एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कुछ समय पहले कर्नाटक में मोबाइल चार्जर के करंट से आठ महीने की मासूम बच्ची का जीवन छिन गया। सॉकेट में लगे चार्जर के तार से खेलते हुए बच्ची ने उसे मुंह में चबा लिया। जिससे करंट लगने से उसकी जान चली गई। इस तरह की खबरें कई बार अलग-अलग समाचार माध्यमों में पहले भी सामने आयी हैं। ऐसी दुर्घटनाएं हर किसी की चेताने वाली है। दरअसल, हमारी जिंदगी में बढ़ते स्मार्ट गैजेट्स ने ऐसे हादसों की आशंका बढ़ा दी है। घरों के कोने-कोने में चार्जर लगे होते हैं वहीं स्मार्ट फोन, लैपटॉप, ईयर प्लग्स और जाने क्या-क्या? ऐसे में बच्चों की सुरक्षा के लिए चार्जर के मामले में भी सतर्कता बरतना आवश्यक है।
जहां तक बच्चों की संभाल का मामला है तो बच्चों के लिए घर से सुरक्षित जगह कोई नहीं होती है। माता-पिता इसके लिए हर संभव इंतजाम करने की कोशिश भी करते हैं। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हर सुविधा जुटाते हैं पर कई बार घर के बड़ों की एक छोटी सी लापरवाही बच्चों की सेफ्टी के लिए खतरा बन जाती है।
मामूली सी गलती बड़ी दुर्घटना को न्योता देने वाली साबित होती है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के चार्जर्स को लेकर बेहद सतर्क रहना जरूरी है। यहां-वहां किसी भी सॉकेट में चार्जर न लगाएं। घर में छोटे बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए चार्जर हमेशा किसी ऊंची जगह पर लगे सॉकेट में लगाएं या फिर चार्जर किसी ऐसे कोने में लगा हो जहां बच्चे पहुंच ही न पायें।
घर के भीतर बच्चों के साथ होने वाली ऐसी ज्यादातर दुर्घटनाओं को घर के बड़ों की थोड़ी सी सजगता से रोका जा सकता है। स्मार्ट गैजेट्स को चार्ज करने के बाद स्विच आफ करना ऐसा ही छोटा सा कदम है, जो किसी अनहोनी को टाल सकता है। देखने में आता है हमारे घरों में लगे बहुत से चार्जर्स का स्विच आफ ही नहीं किया जाता।
पैरेंट्स को अपनी इस आदत को बदलने की आवश्यकता है क्योंकि बच्चे अपनी जिज्ञासा और चंचलता के कारण सॉकेट के साथ खेलने लगते हैं। स्विच का आन होना करंट लगने के कारण हादसा बन सकता है। वैसे कोशिश तो यही होनी चाहिए कि बच्चे सॉकेट के पास ही न पहुंचें। सॉकेट में लगे चार्जर को वे छू भी न पाएं। फिर भी कभी ऐसा हो जाये तो चार्जर वाले सॉकेट का स्विच आॅफ होने से दुर्घटना का खतरा बहुत हद तक टल जाता है।
घर में उपयोग होने वाले इलेक्ट्रिकल सॉकेट में चार्जर्स लगाने से जुड़ी सावधानियां बरतने के साथ ही उपयोग में न आ रहे सॉकेट्स पर भी गौर कीजिए। कई बार ऐसा होता है कि काम में न आने वाले सॉकेट भी हादसों का कारण बन जाते हैं।
बच्चे खेलते हुए कइ बार सॉकेट में अंगुली, कभी किसी खिलौने का हिस्सा या कोई अन्य चीज डाल देते हैं। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि घर में जिन इलेक्ट्रिकल सॉकेट का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा उन्हें बच्चों के लिए सुरक्षित बनाया जाये।
इसके लिए तकनीकी उपाय या किसी मॉडर्न उपकरण का सहारा लिया जा सकता है। बिजली के ऐसे सॉकेट के लिए बाजार में चाइल्ड प्रूफिंग भी उपलब्ध है। इसे लगाकर घर में ऐसे सॉकेट्स के जोखिम से बच्चे की सुरक्षा यकीनी बनायी जा सकती है। असल में चाइल्ड प्रूफिंग, एक तरह का छोटा सा इलेक्ट्रिकल सॉकेट कवर होता है। इसे लगाने से घर में यहां-वहां लगे सॉकेट आपके नन्हे बच्चों के लिए खतरा नहीं बन सकते। ऐसी छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर पैरेंट्स द्वारा बच्चों के लिए अपने घर के आंगन को सुरक्षित बनाया जा सकता है।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कैंसर का नाम सुनते ही घबराहट होने लगती है। पीड़ित बीमारी से अधिक तो कैंसर के नाम से डर जाता है। जिस व्यक्ति को कैंसर होता है वह तो गंभीर यातना से गुजरता ही है उसके साथ ही उसका परिवार को भी बहुत कष्टमय स्थिति में गुजरना पड़ता है। जानलेवा होने के साथ ही कैंसर की बीमारी में मरीज को बहुत अधिक शारीरिक पीड़ा भी झेलनी पड़ती है।
कैंसर की बीमारी इतनी भयावह होती है, जिसमें मरीज की मौत सुनिश्चित मानी जाती है। बीमारी की पीड़ा व मौत के डर से मरीज घुट-घुट कर मरता है। कैंसर के बारे में जागरुकता बढ़ाने और इसकी रोकथाम, पहचान और उपचार को प्रोत्साहित करने के लिए 04 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है।
विश्व कैंसर दिवस के परिप्रेक्ष्य 04 फरवरी 2000 को पेरिस में न्यू मिलेनियम के लिए कैंसर के खिलाफ विश्व शिखर सम्मेलन में हुआ था। विश्व कैंसर दिवस का प्राथमिक लक्ष्य कैंसर और बीमारी के कारण होने वाली मौतों को कम करना है। 1933 में अंतरराष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण संघ ने स्विट्जरलैंड में जिनेवा में पहली बार विश्व कैंसर दिवस मनाया था।
यह दिवस कैंसर के बारे में जागरुकता बढ़ाने, लोगों को शिक्षित करने, इस रोग के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए दुनिया भर में सरकारों और व्यक्तियों को समझाने तथा हर साल लाखों लोगों को मरने से बचाने के लिए मनाया जाता है। 2014 में इसे विश्व कैंसर घोषणा के लक्ष्य 5 पर केंद्रित किया गया है, जो कैंसर के कलंक को कम और मिथकों को दूर करने से संबंधित है।
दुनिया भर में हर साल एक करोड़ से अधिक लोग कैंसर की बीमारी से दम तोड़ते हैं, जिनमें से 40 लाख लोग समय से पहले (30-69 वर्ष आयु वर्ग) मर जाते हैं। इसलिए समय की मांग है कि इस बीमारी के बारे में जागरुकता बढ़ाने के साथ कैंसर से निपटने की व्यावहारिक रणनीति विकसित करनी चाहिए।
2025 तक कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों के बढ़कर प्रति वर्ष एक करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2025 तक कैंसर के कारण समय से पहले होने वाली मौतों में 25 प्रतिशत कमी के लक्ष्य को हासिल किया जाए तो हर साल 15 लाख लोगों का जीवन बचाया जा सकता है।
अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में सबसे ज्यादा कैंसर मरीज भारत में है। 2020 में 1.93 करोड़ नए कैंसर मरीज सामने आए थे, जिनमें 14 लाख से अधिक भारतीय थे। इतना ही नहीं भारत में सालाना बढ़ते कैंसर मामलों के चलते 2040 तक इनकी संख्या में 57.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी होने की आशंका है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के अनुसार देश में कैंसर के मामलों की संख्या 2022 में 14.6 लाख से बढ़कर 2025 में 15.7 लाख होने का अनुमान है, जिसके लिए सरकार को चिकित्सा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है। तभी समय पर कैंसर मरीजों की जांच से पहचान कर सही उपचार कर देकर उनकी जान बचाई जा सकती है।
नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कहा है कि देश के अधिकांश क्षेत्रों में कैंसर की सही निगरानी नहीं हो पा रही है, जिस कारण अधिकांश मामलों में बीमारी का देरी से पता चल रहा है। देश के सभी शोध केंद्रों को पत्र लिख आईसीएमआर ने कैंसर की जांच और निगरानी को आसान बनाने के लिए प्रस्ताव मांगे हैं।
देश के सभी जिलों में कैंसर निगरानी और जांच को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान के तहत नई नीति बनाने के लिए आईसीएमआर को जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए अलग-अलग शोध टीमें गठित होंगी और भौगोलिक व स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा स्थिति के आधार पर वैज्ञानिक तथ्य एकत्रित किए जाएंगे।
आंकड़े बताते हैं कि भारत में कैंसर से साल 2020 में 7,70,230, 2021 में 7,89,202 और 2022 में 8,08,558 लोगों की मौत हुई है। देश में कैंसर के मामलों की कुल संख्या 2022 में 14,61,427 रही। वहीं 2021 में यह 14,26,447, जबकि 2020 में 13,92,179 थी। सबसे ज्यादा कैंसर के मरीज उत्तर प्रदेश में हैं। यहां 2020 में 2,01,319, 2021 में 2,06,088 और 2022 में 2,10,958 मरीज मिले। वहीं सबसे कम कैंसर मरीज केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में हैं। यहां 2020 में 27, 2021 और 2022 में 28-28 मरीज मिले हैं।
कैंसर रोगों का एक समूह है जो असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि और प्रसार से होता है। ये कोशिकाएं ट्यूमर नामक द्रव्यमान का निर्माण कर सकती हैं। जो शरीर के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप कर सकती हैं, जबकि कैंसर किसी को भी प्रभावित कर सकता है। यह पहचानना आवश्यक है कि कुछ जीवनशैली विकल्प, जैसे धूम्रपान, खराब आहार और शारीरिक गतिविधि की कमी, कैंसर के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
हाल ही में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक फफड़ों का कैंसर (लंग्स कैंसर) सबसे खतरनाक कैंसर हो सकता है। हमारे देश में भी लंग्स कैंसर के केस तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों का अनुमान था कि 2023 के आखिर तक करीब 2.38 लाख से ज्यादा लोगों में लंग्स कैंसर मिल सकता है। विश्व कैंसर दिवस 2024 की थीम है केयर गैप को बंद करें।
यह कैंसर देखभाल में वैश्विक असमानताओं को रेखांकित करती है। यह कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सभी के लिए समान स्वास्थ्य देखभाल के महत्व पर जोर देते हुए, गुणवत्तापूर्ण उपचार तक पहुंच में अंतर को पाटने के लिए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान करता है।
कैंसर का पता लगाने, कैंसर के प्रकार और कारण, डायग्नोस और उपचार में काफी प्रगति हुई है, लेकिन अफसोस की बात है कि दुनिया की ज्यादातर आबादी के पास अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवायें नहीं पहुंच पाई हैं, जिसमें गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की देखभाल, रेगुलर टीकाकरण, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं और पुरानी बीमारी का इलाज शामिल है। कैंसर की रोकथाम के बारे में जागरुकता फैलाकर, हेल्थ केयर प्रोफेशनल्स को ट्रेनिंग देकर, इफेक्टिव कम्युनिटी बेस्ड प्लान को लागू करके, हम इस बीमारी से बचाव कर सकते हैं।
विश्व कैंसर दिवस दुनिया पर कैंसर के प्रभाव को कम करने के लिए सभी के लिए मिलकर काम करने का एक अवसर है। जागरुकता बढ़ाकर, शिक्षा को बढ़ावा देकर, दूसरों को नैतिक रूप से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करके और कैंसर के खिलाफ लड़ाई में समर्थन देकर ऐसे लोगों का जीवन बचाना है जिसे रोका और ठीक किया जा सकता है।
एकजुट होकर और काम करके हम इस बीमारी से हमारे स्वास्थ्य, हमारी अर्थव्यवस्था और एक समाज के रूप में हमारी आत्माओं पर पड़ने वाले असर को कम कर सकते हैं। कैंसर दुनियाभर में मौत का प्रमुख कारण बना हुआ है। विश्व स्वस्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार 2020 में लगभग एक करोड़ लोगों की मौत कैंसर से हुई थी, जिसमें ब्रेस्ट और लंग कैंसर के सबसे अधिक मामले सामने आए थे।
डब्लूएचओ के अनुसार दुनिया भर में कैंसर के प्रति जागरुकता बढ़ाने से कैंसर के कारण होने वाली मौतों की संख्या को 30-50 प्रतिशत तक कम करने में मदद मिल सकती है। कैंसर की चुनौती से निपटने का सबसे अच्छा तरीका इस मुद्दे के बारे में लोगों से बातचीत शुरू कर के जागरुकता बढ़ाई जाए, तभी कैंसर जैसी जावलेवा बीमारी से लोगों की जीवन रक्षा की जा सकेगी। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यह चौपाई अब वास्तविकता बनने जा रही है जब श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से चहुंओर हर्ष और आनंदमय वातावरण होगा। 5 अगस्त 2020 को राममंदिर की आधारशिला रखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जय सियाराम के उद्घोष के साथ अपने संबोधन में कहा था कि आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिये... इमारतें नष्ट हो गयीं, अस्तित्व मिटाने का भरसक प्रयास हुआ, लेकिन प्रभु श्रीराम आज भी हमारे मन में बसे हुए हैं। प्रभु श्रीराम हमारी संस्कृति के आधार हैं, भारत के जनमानस के विचार हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम हैं। प्रधानमंत्री ने अपने संकल्प स्वरूप यह भी कहा था कि
22 जनवरी 2024 को भव्य-दिव्य मंदिर में हमारे रामलला विधि-विधान के साथ विराजने जा रहे हैं। सांस्कृतिक सभ्यता से परिपूर्ण हमारा भारत सरयू के किनारे एक स्वर्णिम अध्याय रचने जा रहा है। सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक अयोध्या धाम इतिहास गढ़ने जा रहा है। आज संपूर्ण भारत राममय होकर आनंदित है। हर मन प्रफुल्लित है और भारतवासी भावुक हैं क्योंकि पांच सदियों का इंतजार खत्म होने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ संकल्प शक्ति और कर्तव्य परायणता से अयोध्या धाम में श्री राम मंदिर निर्माण के साथ ही अनेक विकास परियोजनाओं के सृजन से अद्भुत अलौकिक वातावरण का निर्माण होने जा रहा है।
हमारे रामलला की प्राण प्रतिष्ठा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, अपितु यह हमारे सांस्कृतिक अभ्युदय का प्रतीक है। यह प्राण प्रतिष्ठा आस्था, धैर्य और संकल्प के विजय का परिचायक है। यह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियों एवं आध्यात्मिक मूल्यों का प्रतिबिंब भी है। अयोध्या में बना यह मंदिर देश के लिए सिर्फ पूजा स्थल नहीं बल्कि यह हमारे पूर्वजों के तप, त्याग और संकल्प का स्थायी प्रेरणापुंज है। जिन कारसेवकों के आंदोलन रूपी तपस्या के फलस्वरूप श्री रामलला का मंदिर आकार ले पाया है, वह आंदोलन अर्पण, तर्पण और संकल्प से ओत-प्रोत था। उसका लक्ष्य सिर्फ राम मंदिर नहीं अपितु रामराज्य स्थापित करना भी था।
वर्ष 2014 में देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के पश्चात नरेन्द्र मोदी ने इसी रामराज्य की संकल्पना को साकार करने के लिए परिश्रम की पराकाष्ठा के साथ कार्य किया है। मोदी सरकार ने एक ओर सदियों से उपेक्षित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं को प्रतिस्थापित किया तो दूसरी ओर गरीब कल्याण को प्राथमिकता के रूप में अपनी सरकार का लक्ष्य बनाया। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने अनुच्छेद 370 की बेड़ियों से मां भारती को आजाद कराना, तीन तलाक की कुरीति से अल्पसंख्यक बहनों को मुक्ति दिलाना, माताओं-बहनों को रसोई में खतरनाक धुएं से मुक्ति दिलाने के लिए गैस सिलेंडर, नारी शक्ति की गरिमा की रक्षा के लिए शौचालय का निर्माण, आयुष्मान भारत योजना के जरिए स्वास्थ्य सेवा, हर गरीब के सिर पर छत हो उस हेतु प्रधानमंत्री आवास योजना, कोई भूखा न रहे इस हेतु 80 करोड़ देशवासियों के लिए मुफ्त राशन की व्यवस्था, किसानों के लिए किसान सम्मान निधि, पिछले सात दशकों से देश को लूटने वाले भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कठोर कदम, कोरोनाकाल में हर भारतीय को मुफ्त वैक्सीन का प्रबंध जैसे अनेकों ऐतिहासिक कार्य किये। मोदी सरकार ने रामराज्य की अवधारणा को साकार करने के लिए हर संभव प्रयास किये है।
दरअसल, किसी भी लोकतंत्र की गुणवत्ता उसके नेतृत्वकर्ताओं पर निर्भर करती है। नेतृत्वकर्ता यदि त्यागी, तपस्वी और न्याय प्रिय है तो निश्चित ही लोकतंत्र सफल होगा जैसा प्रभु श्रीराम के राज में था। वर्षों बाद प्रभु कृपा से ही पुनः भारत को इसी प्रकार त्यागी, तपस्वी और न्याय प्रिय नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के रूप में प्राप्त हुआ है।
जहां एक ओर देश में राममंदिर के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना जागृत हो रही है, उसी समय यह हमारे भारत का अमृतकाल है और 2047 तक भारत को विकसित बनाने के लिए हम भारतीयों को अपने दायित्वों के प्रति कृत संकल्पित रहना है। रामराज्य की संकल्पना भी यही है जहां शासन जन-जन के साथ मिलकर लोकतंत्र को सशक्त बनाने में सहभागिता निभायें। आज भारत ने अपनी सांस्कृतिक विरासतों के गौरव के साथ ही विकास के नये प्रतिमान स्थापित किये हैं।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आज हमारा भारत अपने तीर्थों को भी संवार रहा है और डिजिटल टेक्नोलॉजी की शक्ति से परिपूर्ण विश्व का अग्रणी राष्ट्र भी बन रहा है। आज मोदी सरकार काशी विश्वनाथ धाम के पुनर्निमाण के साथ ही ग्रामीण विकास हेतु 30 हजार से अधिक पंचायत भवन भी बना रही है। सिर्फ केदारधाम का पुनरुत्थान ही नहीं अपितु 300 से अधिक मेडिकल कॉलेज भी देश में बन रहे हैं।
सिर्फ महाकाल के लोक का ही निर्माण नहीं हो रहा, बल्कि स्वच्छ पेयजल के लिए दो लाख से ज्यादा पानी की टंकियों का भी निर्माण हो रहा है और 14 करोड़ घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंच रहा है। आज देश अपनी अतुलनीय वैज्ञानिक क्षमताओं के माध्यम से एक तरफ चन्द्रमा और सूरज की दूरी नाप रहा है तो वहीं हमारी पौराणिक मूर्तियों को भारत में वापस लाकर अपनी सांस्कृतिक सभ्यता के सवंर्धन का कार्य भी कर रहा है।
प्रधानमंत्री ने अयोध्या धाम में महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे एवं अयोध्या धाम जंक्शन के लोकार्पण के अवसर पर कहा कि विकसित भारत के निर्माण को गति देने के अभियान को अयोध्या नगरी से नयी ऊर्जा मिल रही है। विश्व में कोई भी देश हो अगर उसे विकास की नयी ऊंचाई पर पहुंचना है, तो उसे अपनी विरासत को संभालना होगा। हमारी विरासत हमें प्रेरणा देती है। हमें सही मार्ग दिखाती है। आज का भारत पुरातन और नूतन को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रहा है।
वास्तव में आज अयोध्या में अध्यात्म और विरासत की भव्यता के साथ विकास की दिव्यता भी दिखती है। विकास और विरासत का यह संयोजन ही भारत को 21 वीं सदी में सबसे आगे ले जायेगा। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लोकतंत्र, लोकमंगल और आदर्श राज्य व्यवस्था की अभिव्यक्ति की है। चित्रकूट से विदा होते हुए भरत को श्रीराम सबसे बड़ा उपदेश देते हुए राजा-प्रजा के संबंधों पर कहते हैं :-
यानी शासन पक्षपाती एवं अन्यायी न हो, शासन में समाज के अंतिम व्यक्ति के अभ्युत्थान की चिंता प्रमुख होनी चाहिए। हम गर्व से कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के उत्थान की संकल्पना निश्चित ही साकार हो रही है। इस बात में कोई संशय नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री भारत की मिट्टी के कण-कण और भारत के जन-जन के पुजारी हैं। विगत साढ़े नौ वर्षों में न केवल हम भारतीय अपितु समूचा विश्व एक नये भारत के निर्माण का प्रत्यक्षदर्शी रहा है। यह नया भारत है जिसकी संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों को अपनाने में विश्व का हर देश स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करता है। यह नया भारत अपनी आस्था, अस्मिता और अर्थव्यवस्था के प्रति सजग और संवेदनशील भी है और सचमुच में यही तो रामराज्य की संकल्पना है। (लेखक, मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व लोकसभा सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्या या भारत ही नहीं, सारे संसार में राम की चर्चा है। भारत तो राममय हो ही चुका है। अयोध्या में आगामी 22 जनवरी को होने वाले राममंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के लिए जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं। लगभग 500 वर्ष के दीर्घकालीन वनवास के पश्चात प्रभु श्री राम पुन: पूरे विधि-विधान के साथ अपने जन्म स्थान में पुन: विराजमान होने वाले हैं।
भगवान राम फिर अयोध्या लौटे हैं लेकिन उनके उस जन्मस्थान पर आखिर सभी पंथ, सभी संप्रदाय के लोग समय-समय पर क्यों आते जाते रहे हैं? क्योंकि, राम किसी संकीर्ण विचारधारा से नहीं बंधे हैं। राम ही भारत की प्राणशक्ति हैं। राम ही धर्म हैं। मानव शरीर की श्रेष्ठता और उदात्तता का सीमांत राम से ही बनता है।
हर व्यक्ति के जीवन में हर कदम पर जो भी अनुकरणीय हैं, वह राम ही हैं। इसीलिए तो यहां सिख गुरु नानकदेव भी आए और अयोध्या में जन्मे पांच जैन तीर्थंकरों ने भी अपने को राम की वंश-परंपरा से ही जोड़ा। बनारस से दलित संत रविदास भी रामदर्शन के लिए अयोध्या आए तो दक्षिण के आलावर संत भी। द्वैत सिद्धांत मानने वाले आचार्य भी।
अद्वैत के प्रवर्तक शंकराचार्य और विशिष्टाद्वैत के बल्लभाचार्य भी अयोध्या आकर जन्मस्थान पर अपनी साधना में लीन रहे। निर्गुण कबीर भी राम को भजते हैं और सगुण तुलसी भी। भवभूति भी राम को जपते हैं। तुकाराम से तिरुवल्लुवर तक के लिए राम पीड़ित, शोषित और वंचित की अभिव्यक्ति हैं। श्रीराम की अयोध्या कैसी है? अयोध्या लोकतंत्र की जननी है। आराधिका है। संरक्षिका है।
अयोध्या का लोकतंत्र संविधान या परंपरा से नहीं आचरण की श्रेष्ठता से चलता है। अयोध्या का लोकतंत्र लोकमंगल से चलता है। और वहां बना राम मंदिर? क्या जन्मस्थान पर बनी यह नई इमारत राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के पत्थरों और कंक्रीट का महज एक मंदिर है? नहीं। ये बदलते भारत का प्रतीक है, जिसमें किसी अन्याय के प्रतिकार की ताकत है।
इस मंदिर से हमारी परंपरा, संस्कृति, धर्म, सभ्यता, मान-सम्मान का गर्भनाल का रिश्ता है। अयोध्या का मंदिर श्रीराम का है। इस बीच, एक बात कहनी होगी कि अयोध्या में रामलला के मंदिर और प्राण प्रतिष्ठा की जिस तरह से तैयारियां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निगरानी में हुई उसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है।
योगी आदित्यनाथ ने राज्य सरकार के कामकाज के साथ मंदिर निर्माण के काम को भी देखा। वे रोज काम की प्रगति की जानकारी लेते रहे और अपने मंत्रिमंडल के साथियों व अफसरों को जरूरी निर्देश देते रहे। उनकी पैनी नजर के चलते ही राममंदिर में चल रहा निर्माण कार्य वक्त रहते पूर्ण हुआ।
बहरहाल, अयोध्या श्रीराम की थी, श्रीराम की है और श्रीराम की ही रहेगी। श्रीराम भारत के कण-कण में हैं। हमारे भाव की हर हिलोर में श्रीराम हैं। राम यत्र-तत्र, सर्वत्र हैं। जिसमें रम गये, वहीं राम हैं। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। गांधी के राम अलग हैं, लोहिया के राम अलग। बाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है। भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।
कबीर ने राम को जाना, तुलसी ने माना, निराला ने बखाना। राम एक हैं, पर राम के बारे में दृष्टि सबकी भिन्न है। त्रेता युग के श्री राम त्याग, शुचिता, मर्यादा, संबंधों और इन संबंधों से ऊपर मानवीय आदर्शों की वे प्रति मूर्ति है, जिनका दृष्टांत आधुनिक युग में भी अनुसरण करने के लिए दिया जाता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श भ्राता ही नहीं वरन आदर्श पति भी हैं, जो आजीवन एकपत्नी व्रती रहे। भगवान श्री राम ने राजा होते हुए त्याग, संयम, धैर्य, सहयोग और प्रजा के प्रति सेवा भाव का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पत्नी वियोग के साथ नाना प्रकार के कष्ट सहे।
ईश्वरीय अवतार होने के बावजूद मनुष्य रूप में अनेक कष्ट सहने के बावजूद इतिहास ने भी उनके साथ कम अन्याय नहीं किया। माता सीता पर मिथ्या दोषरोपण के कारण राम द्वारा सीता का परित्याग एक मात्र ऐसा प्रसंग रहा, जिसके कारण आज भी प्रभु श्रीराम नारीवादियों के कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं।
हालांकि, मूल वाल्मीकि रामायण में सीताजी के त्याग का ऐसा कोई प्रसंग नहीं मिलता। ऐसा माना जाता है यह प्रसंग बाद में तत्कालीन लेखकों तथा कवियों ने रामकथा की दिशा को मोड़ने या यूं कहें राम की छवि को धूमिल करने और सनातन संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट करने के लिए जोड़ा।
ऐसा भी कह सकते हैं कि भविष्य में नारी के लिए मयार्दा और शुचिता के कड़े मानदंड स्थापित करने के लिए बाद में यह प्रसंग जोड़ा गया हो। लंका विजय के पश्चात अग्नि को साक्षी मानकर सीता माता को पूरे मन से अपनाने वाले प्रभु श्रीराम माता सीता का परित्याग करने के बजाय उनके साथ पुन: वनवास लेना अधिक श्रेयस्कर समझते।
लेकिन, इस अनर्गल प्रसंग ने प्रभु श्रीराम को निरपराध कटघरे में खड़ा कर दिया। वाकई सीता माता के साथ अन्याय हुआ या नहीं यह तो अतीत के गर्भ में है परंतु यदि श्रीराम पर मिथ्या दोष लगाया गया है, तो वाकई इस सूर्यवंशी महान प्रतापी और मर्यादित राजा के साथ हर युग में अन्याय हुआ है।
इस बीच, कुछ ऐसे कथित ज्ञानी भी हैं जो श्रीराम को काल्पनिक मानते हैं। वैसे उनके कहने से क्या फर्क पड़ता है। फर्क तब पड़ता, अगर वे हजारों वर्ष से जिस प्रकार जीवित है, हयात है, साक्षात है, वह न होते। वे केवल जीवित ही नहीं हैं, उनके नाममात्र ने मुर्दा बना दिये गये राष्ट्र को ऐसा संजीवन कर दिया उसने विश्व सत्ता को अपने स्थान वापस कर दिया, जैसे वामन अवतार ने राजा बलि को।
उनका नाम मात्र धर्म का पर्याय बन गया। दशरथ पुत्र श्रीराम से अधिक, कहीं गुना अधिक काम तो राम नाममात्र से हुए। गांधीजी ने साफ कहा कि वे इस बात में पड़ना ही नहीं चाहते कि राम ऐतिहासिक हैं या नहीं। उनके लिए रामनाम ही उनकी शक्ति और उनकी प्रेरणा थी।
खैर, हिंदुत्व और सनातन धर्मावलंबियों के लिए अयोध्या में राममंदिर का निर्माण तथा भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा एक गौरवशाली क्षण है और वर्तमान पीढ़ी बेहद भाग्यशाली है जो, इन ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी बनने जा रही है । वर्षों से प्रभु श्रीराम जन्मभूमि का विवाद न्यायालय के समक्ष लंबित था जिसमें प्रभु श्रीराम एक वादी के रूप में थे। दीर्घकाल के वनवास के पश्चात प्रभु श्रीराम को अयोध्या में उनका अपना स्थान प्राप्त हुआ है। (लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तिथि ज्यों-ज्यों करीब आ रही है, वहां के अभ्युदय, आख्यान, आस्था और अध्यात्म के साथ-साथ आह्लाद और अर्थात पर चातुर्दिक चर्चाएं तेज हो गयी हैं। 2024 की जनवरी और विक्रम संवत 2080 का पुनीत पौष और फाल्गुन माह अयोध्या के दृष्टिकोण से सामाजिक चिंतन और राजनीतिक विचार-विमर्श का केंद्र बिंदु बन चुका है।
अर्थव्यवस्था के अंकगणित के पैमाने पर भी समग्र आयोजन और प्रयोजन को परखा जा रहा है। देश में 20 लाख से अधिक मंदिर हैं लेकिन इस समय सबकुछ राममय है। सबसे ज्यादा मंदिर तमिलनाडु में हैं, जहां की सरकार की ओर से सनातन धर्म पर उठाये गये सवालों का सटीक जवाब देने का समय संभवत: सन्निकट है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने पर्यटन क्षेत्र के विकास के लिए 2023-24 के बजट में 10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। अयोध्या, काशी और प्रयागराज में विकास कार्यों के लिए अलग से व्यवस्था की गयी। पर्यटन विभाग और धर्मार्थ कार्य विभाग क्रमश: 588 और 936 करोड़ रुपये से अकेले अयोध्या में ही कुंड, मठ और मंदिरों का जीर्णोद्धार करा रहा है।
चित्रकूट, विंध्याचल, नैमिषारण्य, शुकताल, गोला गोकर्णनाथ, वृंदावन, बटेश्वर आदि में कॉरिडोर विकसित कर सुविधाएं बढ़ाने का प्रयास है। परिणाम, प्रदेश में 2022 में जो पर्यटक 31.85 करोड़ थे, सितंबर 2023 तक उनकी संख्या 32 करोड़ से अधिक हो गयी। 9.54 लाख सैलानी विदेशी रहे। इस दौरान सबसे ज्यादा 8.42 करोड़ पर्यटक और श्रद्धालु वाराणसी पहुंचे। दूसरी पसंद प्रयागराज रही और 4.50 करोड़ पर्यटकों ने शहर देखा।
2.39 करोड़ श्रद्धालुओं के साथ तीसरे स्थान पर अयोध्या रही। प्रयागराज के आंकड़े अगले साल और अयोध्या के आंकड़े जल्दी ही बदल जायेंगे। 2025 में प्रयागराज में महाकुंभ होगा, जिसमें छह करोड़ श्रद्धालु पहुंचने की आशा है। इसी मंतव्य से वहां की साज-सज्जा और सुरक्षा के साथ ही सुगम मार्ग बनाये जा रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से 22 जनवरी को प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या आने का आह्वान किया है। माना जा रहा है कि इसके बाद अयोध्या देश का सबसे बड़ा धार्मिक पर्यटन स्थल हो जायेगा। प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रदेश सरकार को यहां हर महीने दो करोड़ श्रद्धालु आने का अनुमान है। रामनगरी में 26 जनवरी से 26 दिन तक प्रतिदिन प्रत्येक राज्य से पांच-पांच हजार श्रद्धालुओं को दर्शन कराने की योजना है।
सामान्य तौर पर एक पर्यटक ढाई हजार रुपये से अधिक खर्च करता है। इस आधार पर प्रत्येक वर्ष 55 हजार करोड़ रुपये की आमदनी होगी। अर्थव्यवस्था इससे सशक्त होगी। वाराणसी और अयोध्या के बीच श्रद्धालुओं के लिए हेलिकॉप्टर सेवा फरवरी में शुरू होगी, जबकि आगरा-मथुरा के बीच यह शुरू हो चुकी है।
अयोध्या का घटनाक्रम आर्थिक गतिविधियों और रोजगार के क्षेत्र में भी सफलता का नया अध्याय लिख रहा है। कंफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेड (कैट) का कहना है कि इस आयोजन से 50 हजार करोड़ रुपये का व्यापार होगा। इसके अंतर्गत श्रीराम मंदिर के मॉडल से लेकर मूर्तियां, पूजन सामग्री, घंटा-घड़ियाल, अगरबत्ती-धूपवत्ती, चंदन, चित्र, दीपक और गंगाजल की खरीदारी बढ़ेगी।
अयोध्या की यात्रा इसमें सम्मिलित नहीं है। रेलवे ने आस्था स्पेशल ट्रेनें चलायी हैं तो लाखों यात्री अपने या सार्वजनिक साधनों से रामलला के दर्शन-पूजन कर स्वयं को अनुग्रहीत करेंगे। यहां यह भी जानना उपयुक्त होगा कि 2021-22 में अयोध्या से विभिन्न क्षेत्रों में 110 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था। 2022-23 में यह बढ़कर 254 करोड़ रुपये हो गया है।
यही नहीं, अयोध्या में 2018-19 तक 28 हजार से अधिक रजिस्ट्री होती थीं, जो 2023-24 में अब तक 46 हजार पार हो गई हैं। यही स्थिति वाराणसी की है। यहां इसी अवधि में 40 हजार का आंकड़ा 72 हजार पहुंच गया है। तीर्थाटन के आंकड़े मात्र आंकड़े नहीं है। इनमें आस्था और अध्यात्म का अहम आधार है। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की चारधाम यात्रा प्रसिद्ध है। घरेलू पर्यटकों में 44 फीसदी का उद्देश्य तीर्थयात्रा और धार्मिक यात्रा का होता है।
2022 में राज्य में पांच करोड़ लोग पहुंचे थे, जिसमें 3.8 करोड़ कांवड़िये और 45 लाख चारधाम के यात्री रहे। 2023 में वैष्णो देवी के दरबार में मत्था टेकने वालों की संख्या 97 लाख रही। 2022 में यह आंकड़ा 91.25 लाख था। 2012 में यहां पहली बार 1.04 करोड़ श्रद्धालु पहुंचे थे। बीते वर्ष 62 दिन चली अमरनाथ यात्रा में 4.45 लाख श्रद्धालु शामिल हुए थे, जबकि 2022 में यह संख्या 3.65 लाख थी।
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में कॉरिडोर बनने के बाद पहली बार 8.10 लाख भक्तों ने दर्शन पूजन कर 2024 की शुरूआत की। एक दिन पहले यानी 32 दिसंबर को संख्या तीन लाख से अधिक थी। यही नहीं, तिरुपति बालाजी मंदिर में हर दिन 50 हजार से एक लाख के बीच श्रद्धालु पहुंचते हैं। एक कालखंड में बुजुर्ग ही तीर्थयात्रा के लिए उपयुक्त पात्र माने जाते थे।
वह भी तब, जब उनकी मनौती पूरी होती थी या और मांगने की इच्छा होती थी। बाद में इसमें बदलाव आया। फिर भी देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन साधनों, संसाधनों और सुरक्षा की कमी के कारण अनियमित था। अब श्रद्धालुओं की श्रेणी में युवक-युवतियां और बच्चे भी आ गये हैं। आर्थिक सामर्थ्य बढ़ने के कारण एक बड़ा वर्ग वर्ष में कम से एक बार पौराणिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले स्थानों पर जाता है।
तीर्थयात्री आने-जाने से लेकर परिवहन, होटल, धर्मशाला, भोजनालय आदि पर खर्च करने के साथ स्थानीय महत्व की स्मृतियां संजोने के लिए खरीदारी भी करते हैं। यही कारण है कि हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा उत्सव देखने के लिए कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं। इन्हें समझते हुए छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने राम की महत्ता को समझते हुए राम वन गमन पथ बनवाया। छत्तीसगढ़ को माता कौशल्या का घर माना जाता है।
हरियाणा सरकार ने सूरजकुंड में दिवाली उत्सव मनाने की योजना बनायी है तो कुरुक्षेत्र में दो सौ करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर ज्योतिसर पार्क खोला जा रहा है। यहां देश में पहली बार महाभारत की कहानी के वाचन के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी उपकरणों का प्रयोग किया जायेगा। जिले में 164 अन्य तीर्थस्थलों का विकास किया जा रहा है। कुरुक्षेत्र में 1989 में जिला स्तरीय गीता जयंती महोत्सव अब वैश्विक हो गया है।
24 दिसंबर 2023 को गीता जयंती के उपलक्ष्य में कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में एक लाख श्रद्धालुओं द्वारा गीता पाठ का विश्व रिकॉर्ड अविस्मरणीय हो गया है। असम में कामाख्या मंदिर के विकास कार्यों पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में महालक्ष्मी मंदिर कॉरिडोर और नासिक से त्र्यंबकेश्वर तक सुविधाजनक मार्ग निर्माणाधीन है। यदि तेलंगाना में भगवान नृसिंह का मंदिर बन रहा है तो राजस्थान में गोविंद देव मंदिर और पुष्कर तीर्थ में सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश है।
तीर्थाटन का महत्व सरकारों को भी पता चल गया है। यही कारण है कि पंजाब सरकार ने नवंबर में गुरुनानक देव के प्रकाशोत्सव पर मुख्यमंत्री तीर्थ योजना शुरू की। इसमें तीन महीने तक 53,850 बुजुर्ग श्रद्धालुओं को देश भर के तीर्थस्थलों के दर्शन के लिए लाने-ले जाने से जुड़े सारे खर्च सरकार देगी।
इस पर 40 हजार करोड़ रुपये खर्च का अनुमान है। मध्य प्रदेश के निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव से चंद दिन पहले अपनी तीर्थ दर्शन योजना में बड़ी सोच प्रदर्शित कर राज्य के 32 वृद्धजनों को दर्शन-पूजन के लिए हवाई जहाज से प्रयागराज भेजा। इससे पहले यह योजना हरियाणा और दिल्ली में भी चलाई जा चुकी है। दिल्ली सरकार ने 75 हजार लोगों को तीर्थयात्रा करायी थी।
भारत में सैर सपाटा वाले प्रमुख स्थानों में 75 से 80 प्रतिशत से अधिक तीर्थस्थल हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, योगेश्वर श्रीकृष्ण, देवाधिदेव महादेव, दुष्ट विनाशनी दुर्गा और काली के अलावा अमोघ आशीषों से आच्छादित हनुमान देशवासियों की आस्था के केंद्र रहे हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे तीर्थस्थल ही पर्यटन के प्रमुख स्थान बन गए।
पर्यटन पहले से अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। अब तीर्थाटन आस्था के साथ अर्थव्यवस्था का नया आधार बन गया है। यही कारण है कि इनके लिए सरकारें ब्रांडिंग और व्यवस्थाएं विकसित कर रही हैं। रोजगार और अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पर्यटन उद्योग की देश की जीडीपी में 9.2 प्रतिशत और रोजगार में 8.1 फीसदी हिस्सेदारी है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसे-जैसे अयोध्या नगरी के नवनिर्मित श्रीराम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के दिन नजदीक आते जा रहे हैं। वैसे- वैसे विभिन्न अखबारों,पत्र-पत्रिकाओं एवं अन्य जन माध्यमों में श्रीराम पर विशेष सामग्री प्रस्तुत की जा रही है जिससे जनमानस को राम की भव्यता, दिव्यता और शुभ्रता को अनुभव करने में सहूलियत हो रही है।
भारतीय साहित्य में राम का चरित्र भरा पूरा है। सभी कवि अपनी काव्यात्मक प्रतिभा से राम के शील,शक्ति और सौंदर्य को अपने अपने ढंग से देखने,समझने का प्रयास किया है। कविवर निराला ने भी राम की शक्ति पूजा के माध्यम से राम को नये भाव-बोध के साथ के देखने का प्रयास किया है। उन्होंन राम को युगीन संवेदना के अनुकूल पूरी तरह से समय-सापेक्ष और मानवीय धरातल पर खड़ा किया है। निराला के राम सामान्य मनुष्य की तरह विषम परिस्थित में दुखी एवं निराश होते हैं। यथा -
रावण के साथ युद्ध करने के क्रम में जब पहली बार राम को कठिन परिस्थित का एहसास होता है,तब उनका मन कौंधने लगता है और वे कहते हैं -
निराला के राम तुलसी के राम जैसे निर्विकार नहीं है। उनका एक रूप आधिदैविक है और दूसरा सहज मानवीय। कविवर निराला इस ओर इशारा करते हुए लिखते हैं-
स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय अर्थात वे जितने दृढ़ चेता हैं,उतने ही शंकालु भी। पूरी कविता में राम की इसी आशा-निराशा के द्वंद्व को दिखाया गया है। राम को उदास देख विभीषण इसका कारण पूछते हैं। राम मंद स्वर में उत्तर देते हैं कि समर में हमें विजय न मिलेगी। यह नर-वानर का राक्षस से युद्ध नहीं रहा। रावण के आमंत्रण पर महाशक्ति उसकी सहायता के लिए उतरी हैं। यह कहते-कहते राम के नेत्र छलछला उठते हैं।
जाम्बवान उन्हें धैर्य देते हुए कहते हैं कि आप भी आराधना का उत्तर दृढ़ आराधना से दीजिए और शक्ति का पूजन कीजिए। जब तक सिद्धि की प्राप्ति न हो जाए तब तक युद्ध छोड़ दीजिये। तब तक युद्ध का संचालन अन्य वीर करते रहेंगे। सुग्रीव आदि एक स्वर से इस सुझाव का समर्थन करते हैं। राम तत्काल ही शक्ति की आराधना करने लगते हैं। वे हनुमान को देवीदह नामक सरोवर से जाकर एक सौ आठ कमल पुष्प ले आने का आदेश देते हैं।
हनुमान प्रभात से पूर्व ही कमल फूल ले आते हैं। रात्रि का अवसान होता है। सूर्य की प्रथम किरण फूटती है। युद्ध भूमि में कोलाहल होने लगता है किन्तु राम मन को एकाग्र किए आराधना में मग्न हैं। इसी प्रकार पांच दिन बीत गए। छठे दिन उनका मन आज्ञाचक्र पर पहुंच गया। भगवती को कमल पुष्प अर्पित करते हुए राम एक ही आसन पर अडिग बैठे रहे।
आठवें दिन एक इंदीवर शेष रह गया और मन सहस्रार को पार करने की प्रतीक्षा करने लगा है। तब दो पहर रात बीतने के बाद साक्षात् भगवती दुर्गा राम की परीक्षा लेने के लिए पूजा का अन्तिम पुष्प उठा ले गयीं। हाथ बढ़ाने पर राम को जब फूल न मिला तो उनका हृदय अस्थिर हो उठा। आसन छोड़ने से असिद्धि होगी यह सोच वे अपने को धिक्कारने लगे-
जानकी ! हाय,उद्धार,प्रिये का हो न सका। तभी उनके मन में विचार आया कि बचपन मेरी मां मुझे कमल नयन कहती थीं, ऐसा सोच कर जैसे ही अपने दक्षिण नेत्र को अर्पित करने के लिए ब्रह्मशर उठाये, देवी ने उनका हाथ थाम लिया और युद्ध में विजयी होने का आशीर्वाद देती हुई राम के शरीर में विलीन हो गयीं-
कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने राम की शक्ति पूजा कविता के माध्यम से मनुष्य के कभी न परास्त होने वाले विवेक का बखान किया है। विकट विरोधी परिस्थितयों में भी धैर्य के साथ काम करने की प्रेरणा दी है। राम के व्यक्तित्व की भांति निराला का व्यक्तित्व भी अपराजेय रहा है।
इसीलिए उन्होंने लिखा भी है- वह एक और मन रहा राम का जो न थका। निराला के राम में यद्यपि आत्मग्लानि के स्वर हैं फिर भी संघर्ष के स्वर अधिक प्रबल है। इसलिए हम कह सकते हैं कि निराला के राम गोस्वामी तुलसीदास के राम से भिन्न और भवभूति के राम के निकट हैं। (लेखक गोस्सनर महाविद्यालय, रांची के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज पूरी दुनिया उत्सुकता के साथ 22 जनवरी के ऐतिहासिक क्षण का इंतजार कर रही है। दुनिया में कोई भी देश हो, अगर उसे विकास की नई ऊंचाई पर पहुंचना है, तो उसे अपनी विरासत को संभालना ही होगा। हमारी विरासत, हमें प्रेरणा देती है, हमें सही मार्ग दिखाती है। इसलिए आज का भारत, पुरातन और नूतन दोनों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ रहा है। एक समय था जब अयोध्या में रामलला टेंट में विराजमान थे, लेकिन आज राम मंदिर का भव्य निर्माण हो रहा है।
श्रीराम मंदिर का निर्माण एक अनथक संघर्ष का प्रतीक है। अयोध्या यानी वह भूमि जहां कभी युद्ध न हुआ हो। ऐसी भूमि पर कलयुग में एक लंबी लड़ाई चली और त्रेतायुग में पैदा हुए रघुकुल गौरव भगवान श्रीराम को आखिरकार छत नसीब होने वाली है। राजनीति कैसे साधारण विषयों को भी उलझाकर मुद्दे में तब्दील कर देती है, रामजन्मभूमि का विवाद इसका उदाहरण है। आजादी मिलने के समय सोमनाथ मंदिर के साथ ही यह विषय हल हो जाता तो कितना अच्छा होता।
आक्रमणकारियों द्वारा भारत के मंदिरों के साथ क्या किया गया, यह छुपा हुआ तथ्य नहीं है। किंतु उन हजारों मंदिरों की जगह, अयोध्या की जन्मभूमि को नहीं रखा जा सकता। एक ऐतिहासिक अन्याय की परिणति आखिरकार ऐतिहासिक न्याय ही होता है। यह बहुत संतोष की बात है कि भारत की न्याय प्रक्रिया के तहत आए फैसले से मंदिर का निर्माण संपन्न हुआ है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस अर्थ में गौरवशाली हैं कि उनके कार्यकाल में इस विवाद का सौजन्यतापूर्ण हल निकल सका और मंदिर निर्माण हो सका।
इस आंदोलन से जुड़े अनेक नायक आज दुनिया में नहीं हैं। उनकी स्मृति आती है। मुझे ध्यान है उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता और मंत्री रहे दाऊदयाल खन्ना ने मंदिर के मुद्दे को आठवें दशक में जोरशोर से उठाया था। उसके साथ ही अशोक सिंघल जैसे नायक का आगमन हुआ और उन्होंने अपनी संगठन क्षमता से इस आंदोलन को जनांदोलन में बदल दिया। संत रामचंद्र परमहंस, महंत अवैद्यनाथ जैसे संत इस आंदोलन से जुड़े और समूचे देश में इसे लेकर एक भावभूमि बनी।
आज तक सरयू नदी ने अनेक जमावड़े और कारसेवा के प्रसंग देखे हैं। सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले के बाद जिस तरह का संयम हिंदू समाज ने दिखाया वह भी बहुत महत्व का विषय है। क्या ही अच्छा होता कि इस कार्य को साझी समझ से हल कर लिया जाता। किंतु राजनीतिक आग्रहों ने ऐसा होने नहीं दिया। कई बार जिदें कुछ देकर नहीं जातीं, भरोसा, सद्भाव और भाईचारे पर ग्रहण जरूर लगा देती हैं।
दुनिया के किसी देश में यह संभव नहीं है उसके आराध्य इतने लंबे समय तक मुकदमों का सामना करें। किंतु यह हुआ और सारी दुनिया ने इसे देखा। यह भारत के लोकतंत्र, उसके न्यायिक-सामाजिक मूल्यों की स्थापना का समय भी है। यह सिर्फ मंदिर नहीं है जन्मभूमि है, हमें इसे कभी नहीं भूलना चाहिए। विदेशी आक्रांताओं का मानस क्या रहा होगा, कहने की जरूरत नहीं है।
किंतु हर भारतवासी का राम से रिश्ता है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है। वे हमारे प्रेरणापुरुष हैं, इतिहास पुरुष हैं और उनकी लोकव्याप्ति विस्मयकारी है। ऐसा लोकनायक न सदियों में हुआ है और न होगा। लोकजीवन में, साहित्य में, इतिहास में, भूगोल में, हमारी प्रदर्शनकलाओं में उनकी उपस्थिति बताती है राम किस तरह इस देश का जीवन हैं।
राम शब्द संस्कृत की रम क्रीड़ायाम धातु से बना है अर्थात हरेक मनुष्य के अंदर रमण करने वाला जो चैतन्य-स्वरूप आत्मा का प्रकाश विद्यमान है, वही राम है। राम को शील-सदाचार, मंगल-मैत्री, करुणा, क्षमा, सौंदर्य और शक्ति का पर्याय माना गया है। कोई व्यक्ति सतत साधना के द्वारा अपने संस्कारों का परिशोधन कर राम के इन तमाम सद्गुणों को अंगीकार कर लेता है, तो उसका चित्त इतना निर्मल और पारदर्शी हो जाता है कि उसे अपने अंत:करण में राम के अस्तित्व का अहसास होने लगता है। कदाचित यही वह अवस्था है जब संत कबीर के मुख से निकला होगा,
राम, दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। संस्कृत में दशरथ का अर्थ है- दस रथों का मालिक। अर्थात पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेंद्रियों का स्वामी। कौशल्या का अर्थ है- कुशलता। जब कोई अपनी कर्मेंद्रियों पर संयम रखते हुए अपनी ज्ञानेंद्रियों को मयार्दापूर्वक सन्मार्ग की ओर प्रेरित करता है, तो उसका चित्त स्वाभाविक रूप से राम में रमने लगता है। पूजा-अर्चना की तमाम सामग्रियां उसके लिए गौण हो जाती हैं।
ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना सहज और सरल हो जाता है कि वह जीवन में आने वाली तमाम मुश्किलों का स्थितप्रज्ञ होकर मुस्कुराते हुए सामना कर लेता है। भारतीय जनमानस में राम का महत्व इसलिए नहीं है कि उन्होंने जीवन में इतनी मुश्किलें झेलीं, बल्कि उनका महत्व इसलिए है, क्योंकि उन्होंने उन तमाम कठिनाइयों का सामना बहुत ही सहजता से किया। उन्हें मयार्दा पुरुषोत्तम भी इसलिए कहते हैं, क्योंकि अपने सबसे मुश्किल क्षणों में भी उन्होंने स्वयं को बेहद गरिमापूर्ण रखा।
राम का होना मर्यादाओं का होना है, रिश्तों का होना है, संवेदना का होना है, सामाजिक न्याय का होना है, करुणा का होना है। वे सही मायनों में भारतीयता के उच्चादर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं। उन्हें ईश्वर कहकर हम अपने से दूर करते हैं। जबकि एक मनुष्य के नाते उनकी उपस्थिति हमें अधिक प्रेरित करती है। एक आदर्श पुत्र, भाई, सखा, न्यायप्रिय नायक हर रुप में वे संपूर्ण हैं।
उनके राजत्व में भी लोकतत्व और लोकतंत्र के मूल्य समाहित हैं। वे जीतते हैं किंतु हड़पते नहीं। सुग्रीव और विभीषण का राजतिलक करके वे उन मूल्यों की स्थापना करते हैं जो विश्वशांति के लिए जरुरी हैं। वे आक्रामणकारी और विध्वंशक नहीं है। वे देशों का भूगोल बदलने की आसुरी इच्छा से मुक्त हैं। वे मुक्त करते हैं बांधते नहीं। अयोध्या उनके मन में बसती है। इसलिए वे कह पाते हैं,
यानि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। अपनी माटी के प्रति यह भाव प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी नागरिक का भाव होना चाहिए। वे नियमों पर चलते हैं। अति होने पर ही शक्ति का आश्रय लेते हैं। उनमें अपार धीरज है। वे समुद्र की तीन दिनों तक प्रार्थना करते हैं।
यह उनके धैर्य का उच्चादर्श है। वे वाणी से, कृति से किसी को दुख नहीं देना चाहते हैं। वे चेहरे पर हमेशा मधुर मुस्कान रखते हैं। उनके घीरोदात्त नायक की छवि उन्हें बहुत अलग बनाती है। वे जनता के प्रति समर्पित हैं। इसलिए तुलसीदास जी रामराज की अप्रतिम छवि का वर्णन करते हैं-
राम ने जो आदर्श स्थापित किए उस पर चलना कठिन है। किंतु लोकमन में व्याप्त इस नायक को सबने अपना आदर्श माना। राम सबके हैं। वे कबीर के भी हैं, रहीम के भी हैं, वे गांधी के भी हैं, लोहिया के भी हैं। राम का चरित्र सबको बांधता है। अनेक रामायण और रामचरित पर लिखे गए महाकाव्य इसके उदाहरण हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त स्वयं लिखते हैं-
भगवान श्रीराम भारतीय संस्कृति के ऐसे वटवृक्ष हैं, जिनकी पावन छाया में मानव युग-युग तक जीवन की प्रेरणा और उपदेश लेता रहेगा। जब तक श्रीराम जन-जन के हृदय में जीवित हैं, तब तक भारतीय संस्कृति के मूल तत्व अजर-अमर रहेंगे। श्रीराम भारतीय जन-जीवन में धर्म भावना के प्रतीक हैं, उनमें मानवोचित और देवोचित गुण थे, इसीलिए वे मर्यार्दा पुरुषोत्तम कहलाये।
भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र भारत की सीमाओं को लांघकर विदेशियों के लिए भी शांति, प्रेरणा और नवजीवनदायक बनता जा रहा है। श्रीराम धर्म के साक्षात स्वरूप हैं, धर्म के किसी अंग को देखना है, तो राम का जीवन देखिये, आपको धर्म की असली पहचान हो जायेगी। धर्म की पूर्णता उनके जीवन में आद्यन्त घटित हुई है।
श्रीराम ने लौकिक धरातल पर स्थिर रहकर धर्म एवं मयार्दा का पालन करते हुए मानव को असत्य से सत्य की ओर, अधर्म से धर्म की ओर तथा अन्याय से न्याय की ओर चलने की प्रेरणा दी है। कर्त्तव्य की वेदी पर अपने व्यक्तिगत सुख-प्रलोभनों की आहुति श्रीराम की जीवन कहानी का सार है।
संसार में महापुरुष अपने जीवन, गुण, कर्म, स्वभाव, कर्त्तव्य, बुद्धि, तप-त्याग और तपस्या से जो अमर जीवन-संदेश देते हैं, वही मानवता की स्थायी धरोहर होती है। हमारा सौभाग्य है कि हम ऐसे दैवीय गुणों के धनी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की संताने हैं। श्रीराम का प्रेरक चरित्र भूली-भटकी मानव जाति में नवजीवन चेतना का संचार कर सकता है।
उनके जीवन की घटनाएं आज के भोगी विलासी और मानवता का गला घोंटने वाले नामधारी मनुष्य को बहुत कुछ सोचने, करने और जीने की प्रेरणा दे सकती है। उनके जीवन के प्रत्येक क्रियाकलाप से अमर संदेश मिलता है। श्रीराम के द्वारा दर्शित आदर्शों एवं जीवन मूल्यों का भारतीय समाज में बहुत ऊंचा स्थान है। यदि हम सबक लेना चाहें, तो रामायण की प्रत्येक घटना से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
लक्ष्मण जी का श्रीराम जी के साथ वन-गमन करना, भरत जी का राज्य को ठुकराना, पादुका रखकर शासन-व्यवस्था चलाना, परस्पर भाइयों की प्रीति का श्रेष्ठ उदाहरण है। आज भाई-भाई एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो रहे हैं, परिवार परस्पर की कलह के कारण टूट रहे हैं। सर्वत्र स्वार्थ, अहंकार और अकेले भोगने की भावना उद्दाम हो रही है। ऐसे में रामायण हमें शिक्षा देती है कि नश्वर सुख-भोग और धन-धाम-धरा के लिए परस्पर लड़ना नहीं चाहिए।
चित्रकूट प्रवास-काल में शूर्पणखा द्वारा श्रीराम को अपनी ओर आकर्षित करके विवाह का प्रस्ताव रखने पर राम द्वारा दृढ़ता से मना कर देना प्रेरणा देता है कि यदि जीवन को सुखी और शान्तिमय बनाना है, तो एक पत्नीव्रत का आचरण करना चाहिए। स्वर्णमृग को देखकर सीताजी का उसे पाने की इच्छा करना तथा भगवान राम द्वारा मायावी मृग को पाने के लिए पीछे दौड़ना और सीता जी का हरण हो जाने की घटना आज के जीवन प्रसंगों को बहुत कुछ प्रेरणा दे सकती है।
आज का मनुष्य धन की मृगतृष्णा के पीछे पागलों की तरह दौड़ा जा रहा है, जो प्राप्त है उससे संतुष्ट नहीं हो पा रहा है। विज्ञान की चमकीली, भड़कीली, दिखावटी, बनावटी चीजों के पीछे दिन-रात अधर्म-असत्य, छल-प्रपंच का सहारा लेकर दौड़ा जा रहा है। इससे हानि यह हुई है कि आत्मारूपी सीता छिन गयी है, भौतिकवादी व्यक्ति सिर्फ शरीर के लिए जीने लगा है तथा इसी मृगतृष्णा में वह जीवन का अंत कर लेता है।
रामायण कहती है दुनिया में आंखें खोलकर चलो, सभी चमकने वाली चीजें सोना नहीं होती हैं। चमक-दमक में व्यक्ति हमेशा धोखा खाता है, इसी धोखे में आत्मरूपी सीता का रावण द्वारा हरण होता है तथा बाद में राम-रावण का निर्णायक युद्ध होता है। यदि रामायण से कुछ सीखना है, तो चरित्र निर्माण, विचारों की उच्चता, भावों की शुद्धता, पवित्रता तथा जीवन को धर्म-मर्यादा एवं उच्चादर्श की ओर ले चलना सीखें। सीता जी का राम जी के साथ वन जाना संसार के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ देता है।
वनवास राम जी को मिला था, सीता जी को नहीं, रामायण में वनवास का प्रसंग यह शिक्षा देता हैं कि नारी की परीक्षा संपत्ति में नहीं विपत्ति में होती है। श्रीराम अपने जीवन की सरलता, संघर्ष और लोकजीवन से सहज रिश्तों के नाते कवियों और लेखकों के सहज आकर्षण का केंद्र रहे हैं। उनकी छवि अति मनभावन है। वे सबसे जुड़ते हैं, सबसे सहज हैं।
उनका हर रूप, उनकी हर भूमिका इतनी मोहनी है कि कविता अपने आप फूटती है। किंतु सच तो यह है कि आज के कठिन समय में राम के आदर्शों पर चलता साधारण नहीं है। उनसी सहजता लेकर जीवन जीना कठिन है। वे सही मायनों में इसीलिए मयार्दा पुरुषोत्तम कहे गए। उनका समूचा व्यक्तित्व राजपुत्र होने के बाद भी संघर्षों की अविरलता से बना है। वे कभी सुख और चैन के दिन कहां देख पाते हैं। वे लगातार युद्ध में हैं।
घर में, परिवार में, ऋषियों के यज्ञों की रक्षा करते हुए, आसुरी शक्तियों से जूझते हुए, निजी जीवन में दुखों का सामना करते हुए, बालि और रावण जैसी सत्ताओं से टकराते हुए। वे अविचल हैं। योद्धा हैं। उनकी मुस्कान मलिन नहीं पड़ती। अयोध्या लौटकर वे सबसे पहले मां कैकेयी का आशीर्वाद लेते हैं। यह विराटता सरल नहीं है। पर राम ऐसे ही हैं। सहज-सरल और इस दुनिया के एक अबूझ से मनुष्य।
राम भक्त वत्सल हैं, मित्र वत्सल हैं, प्रजा वत्सल हैं। उनकी एक जिंदगी में अनेक छवियां हैं। जिनसे सीखा जा सकता है। अयोध्या का मंदिर इन सद् विचारों, श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का प्रेरक बने। राम सबके हैं। सब राम के हैं। यह भाव प्रसारित हो तो देश जुड़ेगा। यह देश राम का है। इस देश के सभी नागरिक राम के ही वंशज हैं।
हम सब उनके ही वैचारिक और वंशानुगत उत्तराधिकारी हैं, यह मानने से दायित्वबोध भी जागेगा, राम अपने से लगेगें। जब वे अपने से लगेगें तो उनके मूल्यों और उनकी विरासतों से मुंह मोड़ना कठिन होगा। सही मायनों में रामराज्य आएगा। कवि बाल्मीकि के राम, तुलसी के राम, गांधी के राम, कबीर के राम, लोहिया के राम, हम सबके राम हमारे मनों में होंगे।
वे तब एक प्रतीकात्मक उपस्थिति भर नहीं होंगे, बल्कि तात्विक उपस्थिति भी होंगे। वे सामाजिक समरसता और ममता के प्रेरक भी बनेंगे और कर्ता भी। इसी में हमारी और इस देश की मुक्ति है। आज के भारत का मिजाज अयोध्या में स्पष्ट दिखता है। आज यहां प्रगति का उत्सव है तो कुछ दिन बाद यहां परंपरा का उत्सव भी होगा।
आज यहां विकास की भव्यता दिख रही है, तो कुछ दिनों बाद यहां विरासत की भव्यता और दिव्यता दिखने वाली है। यही तो भारत है। विकास और विरासत की यही साझा ताकत भारत को 21वीं सदी में सबसे आगे ले जाएगी। (लेखक, भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से भेजे गये समन के मद्देनजर झारखंड के राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाया जा रहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की तरह ही इस बार झारखंड में हेमंत सोरेन भी पत्नी कल्पना सोरेन को राजनीतिक विरासत सौंप सकते हैं।
दरअसल, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को प्रवर्तन निदेशालय की ओर से सातवीं बार भेजे गए समन को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं समेत आईएनडीआइए गठबंधन के तमाम राजनीतिक दलों के बीच झारखंड सरकार के भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है।
यही कारण है कि कांग्रेस के राज्य विधायक दल ने भी आनन-फानन में तीन जनवरी को एक बैठक आहूत की, जिसमें राज्य के चारों मंत्रियों समेत 13 विधायक तथा राज्य कांग्रेस के प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने भी भाग लिया। हालांकि, कांग्रेस की ओर से मीर ने बैठक को लेकर मीडिया से इतना ही कहा कि विधायकों के साथ बैठक काफी अच्छी रही।
देखा जाये तो कांग्रेस की यह बैठक वास्तव में अपने विधायकों की नब्ज टटोलने की एक कोशिश भर थी। दरअसल, कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को यह डर सता रहा है कि कहीं संकट की घड़ी में उनके विधायक टूट न जाएं। इसीलिए कांग्रेस के आलाकमान ने राज्य कांग्रेस के प्रभारी मीर को रांची भेजकर विधायकों को एकजुट रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने की बात कही होगी।
इस बात में वजन इसलिए भी है, क्योंकि झारखंड में आईएनडीआईए गठबंधन के भीतर यदि सबसे अधिक खतरा किसी पार्टी के टूटने का है तो वह कांग्रेस ही है, क्योंकि संकट की घड़ी आने पर सबसे पहले कांग्रेसी विधायक ही इधर-से-उधर होते पाए गए हैं। इससे पहले भी एक बार झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार के गिरने की खबर फैली थी, जब राजनीतिक गलियारों में यह बात खूब उछली थी कि कई कांग्रेसी विधायक भाजपा के कुछ केंद्रीय एवं स्थानीय नेताओं के संपर्क में लगातार बने हुए हैं।
उस समय कांग्रेसी विधायकों की आलाकमान से नाराजगी उनके टूटने की वजह बताई जा रही थी। तब पार्टी को तोड़कर भाजपा में शामिल होने के कथित आरोपी विधायकों का बंगाल कनेक्शन खुलकर सामने आया था। शायद इसीलिए कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व झारखंड सरकार पर आने वाले संकट को भांपकर पहले ही अपनी तैयारी पूरी कर लेना चाहता था।
उधर, झामुमो के भीतर ईडी की ओर से मुख्यमंत्री सोरेन को भेजे गये समन को लेकर अलग ही भय का माहौल बना हुआ है, क्योंकि केंद्रीय एजेंसी की ओर से उन्हें सातवीं बार समन भेजा गया था, जिसे आखिरी समन बताया जा रहा है। हालांकि उसे षड्यंत्र का हिस्सा बताते हुए मुख्यमंत्री इस बार भी ईडी के समक्ष उपस्थित नहीं हुए और उन्होंने समन का गोल-मोल जवाब भेज दिया।
देखा जाए तो ईडी को जवाब भेजकर उन्होंने खानापूर्ति भले ही कर ली हो, लेकिन वे भी जानते हैं कि उनके ऊपर ईडी की तलवार हर वक्त लटक रही है, जिससे अब उनका बचना बेहद कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव प्रतीत होने लगा है। इसका प्रमुख कारण इस मामले में ईडी का वह अल्टीमेटम है, जो एजेंसी ने मुख्यमंत्री को समन के साथ भेजा था।
उसमें एजेंसी ने मुख्यमंत्री से साफ-साफ कहा था कि या तो पूछताछ के लिए वे स्वयं उपस्थित हों अथवा केंद्रीय एजेंसी को स्थान और तिथि बताएं, ताकि उनसे पूछताछ की जा सके। बहरहाल, अब इस मामले में यह संभावना जताई जा रही है कि केंद्रीय एजेंसी वैधानिक प्रक्रियाएं अपनाकर पूछताछ करने के लिए मुख्यमंत्री को हिरासत में ले सकती है।
संभव है कि विपक्ष के नेता हेमंत सोरेन के इस कदम को मूर्खतापूर्ण मानने की गलती कर दें, लेकिन सच तो यह है कि गिरफ्तारी अथवा ईडी द्वारा हिरासत में लिए जाने की स्थिति में सोरेन जनता के बीच स्वयं को पीड़ित (विक्टिम) दिखाकर आगे की राजनीति साधने की तैयारी में हैं।
यही नहीं, हर स्थिति में वे राज्य का सिंहासन अपने ही किसी करीबी (शायद पत्नी) के पास रखना चाहते हैं। तभी तो तीन जनवरी को आनन-फानन में आईएनडीआईए गठबंधन के तमाम सहयोगी दलों के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री आवास में बैठक कर उन्हें रांची से दूर जाने से मना करते हुए यह कहा था कि फिलहाल वे उतनी ही दूरी पर रहें कि जरूरत पड़ने पर तीन घंटे के भीतर मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच सकें।
भाजपा विधायक दल के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबुलाल मरांडी ने भी हेमंत सोरेन पर हमला करते हुए विधायकों को बरगलाने का आरोप लगाया है। बहरहाल, पल-पल बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच हेमंत सोरेन की बेहद सधी चालों पर यदि गौर किया जाये तो मालूम होता है कि मुख्यमंत्री फिलहाल अपने पत्ते खोलने वाले नहीं हैं, बल्कि वे वेट एंड वॉच की रणनीति पर चलते हुए ईडी के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। तात्पर्य यह कि झारखंड में राजनीतिक ऊहापोह की स्थिति अभी बनी रहेगी।
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