एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाल दिवस केवल भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के अधिकांश देशों में मनाया जाता है। भारत में बाल दिवस प्रतिवर्ष 14 नवम्बर को मनाया जाता है लेकिन बच्चों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिवस 20 नवम्बर को मनाया जाता है। यह दिवस हमें बच्चों के अधिकारों की वकालत करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए प्रेरित करता है। इस वर्ष यह दिवस प्रत्येक बच्चे के लिए प्रत्येक अधिकार विषय के साथ मनाया जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर देता है कि सभी बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, सुरक्षा और सुरक्षित वातावरण सहित उनके मौलिक अधिकारों तक पहुंच हो।
वैश्विक स्तर पर इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दुनियाभर में बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार करना, उनकी समस्याओं को हल करना, उनके कल्याण के लिए काम करना तथा अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को बढ़ावा देना है। बाल दिवस दुनियाभर में 190 से ज्यादा देशों में मनाया जाता है और अनेक देशों में इसे मनाने की तारीखें अलग-अलग हैं। जनवरी माह से लेकर दिसम्बर तक हर माह किसी न किसी देश में बाल दिवस का आयोजन होता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 20 नवम्बर 1954 को अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस मनाये जाने की घोषणा की गयी थी, जिसका उद्देश्य यही था कि इस विशेष दिन के माध्यम से अलग-अलग देशों के बच्चे एक-दूसरे के साथ जुड़ सकें, जिससे उनके बीच आपसी समझ तथा एकता की भावना मजबूत हो सके।
सर्वप्रथम बाल दिवस जेनेवा के इंटरनेशनल यूनियन फॉर चाइल्ड वेलफेयर के सहयोग से विश्वभर में अक्तूबर 1953 में मनाया गया था। विश्वभर में बाल दिवस मनाये जाने का विचार वीके कृष्ण मेनन का था, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1954 में अपनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्वभर के तमाम देशों से अपील की गई थी कि वे अपनी परम्पराओं, संस्कृति तथा धर्म के अनुसार अपने लिए कोई ऐसा दिन सुनिश्चित करें, जो सिर्फ बच्चों को ही समर्पित हो।
वैसे तो बाल दिवस मनाये जाने की शुरुआत वर्ष 1925 से ही हो गयी थी लेकिन वैश्विक रूप में देखें तो इसे दुनियाभर में मान्यता मिली 1953 में।दुनियाभर में बाल दिवस के माध्यम से लोगों को बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल मजदूरी इत्यादि बच्चों के अधिकारों के प्रति जगरूक करने का प्रयास किया जाता है। माना जाता है कि सबसे पहले बाल दिवस तुर्की में मनाया गया था।
आइये देखते हैं कि दुनियाभर में किन देशों द्वारा कब बाल दिवस मनाया जाता है। जनवरी के पहले शुक्रवार को बहामास में 11 जनवरी को ट्यूनिशिया, जनवरी के दूसरे शनिवार को थाईलैंड, फरवरी के दूसरे रविवार कुक द्वीप समूह, नाउरू, निउए, टोकेलौ तथा केमन द्वीप समूह में 13 फरवरी को म्यांमार, मार्च के पहले रविवार को न्यूजीलैंड, 17 मार्च को बांग्लादेश, 4 अप्रैल को चीनी ताइपे, हांगकांग, 5 अप्रैल को फिलीस्तीन, 12 अप्रैल को बोलिविया तथा हैती, 23 अप्रैल को तुर्की, 30 अप्रैल को मेक्सिको, 5 मई को दक्षिण कोरिया तथा जापान, मई के दूसरे रविवार को स्पेन तथा यूके, 10 मई को मालदीव, 17 मई को नार्वे, 27 मई को नाईजीरिया, मई के आखरी रविवार को हंगरी, 1 जून को चीन सहित कई देशों में बाल संरक्षण दिवस के रूप में, 1 जुलाई को पाकिस्तान, जुलाई के तीसरे रविवार को क्यूबा, पनामा, वेनेजुएला, 23 जुलाई को इंडोनेशिया, अगस्त के पहले रविवार को उरुग्वे, 16 अगस्त को पैराग्वे, अगस्त के तीसरा रविवार को अर्जेंटीना तथा पेरू, 9 सितंबर कोस्टा रीका, 10 सितंबर को हौंडुरस, 14 सितंबर को नेपाल, 20 सितंबर को आस्ट्रिया तथा जर्मनी, 25 सितंबर को नीदरलैंड, 1 अक्तूबर को अल साल्वाडोर, ग्वाटेमाला तथा श्रीलंका, अक्तूबर के पहले बुधवार को चिली, अक्तूबर के पहले शुक्रवार को सिंगापुर, 8 अक्तूबर को ईरान, 12 अक्तूबर को ब्राजील, अक्तूबर के चौथे शनिवार को मलेशिया, अक्तूबर के चौथा रविवार को आस्ट्रेलिया, नवम्बर के पहले शनिवार को दक्षिण अफ्रीका, 20 नवंबर को अजरबैजान, कनाडा, साइप्रस, मिस्र, इथियोपिया, फिनलैंड, फ्रांस, यूनान, आयरलैंड, इजराइल, केन्या, मैसिडोनिया, नीदरलैंड, फिलीपींस, सर्बिया, स्लोवेनिया, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, संयुक्त अरब अमीरात, त्रिनिदाद व टोबेगो, 5 दिसंबर को सूरीनाम, 23 दिसंबर को सूडान तथा 25 दिसम्बर कांगो गणराज्य, कैमरून तथा भूमध्यरेखीय गिनी में बाल दिवस का आयोजन किया जाता है।
बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस पर हमें यह समझने का अवसर प्रदान करता है कि बच्चों का भविष्य उनके आज पर निर्भर करता है, जिसके लिए हमें ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, बालश्रम और शोषण के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, बच्चों को उनकी प्रतिभा को निखारने के पर्याप्त अवसर मिलें, उन्हें सुरक्षित, स्वस्थ और पोषित वातावरण उपलब्ध कराया जाए। भारत में बच्चों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए कई कानून और योजनाएं लागू हैं, जिनमें बाल श्रम निषेध और विनियमन अधिनियम 1986, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, पॉक्सो एक्ट 2012 प्रमुख रूप से शामिल हैं।
मिड-डे मील योजना और आंगनवाड़ी सेवा जैसी योजनाएं भी बच्चों के पोषण और शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अपनी-अपनी सहूलियत के आधार पर विभिन्न देशों द्वारा भले ही अलग-अलग तारीखों पर बाल दिवस मनाया जाता है लेकिन हर जगह बाल दिवस मनाए जाने का मूल उद्देश्य यही है कि इसके जरिये लोगों को बच्चों के अधिकारों तथा सुरक्षा के लिए जागरूक किया जा सके और बच्चों से जुड़े मुद्दों का समाधान किया जा सके। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नॉर्वे ने आपातकालीन पुस्तिकाएं भी जारी कीं जिसमें लोगों को संपूर्ण युद्ध सहित किसी आपातकालीन स्थिति में एक सप्ताह तक प्रबंधन करने की सलाह दी गयी। रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन-रूस युद्ध को खतरनाक रूप से बढ़ाते हुए यूक्रेनी बलों ने मंगलवार देर रात रूस के ब्रांस्क क्षेत्र में छह अमेरिकी निर्मित लंबी दूरी की मिसाइलें दागीं।
इसे मॉस्को द्वारा एक बड़े उकसावे के रूप में देखा जायेगा और एक जोरदार जवाबी कार्रवाई की संभावना है। कई नाटो देश अपने नागरिकों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कह रहे हैं। परमाणु युद्ध का खौफनाक खतरा पहले से कहीं ज्यादा नजदीक नजर आ रहा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उस सीमा को कम कर दिया जब रूस परमाणु हथियारों का उपयोग कर सकता था। यह तब हुआ जब यूक्रेन ने रूस के अंदर लक्ष्यों पर लंबी दूरी की छह अमेरिकी मिसाइलें दागीं।
नाटो देशों ने युद्ध की आशंका गहराने की आशंका को भांपते हुए अपने नागरिकों को पर्चे जारी किये, जिसमें उन्हें युद्ध की तैयारी करने की सलाह दी गयी। द मिरर आफ यूके के अनुसार, पैम्फलेट में स्वीडन ने परमाणु युद्ध छिड़ने की आशंका के बीच अपने निवासियों को आश्रय लेने की चेतावनी दी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से केवल पांच बार जारी किया गया यह पैम्फलेट प्रत्येक स्वीडिश घर में भेजा गया है।
नॉर्वे ने आपातकालीन पुस्तिकाएं भी जारी कीं जिसमें लोगों को संपूर्ण युद्ध सहित किसी आपातकालीन स्थिति में एक सप्ताह तक प्रबंधन करने की सलाह दी गयी। रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन-रूस युद्ध को खतरनाक रूप से बढ़ाते हुए, यूक्रेनी बलों ने मंगलवार देर रात रूस के ब्रांस्क क्षेत्र में छह अमेरिकी निर्मित लंबी दूरी की मिसाइलें दागीं। इसे मॉस्को द्वारा एक बड़े उकसावे के रूप में देखा जायेगा और एक जोरदार जवाबी कार्रवाई की संभावना है।
कई नाटो देश अपने नागरिकों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कह रहे हैं। डेनमार्क ने पहले ही अपने नागरिकों को सूखे राशन, पानी और दवाओं का स्टॉक रखने के लिए ईमेल भेज दिया है ताकि वे परमाणु हमले सहित तीन दिनों की आपात स्थिति का प्रबंधन कर सकें। फिनलैंड ने भी बढ़ते रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच घटनाओं और संकटों की तैयारी पर अपने आनलाइन ब्रोशर को अपडेट किया।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वायु प्रदूषण से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोग हलकान हैं। दिल्ली के आसपास सांस लेना कठिन है। हवा विषाक्त हो गयी है। एक्यूआई अपने उच्चतम स्तर पर है। जहरीली वायु उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में प्रभाव डाल रही है। अजरबैजान की राजधानी बाकू में पर्यावरण को लेकर सीओपी 29 सम्मेलन चल रहा है। वहां पर्यावरणविदों ने दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक पर गंभीर चर्चा की है।
सरकार ने भी नये निर्माण रोकने, गैर बीएस6 डीजल बसों पर रोक जैसे कठोर कदम उठाये हैं। लेकिन आगे की राह कठिन है। अभी और कड़े निर्णयों की आवश्यकता है। हम सब पृथ्वी पुत्र हैं। पृथ्वी ही पालती है। यही पोषण करती हैं। दूषित पर्यावरण से पृथ्वी का अस्तित्व संकट में है। वायु प्राण हैं। प्राण नहीं तो जीवन भी नहीं। सारी दुनिया का ताप बढ़ रहा है। रामकथा के अनुसार श्रीराम का जन्म पृथ्वी को निशिचर विहीन और पृथ्वी का का कष्ट दूर करने के लिए हुआ था।
रामचरितमानस में तुलसीदास ने लिखा है, अतिशय देख धरम की हानी परम सभीत धरा अकुलानी-धर्म की ग्लानि को बढ़ते देख कर पृथ्वी भयग्रस्त हुई और देवताओं के पास जा पहुंची। उसने देवों को अपना दुख सुनाया-निज संताप सुनाइस रोई-पृथ्वी ने रोते हुए अपना कष्ट बताया। शंकर जी ने पार्वती जी को बताया कि वहां बहुत देवता थे। मैं भी उनमे से एक था-तेहि समाज गिरजा मैं रहेऊ।
रामचरितमानस के अनुसार आकाशवाणी हुई, हे धरती धैर्य रखो। मैं स्वयं सूर्य वंश में आऊंगा और तुमको भार मुक्त करूंगा। पृथ्वी भारतीय परंपरा में माता हैं। हम सबका आश्रय हैं। पृथ्वी को भार मुक्त करने के लिए परम सत्ता मनुष्य बनती है। पर्यावरण संरक्षण वैज्ञानिकों के सामने भी चुनौती है। कहा जा रहा है कि पृथ्वी के प्राकृतिक घटक अव्यवस्थित हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी दिवस हर साल आता है। इस महत्वपूर्ण दिवस पर कई संकल्प लिए गए। हिन्दुत्व की जीवन शैली में पर्यावरण संरक्षण अन्तर्निहित है।
भारत के प्राचीन काल में ही पृथ्वी के प्रति संवेदनशील प्रीति और श्रद्धा थी। वैदिक पूर्वजों ने जल को माताएं कहा था। उन्होंने पृथ्वी को माता और आकाश को पिता बताया था। ऋग्वेद में जल को बहुवचन रूप में माताएं कहा गया है। यूनानी दार्शनिक थेल्स ने जल को आदि तत्व बताया है। प्रकृति के 5 महाभूतों में जल एक महत्वपूर्ण महाभूत है। वायु प्रतिष्ठित देवता हैं ही। पूर्वजों ने वायु को अनेकश: नमस्कार किया है। वायु को शुद्ध बनाये रखना व्रत है। वायु मनुष्य शरीर में प्रवाहित है।
वैदिक साहित्य में जल को अतिरिक्त आदर दिया जाता रहा है। वैदिक समाज में जल वृष्टि के कई देवता हैं। ऋग्वेद (1.164) में कहते हैं, सत्कर्मों से समुद्र का जल ऊपर जाता है। वाणी जल को कंपन देती है। पर्जन्य वर्षा लाते हैं। भूमि आनंद मगन होती हैं। यहां मुख्य बात है कि सत्कर्म के कारण समुद्र का जल ऊपर जाता है। सत्कर्मों से ही वायु शुद्ध रहती है। ऋषि वायु से स्तुति करते हैं कि आप सुखद आशीष देते हुए प्रवाहमान रहें। सत्कर्म महत्वपूर्ण हैं। ऐसे कर्म सांस्कृतिक कर्तव्य हैं।
वर्षा पर्जन्य की कृपा हैं। पर्जन्य देव पृथ्वी, जल, वायु, नदी, वनस्पतियों और सभी प्राणियों के संरक्षण से प्रसन्न होते हैं। वैदिक देवता प्रकृति की महत्वपूर्ण शक्तियां हैं। उन्हें कई विभागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला द्युस्थानीय देवता हैं। द्यौ का ही एक रूप वरुण हैं। द्युस्थानीय देवताओं में द्यौ सबसे प्राचीन बताए गए हैं। आर्यों की ग्रीक शाखा के लोग ज्योस या जिअस के रूप में इस देवता की उपासना करते थे।
द्यौ का प्रकट रूप हैं आकाश। ऋषि राहुगण गौतम द्यच् को सबके पिता कहते हैं। इसी तरह वैदिक देवताओं का दूसरा विभाग है अंतरिक्ष स्थानीय देवता। ऋग्वेद के प्रतिष्ठित देवता इन्द्र इसी श्रेणी में आते हैं। इन्द्र मेघों में अवरुद्ध जल को मुक्त करते हैं। जल प्रवाह वर्षा द्वारा पृथ्वी की ओर आता है। मातरिस्वा, अपानपात आदि अंतरिक्ष स्थानीय देवता हैं। इनमें रूद्र मुख्य हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में रूद्र शिव को त्रयम्बक कहा गया है।
देवताओं के तीसरे वर्ग को पृथ्वी स्थानीय देवता कहा गया है। इस देव तंत्र में सोम अतिप्रतिष्ठित देवता हैं। ऋग्वेद के नौवें मण्डल के अधिकांश सूक्तों के देवता सोम हैं। सोम को सर्वश्रेष्ठ पेय बताया गया है और सर्वश्रेष्ठ औषधि भी। इसी श्रेणी में अग्नि देव भी आते हैं। ऋग्वेद में अग्नि सर्वशक्तिमान बताये गये हैं। बृहस्पति भी पृथ्वी स्थानीय देवता हैं। पृथ्वी भी पृथ्वी स्थानीय देवता हैं। नदियां भी देवता हैं। पूर्वजों के हृदय में पृथ्वी के प्रति माता का भाव है। अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कविता है।
कहते हैं कि यहां भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले लोग रहते हैं। माता पृथ्वी सबका पोषण करती हैं। दुनिया के तमाम विद्वानों ने पृथ्वी सूक्त की प्रशंसा की है। उत्तर वैदिक काल और महाकाव्यों में भी पृथ्वी की स्तुति है। महाभारत के एक प्रसंग में श्रीकृष्ण पृथ्वी की उपासना करते हैं। वे पृथ्वी से ही पूछते हैं कि आप किस तरह की उपासना से प्रसन्न होती हैं। स्वयं पृथ्वी ने उत्तर दिया कि तुम प्रति दिन चिड़ियों और निराश्रित पशुओं के लिए कहीं भी अन्न डाल दिया करो। मैं इसी में प्रसन्न होती हूं।
पृथ्वी संकट चुनौतीपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का अस्तित्व संकट में है। उत्तरी ध्रव और दक्षिणी ध्रुव में हमेशा बर्फ जमी रहती है। वह बर्फ पिघल रही है। पृथ्वी के एक भूखंड में खनिज, तेल और गैस भारी मात्रा में हैं। खनिज सम्पदा और गैस पाने के लिए तमाम देश लालायित रहते हैं। लेकिन वे पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने की चिंता नहीं करते। अधिक बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर ऊपर जायेगा। दुनिया खतरे में होगी। अंधाधुंध औद्योगिक विकास समस्या है। नगरीकरण सुनियोजित योजना के अनुसार नहीं है।
अनियोजित नगरीकरण से पर्यावरण का संकट बढ़ा है और जल, वायु प्रदूषण भी। हिन्दू अनुभूति के अनुसार पृथ्वी, जल, वायु, नदी, वनस्पति और सभी प्राणियों के संरक्षण से देवता प्रसन्न होते हैं। संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में मिस्र के शर्म अल शेख, इसके पहले स्कॉटलैण्ड के ग्लास्गो में भी सम्मेलन हुए थे। ब्राजील के रिओ डी जेनेरिओ नगर में पहला पृथ्वी सम्मेलन हुआ था। लेकिन अब तक के सारे आयोजन बेनतीजा रहे हैं। पृथ्वी माता व्यथित भयग्रस्त है। भूकम्प इसी के परिणाम हैं।
उपनिषद के ऋषियों ने वायु को प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है। यूनानी दार्शनिक अनक्सीमनस ने वायु को सृष्टि का आदि तत्व बताया है। उपनिषदों में रैक्व ने राजा जानश्रुति को वायु की महत्ता बतायी है लेकिन वायु विषाक्त और व्यथित हैं। यह बेचैनी तूफानों में प्रकट होती है। जल अशांत हैं। अतिवृष्टि अनावृष्टि इसी का परिणाम हैं। एक वैदिक मंत्र में स्तुति है, पृथ्वी शांत हों। अंतरिक्ष शांत हों। जल शांत हों। वनस्पतियां औषधियां शांत हों। शांति हमें शांति दें। हिन्दू जीवन स्वाभाविक ही पर्यावरण प्रेमी है।
पृथ्वी के सभी घटकों का संरक्षण राष्ट्रीय कर्तव्य है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया, अन्न से प्राणी हैं। अन्न वर्षा से होता है। वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ सत्कर्मों से होता है। यह साधारण यज्ञ नहीं है। इसमें सत्कर्म की महत्ता है। भारतीय संस्कृति का अधिष्ठान सत्कर्म हैं। सत्कर्मों का प्रसाद शुद्ध वायु है। (लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रभाव ने वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंताएं पैदा की हैं, इस बात पर बहस चल रही है कि क्या आयु प्रतिबंध इसके संभावित नुकसानों को प्रभावी ढंग से दूर कर सकते हैं या अनपेक्षित परिणामों को जन्म दे सकते हैं। साथियों के साथ बातचीत और समुदाय निर्माण की सुविधा देता है, सामाजिक कौशल विकास में सहायता करता है।
प्यू रिसर्च (2023) ने पाया कि 71% किशोर सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। युवाओं को पहचान तलाशने और खुद को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करता है। सोशल मीडिया इंटरनेट साइट्स और ऐप्स के लिए एक शब्द है जिसका उपयोग आप अपने द्वारा बनायी गयी सामग्री को साझा करने के लिए कर सकते हैं। सोशल मीडिया आपको दूसरों द्वारा पोस्ट की गयी सामग्री पर प्रतिक्रिया देने की सुविधा भी देता है। इसमें दूसरों द्वारा पोस्ट की गयी तस्वीरें, टेक्स्ट, प्रतिक्रियाएं या टिप्पणियां और जानकारी के लिंक शामिल हो सकते हैं।
सोशल मीडिया साइट्स के भीतर आनलाइन शेयरिंग कई लोगों को दोस्तों के संपर्क में रहने या नये लोगों से जुड़ने में मदद करती है और यह अन्य आयु समूहों की तुलना में किशोरों के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। दोस्ती किशोरों को उनकी पहचान बनाने में भूमिका निभाती है। इसलिए, यह सोचना स्वाभाविक है कि सोशल मीडिया का उपयोग किशोरों को कैसे प्रभावित कर सकता है। सोशल मीडिया बहुत से किशोरों के दैनिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा है।
कितना बड़ा 13 से 17 साल के बच्चों पर 2024 में किये गये एक सर्वेक्षण से इसका संकेत मिलता है। लगभग 1, 300 प्रतिक्रियाओं के आधार पर, सर्वेक्षण में पाया गया कि 35% किशोर दिन में कई बार से ज्यादा पांच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में से कम से कम एक का इस्तेमाल करते हैं। पांच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हैं: यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट। सोशल मीडिया सभी किशोरों को एक जैसा प्रभावित नहीं करता है। सोशल मीडिया का उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर स्वस्थ और अस्वस्थ प्रभावों से जुड़ा हुआ है। ये प्रभाव एक किशोर से दूसरे किशोर में अलग-अलग होते हैं। मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया का प्रभाव चीजों पर निर्भर करता है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट (2022) से पता चलता है कि सोशल मीडिया 62% किशोरों में आत्म-पहचान को बढ़ावा देता है। विशाल शैक्षिक संसाधनों तक पहुंच सक्षम करता है, डिजिटल साक्षरता और कौशल को बढ़ाता है। लिंक्डइन और फेसबुक युवाओं के लिए डिजिटल कौशल पर कार्यशालाएं प्रदान करते हैं। हाशिए के समूहों के लिए समर्थन और समझ पाने के लिए सुरक्षित स्थान बनाता है डब्ल्यूएचओ (2022) ने सीमित सोशल मीडिया एक्सपोजर वाले युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों में 20% की कमी की रिपोर्ट की है।
अनुचित या खतरनाक सामग्री के संपर्क को सीमित करता है, जिससे नकारात्मक प्रभावों के जोखिम कम होते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (2023) ने पाया कि सोशल मीडिया का उपयोग साइबर बुलिंग के जोखिम को 30% तक बढ़ाता है। युवा उपयोगकर्ताओं को लक्षित करने वाले शिकारी व्यवहार और शोषण के जोखिमों को कम करने में मदद करता है। नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन की 2023 की रिपोर्ट में युवाओं से जुड़े आनलाइन शोषण के मामलों में 15% की वृद्धि पर प्रकाश डाला गया है।
अत्यधिक स्क्रीन समय को नियंत्रित करता है, बेहतर स्वास्थ्य और आफलाइन जुड़ाव का समर्थन करता है। डिजिटल मीडिया पर दक्षिण कोरिया के नियम (2021) नाबालिगों में स्क्रीन की लत को सीमित करते हैं। आयु सत्यापन प्रणाली जैसे आयु प्रतिबंधों के अनपेक्षित परिणाम अक्सर दरकिनार कर दिये जाते हैं, जिससे प्रतिबंधों को लागू करना मुश्किल हो जाता है। यू.के. के अध्ययन (2022) से पता चलता है कि 30% किशोर न्यूनतम प्रयास से आयु जांच को दरकिनार कर देते हैं। आयु प्रतिबंध डिजिटल शिक्षा को सीमित कर सकते हैं, जिससे युवा जिम्मेदार आनलाइन बातचीत के लिए तैयार नहीं हो पाते।पहुंच को प्रतिबंधित करने से किशोर अलग-थलग पड़ सकते हैं, जिससे वे महत्त्वपूर्ण सामाजिक संवादों में शामिल नहीं हो पाते।
यूनिसेफ (2023) ने पाया कि सोशल मीडिया समावेशिता में मदद करता है, खासकर हाशिए पर पड़े समूहों के लिए। प्रमुख प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध युवाओं को कम विनियमित, संभावित रूप से अधिक हानिकारक साइटों की ओर धकेल सकते हैं। प्रतिबंध वाले देशों में, किशोर कम सुरक्षा नियंत्रण वाले आला प्लेटफॉर्म की ओर मुड़ गए हैं, जिससे जोखिम बढ़ गया है। डिजिटल साक्षरता और जागरूकता को बढ़ावा दें युवाओं को सुरक्षित आॅनलाइन प्रथाओं के बारे में शिक्षित करने के लिए स्कूलों में व्यापक डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम शुरू करें।
फिनलैंड का मीडिया साक्षरता सप्ताह छात्रों को डिजिटल सुरक्षा और आलोचनात्मक सोच में प्रशिक्षित करता है। माता-पिता को अपने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग की निगरानी और मार्गदर्शन करने में मदद करने के लिए संसाधन प्रदान करें। 2017 चाइल्ड आॅनलाइन प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क डिजिटल मार्गदर्शन में माता-पिता की भूमिका पर जोर देता है। उम्र सम्बंधी प्रतिबंधों के बजाय हानिकारक सामग्री को प्रतिबंधित करने पर ध्यान केंद्रित करें, जिससे सुरक्षित और संयमित उपयोग की अनुमति मिले।
जुआ और हिंसा जैसी सामग्री पर फ्रांस के 2022 के चुनिंदा प्रतिबंध पूर्ण प्रतिबंध के बिना युवाओं की रक्षा करते हैं। जबकि सोशल मीडिया पर उम्र सम्बंधी प्रतिबंध सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं, एक संतुलित दृष्टिकोण जो डिजिटल शिक्षा, माता-पिता की भागीदारी और लक्षित सामग्री विनियमन को जोड़ता है, किशोरों की सुरक्षा के लिए अधिक व्यावहारिक है, जबकि उन्हें जिम्मेदारी से सोशल मीडिया से लाभ उठाने की अनुमति देता है। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय रेलवे में सुरक्षा पहले से कहीं अधिक बेहतर हो गयी है, जिसका श्रेय पिछले दशक में की गयी योजनाबद्ध पहलों को दिया जा सकता है। भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे व्यस्त यात्री परिवहन नेटवर्क है और रेल-यात्री परिवहन में इसका विश्व में पहला स्थान है। रेलवे हर साल 1 लाख करोड़ यात्री किलोमीटर (पीकेएम) से अधिक की दूरी तय करती है और 685 करोड़ से अधिक यात्रियों को सफर कराती है।
यह आंकड़ा चीन से भी काफी बड़ा है, जहां अपने विशाल नेटवर्क और आबादी के बावजूद लगभग 300 करोड़ यात्री ही रेल का उपयोग करते हैं। सुरक्षा में इस उल्लेखनीय सुधार का प्रमाण दुर्घटनाओं की घटती संख्या से मिलता है। जहां 2000-01 में 473 बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई थीं, वहीं 2023-24 में यह संख्या घटकर केवल 40 रह गयी है। यह गिरावट ट्रैक सुधार, मानव रहित लेवल क्रॉसिंग को हटाने, पुलों की स्थिति की नियमित निगरानी और डिजिटल तकनीक के प्रयोग से संभव हुई है।
रेलवे के सुरक्षा प्रयासों को यात्री और पटरियों की लंबाई के आधार पर और भी सराहा जा सकता है। प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक लोग 70,000 किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर यात्रा करते हैं। त्यौहारों के समय यह संख्या 3 करोड़ तक पहुंच जाती है। इसका मतलब है कि भारत में प्रतिदिन लगभग 2% लोग सुरक्षित रूप से रेल से सफर करते हैं, जबकि चीन में यह आंकड़ा 0.58% और अमेरिका में मात्र 0.09% है।
भारतीय रेलवे के लिए यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। यह 2023-24 में सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से स्पष्ट होता है और चालू वित्त वर्ष में इससे भी अधिक खर्च करने की योजना है। इसका उद्देश्य रेलों, पुलों, पटरियों और संकेत प्रणालियों के रख-रखाव में सुधार करना है। साथ ही, ओवर- और अंडर-ब्रिज के निर्माण के माध्यम से पटरियों के निकट की सड़क सुरक्षा में भी सुधार किया जायेगा।
रेलवे सुरक्षा प्रदर्शन का एक प्रमुख सूचकांक प्रति दस लाख ट्रेन किलोमीटर पर दुर्घटना की संख्या (एपीएमटीके) है, जो 2000-01 में 0.65 से घटकर 2023-24 में 0.03 पर आ गया है। यह सुधार अत्याधुनिक तरीकों और उन्नत तकनीकों के उपयोग के कारण संभव हुआ है, जैसे कि बेहतर पटरी रखरखाव, पटरी दोषों का पता लगाने में सुधार, रेल वेल्ड विफलताओं को रोकना और मानवीय त्रुटियों को कम करना।
पटरी रखरखाव में सुधार के लिए आधुनिक मशीनों की तैनाती में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जहां 2013-14 में केवल 700 मशीनें उपयोग में थीं, वहीं अब यह संख्या बढ़कर 1,667 हो गई है। इसके अतिरिक्त, परिसंपत्ति की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पूरे नेटवर्क में रेल ग्राइंडिंग का भी उपयोग किया जा रहा है। जिससे पटरियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। इसके साथ ही, उपद्रवी गतिविधियों, पटरियों से छेड़छाड़ और पटरियों पर अवरोध वस्तुओं के कारण होने वाले जोखिमों से निपटने के लिए नियमित गश्त की जाती है।
यात्रियों की सुरक्षा से आगे बढ़कर, रेलवे अब वन्यजीव और पशुधन की सुरक्षा पर भी ध्यान दे रही है। 2024-25 तक 6,433 किलोमीटर रेलवे ट्रैक के किनारे बाड़ लगाने का लक्ष्य है, जिसमें से अगस्त 2024 तक 1,396 किलोमीटर पर काम पूरा कर लिया गया है। इससे मवेशियों के साथ टकराव की घटनाओं में कमी आयेगी।
इन परिणामों को बनाये रखने और सुधार करने के लिए भारतीय रेलवे ने तकनीकी कार्यक्रमों और लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को अपनाया है। इस पहल के तहत लोको पायलटों को कोहरे वाले क्षेत्रों में परिचालन में सहायता के लिए जीपीएस- आधारित फॉग-पास डिवाइसेस की संख्या में वृद्धि की गयी है, जो 2014-15 में केवल 90 थी और अब बढ़कर 21,742 हो गयी है।
लोकोपायलटों की सतर्कता बढ़ाने के लिए सभी लोकोमोटिव में सतर्कता नियंत्रण उपकरण (वीसीडी) लगाये गये हैं, जिनकी संख्या 2013-14 में 10,000 से बढ़कर अब 16,021 हो चुकी है। सुरक्षा उपायों के अंतर्गत, बड़ी पटरी (ब्रॉड-गेज) मार्गों पर स्थित 6,637 स्टेशनों में से 6,575 स्टेशनों पर पैनल इंटरलॉकिंग, रूट रिले इंटरलॉकिंग और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग जैसी उन्नत संकेत प्रणालियां स्थापित की गयी हैं।
लोकोपायलटों की दक्षता को बेहतर बनाने के लिए ड्राइविंग कौशल और प्रतिक्रिया समय में सुधार के उद्देश्य से सिम्युलेटर-आधारित प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जो क्षेत्रीय अनुभव का अनुकरण करता है। अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को अग्निशमन और अग्निशामक यंत्रों के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। 2023-24 के दौरान 6 लाख से अधिक रेलवे कर्मचारियों ने प्रारंभिक, प्रगति-उन्मुख, पुन: अभ्यास और विशिष्ट जैसे विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त किये हैं।
यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोत्तम प्राथमिकता देते हुए, एलएचबी कोचों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जो बेहतर दुर्घटना-रोकथाम सुविधाओं से लैस हैं। इन कोचों का डिजाइन इस तरह किया गया है कि यह रेल के पटरी से उतरने और यात्रियों के घायल होने की संभावना को कम करता है। टक्कर के दौरान एक-दूसरे पर चढ़ने से बचने के लिए इन्हें इस प्रकार से बनाया गया है कि ये 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर भी सुरक्षित तरीके से परिचालित हो सकें।
इसकी उत्पादन संख्या में भी महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। 2023-24 में 4,977 एलएचबी कोच बनाये गये हैं, जो 2013-14 के 2,467 से दोगुने से भी अधिक हैं। इन सभी प्रयासों से भारतीय रेलवे पहले से कहीं अधिक सुरक्षित हो गयी है। यात्री सुरक्षा और रेलवे में सुधार की दिशा में निरंतर प्रयास इसे एक सुरक्षित और विश्वसनीय परिवहन विकल्प बनाते हैं। (लेखक भारत सरकार के इंफ्रा रेलवे बोर्ड के पदेन सचिव सह सेवानिवृत्त सदस्य हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सूर्य की उपासना और सूर्य को शक्ति का सबसे प्रमुख श्रोत मानने की परम्परा भारत के मगध क्षेत्र की देन है। इस विराट परम्परा का महत्व दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। सनातन का हर नियम विश्व के कल्याण और प्रकृतिक संसाधनों के समुचित उपयोग को रेखाकिंत करता है। धार्मिक कथाओं पर आधारित मान्यताओं के अनुसार मां सीता और द्रोपदी ने सबसे पहले सूर्य की अराधना की थी।
राम कथा हो या महाभारत दोनों में सूर्य की महता रेखाकिंत की गयी है। महाभारत में सूत पुत्र कर्ण को सूर्य पूत्र कर्ण माना गया। राम कथा में अंजनी के लाल वीर हनुमान को सूर्य का वरद पुत्र कहा गया। आज पूरे देश और दुनिया में हनुमान की पूजा आराधना होती है, कर्ण की सूर्य उपासक के रुप में देश में कई स्थल चिन्हित हैं।
हमारी 10 हजार साल की मान्यताओं में छठ मईया की पूजा उन्हीं विराट परम्परा को रेखाकिंत करता है जो हजारों साल की गुलामी के बाद भी कम नहीं हुई न लुप्त हुई। छठ की पूजा पद्धति को ध्यान से देखा जाए तो इसमें किसी पुरोहित, पंडित या ब्राह्मणों की कोई भूमिका नहीं है। यह संकेत देता है कि समाज में पूजा और अराधना के लिये सर्वोच्च सत्ता को सीधे कर्म कांड के नियम और ग्रामीण संसाधनों के माध्यम से किया जा सकता है।
इस पूजा की सबसे बड़ी बात है कि जहां सीता जनकनंदनी उच्च जाति से आती है वहीं कर्ण सूत पुत्र के रुप में सूर्य की उपासना करने वाला भारतीय सनातन परम्परा का सबसे बड़ा श्रद्धावान माना जाता है। आज देश में हिंदू जन मानस को जिस प्रकार राजनीति लाभ के लिये तोड़ा जा रहा है उसमें छठ की पूजा उपासना की पद्धति करारा तमाचा है। छठ समभाव और जाति की भिन्नता को पूर्ण रुप से खारिज करता है।
नदियों, तालाब और जलस्रोतों के घाट पर बिना किसी भेदभाव के पूरा जन समूह दुनिया के सबसे बड़ें सार्वजनिक पूजा उपासना में शामिल होता है। न किसी की जात न किसी संप्रदाय की चर्चा छठ एक सार्वभौम विश्व कल्याण के लिए किया गया मानवीय प्रयास स्वीकार्य किया जाना चाहिए। पटना के गंगा घाट हो या औरंगाबाद का देव मंदिर, मुम्बई का चौपाटी मैदान हो न्यूयार्क का वॉटर टॉवर सूर्य उपासना का यह पर्व साफ संदेश देता है कि पूरे विश्व का कल्याण और सुरक्षा सूर्य के माध्यम से संभव है।
आज हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, बौद्ध के अतिरिक्त दुनिया के अनेक देशों में इस पर्व की परंपरा और महत्व को समझने का प्रयास कर रहें हैं। दूसरी ओर हमारे देश में राजनीति ही क्षुद्रता और सनातन पद्धति के हर आयाम को राजनीति स्वार्थ के कारण नकारने का प्रयास कर रही है। इन परम्परा विरोधी अल्प ज्ञानियों को सनातन के सूर्य पूजा की परम्परा और उसमें उपयोग किये जाने वाले पदार्थो का समर्थ ज्ञान हो तो इस प्रकार की तोड़ा -फोड़ों वाली राजनीति से बचना चाहिए। यह छठ का संदेश भी है। जाति के मान्यताओं को नकारता संपूर्ण वैश्विक शांति और सुलभता का संदेश देने वाला यह एकमात्र पर्व है।
यह गर्व का पर्व है। यह पर्व समरसता का है। यह समभाव का प्रदर्शित करता है। यह प्रकृति को नमन करता है। यह जल की महत्ता स्थापित करता है। सूर्य के वैज्ञानिक बल को स्वीकार्य करता है। यह सत्य सनातक परंपरा के हजारों वर्ष के इस्लामी और इसाई शासन के बाद भी अपने स्वरुप में विद्यमान रहकर विश्व के पटल पर सनातक पताका को सबसे उपर रखने का संदेश उदघोषित करने का पर्व है। यह विराट पर्व है जिसकी विराटता हर दिन बढ़ती ही जा रही है।
पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान जीव मानव के मानसिक और शारीरिक उर्त्कष को किया जाने वाला यह पर्व अपने आप में पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने का संदेश देता है। यह पर्व हमें बताता भी है और डराता भी है। बताता है कि पृथ्वी का अस्तित्व सूर्य से है और डराता है कि पृथ्वी का नाश भी संभव है। सहज ज्ञान से छठ के संदेशों को समझना असंभव है।
मानव विकास की परम्परा और भारतीय सत्य सनातक की उंचाई से ब्रंम्हण्ड तक पहुंचना दुनिया के किसी भी अन्य धर्म परंपराओं में इस व्यापकता से स्वीकार्य ही नहीं है। जापान की सूर्य देवी, अमातेरासु, जिन्होंने प्राचीन पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जिन्हें विश्व का सर्वोच्च शासक माना जाता था, शाही वंश के संरक्षक देवता थे, और आज भी सूर्य के प्रतीक जापानी राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
मिस्र की धार्मिक मान्यताएं और प्रथाएं ऐतिहासिक काल (लगभग 3000 ईसा पूर्व से) के मिस्र के समाज में घनिष्ठ रूप से एकीकृत थीं। हालांकि प्रागैतिहासिक काल से संभवत: कई अवशेष बचे हुए थे। लगभग पहली शताब्दी ईसवी की गर्गसंहिता (गर्ग की रचनाएं)। यूनानी ज्योतिष को दूसरी और तीसरी शताब्दी ईस्वी में कई संस्कृत अनुवादों के माध्यम से भारत में प्रसारित किया गया था, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध वह है जो 149/150 ईस्वी में यवनेश्वर द्वारा किया गया था और जिसे पद्य के रूप में लिखा गया था।
जाति व्यवस्था, मेटेमप्सिसोसिस (आत्माओं का स्थानांतरण) के सिद्धांत, पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और अंतरिक्ष) के भारतीय सिद्धांत और मूल्यों पर आधारित था। भारत के प्राचीनतक पूजा परम्परा छठ की है जो संदेश देता है कि समाज में किसी प्रकार का जातिगत वर्गी करण को सर्वोच्च सत्ता सूर्य स्वीकार नहीं करता है। सूर्य सबसे ताकतवर देवता के रुप में भी स्वीकार्य थे और आज भी है। लेकिन वर्तमान समय में जिस प्रकार देश की सामाजिक मान्यताओं पर्व त्योहारों की गहराई और उनमें छिपे व्यापक संदेशों को नकारकर क्षुद्र टिप्पणी और तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है उसे छठ पर्व की परम्परा अस्वीकार करती है।
जो इन महान परम्पराओं के विपरीत चल रहें है उनके विचार नाशवान होंगे। छठ पर्व का संदेश सभी है प्रकृति के नजर में एक। जिन्हें यह नहीं दिखता उन्हें छठ घाटों पर उमड़ती भक्तों की आस्था और छठ के संदेश को देखना और समझना चाहिए। विश्व की सभी समस्याओं का संकेत और उनके अंत का मार्ग इस पर्व के मर्म में छिपा है आवश्यकता है क्षुद्रता छोड़ व्यापक दृष्टि अपनाने की।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सुपारी पूरी तरह से एक दवा है, जो भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली चबाये जाने वाला दवा है, जिसे प्राचीन काल से भारतीय और प्रशांत महासागर के द्वीपों और दक्षिणी एशिया के पूर्वी लोगों द्वारा चबाया जाता रहा है। पान में एक हानिरहित मादक पदार्थ है, जिसके कतिपय चिकित्सीय महत्व है (उदाहरण के लिए, अम्लता पर प्रतिक्रिया करने के लिए) और जो हल्की उत्तेजना और कल्याण की भावना पैदा करता है।
चबाने को ताड़ के बीज, एरेका कैटेचू से मिश्रित किया जाता है और पाइपर पान की पत्ती को चूने के पेस्ट (अक्सर प्लस राल) के साथ मिलाया जाता है। साथ में कटा हुआ सुपारी कत्था और संभवत: अन्य स्वाद (उदाहरण के लिए, लौंग, इलायची इत्यादि) के साथ। इस द्रव्य को निगलने के बाद मुंह, पेट, लीवर को दुरुस्त करता है, यह प्रक्रिया लार के प्रचुर प्रवाह को उत्तेजित करती है, जो लगातार उत्सर्जित होती है। व्य व्यक्ति का लार और दांत लाल या भूरे रंग के हो जाता हैं।
अधिकांश पश्चिमी लोगों के लिए सुपारी चबाना एक घृणित आदत प्रतीत होती है, हालाँकि यह संयुक्त राज्य अमेरिका में एक समय व्यापक रूप से प्रचलित तम्बाकू चबाने से थोड़ा अलग है। पुष्टि की गई है कि पान चबाने वालों के दांत खराब होते हैं, लेकिन इसके लिए पान चबाने को दोष देना उचित नहीं है, क्योंकि पोषक तत्वों की कमी भी इसका कारण हो सकता है। भारतीय प्रायद्वीप में एरेका पाम और पान के पत्ते दोनों की व्यापक रूप से खेती की जाती है।
पान के पौधे के बेहतर विकास के लिए अच्छी जल निकास वाली मिट्टी, नमी और छाया और धूप दोनों की आवश्यकता होती है, बड़े पैमाने पर इसकी खेती आमतौर पर घास (सूखी घास) और बांस से बने शेड में की जाती है। हालांकि, उपरोक्त शर्तें पूरी होने पर पान के पौधे भी भूखंडों में उगाए जाते हैं। रोपण के दो महीने बाद पत्तियों की तुड़ाई की जा सकती है। एक स्थापित, रोग-मुक्त स्थिति में, यह 20 वर्षों से भी अधिक समय तक चल सकता है।
पान पत्ता और सुपारी मादक पदार्थ के अंतर्गत भी रखा जाता है, भारतीय समाज में धार्मिक उपयोग के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। पान पत्ता और सुपारी (तमुल पान) संप्रति किचन गार्डन के किनारे भी उगाई जाती है। इसे आम तौर पर घरेलू खपत के लिए भी लगाया जाता है। हालाँकि इसकी उपज अधिक होती है, परन्तु व्यावसाय के लिए भी तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त आमदनी के लिए भी उगाया जाता है।
पान के पत्ते को रोपने की विधि आमतौर पर उस मिट्टी पर निर्भर करती है जहां इसे लगाया जाता है। सबसे पहले घुंडियों से फैली हुई लताओं को अलग-अलग काटना पड़ता है। नर्सरी बेड में लताएं लगाने के लिए दूसरी बात यह है कि लाल रंग की मिट्टी का चयन करना चाहिए। एक महीने के बाद जब लताएं जड़ पकड़ लेती हैं तो उन्हें तैयार भूखंड पर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
विविध भारतीय भाषाओं के लोककथाओं में पान पत्ता और सुपारी (तमुल पान) का स्थान और महत्व का वर्णन प्राप्त होता है, जैसे- बिहू गीत में तामुल पान: उदाहरण के लिए, सुपारी और पान पत्ता का बिहू (एक असमिया त्योहार) के साथ गहरा संबंध है। रंगाली बिहू में लोक नर्तक गांव के हर घर में जाते हैं, धूल, पेपा (हॉर्न-पाइप) और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाते हुए हुसोरी (एक पारंपरिक बिहू नृत्य) गाते हैं, जो परिवार को सर्वशक्तिमान का आशीर्वाद देने के लिए किया जाता है। बदले में उन्हें सुपारी और पान पत्ता, गमुसा (एक पारंपरिक असमिया तौलिया) और पैसे दिये जाते हैं। माना जाता है कि बिहू त्योहार के दौरान लड़कियां अपने प्रेमी को सुपारी और पान खिलाती हैं।
भारतीय समाज में सुपारी और पान के पत्ते धार्मिक और अन्य सामाजिक त्योहारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। घर में मेहमान का स्वागत करने के लिए सबसे पहले तामुल पान देने का रिवाज था। विभिन्न पूजा अनुष्ठानों के दौरान पुजारी या ग्रामीणों को जाराई (स्टैंड के साथ पीतल की ट्रे) में पान-तमुल देना विभिन्न संस्कृतियों व समाज में एक परंपरा है। त्योहारों पर या संकट के समय लोग नामघर (प्रार्थना गृह) में तामुल-पान चढ़ाने का रस्म था। तामुल पान चढ़ाकर कोई भी व्यक्ति पुजारी से आशीर्वाद मांगता था। तमुल पान के आदान-प्रदान से व्यक्ति मित्रता करता था और यदि उसने कोई सामाजिक अपराध किया हो तो क्षमा भी मांगता था।
विभिन्न भारतीय समुदायों के विवाह समारोह में तामुल पान पत्ता का उपयोग की शुरूआत से अंत तक बहुत ही शुभदायक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। तामुल और पान पत्ता का उल्लेख विवाह गीतों में भी मिलता है। ये गीत दूल्हे के आगमन पर गाया जाता था। चेचक के संक्रमण से बचाने के लिए ऊपरी और निचले असम के कतिपय भू-भागों में रहने वाले लोग आई-सभा नामक एक अनुष्ठान करते हैं और देवी को अन्य भेंटों के साथ-साथ तामुल-पान पत्ता भी चढ़ाते हैं।
इसमें ऐनम और शितोलनम (पॉक्स की देवी के लिए प्रार्थना गीत) में सुपारी और पान पत्तियों के उपयोग का उल्लेख मिलता है : भक्त याचक देवी से प्रार्थना करते थे कि हम आपको आपकी वेदी के सामने सुपारी और पान के पत्तों का एक साथ बांधने वाला टुकड़ा चढ़ाते हैं। कृपया अपने आगमन और प्रस्थान पर इसे स्वीकार करें। भारतीय समाज और संस्कृति में सुपारी और पान पत्ता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय लोक गीत और लोक साहित्य का सबसे मूल्यवान हिस्सा है। सुपारी और पान के पत्तों का प्रभाव तब तक जीवित रहेगा जब तक मानव सभ्यता इस संसार में इसका उपयोग करते रहेंगे।
भारतीय समाज में तामुल और पान पत्ता लोगों के जीवन में एक अनिवार्य भूमिका निभाते है। यह न केवल चबाने की वस्तु है बल्कि इसे आगंतुक अतिथियों को भी पेश किया जाता है. इसे अन्य सामाजिक मूल्यों से अलग करना मुश्किल होता है। तामुल-पान पत्ता के बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं होता। यह किसी भी सामाजिक एवं धार्मिक समारोह में निमंत्रण पत्र के रूप में भी उपयोग किया जाता है।
कभी-कभी यह दुनिया की किसी भी अन्य मुद्रा की तुलना में अधिक मूल्यवान हो जाता है जब इसे समाज के किसी सदस्य द्वारा किये गये किसी अपराध के मुआवजे के रूप में पेश किया जाता है। गाँव में कोई भी अनुष्ठान तामुल-पान पत्ता के बिना नहीं किया जाता है, चाहे विवाह, जन्म या मृत्यु या कृषि अभ्यास या स्वास्थ्य और बीमारी से जुड़े अनुष्ठान हों।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। धन, संपदा और भौतिक संसाधन से जो जितना संपन्न है उसी के अनुपात में उसकी समृद्धि आंकी जाती है, जो कि एक सामान्य दृष्टिकोण है। समृद्धि प्राप्त करना एक सामान्य व्यवहार है और जिसे भी देखिए इस दिशा में भाग रहा है। सफलता और असफलता के कई भौतिक कारण हो सकते हैं परंतु मूल कारण के ऊपर कोई विचार नहीं करता है।
वास्तव में देखा जाए तो सफलता अथवा असफलता का मूल आधार हमारा व्यक्तित्व ही होता है इसके निर्माण पर कम ही ध्यान दिया जाता है; जबकि हमारी भारतीय संस्कृति में जन्म से लेकर 25 वर्षों तक व्यक्तित्व के निर्माण का काल निर्धारित रहा है। अपनी प्रतिभा को समृद्ध बनाए बिना क्या भौतिक समृद्धि प्राप्त करना सरल है ?
वंशानुगत प्राप्त भौतिक समृद्धि क्या वास्तविक संतोष और सुख दे पता है? इन प्रश्नों का हल ढूंढने से ज्ञात होता है कि भौतिक समृद्धि से कहीं अधिक प्रतिभा की समृद्धि आवश्यक है जो इंसान को भटकने नहीं देता है। उक्त जानकारी पवित्रम सेवा परिवार के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने दी।
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