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Published / 2026-07-25 13:01:53
अभी भी देशभर की लोकप्रियता में नंबर 1 हैं पीएम मोदी

त्रिवेणी दास

सोशल मीडिया के इंस्टाग्राम पर उन्होंने एक वीडियो डाला और पूरा इंस्टाग्राम का alogrithm (कंप्यूटर-विज्ञान ही बदल गया। 

पहले ही वीडियो में (305 ×10 लाख)  views, 100 मिलियन से अधिक followers बढ़ गए।

दूसरा वीडियो आभार, कृतज्ञता तथा धन्यवाद वाला आया है, इसे कहते हैं unlimited लोकप्रियता।

कल तक instagram कॉकरोच पार्टी का  बोलबाला था, लेकिन जब मोदीजी ने एंट्री  मारी तो देश के युवा मोदीजी के  fan गए।

ऐसे नहीं कहा जाता है कि;
 "मोदी घर में घुस के मारता है"

विदेशों में बैठे भारत विरोधी एक बार फिर हताश हो गए इस बार भी उनका पैसा डूब गया। 

Published / 2026-07-24 17:03:56
महराया हुआ फुस्स पटाखा-रॉकेट...

  • महराया हुआ फुस्स पटाखा-रॉकेट... 

त्रिवेणी दास

और..अंततोगत्वा जंतर मंतर पर धरना दे रहे सोनम वांचूक ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के हाथों फल का जूस पीकर अपना अनशन समाप्त कर दिया है। सोनम वांचूक ने ताड़ लिया कि छात्रों  के आंदोलन में कुछ फुस्स-पटाखे वाले राजनीतिज्ञों का अवांछित एंट्री हो चुका है और आंदोलन का मुख्य उद्देश्य राजनीति के वेदी में बलि चढ़ चुका है।

जैसे ही सोनम वांचूक ने अनशन समाप्त करने की घोषणा की कांग्रेस ने कह दिया कि वांचूक इस आंदोलन के हिस्सा थे ही नहीं। राहुल गांधी अभी 21 दिनों तक विदेश में रहकर वापस आए और प्रधानमंत्री का आवास जो हाइली प्रोटेक्टेड एरिया होता है, सड़क पर लेट गए। 

लगातार चुनाव हारती उनकी पार्टी छात्रों के आंदोलन का केंद्र जंतर मंतर तो नहीं गई परंतु सड़क की राजनीति के माध्यम से जमीन तलाश रही है जबकि लगातार सिद्ध होते रहा है है कि राहुल गांधी कभी नहीं लांच होने वाले फुस्स रॉकेट हैं। लाल टोपी और झाड़ू वालों को जनता वोट नहीं दे रही है इसी बहाने किस्मत आजमा रहे हैं।

छात्रों के मुद्दे और परीक्षा में पेपर लीक के मामले में मोदीजी ने कठोर कदम उठाया है। छात्रों से बात करने की सरकार के द्वारा पहल की गई है। पकड़े गए लोगों को फास्ट ट्रैक में मुकदमा चला कर सजा दिलाने की घोषणा प्रधानमंत्री ने कर ही दिया है। मंत्रिमंडल के बैठक में इस संबंध में कड़ा कानून लाने का मसौदा स्वीकार कर लिया गया है।

पार्लियामेंट में मोदी जी ने खास अंदाज में कहा कि..

तमाशा करने वालों को
क्या खबर
हमने कितने तूफानों को
पार कर दीया जलाया है..

 किसी पत्रकार ने मोदी जी से पूछा था कि आपके सेहत का राज क्या है? मोदीजी ने जवाब दिया था कि रोज रोज दो-चार किलोग्राम गाली खाता हूं और वही मेरी ताकत बन जाती है। आंदोलनकारी छात्रा और छात्राओं के द्वारा जिस प्रकार मोदी जी को गाली देने जा रही है बेचारी गाली का भी सिर शर्म से झूकी जा रही है। 

Published / 2026-07-23 17:06:18
कृपा...

त्रिवेणी दास

"कृपा"  का रहस्य बताने वाले एक बाबा से एक भक्त ने पूछा, बाबा मेरे ऊपर आने वाला कृपा कहां रुकी हुई है_?
बाबा ने पूछा लौकी खाते हो क्या_?
भक्त ने कहा, दिल को स्वस्थ रखने के लिए लौकी रोज ही खाता हूं 
बाबा ने कहा लौकी खाना बंद कर दो तुम्हारी कृपा लौकी में रुकी हुई है।
  
   देश के कांक्रोचों ने सोचा कि NEET में ही उनकी कृपा फंसी हुई है। चलो इसी को मुद्दा बनाते हैं। नीट को ही क्यों न धराशाई कर दिया जाए_?

ना रहेगा नीट ,
न होगा पेपर लीक

उधर धुरंधर भांप लिया था 
मामला जांच लिया था ,
फिर से नीट करवा दिया 
पेपर लीक वालों को 
पकड़ जेल भिजवा दिया_

कृपा पाने की आश में 
नेता सड़क पर निकल गया 
जनता की कृपा नहीं मिली 
मंसूबा उसका फिसल गया_

कृपा नियत में होती है 
परिश्रम में होती है 
क्रिया प्रतिक्रिया के
परिणाम में होती है 
सच्चे बाबा की बात मान लो 
कृपा पाने का रहस्य जान लो

Published / 2026-07-21 15:04:21
परिसीमन विधेयक और लोकसभा...

  • परिसीमन विधेयक और लोकसभा... 

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। अभी 3 महीना पहले लोकसभा में परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) मात्र 54 वोटों की कमी के कारण गिर गया था, लेकिन अब जब लोकसभा का मानसून सत्र शुरू हो गया है तब लोकसभा के सदन में पक्ष एवं विपक्ष सांसदों की संख्या के परिदृश्य में भारी बदलाव हो चुका है।

डीलिमिटेशन बिल लोकसभा में पारित नहीं होने देने के बाद विपक्षी गठबंधन में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के पहले तक एक नई उम्मीद जगी थी, परंतु चुनाव परिणाम आने के बाद देश की राजनीति का तस्वीर एवं तेवर में बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है। 

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के संसद में से 20 सांसदों के बगावत और सदन में विपक्ष से अलग बैठने की स्थिति के कारण सत्तापक्ष को फायदा हुआ है। उद्धव ठाकरे के शिवसेना से 6 संसद के बगावत करके एकनाथ शिंदे के शिवसेना में चले जाने से लोकसभा में सत्ता पक्ष को मजबूती मिल रहा है। 

महाराष्ट्र के शरद पवार के एनसीपी के 8 सांसद परिवर्तन के मार्ग में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। 22 सांसदों वाली डीएमके लोकसभा में विपक्षी खेमा से अलग बैठने का फैसला ले लिया है, क्योंकि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद डीएम के के संबंध कांग्रेस से टूट चुके हैं। डीएमके के नेता एमके स्टालिन का सभी राज्यों में 50% सीटों बढ़ोतरी के मुखर विरोध का मिजाज ठंडा पड़ चुका है।

इस मानसून सत्र के एजेंडा में परिसीमन विधेयक का नहीं होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि मोदीजी की सरकार ने इस विधेयक के बारे में सोचना बंद कर दिया है अथवा लोकसभा में विपक्ष की ताकत का उसे अंदाजा नहीं है। जब कभी सत्ता पक्ष को यह समझ में आ जाएगा कि टू थर्ड मेजोरिटी से लोकसभा में डीलिमिटेशन बिल पास कराया जा सकता है, सरकार एक बार फिर विशेष सत्र बुलाकर इसे पारित करा सकती है। (लेखक स्वतंत्र स्तम्भ कार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)। 

Published / 2026-07-18 21:46:49
रिश्ते अब मटेरियलिस्टिक हो गये हैं...

  • रिश्ते अब मटेरियलिस्टिक हो गये हैं...
  • क्या बुजुर्गों का सम्मान भी आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो गया है?

डॉ. दीपक प्रसाद

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके बुजुर्गों के प्रति व्यवहार से होती है। जिस समाज में वृद्धों का सम्मान, सुरक्षा और स्नेह बना रहता है, वह समाज सांस्कृतिक रूप से समृद्ध माना जाता है। किंतु आज का बदलता सामाजिक परिवेश एक अत्यंत चिंताजनक प्रश्न हमारे सामने खड़ा करता है क्या रिश्ते अब केवल आर्थिक लाभ और भौतिक स्वार्थ तक सीमित हो गए हैं? क्या परिवार में बुजुर्ग का सम्मान अब इस बात से तय होने लगा है कि उन्हें पेंशन मिलती है या नहीं?

यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और मानवीय चेतना से जुड़ा हुआ है। भारतीय संस्कृति में माता-पिता और बुजुर्गों को देवतुल्य माना गया है। मातृदेवो भव:, पितृदेवो भव: केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। संयुक्त परिवार की परंपरा में दादा-दादी और नाना-नानी केवल परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और जीवन-मूल्यों के संरक्षक होते थे। 

आज वही बुजुर्ग अपने ही घर में स्वयं को उपेक्षित, अकेला और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। आज समाज में एक ऐसी प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है जो अत्यंत पीड़ादायक है। यदि किसी बुजुर्ग को नियमित पेंशन मिलती है, तो उसके साथ रहने और उसकी सेवा करने के लिए कई लोग तैयार दिखाई देते हैं। लेकिन जिस बुजुर्ग के पास कोई आय नहीं है, वही व्यक्ति धीरे-धीरे परिवार पर बोझ समझा जाने लगता है। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के क्षरण का संकेत है।

क्या सचमुच रिश्तों का मूल्य अब बैंक खाते से तय होगा? क्या माता-पिता का सम्मान उनकी पेंशन, संपत्ति और बचत के आधार पर होगा? यदि ऐसा है, तो यह केवल परिवार की नहीं, पूरे समाज की नैतिक पराजय है।
बुजुर्ग जीवन के उस पड़ाव पर होते हैं जहां उन्हें सबसे अधिक प्रेम, धैर्य, सम्मान और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। वे फिर से बच्चों की तरह हो जाते हैं। उन्हें समय चाहिए, अपनापन चाहिए, बातचीत चाहिए और यह विश्वास चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं। 

दुर्भाग्य से आधुनिक जीवन की भागदौड़, उपभोक्तावाद और स्वार्थपरक सोच ने इन मानवीय आवश्यकताओं को पीछे छोड़ दिया है। आज का युवा वर्ग अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है- रोजगार, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव और बदलती जीवनशैली। इन परिस्थितियों को नकारा नहीं जा सकता। किंतु इन चुनौतियों के बीच यदि परिवार के सबसे अनुभवी सदस्य ही उपेक्षा के शिकार हो जाएँ, तो यह विकास अधूरा है। आधुनिकता का अर्थ अपने मूल्यों को त्याग देना नहीं है।

तकनीकी प्रगति और आर्थिक सफलता तभी सार्थक है जब उसके साथ मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहें। एक पुरानी कहावत है एक बुजुर्ग चार बच्चों का पालन-पोषण कर सकता है, लेकिन कई बार चार बच्चे मिलकर भी एक बुजुर्ग की सेवा नहीं कर पाते। यह केवल कहावत नहीं, बल्कि आज के समाज की कड़वी सच्चाई बनती जा रही है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपना सुख, समय, स्वास्थ्य और सपने तक न्योछावर कर देते हैं। 

वृद्धावस्था में जब उन्हें सहारे की आवश्यकता होती है, तब यदि उन्हें सम्मान के स्थान पर उपेक्षा मिले, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी परिवार ऐसे नहीं हैं। आज भी असंख्य युवा अपने माता-पिता की निस्वार्थ सेवा कर रहे हैं, उन्हें सम्मान दे रहे हैं और अपने बच्चों को भी यही संस्कार सिखा रहे हैं। ऐसे परिवार समाज के लिए प्रेरणा हैं। इसलिए उद्देश्य किसी एक पीढ़ी को दोष देना नहीं, बल्कि समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करना है। 

सरकारें वृद्धावस्था पेंशन, स्वास्थ्य योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से सहयोग कर रही हैं, परंतु कोई भी योजना उस आत्मीयता का स्थान नहीं ले सकती जो परिवार दे सकता है। आर्थिक सहायता आवश्यक है, लेकिन उससे कहीं अधिक आवश्यक है भावनात्मक सुरक्षा, सम्मान और अपनापन। आज आवश्यकता इस बात की है कि परिवारों में संवाद बढ़े, बच्चों को बचपन से ही बुजुर्गों के प्रति सम्मान का संस्कार दिया जाए और समाज यह समझे कि माता-पिता कोई आर्थिक निवेश नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व की जड़ें हैं। 

यदि रिश्ते केवल लाभ-हानि के तराजू पर तौले जाने लगे, तो परिवार केवल एक साथ रहने का स्थान रह जाएगा, घर नहीं। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि क्या हम भी अनजाने में रिश्तों को मटेरियलिस्टिक बना रहे हैं? क्या हम अपने माता-पिता के साथ वही व्यवहार कर रहे हैं जिसकी अपेक्षा हम अपने बच्चों से भविष्य में करेंगे? समय का चक्र सबके लिए समान है। आज जो युवा है, वह कल बुजुर्ग होगा।

अंतत: यही कहा जा सकता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि उसकी ऊंची इमारतों, आधुनिक तकनीक या बढ़ती आय से नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों के चेहरे पर दिखने वाली संतुष्टि और सम्मान से आंकी जाती है। यदि हमारे घरों में बुजुर्ग सुरक्षित, सम्मानित और प्रसन्न हैं, तभी हमारा विकास वास्तविक है। रिश्तों को धन से नहीं, मन से जोड़िये। पेंशन से नहीं, प्रेम से पहचानिए। क्योंकि धन जीवन को सुविधाएं दे सकता है, परंतु केवल अपनापन ही जीवन को गरिमा दे सकता है। (लेखक असिस्टेंट प्रोफेसर सांस्कृतिक शोधकर्ता, चिन्तक एवं रंगनिर्देशक हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-07-18 12:53:15
पीएम मोदी और आत्मनिर्भर भारत...

  • पीएम मोदी और आत्मनिर्भर भारत... 

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कल शुक्रवार को हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर उद्घाटन करते हुए रवाना किया। यह ट्रेन जींद से सोनीपत रूट पर 89 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। इस ट्रेन में 10 कोच हैं और यात्री क्षमता 2,600 की है। इस ट्रेन के इंजन में 9 लीटर पानी से 1 लीटर हाइड्रोजन गैस बनाया जा रहा है। 

8 हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाए गए हैं जो हाइड्रोजन एवं हवा के रासायनिक क्रिया से बिजली उत्पन्न करते हैं और लिथियम बैटरियों को चार्ज करते हैं और इसी बैटरी के बिजली से ट्रेन चलती है। ट्रेन प्रदूषण मुक्त है और ट्रेन धुएं की जगह पानी का भाँप छोड़ती है। ट्रेन की गति अधिकतम 110 किलोमीटर प्रति घंटा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही विशेषता है कि वे अग्रिम (Advance) सोचते हैं और समस्या के समाधान का ठोस उपाय करते हैं और सकारात्मक परिणाम को धरातल के ऊपर उतारते भी हैं। भारतीय रेल के विद्युतीकरण का कार्य 1025 शुरू हुई थी। 2014 ई तक 30% विद्युतीकरण का कार्य 90 वर्ष में हो सका था। 

2014 में मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 99% रेलवे रूट के विद्युतीकरण का कार्य हो चुका है; और यही कारण है कि तेल संकट के बाद भी भारत के विकास की गति बाधित नहीं हो पाई है। अपने राष्ट्र तथा हम लोगों का सौभाग्य है कि हम अपने भारत को आवश्यकता के हर एक आयाम में आत्मनिर्भर होते हुए अपनी आंखों से देख पा रहे हैं। 

Published / 2026-07-14 20:24:57
विद्यार्थी जीवन का समय...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय जीवन दर्शन के अनुसार 25 वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य व्रत का अनुपालन करते हुए विद्या अध्ययन का काल आने वाले दायित्वों के निर्वहन के लिए स्वयं को परिपक्व करने का समय निर्धारित किया गया है। छात्र जीवन का समय ही वह समय होता है जब व्यक्ति के चरित्र का निर्माण, कर्तव्यों के प्रति संस्कार, आत्म सम्मान तथा आत्मविश्वास वाला व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है।  

छात्र जीवन में शिक्षा के साथ-साथ व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों में भागीदारी की भावनाएं परिपुष्ट होती है।  पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व का बोध पारिवारिक एवं सामाजिक मर्यादाओं के अनुपालन के लिए उत्प्रेरित करते रहता है और परिवार तथा समाज से भटकाव को रोकने का कार्य करता है।  

पारिवारिक एवं सामाजिक विरासत का उल्लंघन आज एक सामान्य घटना बन गयी है। विद्यार्थी जीवन कुछ इस प्रकार से निर्धारित हो गए हैं कि परिवार का विद्यार्थी पारिवारिक एवं सामाजिक अनुशासन को भंग करना अपनी आधुनिकता का पहचान समझ लिया है जबकि उसका आने वाला भविष्य उसे परिवार एवं समाज से दूर करते हुए एकाकी बना देता है।  

आज शिक्षण संस्थान के वातावरण भी अत्यंत प्रदूषित हो चुके हैं। विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत सफलता को ही सर्वोपरि मान बैठे हैं, और इस व्यक्तिगत स्वार्थ की लपट जब अभिभावकों के पास पहुंचती है तब तक बहुत देर हो चुका होता है, अभिभावक के पास रोने-गाने के सिवा और कुछ नहीं बचता है। वास्तव में विद्यार्थी जीवन ही वह नींव है जिसके ऊपर व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय भविष्य का निर्माण किया जा सकता है।

Published / 2026-07-10 22:02:41
हर हाल में रूकना चाहिए जनसंख्या विस्फोट

(विश्व जनसंख्या दिवस/ 11 जुलाई विशेष)  

योगेश कुमार गोयल 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जनसंख्या संबंधित समस्याओं पर वैश्विक चेतना जागृत करने के लिए प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। भारत के संदर्भ में देखें तो तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ही हम सभी तक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पहुंचाने में पिछड़ रहे हैं। देश में बेरोजगारी की समस्या विकराल हो चुकी है। हालांकि विगत दशकों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से नए रोजगार जुटाने के कार्यक्रम चलाए गए लेकिन बढ़ती आबादी के कारण ये सभी कार्यक्रम ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुए। देश में आबादी और संसाधनों के बीच असंतुलन बढ़ता जा रहा है। वास्तविकता यही है कि विगत दशकों में देश की जनसंख्या जिस गति से बढ़ी, उस गति से कोई भी सरकार जनता के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने की व्यवस्था करने में सफल हो ही नहीं सकती थी। 

आज देश की बहुत बड़ी आबादी निम्न स्तर का जीवन जीने को विवश है। देश में करीब 40 प्रतिशत आबादी आजादी के बाद से ही गरीबी के आलम में जी रही है। गरीबी में जीवन गुजार रहे ऐसे बहुत से लोगों की यही सोच रही है कि उनके यहां जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतने ही ज्यादा कमाने वाले हाथ होंगे किन्तु यह सोच वास्तविकता के धरातल से परे है। 

लगातार बढ़ती महंगाई के जमाने में परिवार बड़ा होने से कमाने वाले हाथ ज्यादा होने पर जितनी आय बढ़ती है, उससे कहीं ज्यादा जरूरतें और विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिनकी पूर्ति कर पाना सामर्थ्य से परे हो जाता है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों की सफलता के लिए सर्वाधिक जरूरी यही है कि घोर निर्धनता में जी रहे ऐसे लोगों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों के महत्व के बारे में जागरूक करने की ओर खास ध्यान दिया जाए क्योंकि जब तक इस कार्यक्रम में इन लोगों की भागीदारी नहीं होगी, तब तक लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है। 

देश में जनसंख्या वृद्धि का मुकाबला करने के लिए पिछले काफी समय से कुछ कड़े कानून बनाने की मांग हो रही है लेकिन इस दिशा में कुछ राज्य सरकारें दो से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को सरकारी नौकरी तथा स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारी से अयोग्य अघोषित करने जैसे जिस तरह के उपायों पर विचार कर रही हैं, उन्हें तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। हालांकि जनसंख्या वृद्धि मौजूदा समय में गंभीर चुनौती है लेकिन ऐसे उपायों को संवैधानिक नजरिये से भी तर्कसम्मत नहीं माना जाता। 

चीन में 1980 से पहले केवल एक बच्चा पैदा करने की अनुमति थी, जिसका उल्लंघन करने पर दम्पति को न केवल सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जाता था बल्कि सजा भी दी जाती थी लेकिन वहां यह नीति सफल नहीं हुई। इसीलिए चीन सरकार ने 2016 में इस नीति में बदलाव कर दो बच्चों की अनुमति दी और बाद में तीन बच्चों की अनुमति देनी पड़ी। चीन की तानाशाही सरकार द्वारा नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए दम्पत्तियों को तीन बच्चे करने की अनुमति क्यों दी गई, इसके कारण समझना भी जरूरी है। दरअसल वहां लोगों की सामान्य प्रजनन दर में निरन्तर गिरावट आ रही है और कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यही स्थिति भारत में भी होनी है। 

जनसंख्या में स्थायित्व और कामकाजी युवाओं की स्थिर संख्या के लिए महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 2.1 होनी चाहिए और चीन में यह दर निरन्तर गिर रही है। 1970 में चीन में यह दर 5.8 थी, जो 2015 में घटकर 1.6 और 2020 में केवल 1.3 ही रह गई जबकि बुजुर्गों की आबादी लगातार बढ़ती गई। नेशनल ब्यूरो आॅफ स्टेटिस्टिक्स (एनबीएस) के अनुसार आने वाले समय में आबादी में अधिक उम्र वालों की संख्या बढ़ने से संतुलित विकास और जनसंख्या को लेकर दबाव बढ़ेगा। 1982 में हुई जनगणना में चीन की जनसंख्या में 2.1 फीसदी की सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई थी लेकिन उसके बाद जनसंख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई, जिसके लिए वहां की कम्युनिस्ट सरकार द्वारा अपनायी गयी दशकों पुरानी वन चाइल्ड पॉलिसी को जिम्मेदार माना जाता है। 

विगत एक दशक में चीन की जनसंख्या करीब सात करोड़ बढ़ी लेकिन बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से चीन के लिए अलग ही समस्या उत्पन्न होने लगी है। दरअसल चीन को आशंका है कि अगले दस वर्षों में उसकी जनसंख्या में गिरावट आएगी, जिससे कामगारों की संख्या में कमी आने से उसकी खपत भी घटेगी। एनबीएस के आंकड़ों के मुताबिक चीन को जिन जनसांख्यिकीय संकट का सामना करना पड़ा था, वह और गहरा होने की उम्मीद थी, इसीलिए चीन को अपनी जनसंख्या नीति में बदलाव करने पर विवश होना पड़ा। 

जहां तक भारत की बात है तो यहां 1994 में महिलाओं की सामान्य प्रजनन दर 3.4 थी, जो घटकर 2015 में 2.2 रह गई थी यानी सामान्य के करीब। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत की जनसंख्या 2050 तक बढ़ने के बाद से गिरनी शुरू हो जाएगी और 2100 तक पहुंचते-पहुंचते सामान्य प्रजनन दर केवल 1.3 ही रह जाएगी। इसका अर्थ है कि तब अधिकांश परिवारों में केवल एक ही बच्चा होगा और भारत उसी स्थिति में खड़ा होगा, जिसमें वन चाइल्ड पॉलिसी के बाद चीन खड़ा हुआ और उसे विगत सात वर्षों में दो बार अपनी जनसंख्या नीति में बड़ा परिवर्तन करना पड़ा। इसलिए टू चाइल्ड पॉलिसी जैसे कानूनों के जरिये जनसंख्या नियंत्रण की कोशिशों को व्यावहारिक नहीं माना जा रहा बल्कि इसके लिए डराने-धमकाने वाले कानूनों के बजाय लोगों में जागरुकता पैदा किया जाना सबसे जरूरी है। 

बगैर कड़े कानूनों के देश के ऐसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर में कमी आयी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में गरीब महिलाओं की प्रजनन दर करीब 3.2 है जबकि सम्पन्न महिलाओं में यह दर केवल 1.5 पाई गई है। इसी प्रकार अनपढ़ महिलाओं के औसतन 3.1 बच्चे होते हैं जबकि शिक्षित महिलाओं में यह संख्या औसतन 1.7 है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि जनसंख्या विस्फोट का सीधा संबंध सामाजिक और शैक्षिक स्थितियों से जुड़ा है। शिक्षा के अभाव में ही देश की बड़ी आबादी को छोटे परिवार के लाभ को लेकर जागरूक नहीं किया जा सका है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।) 

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