एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस कभी भी इतने लंबे समय के लिए इतनी कमजोर हताश मायूस होकर विपक्ष में नहीं रही है। पांच सात साल के लिए कभी विपक्ष में रही भी है तो ठसक के साथ रही है। क्योंकि तब सत्ता में गठबंधन सरकारें रहीं हैं, जो खुद हिलती-डुलती आपसी टकराव में रहती थीं और कांग्रेस मजे लेती थी।
1989 में वीपी सिंह के हाथों हार के बाद राजीव गांधी ने कहा भी था कि ये एकाध हार हमारे लिए थोड़ा आराम का वक्त होता है, फिर तो सत्ता हमीं को मिलनी है। लेकिन 2014 के बाद कांग्रेस को वाकई में हारे दीन हीन विपक्षी होने का अहसास हुआ है।
उन मसलों पर निर्णायक काम होना जिसे कांग्रेस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था- जैसे राम मंदिर, विदेशों में भी आतंकियों शत्रुओं को ठिकाने लगाना, पाकिस्तान पर स्ट्रैटेजिक हमले, पाकिस्तान को अलग थलग कमजोर बनाने में सफलता, तीन तलाक, 370, सीएए, एनआरसी जैसे बर्र के छत्ते में हाथ डालना, देश में आतंकवादी घटनाओं पर अंकुश, अब केंद्र का यूसीसी पर भी आगे बढ़ना। यूपी जैसे अराजक माफिया प्रभावी राज्य में लगातार दो बार भगवा सरकार और मुस्लिम माफियाओं का सफाया। ये सब बातें कांग्रेसी और सेकुलर सरकारों की फितरत के खिलाफ जाती हैं।
यह फेहरिश्त लंबी है। अब मैं कोई भविष्यद्रष्टा नहीं हूं पर अतीतद्रष्टा तो हम सभी हैं और उसके आधार पर ही यह सब लिखा गया है। यह सब कम तीव्रता में पहले घटित हो चुका है। जैसे...
2004 में बाजपेयी सरकार को धूल चटा कर कांग्रेस ने आते ही यही सब किया, 2009 में यूपीए टू ने तो भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड ही तोड़ दिये और हमारा प्रधानमंत्री बोला कि देश? के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों और मुसलमानों का है। उसके पहले मुंबई दिल्ली कश्मीर हर कुछ दिनों पर आतंकी हमलों से दहलता था।
याद कीजिये जैसे ही महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सीएम बने हर छोटी से छोटी आवाज को भी सड़क छाप स्टाइल में उद्धव एंड कंपनी ने निबटाया। संजय राऊत, महाराष्ट्र पुलिस और शिव सैनिकों ने उद्धव के सीएम रहते भरपूर तांडव किया। यूपीए के आने पर यह महाराष्ट्र स्टाइल पूरे देश में होगा।
और एक सबसे महत्वपूर्ण काम होगा कि अंबानी अडाणी को काले पानी की सजा देकर अंडमान निकोबार जेल में डाल दिया जायेगा, माल्या को रस्सी से बांध कर इंग्लैंड से मुंबई लाया जायेगा। इस देश से बेरोजगारी और महंगाई एक झटके में गायब हो जायेगी। दो रुपए में दिल्ली से अपने गांव बिहार झारखंड ट्रेन से लौट सकेंगे, उन युवाओं को फिर से ब्यूरोक्रेसी वाली नौकरी सौंप दी जायेगी जो 2014 में मोदी के आने से नौकरी गवां बैठे थे।
टके सेर खाजा टके सेर भाजी मिलने लगेगा। हर व्यक्ति को नौकरी या फिर एक लाख रुपये हर महीने मिलेंगे। आखिर कांग्रेसी पीएम मनमोहन सिंह ने कहा ही था कि पैसे पेड़ पर लगते हैं जब मन करे दो चार अरब तोड़ लो। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार और पत्रकारिता विभाग से जुड़े हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। धरती में महर्षि वेदव्यास, अश्वत्थामा, राजा बलि, वीर हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, ऋषि मार्कंडेय और भगवान परशुराम को चिरंजीवी महायोद्धा माना जाता है। ये हमारी सनातन संस्कृति के ऐसे किरदार हैं, जो हमेशा जीवित रहेंगे। भार्गव वंश में पिता जमदग्नि और मां रेणुका की संतान के रूप में त्रेतायुग में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को जन्मे महर्षि परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है।
कुछ मान्यताओं के मुताबिक वह स्वयं रूद्र रूप थे। वायु पुराण के मुताबिक भगवान परशुराम का जन्म उनकी मां रेणुका द्वारा शिव और विष्णु दोनों को अर्पित प्रसाद खाने के कारण हुआ था। इस कारण उनमें क्षत्रिय और ब्राह्मण दोनों की विशेषताएं थीं। इसलिए उन्हें रुद्र रूप भी कहा जाता है। भगवान परशुराम शिव के परम भक्त थे। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें कई दिव्यास्त्र दिए थे, जिनमें एक अजेय हथियार फरसा भी था, जिसे परशु कहते हैं।
माना जाता है कि भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ, इसलिए उनकी शक्ति भी अक्षय यानी अपार थी। भगवान परशुराम भारतीय संस्कृति के एक ऐसे किरदार हैं, जो कई विरोधाभाषी गुणों से सम्पन्न माने जाते हैं। मसलन एक तरफ जहां कुछ लोग उन्हें अत्यंत क्रोधी कहते हैं, वहीं उनके साथ यह मान्यता भी जुड़ी हुई है कि उन्हें कतई क्रोध नहीं आता था।
वह अपने पिता के इतने आज्ञाकारी थे कि उनके कहने पर अपनी मां और भाइयों का वध कर दिया था और फिर उन्हीं पिता से वरदान लेकर उन सबको जीवित कर दिया था। बहरहाल, वह हिंदू धर्म के कल्प कल्पांतर नायक हैं, उनकी पूजा करने से पुरुषों में पौरुष का संचार होता है। माना जाता है कि परशुराम अभी भी जीवित हैं, वे हर दिन अपने स्थायी निवास महेंद्रगिरि पर्वत से सूर्योदय के समय हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं और सूर्यास्त के समय महेंद्रगिरि पर्वत में वापस आ जाते हैं।
यह भी मान्यता है कि उन्हें यह अमरता भगवान शिव ने दी है। माना जाता है कि वह धरती पर हमेशा जीवित रहेंगे, जब तक कि समय का अंत नहीं हो जाता। भगवान परशुराम के बारे में कई अद्भुत कहानियां भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि उनका अपने शिष्य भीष्म के साथ 24 दिनों तक महायुद्ध हुआ और दोनों ही एक-दूसरे को हरा नहीं सके।
अंत में भीष्म ने परशुराम को हराने के लिए शक्तिशाली पार्श्वास्त्र का उपयोग करने की कोशिश की, लेकिन दिव्य ऋषि नारद और देवताओं ने हस्तक्षेप किया और भीष्म को शक्तिशाली हथियार इस्तेमाल करने से रोका ताकि धरती नष्ट न हो। इसी के साथ संघर्ष समाप्त की घोषणा कर दी गई और इस तरह दोनों में से कोई विजयी या पराजित नहीं हुआ। धरती में परशुराम अपने क्रोध और ब्रह्मचर्य के कारण जाने जाते हैं। माना जाता है कि वह धरती पर हमेशा रहेंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस पार्टी आज जिस प्रकार से दिशाहीन होकर आगे बढ़ रही है, उसमें मैं खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रहा। मैं न तो सनातन विरोधी नारे लगा सकता हूं और न ही सुबह-शाम देश के वेल्थ क्रिएटर्स को गाली दे सकता। इसलिए मैं कांग्रेस पार्टी के सभी पदों व प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहा हूं।
गौरव वल्लभ ने कांग्रेस के प्रवक्ता पद से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। गौरव उन कांग्रेसियों में थे जो आर्थिक विषयों के मर्मज्ञ थे और कई मोर्चा पर भाजपा सहित एनडीए की कसकर घेराबंदी करते थे। उन्होंने जिन दो बिंदुओं पर कांग्रेस को आईना दिखाया सही में उन दो बिंदुओं को न समझ पाने के कारण ही कांग्रेस की दुर्गति हुई है। इन नीतियों के संप्रेषण में कांग्रेस से एक बड़ी भूल हुई है और वह है अडानी को लगातार टारगेट करना।
राम मंदिर शुभारंभ के कार्यक्रम की उपेक्षा करने की उसकी नीति से अधिक खतरनाक है देश के उद्योगपतियों को अकारण गाली देना, उनके उपर जो देश-विदेश में षडयंत्र होता है उसको नैतिक समर्थन देना। निश्चित तौर पर देश की नयी आर्थिक नीति जो 1991 में देश में लागू किया गया उसके मूल में निजीकरण ही था। भारतीय जनता पार्टी में इतनी ईमानदारी थी कि वह इस नीति का पूरजोर विरोध नहीं करती थी। आज देश का विकास निजीकरण के नींव पर खड़ा है।
अगर अमेरिका, जर्मनी, चीन औरजापान की बात करें तो उन देशों में आर्थिक नीतियों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच एक सहमति बनी रहती है जिससे विकास का पहिया तेज घूमता है। लेकिन भारत में कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी लगातार अडानी समूह की आलोचना करते रहते हैं। चूंकि गौरव खुद आर्थिक मामलों के जानकार हैं इस कारण वे कांग्रेस के इस प्रकार की नीतियोंसे क्षुब्ध थे। आज देश की हालत बेहतर इसलिये है कि निजी क्षेत्र पूरी ताकत से विकास कर रहा है।
देश के 6.40 करोड़ सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों से देश के लोगों को जहां जॉब मिला है वहीं आर्थिक गतिविधियों को भी एक नया मुकाम प्राप्त हुआ है। इन्हीं लघु और मध्यम उद्योगों के बीच से अडानी रिलायंस जैसे उद्यौगिक समूह का लगातार विकास होना देश के विकास का शुभ संकेत है। आज टाटा समूह का कुल एसेट पाकिस्तान की बजट से अधिक हो गया है।
वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में निजी कंपनियों के सहारे ही विश्व के विकसित देशों की आर्थिक गति और विकास टिकी हुई है। राहुल गांधी को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस राफेल युद्धक विभान के फ्रांस से खरीदी के बाद हमारी सैन्य शक्तिसे चीन और पाकिस्तान संतुलित हुए है वह एक निजी कंपनी का उत्पाद है। आज देश में 21 हजार करोड़ के रक्षा उत्पाद का निर्यात हुआ है जिसमें अडानी समूह का भी एक बड़ा योगदान है।
निजीकरण को लेकर देश में एक विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किसी भी हालत में देश हित में नहीं है। कांग्रेस को इसका परिणाम भुगतना ही होगा या रणनीति बदलनी होगी। देश के कुल कार्यबल में 98 प्रतिशत कामगार निजी क्षेत्र में कार्य करते हैं। इस कोण से भी देखा जाए तो उन्हें लघु, मध्यम और बड़े उद्योगों में ही काम मिला हुआ है।
यह दुख और आश्चर्य का विषय है कि कांग्रेस की नीतियों को वर्तमान सरकार तेजी से बढ़ा कर देश को दोहरे और अधूरे माहौल से निकालना चाहती है जिससे हम दुनिया में विकसित राष्ट, की श्रेणी में खड़ा हो सके। आर्थिक विषयों, रक्षा मामलों, सेना और अतंरिक्ष के विषयों पर कांग्रेस को बहुत चिंतन की आवश्यकता है अन्यथा कांग्रेस का गौरव सिर्फ चर्चा का विषय रह जायेगा।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोक सभा के चुनाव प्रचार के आंरभ में ही पीएम मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि वे पश्चिम बंगाल में जब्त तीन हजार करोड़ रुपये को वहां के निर्धन परिवारों के बीच के वितरित करने की योजना पर कानूनी सलाह ले रहे हैं।
सरकार ने संसद में बताया था कि 2017 से 2023 के बीच में आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली एजेंसियों द्वारा लगभग 1.11 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की गई है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया था कि ईडी, डीआरआई, आयकर विभाग और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा 10,683 करोड़ रुपये की 204 अचल संपत्तियां कुर्क की गयी हैं। संसद में दिये गए जवाब में पंकज चौधरी ने यह भी कहा था 2017-18 और 2021-22 के बीच दोनों बोर्डों द्वारा बेची गई संपत्ति 71 करोड़ रुपये की थी।
वित्त राज्य मंत्री ने बताया था कि कई मामलों में सीबीडीटी और सीबीआईसी द्वारा संपत्तियों को कुर्क किया जाता है। कुर्क को अदालत में चुनौती दी जाती है और जब तक अदालत मामले का फैसला नहीं करती इन संपत्तियों को नहीं बेचा जा सकता है। इसके साथ ही पिछले पांच वर्षों के दौरान (1 फरवरी, 2018 से 31 जनवरी, 2023 तक) प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 15,619.56 करोड़ की जब्ती की गयी थी।
मंत्री द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक, 15,113.91 करोड़ रुपये की संपत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा कर दी गई है। लोकसभा की पश्चिम बंगाल की भाजपा प्रत्याशी अमृता राय से फोन पर बातचीत के क्रम में पीएम मोदी ने यह बात कही है। याद रहे कि विगत चुनाव में विदेशी काला धन भारत लाकर हर भारतीय परिवार को 15 लाख देने की बात को भी लोगों ने सुना था जिसे बाद में चुनावी जुमला बता दिया गया। तीसरी बारजीत को आश्वस्त मोदी क्या इस मुद्दे पर सही में गंभीर हैं?
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया था कि ईडी, डीआरआई, आयकर विभाग और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा 10,683 करोड़ रुपये की 204 अचल संपत्तियां कुर्क की गयी हैं। संसद में दिये गए जवाब में पंकज चौधरी ने यह भी कहा था 2017-18 और 2021-22 के बीच दोनों बोर्डों द्वारा बेची गई संपत्ति 71 करोड़ रुपये की थी। वित्त राज्य मंत्री ने बताया था कि कई मामलों में सीबीडीटी और सीबीआईसी द्वारा संपत्तियों को कुर्क किया जाता है।
कुर्क को अदालत में चुनौती दी जाती है और जब तक अदालत मामले का फैसला नहीं करती इन संपत्तियों को नहीं बेचा जा सकता है।इसके साथ ही पिछले पांच वर्षों के दौरान (1 फरवरी, 2018 से 31 जनवरी, 2023 तक) प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 15,619.56 करोड़ की जब्ती की गयी थी। मंत्री द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक, 15,113.91 करोड़ रुपये की संपत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा कर दी गयी है।
लोकसभा की पश्चिम बंगाल की भाजपा प्रत्याशी अमृता राय से फोन पर बातचीत के क्रम में पीएम मोदी ने यह बात कही है। याद रहे कि विगत चुनाव में विदेशी काला धन भारत लाकर हर भारतीय परिवार को 15 लाख देने की बात को भी लोगों ने सुना था जिसे बाद में चुनावी जुमला बता दिया गया। तीसरी बारजीत को आश्वस्त मोदी क्या इस मुद्दे पर सही में गंभीर हैं?
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आम चुनाव की घोषणा के साथ आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो गयी है। सामान्य संवाद की भाषा बदल गई है। शब्द आक्रामक हो गए हैं। संवाद की शालीनता समाप्त हो रही है। कायदे से दलतंत्र को लोकतंत्र की मजबूती के लिए काम करना चाहिए। संवाद की भाषा परस्पर प्रेमपूर्ण होनी चाहिए। दल परस्पर शत्रु नहीं हैं। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को आमजनों तक ले जाने और मजबूत करने के उपकरण हैं। लेकिन शब्द अपशब्द हो रहे हैं। वैचारिक आधार पर दलों के मध्य बहस नहीं है।
प्रधानमंत्री तक को अपशब्द कहे गये हैं। भारत के आम चुनाव दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्री उत्सव हैं। लेकिन अपशब्दों के प्रयोग वातावरण को उतप्त कर रहे हैं। आचार संहिता में निर्देश दिये गये हैं कि सभी दल और उम्मीदवार जाति, सम्प्रदाय, पंथिक समूह या भाषाई समूहों के मध्य अलगाववाद बढ़ाने से दूर रहेंगे। परस्पर विद्वेष और तनाव बढ़ाने वाले शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे। संहिता में राजनैतिक दलों की नीतिगत आलोचना की छूट दी गयी है। आलोचना में भी संयम बरतने के निर्देश हैं।
सबसे बड़ी बात है कि नेताओं और कार्यकर्ताओं की निजी जिंदगी की आलोचना नहीं करेंगे। आदर्श चुनाव आचार संहिता में इसी तरह के तमाम संयम की अपेक्षा की गयी है। इस सब के बावजूद व्यक्तिगत आरोपों के माध्यम से वातावरण को बिगाड़ने का काम हो रहा है। शब्द की शक्ति बहुत बड़ी है। शतपथ ब्राह्मण के ऋषि ने वाणी को विराट कहा है। बाईबल में घोषणा है कि सबसे पहले शब्द था-इट वाज लोगोस फर्स्ट। महर्षि व्यास ने शब्द को ब्रह्म कहा है। शब्दों के सदुपयोग से सृजन की गतिविधि चलती रही है।
पतंजलि ने महाभाष्य में ध्यान दिलाया है कि एक ही शब्द का स्थान के अनुसार प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थ देता है। कबीरदास ने भी कहा है कि, शब्द की मार बड़ी है। शब्द साधना स्तुतियों, काव्य और गीतों में प्रकट होती है। शब्द संयम अपरिहार्य है। ऐतरेय उपनिषद के शांति पाठ में प्रार्थना है, हे परमात्मा मेरी वाणी मन में स्थित हों और मन वाणी में स्थित हो जाये। मेरे मन और वाणी साथ साथ काम करे। मेरे संकल्प और वचन विशुद्ध होकर एक रहे। मेरा सुना हुआ और अनुभव में आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे। मेरा ज्ञान मुझे सदा स्मरण रहे।
मन का अनुशासन जरूरी है। अनुशासित मन से सुन्दर शब्द और अर्थ निकलते हैं। मन और वाणी एक साम्य में हमारा मार्गदर्शन करें। ऋषि संकल्प करते हैं कि मैं अपनी वाणी से सदा ऐसे ही शब्दों का उच्चारण करूंगा, जो दोषरहित हो। मैं सत्य बोलूंगा-सत्यं बदिष्यामि। मेरी रक्षा करो। वक्ता की रक्षा करो। भारतीय परंपरा में शब्द अनुशासन पर अतिरिक्त जोर दिया गया है। सृष्टि के जन्म और विकास के अनेक सिद्धांत हैं। चार्ल्स डारविन का सिद्धांत विकासवादी कहा जाता है। स्टीफेन हाकिंग जैसे ब्रह्माण्ड विज्ञानी सृष्टि के उद्भव पर काम करते रहे हैं। आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञानियों का कथन है कि एक समय सृष्टि का सारा पदार्थ और ऊर्जा एक छोटे से बिंदु पर थी। इसे ब्रह्म अण्ड भी कहा जाता है।
अत्यधिक दबाव के कारण ब्रह्म अण्ड फूटा। उसके कण गतिशील हुए और इस तरह सृष्टि का विकास आगे चल पड़ा। वैज्ञानिक कार्ल सागन ने इसे कॉस्मिक एग ब्रह्म अण्ड कहा है। ऋग्वेद में इसे हिरण्यगर्भ कहा गया है। हिरण्य का अर्थ स्वर्ण या कोई अति चमकीली धातु है। ऋग्वेद में कहते हैं कि सबसे पहले हिरण्यगर्भ ही थे। ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद के आरण्यक का भाग है। उपनिषद (खंड 1-4) में कहा गया है, हिरण्यगर्भ पुरुष ने स्वयं को प्रकट करने के उद्देश्य से तप किया। तप के फलस्वरूप हिरण्यगर्भ फूट गया। इससे फूटकर मुख छिद्र बना। इसी मुखछिद्र से वाणी उत्पन्न हुई। वाणी आराध्य है।
वाणी से ही विचार प्रकट होते हैं। वाद, विवाद और संवाद वाणी से ही संभव है। वाणी के ही सम्यक प्रयोग से संस्कृति का विकास हुआ। ऋग्वेद (10-125) में वाणी संपूर्ण प्रकृति को धारण करती है। वाणी में समूचा संसार व्याप्त है। ऋग्वेद में वाणी का सुंदर विवेचन है। वाणी के चार रूप बताये गये हैं। पहले रूप को परा कहा है। यह मन में स्थित रहती है। दूसरी का नाम पश्यन्ती बताया गया है। इस मनोदशा में वाणी प्रकट करने का विचार उठता है। तीसरी मध्यमा है। इस तल पर विचार शब्द अपना रूप ग्रहण करता है। शब्द योजना बनती है। शब्दों का विवेकीकरण होता है।
चौथी का नाम बैखरी बताया गया है। यह प्रकट वार्ता है। लेकिन साधारण लोग पहली तीन स्थितियां कम जानते हैं। वे केवल चौथी का ही प्रयोग करते हैं। वाणी के सभी रूप पालनीय हैं। प्राचीन सुमेरी सभ्यता का विवेचक क्रेमर ने लिखा है कि सुमेरी दार्शनिकों ने दैवीय शब्द की सृजन शक्ति का सिद्धांत बताया था। सृजनकर्ता को योजनाओं के बारे में बोलना था। इच्छानुसार शब्द बोलने से ही कामना पूरी हो जाती थी। दर्शन में आकाश का गुण शब्द बताया गया है। शब्द शक्ति की खोज और पहचान का आदिस्रोत भारत है, ऋग्वेद है। चीन के एक दार्शनिक लाओत्सु (ईसापूर्व 400 वर्ष लगभग) ने भी सृष्टि के विकास पर लिखा है। ताओ ते चिग उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक है। ताओ ते चिग भी वाणी और शब्द का चमत्कार है।
वाणी आराध्य है। छान्दोग्य उपनिषद में व्यथित नारद को सनत् कुमार ने वाणी की शक्ति का दर्शन बताया था। भारत में शब्द और वाणी का जैसा सदुपयोग हुआ है, वैसा अन्य सभ्यताओं में नहीं मिलता। वाणी के सम्यक ज्ञान और सम्यक सदुपयोग से मंत्र शक्ति का पादुर्भाव हुआ। मंत्र शब्दों के सम्यक प्रयोग से बनते हैं। मंत्रों का उच्चारण अनुशासित वाणी द्वारा ही संभव होता है। सुने गये शब्द अपनी अर्थवत्ता के कारण चित्त में रासायनिक परिवर्तन लाते हैं। मंत्र के प्रभाव होते हैं या नहीं? यह विषय वैज्ञानिक और दार्शनिक विवेचन का है। लेकिन वाणी की शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। मधुर वाणी से गीत काव्य प्रकट होते हैं।
इसी के सम्यक उपयोग से स्तुतियां बनती हैं।
वाणी की शक्ति अपरिमित है। संस्कृति मनुष्य को उदात्त बनाती है। संस्कृत देववाणी है। इसमें संस्कृति के विकास की विराट क्षमता है। भारतीय संस्कृति में वाणी और शब्द के आश्चर्यजनक सदुपयोग मिलते हैं लेकिन राजनैतिक क्षेत्र में सामान्य वक्तव्य भी हिंसक हो जाते हैं। भारतीय सुभाषितों में कहा गया है कि सत्य बोलो-सत्यम ब्रूयात। प्रिय बोलो-प्रियं ब्रूयात। लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो। यहां सत्य को भी अप्रिय होने के कारण उचित नहीं कहा गया। 2024 के महासमर में सुन्दर वाणी का प्रयोग जरूरी है। लेकिन प्राचीन भारत के युद्धों में भी अश्लील और असभ्य शब्द प्रयोग नहीं मिलते।
महाभारत का बड़ा हिस्सा युद्ध का है। सेनाएं आमने-सामने हैं। तब दोनों पक्षों के योद्धा परस्पर शालीन वार्तालाप करते थे। भारतीय लोकतंत्र में वैदिक काल से ही सभा समितियां हैं। स्तोता देवताओं से प्रार्थना करते हैं, मैं सभा में मधु बोलूं। मैं सभा में यशस्वी होऊं। उग्र विषय भी मधुर वाणी में बोलूं। आश्चर्य है कि जिस भारत में मधुर बोलने की प्रतिस्पर्धा थी, उसी परम्परा के उत्तराधिकारी होकर भी हम शब्द संयम तोड़ रहे हैं। वातावरण नयी पीढ़ी के लिए अप्रिय हो गया है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा 2024 का चुनाव वस्तुत: एक धर्मयुद्ध है। इसको बहुत संजीदगी से सभी को लड़ना ही होगा। राजनीतिक जय-पराजय अपनी जगह है किंतु देश को जीतना चाहिए। राष्ट्र विजयी हो, ऐसा संकल्प होना चाहिए। इसके लिए प्रतिज्ञा की नहीं केवल संकल्प की आवश्यकता है।
प्रतिज्ञा में शक्ति नहीं होती। वह भीष्म बनाती है किंतु संकल्प शक्ति से भरी होती है। वह शिव बनाती है। शिव कल्याणकारी हैं। शिव से ही सत्य और सुंदर भी स्थापित हो पायेंगे। संकल्प और प्रतिज्ञा के बारे में श्रीमदभगवदगीता में भगवान कृष्ण ने बहुत सलीके से समझा दिया है। याद कीजिए कि जब जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा अर्जुन कर लेते हैं कि सूर्यास्त तक नहीं मारा तो अग्नि समाधि ले लूंगा।
आचार्य द्रोण कमलव्यूह के अंदर जयद्रथ को छुपा देते हैं जिसका आकर 32 कोस का था। जाहिर है वह उस तक कैसे पहुंचते! जयद्रथ की सुरक्षा में बड़े बड़े वीर तैनात थे। भगवान कृष्ण बोले, अर्जुन तुम रास्ता साफ करो मैं रथ ले चलता हूं। संध्या हो आई अब भी 12 कोस रह गया। कृष्ण रथ से उतर गये। अर्जुन ने पूछा, केशव यह क्या? कृष्ण ने कहा अश्व थक गये हैं।
आगे बोलते हुये भगवान कृष्ण जो बोले वह ध्यान देने योग्य है। अर्जुन कदाचित तुमने मेरे उपदेश पर ध्यान नहीं दिया था जो युद्ध के शुरू में मैंने दिया था! तुम प्रतिज्ञा करने वाले होते कौन हो? तुम तो निमित्त हो, यदि तुम प्रतिज्ञा न किये होते तो अब तक जयद्रथ को मार देते। तुम्हारा ध्यान एक तरफ सूर्य पर है दूसरी तरफ जयद्रथ पर। इसलिये तुम्हारे निशाने चूक रहें हैं। ऐसा लक्ष्य तय कर दिये कि असफल होने पर तुम्हें ही विनष्ट कर देगा... यह डर ही तुम्हें हरा देगा।
भगवान के वचन बड़े सारगर्भित हैं। मुझे नहीं लगता आज तक किसी ने इतनी सुंदर यथार्थ बात की हो । कई संदर्भों में बात हो सकती है, लेकिन वर्तमान में देखिये सब प्रतिज्ञाबद्ध हो रहे हैं। यह क्या बात हुई कि अनुच्छेद 370 हटा दो तभी समर्थन करेंगे। पाकिस्तान पर हमला कर दो... तभी समर्थन करेंगे। राम मंदिर बना दो... तभी समर्थन करेंगे।
श्रीराम मंदिर बन गया। 370 हट चुका। तीन तलाक भी हट गया। सीएए भी लागू हो गया। देश के गृहमंत्री ने ताल ठोक कर डंके की चोट पर संकल्प दोहरा दिया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी हमारा है। ध्यान दीजिए, भाजपा प्रतिज्ञापत्र नहीं जारी करती, वह हर चुनाव में संकल्प पत्र जारी करती है।
नेतृत्व सक्षम है किसी प्रतिज्ञा की आवश्यकता क्या है? सक्षम नेतृत्व केवल संकल्प लेता है और उसे हर हाल में पूरा भी करता है। आगे भी निश्चित ही दंडात्मक कार्य होगा और हो रहा है। यह ठीक है कि इस समय भावना प्रबल है परंतु इसी समय सुनियोजित तरीके से काम करने की आवश्यकता है। जो विरोधी हैं वह भी यही ढाल बना रहे हैं। फिलहाल उनसे न 370 से मतलब है न राम मंदिर से। गीता में भगवान ने कहा तो है :-
अपने खुद के धर्म से तुम्हें हिलना नहीं चाहिये क्योंकि न्याय के लिये किये गये युद्ध से बढ़कर एक क्षत्रिय के लिये कुछ नहीं है।
सुख दुख को, लाभ हानि को, जय और पराजय को एक सा देखते हुए ही युद्ध करो। ऐसा करते हुए तुम्हें पाप नहीं मिलेगा।
लेकिन यदि तुम यह न्याय युद्ध नहीं करोगे, तो अपने धर्म और यश की हानि करोगे और पाप प्राप्त करोगे।
इसलिए बाकी सब चिंतन छोड़कर, निस्संकोच योग्य एवं सक्षम नेतृत्व को ही चुनें, यही इस धर्मयुद्ध में आप सभी का आसन्न धर्म है, तथा इसी में राष्ट्रहित एवं धर्म हित सन्निहित है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी सोच अब आहिस्ता-आहिस्ता बदलने लगी है। हम प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति थोड़ा मित्रवत भाव रखने लगे हैं। घर की टेरेस पर पक्षियों के लिए दाना-पानी डालने लगे हैं। गौरैया से हम फ्रेंडली हो चले हैं। किचन गार्डन और घर की बालकनी में कृतिम घोंसला लगाने लगे हैं। गौरैया धीरे-धीरे हमारे आसपास आने लगी है। उसकी चीं-चीं की आवाज हमारे घर आंगन में सुनाई पड़ने लगी है।
गौरैया संरक्षण को लेकर ग्लोबल स्तर पर बदलाव आया है। यह सुखद है। फिर भी अभी यह नाकाफी है। हमें प्रकृति से संतुलन बनाना चाहिए। हम प्रकृति और पशु-पक्षियों के साथ मिलकर एक सुंदर प्राकृतिक वातावरण तैयार कर सकते हैं। जिन पशु-पक्षियों को हम अनुपयोगी समझते हैं, वह हमारे लिए प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करने में अच्छी खासी भूमिका निभाते हैं, लेकिन हमें इसका ज्ञान नहीं होता।
गौरैया हमारी प्राकृतिक मित्र है और पर्यावरण में सहायक है। गौरैया प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती और चावल या अनाज के दाने को चुगती है। कभी घर की दीवार पर लगे आईने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती है। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते थे, लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई।
हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरुकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खासी भूमिका भी है। दुनिया भर में 20 मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गौरैया संरक्षण के लिए लोगों से पहल कर चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा सदस्य बृजलाल के प्रयासों को को सोशल मीडिया में खूब सराहा था और कहा था कि गौरैया संरक्षण को लेकर आपका प्रयास बेहतरीन और काबिल-ए-तारीफ है। राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने अपने घर में गौरैया संरक्षण को लेकर काफी अच्छे उपाय किए हैं।
उन्होंने गौरैया के लिए दाना-पानी और घोंसले की व्यवस्था की है। जंगल में आजकल पंच सितारा संस्कृति विस्तार ले रही है। प्रकृति के सुंदर स्थान को भी इंसान कमाने का जरिया बना लिया है। जिसकी वजह पशु- पक्षियों के लिए खतरा बन गया है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर के प्रयासों से 20 मार्च को चुलबुली गौरैया के लिए रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया।
गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास अधिक रहना पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पाई जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती। इसका जीवनकाल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है।
भारत की आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुले और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है।
गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिकतम दो मील की दूरी तय करती है। मानव जहां-जहां गया, गौरैया उसका हमसफर बनकर उसके साथ गयी।
गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते थे, लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता।
देश की खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। केमिकल युक्त रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े-मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिनमें गिद्ध, कौआ, महोख, कठफोड़वा, और गौरैया शामिल हैं। इनके भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर नासिक से हैं और वह बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े रहे हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक मुल्कों तक पहुंच गयी है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाये जायें और उसमें खाने की भी सुविधा भी उपलब्ध हो।
घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों, जिससे गौरैयों के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें। हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के सरोकार से लोगों को परिचित कराना होगा। आने वाली पीढ़ी तकनीकी ज्ञान अधिक हासिल करना चाहती है, लेकिन पशु-पक्षियों से वह जुड़ना नहीं चाहती है। इसलिए हमें पक्षियों के बारे में जानकारी दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए, जिससे हम अपनी पर्यावरण दोस्त को उचित माहौल दे पायें। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। प्रत्येक जीवित प्राणी में विद्युत उत्पन्न करने वाली मांसपेशियां होती हैं। विश्व की विद्युत उत्पन्न करने वाली सभी मछलियों में तीन प्रमुख हैं— बिल्ली मछली, विद्युत ईल और विद्युत रे। विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली को अंग्रेजी में इलेक्ट्रिक कैट फिश कहते हैं।
आस्ट्रेकोडमर्स को जीव वैज्ञानिकों ने विद्युत उत्पन्न करने वाली मछलियों का पूर्वज माना है। यह मछली लगभग 30 करोड़ साल पहले ही धरती से विलुप्त हो गयी थी। बिल्ली मछली उष्णकटिबंधीय अफ्रीका की नदियों और झीलों में पायी जाती है। यह नील नदी की घाटी में बहुतायत से मिलती है। यह एक मध्यम आकार की मछली है, जिसकी लंबाई 90 सेंटीमीटर से लेकर 1.5 मीटर तक होती है।
कभी-कभी इससे ज्यादा लंबी विद्युत बिल्ली मछली भी देखने को मिलती है। इसका वजन 20 से 25 किलोग्राम तक होता है। इसके पीठ और शरीर के ऊपर का भाग कत्थई रंग का होता है, नीचे के भाग का रंग मांस के रंग का होता है। आंखें छोटी तथा मुंह के चारों ओर तीन जोड़ी मूछें होती हैं। इन मूंछों के कारण इसे बिल्ली मछली कहा जाता है।
इसके शरीर पर पीठ के मीन पंख नहीं होते। विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली के विद्युत उत्पादक अंग अनेक भागों में बंटे होते हैं। शरीर पर बहुत-सी प्लेटें होती हैं और हर प्लेट उसकी रीढ़ की हड्डी से जुड़ी होती है। इसका घनात्मक सिरा शरीर के आगे की और ऋणात्मक सिरा शरीर के पीछे वाले भाग पर होता है। इसके अंगों की संरचना जनरेटरों की तरह होती है और ये उसी की तरह काम करते हैं। यह बहुत शक्तिशाली बिजली उत्पन्न करती है।
एक बड़े आकार की विद्युत उत्पन्न करने वाली बिल्ली मछली 350 वोल्ट तक की विद्युत उत्पन्न कर सकती है। इसका स्पर्श हो जाने से तेज झटका लगता है। इसे यदि एक्वेरियम में रख लिया जाए तो इसके शरीर की विद्युत से दूसरी मछलियां बेहोश हो जाती हैं और कभी-कभी उनकी मौत हो जाती है।
यह एक तेज और चालाक शिकारी मछली है। दिन के समय पौधों के बीच या चट्टानों की दरारों में छिपी रहती है और रात के समय शिकार पर निकल पड़ती है। पूरी तरह मांसाहारी यह मछली छोटे-छोटे कृमि, ताजे पानी के झींगा-झींगी तथा छोटी मछलियों को अपना आहार बनाती है। शिकार की टोह में निकलने के बाद शिकार दिखाई देने पर ये धीरे-धीरे तैरकर उसके करीब पहुंच जाती है और बिजली की तेजी से उस पर झपट पड़ती है और अपने मजबूत जबड़ों में दबोच लेती है।
कोई भी शिकार इसकी पकड़ में आने के बाद बच नहीं पाता, अगर बच भी जाए तो तेज करंट के कारण अचेत हो जाता है और फिर यह उसे आराम से खा लेती है। एक्वेरियम में रखने पर यह दूसरी मछलियों को बहुत परेशान करती है। यही कारण है बड़ी मछली के साथ इसके छोटे बच्चे ही एक्वेरियम में रखे जाते हैं। बड़े होने पर उन्हें नदियों में छोड़ दिया जाता है। इसकी लड़ाकू प्रवृत्ति के कारण इसे पालतू नहीं बनाया जा सकता।
इस मछली में नर और मादा की शारीरिक संरचना एक जैसी होती है और ये दिखने में भी एक जैसे लगते हैं। प्रजनन काल में उत्पादक अंगों की सहायता से नर मादा की खोज करता है और इसके बाद ये प्रजनन करते हैं। कहा जाता है कि इस मछली के विषय में मिस्र के लोगों को प्राचीनकाल से ही इसकी जानकारी थी। वे इसके प्रति श्रद्धा रखते थे। अफ्रीका में अनेक स्थानों पर इस मछली को रोगों की चिकित्सा में इस्तेमाल में लाया जाता है और इससे दवाइयां तैयार की जाती है।
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