एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के पलामू प्रमंडल (विशेषकर चैनपुर और मेदिनीनगर) आज एक ऐसी पहल का साक्षी बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज किया है, जो केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सशक्त प्रस्तावना है। झारखंड ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत जेएसएलपीएस द्वारा स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से अंत:वस्त्र उत्पादन इकाई का शुभारंभ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
यह पहल कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। प्रथम, यह ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकालकर उन्हें उत्पादन और उद्यमिता की मुख्यधारा से जोड़ती है। द्वितीय, यह स्थानीय संसाधनों और श्रमशक्ति के उपयोग के माध्यम से लोकल टू ग्लोबल की अवधारणा को साकार करने की दिशा में ठोस प्रयास है।
तृतीय, यह सामाजिक संरचना में महिलाओं की भूमिका को निर्भर से निर्माता में परिवर्तित करने का सशक्त माध्यम बन रही है। स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा भारत में लंबे समय से ग्रामीण विकास का आधार रही है, लेकिन झारखंड में इसे जिस प्रकार नवाचार और व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा जा रहा है, वह उल्लेखनीय है।
अंत:वस्त्र उत्पादन जैसे क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी न केवल रोजगार सृजन करेगी, बल्कि बाजार में उनकी सीधी हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करेगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ेगा और आत्मनिर्भरता का वास्तविक अर्थ साकार होगा।
इस कार्यक्रम की विशेषता यह भी रही कि इसमें राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर एवं मनिका विधायक रामचंद्र सिंह की गरिमामयी उपस्थिति ने इसे राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन का स्पष्ट संकेत दिया। यह दशार्ता है कि राज्य सरकार ग्रामीण विकास को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि उसे धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है।
इससे पूर्व मेदिनीनगर टाउन हॉल में आयोजित मुखिया सम्मेलन भी इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने जिस स्पष्टता और विस्तार से पंचायती राज व्यवस्था, मुखियाओं के अधिकार और कर्तव्यों पर प्रकाश डाला, वह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक सकारात्मक पहल है।
उत्कृष्ट कार्य करने वाले मुखियाओं को सम्मानित करना न केवल प्रोत्साहन का माध्यम है, बल्कि यह एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही की संस्कृति को भी जन्म देता है। दीपिका पांडेय सिंह की कार्यशैली में एक स्पष्ट दृष्टि और संवेदनशीलता का समावेश दिखाई देता है।
वे केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी समान रूप से ध्यान देती हैं। उनकी यह सक्रियता यह संकेत देती है कि झारखंड में ग्रामीण विकास अब केवल एक विभागीय कार्य नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले रहा है।
हालांकि, इस प्रकार की पहलों की सफलता केवल शुभारंभ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि उत्पादन इकाइयों को निरंतर प्रशिक्षण, बाजार तक पहुंच, वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, उत्पाद की गुणवत्ता और ब्रांडिंग पर भी विशेष ध्यान देना होगा, ताकि यह पहल दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बन सके।
अंतत:, पलामू की यह यात्रा यह संदेश देती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक सहभागिता का समन्वय हो, तो कोई भी क्षेत्र विकास की नयी ऊंचाइयों को छू सकता है। महिलाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रयास न केवल आर्थिक सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि यह एक नए सामाजिक बदलाव की नींव भी रख रहा है।
झारखंड के लिए यह एक प्रेरणादायक क्षण है और यदि इस दिशा में निरंतरता बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पलामू जैसे क्षेत्र आत्मनिर्भर भारत के सबसे सशक्त स्तंभ के रूप में उभरेंगे। (लेखक हृदयानंद मिश्र एडवोकेट सह झारखंड प्रदेश कांग्रेस के समन्वय समिति सदस्य हैं।)
पश्चिम बंगाल का चुनाव और भाजपा
एबीएन एडिटोरियल डेस्क । 2026 के बंगाल चुनाव में 4 मई को आया परिणाम को ऐतिहासिक कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा। 1952 में पहली बार बंगाल विधानसभा का चुनाव हुआ उस समय देश में स्वतंत्रता आंदोलन के कारण कांग्रेस की लोकप्रियता थी, इसीलिए कांग्रेस जीत गई।
25 वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही। फिर 34 वर्षों तक वाम दल CPI(M) की सरकार रही उसके बाद 15 वर्षों तक ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस(TMC) की सरकार रही। इस बार के विधानसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल के राजनीति की इतिहास एवं भूगोल को पूरी तरह से बदल के रख दिया है।
बंगाली श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राजनीति की जिस विचारधारा के नींव की स्थापना की थी उसका परचम पूरे देश में लहरा रहा था, परंतु इस बार बंगाल की जनता ने अपनी क्रांतिकारी निर्णय से बंगाल को भी भगवा के रंग में रंग दिया है।
ममता बनर्जी का बाहरी भीतरी का नारा इस बार काम नहीं आया। मछली-मांस के मुद्दा के ऊपर झाल-मुड़ी का मुद्दा भारी पड़ गया। चुनाव परिणाम ने यह प्रमाणित कर दिया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण कोई मुद्दा था ही नहीं जिसे मुद्दा बनाने की टीएमसी ने भरपूर कोशिश की थी। चुनाव में 93% मतदान जहां अप्रत्याशित था वहीं महिलाओं की लंबी कतार ने सिद्ध कर दिया कि महिला सम्मान एवं उनकी सुरक्षा महिलाओं की पहली प्राथमिकता थी।
मुस्लिम बहुल मालदा, उत्तरी दिनाजपुर और वीरभूम में भाजपा के प्रदर्शन से यह भी प्रमाणित हो रहा है कि अब मुस्लिम समाज को तुष्टीकरण के नाम पर और अधिक ठगा नहीं जा सकता है।
बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में एम के स्टालिन ने अपने क्षेत्रीय पार्टी को अपनी निजी जागीर में बदल दिया था, और इस बार के चुनाव परिणाम ने यह भी सिद्ध कर दिया कि इस प्रकार के दादागिरी को जनता बर्दाश्त लंबे समय तक नहीं करती है।
2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद अन्य राजनीतिक दलों को भारतीय जनता पार्टी निस्तेज दिखने लगी थी, परंतु नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह की जोड़ी ने उसे स्थिति को बड़ी कुशलता पूर्वक संभाला और भाजपा की प्रभामंडल को और भी तेजवान बनाया। असम में भाजपा की हैट्रिक इस बात का प्रमाण है कि भाजपा अपने कार्यों के द्वारा प्रो-इनकंबेंसी क्रिएट करने में सफलता अर्जित करती जा रही है।
ममता बनर्जी के द्वारा इस्तीफा नहीं दिए जाने की घोषणा बाल-हठ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है क्योंकि राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वह अल्पमत वाली सरकार को बर्खास्त कर देंगे और चुनाव आयोग के द्वारा घोषित परिणाम के आधार पर बहुमत वाली दल को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण दे देंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क । अब भारतीय संस्कृति को न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय बनाने और इस सॉफ्ट पावर को कथित रूप से आॅरेंज इकोनॉमी के रूप में आगे बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। यह सच है कि किसी देश के सांस्कृतिक विकास की तस्वीर को अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र के योगदान के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन, कड़वा सच यह भी है कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पहले जिंदगी की बुनियादी जरूरतों का पूरा होना आवश्यक है। इसीलिए कबीरदास की यह पंक्ति प्रचलित है भूखे भजन न होइ गोपाला, यह लो अपनी कंठी माला। सुविधा संपन्न लोग ही कला-साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का रस ले पाते हैं।
आजादी के 75 साल में देश की बुनियादी जरूरतें काफी हद तक पूरी होने के बाद, अब भारतीय संस्कृति को न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय बनाने और इस सॉफ्ट पावर को कथित रूप से आॅरेंज इकोनॉमी के रूप में आगे बढ़ाने के प्रयास किये जा रहे हैं। संतोषजनक पक्ष यह है कि इस सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का फायदा दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रहा है और जयपुर, इंदौर, कोच्चि, लखनऊ, पटना और चंडीगढ़ जैसे शहरों को इसका ज्यादा लाभ हो रहा है।
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को सिर्फ आर्थिक और सामरिक विकास से ही पूरा नहीं किया जा सकता। हार्ड पावर का असर कुछ समय तक जबकि सॉफ्ट पावर का दीर्घकालिक रहता है। भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कलकत्ता का कला-साहित्य और सिनेमा में देशव्यापी प्रभाव महसूस किया जाता है। फ्रांस की प्राचीन संस्कृति यूरोप को मुरीद बनाए हुए है।
हाल ही ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय की अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पर यह टिप्पणी चर्चा में रही कि हम न होते तो आप फ्रेंच बोल रहे होते। लेकिन इतिहास को कुछ और पहले ले जायें, तो यह भी कहा जा सकता है कि रोम न होता तो आज ब्रिटेन भी ऐसा नहीं होता। पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाली ग्रीको-रोमन संस्कृति विकसित ही नहीं होती यदि यूनान को पराजित करने वाले रोमन योद्धा ग्रीक संस्कृति के कायल नहीं हो जाते।
रोमन कवि होरेस ने ठीक ही कहा था, रोम की सेना ने यूनान को जीत लिया लेकिन ग्रीक संस्कृति ने रोम पर कब्जा कर लिया।
आज अमरीकी संस्कृति दुनिया जीत रही है, क्योंकि वह पहले नंबर की अर्थव्यवस्था बनी हुई है। भारत का वैश्विक कद बढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति का डंका पूरी दुनिया में बजाया जाना जरूरी है। अच्छी बात यह है कि छोटे शहर, महानगरों की नकल की बजाय सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं।
हमें ग्रामीण स्तर पर देश की सांस्कृतिक विरासत को संभालना और स्थानीय कलाकारों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ा होगा। एक अनुमान के अनुसार, यह क्षेत्र फिलहाल 45 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। करीब 60 लाख लोग पारंपरिक कला उद्योग से जुड़े हुए हैं। इनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी तो और भी लोग इसके लिए आगे आएंगे। देश में सांस्कृतिक-आध्यात्मिक पर्यटन के विकास की काफी गुंजाइश है। इसके विकास के लिए हमें कुछ और गंभीर कदम उठाने होंगे।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पहली मई का दिन हर वर्ष हमारे सामने एक ऐसा आईना लेकर आता है, जिसमें हम अपने समाज और विकास की वास्तविक तस्वीर देख सकते हैं। यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। जब हम मजदूर दिवस कहते हैं, तो यह शब्द अपने भीतर केवल एक वर्ग का उल्लेख नहीं करता, बल्कि उस व्यापक मानव समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, जिसकी मेहनत, धैर्य और संघर्ष ने आधुनिक दुनिया की नींव रखी है।
सड़कों की चकाचौंध, शहरों की रफ्तार, उद्योगों की निरंतरता और खेतों की हरियाली इन सबके पीछे एक समान तत्व है और वह है श्रम। इतिहास हमें बताता है कि श्रमिकों के अधिकारों की यात्रा सरल नहीं रही है। औद्योगिक क्रांति के समय जब उत्पादन के साधन तेजी से विकसित हो रहे थे, तब श्रमिकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। काम के घंटे अनिश्चित थे, मजदूरी अत्यंत कम थी और कार्यस्थल की सुरक्षा का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं था।
श्रमिकों को केवल उत्पादन के एक साधन के रूप में देखा जाता था, न कि एक संवेदनशील और अधिकार-संपन्न इंसान के रूप में। ऐसे समय में जब मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठायी, तब यह केवल आर्थिक सुधार की मांग नहीं थी, बल्कि यह मानव गरिमा की पुनर्स्थापना का संघर्ष था। आठ घंटे कार्यदिवस की मांग, जो आज हमें सामान्य लगती है, एक समय में एक क्रांतिकारी विचार थी।
इसके पीछे वह सोच थी कि मनुष्य केवल काम करने के लिए नहीं बना है, बल्कि उसे विश्राम, परिवार और व्यक्तिगत विकास के लिए भी समय चाहिए। इस विचार ने श्रम के प्रति दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मजदूर दिवस इसी ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक है, जो हमें यह याद दिलाता है कि जो अधिकार आज हमें सहज लगते हैं, वे किसी समय संघर्ष और बलिदान के परिणाम थे। भारत के संदर्भ में मजदूर दिवस का महत्व और भी व्यापक हो जाता है।
यहां श्रमिक वर्ग अत्यंत विविधतापूर्ण है कृषि मजदूर, निर्माण कार्य में लगे श्रमिक, कारखानों में काम करने वाले कर्मचारी, घरेलू कामगार, रिक्शा चालक, छोटे व्यापारों में लगे सहायक और अब डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर ये सभी उस व्यापक श्रम शक्ति का हिस्सा हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था को चलाती है। लेकिन इस विविधता के साथ एक बड़ी चुनौती भी जुड़ी है असमानता। भारत में श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है।
इस क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ रोजगार की कोई स्थिरता नहीं होती, वेतन अनिश्चित होता है और सामाजिक सुरक्षा का अभाव होता है। यह वह वर्ग है, जो रोज कमाता है और रोज खाता है। इनके जीवन में किसी भी प्रकार की आर्थिक या सामाजिक अस्थिरता सीधे उनके अस्तित्व को प्रभावित करती है। मजदूर दिवस के अवसर पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे विकास मॉडल में इस वर्ग के लिए पर्याप्त स्थान है? बीते कुछ दशकों में भारत ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।
बुनियादी ढांचे का विस्तार हुआ है, उद्योगों का विकास हुआ है और तकनीकी क्षेत्र में नयी ऊंचाइयां प्राप्त की गयी हैं। लेकिन इस विकास के साथ एक विडंबना भी जुड़ी है आर्थिक वृद्धि के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाये हैं। श्रमिक वर्ग, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के श्रमिक, आज भी उस स्तर की सुरक्षा और सम्मान से वंचित हैं, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। तकनीकी परिवर्तन ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है।
स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उत्पादन प्रक्रियाओं को अधिक दक्ष बना दिया है, लेकिन इसके साथ ही पारंपरिक रोजगार के अवसरों में कमी भी आयी है। गिग इकॉनमी और फ्रीलांस कार्य ने रोजगार के नये अवसर तो प्रदान किये हैं, लेकिन इनकी प्रकृति अस्थायी और अनिश्चित है। ऐसे में श्रमिकों के सामने यह चुनौती है कि वे लगातार बदलती परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालें।
इस संदर्भ में कौशल विकास और शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि श्रमिकों को नयी तकनीकों और कार्य पद्धतियों के अनुरूप प्रशिक्षित किया जाये, तो वे न केवल अपनी आजीविका को सुरक्षित कर सकते हैं, बल्कि अपने जीवन स्तर को भी बेहतर बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल औपचारिक न हों, बल्कि वे वास्तव में श्रमिकों की जरूरतों के अनुरूप हों।
कोविड-19 महामारी ने श्रमिकों की स्थिति को एक नयी दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान किया। जब पूरे देश में लॉकडाउन लागू हुआ, तब सबसे अधिक प्रभावित वही वर्ग हुआ, जो पहले से ही सबसे कमजोर था। लाखों प्रवासी श्रमिकों का शहरों से अपने गाँवों की ओर पलायन एक ऐसी घटना थी, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। यह केवल एक मानवीय संकट नहीं था, बल्कि यह हमारी आर्थिक और सामाजिक संरचना की कमजोरियों का भी प्रतीक था।
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि श्रमिकों के लिए केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके जीवन की स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, और संकट के समय सहायता प्रदान करने के लिए प्रभावी तंत्र ये सभी ऐसे कदम हैं, जो श्रमिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित बना सकते हैं।
मजदूर दिवस का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह हमें श्रम के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने के लिए प्रेरित करता है। आज भी समाज में शारीरिक श्रम को कमतर आंका जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रकार का श्रम समान रूप से महत्वपूर्ण है। एक इंजीनियर की योजना तब तक अधूरी है, जब तक उसे जमीन पर उतारने वाला श्रमिक न हो। एक किसान की मेहनत के बिना शहरों का जीवन संभव नहीं है।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम श्रम के प्रति सम्मान की भावना विकसित करें। नीतिगत स्तर पर श्रमिकों के कल्याण के लिए कई प्रयास किये गये हैं। श्रम कानूनों में सुधार, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार और कौशल विकास कार्यक्रमों की शुरूआत ये सभी सकारात्मक कदम हैं। लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितनी प्रभावी ढंग से लागू होते हैं।
अक्सर देखा गया है कि योजनाओं का लाभ उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता, जिनके लिए वे बनायी गयी हैं। इसके अलावा, निजी क्षेत्र और उद्योगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि उद्योग श्रमिकों को केवल उत्पादन का साधन मानते रहेंगे, तो समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रमिकों को सुरक्षित कार्य वातावरण, उचित वेतन और सम्मानजनक व्यवहार प्रदान करना केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।
मजदूर दिवस हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि क्या हमारा समाज वास्तव में समावेशी है। क्या हम अपने दैनिक जीवन में उन लोगों के योगदान को पहचानते हैं, जो हमारे जीवन को आसान बनाते हैं? क्या हम उन्हें केवल सेवा प्रदाता के रूप में देखते हैं, या एक ऐसे इंसान के रूप में, जिसकी अपनी भावनाएं, आकांक्षाएं और अधिकार हैं? मजदूर दिवस एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी।
चेतावनी इस बात की कि यदि हम श्रमिकों की उपेक्षा करते हैं, तो विकास की पूरी संरचना असंतुलित हो जायेगी। और अवसर इस बात का कि हम एक ऐसा समाज बना सकते हैं, जहां श्रम को उसका उचित सम्मान मिले, श्रमिकों को सुरक्षा और अवसर प्राप्त हों, और विकास की प्रक्रिया वास्तव में सबके लिए लाभकारी हो।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हर वर्ष 29 अप्रैल को मनाया जाने वाला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का स्मरण है, जिसमें देह, मन और आत्मा एकाकार होकर सृजन की पराकाष्ठा को स्पर्श करते हैं। नृत्य मानव की सबसे प्राचीन अभिव्यक्तियों में से एक है। एक ऐसी भाषा, जिसे शब्दों की आवश्यकता नहीं होती, परंतु जो भावों की सम्पूर्णता को संप्रेषित कर देती है।
नृत्य की उत्पत्ति उतनी ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता। आदिमानव ने जब पहली बार प्रकृति के साथ संवाद स्थापित किया, तब उसके आनंद, भय, विजय और उत्सव के भाव देह की गतियों में प्रकट हुए। गुफा चित्रों, सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियों विशेषकर नर्तकी की कांस्य प्रतिमा से यह स्पष्ट होता है कि नृत्य का अस्तित्व हजारों वर्ष पूर्व भी था। भारतीय परंपरा में नृत्य को दिव्यता से जोड़ा गया है।
भगवान शिव का नटराज रूप सृष्टि, स्थिति और संहार के चक्र को नृत्य के माध्यम से ही अभिव्यक्त करता है। यही नहीं, वैदिक युग में भी नृत्य यज्ञों और अनुष्ठानों का अभिन्न अंग था। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में नृत्य और नृत के बीच सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण अंतर है नृत शुद्ध शारीरिक गतियों का प्रदर्शन, जिसमें भाव या कथा का अभाव होता है। यह तकनीकी दक्षता और ताल-लय की सटीकता पर आधारित होता है। वहीं नृत्य इसमें भाव, रस और अभिव्यक्ति का समावेश होता है। यह दर्शकों के साथ संवाद स्थापित करता है।
इसके अतिरिक्त नाट्य में कथा, अभिनय और संवाद का समावेश होता है। यह त्रिविध विभाजन भारतीय नृत्य की वैज्ञानिकता और गहनता को दर्शाता है। भारतीय नृत्य की आधारशिला नाट्यशास्त्र में निहित है, जिसे भरतमुनि ने रचा। इसमें नृत्य के अंग, उपांग, मुद्राएं, रस, भाव और अभिनय के नियमों का विस्तृत वर्णन है। रस सिद्धांत के अनुसार नृत्य का उद्देश्य दर्शकों में भावों का संचार करना है। श्रृंगार, वीर, करुण, रौद्र, हास्य, भयानक, बीभत्स और अद्भुत।
नर्तक की देह, नेत्र, मुखमुद्राएं और हस्तमुद्राएं मिलकर इन भावों को सजीव करती हैं। नृत्य का आध्यात्मिक आयाम भारतीय दृष्टि में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। यह योग की तरह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। भक्ति आंदोलन में मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु जैसे संतों ने नृत्य को ईश्वर भक्ति का साधन बनाया। नृत्य में लय और ताल का समन्वय ब्रह्मांड की गति का प्रतीक है। भारत में शास्त्रीय नृत्य की परंपरा हजारों वर्ष पुराना है।
भारत विविधताओं का देश है, और यहां नृत्य की परंपरा अत्यंत समृद्ध है। यहां की प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां हैं तमिलनाडु भरतनाट्यम, केरल कथकली, मोहिनीअट्टम, उत्तर प्रदेश कथक, ओडिशा ओडिसी, आंध्र प्रदेश कुचिपुड़ी, मणिपुर मणिपुरी, असम सत्रिया इन सभी नृत्य शैलियों की अपनी विशिष्ट शैली, वेशभूषा, संगीत और कथा परंपरा है, किंतु इनका मूल आधार नाट्यशास्त्र ही है। जनजीवन की धड़कन कहीं जाने वाली जो नृत्य है वह है लोक नृत्य।
यदि शास्त्रीय नृत्य आत्मा की साधना है, तो लोक नृत्य जनजीवन की धड़कन है। भारत के प्रत्येक राज्य में लोक नृत्य की अपनी अलग पहचान है जैसे पंजाब भांगड़ा, गिद्धा, गुजरात गरबा, डांडिया, राजस्थान घूमर, बिहार झूमर, जट-जटिन, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल छऊ, लोक नृत्य समाज के उत्सव, कृषि, विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े होते हैं। इनमें सहजता, सामूहिकता और आनंद की प्रधानता होती है। झारखंड की धरती नृत्य और संगीत की जीवंत प्रयोगशाला है। यहां के जनजातीय समुदायों के जीवन में नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है।
झारखण्ड के प्रमुख लोक नृत्य है छऊ नृत्य (सरायकेला) झ्र मुखौटा नृत्य, जिसमें वीरता और पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है। जोहड़ा (झूमर) महिलाओं द्वारा किया जाने वाला सौंदर्यपूर्ण नृत्य। डोमकच विवाह अवसर का उल्लासपूर्ण नृत्य। करमा नृत्य प्रकृति और वृक्ष पूजा से जुड़ा हुआ। पाइका नृत्य युद्ध कौशल का प्रतीक माना जाता है। इन नृत्यों में प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाई देता है। जंगल, पहाड़, नदियां और ऋतु परिवर्तन सभी नृत्य के भावों में समाहित हैं।
नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्तित्व विकास, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन का भी सशक्त साधन है। शिक्षा के क्षेत्र में नृत्य आत्मविश्वास बढ़ाता है, अनुशासन सिखाता है, सांस्कृतिक चेतना विकसित करता है, सृजनात्मकता को प्रोत्साहित करता है। आज के डिजिटल युग में जहां मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं, वहां नृत्य हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है।
वैश्वीकरण और पाश्चात्य प्रभाव के कारण पारंपरिक नृत्य शैलियां संकट का सामना कर रही हैं। युवा पीढ़ी का झुकाव आधुनिक और फ्यूजन नृत्य की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नृत्य शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, लोक कलाकारों को मंच और सम्मान मिले, डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग कर परंपराओं को संरक्षित किया जाए।
अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस हमें यह याद दिलाता है कि नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि जीवन की लय है। यह शरीर की गति में आत्मा की अभिव्यक्ति है। झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में नृत्य की परंपरा न केवल अतीत की धरोहर है, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। आज आवश्यकता है कि हम नृत्य को केवल मंच तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं—ताकि हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारी आत्मा सदैव गतिमान बनी रहे। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। मलेरिया एक गंभीर और कभी-कभी प्राणघातक हो जाने वाली बीमारी है, जो आमतौर पर एक निश्चित प्रकार के मच्छर को संक्रमित करने वाले परजीवी के कारण होती है और इन संक्रमित मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है। अमेरिका से करीब 70 साल पहले ही मलेरिया को पूरी तरह खत्म घोषित कर दिया गया था लेकिन अभी भी प्रतिवर्ष दो हजार अमेरिकी इससे संक्रमित होते हैं। भारत में तो हर साल लाखों लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं।
चिंता की स्थिति यह है कि दुनियाभर में मलेरिया से हर साल लाखों लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं, जिनमें ज्यादातर छोटे बच्चे हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चे मलेरिया से असमान रूप से प्रभावित होते हैं, जो मलेरिया से होने वाली कुल मौतों का करीब 82 प्रतिशत है। 2021 में मलेरिया से दुनियाभर में 6.19 लाख लोगों की मौत हुई थी जबकि 2022 में 6.08 लाख लोग मलेरिया के कारण मारे गये और 2024 में मलेरिया से 6.1 लाख मौतें दर्ज की गयी।
हालांकि मलेरिया ऐसी बीमारी है, जिसकी रोकथाम करके बड़ी संख्या में होने वाली इन मौतों को रोका जा सकता है लेकिन यह दुनियाभर में रोकी जा सकने वाली बीमारी और मृत्यु का एक प्रमुख कारण बना हुआ है। इसीलिए मलेरिया को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से 2008 से ही 25 अप्रैल को एक खास विषय के साथ विश्व मलेरिया दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष मलेरिया दिवस की थीम है- मलेरिया को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध अब हम कर सकते हैं। अब हमें करना ही होगा। इसका प्रमुख संदेश यही है कि मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
भेदभाव और कलंक को खत्म करना, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने में समुदायों को शामिल करना, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल को उस स्थान के करीब लाना, जहां लोग रहते हैं और काम करते हैं, मलेरिया के खतरे को बढ़ाने वाले कारकों को संबोधित करना, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में मलेरिया नियंत्रण हस्तक्षेप इत्यादि मलेरिया दिवस मनाने के प्रमुख उद्देश्य हैं। दरअसल, विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हर किसी को मलेरिया की रोकथाम, पता लगाने और इलाज के लिए गुणवत्तापूर्ण, समय पर और सस्ती सेवाओं का अधिकार तो है लेकिन यह सभी के लिए वास्तविकता नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनियाभर में मलेरिया के बीस करोड़ से भी ज्यादा नए मामले दर्ज किये जाते हैं, जिनमें से कई लाख लोगों की हर साल मौत हो जाती है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि मलेरिया की रोकथाम के मामले में बीते कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति तो हुई है लेकिन मलेरिया के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और मलेरिया मुक्त विश्व के लक्ष्य को प्राप्त करना अभी भी गंभीर चुनौती है। चिंता का विषय यह भी है कि प्रभावित क्षेत्रों में यह बीमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों और अर्थव्यवस्थाओं पर बड़ा बोझ भी डालती है।
मलेरिया एनोफेलीज मादा मच्छर के काटने से होता है, जो प्लाज्मोडियम परजीवी से संक्रमित होता है और जब यह मच्छर किसी को काटता है तो ये परजीवी मानव रक्त में प्रवेश करके लिवर तथा लाल रक्त कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगते हैं और व्यक्ति को बीमार बना देते हैं। इस रोग की गंभीरता परजीवी पर ही निर्भर करती है। मनुष्यों में सबसे आम मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम है, जो बीमारी के सबसे घातक रूप के लिए जिम्मेदार है। एनोफेलीज मच्छर वाहक के रूप में कार्य करते हैं, जब वे एक संक्रमित व्यक्ति को काटते हैं और फिर दूसरे व्यक्ति को काटते हैं तो परजीवियों को प्रसारित करते हैं।
जब परजीवी एक बार मानव शरीर के अंदर यकृत में चले जाते हैं तो ये लाल रक्त कोशिकाओं के अंदर गुणन करते हैं, जिससे कई प्रकार के लक्षण पैदा होते हैं। मनुष्यों को मलेरिया के चार मुख्य प्रकार (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम विवैक्स, प्लाज्मोडियम ओवले और प्लाज्मोडियम मलेरिया) संक्रमित करते हैं। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम सबसे खतरनाक प्रकार है जबकि मलेरिया के अन्य प्रकार आमतौर पर हल्की बीमारी का कारण बनते हैं।
गंभीर मलेरिया गंभीर एनीमिया, गुर्दे की विफलता, दौरे, कोमा और यहां तक कि मृत्यु जैसी जटिलताओं का कारण भी बन सकता है, खासकर यदि तुरंत निदान और इलाज नहीं किया जाये। हालांकि दुनियाभर में शोधकर्ता मलेरिया को नियंत्रित करने और अंतत: खत्म करने के लिए टीकों और अन्य नवीन समाधानों पर काम कर रहे हैं लेकिन इसकी रोकथाम के मुख्य उपायों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मच्छरदानी, कीट विकर्षक और मलेरिया-रोधी दवाओं का उपयोग करना शामिल है।
जटिलताओं और मृत्यु को रोकने के लिए प्रभावी मलेरिया-रोधी दवाओं के साथ शीघ्र निदान और उपचार महत्वपूर्ण है। मलेरिया होने पर आमतौर पर तेज बुखार होता है, जो 103 से 105 डिग्री तक हो सकता है। सिरदर्द, बदन दर्द, घबराहट, अत्यधिक पसीना आना, जी मिचलाना, उल्टी होना, अत्यधिक ठंड लगना, कमजोरी इत्यादि मलेरिया के अन्य प्रमुख लक्षण हैं। इन लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भी खतरनाक हो सकता है।
वैसे तो मलेरिया के लक्षण प्राय: 24 से 48 घंटे में ही नजर आ सकते हैं लेकिन कई बार लक्षण सामने आने में ज्यादा समय भी लग सकता है। मलेरिया की जांच से ही पता चल पाता है कि मरीज किस तरह के मलेरिया से ग्रसित है और उसी के आधार पर विभिन्न दवाओं से उसका इलाज शुरू किया जाता है। साधारण मलेरिया होने पर सही इलाज से मरीज 3-5 दिनों में ठीक हो सकता है लेकिन यदि सीवियर फाल्सीपेरम मलेरिया हुआ तो समय पर और सही इलाज नहीं कराने पर मरीज की मौत भी हो सकती है।
इसलिए बेहद जरूरी है कि मलेरिया की जांच और इलाज में कोताही न बरतें। गर्मी और मानूसन के दौरान मच्छरों की संख्या बहुत बढ़ जाती है, इसलिए आमतौर पर मलेरिया इन्हीं मौसम में सबसे ज्यादा होता है। वैसे मलेरिया के मच्छर अधिकांशत: उन्हीं जगहों पर पनपते हैं, जहां गंदगी होती है या गंदा पानी जमा होता है। इसलिए मलेरिया की रोकथाम के लिए सबसे जरूरी है कि अपने घरों में तथा आसपास गंदगी और गंदा पानी एकत्र न होने दें। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 25 अप्रैल को पूरी दुनिया विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाती है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को सदियों से चुनौती देती आ रही एक घातक बीमारी मलेरिया के विरुद्ध वैश्विक संकल्प का प्रतीक है।
वर्ष 2007 में वर्ल्ड हेल्थ आॅगेर्नाइजेशन द्वारा इसकी शुरुआत की गयी थी, ताकि दुनिया भर में इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ायी जा सके और इसके उन्मूलन की दिशा में ठोस प्रयास किये जा सकें। मलेरिया, प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से फैलने वाली बीमारी है, जो मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आज भी यह बीमारी दुनिया के कई विकासशील देशों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है।
ताजा वैश्विक आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष लगभग 20-25 करोड़ लोग मलेरिया से संक्रमित होते हैं, करीब 6 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें अधिकतर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब और ग्रामीण क्षेत्र प्रभावित होते हैं। भारत की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। भारत ने मलेरिया के मामलों में बड़ी गिरावट दर्ज की है, लेकिन अभी भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
भारत ने राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से मलेरिया नियंत्रण में महत्वपूर्ण प्रगति की है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का है। फिर भी चुनौतियां बनी हुई हैं, दूर-दराज ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र। स्वच्छ जल और स्वच्छता की कमी, स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच, जागरूकता का अभाव। बात अगर हम झारखंड की करें तो झारखंड जैसे राज्य में मलेरिया एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या के रूप में उपस्थित है।
इसके पीछे कई कारण हैं, घने जंगल और आर्द्र जलवायु, आदिवासी बहुल क्षेत्र, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। जलभराव और साफ-सफाई की कमी। राज्य के कई जिले जैसे सिमडेगा, गुमला, गोड्डा, लातेहार और पश्चिमी सिंहभूम मलेरिया के हॉटस्पॉट माने जाते रहे हैं। हालांकि, राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग द्वारा किये गये प्रयासों से स्थिति में सुधार आया है जैसे मच्छरदानी का वितरण, आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से घर-घर जांच।
इसके बावजूद भी अगर नियमित फॉगिंग और दवा छिड़काव चाहे गांव हो या शहर होता रहे तो इस ओर बहुत सुधार हो सकेगा। फिर भी, हर वर्ष झारखंड में सैकड़ों लोगों की जान इस बीमारी के कारण चली जाती है जो इस बात का संकेत है कि अभी और सतत प्रयास आवश्यक हैं फाइलों में नहीं धरातल पर। मलेरिया कोई नई बीमारी नहीं है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है आयुर्वेद में इसे विषम ज्वर कहा गया है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में इसके लक्षण और उपचार का वर्णन मिलता है। झारखंड की आदिवासी संस्कृति में भी प्राकृतिक उपायों का उल्लेख मिलता है। नीम, तुलसी, गिलोय जैसी औषधियों का प्रयोग घरों के आसपास धुआं करके मच्छरों को भगाना, जल स्रोतों को साफ रखना ये पारंपरिक उपाय आज भी प्रासंगिक हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के साथ इनका समन्वय आवश्यक है।
बचाव ही सबसे बड़ा उपचार है। मलेरिया का सबसे प्रभावी इलाज उसका बचाव है, व्यक्तिगत स्तर पर मच्छरदानी का नियमित उपयोग, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना, घर के आसपास पानी जमा न होने देना, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना, सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता अभियान चलाना। जल निकासी की उचित व्यवस्था करना।
नियमित सरकार द्वारा गली, मोहल्लों, गांवों, शहरों में फॉगिंग होना अति आवश्यक है। यदि मलेरिया को जड़ से समाप्त करना है, तो शिक्षा को केंद्र में रखना होगा। स्कूल और कॉलेज एवं किसी भी प्रकार की शिक्षण संस्थाओं की भूमिका तय करनी होगी। पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य शिक्षा को शामिल करना, मलेरिया जागरूकता सप्ताह का आयोजन करना। नाटक, पोस्टर, रैली और नुक्कड़ नाटक के माध्यम से रोकथाम के लिए प्रचार प्रसार करना।
मलेरिया से लड़ाई केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है। विविध प्रकार से जागरूकता फैलाने के उपाय ढूंढ़ा जा सकता है जैसे पंचायत स्तर पर बैठकें हो, सोशल मीडिया और रेडियो का उपयोग करके, स्थानीय भाषा और लोक कला के माध्यम से संदेश फैलाकर। मलेरिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि यह हमारे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक ढांचे की परीक्षा है।
यदि हम इसे हराना चाहते हैं, तो हमें सरकार, समाज, शिक्षा और संस्कृति सभी को एक साथ जोड़ना होगा। विश्व मलेरिया दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। झारखंड जैसे राज्यों में यदि हम स्थानीय परंपराओं, आधुनिक चिकित्सा और शिक्षा को एक सूत्र में पिरो दें, तो वह दिन दूर नहीं जब मलेरिया केवल इतिहास का एक अध्याय बनकर रह जायेगा। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर, सांस्कृतिक शोधकर्ता और रंगनिर्देशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हर वर्ष 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक औपचारिक अवसर नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना को जगाने का दिन है, यह याद दिलाने का दिन है कि यह पृथ्वी ही हमारा एकमात्र घर है। आज जब पूरी दुनिया तकनीकी प्रगति और विकास की दौड़ में आगे बढ़ रही है, उसी समय युद्ध, संघर्ष और पर्यावरणीय विनाश की भयावह छाया भी इस धरती को लगातार कमजोर कर रही है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में युद्धों की विभीषिका केवल मानव जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को गहरी चोट पहुँचा रही है। बमों की गूंज, रासायनिक हथियारों का उपयोग, जंगलों का विनाश, जल स्रोतों का प्रदूषण ये सब मिलकर पृथ्वी को एक असंतुलित और असुरक्षित स्थिति में धकेल रहे हैं। युद्ध का प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर हवा, पानी, मिट्टी, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों तक फैलता है।
भारतीय संस्कृति में पृथ्वी को माता का दर्जा दिया गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सदैव प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की प्रेरणा दी। पेड़-पौधों, नदियों, पर्वतों और जीव-जंतुओं को पूजनीय माना गया। लेकिन आधुनिकता के अंधाधुंध विस्तार और उपभोगवादी मानसिकता ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। आज मनुष्य विकास के नाम पर जंगल काट रहा है, नदियों को प्रदूषित कर रहा है और जीव-जंतुओं के अस्तित्व को खतरे में डाल रहा है। युद्ध इस विनाश को और तेज कर देता है।
युद्ध केवल राजनीतिक या सामरिक मुद्दा नहीं है, यह पर्यावरणीय संकट का भी सबसे बड़ा कारण है। युद्ध के दौरान भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है, जिससे जलवायु परिवर्तन तेज होता है। रासायनिक और परमाणु हथियारों से मिट्टी और जल स्रोत लंबे समय तक प्रदूषित रहते हैं। लाखों पशु-पक्षी और वन्यजीव अपने आवास खो देते हैं। खेत-खलिहान बंजर हो जाते हैं, जिससे खाद्य संकट उत्पन्न होता है। इस प्रकार युद्ध, मानव और प्रकृति दोनों के लिए विनाशकारी है।
पृथ्वी केवल मनुष्यों की नहीं है। यह पक्षियों की उड़ान, पशुओं के जीवन, कीट-पतंगों की गतिविधियों और जलचर जीवों का भी घर है। जब जंगल कटते हैं, तो पक्षियों का बसेरा खत्म होता है। जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मछलियाँ मरती हैं। जब हवा जहरीली होती है, तो हर जीव प्रभावित होता है। आज जरूरत है कि हम इस समग्र दृष्टिकोण को समझें पृथ्वी का संरक्षण तभी संभव है जब हम सभी जीवों के अधिकारों को स्वीकार करें। पर समाधान क्या किया जाए?
जीव-जंतुओं का संरक्षण। वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाए जाएं। शिकार और अवैध व्यापार पर कड़ी रोक लगे। पक्षियों के लिए जल और भोजन की समुचित व्यवस्था की जाए। विश्व पृथ्वी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत जिम्मेदारी का प्रतीक है। यदि हम आज भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियों को एक बंजर, प्रदूषित और असुरक्षित पृथ्वी विरासत में मिलेगी।
अब समय है कि हम युद्ध की राह छोड़कर शांति और संरक्षण का मार्ग अपनाएं। पृथ्वी हमारी माता है और एक संतान के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी रक्षा करें। आइए, इस पृथ्वी दिवस पर हम संकल्प लें कि न युद्ध करेंगे, न प्रकृति का शोषण करेंगे, बल्कि मिलकर इस धरती को सुरक्षित और समृद्ध बनाएंगे। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse