विचार

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Published / 2023-09-24 18:21:46
छोटी उम्र में बड़ी जंगें

रामलाल प्रसाद 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के कोडरमा की 15 साल की सुधा (बदला हुआ नाम) के साहस और संघर्षों को सलाम किया जा सकता है। परिवार बेहद गरीब था और फिर पिता की भी मृत्यु हो गई। घर में पाई-पाई के संकट के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी और पांच लोगों के परिवार का पेट भरने के लिए नन्हीं सी सुधा रोजाना 14 घंटे अभ्रक की खदानों में खटने लगी। 

झारखंड में अभ्रक की खदानें पहले नन्हें बच्चों के शोषण और बाल मजदूरों के इस्तेमाल के लिए कुख्यात थीं। लेकिन कमरतोड़ मेहनत के बाद भी सुधा को मुश्किल से 50 रुपए मिल पाते जिससे किसी तरह पांच लोगों के परिवार का पेट भरता था। इसी बीच सुधा के घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी। लेकिन सुधा किसी भी तरह पढ़ना चाहती और इस उम्र में शादी के खिलाफ थी। 

उसने अपने घर वालों को मनाने की हर चंद कोशिश की लेकिन नाकाम रही। सुधा को अपने गांव में बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के बारे में पता चला। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन द्वारा संचालित बीएमजी अपनी अभिनव पहलों के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में बच्चों को अगली पांत में रखकर न सिर्फ उन्हें जागरूक कर रहा है बल्कि बाल विवाह एवं बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में नए योद्धा तैयार कर रहा है। 

यह लोकतांत्रिक हस्तक्षेपों और कार्रवाइयों के जरिये अपने जीवन और समुदाय में सकारात्मक परिवर्तनों के लिए बच्चों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हुए बाल श्रम, बाल विवाह और बाल यौन उत्पीड़न से बचाव के लिए उनके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा घेरे का निर्माण करता है। सुधा ने अपना बाल विवाह रुकवाने में मदद के लिए बीएमजी के सदस्यों से संपर्क किया। लेकिन उसके परिवार ने मिलने से इनकार कर दिया। 

किसी तरह से वे मुलाकात के लिए राजी हुए। इसके बाद कई मुलाकातों और मान मनुहार के बाद उन्होंने अनमने मन से बालिग होने तक सुधा की शादी नहीं करने का वादा किया। बीएमजी ने सुधा का एक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया और इस तरह उसकी पढ़ाई एक बार फिर शुरू हो गयी।

सुधा बीएमजी की सक्रिय सदस्य हो गई थी और पिछले साल अपने गांव की बाल पंचायत की उपाध्यक्ष चुनी गई। एक बार स्कूल जाना शुरू करने के बाद सुधा ने अभ्रक की खदानों में काम बंद कर दिया। अब परिवार उसे बोझ समझने लगा था और किसी तरह उसके हाथ पीले कर उसे विदा करने की जुगत में था।

शादी के लिए परिवार वालों के लगातार दबाव से परेशान होकर सुधा ने प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) से इसकी शिकायत की। बीडीओ ने तत्काल कार्रवाई करते हुए सुधा के परिजनों से संपर्क किया और उन्हें इस तरह का गैरकानूनी कदम उठाने के खिलाफ चेतावनी दी। 

सुधा अब अपने गांव और आस पास की बच्चियों को बाल विवाह के नर्क में जाने से बचाने की लड़ाई लड़ रही है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो मिल गया है लेकिन अब उन्हें अपने अधिकारों के बारे में शिक्षित करने की जरूरत है। 

बीएमजी की मदद से सुधा ने यही किया है। वह कहती है, मैं बाल पंचायत की सक्रिय सदस्य हूं और मुझे बच्चों के अधिकारों के बारे में पता है। मैं कानूनी रूप से बालिग होने से पहले शादी नहीं करूंगी। आज देश की हर लड़की को सुधा जैसे जज्बे और हौसले से लैस होने की जरूरत है। (लेखक जन सेवा परिषद, हजारीबाग के सचिव हैं।)

Published / 2023-09-10 23:07:08
कई परत वाले प्याज और टमाटर के मसले

  • महंगाई बढ़ाये ब्याज दर 
  • प्याज-टमाटर के भाव सिर्फ रसोई का मसला नहीं हैं। प्याज-टमाटर के भावों का दूरगामी असर समग्र महंगाई दर पर पड़ता है और उसका असर आखिर में ब्याज दर पर पड़ता है। लगातार बढ़ती महंगाई में ब्याज दरों में गिरावट संभव नहीं है। इसलिए प्याज-टमाटरों के भावों को सिर्फ सरकारें नहीं देख रही हैं। रिजर्व बैंक के लिए भी ये भाव विश्लेषण का विषय है। 

आलोक पुराणिक 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जुलाई, 2023 में खुदरा महंगाई दर 7.44 प्रतिशत पर जा पहुंची। जून 2023 में यह दर 4.87 प्रतिशत पर थी। रिजर्व बैंक की नीतिगत आकांक्षा यह है कि यह महंगाई दर चार प्रतिशत के करीब रहे गिरे तो गिरकर दो प्रतिशत से नीचे न जाये और बढ़े तो यह छह प्रतिशत से ऊपर न जाये। पर महंगाई छह प्रतिशत से ऊपर जा चुकी है यानी 7.44 प्रतिशत पर है। 

हालिया महंगाई की वजह टमाटरों की महंगाई है। टमाटर की महंगाई का असर समग्र होता है और ब्याज दर पर भी टमाटर की महंगाई असर डालती है। टमाटर-प्याज के भाव महंगाई दर को ऊपर उठा लेते हैं। महंगाई दर से सरकार तो परेशान होती ही है, रिजर्व बैंक आफ इंडिया की परेशानी भी बढ़ जाती है। 

राजनीति बहुत मुश्किल काम है। कच्चे तेल के भावों से लेकर टमाटर-प्याज के भाव तक के मसले बहुत बड़े बन जाते हैं। अब सरकारें परेशान हैं टमाटर के भाव को लेकर। टमाटर के रिटेल भाव दिल्ली में अगस्त में दो सौ रुपये रुपये प्रति किलो तक पहुंचे। सस्ते टमाटर बिकवाने का इंतजाम सरकार को करना पड़ा। 

दिल्ली में बरसों पहले भाजपा की एक सरकार प्याज के भावों के चक्कर में गयी थी। प्याज सबसे ज्यादा राजनीतिक आइटम है। इस बार टमाटर के भावों ने सरकार को परेशान किया। बोफोर्स तोप के चक्कर में एक सरकार गयी, प्याज के चक्कर में जाने कितनी राज्य सरकारें परेशान रहती हैं। 

टमाटर-प्याज के हाल 

कई राज्यों में टमाटर की फसल तबाह हुई, तो टमाटर के भाव आसमान छूने लगे। प्याज रबी की फसल में भी होता है और खरीफ की फसल में भी होता है। देश की कुल प्याज पैदावार का करीब साठ प्रतिशत रबी में होता है, इसका प्याज ही अक्तूबर तक बाजार में चलता है, इसके बाद नवंबर में खरीफ का प्याज आना शुरू होता है।

इस बार भारी बारिश बाढ़ के हालात के चलते प्याज की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आपूर्ति कम होने या आपूर्ति कम होने की आशंका का ही मतलब है कि भाव ऊपर जायेंगे। भावों ने ऊपर जाना शुरू किया। प्याज के भावों ने उतना कहर न मचाया, जितना कहर टमाटर के भावों ने मचाया। पर प्याज के भावों के राजनीतिक महत्व को केंद्र सरकार समझती है। 

सियासत की चुस्ती 

भाव ऊपर जा रहे हैं, तो सरकारें चिंतित हैं। केंद्र सरकार की अलग चिंता है, राज्य सरकारों की अलग चिंताएं हैं। खासकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि में विधानसभा चुनाव सामने हैं। यहां अलग तरह की राजनीतिक चिंताएं हैं। टमाटर और प्याज आम तौर पर भारतीय खाने का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। तमाम टीवी चैनल लगातार कवरेज दिखाकर इन्हे और खास बना देते हैं। 

लगातार टीवी चैनलों पर इस आशय की कवरेज आती रहती है कि टमाटर खरीदने के लिए लाइन इतनी लंबी है और फलां सरकार ने सस्ता टमाटर बेचने की घोषणा की है। प्याज-टमाटर केंद्रित राजनीति के परिणाम और दुष्परिणामों से भारत के अधिकांश राजनीतिक दल वाकिफ हैं, इसलिए प्याज-टमाटर को लेकर कोई भी राजनीतिक दल सुस्त नहीं दिखना चाहता, खासकर उन राज्यों में तो बिलकुल नहीं, जहां विधानसभा चुनाव सामने हैं। 

बाजार का खेल? 

गौरतलब है कि प्याज जैसी सब्जियों को उगानेवाले किसानों के जोखिम का स्तर धान और गेहूं उगानेवाले किसानों के जोखिम से ज्यादा होता है। धान और गेहूं के मामले में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का सरकारी प्रावधान होता है। पर प्याज में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता है। यानी प्याज का न्यूनतम मूल्य क्या होगा, यह कोई तय नहीं कर सकता, सिर्फ बाजार ही तय करता है। 

किसान बनाम उपभोक्ता 

मसले पेचीदा हैं। अगर प्याज के भाव लगातार बढ़ते रहें, तो कहीं न कहीं किसान को इसका फायदा मिलने की उम्मीद होती है। यूं किसान को हर स्थिति में बढ़े हुए भाव नहीं मिलते, बिचौलिये यानी बीच में थोक कारोबारी ज्यादा कमा लेते हैं। प्याज के भाव जब सस्ते होते हैं, और छोटे किसान के पास प्याज को स्टोर करने की क्षमताएं नहीं होतीं, तो किसान सस्ते में प्याज बेचकर निकल लेता है। सस्ता प्याज बिचौलियों के गोदाम में जमा हो जाता है। 

महंगे टमाटर-प्याज से जुड़ी समग्र महंगाई दर

महंगाई दर का ताल्लुक ब्याज दर से है, ब्याज दर क्या हो, यह निर्धारण रिजर्व बैंक आफ इंडिया करता है जो ब्याज दर निर्धारण में महंगाई दर का विश्लेषण करता है। यानी अगर महंगाई दर लगातार ऊपर जा रही हो, तो रिजर्व बैंक की कोशिश रहती है कि ब्याज दरें सस्ती न हों। ब्याज दर सस्ती कर जायें, तो पब्लिक के हाथ में खूब पैसा सस्ते भावों पर आ जाये, तो फिर महंगाई बढ़ने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। महंगाई अगर लगातार बढ़ती रहे, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरें भी बढ़ाने की बात करता है। 

किसान के हित भी सोचें 

किसी भी आइटम के भावों में तेज गिरावट और बढ़ोतरी के कारणों में आपूर्ति और मांग का संतुलन ही होता है। अगर किसी आइटम की मांग तेजी से बढ़ जाये, तो भाव बढ़ जाते हैं और किसी आइटम की आपूर्ति तेजी से गिर जाये, तो उसके भाव गिर जाते हैं। आपूर्ति गिरने के कारण कुछ भी हो सकते हैं, बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक आपदा के चलते किसी आइटम की आपूर्ति बाधित हो सकती है। इसमें किसी सरकार का कोई दखल नहीं है। (लेखक आर्थिक पत्रकार हैं।)

Published / 2023-09-10 22:06:10
अलबेले मेले का हासिल जी-20 शिखर बैठक

  • जी-20 की आधारशिला वर्ष 1999 में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, कृषि व ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के संबंध में रखी गयी। समय के साथ इनमें पर्यावरण, आतंकवाद जैसे विषय भी जुड़ गये। अब 19 देश और यूरोपीय संघ इसके सदस्य हैं जिनके बीच संगठन की अध्यक्षता बारी-बारी से घूमती है। इस बार भारत इसका अध्यक्ष है वहीं शिखर बैठक का मेजबान भी। सवाल ये है इस बड़े आयोजन से भारत को क्या हासिल होगा? क्या शी चिनफिंग या पुतिन की अनुपस्थिति कोई प्रभाव डालेगी?

पुष्परंजन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए जी-20 शिखर बैठक में आना जरूरी नहीं था। वो जकार्ता में चल रही आसियान शिखर बैठक की ग्रांड सफलता चाहते थे। चीन का मीडिया उन्हीं खबरों से लबरेज रहा, जिसे पूर्वी एशियाई देशों का मीडिया फॉलो कर रहा है। मंशा यही है कि जी-20 बैठक को महत्वहीन साबित किया जाये, उसकी कवरेज कम से कम हो। 

जकार्ता की बैठक में चीनी प्रधानमंत्री ली छियांग मंगलवार को अपना वक्तव्य दे रहे थे। 26वीं चाइना-आसियान शिखर बैठक, 26वीं आसियान प्लस थ्री, और 18वीं ईस्ट एशिया समिट के बाद ली छियांग इस आलेख के छपने तक भारत प्रस्थान कर चुके होंगे। जी-20 की शिखर बैठक में ली छियांग शायद उन सवालों को उभारें, जिसपर चीन को आपत्ति है। 

चीन की बुनियादी आपत्ति जी-20 समारोहों का उन भारतीय इलाकों में होना था, जिसपर वह जबरदस्ती का दावा ठोकता है। कुछ दिल पहले चीन ने एक तथाकथित मानक मानचित्र जारी किया जिसमें अरुणाचल प्रदेश, अक्साईचिन के साथ-साथ ताइवान और दक्षिण चीन सागर पर क्षेत्रीय दावा किया गया। चीन हर साल इस तरह के मानक मानचित्र जारी करता है। यह पहली बार है कि भारत ने चीनी दावों को खारिज करते हुए इस मानचित्र पर कड़ा एतराज किया है। 

जी-20 शिखर सम्मेलन से कुछ दिन पहले इस नक्शे का प्रकाशन चीनी शरारत ही कहा जाना चाहिए। जोहान्सबर्ग की बैठक में शी और मोदी की मुलाकात, सीमा विवाद के हल के लिए पहल संबंधी जो बयान जारी हुआ था, उससे लगा था कि अब गाड़ी पटरी पर चलने लगेगी। शी को यह भी लगा कि पुतिन के बगैर यदि वो दिल्ली शिखर बैठक में जाते हैं, तो कहीं उनकी कूटनीतिक घेरेबंदी न हो जाये। शी का दिल्ली बैठक में नहीं आना भी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए बड़ी खबर बन गयी, जिसकी व्यापक कवरेज देखकर लगता है कि जैसे सबकुछ पूर्वनियोजित हो। 

शी 14 मार्च 2013 को चीन के राष्ट्रपति बने, तब से वो लगातार जी-20 की शिखर बैठकों में जाते रहे। अपवाद के रूप में 2021 की बैठक में शी आभासी रूप से स्क्रीन पर दिखे। वह कोविडकाल था। मगर, शी जब नूसा डुआ में थे, पीएम मोदी से उनका हाथ मिलाना भारत के लिए अहम खबर बनी। मोदी समर्थक सोशल मीडिया लहालोट था। इससे खुन्नस खाये ट्रोल आर्मी ने जवाबी हमले में प्रधानमंत्री मोदी को नहीं बक्शा। अजब हो रहा था, हाथ मिलाओ तो बुरा, न मिलाओ तो मुश्किल। 

क्या शी जो बाइडेन से भी दूरी चाहते थे, इसलिए दिल्ली नहीं आये? इस थ्योरी को भी सही नहीं मानिये। बल्कि, जो बाइडेन ने शी के नहीं आने का अफसोस प्रकट किया है। ठीक से देखा जाये तो अमेरिका-चीन कूटनीति की गाड़ी को धीरे-धीरे पटरी पर लाने के प्रयास लगातार चल रहे हैं। दो अगस्त को अल जजीरा ने खबर दी कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी वाशिंगटन आमंत्रित किये गये हैं। अगस्त 2023 के तीसरे हफ्ते अमेरिकी वित्त मंत्री जीना राइमांडो पेइचिंग हो आई थीं। कई कारणों में से एक कारण अवश्य है कि पुतिन से दोस्ती निभाने की वजह से शी ने भारत आना सही नहीं समझा। 

रिश्तों में असहजता का पहलू

पीएम मोदी से शी की जोहान्सबर्ग में मुलाकात के विजुअल्स को ध्यान से देखिये तो संबंधों में सहजता नहीं प्रकट हो रही थी। बिल्कुल औपचारिक। यांत्रिक। फिर, डोकलाम-देपसांग ला, दौलत बेग ओल्डी जैसे इलाकों में भूमिहरण को लेकर चीन के प्रति भारत का सोशल मीडिया और प्रतिपक्ष जिस तरह से हमलावर है, उससे भारत स्थित चीनी दूतावास ने शी के आने का सही समय नहीं माना। 

भारतीय विदेशमंत्री एस. जयशंकर से जब पूछा गया कि पुतिन और शी चिनफिंग के भारत न आने का जी-20 सम्मेलन पर क्या असर पड़ेगा? जवाब में विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा- मुझे लगता है कि जी 20 में अलग-अलग मौकों पर ऐसे कुछ राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री रहे हैं, जो किसी भी वजह से शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे, लेकिन उस देश के प्रतिनिधि बैठक में अपना पक्ष बताते हैं। मुझे लगता है कि बैठक में सभी प्रतिनिधि बहुत गंभीरता से शामिल हो रहे हैं। 

जयशंकर से दूसरा महत्वपूर्ण सवाल था, शी और पुतिन के जी-20 सम्मेलन में न आने की वजह क्या भारत से नाराजगी है? जयशंकर ने जवाब दिया कि मुझे नहीं लगता कि इसका भारत से कोई संबंध है। दोनों नेताओं ने जो फैसला लिया है, उसके बारे में वो बेहतर जानते होंगे। 

1999 में जी-20 की आधारशिला वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, कृषि व ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग के लिए रखी गयी। सबसे पहले यह आइडिया दुनिया के सात समृद्ध देशों के वित्तमंत्रियों व सेंट्रल बैंक के गवर्नरों ने विकसित किया था। समय के साथ जी-20 में पर्यावरण, आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई और महिला अधिकार जैसे विषय जुड़ते चले गये। सात से बढ़ते-बढ़ते 19 देश और यूरोपीय संघ को मिलाकर 20वां समूह, जी-20 के सदस्य हैं। 

19 देशों के बीच संगठन की अध्यक्षता बारी-बारी से घूमती रहती है। लेकिन भारत में ऐसी व्याख्या की जाती रही, गोया पीएम मोदी के प्रताप की वजह से भारत को जी-20 की अध्यक्षता का अवसर मिला है। बात भी बहुत हद तक सही है। तीस नवंबर से एक दिसंबर 2018 तक अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में जी-20 की शिखर बैठक थी।  (लेखक ईयू एशिया न्यूज के नई दिल्ली संपादक हैं।)

Published / 2023-09-10 20:45:19
जागृत भारत के वक्ता : स्वामी विवेकानंद

  • 11 सितंबर, विश्व धर्म सभा, शिकागो में  स्वामी विवेकानंद के व्याख्यान के 130 वर्ष पूरा होने पर विशेष  

विजय केसरी 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतवर्ष के लिए 9 -10 सितंबर का दोंनो दिन सदा-सदा के लिए स्वर्ण हस्ताक्षर से दर्ज हो चुका है।  जी-20 की बैठक की सफलता, सर्वसम्मति से 73 रेजोल्यूशन पारित कर इतिहास रच दिया, जी 20 में  शामिल सभी देशों का पूर्ण समर्थन ने भारत को विश्व गुरु बनने  के और करीब ला दिया है। 

इतिहास साक्षी है कि 11 सितंबर को शिकागो में विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने जो भाषण दिया था,  जी 20 की बैठक की सफलता से सच होता दिख रहा है। स्वामी विवेकानंद के विचार सदैव देशवासियों के मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। आज से 130 वर्ष पूर्व शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, रीति रिवाज, रहन सहन, समृद्ध भाषा और पौराणिक ग्रंथों की महत्ता पर प्रकाश डाला था। 

स्वामी विवेकानंद से पूर्व किसी भी वक्ता ने अपने धर्म और धर्म ग्रंथों की इतनी विद्वता पूर्ण व्याख्यान नहीं दिया था । मंच पर मौजूद कोई भी धार्मिक गुरु ने यह नहीं सोचा था कि भारत से आया यह युवा संन्यासी इस तरह अपनी बातों को रखेगा। दर्शक दीर्घा में बैठे विभिन्न देशों से आए श्रोता गण को भी विश्वास नहीं हो रहा था कि भारत का यह युवा सन्यासी इतनी गहराई और विद्वता पूर्ण तरीके से अपनी बातों को रखेगा। 

स्वामी विवेकानंद बहुत ही मुश्किलों का सामना करते हुए इस धर्म सभा में सम्मिलित हो पाए थे। जिस कालखंड में स्वामी विवेकानंद ने विश्व धर्म सभा में अपनी बातों को रखा था, भारत ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था। भारत एक गुलाम देश के रूप में जाना जाता था। भारत को गरीबों का एक देश, अनपढ़ों का देश, सपेरों का एक देश के नाम से पश्चिम वाले पुकारा करते थे

स्वामी विवेकानंद की विद्वता पूर्ण प्रस्तुति ने  भारत वासियों को अब तक देखने की दृष्टि को ही बदल कर रख दिया था।स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया यह व्याख्यान एक नये भारत व स्वतंत्र भारत का शंखनाद था। जिस कालखंड में स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था, तब संपूर्ण देश ब्रिटिश हुकूमत के अधीन था। 

ब्रिटिश हुकूमत बहुत ही मजबूती के साथ अपनी पैठ भारत में स्थापित करती जा रही थी। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1857 क्रांति दर्ज होने के बाद देशवासियों के भीतर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जागृति की लहरें पैदा होना शुरू हो गई थी। स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया व्याख्यान ने भारत वासियों को जगाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ।

देशवासियों के मन में अपने गौरवशाली पुरखों के इतिहास हिलकोरे मार रहे थें। उन जागृति की लहरों को जन-जन तक पहुंचाने में स्वामी विवेकानंद के विचार ने देशवासियों के भीतर एक नई चेतना पैदा कर दी थी। उनका जन्म देश को जगाने के लिए ही हुआ था।स्वामी विवेकानंद विलक्षण प्रतिभा के महान संत थे। उन्होंने भारतीय उपनिषद, वेद, पुराण सहित विभिन्न ग्रंथों का व्यापक अध्ययन किया था। मानो उन्होंने भारत की गौरवशाली विरासत से साक्षात्कार कर लिया था। 

उन्हें यह पक्का विश्वास हो गया था कि जिस देश का इतना गौरवशाली इतिहास हो सकता है, वह देश कैसे परतंत्र रह सकता है? देश की परतंत्रता के कारणों की जड़ तक पहुंचने वाले स्वामी विवेकानंद कुछ ऐसा करना चाहते थे कि संपूर्ण विश्व,  भारत के गौरवशाली इतिहास से परिचित हो सके। इसलिए उन्होंने 11 सितंबर 1893 का विश्व धर्म सभा का दिन चुना था। वे  कई परेशानियों को झेलते हुए विश्व धर्म सभा के मंच तक पहुंच पाये थे। उस ऐतिहासिक मंच पर वे करोड़ों भारतवासियों के अकेले प्रतिनिधि थे। 

उन्हें यकीन था कि भारत के प्रति  पश्चिम वासियों की जो सोच थी, उसे सदा सदा के लिए बदल देना था।   वे इसी उद्देश्य को लेकर मंच पर आसीन हुए थे।  उनका सीना गर्व से चौड़ा था। ये बातें उनकी आंखें खुद-ब-खुद बंया कर रही थीं। इस विश्व धर्म सभा में सम्मिलित विचारको ने जब स्वामी विवेकानंद को देखा तो उन सबों को अहसास हो गया था कि  स्वामी विवेकानंद कुछ चमत्कार जरूर करेंगे। 

परंतु भारत के संदर्भ में विश्व भर में प्रचारित बातों को ध्यान में रखते हुए उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह  युवा सन्यासी ऐसा व्याख्यान देगा। पश्चिमी देशों की सोच के विपरीत विवेकानंद जी ने यह चमत्कार कर दिखाया था। जिसकी गूंज आज भी विश्व भर में गूंजित हो रही है। उन्होंने कहा, मेरे प्रिय अमेरिकावासी भाइयों और बहनों! आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है। 

उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है।  संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं। धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं।  सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिंदुओं की ओर से धन्यवाद देता हूं। मैं इस मंच पर बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं।

जिन्होंने प्राची के प्रतिनिधियों का उल्लेख करते समय आपको यह बतलाया कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं। मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। 

हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरण समस्त धर्मों को सच मानकर स्वीकार करते हैं।  मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ित और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। स्वामी विवेकानंद ने जिस अंदाज में अपनी बातों को इस मंच से रखा, आज भी उनकी बातें भारत वासियों को गौरवान्वित करती रहती हैं। उन्होंने कहा कि भारत के समस्त हिंदुओं की ओर से मैं आप सभी को धन्यवाद देता हूं।  

यह सुनकर विश्व धर्म सभा के सभी प्रतिनिधि अवाक रह गये थे। उन सबों ने ऐसी कल्पना भी ना की थी कि भारत का यह युवा सन्यासी इतने विद्वता पूर्ण ढंग से अपनी बातों को रखेगा। स्वामी जी ने बहुत ही तर्कपूर्ण ढंग से भारत की विरासत, भारत के धर्म, भारत के रीति रिवाज, रहन-सहन आदि से संबंधित बातों को रखा था। भारतवासी किस तरह सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते हैं? 

भारतवासी एक सहिष्णु देश के रूप में अपने सभी भाई बहनों के साथ मिलजुल कर रहते हैं। भारत सभी धर्मों का आदर करने वाला देश है। विश्व धर्म सभा से स्वामी विवेकानंद ने जिस तरह आह्वान किया, फलस्वरूप  भारत के प्रति पाश्चात्य देशों की सोच को सदा सदा के लिए बदल कर रख दिया। उन सबों को यह विचारने के लिए विवश होना पड़ा था कि जिस देश का इतना  गौरवशाली  इतिहास है। 

वह देश कैसे परतंत्र रह सकता है ? उस धर्म सभा में स्वामी विवेकानंद ने ना कोई अनशन किया, ना ही धरना दिया था। लेकिन अपनी जागृति पूर्ण बातों से वह काम कर दिखाया, जो पिछले दो हजार वर्षों में किसी भारतीय ने नहीं किया था। भारत की आजादी का इतिहास बहुत ही गौरवशाली है। लंबे संघर्ष के बाद देश को आजादी मिली थी। इस आजादी में शामिल स्वाधीनता सेनानियों के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद के विचार रहें। 

स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रेरित होकर हमारे कई स्वाधीनता सेनानियों ने राष्ट्र सेवा करने का संकल्प लिया था। स्वामी विवेकानंद के विचार जितने उनके जीवन काल में महत्वपूर्ण थे, आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनके विचारों में देश की एकता और अखंडता का पुट मिलता है। 

भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के विचारों पर स्वामी विवेकानंद का गहरा प्रभाव था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ने कहा- यद्यपि स्वामी विवेकानंद ने कोई राजनीतिक  संदेश नहीं दिया, लेकिन जो उनके संपर्क में आया या जिसने भी उनके लेखों को पढ़ा, वह देश भक्ति की भावना से ओतप्रोत हो गया। 

उनमें स्वत: ही राजनीतिक चेतना पैदा हो गयी। सुभाष चंद्र बोस ने बिल्कुल सही दर्ज किया कि स्वामी विवेकानंदने कोई राजनीतिक विचार नहीं दिया था। लेकिन उनके विचारों में देश की परतंत्रता की कोई बात स्वीकार नहीं थी।  उन्हें यह स्वीकार था कि कैसे भारतवासी परतंत्रता से मुक्त हो। जब भारत वासियों का इतना गौरवमई इतिहास रहा है। 

तब उनकी भावी पीढ़ी गुलाम कैसे रह सकती है? स्वामी विवेकानंद का अपने धर्म और अपनी आस्था पर पूर्ण विश्वास था। उन्हें भारत वर्ष में जन्म लेने पर गर्व था। उनका कथन, तुम बस विचारों की बाढ़ लगा दो। बाकी प्रकृति स्वयं संभाल लेगी। अर्थात वे एक एक भारतीय को शिक्षित होते देखना चाहते थे। हर भारतवासी के अंदर में शिक्षा का अलख जगाना चाहते थे। भारत की नारियां, जो देश की आधी आबादी है। उसको भी शिक्षित करना चाहते थे। 

उनका मत था कि देश की आधी आबादी जब अशिक्षित रहेगी, तब देश कैसे स्वालंबन, स्वाधीनता और स्वाभिमान का अनुभव कर सकता है? इसलिए वे पुरुषों के साथ नारियों को भी शिक्षित करना चाहते थे। उन्होंने अपने भाषणों में नारियों की शिक्षा पर बहुत ही बल दिया था। 

नारी  शिक्षा पर उन्होंने कहा, भारत की स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जिससे वे निर्भय होकर भारत के प्रति अपने कर्तव्य को भलीभांति निभा सकें। वे संघमित्रा लीला, अहिल्या बाई और मीराबाई आदि भारत की महान नारियों द्वारा चलायी गयी परंपरा को आगे बढ़ा सके। 

स्वामी विवेकानंद सच्चे अर्थों में  भारत में नव जागृति लाने वाले पहले संत थे। वे एक महान वक्ता थे। वे  भारत के एक शिल्पकार के रूप में भी जाने जाते हैं। हम सब स्वामी विवेकानंद के  विचारों को आत्मसात कर एक बेहतर भारत के निर्माण में महती भूमिका अदा कर सकते हैं।

Published / 2023-09-07 23:45:20
जी-20 में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां

सर्बानंद सोनोवाल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज दुनिया भारत को किफायती और साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में पारंपरिक ज्ञान के भंडार के रूप में पहचानती है। इसका मुख्य कारण आयुर्वेद और योग में इसकी प्रभावशीलता है। भारत की जी-20 की अध्यक्षता ने इस प्रभावकारिता को विश्व की अग्रणी हस्तियों और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े विशेषज्ञों के सामने बहुत ही लक्षित तरीके से प्रदर्शित करने का सुनहरा मौका प्रदान किया।

आयुष मंत्रालय ने वैश्विक समुदाय को यह बताने के लिए सभी प्रासंगिक विचार-विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लिया। भारत के पारंपरिक स्वास्थ्य विज्ञान अच्छे स्वास्थ्य और कल्याण के सतत विकास लक्ष्य 3 (एसडीजी 3) पर ध्यान केंद्रित करते हुए मानवता और पर्यावरण की लगातार बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए इसे प्रदर्शित कर रहे हैं।

अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कोविड के बाद वैश्विक समुदाय के स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार में भारी बदलाव आया है। अब यह समग्र स्वास्थ्य और कल्याण की ओर स्थानांतरित हो गया है। न्यायसंगत तरीके से उच्च गुणवत्ता, सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना अब मानवता की जरूरत है। पिछले 9 वर्षों के दौरान आयुष मंत्रालय की विभिन्न पहलों ने विभिन्न पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में आधुनिक तकनीकी उपकरणों और आधुनिक पद्धतियों को शामिल किया है, जिसके परिणामस्वरूप समग्र रूप से साक्ष्य-आधारित आयुष क्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि हुई है।

यह याद रखना उचित होगा कि जापान के ओसाका में जी-20 शिखर सम्मेलन के तीसरे सत्र के दौरान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वास्थ्य सेवाओं के संबंध में 5 ए - एक्सेसीबल (पहुंच योग्य), अफोर्डेबल (किफायती), अप्रोप्रिएट (समुचित), एकाउंटेबल (जवाबदेह) और एडेप्टेबल (अनुकूलनीय) के बारे में बताया था। 

आयुष मंत्रालय इन आयामों में लगातार योगदान दे रहा है और भारत की जी-20 अध्यक्षता के तहत व्यापक चर्चा के दौरान मंत्रालय ने विभिन्न कार्यक्रमों/सेमिनारों में प्रदर्शित किया कि उसके पास (ए) जी-20 देशों के भीतर पारंपरिक चिकित्सा के लिए अनुसंधान एवं विकास और नियामक दिशा- निर्देशों का मानकीकरण को लेकर वैश्विक सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए सभी आवश्यक साधन हैं; (बी) ज्ञान साझा करने, क्षमता निर्माण और सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों की सुविधा के लिए उद्योग जगत से हितधारकों को शामिल करना। मंत्रालय ने सहयोग और साझेदारी के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के लिए विभिन्न जी-20 भागीदारी और कार्य समूहों के साथ मिलकर काम किया।

जी-20 के तहत स्वास्थ्य कार्यसमूह की स्थापना महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों पर संवाद बढ़ाने और जी-20 देशों के दिग्गजों को सूचित करने के लिए की गयी है। साथ ही, यह समूह वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए समान स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त करने की दिशा में काम करता है। आयुष मंत्रालय ने जी-20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान स्वास्थ्य संबंधी सभी कार्य समूह कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लिया। 

यह सब 17-18 अगस्त को गुजरात के गांधीनगर में आयोजित पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन में किया गया। गुजरात के जामनगर में पारंपरिक चिकित्सा के लिए डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर में भागीदारी, विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान के मामले में और डब्ल्यूएचओ पांरपरिक चिकित्सा रणनीति 2025-35 के दस्तावेज दोनों के लिए भविष्य की रणनीतियों को तैयार करने को लेकर शिखर सम्मेलन एक बड़ी सफलता थी।

पारंपरिक चिकित्सा में भारत सरकार के प्रयासों की सराहना करते हुए, डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस ने इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान पांरपरिक चिकित्सा में भारत के निर्विवाद योगदान की पुष्टि की। उल्लेखनीय है कि इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के परिणाम दस्तावेज को जल्द ही डब्ल्यूएचओ द्वारा गुजरात घोषणा के रूप में जारी किया जायेगा।

हाल ही में, जुलाई में दिल्ली में जी-20 शेरपा, अमिताभ कांत की अध्यक्षता में आयुष मंत्रालय द्वारा स्थिति का जायजा लिया गया था। बैठक में जी-20 के माध्यम से वैश्विक स्तर पर चिकित्सा की आयुष प्रणालियों को बढ़ावा देने के आयुष मंत्रालय के प्रयासों पर ध्यान केंद्रित किया गया। डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन (जीसीटीएम) के भीतर नवीन तकनीकों और नवीन दृष्टिकोणों को शामिल करने का सुझाव देते हुए, अमिताभ कांत ने विस्तार से बताया कि कैसे इनफ्यूजन पारंपरिक कार्यप्रणालियों को आधुनिक बनाएगा और उनकी प्रभावशीलता को बढ़ाएगा, जिससे पारंपरिक चिकित्सा की व्यापक स्वीकृति और उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने जी-20 के सभी भागीदार समूहों में पारंपरिक चिकित्सा के सिद्धांतों को एकीकृत करने के लिए हितधारकों के बीच बेहतर सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

जी-20 की विभिन्न एंगेजमेंट और वर्किंग ग्रुप की बैठकों में आयुष मंत्रालय के प्रयासों का निश्चित रूप से प्रभाव पड़ा है। इस बैठक में यह तब स्पष्ट हुआ जब स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अपर सचिव श्री लव अग्रवाल की टिप्पणी में उन्होंने भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की आगामी स्वास्थ्य संबंधी घोषणा में पारंपरिक चिकित्सा को शामिल करने की पुष्टि की। उन्होंने आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल के संदर्भ में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की पूरी क्षमता का पता लगाने और सहयोग करने के लिए विशेषज्ञों और हितधारकों को एक मजबूत मंच प्रदान करने के लिए पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक समर्पित मंच की स्थापना की आवश्यकता भी जतायी। उसी बैठक में, स्टार्टअप-20 के इंडिया चेयर चिंतन वैष्णव ने कहा कि आयुष चिकित्सा प्रणाली को भविष्य को आकार देने वाले स्टार्टअप-20 एजेंडा की सूची में शामिल किया गया है, जिसे ब्राजील की जी-20 की अगली अध्यक्षता के तहत आगे बढ़ाया जायेगा।

अपने अत्याधुनिक अस्पतालों और अत्यधिक कुशल डॉक्टरों के साथ, भारत चिकित्सा पर्यटन के लिए सबसे लोकप्रिय स्थलों में से एक बनकर उभरा है। देश में चिकित्सा पर्यटन को और बढ़ावा देने के लिए, तिरुवनंतपुरम में पहले स्वास्थ्य कार्यसमूह ने चिकित्सा मूल्य यात्रा पर एक अतिरिक्त कार्यक्रम का आयोजन किया। यह भारत में चिकित्सा पर्यटन उद्योग में अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए एक लाभदायक और व्यावहारिक मंच था। यहां कई हितधारकों द्वारा यह देखा गया कि एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल पर आधारित चिकित्सा मूल्य यात्रा के माध्यम से दुनिया के देश आपस में जुड़ेंगे। इसमें पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को मजबूत तरीके से शामिल किया गया है। यह मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य को पूरा करेगा।

उल्लेखनीय है कि आयुष उद्योग हाल के वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव से गुजरा है। बाजार अनुसंधान रिपोर्ट के अनुसार बाजार में प्रति वर्ष 17 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है और अनुमान है कि यह 23.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक तक पहुंच गया है। ये संख्याएं किसी भी उद्योग मानक से बहुत अधिक हैं। आयुष की बढ़ती लोकप्रियता और स्वीकार्यता का श्रेय बढ़ी हुई जागरूकता, वैज्ञानिक मान्यता, सरकारी समर्थन, वैश्विक पहुंच, जीवनशैली के रुझान और आयुष प्रणालियों द्वारा पेश किए गए व्यक्तिगत दृष्टिकोण को दिया जाता है। जैसे-जैसे अधिक लोग आयुष कार्यप्रणालियों के लाभों का अनुभव करेंगे, मुख्यधारा की स्वास्थ्य देखभाल में इसकी स्वीकृति और जुड़ाव बढ़ने की संभावना है।

एक मोर्चे पर, यह आयुष क्षेत्र में काफी विकास के अवसरों को दशार्ता है, लेकिन इस तेज वृद्धि के साथ जुड़ी चुनौतियाँ भी हैं। चुनौतियों को सुरक्षा, प्रभावकारिता, पारदर्शिता, विश्वसनीयता और नैतिक कार्यप्रणालियों के संदर्भ में देखा जा सकता है।

बढ़ती लोकप्रियता ऐसे उदाहरण भी सामने लाती है जहां भ्रामक दावों ने जनता के बीच अविश्वास पैदा कर दिया हैं। भारत सरकार ने भ्रामक जानकारी के मुद्दे के समाधान के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें विज्ञापन और उपभोक्ता संरक्षण के मामले भी शामिल हैं। इसके संचालन में सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने और आयुष के क्षेत्र में विश्वास को बढ़ावा देने की यात्रा वर्ष 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना के बाद से ही शुरू हो गयी थी।

इन वर्षों के दौरान, मंत्रालय ने अपने फामार्कोविजिलेंस कार्यक्रम को मजबूत करके सक्रिय रूप से कदम उठाये हैं। भ्रामक विज्ञापनों की निगरानी के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया गया है। इसके साथ ही, भ्रामक विज्ञापन से संबंधित अन्य नियम और विनियमन भी ऐसे मामलों से निपटने में समान रूप से प्रभावी हैं।

सरकार की प्रमुख पहलों में से एक मजबूत फामार्को-विजिलेंस कार्यक्रम का कार्यान्वयन है। ये कार्यक्रम आयुष दवाओं की सुरक्षा की निगरानी करने और प्रतिकूल घटनाओं या दुष्प्रभावों पर डेटा इकट्ठा करने के लिए तैयार किए गए हैं। यह कार्यक्रम प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट एकत्र करता है, उनका विश्लेषण करता है और उन पर प्रतिक्रिया देता है। इस पूरी प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाता है कि आयुष दवाओं की सुरक्षा प्रोफाइल की लगातार निगरानी की जा सके।

मंत्रालय ने नियामक अनुपालन और स्थापित दिशा-निदेर्शों के पालन के महत्व पर जोर दिया है। इसने आयुष औषधियों के लिए एक नियामक ढांचा लागू किया है, जिसमें निमार्ताओं, आयातकों और वितरकों के लिए लाइसेंसिंग और प्रमाणन प्रक्रियाएं शामिल हैं। इसके अलावा, मंत्रालय ने आयुष के क्षेत्र में अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित कार्यप्रणालियों को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया है। यह आयुष उपचारों की प्रभावकारिता और सुरक्षा को मान्यता देने के लिए कठिन वैज्ञानिक अध्ययन और नैदानिक परीक्षणों को प्रोत्साहित करता है।

आयुष मंत्रालय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूचनाओं का आदान-प्रदान करने, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को साझा करने और आयुष दवाओं की नियामक निगरानी को मजबूत करने के लिए नियामक अधिकारियों के साथ सहयोग करता है। यह सहयोग यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि सुरक्षा मानक वैश्विक कार्यप्रणालियों के अनुरूप हैं और उनके बीच तालमेल भी है। हाल ही में गांधीनगर में डब्ल्यूएचओ पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान, इस विषय पर गहन विचार-विमर्श किया गया, जिसके परिणामस्वरूप भाग लेने वाले देशों के बीच इस क्षेत्र में समन्वित कार्रवाई की संभावना बढ़ी है।

संक्षेप में, पिछले कुछ महीनों के दौरान जी-20 की अध्यक्षता की गतिविधियों ने विभिन्न भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को साक्ष्य-आधारित प्रभावकारिता को प्रदर्शित करने और साझा करने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान किया। इसने देश और दुनिया भर में पारंपरिक चिकित्सा क्षेत्र के सभी हितधारकों की आशा और विश्वास को भी मजबूत किया है कि भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां व्यापक तौर पर स्वास्थ्य कवरेज के ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मानवता की सेवा करने में सभी आवश्यक साधनों से सुसज्जित हैं। (लेखक, केंद्रीय आयुष और पोत, पत्तन एवं जलमार्ग मंत्री हैं।)

Published / 2023-09-05 18:11:16
शिक्षक का जीवन राष्ट्र के लिए अतुलनीय पाथेय

शिक्षक दिवस/5 सितंबर विशेष 

डॉ वंदना सेन 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। व्यक्ति जीवन भर शिक्षा ग्रहण करता है, तब भी शिक्षा का कोई न कोई अध्याय अधूरा ही रह जाता है। लेकिन भारत के राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक अपने शिष्य में अपनी छवि का दर्शन देखना चाहते हैं। शिक्षक वही है, जो अपने अनुसार देश का चरित्र निर्माण कर सके। 

अपने देश के संस्कारों को देश की भावी पीढ़ी में उतार सके। शिक्षा वही सार्थक होती है, जो अपने देश के लिए चरित्रवान समाज और सकारात्मक सोच का निर्माण कर सके। भारत में अभी तक जो शिक्षा दी जा रही थी, उसमें भारत के मानबिन्दुओं का उपहास उड़ाया गया और विदेशियों का गुणगान किया गया। 

इसमें ऐसे भी विदेशी शामिल किये गये, जिन्होंने भारतीयता को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे चरित्रों के पठन पाठन से ही आज की पीढ़ी भारत के संस्कारों से दूर होती जा रही है। लेकिन हमारे देश के शिक्षकों को भी यह समझना चाहिए कि छात्रों को क्या शिक्षा दी जाये।

हमारे देश में शिक्षाविद् डॉ राधाकृष्णन के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आज के विद्यार्थियों को यह भी नहीं पता होगा कि डॉ राधाकृष्णन जी के जीवन शिक्षकों के लिए एक आदर्श है, एक पाथेय है। जिस पर चलकर हम शिक्षक की वास्तविक भूमिका का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। 

उनके जीवन पर एक नजर डालते हैं। सन 1962 में जब डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ विद्यार्थी उनके पास उनका जन्मदिन मनाने की स्वीकृति लेने गये। उस समय राधाकृष्णन जी ने कहा मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो मुझे अति प्रसन्नता एवं गर्व महसूस होगा। 

डॉ राधाकृष्णन का शिक्षकों के बारे में मत था कि शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे। वास्तविक शिक्षक तो वह है जो छात्र को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे। आज की शिक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि जीवन में पैसे कैसे कमाए जाते हैं, इसे ही ध्यान में रखकर दी जा रही है। 

कहा जा सकता कि जो शिक्षा दे रहे हैं, वे इसे व्यवसाय मान रहे हैं और जो ग्रहण कर रहे वे इसे आय प्राप्त करने का साधन। ऐसी शिक्षा चरित्र का निर्माण नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों को ऐसी शिक्षा भी दें, जो उनके जीवन को संवार सके। क्योंकि जिस शिक्षा से संस्कारों का निर्माण होता है, वही जीवन के काम आती है। 

शिक्षा वही सार्थक होती है, जो जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करे, इसके साथ ही सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति कर्तव्य पालन का बोध कराए। राष्ट्रीय दायित्व का बोध केवल इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों के अध्ययन और अध्यापन से ही हो सकता है। वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि हम शिक्षा तो ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन पिछले पाठों को भूलते जा रहे हैं। 

इसका एक मूल कारण हमारे देश की शिक्षा नीति भी रही है। आज से 75 वर्ष पूर्व जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी शिक्षा नीति को भारतीय बनाने पर जितना जोर दिया जाना चाहिए, उतना नहीं दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह से भटक गए। इसलिए आज की पीढ़ी में न तो भारतीय संस्कारों का बोध है और न ही नैतिकता के जीवन मूल्य ही हैं।

हम भली भांति जानते हैं कि पुरातन काल में भारतीय गुरुकुलों में जो शिक्षा प्रदान की जाती थी, वह निश्चित रूप से बच्चों का समग्र विकास करने वाली ही थी। इतना ही नहीं वह शिक्षा विश्व स्तरीय ज्ञान का द्योतक भी थी, इसलिए विश्व के कई देश भारत के शिक्षालयों में ज्ञान और विज्ञान की उच्चस्तरीय शिक्षा ग्रहण करने आते थे। 

हमें अब उसी शिक्षा पद्धति की ओर कदम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। अभी भारत सरकार ने इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इंडिया को भारत बनाने में सकारात्मक सिद्ध होगी, यह संकेत दिखाई देने लगे हैं। शिक्षकों को भी चाहिए कि वह इस नीति को आत्मसात कर बच्चों के भविष्य को वह दिशा प्रदान करें जो विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। 

जिनकी याद में हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, वे चाहते थे कि शिक्षा विद्यार्थियों को सही और गलत का बोध कराने वाली होना चाहिए। वास्तव में डॉ राधाकृष्णन जी भारतीय संस्कृति के संवाहक थे। उन्होंने अपने लेखों और प्रबोधन के माध्यम से भारतीय संस्कृति की सुगंध को हमेशा ही प्रवाहित किया। 

एक बार शिकागो विश्वविद्यालय में उनको धर्म पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया। जहां उन्होंने भारत के ज्ञान के बारे में प्रेरणास्पद उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन जी की ख्याति वैश्विक धरातल पर और भी बढ़ती चली गई और इसी कारण उन्हें भारत एवं अन्य देशों की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। 

उसके बाद विश्व में भारत का गौरव गान होने लगा। उनके भाषणों में सिर्फ भारत ही होता था। वह जब बोलते थे तब ऐसा लगता था कि यही भारत की वाणी है। वह वास्तव में भारत रत्न थे। इसलिए भारत सरकार ने सन 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया। 

शिक्षा अत्यंत ही अनमोल एवं मूल्यवान है। जिससे विद्यार्थी अपने स्वयं के ज्ञान का विस्तार तो करता ही है, साथ ही देश को भी मजबूत करता है। डॉ राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत के राजनीतिक विचारक में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षकों और शिक्षा के महत्व को बताया है। 

डॉक्टर राधाकृष्णन के अनुसार शिक्षक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से हुए अधिक सम्मान के योग्य होते हैं। भारत में सनातन काल से गुरु और शिष्य का संबंध समर्पण की भावना से परिपूर्ण रहा है। गुरु देश के भविष्य को संवारता है। वर्तमान पीढ़ी देश का भविष्य है। गुरु जैसे संस्कार युवा पीढ़ी को देंगे वैसा ही देश का चरित्र बनेगा। (लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

Published / 2023-09-05 00:02:57
राष्ट्र के प्रकाश स्तंभ होते हैं शिक्षक

रमेश सर्राफ धमोरा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिक्षक हर व्यक्ति के जीवन की रीढ़ होते हैं। शिक्षक ही है जो विद्यार्थियों को जीवन का नया अर्थ सिखाता है। सही रास्ता दिखाता है। गलत करने से रोकता है। वे बाहर से देख सकते हैं। वे प्रत्येक छात्र की देखभाल करते हैं और उनके विकास की कामना करते हैं। शिक्षकों का सम्मान नहीं करने वाले जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकते। 

शिक्षक बच्चों के व्यक्तित्व को ढालते हैं। वे एकमात्र नि:स्वार्थ व्यक्ति हैं जो खुशी-खुशी बच्चों को अपना सारा ज्ञान देते हैं। शिक्षक बच्चों के जीवन के वास्तविक निमार्ता होते हैं, जो न सिर्फ हमारे जीवन को आकार देते हैं, बल्कि इस काबिल बनाते हैं कि वह पूरी दुनिया में अंधकार होने के बाद भी प्रकाश बिखेरते रहें। शिक्षक समाज में प्रकाश स्तंभ की तरह होता है, जो अपने शिष्यों को सही राह दिखाकर अंधेरे से प्रकाश की और ले जाता है। 

शिक्षकों के ज्ञान से फैलने वाली रोशनी दूर से ही नजर आने लगती है। इस वजह से हमारा राष्ट्र ढेर सारे प्रकाश स्तंभों से रोशन हो रहा है। इसलिए देश में शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के रिश्तों को सुदृढ़ करने को शिक्षक दिवस एक बड़ा अवसर होता है।

दुनिया के एक सौ से अधिक देशों में अलग-अलग समय पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह क्रम 1962 से चल रहा है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जतायी थी। कहा जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। यह बात बिल्कुल सत्य है। 

हमारे जीवन में सबसे पहली गुरु तो मां होती है जो हमें जन्म लेते ही हर बातों का ज्ञान कराती है। मगर विद्यार्थी काल में बालक के जीवन में शिक्षक एक ऐसा गुरु होता है जो उसे शिक्षित तो करता ही है साथ ही उसे अच्छे बुरे का ज्ञान भी कराता है। पहले के समय में तो छात्र गुरुकुल में शिक्षक के पास रहकर वर्षों विद्या अध्ययन करते थे। 

उस दौरान गुरु अपने शिष्यों को विद्या अध्ययन करवाने के साथ ही स्वावलंबी बनने का पाठ भी पढ़ाते थे। इसीलिए कहा गया है कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताये। गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा माना गया है, क्योंकि गुरु के माध्यम से ही व्यक्ति ईश्वर को भी प्राप्त करता है।

हमारे जीवन को संवारने में शिक्षक एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सफलता प्राप्ति के लिए वो हमें कई प्रकार से मदद करते है। जैसे हमारे ज्ञान, कौशल के स्तर, विश्वास आदि को बढ़ाते है तथा हमारे जीवन को सही आकार में ढालते है। कबीर दास ने शिक्षक के कार्य को इन पंक्तियो में समझाया है:- गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट, अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।

कबीर दास कहते हैं कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह है और छात्र पानी के घड़े की तरह। जो उनके द्वारा बनाया जाता है और इसके निर्माण के दौरान वह बाहर से घड़े पर चोट करता है। इसके साथ ही सहारा देने के लिए अपना एक हाथ अंदर भी रखता है। डॉ राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही किताबें पढ़ने के शौकीन थे और स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित थे। 

उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन में गुजारे।उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को चेन्नई में हुआ था। राधाकृष्णन ने 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन में प्रवेश करने के साथ ही दर्शनशास्त्र शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने बनारस, चेन्नई, कोलकाता, मैसूर जैसे कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों और लंदन के आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाया था। अध्यापन पेशे के प्रति समर्पण की वजह से उन्हें 1949 में विश्वविद्यालय छात्रवृत्ति कमीशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

पुराने समय में शिक्षकों को चरण स्पर्श कर सम्मान दिया जाता था। परन्तु आज के समय में शिक्षक और छात्र दोनों ही बदल गये हैं।  पहले शिक्षण एक पेशा न होकर एक उत्साह और एक शौक का कार्य था। पर अब यह मात्र एक आजीविका चलाने का साधन बनकर रह गया है। शिक्षक मार्गदर्शक, गुरु, मित्र होने के साथ ही और कई भूमिकाएं निभाते हैं। यह विद्यार्थी के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने शिक्षक को कैसे परिभाषित करता है। संत तुलसी दास ने इसे अच्छे तरीके से समझाया है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। 

अर्थात भगवान, गुरु एक व्यक्ति को वैसे ही नजर आएंगे जैसा कि वह सोचेगा। उदाहरण के लिए अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण को अपना मित्र मानते थे। वहीं मीरा बाई भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रेमी। यही बात शिक्षक के ऊपर लागू होती है। इसीलिए कहते हैं कि शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है।

हर देश में इस दिवस को मनाने की तारीख अलग-अलग है। चीन में 10 सितंबर तो अमेरिका में छह मई, आॅस्ट्रेलिया में अक्टूबर का अंतिम शुक्रवार, ब्राजील में 15 अक्टूबर और पाकिस्तान में पांच अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ओमान, सीरिया, मिस्र, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, सऊदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और कई इस्लामी देशों में 28 फरवरी को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

वर्तमान समय में शिक्षकों का समाज में सम्मान कम होने लगा है। बहुत से शिक्षकों की घटिया हरकतों ने उनको समाज की नजरों से गिरा दिया है। मौजूदा दौर में शिष्य भी कुछ कम नहीं हैं। छात्रों की अनुशासनहीना के चलते स्कूल, कालेजों में शिक्षा का वातावरण समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में गुरु-शिष्य को एक-दूसरे की भावनाओं को समझ कर मिल-जुल कर ज्ञान की ज्योति जलानी होगी। शिक्षक दिवस मनाने के साथ हमें शिक्षण कार्य की पवित्रता को फिर से बहाल करने की प्रतिज्ञा भी लेनी होगी। तभी हमारा शिक्षक दिवस मनाना सार्थक हो पायेगा। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

Published / 2023-09-04 23:56:35
जीवन जीने का सलीका सिखाते हैं शिक्षक

  • शिक्षक दिवस/5 सितंबर/विशेष

योगेश कुमार गोयल

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। विश्वभर में लगभग सभी महापुरुषों ने शिक्षकों को राष्ट्र निमार्ता की संज्ञा दी है। गुरु रूपी इन्हीं शिक्षकों को सम्मान देने के लिए प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा दिन है, जब छात्र अपने शिक्षकों अर्थात गुरुओं को उपहार देते हैं। पहले जहां गुरुकुल परंपरा हुआ करती थी और उस समय जीवन की व्यावहारिक शिक्षा इन्हीं गुरुकुल में गुरु दिया करते थे।

आज नये जमाने में गुरुओं का वही अहम कार्य शिक्षक पूरा कर रहे हैं, जो छात्रों के सच्चे मार्गदर्शक बनकर उन्हें स्कूल से लेकर कॉलेज तक वह शिक्षा देते हैं, जो उन्हें जीवन में बुलंदियों तक पहुंचाने में सहायक बनती है। आज भले ही शिक्षा प्राप्त करने या ज्ञानोपार्जन के लिए अनेक तकनीकी साधन सुलभ हैं किन्तु एक अच्छे शिक्षक की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता। 

जिस प्रकार एक अच्छा शिल्पकार किसी भी पत्थर को तराशकर उसे खूबसूरत रूप दे सकता है और एक कुम्हार गीली मिट्टी को सही आकार प्रदान कर सही आकार के खूबसूरत बर्तन बनाता है, समाज में वही भूमिका एक शिक्षक अदा करता है, इसीलिए शिक्षक को समाज के असली शिल्पकार का भी दर्जा दिया जाता है। इतिहास ऐसे शिक्षकों के उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपनी शिक्षा से अनेक लोगों के जीवन की दिशा ही बदल दी।

भारत के प्रथम उप राष्ट्रपति एवं द्वितीय राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर भारत में प्रतिवर्ष 5 सितंबर को शिक्षकों के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से शिक्षक दिवस मनाया जाता है। 

13 मई 1962 को राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और उसी वर्ष उनके कुछ छात्र उनका जन्मदिन मनाने के उद्देश्य से उनके पास गए तो उन्होंने उन छात्रों को परामर्श दिया कि उनके जन्मदिन को अध्यापन के प्रति उनके समर्पण के लिए शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाये और इस प्रकार 5 सितंबर 1962 से ही देश में यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 5 सितंबर 1888 को एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में जन्मे डॉ राधाकृष्णन ने अपने जीवनकाल के 40 वर्ष एक आदर्श शिक्षक के रूप में समर्पित कर दिये। 

मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने मैसूर यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और लंदन में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी दर्शन शास्त्र पढ़ाया। 1931 में किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की किन्तु उन्होंने देश की आजादी के बाद अपने नाम के साथ सर लगाना बंद कर दिया। राधाकृष्णन 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य रहे और 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

1962 में ब्रिटिश अकादमी का सदस्य बनने पर उन्हें गोल्डन स्पर, इंग्लैंड के आर्डर आफ मैरिट तथा 1975 में मरणोपरांत अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ राधाकृष्णन एक महान् दार्शनिक और आदर्श शिक्षक होने के साथ-साथ राजनीति में भी प्रवीण थे।
दर्शन शास्त्र जैसे गंभीर विषय को भी डॉ राधाकृष्णन अपनी अद्भुत शैली से बेहद सरल और रोचक बना देते थे। जिस विषय का वे अध्यापन करते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। 

डॉ राधाकृष्णन अपने व्याख्यानों के साथ-साथ विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से छात्रों को उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में समाहित करने के लिए प्रेरित कर उनका बेहतर मार्गदर्शन भी करते थे। उनका कहना था कि हमें अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि शिक्षक के बिना इस दुनिया में हम सभी अधूरे हैं। शिक्षक ही हैं, जो देश के भविष्य के वास्तविक आकृतिकार हैं और हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। 

राधाकृष्णन का कहना था कि हमें मानवता को उन नैतिक जड़ों तक वापस ले जाना चाहिए, जहां से अनुशासन और स्वतंत्रता दोनों का उद्गम हो। उनका कथन स्पष्ट था कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होगा और शिक्षा को एक मिशन के रूप में नहीं अपनायेगा, तब तक अच्छी और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।

आज हम हर बच्चे को महंगी उत्कृष्ट आधुनिक शिक्षा के जरिये टॉपर बनाकर बड़ा डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाने का सपना संजोये रहते हैं और भूलते जा रहे हैं कि उसे जीवन की बुलंदियों पर पहुंचाने के साथ-साथ एक अच्छा इंसान बनाना भी बेहद जरूरी है और इसके लिए हर बच्चे को नैतिक, भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक शिक्षा दिये जाने की भी आवश्यकता है ताकि बच्चे अपने विवेक से बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने और समाज को सही दिशा देने में सक्षम बनें। 

डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि यदि सही तरीके से शिक्षा प्रदान की जाए तो समाज की अनेक बुराइयों का समूल नाश किया जा सकता है। एक सभ्य, सुसंस्कारित, सुंदर एवं शांतिपूर्ण समाज के निर्माण के लिए शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ राधाकृष्णन के आदर्शों, उनकी शिक्षाओं तथा जीवन मूल्यों को जीवन में आत्मसात करने की आवश्यकता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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