एबीएन एडिटोरियल डेस्क। नासा की अनुभवी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और उनके साथी बुच विल्मोर, जो पिछले नौ महीने से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर थे, आज सफलतापूर्वक धरती पर लौट आये। स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल की मदद से उन्होंने मेक्सिको की खाड़ी में सुरक्षित लैंडिंग की।
सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर जून 2024 में बोइंग के स्टारलाइनर के साथ परीक्षण उड़ान के लिए अंतरिक्ष में गए थे। हालांकि, स्टारलाइनर में तकनीकी खामी के कारण उनकी वापसी में देरी हुई, जिससे वे नौ महीने तक आईएसएस पर रहे। उनकी वापसी के लिए स्पेसएक्स का क्रू-10 मिशन लॉन्च किया गया था, जिससे सफलतापूर्वक उन्हें धरती पर वापस लाया जा सका। वापसी के बाद दोनों अंतरिक्ष यात्रियों को स्ट्रेचर पर ले जाया गया, जो लंबे समय तक भारहीनता में रहने के बाद एक सामान्य प्रक्रिया है।
यह मिशन न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा बल्कि इससे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने के प्रभावों को समझने में भी मदद मिलेगी। इससे नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों को भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों, जैसे मंगल पर मानव मिशन की योजना बनाने में सहायता मिलेगी। सुनीता विलियम्स व उनके सहयोगी की वापसी अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए मूल्यवान डेटा प्रदान करेगा और अंतरिक्ष यान तकनीक के सुधार में सहायक सिद्ध होगा।
सुनीता विलियम्स और उनके जैसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री भविष्य के चंद्र और मंगल अभियानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ अब दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों की तैयारी कर रही हैं, जिनमें अंतरिक्ष में रहने के नए तरीके, कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की संभावनाएँ और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की रणनीतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा, स्टारलाइनर जैसी तकनीकों में सुधार कर, अंतरिक्ष अन्वेषण को अधिक सुरक्षित और कुशल बनाया जाएगा। अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति को और विस्तारित करने के लिए वैज्ञानिक शोध जारी रहेंगे, जिससे भविष्य में मंगल और उससे आगे की यात्राएँ संभव हो सकेंगी।
सुनीता विलियम्स भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री हैं, जिनका भारत से गहरा जुड़ाव रहा है। उनके पिता भारतीय मूल के हैं और उन्होंने कई बार भारत के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है। भारत में अंतरिक्ष विज्ञान और अनुसंधान की बढ़ती उपलब्धियों के बीच सुनीता विलियम्स एक प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। इसरो (आईएसआरओ) भी अब मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम, गगनयान की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। इसरो ने हाल ही में गगनयान के लिए प्रमुख परीक्षण पूरे किए हैं और आने वाले वर्षों में भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन को लॉन्च करने की योजना बना रहा है।
सुनीता विलियम्स की उपलब्धियाँ न केवल भारतीय वैज्ञानिकों बल्कि देश के युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी सफलता यह दिखाती है कि भारतीय मूल के लोग वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। भविष्य में, इसरो और नासा के बीच सहयोग बढ़ सकता है, जिससे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को और मजबूती मिलेगी। सुनीता विलियम्स न केवल एक उत्कृष्ट अंतरिक्ष यात्री हैं बल्कि एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व भी हैं।
उनका सफ़र यह दर्शाता है कि कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और विज्ञान के प्रति जुनून कैसे किसी को नई ऊंचाइयों तक पहुँचा सकता है। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं और युवा वैज्ञानिकों को प्रेरित किया है कि वे अंतरिक्ष अनुसंधान और विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ें। उन्होंने कई मौकों पर भारतीय छात्रों व युवाओं से संवाद किया है और उन्हें वैज्ञानिक क्षेत्रों में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया है। उनके अनुभव और उपलब्धियाँ न केवल अंतरिक्ष क्षेत्र बल्कि विज्ञान और तकनीक में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रेरणा हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सीमाएँ केवल मानसिकता में होती है और यदि कोई लक्ष्य निर्धारित किया जाए तो उसे प्राप्त किया जा सकता है।
सुनीता विलियम्स और उनके जैसे अनुभवी अंतरिक्ष यात्री भविष्य के चंद्र और मंगल अभियानों में अहम भूमिका निभा सकते हैं। नासा और अन्य स्पेस एजेंसियाँ अब दीर्घकालिक अंतरिक्ष मिशनों की तैयारी कर रही हैं, जिनमें अंतरिक्ष में रहने के नए तरीके, कृत्रिम गुरुत्वाकर्षण की संभावनाएँ और अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने की रणनीतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा, स्टारलाइनर जैसी तकनीकों में सुधार कर अंतरिक्ष अन्वेषण को अधिक सुरक्षित और कुशल बनाया जाएगा। अंतरिक्ष में मानव उपस्थिति को और विस्तारित करने के लिए वैज्ञानिक शोध जारी रहेंगे, जिससे भविष्य में मंगल और उससे आगे की यात्राएँ संभव हो सकेंगी।
सुनीता विलियम्स की वापसी अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए मूल्यवान डेटा प्रदान करेगा और अंतरिक्ष यान तकनीक के सुधार में सहायक सिद्ध होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सुनीता विलियम्स की सफल वापसी पर बधाई देते हुए उनके साहस तथा समर्पण की सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उनका यह मिशन भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और युवाओं के लिए एक प्रेरणा है, जो अंतरिक्ष में नई ऊंचाइयों को छूने का सपना देखते हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। हमारी सोच अब आहिस्ता-आहिस्ता बदलने लगी है। हम प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति थोड़ा मित्रवत भाव रखने लगे हैं। घर की छत या बालकनी में पक्षियों के लिए दाना-पानी डालने लगे हैं। गौरैया से हम फ्रेंडली हो चले हैं। किचन गार्डन और घर की बालकनी में कृत्रिम घोंसला लगाने लगे हैं। गौरैया हमारे आसपास आने लगी है।
उसकी चीं-चीं की आवाज हमारे घर-आंगन में सुनाई पड़ने लगी है। गौरैया संरक्षण को लेकर ग्लोबल स्तर पर बदलाव आया है, यह सुखद है। फिर भी अभी यह नाकाफी है। हमें प्रकृति से संतुलन बनाना चाहिए। हम प्रकृति और पशु-पक्षियों के साथ मिलकर एक सुंदर प्राकृतिक वातावरण तैयार कर सकते हैं। जिन पशु -पक्षियों को हम अनुपयोगी समझते हैं वह हमारे लिए प्राकृतिक पर्यावरण को संरक्षित करने में अच्छी-खासी भूमिका निभाते हैं लेकिन हमें इसका ज्ञान नहीं होता।
गौरैया हमारी प्राकृतिक मित्र है और पर्यावरण में सहायक है। गौरैया प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुदकती और चावल या अनाज के दाने को चुगती है। कभी घर की दीवार पर लगे आईने पर अपनी हमशक्ल पर चोंच मारती दिख जाती। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते थे लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई। हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खासी भूमिका है। दुनिया भर में 20 मार्च गौरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गौरैया संरक्षण के लिए लोगों से पहल की अपील कर चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा सदस्य बृजलाल के प्रयासों को ट्वीटर पर खूब सराहा था और कहा कि गौरैया संरक्षण को लेकर आपका प्रयास बेहतरीन और काबिले तारीफ है। राज्यसभा सदस्य बृजलाल ने अपने घर में गौरैया संरक्षण को लेकर काफी अच्छे उपाय किए हैं। उन्होंने गौरैया के लिए दाना-पानी और घोंसले की व्यवस्था की है। जंगल में आजकल पंच सितारा संस्कृति विस्तार ले रही है। प्रकृति के सुंदर स्थान को भी इंसान कमाने का जरिया बना लिया है। जो पशु- पक्षियों के लिए खतरा बन गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर के प्रयासों से 20 मार्च का दिन गौरैया के नाम रखा गया। 2010 में पहली बार यह दुनिया में मनाया गया। गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इनसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास रहना अधिक पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत पायी जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती। इसका जीवनकाल दो साल का होता है। यह पांच से छह अंडे देती है।
भारत की आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुले और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। इसकी लंबाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है। इसका वजन 25 से 35 ग्राम तक होता है। यह अधिकांश झुंड में रहती है। यह अधिक से अधिक दो मील की दूरी तय करती है। मानव जहां-जहां गया, गौरैया उसका हमसफर बनकर उसके साथ गयी।
गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे। उसमें लकड़ी और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक वातावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते थे, लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता। देश की खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। केमिकल युक्त रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े-मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिनमें गिद्ध, कौआ, महोख, कठफोड़वा और गौरैया शामिल हैं। इनके भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है।
प्रसिद्ध पर्यावरणविद् मोहम्मद ई. दिलावर नासिक से हैं और वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े रहे हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक देशों तक पहुंच गयी है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाए जाएं और उसमें खाने की भी सुविधा भी उपलब्ध हो। घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों, जिससे गौरैयों के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें। हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के सरोकार से लोगों को परिचित कराना होगा। आने वाली पीढ़ी तकनीकी ज्ञान अधिक हासिल करना चाहती है लेकिन पशु-पक्षियों से वह जुड़ना नहीं चाहती है। इसलिए हमें पक्षियों के बारे में जानकारी दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। जिससे हम अपनी पर्यावरण दोस्त को उचित माहौल दे पाएं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी वीचैट हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्त्रियों की भागीदारी हर देश, समाज और परिवार में रेखांकित करने योग्य रही है। बावजूद इसके उनके व्यक्तित्व और विचारों के प्रति समावेशन यानी समानता का भाव नदारद रहा है। जिसके चलते तेजी से आगे बढ़ती दुनिया के हर कोने में ही आधी आबादी की तरक्की की गति जरा कम ही रही। लैंगिक भेदभाव और असमानता की स्थितियां स्त्रियों की हिस्सेदारी बढ़ाने में बड़ी बाधा बनती रही हैं।
गौरतलब है कि इस वर्ष इंटरनेशनल वीमन्स डे की थीम सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिकार-समानता और सशक्तीकरण है। यह दिन स्त्रियों को शुभकामनाएं देने का विशेष दिन भर नहीं बल्कि उनके लिए समानता का परिवेश बनाने से जुड़ा संदेश लिए है। समग्र परिवेश में सार्थक बदलाव लाने के लिए आवश्यक है कि समानता की इस मुहिम को हर परिवार भी आगे बढ़ाये।
सकारात्मक और प्रेरणादायी परिस्थितियां बेहतरी से जुड़े हर बदलाव को खाद-पानी देती हैं। अधिकारों और मानवीय मोर्चे पर बराबरी की बुनियाद बनाने वाली इस वर्ष की थीम तो आज ही नहीं, आने वाले कल के लिए भी एक प्रेरणादायी परिवेश बनाने से जुड़ी है। ऐसे सामाजिक-पारिवारिक ताने-बाने को तैयार करने का उद्देश्य लिए है, जिसमें महिलाओं को हर स्तर पर प्रोत्साहन देने का काम किया जाए।
यह वैचारिक रूपरेखा व्यावहारिक धरातल पर एक बेहतर दुनिया के निर्माण का इरादा लिए है। समझना कठिन नहीं कि सामूहिक रूप से आधी आबादी के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल बनाने के लिए प्रेरित करने वाली परिस्थितियां आवश्यक भी हैं। आमतौर पर देखने में आता है कि घर हो या बाहर, स्त्रियों के उत्साह को सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलती है।
बहुत सी सामाजिक बाधाएं और पारिवारिक नीति-नियम आधी आबादी के प्रति समान व्यवहार अपनाने में रुकावट बनते हैं। जबकि अपने प्रयासों के लिए प्रशंसा पाना किसी भी इंसान को सबसे अधिक प्रेरणा देता है। समाज हो, कार्यस्थल हो या घर हो झ्र समग्र परिवेश में स्त्रियों को उनके अधिकार दिलाने और बराबरी की बुनियाद पक्की करने के लिए उनके उत्साह और हौसले को बल देने का भाव जरूरी है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हर स्त्री के अधिकार और समानता की ऐसी ही बातें रखने के लिए एक प्रभावी मंच के समान है। वीमन्स डे पर बराबरी चाहने की साझी आवाज दुनिया के हिस्से में गूंजती है। भारतीय समाज के परंपरागत ढांचे में पारिवारिक व्यवस्था इस भाव और बदलाव को सबसे अधिक बल दे सकती है।
महिलाएं सदा से ही अपनी हर भूमिका को एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व के रूप में जीती आई हैं। मां, पत्नी, सहकर्मी ही नहीं, आस-पड़ोस में बसे किसी परिवार की सदस्य के रूप में भी। अपनों-परायों, सभी को उनकी बातें और बर्ताव प्रेरणा देता रहा है। स्त्रियों की उपस्थिति हर हाल में बेहतरी की ओर बढ़ने का संबल देती रही है।
पीड़ादायी यह है कि स्त्रियां खुद अपना संबल नहीं बन पातीं। हर फ्रंट पर अपनी ही अनदेखी करती हैं। अपनी हिस्सेदारी पर अधिकार जमाने में पीछे रह जाती हैं। काबिलियत के बावजूद कामयाबी की राह पर बढ़ने से हिचकती हैं। यही कारण है कि भारतीय परिवेश में ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी उनके लिए न्यायसंगत और समानता के भाव से भरा समाज नहीं बन पाया है।
आवश्यक है कि स्त्रियां स्वयं आगे आएं। मानसिक बल और सामाजिक अपनेपन को अपने सशक्त व्यक्तित्व की बुनियाद बनाएं। मां, परवरिश के मोर्चे पर बेटी को मजबूत मन की धनी बनाकर तो बेटियां मां का मन समझकर एक-दूजे का संबल बन सकती हैं। यूं ही दूसरे सम्बन्धों में भी खींचतान के बजाय साथ देने की सोच हर स्त्री के लिए सहयोगी परिवेश बना सकती है। एक महिला किसी दूसरी महिला की मददगार बन सकती है।
स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रह, रूढ़िवादिता और भेदभाव के रहते लैंगिक समानता वाले विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती। इसीलिए महिलाओं को सही मायने में भागीदार बनाने के लिए उनकी उम्र, क्षमता और शारीरिक छवि से परे विविधता को खुले मन से स्वीकारना जरूरी है। हर स्त्री के व्यक्तित्व और विचारों को मान देना जरूरी है।
इसमें घर-परिवार के लोग भी व्यक्तिगत रूप से बहू-बेटियों का मन समझने, उनके काम को महत्व देने और उनकी भागीदारी को अहमियत देकर लैंगिक समानता के भाव को बढ़ावा दे सकते हैं। असमानता से जूझने के लिए भी स्त्रियां एक-दूजे का हाथ थामें। बेटी के जन्म पर अपराधबोध या दूसरे घर से आई बहू को अधिकार देने में भेदभाव करने की मानसिकता से खुद स्त्रियों को भी बाहर आना होगा।
व्यवस्थागत नियमों के साथ ही घर-परिवार में भी परिवर्तन लाने होंगे, ताकि सकारात्मक बदलावों को गति दी जा सके। इस वर्ष के विषय में समाहित एक भाव एक्सीलरेट एक्शन भी है। जिसके तहत लैंगिक समानता से जुड़े सभी पहलुओं पर ठोस कदम उठाने का आह्वान किया गया है।
यह विचार आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और पारिवारिक स्तर पर प्रभावी योजनाओं की वकालत करते हुए महिलाओं का जीवन बेहतर बनाने का उद्देश्य लिए है। बदलाव के लिए गंभीरता से प्रयास किये जाएं व उन्हें रफ्तार भी दी जाए।
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का विशेष अवसर है महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 26 फरवरी को मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि को भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है। भारत में धार्मिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि का बहुत महत्व है। यह आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने का सुअवसर है। महाशिवरात्रि को शिव तत्व को आत्मसात करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग एवं शहद अर्पित करने से विशेष फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन जलाभिषेक के साथ भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। इस रात्रि को जागरण करने वाले भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवपुराण के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है, पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान है।
धर्मग्रंथों में भगवान शिव को कालों का काल और देवों का देव अर्थात् महादेव कहा गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। देवाधिदेव भगवान शिव के समस्त भारत में जितने मंदिर अथवा तीर्थस्थान हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं।
आज भी समूचे देश में उनकी पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है। सर्वत्र पूजनीय शिव को समस्त देवों में अग्रणी और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वे अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
वे भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता के प्रतीक हैं। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले, जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जायेगा।
हालांकि बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जिस प्रकार विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव के जन्मदिन को उनकी जयंती के बजाय रात्रि के रूप में क्यों मनाया जाता है? इस संबंध में मान्यता है कि रात्रि को पापाचार, अज्ञानता और तमोगुण का प्रतीक माना गया है और कालिमा रूपी इन बुराइयों का नाश करने के लिए हर माह चराचर जगत में एक दिव्य ज्योति का अवतरण होता है, यही रात्रि शिवरात्रि है।
शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है- जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।
महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से सगुण ईश्वर और निर्गुण ब्रह्म कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं।
शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया।
विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे नीलकंठ के नाम से जाने गये। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाये।
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं।
उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। (लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। किसी भी सेवा प्रदाता विभाग या कंपनी की लापरवाही की वजह से जान-माल का नुकसान हो और वह उस मामले में दोषी पाया जाये तो उपभोक्ता का अधिकार उससे मुआवजा लेने का है। यदि विभाग आनाकानी करे तो नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत दावा कर सकता है।
घटना 14 दिसंबर, 2015 की है। एक किशोर छत पर बैठकर पढ़ाई कर रहा था। बाहर से किसी के आवाज देने पर वह छत से नीचे की ओर झांककर देखने लगा। इस दौरान बिजली का तार ढीला होने के कारण हवा के झोंके से छज्जे पर लगी लोहे की ग्रिल से छू गया। जिससे ग्रिल पर करंट उतर आया और किशोर के दोनों हाथ बिजली के करंट से झुलस गये।
उसने बड़े अस्पतालों में इलाज कराया ,परन्तु डॉक्टरों द्वारा उसके दोनों हाथ काटने पड़े। करंट से अपने दोनों हाथ गंवाने वाले किशोर ने अपने अधिकारों की नौ साल कानूनी लड़ाई लड़ी। सिविल जज त्वरित न्यायालय ने उक्त हादसे के लिए बिजली विभाग को दोषी मानते हुए 20 लाख रुपये जुमार्ना पीड़ित को दो माह के भीतर अदा करने के आदेश दिए, साथ ही इस राशि पर मुकदमा दायर करने के समय से ही छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी।
बता दें कि पीड़ित ने नौ साल पहले न्यायालय में उक्त मुकदमा दर्ज कराया था, जिसमें पावर कारपोरेशन के चेयरमैन और अधिशासी अभियंता को प्रतिवादी बनाया था। वादी का कहना था कि उनके मकान के छज्जे से मात्र आठ से 10 इंच की दूरी पर 33 केवी लाइन गुजर रही थी। लाइन के बीच में न तो गार्डिंग की व्यवस्था थी और न ही बीच में पोल लगाकर तारों को कसा गया था।
खतरे को भांपकर उनके पिता व अन्य मोहल्लेवासियों ने उक्त दुर्घटना से कुछ माह पहले लाइन हटवाने के लिए अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिए परन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुईङ्घ और यह हादसा हो गया। इस तरह के हादसे या फिर हाई वोल्टेज के कारण उपभोक्ता का कीमती सामान फुंक जाने पर की गई शिकायत के बाद यदि बिजली विभाग न तो कोई कार्रवाई करे और न ही मुआवजा दे तो उपभोक्ता विभाग पर हुए नुकसान के मुआवजे का दावा ठोक सकता है।
एक अन्य मामला ज्यादा वोल्टेज से घरेलू उपकरण जलने का है। गाजियाबाद में हाई वोल्टेज से कई घरों के लाखों रुपये के विद्युत उपकरण जैसे मोबाइल चार्जर, टीवी, कूलर, फ्रिज और पंखा आदि फूंक गये। ऐसी स्थिति में हुए नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में उपभोक्ताओं को ऐसे अधिकार प्राप्त हैं कि अगर वह उनका इस्तेमाल करें तो उसे नुकसान की भरपाई ब्याज सहित प्राप्त हो सकती है।
यानी अधिक वोल्टेज की वजह से आपका टीवी, फ्रिज या एसी फुंक गया है तो ऊर्जा निगम मुआवजा देगा। 43 इंच से अधिक के कलर टीवी, पूरी तरह आॅटोमैटिक वॉशिंग मशीन, कम्प्यूटर, एसी और 200 लीटर से अधिक का फ्रिज फूंकने पर प्रत्येक सामान के लिए 5000 रुपये तक मुआवजा मिलेगा। विद्युत नियामक आयोग ने हाल ही में मुआवजा बढ़ाया है।
पहले यह मुआवजा अधिकतम पांच सौ रुपये था। इसी श्रेणी के छोटे या कम क्षमता के उपकरणों के फूंकने पर भी कम से कम एक हजार रुपये का मुआवजा तय किया गया है। इस तरह बिजली उपकरण फूंकने पर एक हजार से पांच हजार रुपये तक मुआवजा मिलेगा। हालांकि इसके लिए तय प्रक्रिया पूरी करनी होगी तथा बिल दिखाने होंगे।
नये नियमों के अनुसार फ्यूज उड़ने पर राज्य के शहरी क्षेत्रों में चार घंटे, ग्रामीण क्षेत्रों में आठ घंटे और ऐसे पर्वतीय क्षेत्र जो सड़क से नहीं जुड़े हैं, वहां 12 घंटे के भीतर बिजली आपूर्ति सुचारु करनी होगी। ऐसा न होने पर एक उपभोक्ता के मामले में 20 रुपये प्रति घंटा और पूरे क्षेत्र के मामले में 10 रुपये प्रति उपभोक्ता प्रति घंटा मुआवजा दिया जाएगा। इसके इलावा उपभोक्ता को बिजली कनेक्शन आवेदन के 15 दिन में अनिवार्य रूप से देना होगा। समय पर कनेक्शन न मिला तो विभाग उपभोक्ता को प्रतिदिन पांच रुपये के हिसाब से मुआवजा देगा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 उपभोक्ताओं को उन कंपनियों से भी लड़ने की ताकत देता है, जो पहले के उपभोक्ता कानून में नहीं थी। उपभोक्ताओं को न्याय के लिए उपभोक्ता अदालतों के साथ-साथ केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण भी गठित किया गया है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की स्थापना का उद्देश्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करना है।
साथ ही अनुचित व्यापारिक गतिविधियां, भ्रामक विज्ञापनों और उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों को भी प्राधिकरण देखता है और उसका निपटारा करता है। इसी तरह उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का काम है। (लेखक उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। यदि कोई अपनी तेजतर्रार देशभक्ति, स्वधर्मनिष्ठा,धार्मिकता और असीम साहस को नाम देता है तो वह छत्रपति शिवाजी महाराज बन जाता है। यह वह समय था जब हमारे देश पर अलग-अलग आक्रांताओं का शासन था, जिन्होंने मंदिरों को ध्वस्त किया, माताओं का अपहरण किया और गायों को मार डाला। उन्होंने पहले ही हमारी शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर दिया है।
हमारे षोडश संस्कारों को एवं 64 कलाओं और उनकी शिक्षण विधियों को बेरहमी से नष्ट कर दिया। वह अशांति का युग था, जब उस समय के लोग जो दिशा हीन और निराश थे, हताशा में इंतजार कर रहे थे कि कोई उन्हें बचाएगा। ऐसे समय में विदेशी सुल्तानों और मुगल शासकों को खदेड़ने वाले ऐतिहासिक पुरुष शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को हुआ था। दादाजी कोंडदेव के प्रशिक्षण के कारण उन्होंने 17 वर्ष की अल्पायु में ही घोर युद्ध लड़े। उन्होंने युद्ध में सबसे पहले तोरणदुर्गा पर कब्जा कर लिया।
अपनी मां से नैतिकता, समरद्धगुरु रामदासु से देश, धर्म, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक विषय सीखने के बाद। उन्होंने हिंदू समुदाय को खड़ा करने का एवं मुगलों, बीजापुर सुल्तानों, निजाम शाही, बहमनी सुल्तानों को बाहर निकालने और हिंदू धर्म को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्प लिया।
शिवाजी ने वेतनभोगी सैनिकों को युद्ध के लिए नियुक्त नहीं किया। उन्होंने आम लोगों में स्वाभिमान जगाया। वे लोग अपना व्यवसाय, खेती करते हुए भी जरूरत पड़ने पर देश के लिए लड़ना करते थे। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध, (मारो और भागो युद्ध) में महारत हासिल की और एक महीने तक बिना रुके लड़ने का कौशल हासिल किया। वे पानी में कम से कम तीन दिन बिता सकते थे और एक महीने तक घोड़े पर रहकर बिना उतारे लड़ने में कुशल थे।
बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी को दबाने के लिए अफजल खान के नेतृत्व में हजारों अफगान और पश्तून सैनिकों को भेजा, शिवाजी ने अफजल खान को अपने बाघ नाखून से पेट को छीर दिया। हिंदवी स्वराज्य सेना हजारों अफगानों और पश्तूनों को मारकर विजयी प्राप्त की। इस घटना से शिवाजी महाराज की प्रसिद्धि पूरे भारत में फैल गई। यह युद्ध प्रतापगढ़ में लड़ा गया था।
इसके अलावा कोल्हापुर की लड़ाई में बीजापुर के सुल्तान ने 10 हजार भाड़े के सैनिक भेजे, लेकिन कोल्हापुर में उन्हें केवल 5 हजार मराठा योद्धाओं का सामना करना पड़ा। हर-हर महादेव कहते हुए, शिवाजी युद्ध के मैदान में कूद पड़े और दुश्मनों का नरसंहार किया। एक और लड़ाई शाहिस्ता खान के साथ लड़ी गई, जिसने एक लाख से अधिक प्रशिक्षित सेना भेजी, शिवाजी ने हार का नाटक किया और पूणा के किले में प्रवेश किया, शाहिस्ता खान की उंगलियां काट दीं और वह अपनी जान बचाकर भाग गया।
एक अन्य युद्ध में उन्होंने मुगलों के मुख्य व्यापारिक केन्द्र सूरत पर आक्रमण किया और भारी धन-संपत्ति तथा हथियार एकत्र किये। कुछ ही दिनों में उन्होंने एक-एक करके मुगलों और बीजापुर के सुल्तानों के किलों को अपने कब्जे में लेना शुरू कर दिया। छत्रपति शिवाजी एक महान राजनेता थे जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में सिर झुकाया और अनुकूल परिस्थितियों में अपना सिर ऊंचा उठाया।
वर्ष 1674 के युद्ध में विजय के बाद शिवाजी का सात नदियों और चार समुद्रों से एकत्र किए गए पवित्र जल से अभिषेक किया गया और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिवाजी महाराज को छत्रपति की उपाधि के साथ हिंदू सम्राट के रूप में राज्याभिषेक किया गया। इस साम्राज्य को हिंदवी साम्राज्य के रूप में हिंदू पदपादशाही घोषित किया गया था।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के बाद एक लाख घोड़ों, हथियारों सहित एक प्रशिक्षित सेना तैयार की। अपने 27 साल के शासनकाल के दौरान, छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के अग्रणी राजाओं में से एक बन गए, न केवल सैन्य रणनीति में बल्कि प्रशासन में भी, उन्होंने अपने पास मौजूद 300 किलों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया। उन्होंने अकेले निर्णय लेने के बजाय 8 प्रधानमंत्रियों की एक मंत्रिपरिषद का गठन किया।
उन्होंने एक मजबूत विदेश नीति और खुफिया तंत्र की स्थापना की। इस सिद्धांत का पालन करते हुए कि सरकार समाज के लोगों के लिए हैं, उन्होंने व्यक्तिगत विलासिता पर कोई पैसा खर्च किये बिना जन कल्याण के लिए काम किया। उन्होंने पूरे राज्य को सर्वेक्षण करके स्थानीय लोगों के बीच समस्याओं को रोकने के लिए भूमि को आवंटित किया। उन्होंने सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था बनाई। बंजर भूमि को भी फसल के लिए उपयुक्त खेतों में बदलने के लिए महान प्रयास किये गये हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज का साम्राज्य आज के भारत के दक्षिण-पश्चिम में एक छोटे राज्य के रूप में शुरू हुआ और बाद में एक महान साम्राज्य में बदल गया जो 1674 में हिंदवी स्वराज के रूप में अस्तित्व में आया और 1818 तक दक्षिण एशिया में सबसे बड़े साम्राज्य के रूप में विकसित हुआ। 1680 में शिवाजी की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी छत्रपति और पेशवा के रूप में शासन करते रहे। छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज 145 वर्षों से अधिक समय तक चला।
इस प्रकार स्वतंत्र भारत निर्माण हेतु लड़ने वाले वीरों के प्रेरणादाता एवं भारतीय जीवनशैली की रक्षा के लिए, प्राचीन हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रयास अमर और अनुकरणीय हैं। यदि कोई अपनी तेजतर्रार देशभक्ति, स्वधर्मनिष्ठा, धार्मिकता और असीम साहस को नाम देता है तो वह छत्रपति शिवाजी महाराज बन जाता है। (लेखक विश्व हिंदू परिषद और अखिल भारतीय गौ रक्षा के सहप्रमुख हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध एक वैश्विक बहस का विषय बन गया है। जबकि कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, अन्य देशों ने इसके उपयोग को कानूनी दायरे में लाने का फैसला किया है। यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जेम) टीम के अनुसार, कम से कम 79 शिक्षा प्रणालियों ने स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो बच्चों के शिक्षा और गोपनीयता पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं।
फ्रांस में वर्ष 2018 में स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जो छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और शैक्षिक प्रदर्शन पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करता था। इसी तरह, कुछ आस्ट्रेलियाई और ब्रिटिश स्कूलों ने भी स्कूल घंटों के दौरान स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो विचलित होने और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं।
अन्य देशों ने भी स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाए हैं। चीन के झेंगझओए शहर में, माता-पिता को अपने बच्चों को प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में स्मार्टफोन का उपयोग करने के लिए लिखित सहमति देनी होती है। इसके अलावा, कुछ देशों ने गोपनीयता की चिंताओं के कारण शैक्षिक सेटिंग्स से विशिष्ट अनुप्रयोगों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। डेनमार्क और फ्रांस ने दोनों ने गूगल वर्कस्पेस पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि जर्मनी के कुछ राज्यों ने माइक्रोसॉफ्ट उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है।
इसके विपरीत, कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने का फैसला किया है, इसके बजाय प्रतिबंध लगाने के। यह दृष्टिकोण शैक्षिक सेटिंग्स में स्मार्टफोन के संभावित लाभों को स्वीकार करता है, जैसे कि आनलाइन संसाधनों तक पहुंच और छात्रों और शिक्षकों के बीच संचार को सुविधाजनक बनाने की क्षमता। भारत में, उदाहरण के लिए, सरकार ने स्कूलों में स्मार्टफोन के जिम्मेदार उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो शिक्षकों को इन उपकरणों को शिक्षा और सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले तरीके से अपने शिक्षण प्रथाओं में शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
सिंगापुर ने भी स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए कई पहल शुरू की हैं, जिनमें मोबाइल डिवाइस प्रबंधन सॉफ्टवेयर का उपयोग शामिल है ताकि स्मार्टफोन के उपयोग पर निगरानी और नियंत्रण किया जा सके। इसी तरह, कुछ कनाडाई स्कूलों ने स्कूल घंटों के दौरान स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए नीतियां लागू की हैं, जिनमें निर्दिष्ट टेक-फ्री क्षेत्रों का उपयोग शामिल है।
स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या इसके उपयोग को विनियमित करने का निर्णय शैक्षिक समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं और चिंताओं सहित विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। इसके बजाय एक समग्र प्रतिबंध लगाने के बजाय, स्कूलों और सरकारों को एक संतुलन खोजने का प्रयास करना चाहिए जो छात्रों को स्मार्टफोन के लाभों का लाभ उठाने की अनुमति देता है जबकि जोखिमों को कम करता है।
स्पष्ट नीतियों को लागू करके, छात्रों और शिक्षकों को शिक्षित करके, और स्मार्टफोन के उपयोग पर निगरानी करके, स्कूल स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने में मदद कर सकते हैं जो शिक्षा, सुरक्षा और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, स्कूल स्मार्टफोन की लत और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने के लिए शारीरिक गतिविधि और आउटडोर प्ले को बढ़ावा दे सकते हैं।
भारत सरकार ने स्कूली छात्रों में स्मार्टफोन की लत के मुद्दे को हल करने के लिए कई कदम उठाये हैं। मुख्य उपायों में से एक स्कूलों में जिम्मेदार स्मार्टफोन उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी करना है। ये दिशा-निर्देश शिक्षकों को अपने शिक्षण प्रथाओं में स्मार्टफोन को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जो शिक्षा और सुरक्षा को बढ़ावा देते हैं।
स्मार्टफोन के उपयोग को विनियमित करने के लिए, कुछ भारतीय स्कूलों ने परिसर के आसपास मोबाइल फोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। अन्य लोग दिन के विशिष्ट समय या स्कूल के क्षेत्रों में फोन के उपयोग को प्रतिबंधित करने की सिफारिश करते हैं। यह दृष्टिकोण विचलित होने को कम करता है और एक स्वस्थ शिक्षा वातावरण को बढ़ावा देता है।
स्मार्टफोन की लत बच्चों पर कई नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, जिनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी, साइबर बुलिंग का खतरा बढ़ना और शारीरिक गतिविधि में कमी शामिल है। इसके अलावा, अत्यधिक स्मार्टफोन के उपयोग को कई नकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से जोड़ा गया है, जिनमें चिंता, अवसाद और अकेलापन शामिल हैं। इन जोखिमों को कम करने के लिए, स्कूल और माता-पिता कई कदम उठा सकते हैं, जिनमें स्मार्टफोन के उपयोग पर सीमाएं निर्धारित करना, शारीरिक गतिविधि और आउटडोर प्ले को प्रोत्साहित करना और डिजिटल साक्षरता और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा देना शामिल है।
स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर बहस जटिल और बहुआयामी है। जबकि कुछ देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है, अन्य देशों ने इसके उपयोग को विनियमित करने का फैसला किया है। स्मार्टफोन के लाभों का लाभ उठाने की अनुमति देते हुए छात्रों को जोखिमों को कम करने के लिए एक संतुलन खोजने से, स्कूल और सरकारें छात्रों के लिए एक स्वस्थ और समर्थनकारी शिक्षा वातावरण बनाने में मदद कर सकती हैं।
अंतत:, स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने या इसके उपयोग को विनियमित करने का निर्णय कई कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें शैक्षिक समुदाय की विशिष्ट आवश्यकताओं और चिंताओं शामिल हैं। स्कूल, सरकारें और माता-पिता मिलकर काम करके यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि छात्र स्मार्टफोन का उपयोग शिक्षा, सुरक्षा और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने वाले तरीके से करते हैं। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज की युवा पीढ़ी एक अजीब सी मानसिक उलझन में फंसी हुई है। एक ओर वे अपने करियर को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं, तो दूसरी ओर उनका झुकाव भौतिकतावादी जीवनशैली की ओर बढ़ता जा रहा है। माता-पिता और बच्चों के बीच की दूरी बढ़ रही है, जिसके चलते बच्चे सही मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। नैतिक मूल्यों में गिरावट, बड़ों का सम्मान न करना, नाइट कल्चर को अपनाना, व्यवहारिक ज्ञान की कमी—ये सभी समस्याएं कहीं न कहीं हमारे पेरेंटिंग के ढांचे पर सवाल उठाती हैं।
करियर की चिंता और पैसे का बढ़ता आकर्षण, आज का युवा अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करता है। करियर बनाने की दौड़ में वे मानसिक दबाव में रहते हैं, और इसी तनाव के कारण वे अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। माता-पिता भी इस स्थिति को समझने के बजाय, बच्चों को केवल आर्थिक सहायता देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं।
हालांकि, पैसों की आपूर्ति से जीवन तो चल सकता है, परंतु सही मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग न मिलने से बच्चे अकेलापन महसूस करने लगते हैं। बच्चों में व्यवहारिक ज्ञान की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। वे सामाजिक संबंधों को समझने में असमर्थ हो रहे हैं, आत्मकेंद्रित हो गए हैं, और केवल अपने फायदे को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसका एक मुख्य कारण यह भी है कि माता-पिता स्वयं भी बच्चों के साथ कम समय बिताते हैं और उन्हें नैतिक मूल्यों की शिक्षा नहीं दे पाते।
नतीजा यह होता है कि बच्चे बड़ों का सम्मान नहीं करते, अनुशासनहीन हो जाते हैं, और अपनी इच्छाओं को ही सर्वोपरि मानने लगते हैं। माता-पिता और बच्चों के बीच बढ़ती दूरी के कारण पारिवारिक संबंधों में दूरियां बढ़ रही हैं। पहले जहां संयुक्त परिवारों में बच्चों को दादा-दादी, चाचा-चाची से भी सीखने का अवसर मिलता था, वहीं आज एकल परिवारों में माता-पिता अपने करियर और निजी जीवन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते।
इस वजह से बच्चों में भावनात्मक अस्थिरता बढ़ रही है और वे सोशल मीडिया, दोस्तों, या अन्य बाहरी साधनों से अपना मानसिक सहारा खोजने लगते हैं, जो हमेशा सही दिशा में नहीं होता। आजकल नाइट कल्चर का प्रभाव बढ़ रहा है। देर रात तक बाहर रहना, अनावश्यक पार्टी करना, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताना बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। माता-पिता इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे, क्योंकि वे या तो अधिक लिबरल बनना चाहते हैं या फिर अपनी व्यस्तता के कारण इस पर ध्यान नहीं देते।
इससे बच्चों में अनुशासन की भावना कम होती जा रही है, जो अवसाद और तनाव को और बढ़ाने का काम कर रही है। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि इन तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए क्या कर सकते हैं माता-पिता?,? तो बच्चों के साथ समय बिताएं: सिर्फ पैसों से ही बच्चों की जरूरतें पूरी नहीं होतीं, उन्हें माता-पिता का समय और प्यार भी चाहिए। उनके साथ नियमित रूप से बातचीत करें और उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करें। सही मार्गदर्शन दें: करियर और पैसे की अहमियत समझाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ-साथ नैतिकता और जीवन मूल्यों का ज्ञान देना भी आवश्यक है।
व्यवहारिक शिक्षा दें: बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान भी दें। उन्हें सिखाएं कि कैसे दूसरों के साथ व्यवहार करना चाहिए और समाज में अच्छे संबंध कैसे बनाए रखें। संस्कारों पर जोर दें: बड़ों का सम्मान करना, अनुशासन का पालन करना, और सही-गलत में अंतर समझना बच्चों को घर से ही सीखना चाहिए। नाइट कल्चर पर नियंत्रण रखें: बच्चों को अनुशासन में रखें और समय की पाबंदी सिखाएं।
उन्हें समझाएं कि पर्याप्त नींद और दिनचर्या का सही पालन उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। अगर सभी माता-पिता पैसे देने के साथ-साथ यह भी जिम्मेदारी अगर उठाएं तो भविष्य हमारा उज्जवल होगा। समझने की बात यहां यह है कि बच्चों में बढ़ते अवसाद के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन खराब पेरेंटिंग इसमें एक प्रमुख भूमिका निभाती है। माता-पिता को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी बच्चों का समर्थन करना चाहिए।
यदि आज की युवा पीढ़ी को सही मार्गदर्शन नहीं मिला, तो आने वाला भविष्य अंधकारमय हो सकता है। इसलिए, माता-पिता को अपने बच्चों के साथ मजबूत रिश्ता बनाना होगा, उन्हें नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान से संपन्न करना होगा, ताकि वे मानसिक रूप से मजबूत और जीवन में सफल बन सकें। (लेखक रांची विश्वविद्यालय, रांची से संबद्ध कार्तिक उरांव महाविद्यालय, गुमला के रंगकर्मी, निर्देशक सह सहायक आचार्य हैं।)
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