्य संस्कृति को तिलांजलि देकर जहां वे एक ओर भारतीय संस्कारों व मान्यताओं को अपना रहे हैं वहीं, कुछ मुट्ठी भर लोग भारतीय जीवन मूल्यों का मखौल उड़ाते हुए अपने अमर्यादित, अप्राकृतिक व असांस्कृतिक कुकृत्यों को वैधानिक मान्यता दिलाने पर तुले हैं। 

दुर्भाग्य से ऐसे लोगों के साथ हमारे यहां के कुछ कथित बुद्धिजीवी, वकील तथा न्यायाधीश भी उनके सहयोगी की भूमिका में दिख रहे हैं। हां! हम बात कर रहे हैं दो समलैंगिकों के अप्राकृतिक व्यवहार को विवाह की मान्यता की।

संस्कार भारतीय जीवन मूल्यों तथा सामाजिक व्यवस्था की धुरी होते हैं। यूं तो भारतीय परंपरा में गर्भाधान पुंसवन, सीमंतोनयन, जातकर्म, नाम करण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ा कर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास तथा अंत्येष्टि संस्कार सहित सोलह संस्कारों का वर्णन मिलता है। 

किन्तु इनमें मात्र एक ही संस्कार ऐसा है जिसमें दो लोग मिलकर सामूहिक रूप से एक साथ संस्कारवान होते हैं। इसे विवाह संस्कार कहते हैं जिसके लिए स्त्री व पुरुष दोनों का होना अनिवार्य है। इस संस्कार का मुख्य प्रयोजन योग्य संतानोत्पत्ति कर समाज व राष्ट्र को उन्नत करना है। यूं तो विवाह भी आठ प्रकार के बताये हैं। ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गंधर्व, राक्षस व पैशाच नामक विवाहों में से ब्राह्म विवाह को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।

विवाहों की जो निकृष्टतम पद्धति भी है उसमें भी स्त्री व पुरुष दोनों का होना अनिवार्य है। यदि हिंदू मान्यताओं को छोड़ भी दें तो पाएंगे कि दुनियां के अन्य किसी भी मत, पंथ, संप्रदाय में भी सर्वत्र स्त्री के साथ पुरुष या पुरुष के साथ स्त्री के विवाह को ही मान्यता दी गयी है। आदिकाल से ही विवाह को हमारे यहां एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है।

भारतीय समाज में चार आश्रमों यथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम में से गृहस्थ आश्रम का विशेष महत्व है। इसमें प्रवेश ही विवाह संस्कार के माध्यम से होता है। यह आश्रम शेष सभी आश्रमों की धुरी भी है। यदि यही कलंकित या दूषित हो जाएगा तो अन्य आश्रमों का क्या होगा। 

भारतीय मान्यताओं के अनुसार विवाह बंधन में बंधने वाले युगल एक दूसरे के प्रति समर्पित भाव से दायित्व का भाव लेकर एक होने का संकल्प लेते हैं ना कि अपने अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं। वे अपनी संतान माता-पिता, रिश्तेदारों व समाज के लिए दायित्व बोध से काम करते हैं।

विवाहों को कानूनी मान्यता हेतु हमारे यहां अलग अलग रिलीजन के हिसाब से अलग अलग कानून बनाए गए हैं। ये सभी संविधान के अनुच्छेद 246 के अंतर्गत संसद को प्रदत्त शक्तियों के अंतर्गत बनाये गये हैं। जो उन कानूनों के अंतर्गत नहीं आता उनके लिए विशेष विवाह अधिनियम 1954 है। इसके अंतर्गत दो विविध मतों के मतावलंबी अपने अपने मत का पालन करते हुए बिना मतांतरित हुए भी विवाह कर सकते हैं। 

किन्तु किसी भी कानून में दो समलैंगिक व्यक्तियों को पति-पत्नी के रूप मान्यता देने का कोई विधान नहीं है। संसार का कोई भी धर्म समलैंगिक विवाह को मान्यता नहीं देता। अब यदि दो समलैंगिकों अर्थात महिला का महिला के साथ या किसी पुरुष का पुरुष के साथ सह-जीवन को विवाह की स्वीकृति दी जाती है तो उसके क्या परिणाम होंगे उन पर विचार करते हैं।

यदि समलैंगिक विवाह को मान्यता दी जाती है तो संतानोत्पत्ति कैसे होगी? इन्हें बच्चा कोई गोद देगा ही क्यों? क्या कानून ऐसे जोड़ों को दत्तक गृहण का अधिकार देगा? बच्चे यदि गोद भी ले लिए जायें तो क्या उन समलैंगिकों के आचरण व व्यवहार के दुसप्रभाव से बच्चा अछूता रह सकता है? दत्तक बच्चों को मातृत्व और पितृत्व का सुख कैसे संभव है? बच्चा जब विद्यालय जाएगा तो उसके मां व बाप का नाम क्या होगा? संतानोत्पत्ति होगी ही नहीं तो गोद लिए बच्चे के प्रति उस कथित दम्पत्ति का व्यवहार और बच्चे पर उसका दुसप्रभाव दोनों ही अकल्पनीय होंगे। 

बच्चों व बड़ों में पारिवारिक संस्कार कहां से आयेंगे जो कि जीवन की शांति, व्यवस्था व नैतिक मूल्यों पर आधारित समाज के लिए बहुत आवश्यक हैं? पति पत्नी की युगल जोड़ी के बिना पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान कैसे हो पायेंगे? बच्चे की रिस्तों की डोर ही पूरी तरह टूट जायेगी। भाई-बहिन, माता-पिता, मौसा-मासी, दादी-दादी, नाना-नानी इत्यादि सभी रिश्तों की इति श्री हो जायेगी, जिनसे व्यक्ति जीवन भर ऊर्जावान रहता है। 

दत्तक को माता पिता की प्रॉपर्टी में हिस्सा कैसे मिलेगा। प्रकृति के प्रतिकूल इस अप्राकृतिक व्यवहार से समाज में व्यभिचार, हिंसा, रोग, असंतोष व अवैधानिक कार्यों को बढ़ावा मिलेगा। यदि सिर्फ शारीरिक आकर्षण को विवाह का रूप दिया गया तो कल कोई भी दो वयस्क (भाई-बहिन या पिता-पुत्री भी) एक दूसरे से विवाह की जिद करेंगे! कहेंगे आप यह तय करने वाले कौन होते हैं कि हम अपनी यौन अभिरुचि किसके साथ रखें? एक बात और, समलैंगिक विवाह की बात तो हो रही है किन्तु अभी तक किसी ने समलैंगिक निकाह की बात नहीं की! आखिर क्यों?

हालांकि, भारतीय संस्कृति, संस्कारों व मर्यादाओं को तार तार करने का प्रयास कोई नया नहीं है। षड्यंत्र पूर्वक भारतीय संविधान की मूल प्रति से पहले राम दरबार के चित्र को हटाया गया, संविधान की प्रस्तावना में सेक्यूलर व सोशलिस्ट शब्दों को अनधिकृत तरीके से घुसाया गया,  माननीय सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से दो वयस्कों के मध्य सहमति से सेक्स संबंधों को कानूनी मान्यता दी गई। उसके बाद लिव इन रिलेशनशिप तथा विवाहेत्तर संबंधों व समलैंगिक व्यवहार को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। 

मतांतरित अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण दिलाकर अनुसूचित समाज के मूल अधिकारों पर भी कुठाराघात के प्रयास हो रहे हैं। अब समलैंगिकों के मध्य अप्राकृतिक व्यवहार को विवाह जैसे पवित्र शब्द से अलंकृत करने के गहरे षडयंत्र हो रहे हैं। अब आगे आने वाले समय में क्या जानवरों के साथ संबंधों को भी मान्यता दिलाने की लड़ाई लड़ी जायेगी? 

पिछले कुछ वर्षों से लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने के नाम पर नई नई दलीलें भी दी जा रही हैं जैसे- महिला और पुरुषों के लिए टॉयलेट (शौचालय) अलग अलग क्यों? छात्र और छात्राओं के हॉस्टल अलग अलग क्यों? यदि लड़के टॉपलैस रह सकते हैं तो लड़कियां क्यों नहीं इत्यादि...?

भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति के मूल अधिकारों की रक्षा हेतु प्रतिबद्ध है। चाहे वह व्यक्ति स्वयं कोई दुराचारी, पापाचारी या भारतीय संस्कृति का विरोधी ही क्यों ना हो। समलैंगिक व्यवहार चाहे अप्राकृतिक, अमर्यादित या भारतीय मान्यताओं के विरुद्ध हो तो भी, न तो यहां के कानून द्वारा और ना ही यहां के लोगों के द्वारा उनका किसी प्रकार से तिरस्कार किया जाता है। 

किंतु, इतना सब कुछ होने के बावजूद, यदि उनके इस व्यवहार को विवाह का नाम देने की कोशिश होती है तो, निसंदेह विवाह रूपी पवित्र बंधन को कलंकित करने का प्रयास जरूर माना जायेगा। वे समलैंगिक अपने घर में कैसे भी रहें, चाहे वे वैवाहिक दंपत्ति की तरह ही क्यों न रहें, किंतु भारतीय समाज उन्हें पति-पत्नी के रूप में कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। 

ऐसे में कुछ मुट्ठी भर लोग सर्वोच्च न्यायालय का बहुमूल्य समय तो बर्बाद कर ही रहे हैं साथ ही, भारत के नागरिकों द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों द्वारा कानून बनाने की उनकी शक्तियों का अतिक्रमण भी कर रहे हैं। जो काम संसद का है, उसे भला न्यायालय कैसे कर सकता है? दूसरी बात, इस तरह की मान्यता क्या कुछ व्यक्तियों या न्यायाधीशों द्वारा दी जा सकती है? 

तीसरी बात कि फ्री शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार, पर्यावरण संरक्षण व जनसंख्या नियंत्रण इत्यादि अन्य अनेक महत्वपूर्ण मामलों को किनारे कर इस मामले की त्वरित व दिन प्रति दिन सुनवाई किया जाना क्या उचित है? क्या इस मामले की तुलना श्री राम जन्मभूमि वाद से करना अतार्किक व रामभक्त हिन्दू जनमानस का उपहास नहीं? इस विवाह के बाद महिला, बच्चों व संयुक्त परिवार के अधिकारों के साथ तलाक, भरण पोषण, इत्यादि से जुड़े लगभग 160 कानूनी प्रावधानों में संशोधन करना पड़ेगा जिसके परिणाम स्वरूप क्या अनेक प्रकार की विधि-विषमताएं जन्म नहीं लेंगी? 

क्या बिना विवाह के दो समलैंगिक अपना बैंक खाता नहीं खुलवा सकते या अपनी बीमा पॉलिसी में एक दूसरे को नामित नहीं कर सकते? क्या सिर्फ इन तर्कों के आधार पर महान व पावन विवाह व्यवस्था तथा उस पर टिकी कुटुंब प्रणाली का यूं ही गला घोंट दिया जाना उचित है? यह बहुत संवेदनशील और पेचीदा विषय है जिसमें हाथ डालने से कहीं इस कथित राइट प्रोटेक्शन से रॉइट्स प्रॉडक्शन न शुरू हो जाये, इस बात का ध्यान भी रखना होगा। (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता व विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

Published / 2023-04-29 21:40:52
बस्तर, तेंदूपत्ता और माओवाद

उपेन्द्र नाथ राय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में माओवादियों के कायराना हमले ने सबको झकझोर दिया है। आमतौर पर ऐसी वारदात सोझी समझी रणनीति के तहत तेंदूपत्ता सीजन में ही होती हैं। बस्तर का हर व्यक्ति यह जानता है कि माओवादियों की सक्रियता मार्च से जून तक बढ़ जाती है। चुनावी वर्ष में भी यह बड़ी घटना को अंजाम देने के फिराक में रहते हैं।

इसी अवधि में माओवादी टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन अर्थात टीसीओसी चलाते हैं। इसी दौरान नए रंगरूटों को भर्ती किया जाता है। ऐसे हमलों का मकसद तेंदूपत्ता हितग्राहियों में दिल-दिमाग में खौफ पैदा करना होता है, जिससे वह पैसा देने में आनाकानी न करें। 

माओवादियों की यह मारकाट रंग लाती है। तेंदूपत्ता की तुड़ाई मई में शुरू हो जाती है। इसके लिए बस्तर में समितियों के गठन से लेकर अन्य तैयारियां शुरू हो गई हैं। माओवादियों की कमाई का बड़ा जरिया तेंदूपत्ता ही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र कांकेर जिले से माओवादी लगभग डेढ़ करोड़ रुपये (पुलिस खुफिया विभाग की रिपोर्ट) की वसूली करते हैं। 

यही वजह है कि माओवादी मार्च से ही दहशत फैलाने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि तेंदूपत्ता की तुड़ाई करने वाले आसानी से समितियों को उनका हिस्सा दे देते हैं। पिछली भाजपा सरकार ने तेंदूपत्ता तुड़ाई के पैसे देने की नियमावली में परिवर्तन किया था। सरकार सीधे हितग्राहियों के खाते में पैसा भेजने लगी थी। 

इससे माओवादियों को वसूली में परेशानी हुई। इसके बाद माओवादियों के इशारे पर बस्तर संभाग में आंदोलन शुरू हो गया। अब इसको समझिए, माओवादियों के ही इशारे आंदोलन भी होते हैं। जंगल से फरमान आता है और लोग न चाहते हुए भी बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं। जब तक भाजपा की सरकार रही, उसने पैसा सीधे हितग्राही के खाते में डाला। रमन सिंह आंदोलन के आगे नहीं झुके। 

कांग्रेस की सरकार बनते ही इ्स पर पूर्णविराम लगा दिया गया। समितियों के माध्यम से ही पैसा दिया जाने लगा। समितियों के माध्यम से पैसा देने से माओवादियों को यह फायदा होता है कि उन्हें सिर्फ समिति के पदाधिकारियों से मिलना होता है। वहां फरमान चला जाता है। वहां से हर हितग्राही के मेहनत के पैसे में 15 प्रतिशत तक की कटौती कर ली जाती है। 

बाद में यह पैसा (कटौती) माओवादियों तक पहुंचा दिया जाता है। इसे कांग्रेस या तो समझ नहीं पाई या समझते हुए भी माओवादियों के सामने दंडवत हो गई। सरकारें बार-बार कहती हैं कि माओवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन यह अर्द्धसत्य है। हकीकत तो यह है कि फोर्स सिर्फ गतिविधियों को दबाने की दवा मात्र है। 

यह वैसे ही है, जैसे मलेरिया की दवा कुनैन है। कुनैन से मलेरिया को खत्म तो किया जा सकता है, लेकिन मलेरिया कभी हो न, इसके लिए तो मच्छरों को खत्म करने के उपाय पर विचार करना होगा। माओवादियों की मौजूदगी की वर्तमान स्थिति के बारे में उनके सात नवंबर 2022 को जारी 27 पेज के पत्र से जाहिर होती है। 

इसमें लिखा है कि 11 महीनों के अंदर (दिसंबर 2021 से नवंबर 2022 तक) देशभर में 132 माओवादी मारे गए। इसमें सबसे अधिक 89 दंडकारण्य क्षेत्र में मारे गये। माओवादियों का यह दंडकारण्य बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़ के बार्डर महाराष्ट्र और तेलंगाना के बार्डर को मिलाकर बनाया गया है। 

माओवादी इसे एक डिवीजन दंडकारण्य संबोधित करते हैं। इस पत्र के मुताबिक पिछले 11 माह में उसके सेंट्रल रीजनल बल का एक, बिहार-झारखंड के 17, पश्चिम बंग का एक, तेलंगाना के 15, आंध्र प्रदेश में एक, ओडिशा के तीन, पश्चिम घाटियों में एक, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तीन माओवादी मारे गए। 

इसमें केंद्रीय कमेटी के सदस्य दीपक को बचाने में ही 27 माओवादी पारेवा मुठभेड़ में मारे गए। यहां महत्वपूर्ण है कि माओवादियों के समूल नाश के लिए केंद्र ने मई 2017 में पांच वर्ष की समय सीमा रखकर समाधान योजना प्रारंभ की थी। इस पत्र में ही लिखा है कि माओवादियों (2017 से) ने इस दौरान पूरे भारत में 1300 से अधिक गुरिल्ला कार्रवाई की। 

इसके माध्यम से पांच साल में 429 जवान शहीद हो गए। 966 जवान घायल हुए। इस दौरान 40 लोगों को माओवादियों ने मारा। 409 जन सामान्य की भी नृशंस हत्या कर दी गई। इनमें से ज्यादातर आदिवासी समाज के लोग हैं। 300 जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। एक साल में माओवादियों ने 200 बार दहशत फैलायी। इन घटनाओं में 31 जवान शहीद हुए। 154 जवान घायल हुए। 69 सामान्य लोगों को मार दिया गया। 

माओवाद की समस्या को आप इसी से समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले का आमाबेड़ा क्षेत्र जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है। इस क्षेत्र में आज भी ऐसे गांव हैं, जहां के लोग हिंदी बोलना तो दूर छत्तीसगढ़ी भी नहीं बोल पाते। ऐसे में यह लोग अधिकारियों से अपने दर्द को कैसे बयां कर सकते हैं। 

ऐसे कई गांव हैं, जहां पर प्रशासन को पहुंचने में 12 से 15 घंटे लग जाते हैं। यहां सिर्फ किसी तरह साइकिल या बाइक ही जा सकती है। अधिकारियों की अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती। यदि पूरी फोर्स वहां पहुंचती है तो हर कदम पर खतरा मंडरा रहा होता है। 

यहां पुलिस और माओवादियों में अंतर यह होता है कि माओवादियों के सचिव स्तर के पदाधिकारी के लिए अनिवार्य योग्यता ही चार भाषाओं का ज्ञान होना होती है। जिस क्षेत्र में उसकी नियुक्ति है, उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साथ ही हिंदी और अंग्रेजी की जानकारी भी चाहिए। स्थानीय भाषा के जानकार होने से यह लोग स्थानीय लोगों के साथ आसानी से घुल-मिल जाते हैं। 

वहीं पुलिस को लोगों का दर्द समझने के लिए दुभाषिया की जरूरत होती। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस स्थानीय लोगों के साथ कैसे घुल-मिल सकती है। यह कहा जाता है कि जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। यह बात माओवादी क्षेत्रों में सच साबित होती है। यही कारण है कि बाहर से उस क्षेत्र में जाकर खबर देने वाले पत्रकार भी कभी हकीकत को ठीक से उजागर नहीं कर पाते। 

इसका कारण है कि उनकी रिपोर्ट स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित पर होती है। आप सोच सकते हैं कि जो (स्थानीय बाशिंदे) बंदूक की नाल पर हमेशा सांस ले रहा हो, वह कैसे सच बता सकता है। हकीकत यह होती है कि बाहर से जाने वाले पत्रकारों से बातचीत के समय 10 स्थानीय लोगों के बीच एक माओवादी जरूर होता है। 

उदाहरण के तौर पर आप उनसे पूछिये, क्या इस बीच माओवादी इस क्षेत्र में देखे गए हैं। उनका यही जवाब होता है, वर्षों से देखे नहीं गए, जबकि हकीकत है कि उस क्षेत्र में माओवादी रोज आते-जाते हैं। माओवादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के सामने एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ है। 

दोनों के बीच हमेशा उनकी जिंदगी खतरे में पड़ी रहती है। यदि एक पुलिस वाला उनसे बात कर लेता है तो शक में माओवादी उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। कहते हैं, यह पुलिस का मुखबिर था। इधर पुलिस उन्हें हमेशा शक के दायरे में रखती है कि यह जनताना सरकार का सदस्य होगा और कई बार यह हकीकत भी होती है कि उन्हीं आम आदमियों के बीच माओवादियों का मुखबिर भी छिपा होता है, जिसे उस गांव के लोग भी नहीं जानते। 

इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार मैं छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में माओवादियों से प्रभावित सीतरम इलाके में गया था। वहां जाने के लिए एक नदी को पार करना पड़ा। नदी पार करते ही माओवादियों के स्मारक दिखने लगे। मैं चारों तरफ से घिर गया। इसके बाद मैंने अखबार से बताया तो कुछ राहत मिली। 

कई लोगों से बातचीत की। एक व्यक्ति ने कहा कि यहां माओवादियों की गतिविधियां लंबे समय से शून्य हैं। और यह बातचीत के ठीक तीन दिन बाद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यदि आतंकवादियों और माओवादियों की तुलना करें तो माओवादी ज्यादा घातक हैं। 

आतंकवादी तो पहचान में आ जाएंगे, क्योंकि वे हमेशा आमने-सामने की लड़ाई करते हैं, जबकि माओवादी हमेशा कायरों की भांति छुपकर गुरिल्ला युद्ध करते हैं। जब अकेले पाते हैं तो पीठ में छुरा भोंक कर चले जाते हैं। माओवादियों की पहचान करनी बहुत मुश्किल है। इस कारण इनसे लड़ाई इन्हीं की भाषा में ही की जा सकती है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

Published / 2023-04-22 19:35:59
अवसरों का जनतंत्र है अमृतकाल...

प्रो संजय द्विवेदी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आजादी के अमृत महोत्सव से अमृतकाल की यात्रा में देश आत्मविश्वास से भरा हुआ है। यह आत्मविश्वास 2014 के बाद हर भारतवासी में आया है जो कुछ समय पहले तक अवसाद और निराशा से घिरा था। भरोसा जगाने वाला यह समय हमें जगा कर कुछ कह गया और लोग राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को रेखांकित और पुनर्पारिभाषित करने लगे।

इस देश का कुछ नहीं हो सकता से यह देश सब कुछ कर सकता है तक हम पहुंचे हैं। यह साधारण नहीं है कि कल तक राजनीतिक-प्रशासनिक जड़ता, निर्णयहीनता, नकारात्मक राजनीति और अवसाद से घिरा भारत अवसरों के जनतंत्र में बदलता दिख रहा है। यह आकांक्षावान भारत है। 

उम्मीदों से घिरा भारत है। अपने सपनों की ओर दौड़ लगाता भारत है। लक्ष्यनिष्ठ भारत है। कर्तव्यनिष्ठ भारत है। यह सिर्फ अधिकारों के लिए लड़ने वाला नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध से भरा भारत है। 

ये वक्त हमारा है : सही मायनों में यह भारत का समय है। भारत में बैठकर शायद कम महसूस हो किंतु दुनिया के ताकतवर देशों में जाकर भारत की शक्ति और उसके बारे में की जा रही बातें महसूस की जा सकती हैं। सांप-संपेरों के देश की कहानियां अब पुरानी बातें हैं। भारत पांचवीं बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में विश्व मंच पर अपनी गाथा स्वयं कह रहा है। अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति, कूटनीति, डिजिटलीकरण से लेकर मनोरंजन के मंच पर सफलता की कहानियां कह रहा है। 

सबसे ज्यादा आबादी के साथ हम सर्वाधिक संभावनाओं वाले देश भी बन गए हैं, जिसकी क्षमताओं का दोहन होना अभी शेष है। भारत के एक अरब लोग नौजवान यानी 35 साल से कम आयु के हैं। स्टार्टअप इको सिस्टम, जलवायु परिवर्तन के लिए किए जा प्रयासों, कोविड के विरुद्ध जुटाई गई व्यवस्थाएं, जी 20 के अध्यक्ष के नाते मिले अवसर, जीवंत लोकतंत्र, स्वतंत्र मीडिया हमें खास बनाते हैं। 

चुनौतियों से जूझने की क्षमता भारत दिखा चुका है। संकटों से पार पाने की संकल्प शक्ति वह व्यक्त कर चुका है। अब बात है उसके सर्वश्रेष्ठ होने की। अव्वल होने की। दुनिया को कुछ देने की। 

नये भारत के शिल्पकार : निश्चित यह सब कुछ इतना आसान नहीं था। नौकरशाही की जड़ता, राजनीति के सीमित पांच साला लक्ष्य, समाज में फैली गैरबराबरी और असमानता, क्षेत्रीयता, जातीयता की भावनाओं में बंटा समाज लक्ष्यों में बाधक था और आज भी कमोबेश ये संकट बने हुए हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्रीय मंच पर आगमन के साथ सारा कुछ बदल गया है। 

आम आदमी सरकारी प्रयासों के साथ देश के व्यापक लोकतंत्रीकरण में सहायक बना है। भारत सड़क, रेलवे, बंदरगाह और हवाई अड्डे जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ साफ्ट पावर में भी अग्रणी बना है। स्थान-स्थान पर भारतीय प्रतिभाओं को खोजकर उन्हें सम्मानित करने का क्रम भी जारी है। इससे भारत की आत्मा जाग रही है। 

आप पिछले कुछ सालों में पद्म सम्मानों की सूची का अवलोकन करें तो आपका मन गर्व से भर जायेगा और एक नये भारत को बनता हुआ देख पायेंगे। दिल्ली से निकल देश की संभावनाएं छोटे शहरों और गांवों तक ले जाने के व्यापक प्रयास सब तरफ दिखने लगे हैं। छोटे शहर अपनी संभावनाओं को तलाश रहे हैं। 

गांव संसाधनों का केंद्र बनने के लिए व्यग्र हैं। नीतिगत फैसलों में गति लाकर देश का चेहरा बदलने के ये प्रयास साधारण नहीं हैं। प्रधानमंत्री इस परिघटना को बहुत उम्मीद से देखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं- भारत ने आज जो कुछ हासिल किया है, वह हमारे लोकतंत्र की ताकत, हमारे संस्थानों की ताकत की वजह से संभव हो पाया है। दुनिया देख सकती है कि भारत में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार निर्णायक फैसले ले रही है। हमने दुनिया को दिखा दिया है लोकतंत्र कितना फलदायी हो सकता है। 

नीयत से बदलती नीतियां : परिर्वतन को रोका नहीं जा सकता। यह नैसर्गिक है। किंतु परिर्वतन या बदलाव की दिशा जरूर तय की जा सकती है। सकारात्मक दृष्टिकोण से किये गये काम हमेशा परिणाम देते हैं और उनसे समाज को दिशा मिलती है। बहुत पुरातन और गौरवशाली राष्ट्र होने के बाद भी हमें अपनी कमियों से लगातार आक्रमण, गुलामी और संघर्ष का समय देखना पड़ा। 

बावजूद इसके चिति स्वतंत्र रही। राज और समाज की दूरी ने समाज के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को चुकने नहीं दिया। अत्याचार और विदेशी शासकों के दमन के विरुद्ध भारत का संघर्ष जारी रहा। 

1947 के बाद स्वदेशी, स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता, भारतीय भाषाओं और भारतीय जन के सम्मान का जो समय प्रारंभ होना था वह नहीं हो पाया। लोकसेवक और जनसेवक शासक बन बैठे और उनकी मानसिकता वही थी, जो विरासत में मिली थी। इसने देश के स्वाभिमान को जगने नहीं दिया। लंबे समय के बाद अच्छे काम पर भरोसा करते हुए जनमानस का जागरण हुआ है। 

अपने वर्तमान नेतृत्व के प्रति समाज का असंदिग्ध विश्वास है और उनकी क्षमताओं पर नाज। आजादी के बाद हर सरकार और उसके प्रधान ने निश्चित ही कुछ जोड़ा है। देश ने प्रगति और विकास के नए सोपान तय किये हैं। किंतु भ्रष्टाचार, दिशाहीनता, राजनीतिक निर्णयों में हानि-लाभ के विचार ने उसके संपूर्ण लाभ से वंचित किया। 

सामान्य जन के विकास योजनाओं के एक रुपये में पचासी पैसे के डूब जाने की कहानियां हमने खूब सुनी हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री की विवशता भी प्रकट होती है कि वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि भ्रष्टाचार का घुन अंदर तक प्रवेश कर चुका है।

डिजिटलीकरण ने इस पर न सिर्फ अंकुश लगाया है, वरन लोगों को राहत दी है। सुशासन के लक्ष्य इसी पारदर्शिता से पाये जा सकते हैं। 
2015 से 2017 के बीच 50 करोड़ बैंक खाते खोले गये हैं। भारत आज यूरोप और अमेरीका की तुलना में 11 गुना ज्यादा डिजिटल पेमेंट करता है। आयुष्मान भारत ने 31 करोड़ भारतीयों के लिए मुफ्त कैंसर जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की है। 

यह एक साधारण आंकड़ा भर नहीं है। नई व्यवस्था में स्वयं सहायता समूहों में लगभग 9 करोड़ महिलाओं को 32 अरब डालर (2.6 लाख करोड़ रुपये) की उधार सुविधा दी जा रही है। ऐसे अनेक उदाहरण हमें गर्व से भर देते हैं। इसी संदर्भ में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं-2014 के पहले देश के 60 करोड़ लोग सपना नहीं देख सकते थे।

 प्रधानमंत्री ने उनके जीवन में उम्मीद जगाई है और उनमें महत्वाकांक्षाएं पैदा की हैं। भारत जब आजादी का शताब्दी उत्सव मना रहा होगा तो वह हर क्षेत्र में नंबर-1 होगा। 

उम्मीद जगाता नया भारत : नया भारत अपने सपनों में रंग भरने के लिए चल पड़ा है। भारत सरकार की विकास योजनाओं और उसके संकल्पों का चातुर्दिक असर दिखने लगा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, अटक से कटक तक उत्साह से भरे हिंदुस्तानी दिखने लगे हैं। जाति,पंथ, भाषावाद, क्षेत्रीयता की बाधाओं को तोड़ता नया भारत बुलंदियों की ओर है। 

नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत की सुनें तो 2070 तक हम बाकी दुनिया को 20-30 प्रतिशत वर्कफोर्स उपलब्ध करवा सकते हैं और यह बड़ा मौका है। ऐसे अनेक विचार भारत की संभावनों को बता रहे हैं। 

अपनी अनेक जटिल समस्याओं से जूझता, उनके समाधान खोजता भारत अपना पुनर्अविष्कार कर रहा है। जड़ों से जुड़े रहकर भी वह वैश्विक बनना चाहता है। उसकी सोच और यात्रा ग्लोबल नागरिक गढ़ने की है। यह वैश्चिक चेतना ही उसे समावेशी, सरोकारी, आत्मीय और लोकतांत्रिक बना रही है। लोगों का स्वीकार और उनके सुख का विस्तार भारत की संस्कृति रही है। 

वह अतिथि देवो भव: को मानता है और आंक्राताओं का प्रतिकार भी करना चाहता है। अपनी परंपरा से जुड़कर वैश्विक सुख, शांति और साफ्टपावर का केंद्र भी बनना चाहता है। हमारे प्रधानमंत्री इसीलिए भरोसे से यह कह पाते हैं कि यह युद्ध का समय नहीं है। यह समय देश की रचनात्मकता, विश्वसनीयता और क्षमता को प्रकट करने वाला है। 

यही समय भारत का भी है और भारतबोध का भी। आइए इन सपनों को पूरा करने के लिए भगीरथ प्रयत्नों में अपना भी योगदान सुनिश्चित करें। हमारे छोटे किंतु समन्वित प्रयासों से भारत मां फिर से जगद्गुरु के आसन पर आसीन होंगी और अपने आशीष की हम सब पर वर्षा करेंगी। (लेखक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं।)

Published / 2023-04-20 21:37:32
कर्नाटक में भाजपा हार भी सकती है...

ईमानदार का टिकट कटा, बेइमानों के पौ बारह 

रमेश सर्राफ धमोरा 

एबीएन एडिटोरिलय डेस्क। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए 10 मई को वोट डाले जाएंगे। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुटे हुए हैं। अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। उससे पूर्व कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणाम देश की राजनीति में महत्वपूर्ण पड़ाव साबित होगें।

भाजपा ने सत्ता विरोधी माहौल को समाप्त करने के लिए 52 मौजूदा विधायकों के टिकट काटकर उनके स्थान पर नए चेहरों को मौका दिया है। भाजपा ने पार्टी संस्थापकों में से एक रहे पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार एवं पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी का भी टिकट काट दिया है। 

भाजपा के बड़े नेता रहे के अंगारा, आर शंकर और एमपी कुमार स्वामी ने भी टिकट नहीं मिलने पर इस्तीफा दे दिया है। जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। 

जगदीश शेट्टार 6 बार विधायक, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री सहित कई बार मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष रह चुके हैं। इतने लंबे राजनीतिक जीवन में उन पर कभी किसी तरह के आरोप नहीं लगे हैं। बीएस येदुरप्पा के बाद वह लिंगायत समुदाय के दूसरे सबसे बड़े नेता माने जाते हैं। बीएस येदुरप्पा एवं ईश्वरप्पा के इस बार चुनावी मैदान में नहीं होने से पार्टी के पास बड़े चेहरे का अभाव है। 

कांग्रेस चाहती है कि किसी भी तरह से भाजपा को हरा कर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई जाए ताकि पार्टी के गिरते जनाधार को रोका जा सके। कर्नाटक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे का गृह राज्य है। उनकी सदा से ही मुख्यमंत्री बनने की चाहत रही है जो इस बार सरकार बनने पर पूरी हो सकती है।

वैसे भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद मल्लिकार्जुन खरगे के सामने अपने गृह प्रदेश में सरकार बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। कांग्रेस चुनाव जीतने के लिए सभी तरह के प्रयास कर रही है। जनता दल सेक्युलर मैसूरू इलाके में अपना मजबूत जनाधार रखती है। 

प्रदेश की 100 सीटों पर जनता दल सेक्युलर चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की ताकत रखती है। जनता दल सेक्युलर ने किसी भी राजनीतिक दल से चुनावी समझौता नहीं किया है। उनका मानना है कि चुनाव में पिछले बार की तरह किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा। 

ऐसे में वह अपने जीते हुए विधायकों के बल पर सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगी। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक करोड़ 33 लाख 28 हजार 524 वोट यानी 36.35 प्रतिशत मतों के साथ 104 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को एक करोड़ 39 लाख 86 हजार 526 वोट यानी 38.14 प्रतिशत वोटों के साथ 80 सीटों पर जीत मिली थी। 

जनता दल सेक्युलर को 67 लाख 26 हजार 667 वोट यानी 18.30 प्रतिशत वोटों के साथ 37 सीटों पर जीत मिली थी। पिछले चुनाव में कांग्रेस भाजपा से 6 लाख 58 हजार दो वोट यानी 1.70 प्रतिशत अधिक मत लेकर भी सीटों के मामले में 24 सीटों से पिछड़ गई थी। इसका मुख्य कारण था जनता दल सेकुलर का कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाना। 

पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास कर्नाटक के सबसे प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का कोई बड़ा नेता भी नहीं था, लेकिन इस बार जगदीश शेट्टार के आने से कांग्रेस को लिंगायत समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाने का एक बड़ा हथियार मिल गया है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास पर्याप्त बहुमत नहीं था। 

ऐसे में कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर ने मिलकर जनता दल सक्युलर के नेता एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में सरकार का गठन कर लिया था। मगर 14 महीने बाद ही भाजपा ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के विधायकों से इस्तीफे दिलवा कर जोड़-तोड़ से अपनी सरकार बना ली थी। उस समय येदुरप्पा भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बने थे। 

मगर येदुरप्पा की मनमानी व उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार को लेकर लगे आरोपों के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा और जुलाई 2021 में बसवराज बोम्मई को भाजपा ने नया मुख्यमंत्री बनाया। बोम्मई मुख्यमंत्री बन गए मगर सरकार पर पूरा प्रभाव येद्दयुरप्पा का ही रहा। 2019 में जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने के बाद से ही कर्नाटक भाजपा में लगातार उथल पुथल होती रही है। 

चुनाव से पहले कई बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने से भाजपा मुश्किलों में घिरी नजर आ रही है। पिछले साल तुमकुर जिले के एक ठेकेदार ने तब के मंत्री ईश्वरप्पा पर रिश्वत लेने का आरोप लगाकर आत्महत्या कर ली थी। जिसके चलते ईश्वरप्पा को राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। 

हालांकि बाद में जांच कर ईश्वरप्पा को बरी कर दिया गया था। इसी के चलते इस बार ईश्वरप्पा को टिकट से वंचित रखा गया है। हालांकि भाजपा गुजरात की तर्ज पर अधिकांश विधायकों के टिकट काटना चाहती थी, लेकिन येदुरप्पा के विरोध के चलते ऐसा नहीं कर पायी। 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस बार जहां भाजपा सत्ता विरोधी लहर के चलते बचाव की मुद्रा में है। वहीं कांग्रेस सहित जनता दल सेक्युलर एवं अन्य विपक्षी दल पूरी तरह सरकार पर हमलावर हो रहे हैं। कांग्रेस में भी पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया व प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के मध्य गुटबाजी चल रही है। 

कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व उप मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी विधानसभा के अंदर अश्लील वीडियो देखते पकड़े जा चुके हैं। उनकी छवि विवादास्पद रही है। ऊपर से दूसरे दलों से आए लोगों को कांग्रेस ने टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया है। इससे पार्टी में आंतरिक झगड़े बढ़ गए हैं। कांग्रेस में भी जिन लोगों के टिकट काटे गए हैं वह सभी पार्टी की खिलाफत करते नजर आ रहे हैं। 

इससे कांग्रेस को भी नुकसान होना तय माना जा रहा है। जनता दल सेकुलर जितनी अधिक सीटों पर मजबूत होगी उतना ही कांग्रेस को नुकसान होगा। यही भाजपा की जीत का मूल मंत्र बनेगा। भाजपा का पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास के चेहरे पर फोकस रहेगा। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

Published / 2023-04-20 21:35:13
सबसे व्यापक और प्रचंड अवतार है भगवान परशुराम का

अवतरण दिवस- अक्षय तृतीया पर विशेष  

रमेश शर्मा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पृथ्वी पर सत्य, धर्म और न्याय की स्थापना के लिए भगवान नारायण ने अनेक अवतार लिए हैं। इनमें परशुराम का अवतार पहला पूर्ण अवतार है। जो सर्वाधिक व्यापक है। संसार का ऐसा कोई कोना, कोई क्षेत्र या कोई देश ऐसा नहीं, जहां भगवान परशुराम की स्मृति या चिह्न नहीं मिलते हों। 

उन्होंने संसार में शांति और मानवता की स्थापना के लिए पूरी पृथ्वी की सतत यात्राएं कीं। यदि यह कहा जाय कि विश्व में आर्यत्व की स्थापना भगवान परशुराम ने की तो यह सच्चाई का महत्वपूर्ण तथ्य होगा। भगवान परशुराम का चरित्र वैदिक और पौराणिक इतिहास में सबसे प्रचंड और व्यापक है। उन्हें नारायण के दशावतार में छठे क्रम पर माना गया। वे पहले पूर्ण अवतार हैं। 

उन्हें चिरंजीवी माना गया इसीलिए उनकी उपस्थित हरेक युग में मिलती है। उनका अवतार सतयुग के समापन और त्रेतायुग आरंभ के संधि क्षण में हुआ। वह वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया थी। चूंकि उनका अवतार अक्षय है इसलिए यह तिथि अक्षय तृतीया कहलायी। इस तिथि का प्रत्येक पल शुभ होता है। उनका अवतार एक प्रहर रात्रि के शेष रहते हुआ इसलिए यह ब्रह्म मुहूर्त कहलाया। 

उनकी उपस्थिति सतयुग के समापन से आरंभ होकर कलियुग के अंत तक रहने वाली है। इतना व्यापक और कालजयी चरित्र किसी देवता, ऋषि अथवा अवतार का नहीं मिलता। उन्होंने ही वह शिव धनुष राजा जनक को दिया था जिसे भंग करके रामजी ने माता सीता का वरण किया। भगवान परशुराम ने ही वह विष्णु धनुष भगवान राम को दिया था जिससे लंकापति रावण का वध हुआ।

इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र और गीता का ज्ञान भी देने वाले परशुराम ही हैं। पुराणों में यह भी उल्लेख है कि धर्म रक्षा के लिए कलयुग में कल्कि अवतार होगा तब उन्हें शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देने के निमित्त भी भगवान परशुराम ही होंगे। 

भगवान परशुरामजी का अवतार ऋषिकुल में हुआ। भगवान परशुराम के पिता महर्षि जमदग्नि थे और माता रेणुका सूर्यवंशी प्रतापी सम्राट राजा रेणु की पुत्री थीं। भगवान परशुराम पांच भाई और एक बहन हैं। उनके सात गुरु है। 

पहली गुरु माता रेणुका हैं, दूसरे गुरु पिता महर्षि जमदग्नि। तीसरे गुरु महर्षि चायमान, चौथे गुरु महर्षि विश्वामित्र, पांचवें गुरु महर्षि वशिष्ठ, छठे गुरु भगवान शिव और सातवें गुरु भगवान दत्तात्रेय हैं। 

भगवान शिव की भक्ति तो पूरा संसार करता है पर उनके एक मात्र शिष्य भगवान परशुराम ही हैं। वे मन की गति से भ्रमण करते हैं। इसे मन व्यापक गति कहते हैं। उन्हें चिर यौवन का वरदान है अर्थात वे कभी वृद्ध नहीं होंगे। 

संसार को श्रीविद्या का ज्ञान भगवान् परशुराम ने दिया। शक्ति की उपासना भी भगवान परशुराम से आरंभ हुई। परशुराम के ज्ञान, साधना, ओजस्विता और तेजस्विता के आगे कोई नहीं ठहर पाया। उनके आगे चारों वेद चलते हैं। पीठ पर अक्षय तीरों से भरा तूणीर रहता है। एक हाथ में शास्त्र हैं तो दूसरे में शस्त्र। 

वे श्राप देने और दंड देने दोनों में समर्थ हैं। यह क्षमता किसी और अवतार में या ऋषि में नहीं। उन्होंने यदि प्रत्यक्ष युद्ध करके आतताइयों का वध किया है तो तप करके शिवजी को प्रसन्न भी किया है। उन्होंने समाज निर्माण के लिए दो बार विश्व की यात्रा की। ऋषि रूप वेद ऋचाओं का सृजन भी किया है। 

मध्यकाल में जिस भारत के मान बिंदुओं को कलंकित किया गया उसी प्रकार भारत के आदर्श चरित्र गाथा में अनेक कूटरचित कथाएं जोड़कर विवादास्पद बनाने का कुचक्र चला। आक्रामणकारियों का घोषित नारा था बांटो और राज करो इसके अंतर्गत ही भगवान परशुराम की गाथा में कुछ प्रसंग जोड़े। जो पूरी तरह असत्य और भ्रामक हैं। 

भगवान परशुराम पर दो आक्षेप लगाये जाते हैं एक तो यह कि उन्होंने क्षत्रियों का क्षय किया दूसरा यह कि वे बहुत क्रोधी थे। ये दोनों आक्षेप असत्य हैं और समाज में भेद पैदा करने के लिए कुछ विदेशी षड्यंत्रकारियों द्वारा रचित हैं ताकि समाज को विभाजित कर भारत को कमजोर किया जा सके। 

वे अपने षड्यंत्र में कुछ सफल भी हुए, लेकिन अब हमें स्वयं अध्ययन करके समस्त भ्रांतियों का निवारण करना चाहिए। इन दोनों प्रश्नों पर शास्त्रों में पर्याप्त प्रमाण हैं। श्रीमद्भागवत में स्पष्ट है कि दुष्टं क्षत्रम शब्द आया है। अर्थात दुष्ट राज्य। पुराण कथाओं में तीन शब्द आतें हैं क्षत्र, क्षत्रप और क्षत्रिय। 

इन तीनों शब्दों में अंतर होता है। क्षत्र यानि राज्य, क्षत्रप यानि राजा और क्षत्रिय यानि राज्य के लिए समर्पित। यदि शब्द दुष्ट क्षत्रम् है तो उसका अर्थ हुआ ऐसे राज्य जो दुष्टता करते थे। महाभारत के एक प्रसंग में भगवान् शिव ने आदेश दिया कि तुम मेरे समस्त शत्रुओं का वध करो। संस्कृत में शब्द चाहे क्षत्र आया हो या क्षत्रप लेकिन हिंदी अनुवाद में सीधा क्षत्रिय ही करके भ्रम फैलाया गया। 

परशुराम के संदर्भ में क्षत्रिय शब्द का वर्णन पहली बार कालिदास के रघुवंश में हुआ और यहीं से ने क्षत्रिय विनाश के किस्से चल पड़े। इसके बाद जो साहित्य रचा गया उसमें इसके वर्णन में विस्तार होता गया। भला बताइये भगवान परशुराम नारायण के अवतार हैं। क्षत्रिय की उत्पत्ति नारायण के बाहुओं से हुई तो क्या नारायण स्वयं अपनी बाहुओं का विनाश करने के लिए अवतार लेंगे?

इसके अतिरिक्त उनकी माता देवी रेणुका क्षत्रिय, उनकी दादी देवी सत्यवती क्षत्रिय, भृगु वंश की अनेक ऋषि कन्याएं क्षत्रियों को ब्याहीं तब भला कैसे वे क्षत्रिय विरोधी अभियान छेड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त एक बात और नारायण जब भी अवतार लेते हैं, उनके अवतार का कहीं न कहीं निमित्त होता है। 

यदि किसी अवतार में पत्नी वियोग होना है, वानरों का साथ लेना है, एक ही विवाह करना या एक से अधिक विवाह करना या रणछोड़ का आक्षेप लगना सब निर्धारित होता है। इसीलिए नारायण के अवतार के कार्यों को कर्म नहीं लीला कहा जाता है। नारायण के किसी प्रसंग में किसी शास्त्र में यह उल्लेख नहीं आया कि कभी वे क्षत्रिय हंता बनेंगे। 

अतएव यह भ्रामक बात समाज को मन से निकालनी होगी। समाज को बांटने के यूं भी कम षड्यंत्र नहीं हो रहे हैं। अतएव हमें सत्य को समझना चाहिए। भगवान परशुराम से संबंधित प्रसंग पूरे विश्व में मिलते हैं। उनके विभिन्न नामों में एक नाम भृगुराम भी है। यह शब्द अपभ्रंश होगा बगराम बना। 

अफगानिस्तान में भी बगराम नामक स्थान है यहां विमानतल भी बना है। एक बगराम नगर ईराक में भी है। लैटिन अमेरिका की खुदाई में श्रीयंत्र जैसी आकृति निकली है। भगवान परशुराम के कहने पर मय दानव पाताल गया था। संभवत: मय दानव से ही लैटिन अमेरिका की "मायन सभ्यता" विकसित हुई होगी। रोम की खुदाई में पत्थर पर उकेरी गई एक ऐसी आकृति निकली जिसके कंधे पर धनुष बाण है और परशु जैसा शस्त्र भी। 

यद्यपि इस आकृति के सिर पर टोप तो रोमन ही, पर परशु और धनुष बाण धारण करने वाले एक मात्र परशुराम हैं। संभव है कि रूस नाम ऋषिका का अपभ्रंश हो। पर इस पर व्यापक शोध की आवश्यकता है। मैक्समूलर की पुस्तक हम भारत से क्या सीखें के अनुसार संसार का ज्ञान भारत से ईरान पहुंचा और ईरान से पूरे विश्व में। 

इस कथन से यह धारणा प्रबल होती है कि विश्व में जो परशुराम से मिलते जुलते शब्द या चिह्न मिलते हैं वे सब परशुराम से ही संबंधित हो सकते हैं। इस प्रकार भगवान परशुराम अवतार विश्व व्यापक है, सबसे प्रचंड है और संसार में अधर्म का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

Published / 2023-04-15 23:19:47
राष्ट्रबोध का आधार है इतिहासबोध...

हृदयनारायण दीक्षित

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा दसवीं, ग्यारहवीं व बारहवीं की पुस्तकों में कतिपय संशोधन किये गये हैं। इन पुस्तकों में बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक पाठ्यक्रम बनाए जाते हैं। विषय विशेषज्ञों की समिति विचार करती है। अन्य विषय की पुस्तकों में भी संशोधन हुए हैं। लेकिन इतिहास की पुस्तकों में हुए कतिपय संशोधनों को लेकर बहस चल रही है। 

अध्ययन की दृष्टि से इतिहास, संस्कृति और दर्शन महत्वपूर्ण विषय माने जाते हैं। इतिहासबोध राष्ट्रबोध का आधार है। भारत में इतिहास संकलन की विशेष परंपरा रही है। यूरोपीय तर्ज के इतिहास में राजाओं और सामंतों के संघर्षों का वर्णन ज्यादा होता है। भारतीय इतिहास में संस्कृति का विवरण महत्वपूर्ण होता है।

इतिहास सर्वोच्च मार्गदर्शी होता है। सृष्टि के उदय से लेकर अब तक का विवरण इतिहास है। इतिहास का अर्थ है-ऐसा ही हुआ था। भारतीय जीवन दृष्टि में इतिहास कभी बूढ़ा नहीं होता। यह अजर अमर आख्यान है। इतिहास के वृक्ष पर नित नया वसंत खिलता रहता है। सूर्य उगते हैं। प्रतिपल नया सूर्योदय होता है। इसके पहले ऊषा आती है।

बार-बार आती है। मधु मास आते हैं। नए फूल फल उगते हैं। ऋतुएं नया रंग रूप लेती हैं। मनुष्य और प्रकृति की प्रीति चलती रहती है। संघर्ष भी चलते हैं। मनुष्य मनुष्य से परस्पर लड़ते हैं। हिंसा होती है। मनुष्यता पश्चाताप में होती है। इतिहास के अंत:करण में ऐसी सारी घटनाएं संकलित रहती हैं।

भारतीय इतिहास की शुरुआत सृष्टि सृजन की मधुमय मुहूर्त से होती है। ऋग्वेद के एक मंत्र (10.72.2) में कहते हैं, देवताओं के जन्म से पहले असत्य से सत्य का उद्भव हुआ। सृष्टि उगती है। इतिहास का गायन शुरू हो जाता है। बड़ी बात है कि ऋषि उस कालखंड का वर्णन कर रहे हैं जब देवता भी नहीं थे। ऋग्वेद के ऋषि सृष्टि संरचना से इतिहास का क्रम शुरू करते हैं। यूरोपीय तर्ज के इतिहास लेखक इसे प्रागैतिहासिक काल बता कर छुट्टी पा जाते हैं। पहले समय नहीं था। 

सृष्टि सृजन के शुरूआत के साथ गति हुई और गति से समय का जन्म हुआ। ऋग्वेद के ऋषि इसके भी पहले का वर्णन करते हैं, तब न सत्य था न असत्य था। भू, आकाश आदि भी नहीं थे। न दिन था न रात्रि। वायु भी नहीं थी। यह भारतीय दृष्टि का इतिहास है। असिमोव ने वर्ल्ड क्रोनोलॉजी में बताया है कि अग्नि की खोज मानव जीवन की महत्वपूर्ण घटना है।

ऋग्वैदिक ऋषि अग्नि की खोज का श्रेय भारतीय पूर्वजों को देते हैं। कहते हैं, मनु ने मानवता के हित में अग्नि की स्थापना की। (1.36.19) मनु के बारे में कहते हैं, वह हम सब के पिता हैं। भारत में इतिहास की ज्ञान उपासना प्राचीन है। इस इतिहास में अतीत के तथ्य काव्य रूप में हमारे सामने आते हैं। यह शैली लोकमंगल से जुड़ी प्रकृति की शक्तियों को देवता रूप देती हैं। लेकिन इतिहास के प्रति सजगता बनी रहती है। 

एक सुन्दर सूक्त (10.14.15) में कहते हैं, इदं नम: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकृष्टभ्य:, ऋषिभ्य: - पूर्वजों को नमस्कार है। वरिष्ठों को नमस्कार है। मार्गदर्शक ऋषियों को नमस्कार है। पूर्वज पूर्वकाल में हुए थे और पूर्व काल का विवरण इतिहास है।

अथर्ववेद के पंद्रहवें अध्याय में अथर्वा ने व्रात्य नाम के देवता का विवरण दिया है। वेदों में व्रात्य शब्द का अर्थ उच्चतर आध्यात्मिक चेतना के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह विवरण इतिहास दृष्टि का सुन्दर उदाहरण है, व्रात्य ने उच्चतर स्थिति प्राप्त होते ही ब्रह्मा का मार्गदर्शन प्राप्त किया। ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की। ऋषि व्रात्य की यात्रा का सुन्दर वर्णन करते हैं। सूक्त 6 में कहते हैं, उसने ऊर्ध्व दिशा की ओर प्रस्थान किया। 

भूमि, अग्नि औषधियां, वनस्पतियां उसके अनुकूल हो गयीं। जो यह तथ्य जानते हैं वह उक्त सभी तत्वों को अपने अनुकूल कर लेते हैं। यहां समस्त भौतिक जगत को अपने अनुकूल करने की प्रेरणा है।
कर्तव्य पालन करने वाला व्यक्ति हमेशा गतिशील रहता है। प्रारम्भिक चरण में वह भौतिक जगत को अपने अनुकूल करता है। फिर कहते हैं, व्रात्य ने ऊर्ध्व दिशा की ओर प्रस्थान किया।

ऋत, सत्य, सूर्य और नक्षत्र उसके अनुकूल हो गए और पीछे चलने लगे। यहां चेतना के ऊर्ध्वगमन की बात कही गई है। फिर कहते हैं कि व्रात्य ने वृहती दिशा की ओर प्रस्थान किया। तब इतिहास, पुराण और नारसंशी गाथाएं उसके साथ चलीं। अथर्ववेद में इतिहास का यह उल्लेख ध्यान देने योग्य है। यहां इतिहास भी परिश्रमी व्यक्ति के साथ चलता हुआ बताया गया है।

हिन्दुओं पर इतिहास की उपेक्षा का आरोप पुराना है। अलबेरुनी का आरोप था कि हिन्दू चीजों के ऐतिहासिक क्रम पर ध्यान नहीं देते। वे अपने सम्राटों के कालक्रमानुसार उत्तराधिकार के वर्णन में लापरवाह हैं। निस्संदेह भारत में युद्धों आदि के विवरण का संकलन कालक्रमानुसार नहीं किया गया। वस्तुत: भारतीय इतिहासवेत्ताओं और पुराणकारों की दृष्टि भविष्य की ओर थी। हिन्दुओं ने इतिहास से प्रेरक और अनुकरणीय पात्रों को महत्व दिया है। वैदिक ऋषियों और पुराणकारों ने प्रेय और श्रेय को मंत्र बनाया। काव्य की तरह गाया। लोकस्मृति आखिरकार है क्या?

वस्तुत: यह इतिहास का ही स्वर्ण कोष है। श्रीराम भी राजा हैं। भारतीय इतिहास में ढेर सारे राजा हुए। लेकिन राजा रामचंद्र भारत की श्रुति में, गीत में, परस्पर बतरस में गांव-गली तक चर्चा पाते हैं। श्रीकृष्ण भी ऐतिहासिक नायक हैं। राम राज्य विश्व का आदर्श राज्य है। इतिहास के लाडले राजा हरिश्चंद्र भी महत्वपूर्ण नायक हैं। देश के प्रत्येक गांव-घर में हरिश्चंद्र नाम के हजारों लोग मिलते हैं। सवा अरब की जनसंख्या में ज्यादातर नाम राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र जुड़े हुए हैं। राम प्रसाद, राम नाइक, राम भरोसे, राम बहादुर जैसे नाम इतिहास में हैं। और आधुनिक भारत में भी गांव गली तक चर्चित हैं।

प्राचीन भारत में इतिहास का नाम पुरावृत्त था। यह अमरकोश में सुरक्षित है। उत्तर वैदिक काल की छान्दोग्य उपनिषद में नारद ने सनत् कुमार को बताया था कि मैंने इतिहास और पुराण पढ़े हैं। कालिदास ने रघुवंश में लिखा है कि विश्वामित्र ने राम को पुरावृत्त सुनाया था। भवभूति और राजशेखर ने रामायण को इतिहास बताया है। महाभारत भी इतिहास है। इस इतिहास में यक्ष प्रश्न हैं। ऋग्वेद इस इतिहास का प्राचीनतम विवरण है। इस इतिहास में ऋग्वेद है और ऋग्वेद में इतिहास है। सुदास वैदिक इतिहास के राजा हैं। दस राजाओं से सुदास का युद्ध हुआ था। 

यह बड़ा युद्ध था। (7.83.7) यह हजारों वर्ष प्राचीन इतिहास है। गीता के चौथे अध्याय के पहले व दूसरे श्लोक में इतिहासबोध है कि हे अर्जुन यह योग पहले विवस्वान को दिया था। उन्होंने मनु को बताया और मनु ने इक्ष्वाकु को।

इतिहास की इसी परंपरा में राजऋषियों ने इस ज्ञान का प्रवाह बनाए रखा लेकिन दीर्घकाल में यह ज्ञान नष्ट हो गया। कृष्ण ने कहा वही ज्ञान मैं तुमको बता रहा हूं। ऋग्वेद से लेकर महाभारत पुराणकाल तक का इतिहास प्राचीन ग्रंथों में सुरक्षित है। इससे भी ज्यादा वह भारत की लोक स्मृति में गांव-गली तक फैला हुआ है। इसके बाद मध्यकाल में मुगल सत्ता व आधुनिक काल में ब्रिटिश सत्ता है। इस इतिहास का विरूपण हुआ है। निष्पक्ष ही इतिहास आधुनिक पीढ़ी को जिज्ञासु विज्ञानी बनायेगा। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

Published / 2023-04-15 22:59:50
हिंदी के अनन्य संत डॉ कामिल बुल्के

मनीष कुमार पाण्डेय

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहते हैं प्रतिभा कभी छिपाये नहीं छिपती है। महान पुरूषों के सद्गुण मृग में बसी कस्तूरी के समान होते हैं, जिसकी सुगंध सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। ऐसे ही विभूतियों में शुमार  हैं युग पुरूष साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के। जिनकी सरलता, सहजता, बुद्धिमता, सादगी, तप, त्याग, दूरदर्शिता एवं हिन्दी भाषा के प्रति असीम लगाव को केवल भारत में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में सराहा गया है। 

परहित सरिस धरम नहिं, भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

बेल्जियम के फ्लैंडर्स प्रांत रम्सकैपेले गांव के रहने वाले फ्लेमिश भाषी डॉ कामिल बुल्के को तुलसीदास रचित रामचरितमानस की इस पंक्ति ने इतना प्रभावित किया कि उनके मन में भारत आने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे तुलसीदास की पावन भूमि भारत खिंचे चले आये और हमेशा के लिए यहीं के होकर रह गये। डॉ कामिल बुल्के के मन में यह जिज्ञासा थी कि आखिर इतनी उदात्त सोच रखने वाले तुलसीदास का देश भारत कितना महान और पावन होगा। उसे अनुभव और महसूस करने आखिर वे भारत आ ही गये। बाद में उन्होंने अपने को हिंदी के लिए आजीवन समर्पित कर दिया। 

साहित्य के अनन्य साधक, धर्मयोद्धा और संत साहित्यकार डॉ फादर कामिल बुल्के का जन्म 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम में हुआ था। सन् 1935 ईस्वी में फादर कामिल बुल्के भारत पहुंचे जहां से उनकी जीवन यात्रा का एक नया दौर शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने दार्जिलिंग के संत जोसेफ कॉलेज और गुमला के संत इग्नासियुस मिशन स्कूल में बतौर शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया। 

कुछ ही दिनों में उन्होंने महसूस किया कि जैसे बेल्जियम में मातृभाषा फ्लेमिश की उपेक्षा और फ्रेंच का वर्र्चस्व था, वैसी ही स्थिति भारत में हिन्दी की उपेक्षा और अंग्रेजी का वर्चस्व है। उन्होंने 1938 ई़ में सीतागढ़ा में पंडित बदरीदत्त शास्त्री के निर्देशन में हिन्दी और संस्कृत सीखा। 1940 ई़ में फादर बुल्के ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की विषारद की परीक्षा पास किया। 1947 ई़ में इलाहाबाद विश्वविद्यायल से हिन्दी में एमए की शिक्षा ग्रहण किया। 

1947 ई़ में फादर बुल्के ने डॉ धीरेन्द्र वर्मा की प्रेरणा से रामकथा : उत्पत्ति और विकास विषय पर डॉ माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में शोध कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने हिन्दी प्रेम के कारण अपनी पीएचडी शोध प्रबंध हिन्दी में ही लिखी। जिस समय वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में लिखी जाती थी। उन्होंने जब हिन्दी में शोध प्रबंध लिखने की अनुमति मांगी तो विश्वविद्यालय ने अपनी शोध संबंधी नियमों में बदलाव कर उनकी बात मान ली। 

उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिन्दी में शोध प्रबंध लिखी जाने लगी। फादर बुल्के के द्वारा प्रस्तुत  शोध-प्रबंध हिन्दी में लिखा गया पहला षोध प्रबंध है। उनके द्वारा किया गया शोध इतना गहन, गंभीर और उत्तम था कि आगे चलकर यह भारत सहित पूरे विष्व में प्रकाशित हुई और हिन्दी प्रेमी फादर बुल्के को पूरा विश्व जानने लगा। वास्तव में उनके द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंध को रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्व-कोष कहा जा सकता है। उनका शोध प्रबंध चार भागों में विभक्त है। 

पहले भाग में प्राचीन रामकथा साहित्य की विवेचना की गयी है। इसके अंतर्गत पांच अध्यायों में वैदिक साहित्य और रामकथा, वाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत की रामकथा, बौद्घ रामकथा तथा जैन रामकथा संबंधी सामग्री की पूर्ण परीक्षण की गयी है। दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार प्रसार में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी ही देन है कि आज बैंको में हिन्दी माध्यम से कार्य सम्पन्न हो रहा है। उन्होंने रामकथा और रामचरितमानस को बौद्घिक जीवन दिया। 

फादर बुल्के ने अपने बुलंद हौसलों से यह साबित कर दिया कि-

लहरों को साहिल की दरकार नहीं होती

हौसले बुलंद हो तो चिराग की चाह नहीं होती।

फादर बुल्के हिन्दी अंगेजी शब्द-कोष के निर्माण के लिए वे सत्त प्रयत्नशील रहे। 1968 ई़ में उनका अंग्रेजी हिन्दी कोष प्रकाशित हुआ जो आज भी सबसे प्रामाणिक शब्द कोश माना जाता है। उन्होंने इसमें 40 हजार शब्द जोड़ा है। वे बाइबिल का भी हिन्दी भाषा में अनुवाद किये। भारत में हिन्दी के महत्व को डॉ फादर बुल्के ने बखूबी समझा। 

इस संदर्भ में उनका यह कथन उल्लेखनीय है- संस्कृत भारत की महारानी, हिन्दी बहुरानी, और अंगे्रजी भारत की नौकरानी है। यह उनके हिन्दी प्रेम का परिचायक है। 17 अगस्त 1982 ई को फादर कामिल बुल्के इस धराधाम से हमेशा  के लिए चल बसे। फादर बुल्के को हिन्दी भाषा की सेवा के लिए अनेको सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें 1974 ई में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1951 ई़ में उन्हें भारत की नागरिकता मिली। 

फादर कामिल बुल्के की प्रमुख रचनाएं हैं- रामकथा : उत्पत्ति और विकास, नया विधान, नील पक्षी, मंथन, राम कथा और तुलसीदास, मानस कौमुदी, ईसा जीवन और दर्षन, अंग्रेजी हिन्दी शब्द कोष, हिन्दी अंग्रेजी लघु कोष। 
डॉ कामिल बुल्के ने अपनी साधना से हिन्दी को पूरब और पश्चिम से जोड़ दिया। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति की दीवारों को तोड़ते हुए हिन्दी के अनन्य संत हमेशा के लिए अजर अमर हो गये। हिंदी के लिए उनका समर्पण अविस्मरणीय और अनुकरणीय है।

इस महान विभूति को शत -शत नमन। फिराक गोरखपुरी की ये पंक्तियां बुल्के साहब पर सही बैठती हैं -

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,

तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।

Published / 2023-04-14 18:49:59
मन की बात का 100वां एपिसोड : जनता से सीधे जुड़ने का अभिनव प्रयोग

मनोज कुमार शर्मा 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जल्द ही रेडियो पर प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम का 100वां एपिसोड प्रसारित होगा। इस लोकप्रिय कार्यक्रम के 100वें एपिसोड का रेडियो पर वैश्विक प्रसारण होगा। मन की बात  कार्यक्रम का पहला एपिसोड 03 अक्टूबर 2014 को प्रसारित हुआ था। यह कार्यक्रम प्रत्येक महीने के आखिरी रविवार को रेडियो पर प्रसारित होता है। 

भारत जैसे देश में जिसकी आबादी सवा अरब से ज्यादा हो वहां के प्रधानमंत्री का जनता से सीधा संवाद करने का यह तरीका स्वयं में अभिनव सा है। अब तक यह परिपाटी सी रही थी कि भारत के प्रधानमंत्री चुनावों के समय, राष्ट्रीय पर्वों या किसी खास अवसर पर ही टीवी के माध्यम से जनता को संबोधित करते थे। 

लेकिन, वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात  कार्यक्रम के माध्यम से देशवासियों से किसी खास अवसर की बजाय आम जन के सरोकार वाले प्रत्येक अवसर पर संवाद किया और इसके लिये उन्होंने सर्वसुलभ और देश के 91 प्रतिशत से ज्यादा पहुंच रखने वाले माध्यम रेडियो को चुना।

हालांकि मन की बात कार्यक्रम दूरदर्शन और अन्य राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर भी प्रसारित होते हैं, पर इसका मुख्य माध्यम रेडियो ही है। जब देश का प्रधानमंत्री स्वयं लोगों से मुखातिब हों और छात्रों से परीक्षा, महामारी, अंगदान, मोटे अनाज के उपयोग, कृषि जैसे विषयों पर संवाद करें तो निश्चय ही देशवासियों के बीच इसका सकारात्मक प्रभाव होता है।

जनता ऐसे प्रसारण से अपने प्रधानमंत्री को अपने करीब एक जिम्मेदार प्रतिपाल की भांति महसूस करती है। जब प्रधानमंत्री स्वयं 10वीं, 12वीं की परीक्षाओं के समय छात्रों को सहज होकर परीक्षा देने का संदेश देते हैं और छात्रों को कहते हैं कि आप टॉपर होने शत-प्रतिशत नंबर लाने का तनाव न लें, कुछ प्रतिशत कम नंबरों से पास होना आप की सफलता में  बाधक नहीं बनता नही इससे आप की योग्यता में कोई कमी आती है, तो परीक्षा के तनाव से गुजर रहे छात्रों, युवाओं को एक राहत मिलती है निश्चय ही उनका मनोबल बढ़ता है। 

मन की बात कार्यक्रम के तकरीबन प्रत्येक एपिसोड में प्रधानमंत्री ने देशवासियों के बीच सकारात्मकता का संचार किया है। इस कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि पीएम अक्सर सराहनीय कार्यकरने वालों के बारे में नाम लेकर बताते हैं और संवाद भी करते हैं।  
इस कार्यक्रम के जनता से जुड़ाव में सबसे बड़ा योगदान रेडियो का रहा है। 

ग्रीक भाषा में रेडियस का अर्थ दायरा होता है और इसी शब्द से रेडियो का नाम पड़ा क्योंकि रेडियो का प्रसारण एक व्यापक दायरे में होता है। ऐसे में मन की बात कार्यक्रम के लिये रेडियो का चुनाव एक सफल कदम है। प्रधानमंत्री ने मन की बात के लिए रेडियो को चुना। इससे रेडियो को भी इस टीवी, डिजिटल और इंटरनेटयुग में फिर से पुरानी पहचान मिली है।

अब सभी मन की बात कार्यक्रम को गावों कस्बों, खेतों में भी लोगों को रेडियो पर सुनते देखते हैं। यही नहीं रेडियो को कभी-कभार उपयोग में लेने वाले देश भर के महानगरों और शहरों में रहने वाले लोगों ने रेडियो का उपयोग करना प्रारंभ कर दिया है। 

मुंबई और चेन्नई के अलावा 6 बड़े शहरों में किये गये एक सर्वेक्षण से यह पता चला कि कि लगभग 66.7% आबादी ने प्रधानमंत्री के संबोधन को सुनने के लिए ट्यून किया था और इसे बहुत ही अच्छा कहा।  

झारखंड के लोगों के लिए उपलब्धि का क्षण 

संचार का एक सामान्य तथ्य है कि वह आम जन के लिये सुलभ, रूचिकर, प्रेरणादायी भी हो। जब प्रधानमंत्री स्वयं आकर किसी विषय पर जनता के बीच संदेश दें  उन लोगों का नाम लें जो अपने क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रहे हैं, संघर्ष से अपना लक्ष्य प्राप्त किये हैं या देश समाज के लिये नि: स्वार्थ काम कर रहे हैं तो इसका आम जन में तो व्यापक सकारात्मक प्रभाव होता ही है, उस क्षेत्र के अनय लोग भी इससे प्रेरणा पाते हैं। 

प्रधानमंत्री ने कई एपिसोड में झारखंड में गांव कस्बों तक में बेहतरीन कार्य कर रहे लोगों, युवाओं, महिलाओं, किसानों का नाम लेकर उनके बारे में लोगों को बताया।  सितंबर 2022 में जब प्रधानमंत्री ने रांची के महिला समूह के शोभा दीदी और उनके सहयोगियों के कार्य की सराहना की तो पूरे झारखंड का गौरव बढ़ा। 

75वें एपिसोड में प्रधानमंत्री ने रांची झारखंड के युवा नवीन का विशेष उल्लेख किया और देशवासियों को बताया कि युवा नवीन कैसे झारखंड के स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान के बारे में लोगों को अवगत करा रहे हैं और बिरसा मुंडा से लेकर सिदो कान्हो व अन्य गुमनाम से स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में भी लाग अब जान रहे हैं तो यह झारखंड के लिये बड़ा ही उपलब्धि का क्षण था।  

92वें एपिसोड में गिरिडीह के पीरटांर के मधुबन पंचायम के सिंहपुर गांव के आंगनबाड़ी केंद्र के कुपोषण के खिलाफ किये जा रहे कार्यों की दिल खोल कर सराहना की और झारखंड की यह खबर रेडियो और अन्य माध्यमों से पूरे देश में सुर्खियों में आया।  

दुमका के संजय कच्छप को जिन्होंने अपने प्रयास से चाइबासा समेत अन्य जिलों में 24 लायब्रेरी का निर्माण करवाया है उन्हें लायब्रेरीमैन कह कर जब पीएम ने रेडियो पर पुकारा तो यह झारखंड के लिए बड़ी उपलब्धि थी। वैसे ही गोमो रेलवे स्टेशन जिसे अब सुभाषचंद्र बोस स्टेशन नाम से जाना जाता है, उसके बारे में भी देशवासियों को पीएम ने रेडियो पर अपने कार्यक्रम के माध्यम से ही बताया कि कैसे अंग्रेजों को चकमा देकर  इसी स्टेशन से रेल पर सवार होकर निकलने के बाद नेता जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आये। उनके इस सफर को महानिष्क्रमण नाम दिया और स्टेशन का नाम गोमो से सुभाषचंद्र बोस स्टेशन नाम दिया गया। 

कोरोना काल में 31 जनवरी 2021 के अंक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात में झारखंड के दुमका के शिक्षा मॉडल की चर्चा की। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान स्कूली शिक्षा जारी रखने के लिए दुमका में किये गये अनूठे प्रयास की सराहना की । 
अभी हाल में प्रसारित 99वें एपिसोड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मार्च को अंग दान करने वालों की तारीफ की। अपने संबोधन में उन्होंने झारखंड के जमशेदपुर की रहने वाली स्नेह लता चौधरी का जिक्र किया। 

उन्होंने कहा कि जब अंगदान या देहदान करने वाला कोई मिल जाता है तो उसमें ईश्वर का स्वरूप ही नजर आता है। उन्होंने अपने संबोधन में आगे कहा कि झारखंड की स्नेह लता चौधरी ऐसी ही थीं। जिन्होंने ईश्वर बनकर दूसरों को जिंदगी दी। 63 साल की स्नेह लता चौधरी अपना हार्ट, किडनी, आंख और लीवर दान कर के गयीं। 

मन की बात रेडियो पर प्रसारित एक कार्यक्रम ही नहीं बल्कि एक लोकतांत्रिक देश के मुखिया का अपनी जनता से सीधा जुड़ाव और संवाद है जो जनता और सरकार के बीच संवादहीनता को खत्म करने के साथ ही विश्वास का संचार करता है और बेशक इसके लिए चुना गये माध्यम रेडियो का इसमें  बहुत बड़ा योगदान है। (लेखक स्कूल आॅफ मास कम्युनिकेशन, रांचीविश्विवद्यालय, रांची से जुड़े हैं।)

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