एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय चिंतन में तीज त्यौहार केवल धर्मिक अनुष्ठान और परमात्मा की कृपा प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। परमात्मा के रूप में परम् शक्ति की कृपा आकांक्षा तो है ही, साथ ही इस जीवन को सुंदर और सक्षम बनाने का भी निमित्त तीज त्यौहार हैं। इसी सिद्धांत नवरात्र अनुष्ठान परंपरा में है। इन नौ दिनों में मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा को सृष्टि की अनंत ऊर्जा से जोड़ने की दिशा में चिंतन है। आधुनिक विज्ञान के अनुसंधान भी इस निष्कर्ष पर पहुंच गये हैं कि व्यक्ति में दो मस्तिष्क होते हैं। एक चेतन और दूसरा अवचेतन।
इसे विज्ञान की भाषा में कॉन्शस और अनकॉन्शस कहा गया है व्यक्ति का अवचेतन मष्तिष्क सृष्टि की अनंत ऊर्जा से जुड़ा होता है। जबकि चेतन मस्तिष्क संसार से। हम चेतन मस्तिष्क से सभी काम करते हैं पर उसकी क्षमता केवल पन्द्रह प्रतिशत ही है। जबकि अवचेतन की सामर्थ्य 85% है। सुसुप्त अवस्था में तो दोनों का संपर्क जुड़ता है। पर यदि जाग्रत अवस्था में चेतन मस्तिष्क अपने अवचेतन से शक्ति लेने की क्षमता प्राप्त कर ले तो उसे वह अनंत ऊर्जा से भी संपन्न हो सकता है। प्राचीनकाल में ऋषियों की वचन शक्ति अवचेतन की इसी ऊर्जा के कारण रही है।
नवरात्र में पूजा साधना विधि जन सामान्य को अवचेतन की इसी शक्ति को सम्पन्न करने का प्रयास है। इससे आरोग्य तो प्राप्त होगा ही साथ ही अलौकिक ऊर्जा से संपन्नता भी बढ़ती है। अनंत ऊर्जा से जुड़ने की प्रक्रिया पितृपक्ष से आरंभ होती है। दोनों मिलाकर यह कुल पच्चीस दिनों की साधना है। सनातन परंपरा में दो बार नवरात्र आते हैं। एक चैत्र माह में और दूसरा अश्विन माह में। ये दोनों माह सृष्टि के पांचों तत्वों के संतुलन की अवधि होती है। अतिरिक्त क्षमता अर्जित करने के लिये पांचों तत्वों का संतुलन आवश्यक है। असंतुलन की स्थिति में उस तत्व से संबंधित तो प्रगति तीव्र होती है जिसका अनुपात अधिक होता है पर संपूर्ण की गति कम रहती है।
प्रकृति संतुलित हो तो प्राणी ही नहीं समूची वनस्पति में आंतरिक विकास की गति तीब्र होती है। इसका अनुमान हम फसल चक्र से लगा सकते हैं। यदि प्राणी देह की आंतरिक कोशिकाओं के विकास की अवधि में अतिरिक्त प्रयास हों तो अतिरिक्त ऊर्जा से संपन्नता हो सकती है। दोनों नवरात्र में यह शारदीय नवरात्र अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस नवरात्र को पितृपक्ष से जोड़ा गया है। पितृपक्ष की नियमित दिनचर्या चित्त को शांत करती है। शांत चित्त में ही सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। शरीर, मन और प्राण शक्ति को इस योग्य बनाती है कि व्यक्ति ज्ञान और आत्मा के स्तर पर सृष्टि की अनंत ऊर्जा से जुड़ सके। इसीलिए पितृपक्ष में यम, नियम, संयम, आहार और प्राणायाम पर जोर दिया गया है। जबकि नवरात्र में धारणा ध्यान और समाधि पर।
देवी को आदिशक्ति माना है। इसीलिए भारत में नारी को आद्या कहा है और पुरुष को पूर्णा। शक्ति के विभिन्न रूप हैं। शरीर की शक्ति, मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, चेतना की शक्ति और प्रकृति की शक्ति। यदि शरीर सबल है किंतु मन भयभीत है तो परिणाम अनुकूल न होंगे। यदि शरीर ठीक है, मन ठीक है पर बुद्धि यह काम न कर रही तो कार्य को कैसे पूरा किया जाये तो भी परिणाम अनुकूल न होंगे। सब ठीक होने पर यदि प्रकृति विपरीत हो तो भी परिणाम प्रभावित होगा। इन्हीं सब प्रकार की शक्ति अर्जित करने के लिये ही नवरात्र की अवधि है।
यह नवरात्र बहु आयामी हैं। ये शरीर को स्वस्थ्य बनाते हैं, शक्ति सम्पन्न बनाते हैं और अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से जोड़ने हैं। पर अच्छे परिणाम तभी होंगे जब हम पितृपक्ष की अवधि का पालन भी निर्धारित दिनचर्या से करें। जिस प्रकार हम कहीं दूर देश की यात्रा के लिये पहले वाहन की ओव्हर हालिंग करते हैं वैसे ही पहले पितृपक्ष में शरीर, मन, विवेक बुद्धि को तैयार किया जाता है। नवरात्र में नौ देवियों के पूजन का विधान है। प्रत्येक देवी का नाम अलग है, रूप अलग है, पूजन विधि अलग है, और तो और पृथक वनस्पति और पृथक चक्र से संबंधित है। मानव देह में मूलाधार से कुल आठ चक्र होते हैं। आरंभिक आठ दिन इन चक्र के माध्यम से शरीर की सभी कोषिकाओं को सक्रिय और समृद्ध बनाना है।
यह हमारा भ्रम और अज्ञानता है कि जो कर रहे हैं हम अपनी सामर्थ्य से कर रहे हैं। वस्तुत: हम एक पग भी प्रकृति की शक्ति के बिना नहीं उठा सकते। हमारे जीवन का एक एक पल और हमारी एक एक श्वांस भी प्रकृति की शक्ति से संचालित होती है। प्रकृति अनंत शक्ति और ऊर्जा से संपन्न है। विज्ञान की भाषा में प्रकृति की ऊर्जा का अंश ही हमको संचालित कर रहा है। वहीं आध्यात्मिक शब्दों में कहें तो हमारे भीतर आत्मा ही उस परम् दिव्य शक्ति का अंश है। दोनों के शब्दों में अंतर है पर भाव एक ही। कि प्रकृति की शक्ति या ऊर्जा ही हमारी सामर्थ्य है।
यदि हम कुछ अतिरिक्त प्रयत्न करके प्रकृति से अतिरिक्त ऊर्जा ले लें तो हमारी कार्य ऊर्जा में गुणात्मक वृद्धि हो सकती है। प्रकृति से अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करने की साधना के ही दिन हैं ये नवरात्र। पर पहले शरीर, मन, बुद्धि और चेतना को इतना सक्षम बनाना होता है कि वह इस अतिरिक्त ऊर्जा को अपने भीतर समेटने में सक्षम हो सके। शरीर को संतुलित बनाने की अवधि है पितृपक्ष और स्वयं को अतिरिक्त ऊर्जा से युक्त बनाने की अवधि है नवरात्र। कितने लोग हैं यथा अवस्था में ही जीवन जीते हैं और कितने लोग हैं जो अपना जीवन शून्य से आरंभ करके भी आसमान की ऊंचाइयां छू लेते हैं।
यह सब उनकी आंतरिक क्षमता के उपयोग से ही संभव होता है। शरीर की प्रत्येक कोशिका या अंग को स्वस्थ्य रखना और उसे प्रकृति की अनंत ऊर्जा से जोड़ना ही यह कुल अवधि का सारांश है। शरीर की कोशिकाओं या अंगो को केंद्र ये आठों चक्र हैं। इनके द्वारा ही ऊर्जा अंगों या कोशिकाओं को पहुंचती है। इसे गर्भावस्था में जीवन विकास क्रम से समझा जा सकता है। गर्भस्थ शिशु माता की नाभि से ही भोजन और श्वांस लेता है। अर्थात माता के नाभि चक्र में वह सामर्थ्य है कि वह एक जीवन को विस्तार दे सकता है। लेकिन गर्भस्थ शिशु के विकास और उनके जन्म के बाद नाभि चक्र की उपयोगिता कितनी रह जाती है।
भारतीय अनुसंधानकर्ताओं ने इसी विचार को आगे बढ़ाया और शरीर के सभी चक्रों को अधिक सक्रिय कर अंतरिक्ष की अनंत ऊर्जा से संपन्न होने का मार्ग खोजा। यह नौ दिन की साधना यही मार्ग खोलती है। इसका यह आशय कदापि नहीं कि पितृपक्ष में पितरों के समीप आने या उनके आशीर्वाद प्राप्त करने की अवधारणा या नवरात्र में देवी को प्रसन्न करने की अवधारणा कोई कम महत्वपूर्ण है। इन दोनों अवधारणाओं का अपना महत्व है। पर इसके साथ हमें इन उपासना के पीछे पितरों और देवी को प्रसन्न करके अपनी सामर्थ्य वृद्धि के दर्शन की बात भी समझना है।
नवरात्र साधना में दैवीय कृपा मिलने, या ध्यान समाधि से अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त करने के मार्ग के साथ औषधियों और आरोग्य प्राप्त करने का अवसर भी होते हैं नवरात्र। दुर्गा कवच में वर्णित नवदुर्गा नौ विशिष्ट औषधियों में हैं। प्रथम शैलपुत्री का संबंध हरड़ से माना गया है जो अनेक प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि है। हरड़ को हिमायती गया है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथ्य, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। द्वितीय ब्रह्मचारिणी। इन्हे ब्राह्मी भी कहा गया है। यह ब्राह्मी औषधि स्मरणशक्ति बढ़ाती है और रक्तविकारों को दूर करती है। वाणी को भी मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।
तृतीय चंद्रघंटा। इंहें चंद्रसुर भी कहा गया है। चन्द्रसूर एक ऐसा पौधा है जो धनिए के समान है। यह औषधि मोटापा दूर करता है, सुस्ती दूर करता है। शरीर को सक्रिय रहता है और त्वचा रोगों में भी लाभप्रद है चतुर्थ कूष्माण्डा इनका प्रतीक कुंमड़ा है। आज-कल इस दिन कुंमड़े की बलि देने का प्रचलन हो गया है। पर वस्तुत: यह एक प्रकार की औषधि है इससे एक मिष्ठान्न पेठा भी बनता है। इससे रक्त विकार दूर होता है, पेट को साफ होता है। मानसिक रोगों में तो यह अमृत के समान है। पंचमी देवी स्कन्दमाता। इनका प्रतीक अलसी है। कहते हैं ये देवी अलसी में विद्यमान रहती हैं। अलसी वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है। षष्ठम् कात्यायनी देवी हैं। इन्हें मोइया भी कहा गया है।
यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।सप्तम् कालरात्रि। इन देवी का वास नागदौन में माना गया है। यह औषधि नागदौन सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी होती और मनोविकारों को दूर करती है।अष्ठम् महागौरी। इनका निवास तुलसी में माना गया है। तुलसी कितनी गुणकारी होती है। हम परिचित हैं। तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र तुलसी। शरीर मन और मस्तिष्क का ऐसा कोई रोग नहीं जिसमें तुलसी लाभकारी न हो। पिछले दिनों पूरी दुनियाँ में एक बीमारी कोरोना फैली।
जिन घरों में तुलसी पत्ती की नियमित चाय बनती थी वहाँ इस बीमारी का प्रभाव नगण्य ही रहा। नवम् सिद्धिदात्री। इनका वास शतावरी में माना गया है। इसे नारायणी शतावरी भी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।इस प्रकार इन नौ दिनों का संबंध औषधियों से भी है। नवरात्र में नियमानुसार साधना आराधना करके और निर्देशित दिनचर्या करके हम आरोग्य प्राप्त कर सकते हैं। अंतरिक्ष की अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं और दैवी कृपा तो है ही। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय समाज जीवन में भय और आतंक पैदा करने के तरीकों में अब राष्ट्रद्रोही तत्वों ने रेल गाड़ियों और रेल पटरियों को निशाने पर लिया है। कहीं रेल पटरियां उखाड़ी गयींं, कहीं पटरियों पर डेटोनेटर रखे गये, कहीं गैस सिलेंडर और कहीं पत्थर रखकर रेलमार्ग अवरुद्ध किया गया। इसके साथ अब रात के अंधेरे में सवारी गाड़ियों पर पथराव किया गया। ये घटनाएं देशभर में घट रही हैं।
वैश्विक विषमताओं के बीच भारत की विकास यात्रा निरंतर है। वह विश्व की पांचवीं अर्थ शक्ति बना और अब तीसरे क्रम पर आने की आशा बंधी है। भारत की यह प्रगति बहुआयामी है आर्थिक, सामरिक और तकनीकी प्रगति के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख भी बढ़ी है जिसकी झलक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विभिन्न विदेश यात्राओं में देखी जा रही है।
भारत की यह प्रगति और प्रतिष्ठा देश विरोधी तत्वों और षड्यंत्रकारियों को पच नहीं रही। वे भारतीय समाज जीवन में तनाव और भय का वातावरण बनाकर विकास की गति अवरुद्ध करने के नये-नये तरीके खोज रहे हैं। कभी धार्मिक यात्राओं पर पथराव होता है तो कभी अपराधी पर की जाने वाली कानूनी कार्रवाई को साम्प्रदायिक रंग देकर समाज को भड़काने का प्रयास होता है। ताकि भारतीय समाज आंतरिक तनाव में उलझे और विकास यात्रा की गति धीमी हो।
इसी कुत्सित मानसिकता के अंतर्गत अब भारतीय रेलों को निशाने पर लिया जाने लगा है। जिससे समाज में भय और तनाव का वातावरण बने। भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल यातायात व्यवस्था है। अनुमान के मुताबिक लगभग डेढ़ करोड़ लोग प्रतिदिन रेलयात्रा करते हैं। भारतीय रेलें सामान ढुलाई का भी बड़ा माध्यम हैं। षड्यंत्रकारियों ने इन दोनों प्रकार की रेल गाड़ियों को निशाना बनाने का षड्यंत्र रचा है।
पिछले छह महीनों में तीस से अधिक छोटी-बड़ी रेल दुर्घटनाएं घटीं हैं, इनमें से कुछ को चालक की सावधानी से बचा लिया गया है लेकिन कुछ न बच सकीं लेकिन इनमें रेलवे स्टॉफ की सावधानी से उतना नुकसान नहीं हुआ जितना गहरा षड्यंत्र रचा गया था। 16 घटनाओं में सीधे-सीधे आतंकवादी षड्यंत्र के संकेत मिले हैं। रेल दुर्घटनाओं का यह षड्यंत्र कुल तीन प्रकार का हुआ।
मार्च से अगस्त तक घटी घटनाओं में रेल पटरियों को उखाड़ कर रेल दुर्घटनाओं का षड्यंत्र हुआ। ये घटनाएं असम, बंगाल, झारखंड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि प्रांतों में घटीं थीं। इनमें कुछ घटनाओं के सीसीटीवी फुटेज भी मिले। इसके आधार पर तीन घटनाओं में गिरफ्तारियां भी हुईं। ऐसी एक घटना में गिरफ्तार किया गया एक संदिग्ध व्यक्ति कैमरे में फिशप्लेट ढीली करता दिख रहा था।
जांच में उसकी गतिविधियां संदिग्ध हैं। वह कई कई दिनों तक घर से गायब रहा। आशंका है कि उसके तार सीमापार से जुड़े हैं, अनुमान किया जा रहा है कि वह कहीं ट्रेनिंग लेने गया होगा। लेकिन वह मानसिक रोगी होने की एक्टिंग कर रहा है। ऐसा अक्सर होता है। राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के अनेक आरोपित ऐसी ही एक्टिंग करने लगते हैं। लेकिन इसके अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितम्बर माह में घटने वाली घटनाएं अधिक सनसनीखेज हैं।
ये घटनाएं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और पंजाब में घटीं हैं। इनमें तीन घटनाएं तो अकेले कानपुर नगर की हैं। इनमें रेलवे लाइन पर कहीं डेटोनेटर रखा गया, कहीं गैस सिलेंडर, कहीं पत्थर के बोल्डर डाले गये तो कहीं लकड़ी गट्ठर रखकर रेलवे को दुर्घटनाग्रस्त करने का षड्यंत्र रचा गया है। ऐसी कुल 13 घटनाएं घटीं। कानपुर के अतिरिक्त जिन नगरों में यह षड्यंत्र हुआ उनमें अजमेर, भटिन्डा, रामपुर और बुरहानपुर आदि हैं। इन सभी घटनाओं को बहुत सावधानी से किया गया है।
पहले तरह की घटनाओं में कुछ लोग सीसीटीवी कैमरे में आ गये थे। इसलिए इस बार षड्यंत्र के लिये ऐसे स्थल चुने गये जो कैमरे की पहुंच से बाहर हों। ये सभी घटनाएं बड़े स्टेशन के समीप घटीं। इन सभी घटनाओं में स्थानीय सामग्री और स्थानीय शरारती तत्वों की भागीदारी हुई। यदि कोई बाहरी सामग्री उपयोग की जाती तो षड्यंत्र के सूत्र मिल सकते थे। इन घटनाओं में समानता है और जो सावधानी बरती गई है, उससे यह किसी गहरे षड्यंत्र का हिस्सा हैं और इन सबका योजनाकार कोई एक ही है।
रेल पटरी उखाड़ कर रेल को दुर्घटनाग्रस्त करने के कुल 12 स्थानों पर षड्यंत्र हुये थे इनमें चालक की सावधानी से सात दुर्घटनाएं बचा लीं गयी। कुछ घटनाएं मामूली नुकसान तक सीमित रहीं लेकिन तीन घटनाओं में तीन यात्रियों की मौत हुई।
रेलों को निशाना बनाने वालों ने अगस्त के अंतिम सप्ताह से अपनी रणनीति बदली। पहले पटरी उखाड़ कर रेलों को दुर्घटनाग्रस्त का षड्यंत्र हुआ। इसके बाद रेल पटरी पर खतरनाक सामान रखने कर रेल पलटाने का कुचक्र रचा गया है। इसमें सबसे गंभीर घटना मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के समीप घटी। बुरहानपुर में एक ऐसी ट्रेन को निशाना बनाने का प्रयास हुआ जिसमें सेना के जवान यात्रा कर रहे थे।
ये घटना 18 सितंबर की थी। यह ट्रेन तिरुवनंतपुरम जा रही थी। इसमें आर्मी के अफसर, कर्मचारी और हथियार भी थे। इस ट्रेन की पटरी पर सागफाटा के पास 10 डेटोनेटर रखे गये थे लेकिन इसकी सूचना समय पर मिल गई। सूचना मिलते ही ट्रेन को सागफाटा में रोक दिया गया और एक भयानक दुर्घटना टल गयी। कानपुर रेल मंडल इन उपद्रवियों के निशाने पर सबसे अधिक रहा।
अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितंबर तक उत्तर प्रदेश में पांचवां षड्यंत्र हुये और कानपुर में तीन। कानपुर के समीप पिछले सप्ताह प्रेमपुर स्टेशन के समीप रेलवे ट्रैक पर खाली सिलेंडर रखा मिला। प्रयागराज के लिये मालगाड़ी निकलने वाली थी। पूर्व सूचना मिल जाने से दुर्घटना बच गई। यह पांच किलो वाला खाली सिलेंडर था। इससे पहले 8 सितंबर को कानपुर में ही रेलवे ट्रैक पर 8 किलो वाला भरा सिलेंडर रखा गया था। तब कालिंदी एक्सप्रेस को डिरेल करने की साजिश रची गयी थी। लेकिन समय पर सूचना मिली और दुर्घटना टल गयी।
आठ सितंबर की इस घटना में सिलेंडर रेल के पहिये से टकराया भी लेकिन गाड़ी की धीमी गति थी इसलिए टकरा कर दूर चला गया और कोई बड़ी दुर्घटना होने से बच गई। यहां पुलिस को पेट्रोल से भरी बोतल और माचिस भी मिली। उत्तर प्रदेश के रामपुर स्टेशन के समीप खंबा रखकर नैनी जन शताब्दी एक्सप्रेस को निशाना बनाने का प्रयास हुआ। यह लोहे का खंबा छह मीटर लंबा था। यहां दो संदिग्ध लोगों को बंदी बनाया गया।
पंजाब के भटिंडा रेलवे लाइन पर लोहे के नौ सरिये रखे मिले। यह रात तीन बजे की घटना है। यहां से मालगाड़ी निकलने वाली थी लेकिन मालगाड़ी को सिग्नल नहीं मिला इसलिये रुक गयी और दुर्घटना टल गयी। इधर, मुजफ्फरपुर-पुणे स्पेशल एक्सप्रेस के छह पहिये पटरी से उतर गये। रेलवे सुरक्षा टीम जांच कर रही है। माना जा रहा है कि पटरी पर कुछ रखा होगा जिससे ये पटरी से उतरे।
पहले पटरी उखाड़ने, फिर पटरी पर खतरनाक सामग्री रखकर दुर्घटना कराने का षड्यंत्र हुये। अब रात के अंधेरे में यात्री गाड़ियों पर पथराव होने लगे हैं। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में महाबोधि एक्सप्रेस पर पथराव हुआ। यह नई दिल्ली से बिहार के गया जा रही थी। पथराव में कई यात्री घायल हुये। इसी तरह छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में ट्रायल रन के दौरान दुर्ग-विशाखापत्तनम वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन पर पथराव हुआ।
असामाजिक तत्त्वों ने एसी बोगियों को निशाना बनाया जिससे तीन बोगियों के शीशे टूट गये। कुछ पत्थर अंदर भी गिरे और कुछ यात्रियों को चोट लगी। यह घटना 13 सितम्बर को रात नौ बजे की है। रेलवे सुरक्षा बल ने 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। उत्तर में आगरा रेलमंडल के अंतर्गत मनिया स्टेशन के समीप एक बार फिर वंदे भारत एक्सप्रेस पर पथराव हुआ है। यह ट्रेन भोपाल से दिल्ली जा रही थी। यह पथराव रात ग्यारह बजे हुआ इससे ट्रेन की कई बोगियों के शीशे टूट गये। इस पथराव से किसी के घायल होने की खबर नहीं है।
वर्तमान रेलवे सुरक्षा अधिनियम 1989 की धारा 151 के अंतर्गत षड्यंत्र प्रमाणित होने पर अधिकतम दस वर्ष की सजा और जुमार्ने का प्रावधान है। ताजा घटनाओं के बाद भारत सरकार इस कानून को कड़ा बनाने पर विचार कर रही है। रेलमंत्री ने संकेत दिया है कि इस अधिनियम में उप धारा जोड़कर इसे देशद्रोह की श्रेणी में लाने पर विचार हो रहा है। षड्यंत्र के चलते होने वाली रेल दुर्घटनाओं में किसी की मृत्यु होने पर देशद्रोह की धारा के साथ सामूहिक हत्या का षड्यंत्र करने की धारायें जोड़ने और आजीवन कारावास अथवा मृत्युदंड का प्रावधान करने पर विचार किया जा रहा है।
नये प्रावधानों में धरना-प्रदर्शन करके रेलमार्ग अवरुद्ध करने पर भी दंड का प्रावधान किये जाने की संभावना है। सरकार के नियम जब भी बने लेकिन जिस प्रकार पूरे देश में रेलयात्रा को बाधित करके षड्यंत्र किये जा रहे हैं, इसके प्रति सरकार और सरकार के सुरक्षा प्रबंधों के साथ समाज का जागरूक होना भी जरूरी है। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। 14 सितंबर का दिन हर वर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो हिंदी भाषा की समृद्धि, महत्ता और इसकी सांस्कृतिक धरोहर को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करता है। यह दिन विशेष रूप से हमारे संविधान द्वारा हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किये जाने की याद दिलाता है।
14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में भारत की राजभाषा के रूप में अपनाया था। इस निर्णय के पीछे हिंदी के प्रचलन और इसके सरलता के गुणों को प्रमुखता दी गयी। इसके साथ हीए राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रतीक के रूप में हिंदी को स्थापित किया गया। इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगाए ताकि हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता और इसका महत्व और बढ़ सके।
हिंदी भारत के हृदय की भाषा मानी जाती है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सभ्यता और भावनाओं का प्रतिबिंब भी है। हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आम जनमानस से जुड़ी भाषा है, जो देश के विभिन्न हिस्सों को आपस में जोड़ने का कार्य करती है। हिंदी साहित्य का भी अद्वितीय योगदान है, जिसमें प्रेमचंद, निराला, महादेवी वर्मा जैसे साहित्यकारों की रचनाओं ने इसका मान बढ़ाया।
वैश्वीकरण और तकनीकी युग के इस दौर में, हिंदी ने भी खुद को नये रूप में ढाल लिया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल मंचों पर हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। इसके साथ ही हिंदी में फिल्मों, साहित्य और मीडिया का योगदान भी इसे लगातार समृद्ध बना रहा है। हालांकि, अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के कारण हिंदी के सामने कई चुनौतियां भी हैं।
हिंदी दिवस हमें हमारी मातृभाषा और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और इसे आगे बढ़ाने का संदेश देता है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमें अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए और इसे अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का जिम्मा भी हमारा है। इसके साथ ही, हिंदी दिवस उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने के लिए कार्यरत हैं।
हिंदी दिवस केवल एक उत्सव नहीं है, यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और आत्मसम्मान का प्रतीक है। हिंदी भाषा के प्रति हमारा सम्मान और इसे प्रोत्साहन देने का प्रयास हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखता है। हिंदी हमारी संस्कृति की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसे संरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है।
हिंदी दिवस पर इन विद्वानों की बातें हमें यह समझाती हैं कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं है, यह हमारी संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है। हमें हिंदी के समृद्धि और उसके प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।(लेखक रंगकर्मी, निर्देशक, सहायक आचार्य, शिक्षा संकाय कार्तिक उरांव महाविद्यालय, गुमला सह रांची विश्वविद्यालय रांची, झारखंड हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। यह बात बिल्कुल सत्य है। हमारे जीवन में सबसे पहली गुरु तो मां होती है जो हमें जन्म लेते ही हर बातों का ज्ञान कराती है। मगर विद्यार्थी काल में बालक के जीवन में शिक्षक एक ऐसा गुरु होता है जो उसे शिक्षित तो करता ही है साथ ही उसे अच्छे बुरे का ज्ञान भी कराता है। पहले के समय में तो छात्र गुरुकुल में शिक्षक के पास रहकर वर्षों विद्या अध्ययन करते थे। उस दौरान गुरु अपने शिष्यों को विद्या अध्ययन करवाने के साथ ही स्वावलंबी बनने का पाठ भी पढ़ाते थे।
इसीलिए कहा गया है कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताये। गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा माना गया है, क्योंकि गुरु के माध्यम से ही व्यक्ति ईश्वर को भी प्राप्त करता है। हमारे जीवन को संवारने में शिक्षक एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। सफलता प्राप्ति के लिये वो हमें कई प्रकार से मदद करते है। जैसे हमारे ज्ञान, कौशल के स्तर, विश्वास आदि को बढ़ाते है तथा हमारे जीवन को सही आकार में ढ़ालते है। कबीर दास ने शिक्षक के कार्य को इन पंक्तियो में समझाया है:-
कबीर दास जी कहते हैं कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह है और छात्र पानी के घड़े की तरह। जो उनके द्वारा बनाया जाता है और इसके निर्माण के दौरान वह बाहर से घड़े पर चोट करता है। इसके साथ ही सहारा देने के लिए अपना एक हाथ अंदर भी रखता है। शिक्षक हमें जीवन में सफलता के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल देते हैं। शिक्षक हमारे व्यक्तित्व को तैयार करते हैं। चरित्र को ढालने और मूल्यों को स्थापित करने में मदद करते हैं। हमें एक अच्छा नागरिक भी मनाने में मदद करते हैं। शिक्षक ही है जो छात्रों को जीवन का नया अर्थ सिखाता है।
वे हमें सही रास्ता दिखाते हैं और कुछ भी गलत करने से रोकते हैं। वे बाहर से देख सकते हैं। वे प्रत्येक छात्र की देखभाल करते हैं और उनके विकास की कामना करते हैं। उस छात्र को मत भूलो जो छात्र अपने शिक्षकों का सम्मान नहीं करता है। वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ता है। शिक्षक छात्र के व्यक्तित्व को ढालते हैं। वे एकमात्र नि:स्वार्थ व्यक्ति हैं जो खुशी-खुशी बच्चों को अपना सारा ज्ञान देते हैं।
शिक्षक विद्यार्थियो के जीवन के वास्तविक निमार्ता होते हैं जो न सिर्फ हमारे जीवन को आकार देते हैं। बल्कि हमें इस काबिल बनाते हैं कि हम पूरी दुनिया में अंधकार होने के बाद भी प्रकाश की तरह जलते रहें। शिक्षक समाज में प्रकाश स्तंभ की तरह होता है। जो अपने शिष्यों को सही राह दिखाकर अंधेरे से प्रकाश की और ले जाता है। शिक्षकों के ज्ञान से फैलने वाली रोशनी दूर से ही नजर आने लगती है। इस वजह से हमारा राष्ट्र ढेर सारे प्रकाश स्तंभों से रोशन हो रहा है। इसलिये देश में शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है।
शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के रिश्तों को सुदृढ़ करने को शिक्षक दिवस एक बड़ा अवसर होता है। पुराने समय में शिक्षकों को चरण स्पर्श कर सम्मान दिया जाता था। परन्तु आज के समय में शिक्षक और छात्र दोनो ही बदल गये हैं। पहले शिक्षण एक पेशा ना होकर एक उत्साह और एक शौक का कार्य था। पर अब यह मात्र एक आजीविका चलाने का साधन बनकर रह गया है। शिक्षक एक व्यक्ति के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। शिक्षक एक मार्गदर्शक, गुरु, मित्र होने के साथ ही और कई भूमिकाएं निभाते है। यह विद्यार्थी के उपर निर्भर करता है कि वह अपने शिक्षक को कैसे परिभाषित करता है। संत तुलसी दास के ने इसे नीचे के पंक्तियों में बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया है।
संत तुलसी दास ने बताया है कि भगवान, गुरु एक व्यक्ति को वैसे ही नजर आयेंगे जैसा कि वह सोचेगा। उदहारण के लिए अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को अपना मित्र मानते थे। वही मीरा बाई भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रेमी। ठीक इसी प्रकार से यह शिक्षक के उपर भी लागू होता है। इसीलिए कहते हैं कि शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है। शिक्षक दिवस को स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षक और विद्यार्थियों के द्वारा बहुत ही खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन विद्यार्थियों से शिक्षकों को ढ़ेर सारी बधाइयां मिलती है।
भारत में शिक्षक दिवस शिक्षकों के सम्मान में मनाया जाता है। शिक्षक पूरे वर्ष मेहनत करते है और चाहते है कि उनके छात्र विद्यालय और अन्य गतिविधियों में अच्छा प्रदर्शन करें। शिक्षक दिवस पर पूरे देश के विद्यालयों में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। दुनिया के एक सौ से अधिक देशों में अलग-अलग समय पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत में भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस पांच सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस को 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जतायी थी। देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही किताबें पढ़ने के शौकीन थे और स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित थे। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान शिक्षक थे। जिन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन पेशे को दिया है।
वो विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षकों के योगदान और भूमिका के लिये प्रसिद्ध थे। इसलिए वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शिक्षकों के बारे में सोचा और हर वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रुप में मनाने का अनुरोध किया। उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को चेन्नई में हुआ था। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन पेशे में प्रवेश करने के साथ ही दर्शनशास्त्र शिक्षक के रुप में अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने बनारस, चेन्नई, कोलकाता, मैसूर जैसे कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों तथा विदेशों में लंदन के आक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र पढ़ाया था।
अध्यापन पेशे के प्रति अपने समर्पण की वजह से उन्हें 1949 में विश्वविद्यालय छात्रवृत्ति कमीशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। हर देश में इस दिवस को मनाने की तारीख अलग-अलग है। चीन में 10 सितंबर तो अमेरिका में छह मई, आॅस्ट्रेलिया में अक्तूबर का अंतिम शुक्रवार, ब्राजील में 15 अक्तूबर और पाकिस्तान में पांच अक्तूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसके अलावा ओमान, सीरिया, मिस्र, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, सऊदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और कई इस्लामी देशों में 28 फरवरी को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
वर्तमान समय में शिक्षकों का समाज में सम्मान कम होने लगा है। बहुत से शिक्षकों की घटिया हरकतों ने उनको समाज की नजरों से गिरा दिया है। स्कूल, कालेजों में छात्र, छात्राओं के साथ शिक्षकों द्वारा नीच हरकत करने के चलते शिक्षण जैसा पवित्र कार्य बदनाम होता जा रहा है। मौजूदा दौर में शिष्य भी कुछ कम नहीं हैं। छात्रों की अनुशासनहीना के चलते स्कूल, कालेजों में शिक्षा का वातावरण समाप्त होता जा रहा है। गुरु-शिष्य को एक दूसरे की भावनाओं को समझ कर मिलजुल कर ज्ञान की ज्योति जलानी होगी। शिक्षक दिवस मनाने के साथ हमें शिक्षण कार्य की पवित्रता को फिर से बहाल करने की प्रतिज्ञा भी लेनी होगी। तभी हमारा शिक्षक दिवस मनाना सार्थक हो पायेगा। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की चर्चित मदरसा जामिया हबीबिया मस्जिदे आजम जाली नोट छाप जाने के मामले में जांच के दायरे में है। जांच के क्रम में मदरसा को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। इस मदरसे में छापेमारी के दौरान पुलिस टीमों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी कई किताबें मिली हैं।
मदरसे के प्रिंसिपल मौलवी मोहम्मद तफसीरुल आरीफीन के कमरे में आरएसएस पर लिखी गई आपत्तिजनक किताबें और तस्वीरें मिलने पर मामला गंभीर हो गया है। मदरसे के प्रिंसिपल के कमरे से उर्दू भाषा में भड़काऊ साहित्य पाया गया। बरामद उर्दू साहित्य के अनुसार आरएसएस मुल्क में सबसे दहशतगर्द तंजीम है और बरामद किताब में आरएसएस के खिलाफ कई भड़काऊ लेख हैं, आरएसएस को किताब मे आतंकी संगठन बताया गया है।
देश में हुए कई आतंकी घटनाओं का भी किताब में जिक्र किया गया है। महाराष्ट्र पुलिस के रिटायर्ड मुस्लिम पुलिस आधिकारी ने इस भड़काऊ किताब को लिखा है। जांच एजेंसियां उर्दू साहित्य से जुड़ी किताब की भी पड़ताल कर रही हैं। इन किताबों के जरिए मदरसे के बच्चों का ब्रेनवॉश किया जाता था। यूपी में मदरसों के आतंकी कनेक्शन को लेकर अक्सर आरोप लगाते रहते हैं, लेकिन संगम नगरी प्रयागराज के एक मदरसे से ऐसा सनसनीखेज खुलासा हुआ है, जो हैरान कर देने वाला है।
यह मदरसा नकली नोट छापने का कारखाना बना हुआ था। प्रयागराज पुलिस ने मदरसे से संचालित होने वाले नकली नोट छापने के गिरोह का पर्दाफाश करते हुए चार सदस्यों को गिरफ्तार किया था। नकली नोट छापने का कारखाना बना यह मदरसा प्रयागराज शहर के अतरसुइया इलाके में स्थित है, मदरसे का नाम जामिया हबीबिया है,यहां बड़ी संख्या में छात्र तालीम हासिल करते हैं, मदरसे के एक हिस्से में मस्जिद भी है।
दरअसल, मदरसे में 28 अगस्त को पुलिस ने छापेमारी की। इस छापेमारी के दौरान चौंकाने वाले खुलासे हुए, छापेमारी के दौरान पुलिस को सिर्फ जाली नोट और जाली नोट छापने की मशीन ही नहीं मिली थी, बल्कि पुलिस को कुछ आपत्तिजनक किताबें भी मिली हैं, न्यूज एजेंसियो को पुलिस छापेमारी के दौरान की एक्सक्लूसिव तस्वीरें मिली हैं। ऐसी ही एक किताब इस मदरसे में मिली, जिसमें आरएसएस के विरुद्ध बातें लिखी हुई हैं।
ये किताब महाराष्ट्र के पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एसएम मुशर्रफ द्वारा लिखी गयी है,जानकारी के लिए बता दें कि महाराष्ट्र के रिटायर्ड आईजी मुशर्रफ ने मुंबई 26/11 को लेकर भी कई आपत्तिजनक किताबें लिखीं थीं, ये सभी किताबें आनलाइन भी बिक रही हैं। अब प्रश्न उठता है कि संघ को आतंकी संगठन बताते हुए लिखी इस किताब का मकसद क्या था? इसकी पुलिस जांच कर रही है, लेकिन सूत्रों की मानें तो इस मदरसे में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, झारखंड समेत कई राज्यों के नौजवान पढ़ने के लिए आते थे।
ऐसे में संघ के विरुद्ध जहर घोलने वाले किताब की मदरसे से बरामदगी और मदरसे में जाली नोट की फैक्टरी का क्या कनेक्शन है, पुलिस इस मामले की जांच कर रही है, पुलिस ये जांच भी कर रही है कि क्या मदरसे में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के दिमाग में संघ के विरुद्ध जहर तो नहीं भरा जा रहा था। पुलिस आरोपितों पर एनएसए लगाने की तैयारी में है। (लेखक, इतिहास के प्राध्यापक एवं इतिहास संकलन समिति के पदाधिकारी हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। ये विषय देश की आंतरिक सुरक्षा, सद्भाव और परस्पर समरसता से जुड़ा है। अभी लगातार दो तरह की घटनाएं घटती दिख रही हैं, एक तरफ राहुल गांधी स्वयं से नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं तो दूसरी ओर जेएनयू जैसे शिक्षा संस्थान और स्वयंसेवी संस्थाएं हैं जिन्हें टूलकिट के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। उद्देश्य दोनों का समान है, भारत में अराजकता का माहौल पैदा करना।
वर्तमान केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास की भावना आम जन में भर देना ताकि किसी भी तरह से देश में दंगे-फसाद कराये जा सकें और फिर किसी तरह से वर्तमान नेतृत्व को सत्ता से बाहर कर सत्ता हथियाई जा सके। वैसे देश की एकता, अखण्डता एवं समरसता के लिए पहले भी न्यायालय कई विषयों पर आगे से स्वत: संज्ञान लेकर हस्तक्षेप करता रहा है। इस मुद्दे पर भी माननीय न्यायालय से आग्रह है कि वह आगे आये। देश में घटनाएं कैसे घट रही हैं, आप देखिये; पहले, राहुल गांधी का एक वीडियो सामने आता है, इसे उत्तरप्रदेश के प्रयागराज में संविधान सम्मान सम्मेलन का बताया जा रहा है।
इस सम्मेलन में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मिस इंडिया कॉन्टेस्ट को लेकर यह दावा करते नजर आ रहे हैं कि देश में नब्बे प्रतिशत लोग सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं, कह रहे हैं, मैं तो मिस इंडिया की लिस्ट देख रहा था, उसमें कोई दलित-ओबीसी-आदिवासी, अल्पसंख्यक ही नहीं है। उनके पास हर तरह की प्रतिभा मौजूद है, लेकिन फिर भी वे सिस्टम से जुड़े नहीं हैं। यही कारण है कि हम जाति जनगणना की मांग कर रहे हैं। उनका ये बयान सामने आने के बाद मीडिया ने भी इसे तेजी के साथ आगे बढ़ाया।
स्वाभाविक है, जो आंकड़ों में नहीं जाते, अध्ययन करने पर कम, अपने नेता या वरिष्ठ के कहे पर विश्वास अधिक करते हैं। जो साक्षर हैं किंतु शिक्षित नहीं, वस्तुत: देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं। अब ऐसे में राहुल गांधी का दयिा ये बयान उन्हें सही नजर आ सकता है! स्वभाविक तौर पर उनके मन में आक्रोश भी पनप सकता है कि बताओ, स्वाधीनता के 77 वर्ष बाद भी देश में अनुसूचित जाति-जनजाति, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को उनका अधिकार क्यों नहीं दिया गया है, बल्कि अभी पर कुछ चुनिंदा अपने में तथाकथित बड़ी जातियों ने कब्जा करके रखा है!
किंतु क्या राहुल गांधी यहां जो कह रहे हैं वह सच है माननीय न्यायालय आप जानते हैं कि राहुल गांधी यहां जूठ बोल रहे हैं। देश में सिर्फ मिस इंडिया ही नहीं अनेक प्रमुख प्रतिष्ठित स्थानों पर अजा, जनजा, अल्पसंख्यक लोग विराजमान रहे हैं और वर्तमान में भी हैं। इस संदर्भ में अनेक तथ्य मौजूद हैं, जैसेकि भारतीय जनता पार्टी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने स्वाधीनता के बाद से अब तक उन महिलाओं की सूची साझा की है, जिन्होंने मिस इंडिया का क्राउन पहना है।
इस लिस्ट को जारी करते हुए तजिंदर बग्गा ने एक्स पर लिखा भी कि इस देश में मिस इंडिया कॉन्टेस्ट 1947 में शुरू हुई, उसमें अल्पसंख्यक समाज की कई बहनें विजेता बनी। उन्होंने जो लिस्ट साझा करते हुए एस्टर विक्टोरिया अब्राहम, इंद्रानी रहमान, फेरिअल करीम से लेकर नायरा मिर्जा, अंजुम मुमताज, फरजारा हबीब, सोनू वालिया, गुल पनाग, साराह जेन डायस, नवनीत कौर ढिल्लन तक के नामों का उल्लेख किया है। वस्तुत: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी इतना कहने के बाद भी चुप नहीं रहे हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर बड़े आरोप लगा दिए । इसी संविधान सम्मान सम्मेलन कार्यक्रम में बोलते दिखे कि संविधान की रक्षा, दलित, आदिवासी, ओबीसी करते हैं।
यहां प्रश्न यह है कि क्या अन्य जन जो इस सूची से बाहर हैं, वह संविधान की रक्षा नहीं करते फिर उनका यहां यह कहना कि देश के उद्योगपति में कोई दलित आदिवासी नहीं, मोची, धोबी और बढ़ई के हाथों में जबरदस्त स्किल है, पर देश में हुनर की इज्जत नहीं ह, कितना सही है आगे वे कहते दिखे, स्किल डेवेलमेंट की शुरूआत यूपीए ने की थी किंतु 90 प्रतिशत लोग सिस्टम से बाहर बैठे हैं। पीएम मोदी राजा-महाराजा वाला मॉडल चाहते हैं।
अब माननीय न्यायालय आप देखिये, यह संविधान बचाने के नाम पर देश को किस-किस तरह से आपस में यहां के जनसमुदायों को जाति के आधार पर भिड़ाने की कोशिश की जा रहे हैं! जबकि हकीकत यही है कि देश में अनेक उद्योगपति हैं, जोकि अजा, जनजा, पिछड़ावर्ग से आते हैं और वे अपने व्यवसाय में पूरी तरह से सफल हैं। यहां भी राहुल का इस संबंध में किया दावा गलत ठहरता है। इस वक्त राहुल गांधी जिस तरह से आबादी के हिसाब से नीतियां बनाने की बात कह रहे हैं, हम सभी जानते हैं कि वह साम्यवाद का वामपंथी मॉडल है, जो कहता है कि सभी को उनकी जनसंख्या के हिसाब से लाभ मिले।
दरअसल, सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है।
किंतु इस मॉडल के अनेक खतरे हैं। पूरी दुनिया इस मॉडल को रिजेक्ट कर चुकी है, यहां तक कि जहां से वामपंथ शुरू हुआ था, वह देश वियतनाम, चीन, जर्मनी, रूस या अन्य कोई देश क्यों न हो। सभी का अनुभव इस मामले में एक जैसा ही है कि यह नीति अपने देश की बहुजनसंख्या को निकम्मा बना देने का काम करती है। अब इस सिद्धांत से चलेंगे तो जो काम करेगा उसे भी उतना ही भाग मिलेगा जितना कि बगैर काम करनेवाले को। ऐसे में योग्य लोगों की जब प्रतिभा का ह्रास होता दिखेगा तो फिर कौन काम करना चाहेगा समाज की व्यवस्था अपने आप डगमगा जायेगी। समाज की श्रम और क्रय शक्ति कमजोर होगी तो स्वभावकि है कि देश कमजोर हो जायेगा।
अभी ये घटना घटी ही थी कि एक दूसरी घटना का वीडियो सामने आया, अबकी बार ये जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से बाहर आया था, जिसमें कि जेएनयू के अंदर आजादी-आजादी वाले फिर गूंजे हैं। यहां प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने कथित तौर पर हिंदू राष्ट्र से आजादी और रामराज्य से आजादी के नारे लगाये हैं। यहां लगे नारों को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जेएनयू ईकाई के अध्यक्ष राजेश्वर कांत दुबे ने इसके संबंध में खुलकर बताया भी है कि कैसे कुछ वामपंथी अपना प्रोटेस्ट करते हैं और उसमें स्टूडेंट के हित को लेकर के नारे नहीं लगाते, बल्कि सनातन हिन्दू धर्म के खिलाफ ये नारे लगाते हैं।
राजेश्वर कांत दुबे बताते हैं कि जेएनयू में छात्रों की मांगों को लेकर प्रदर्शन कई दिनों से चल रहा था। इसी के तहत कुछ वामपंथी और कांग्रेसियों ने एमओई तक मार्च निकाला। इसमें छात्रों की मांगों को लेकर नारेबाजी नहीं हुई, बल्कि उसमें सनातन हिंदू धर्म के विरोध में नारे लगे। उसमें भारत के खिलाफ भी नारे लगाये गये हैं। अब माननीय न्यायालय आप ही देखें, भारत में कौन सा हिंदू राष्ट्र बन रहा है और कौन सा राम राज्य आ गया जो यह नारे लगाकर एक बहुसंख्यक समाज को विचलित कर देने का प्रयास किया जा रहा है! इसके पीछे के लोगों की आप पड़ताल करेंगे तो मालूम हो जाएगा कि इनके और राहुल गांधी के अंतरंग संबंध कितने गहरे हैं!
वास्वत में लगातार जहर उगल रहे राहुल गांधी बहुसंख्यक हिन्दू समाज को कई टुकड़ों में विभाजित कर देने के षड्यंत्र में रचे-बसे नजर आ रहे हैं। जोकि नेता प्रतिपक्ष होने के नाते अति गंभीर मामला है, जिस पर कि अतिशीघ्र रोक लगना जरूरी है। यहां यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि विरोध का मतलब यह कदापि नहीं हो सकता कि देश को कमजोर किया जा सके, वह कोई भी हो, एक जिम्मेदार पद पर बैठकर देश को कमजोर करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती है। माननीय न्यायालय अब आपसे ही आस है। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। देश के सर्वोच्च न्यायालय की चिंता और लगभग पूरे देश के रोष के बाद भी राजनीति पश्चिम बंगाल में कुछ लोगों का कवच बनी हुई है। कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रशिक्षु महिला चिकित्सक की यौन हिंसा के बाद हुई हत्या ने एक बार फिर साबित किया है कि समूचे देश में कामकाजी महिलाओं के लिये कार्यस्थल पर परिस्थितियां कितनी असुरक्षित हैं। वह भी इतनी भयावह कि कार्यस्थल पर ही प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के साथ यह सब वीभत्स घट जाता है। निश्चित रूप से कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न मानव अधिकारों का सरासर उल्लंघन ही है।
कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए सुरक्षा अनुकूल वातावरण बनाने के मद्देनजर विशाखा दिशा-निर्देश जारी करने के 27 साल बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को डॉक्टरों की सुरक्षा को संस्थागत बनाने के लिए तुरंत कदम उठाने के निर्देश दिये हैं। वहीं दूसरी ओर देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देश के अनुपालन हेतु गठित एक राष्ट्रीय टास्क फोर्स को चिकित्सा पेशवरों की सुरक्षा, महिला चिकित्सकों के लिये अनुकूल कामकाजी परिस्थितियां बनाने तथा उनके हितों की रक्षा के लिये प्रभावी सिफारिशें तैयार करने का काम सौंपा गया है।
विश्वास किया जाना चाहिए कि ये सिफारिशें यदि जमीनी स्तर पर भी प्रभावी साबित हुईं तो किसी भी पेशे में कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिये असरकारी साबित होंगी। लेकिन यह तभी संभव है जब सभी हितधारक एक स्तर पर एकजुट होकर इस दिशा में काम करेंगे। निस्संदेह, किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना होने के वक्त तमाम तरह के उपक्रम होते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
और यही वजह है कि नयी कार्ययोजना बनाते समय इस बात का आकलन करने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है कि महिला सुरक्षा को लेकर मौजूदा कानून और दिशा-निर्देश जमीनी स्तर पर बदलाव लाने में कितने सफल रहे हैं। सही मायनों में कानून बनाने और दिशा-निर्देश जारी करने से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका अनुपालन कितने पारदर्शी व संवेदनशील दृष्टि से किया जाता है। साथ ही विगत के अनुभवों से भी सबक लेकर आगे बढ़ने की जरूरत है।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद देश में कोलकाता कांड में भी उसी तरह की तल्ख प्रतिक्रिया सामने आयी है। जिसके बाद आवश्यकता महसूस की गई कि ऐसे क्रूर अपराधियों को सख्त से सख्त सजा देने वाले कानून लाये जायें। कालांतर देश में यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम अस्तित्व में आया। दरअसल, महिलाओं के लिये सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ ही विशाखा दिशा-निर्देशों के विस्तार के रूप में इसे अधिनियमित किया गया।
यहां उल्लेखनीय है कि पिछले साल, देश की शीर्ष अदालत ने इस अधिनियम के क्रियान्वयन के संबंध में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया था। साथ ही इससे जुड़ी अनिश्चितताओं की ओर भी संकेत दिया था। इसके उदाहरण के रूप में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये केंद्र सरकार द्वारा स्थापित निर्भया फंड अक्सर नकारात्मक कारणों से सुर्खियों में रहा है। जिसमें आवंटित धन का पर्याप्त रूप में उपयोग न करना या फिर इस आवंटित धन का दुरुपयोग होना शामिल है।
करीब एक दशक में देश के विभिन्न राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के लिये महिला सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये आवंटित धनराशि का लगभग छिहत्तर प्रतिशत धन ही खर्च हो पाया है। निश्चित रूप से महिला सुरक्षा की ऐसी चुनौतियों के बीच कम धन का खर्च होना एक विडंबना ही कही जायेगी। वहीं इस दौरान देश में दर्ज किये गये बलात्कार के मामलों की संख्या में केवल नौ प्रतिशत की ही गिरावट दर्ज की गयी है। निश्चित रूप से महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शुरू की जाने वाली किसी भी नयी पहल पर इन तमाम गंभीर तथ्यों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
इसमें दो राय नहीं कि महिलाओं की सुरक्षा और कार्यबल में उनकी बड़ी भागीदारी तब तक अधूरी कही जायेगी, जब तक हम न केवल अपराधियों के खिलाफ बल्कि उन अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई नहीं करते, जो अपने कर्तव्य पालन में लापरवाही के लिये दोषी पाये जाते हैं। (लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। क्या आप जानना चाहते हैं कि भारत में ब्लू-कॉलर वर्कर्स कितना कमाते हैं? एक नई रिपोर्ट बताती है कि देश में ज्यादातर ब्लू-कॉलर वर्कर्स को इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि वे अपने घर, दवाई और बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी कामों के लिए भी पैसे नहीं जुटा पाते।
ब्लू-कॉलर नौकरियों में आमतौर पर हाथों से काम करना होता है, जैसे फैक्ट्री में काम करना या कोई भी काम जो आॅफिस में नहीं होता। इनमें निर्माण, उत्पादन, मरम्मत और खनन जैसे काम शामिल हो सकते हैं। पहले लोग सोचते थे कि ब्लू-कॉलर काम करने वाले लोग कम पढ़े-लिखे होते हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं है। आजकल कई ब्लू-कॉलर नौकरियों के लिए खास ट्रेनिंग और तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है।
वर्क इंडिया नाम की एक कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 57.63% से ज्यादा ब्लू-कॉलर नौकरियों में महीने के 20,000 रुपये या उससे कम की कमाई होती है। इसका मतलब है कि बहुत सारे ब्लू-कॉलर वर्कर्स को बहुत कम पैसे मिलते हैं, जिससे उनके लिए घर का किराया, दवाई और बच्चों की पढ़ाई जैसे जरूरी कामों के लिए पैसे जुटाना मुश्किल हो जाता है।
हालांकि ज्यादातर ब्लू-कॉलर वर्कर्स को कम पैसे मिलते हैं, लेकिन कुछ नौकरियों में अच्छी कमाई होती है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ काम ऐसे हैं जिनमें 40,000 रुपये से ज्यादा कमाया जा सकता है :
इनमें से बहुत सारे ब्लू-कॉलर वर्कर्स, खासकर 18 से 30 साल के, ज्यादा पैसे कमाने और अच्छी जिंदगी जीने के लिए बहुत मेहनत वाले काम करते हैं, जैसे निर्माण, फैक्ट्री में काम करना, या घर का काम। ज्यादा कमाई के लिए ये लोग अपने देश को छोड़ने में गुरेज नहीं करते।
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