विचार

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Published / 2026-03-05 13:34:41
वक्त का हर शै गुलाम... नीतीश की विदाई की बस इत्ती सी कहानी है

  • वक्त का हर शै गुलाम... नीतीश की विदाई की बस इत्ती सी कहानी है

शंभु नाथ चौधरी

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वक्त का हर शै गुलाम। वक्त के सामने कुछ भी स्थायी नहीं होता। न ताज। न तख्त। वक्त सबसे बड़ा खिलाड़ी है और जिसे हम-आप बड़ा खिलाड़ी मान बैठते हैं, वह भी आखिरकार वक्त का मोहरा होता है। अब बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ आया है। नीतीश कुमार ने खुद लिखा है-वे राज्यसभा जा रहे हैं। उन्होंने इसे अपनी मर्जी बताया। मगर सियासत के सिकंदर की भी हर मर्जी अपनी नहीं होती।

नीतीश का एग्जिट प्लान मोदी-शाह ने लिखा है। उसी मोदी ने, जिनके साथ कभी नीतीश ने मंच साझा करने से इनकार कर दिया था। तमाम इफ-बट के बावजूद आज की सियासत में मोदी-शाह सिकंदर हैं। अभी हर पत्ता उनकी मर्जी से खड़कता है। हर किसी को पता है कि नीतीश पाटलिपुत्र से निर्वासित नहीं होना चाहते थे, लेकिन वक्त ऐसा निर्मम है कि वह निर्वासन को भी अपनी इच्छा बता रहे हैं।

नीतीश की विदाई के साथ बिहार की सत्ता की ड्राइविंग सीट अब भाजपा के पास होगी। चुनाव के बाद भाजपा के पास ज़्यादा सीटें थीं। फिर भी स्टीयरिंग व्हील नीतीश के हाथ में रहा। वे मुख्यमंत्री बने रहे। यह पहली बार नहीं हुआ था।  अवसरों को साधने में माहिर नीतीश कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में जाते रहे, लेकिन वह सबके लिए सिरमौर बने रहे।

उनकी अदाओं पर रीझने वाले लोग कहते थे-नीतीश वक्त को मोड़ लेते हैं। लेकिन सच थोड़ा अलग है। वक्त किसी का नहीं होता। हर शख्स उसका कैदी है। नीतीश कुमार की सियासी यात्रा लंबी रही। और बेहद दिलचस्प भी। 1985 में वे पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे थे। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में। फिर धीरे-धीरे वे समाजवादी राजनीति के मजबूत चेहरे बने। 1989 में जनता दल के महासचिव बने और उसी साल लोकसभा पहुंचे।

दिल्ली की राजनीति में उनकी एंट्री यहीं से हुई। 1994 में उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी बनाई। यह उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट था। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे केंद्रीय मंत्री बने। रेल मंत्री के तौर पर उनकी पहचान मजबूत हुई। रेलवे मॉडर्नाइजेशन और सेफ्टी पर उन्होंने बेहतरीन काम किया।

लेकिन उनका असली अध्याय बिहार में लिखा गया। 2000 में वे पहली बार मुख्यमंत्री बने। सरकार सात दिन चली। मगर कहानी खत्म नहीं हुई। 2005 में वे फिर लौटे और लंबे समय तक सत्ता के केंद्र में रहे। कानून व्यवस्था सुधरी। सड़कें बनीं। स्कूल खुले। वह सुशासन बाबू कहलाने लगे।

इस बीच वह सियासत में पलटी मारने की भी अजब-गजब कहानियां लिखते रहे। 2013 में उन्होंने एनडीए छोड़ा। 2015 में राजद के साथ गए। 2017 में फिर भाजपा के साथ। फिर महागठबंधन। फिर एनडीए।  गठबंधन बदलते रहे। लेकिन कुर्सी नहीं छूटी। 

किसी ने उन्हें पलटू कुमार कहा, किसी ने कुर्सी कुमार। नीतीश दस बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। यह अपने आप में रिकॉर्ड है। अब सवाल है-उनके बाद उनकी पार्टी का क्या? जदयू की दूसरी कतार कमजोर है। उन्होंने कभी किसी को अपने बराबर नहीं बनने दिया। यह उनकी लीडरशिप स्टाइल का हिस्सा था या सियासी मजबूरी, वही जानें।

खबर है कि अब उनके बेटे निशांत कुमार राजनीति में आ रहे हैं। लेकिन निशांत का मिजाज अलग बताया जाता है। उनकी आध्यात्म में दिलचस्पी रही है। उन्होंने तकरीबन अपनी आधी उम्र जी ली है, लेकिन सियासत कभी उनकी जिंदगी के सिलेबस का हिस्सा नहीं रही। एकांत पसंद यह शख्स पॉलिटिकल बैटलफील्ड में कैसे उतरेगा? और उतरेगा तो कितनी दूर तक चल पाएगा-यह बड़ा सवाल है।

और उससे भी बड़ा सवाल-जदयू का भविष्य? क्या पार्टी नीतीश के बाद भी प्रासंगिक रहेगी? या वह धीरे-धीरे भाजपा की परछाईं बन जाएगी? सियासत का एक उसूल है। हर दौर का अपना किरदार होता है। कभी लालू का दौर था। फिर नीतीश का। आज पाटलिपुत्र की धरती पर एक नए चैप्टर का आगाज हो रहा है। अंजाम क्या होगा? वक्त जाने…खुदा जाने। (लेखक शंभूनाथ चौधरी द रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)

Published / 2026-02-17 21:22:36
ताकतवर गणेश जी की बाल कहानी

राजकुमारी पांडेय 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। गणेश जी के कान बहुत बड़े थे। उनका नाक हाथी के सूड़ जैसा था। उनका पेट बहुत बड़ा मटके जैसा था। उनको लड्डू और मोदक बहुत पसंद था। एक बार में वो एक नहीं, दो नहीं बल्कि दस लड्डू खा लेते थे। गणेश जी के पड़ोस मे गोविंद सिंह रहता था। उसके बेटे सोमदेव की शादी थी। सोमदेव गणेश जी का दोस्त था। सोमदेव की मां यमुना देवी अपने पति गोविंद सिंह से कहती है, सोमदेव की शादी में गणेश जी को साथ नहीं ले जायेंगे। 

गोविंद सिंह ने पूछा कि गणेश जी तो अच्छे बालक हैं। उसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? उसे सोमदेव की बारात मे क्यों नहीं ले जाना? वो हमारे बेटे सोमदेव का दोस्त भी है। यमुना देवी कहती है, अरे, आपको पता नहीं है क्या गणेश जी कितना खाते हैं। सारी बारात का खाना वो अकेले ही खा जायेंगे। और हां, वो सुंदर भी नहीं है। उसकी सूंड़ जैसी नाक है और एक दांत टूटा हुआ है। सोमदेव की बारात को देखकर सभी हंसेंगे। नहीं, नहीं, गणेश हमारे साथ नहीं जायेगा। 

दूसरे दिन बारात रांची से रामगढ़ चल पड़ी। बारात अभी मेन रोड पार करके चर्च रोड तक पहुंची ही थी कि सोमदेव की गाड़ी का पहिया कीचड़ में फंस गया। सभी बाराती अपनी-अपनी गाड़ियों से उतरे। सब ने मिलकर गाड़ी को धक्का दिया। बहुत सारे लोगों के जूते चप्पल कीचड़ से सन गये। कुछ बारातियों के कपड़ों मे कीचड़ के छींटे लग गये। 

सभी चिंता करने लगे, अब क्या करें? शादी का मुहूर्त करीब आते जा रहा है। दोपहर भी बीत चुकी है। अब शाम हो जायेगी। सभी बहुत परेशान थे। 
सोमदेव सोच रहा था, अब पापा से अपने मन की बात बतला ही दूं। उसे पूरा विश्वास था, मेरा दोस्त गणेश सब ठीक कर देगा। उसने अपने पापा गोविंद सिंह से और माता यमुना देवी से कहा, मां मेरे दोस्त गणेश को बुला लीजिये। 

वो सब ठीक कर देगा। मां यमुना देवि को विश्वास ही नहीं हो रहा था। पर सोमदेव के बार-बार टोकने पर रमेश और गोकुल को गणेश जी के घर भेजती है। तुम दोनों जाओ और गणेश जी को समझा बुझा कर लाओ। वो भी हमारे साथ बारात में चलेंगे। रमेश और गोकुल जैसे ही घर जाने आटो में बैठे सामने से गणेश आते हुए दिखलाई दिया। वे हंसते-गाते झूमते झामते, अपनी सूंड़ हिलाते आ रहा था।

पास आकर गणेश ने यमुना देवी से पूछा, काकी, क्या बात है। बारात यहां क्यों खड़ी है। यमुना काकी ने कहा, गाड़ी का पहिया कीचड़ में धंस गया है। सब थक गये हैं। पर पहिया हिल भी नहीं रहा है। गणेश ने कहा, बस इतनी सी बात है, काकी। ये लो, मैं इसे अभी ठीक कर देता हूं। गणेश गाड़ी के सामने जाकर खड़ा हुआ और अपनी सूंड़ से गाड़ी को धक्का दिया। गाड़ी एक झटके में कीचड़ से बाहर आ गयी। सभी ने जोरों से पुकारा, गणेश जी महाराज की जय हो। 

सीख : आदमी के गुण देखे जाते हैं। उसके गुणों की पूजा होती है। किसी की ताकत और मदद करने की भावना महत्वपूर्ण है। 

Published / 2026-02-01 21:25:43
विकसित भारत की आत्मा : संत रविदास के विचारों की समकालीन प्रासंगिकता

संत रविदास जयंती पर विशेष 

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दहलीज पर खड़ा है। आर्थिक प्रगति, तकनीकी उन्नति, डिजिटल क्रांति और वैश्विक पहचान ये सभी उपलब्धियां गर्व का विषय हैं। किंतु इसी विकास यात्रा के साथ सामाजिक विषमता, जातिगत मानसिकता, धार्मिक असहिष्णुता, नैतिक पतन, बेरोजगारी, उपभोक्तावाद और मूल्यहीनता जैसी समकालीन चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी हैं। ऐसे समय में जब युवा वर्ग भ्रम, आक्रोश और अस्मिता के संकट से जूझ रहा है, संत रविदास के विचार दीपस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करते हैं। 

रविदास जयंती केवल एक संत की स्मृति नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, समानता और श्रम-सम्मान के दर्शन को पुन: समझने का अवसर है। संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) के निकट सीर गोवर्धनपुर में माना जाता है। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जो सामाजिक दृष्टि से उस समय तथाकथित निम्न वर्ग में रखा जाता था। उनके पिता संतोख दास और माता कर्मा देवी (या कालसा देवी) श्रमजीवी थे। पिता जूते-चप्पल बनाने का कार्य करते थे। यह वही पेशा था जिसे समाज ने हेय दृष्टि से देखा, पर रविदास ने इसी श्रम को साधना में बदल दिया। 

यहीं से उनका पहला संदेश निकलता है काम छोटा नहीं होता, सोच छोटी होती है। संत रविदास की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, पर उनकी आध्यात्मिक और बौद्धिक चेतना अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने जीवन की पाठशाला से शिक्षा ली। वे भक्ति आंदोलन की निर्गुण धारा के प्रमुख संत थे। कबीर, नामदेव, दादू, सेन, त्रिलोचन ये सभी संत एक ही सामाजिक चेतना की कड़ी थे, जो कर्मकांड, जाति-भेद और पाखंड के विरुद्ध खड़े हुए। 

रविदास के गुरु को लेकर मतभेद हैं, किंतु यह निर्विवाद है कि उन्होंने स्वानुभूति को ही अपना गुरु माना। संत रविदास का दर्शन केवल भक्ति तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज-सुधार का क्रांतिकारी घोषणापत्र था। उनके प्रमुख विचार थे जाति आधारित भेदभाव का विरोध, श्रम की प्रतिष्ठा, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा, समता और करुणा, ईश्वर की सर्वव्यापकता। 

उनका प्रसिद्ध पद है मन चंगा तो कठौती में गंगा आज के उपभोक्तावादी और तनावग्रस्त समाज के लिए यह पंक्ति मानसिक स्वास्थ्य और आंतरिक शांति का सूत्र है। संत रविदास की सबसे मौलिक अवधारणा है बेगमपुरा। बेगमपुरा शहर को नाउं, दुख-अंदोह नाहीं तिहि ठाउं। बेगमपुरा का अर्थ है ऐसा नगर जहां किसी प्रकार का भय, दुख, भेदभाव या शोषण न हो। 

संत रविदास कहते हैं कि यह एक ऐसा शहर है जहां कोई मानसिक या सामाजिक पीड़ा नहीं है कोई कर (खिराज) या जबरन वसूली नहीं, कोई अपराध का भय नहीं, कोई जाति, ऊंच-नीच या अपमान नहीं, उस समाज में सभी लोग समान हैं, कोई पराया नहीं, हर व्यक्ति जहाँ चाहे, सम्मान के साथ रह सकता है। यह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित समाज की परिकल्पना है। 

यह केवल आध्यात्मिक कल्पना नहीं, बल्कि समाजवादी और समतामूलक राष्ट्र की पूर्व-परिकल्पना है। आज जब हम विकसित भारत @2047 की बात करते हैं, तो बेगमपुरा उसका नैतिक खाका बन सकता है। राष्ट्र के प्रति संत रविदास का दायित्वबोध यह बताता है कि संत रविदास ने कभी सत्ता नहीं चाही, पर उन्होंने समाज को जागृत किया और जागृत समाज ही राष्ट्र की शक्ति होता है। उन्होंने लोगों को सिखाया कि राष्ट्र केवल भूमि नहीं, मानव मूल्यों का समुच्चय है। 

भक्ति का अर्थ पलायन नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व है, धर्म का अर्थ विभाजन नहीं, मानवता का विस्तार है, मीरा, जो एक राजघराने से थीं, उन्होंने भी रविदास को गुरु माना। यह तथ्य सामाजिक समरसता का ऐतिहासिक उदाहरण है। संत रविदास का जीवन आसान नहीं था। जातिगत अपमान, आर्थिक तंगी, सामाजिक बहिष्कार, धार्मिक कट्टरता लेकिन उन्होंने कभी प्रतिशोध नहीं चुना। उन्होंने विरोध को करुणा से और अपमान को आत्मबल से परास्त किया। 

आज के युवाओं के लिए यह सबसे बड़ा सबक है- संघर्ष से भागना नहीं, उसे मूल्यबोध में बदलना। आज की प्रमुख समस्याएं—जातिगत राजनीति, सोशल मीडिया पर घृणा, बेरोजगार युवाओं में कुंठा, धर्म के नाम पर विभाजन, नैतिक पतन इन सबका समाधान संत रविदास के विचारों में निहित है, जाति नहीं, कर्म से पहचान, धर्म नहीं, मानवता से मूल्यांकन, भोग नहीं, संतुलन से सुख। आज का युवा प्रश्न पूछता है—मैं कौन हूं? मेरा मूल्य क्या है? 

संत रविदास उत्तर देते हैं—तुम्हारा मूल्य तुम्हारे जन्म से नहीं, तुम्हारे विचार और कर्म से तय होता है। यदि युवा श्रम को सम्मान दे, विविधता को स्वीकार करे, आत्मसम्मान को अहंकार न बनाए, तकनीक के साथ नैतिकता जोड़े तो वही युवा विकसित भारत का निमार्ता बनेगा। तात्पर्य रविदास केवल अतीत नहीं, भविष्य हैं। संत रविदास इतिहास के पन्नों में बंद कोई संत नहीं, बल्कि भारत की चेतना में प्रवाहित विचारधारा हैं। 

विकसित भारत का अर्थ केवल ऊंची इमारतें, तेज इंटरनेट, बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। विकसित भारत का अर्थ है समान अवसर, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक समरसता और मानवीय गरिमा और इन सबकी आत्मा संत रविदास के विचारों में बसती है। रविदास जयंती पर उन्हें स्मरण करना तभी सार्थक होगा, जब हम उनके विचारों की केवल माला नहीं, मार्ग बनायें और अपने जीवन में आत्मसात करें। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देशक और असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

Published / 2026-01-23 21:12:01
झारखंड की आध्यात्मिक विरासत टांगीनाथ

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की धरती केवल खनिज, वन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि भारत की प्राचीन सनातन साधना, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना की भी जीवंत साक्षी रही है। इसी पवित्र धरती पर अवस्थित टांगीनाथ धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा, सनातनी परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास का एक मौन किंतु सशक्त घोषणापत्र है। टांगीनाथ शब्द अपने आप में गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है।

लोकमान्यता के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग और उससे जुड़ी टांगी (फरसा) शक्ति, तप और त्याग की प्रतीक है। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन साधकों की कठोर तपस्या, वैराग्य और ब्रह्मानुभूति का साक्ष्य है। यह धाम गुमला जिले के चैनपुर डुमरी प्रखंड के घने वनों और पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां प्रकृति स्वयं ध्यान और साधना की सहचरी बन जाती है। यही कारण है कि टांगीनाथ को आदिकाल से ही तपस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त रही है। 

टांगीनाथ धाम को लेकर झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों में एक अत्यंत प्राचीन और सुदृढ़ मान्यता प्रचलित है कि यह स्थल भगवान परशुराम की तप:स्थली रहा है। यह मान्यता केवल लोककथा नहीं, बल्कि भारत की सनातन तपस्वी परंपरा, शैव-वैष्णव समन्वय और भौगोलिक साक्ष्यों से भी जुड़ती दिखाई देती है। भगवान परशुराम को भारतीय परंपरा में विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। जिनको त्रेता युग के प्रारंभिक काल का महापुरुष चिरंजीवी (अमर) तपस्वी योद्धा माना गया है। 

अधिकांश विद्वान परशुराम को ईसा से लगभग 3000-4000 वर्ष पूर्व के कालखंड में स्थापित करते हैं। वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि शैव साधक, कठोर तपस्वी और ब्रह्मचारी योगी थे। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टांगीनाथ परशुराम की तप:स्थली थी? तो ग्रंथों में टांगीनाथ नाम से सीधा उल्लेख नहीं मिलता, किंतु स्कंद पुराण, वायु पुराण, शिव पुराण में ऐसे वनांचल, पर्वतीय तपोवनों का उल्लेख है जहां परशुराम ने शिव-साधना की। 

झारखंड का यह क्षेत्र उस समय दंडकारण्य और उत्तर कोसल क्षेत्र की सीमाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। अत: भौगोलिक संगति पूरी तरह बनती है। टांगीनाथ में अवस्थित त्रिशूल/टांगी को लेकर स्थानीय जनमान्यता है कि यह स्वयं भगवान परशुराम द्वारा स्थापित है। यह उनकी तपस्या का प्रतीक है। इसी टांगी स्थानीय भाषा में (त्रिशूल) के कारण स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से यह त्रिशूल धातु-विशेष (लोहे/मिश्र धातु) का बना है। इसका रूप आधुनिक नहीं, बल्कि प्राचीन लौह युगीन शस्त्र शैली से मेल खाता है। 

अनुमानत: यह 2000 वर्ष से अधिक पुराना हो सकता है, हालाँकि इसकी कार्बन डेटिंग या वैज्ञानिक जांच आज तक नहीं कराई गई, यह प्रशासनिक उपेक्षा का बड़ा उदाहरण है। भगवान परशुराम को शास्त्रों में परम शिवभक्त कहा गया है। उनके जीवन का एक बड़ा भाग शिव आराधना, तप, क्षत्रिय दमन के पश्चात प्रायश्चित में व्यतीत हुआ। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परशुराम ने एक निश्चित संकल्प संख्या के अंतर्गत शिवलिंग स्थापित किये, ये शिवलिंग प्राकृतिक शिलाओं से निर्मित हैं। पूरे टांगीनाथ पर्वत परिसर में सैकड़ों शिवलिंग बिखरे हुए हैं। 

यह संख्या संयोग नहीं, बल्कि तपस्या की गणना आधारित साधना पद्धति का संकेत देती है। स्थानीय पुजारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार 300 से 500 के बीच शिवलिंग होने की संभावना व्यक्त की जाती है। कई अब वनस्पति और मिट्टी में दब चुके हैं, स्थानीय लोग तो यह भी बताते हैं कि कई आसामाजिक तत्वों ने शिवलिंग को यहां से उठाकर कहीं-कहीं और भी ले गये हैं जिसका पता नहीं। परिसर में जो शिवलिंग हैं वह कुछ खंडित अवस्था में हैं। यह संख्या दशार्ती है कि यह स्थल एक सामान्य तपोभूमि नहीं रहा होगा। बल्कि एक दीर्घकालीन तपोवन परिसर रहा है। 

ग्रंथीय संकेत और लोकपरंपरा दोनों के आधार पर परशुराम ने कई चरणों में तपस्या की। प्रत्येक तपस्या 12 वर्षों की मानी जाती है। कुल अवधि 36 से 60 वर्षों तक की मानी जाती है। यह तपस्या शिव-अनुग्रह, आत्मशुद्धि और लोककल्याण के लिए थी। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान मंदिर संरचना परशुराम काल की नहीं है। परंतु यहां पर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े हुए मंदिर के अवशेषों से यह अनुभव होता है कि यहां संभवत: 9वीं-12वीं शताब्दी के बीच नागवंशी या किसी स्थानीय शैव शासकों द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसके अवशेष अभी भी परिसर में मौजूद है। 

परंतु मूल तप:स्थली उससे हजारों वर्ष पुरानी रही होगी। स्थानीय मान्यताओं में यह कथा प्रचलित है कि किसी छत्तीसगढ़ क्षेत्र के शासक ने सत्ता संघर्ष या धार्मिक अहंकार में टांगीनाथ मंदिर को आंशिक रूप से खंडित करवाया। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन खंडित शिलाएं, टूटी मूर्तियां, पुनर्निर्माण के संकेत इस कथा को पूर्णत: असत्य भी नहीं ठहराया जा सकता। यह संभवत: मध्यकालीन सत्ता संघर्ष, धार्मिक टकराव या संसाधन लूट का परिणाम रहा हो। धर्मग्रंथों में टांगीनाथ का नाम से उल्लेख नहीं मिलता है, किंतु यह स्थल शिव तपोवन श्रेणी में आता है। 

परशुराम से जुड़ी वनस्थली साधना परंपरा का सशक्त प्रमाण है। सनातन परंपरा में कई स्थलों के नाम कालांतर में परिवर्तित हो गए, पर उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा स्थिर रही। देश के इतिहास के पन्नों में टांगीनाथ को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। जबकि यह सर्वविदित है कि झारखंड क्षेत्र प्राचीन काल से ही शैव, वैष्णव और शक्ति उपासना की त्रिवेणी रहा है। टांगीनाथ इसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी है। जनश्रुतियों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यहां सिद्ध महात्माओं और योगियों ने वर्षों तक कठोर साधना की। 

यह स्थल वैदिक और उत्तरवैदिक सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ रहा है, जहां ब्रह्म, आत्मा और प्रकृति के सामंजस्य को जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार किया गया। यदि सनातन को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म को समझा जाये, तो टांगीनाथ का संबंध सीधे श्रीकृष्ण तत्व से जुड़ता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं योगस्थ: कुरु कर्माणि (अध्याय 2, श्लोक 48) अर्थात योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर कर्म करो। टांगीनाथ की परंपरा भी कर्म, तप और ध्यान के समन्वय पर आधारित है। 

यहाँ की साधना पद्धति में निष्काम कर्म, आत्मसंयम और ईश्वर से तादात्म्य का भाव स्पष्ट दिखाई देता है, जो श्रीकृष्ण के योग-दर्शन का ही विस्तार है। झारखंड की आदिवासी सनातन चेतना भी श्रीकृष्ण के प्रकृतिझ्रकेन्द्रित दर्शन से मेल खाती है, जहां वन, पर्वत, नदी और जीव-जंतु सभी ईश्वरीय सत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। टांगीनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि झारखंड की लोक-संस्कृति, आस्था और सामूहिक चेतना का केंद्र है। यहां लगने वाले मेले, धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखते हैं। 

यह स्थल बताता है कि झारखंड की संस्कृति किसी बाहरी प्रभाव की देन नहीं, बल्कि सनातन भारतीय संस्कृति की मूलधारा का अभिन्न अंग है। यदि टांगीनाथ का समुचित विकास किया जाए, तो यह स्थल आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, प्रकृति एवं वन पर्यटन, शोध एवं अध्ययन पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। यहां की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा इसे झारखंड का केदारनाथ बनने की क्षमता प्रदान करती है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद टांगीनाथ आज भी आधारभूत सुविधाओं की कमी समुचित सड़क और परिवहन व्यवस्थाओं के अभाव से जूझ रहा है। प्रचार-प्रसार की उपेक्षा, संरक्षण और शोध की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यह प्रशासनिक अनदेखी केवल एक स्थल की नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा की उपेक्षा है। 

यदि टांगीनाथ को केंद्र में रखकर सनातन सांस्कृतिक सर्किट, धार्मिक पर्यटन नीति, स्थानीय युवाओं को रोजगार, शोध एवं दस्तावेजीकरण जैसे प्रयास किए जायें, तो यह झारखंड की आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। टांगीनाथ झारखंड की केवल एक धरोहर नहीं, बल्कि सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि झारखंड की पहचान केवल खनिज से नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक आत्मबोध और सनातनी परंपरा से है। 

आज आवश्यकता है कि हम टांगीनाथ को केवल अतीत की स्मृति न बनाकर, उसे झारखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास का केंद्र बनायें। ठीक उसी प्रकार जैसे श्रीकृष्ण ने कर्म और चेतना के संतुलन से समाज को दिशा दी थी। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देश सह असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

Published / 2026-01-21 13:21:16
सनकी ट्रंप का यही व्यवहार...

त्रिवेणी दास

हरियाली दिख जाए तो 
भैंस लगाए दौड़, 
राह में जो भी आ जाए 
देता सिंग से फोड़...

देता सिंग से फोड़ 
सनकी ट्रंप का यही व्यवहार,
ग्रीनलैंड की देख हरियाली 
मुंह से टपकाए लार...

मुंह से टपकाए लार
हर जगह करता घुसपैठ,
क्यों दिया जाए नोबेल पुरस्कार 
है बना हुआ बिगड़ैल लठैत...

Published / 2026-01-17 21:43:49
मंगला और सुमंगला दो सखियों की धार्मिक कथा

राजकुमारी पाण्डेय 

एबीएन सोशल डेस्क। एक समय की बात है वृंदावन में एक महाराज जी बड़ी ही सुंदर कथा सुना रहे थे। यमुना नदी के उस पार गांव से दो सखियां वृंदावन में रोज सब्जी बेचने आती थी। उन दोनों में से एक का नाम था मंगला और दूसरी का सुमंगला। मंगला और सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी सिर पर रख आती और रोज वृंदावन में सब्जी बेचती। वह दोनों घर से अचार और रोटी लेकर आती और वापस यमुना के तट पर जाकर पेड़ की छाया में बैठकर अचार-रोटी खाती। यमुना जी का पानी पीती। बड़े ही आनंद के साथ नाव में बैठकर किराया देकर अपने घर चली जाती थी। वह दोनों वृंदावन के पास यमुना नदी के उस पार एक गांव में रहने वाली थी। परंतु कभी उन्होंने भगवान श्री कृष्ण का नाम नहीं सुना था।  

भक्ति क्या होती है पूजा पाठ क्या होता है उन्होंने कभी नहीं जाना। केवल अपना गुजारा करती और अपना पेट भरना जानती थी। वह दोनों बड़ी सहज थी। झूठ बोलना तो मानो उन्होंने अपने जीवन में जाना ही नहीं था। कपट क्या होता है मंगला और सुमंगला ये नहीं समझती थी। आज तक उन्होंने झूठ नहीं बोला था। उनके अंदर रति भर कपट नहीं था। जैसी ही वह दोनों बाहर से थी वैसे ही भीतर से भी।  

एक दिन दोनों सखियां सब्जी बेचने वृंदावन आयी। उनकी सब्जी जल्दी बिक गयी। सब्जी जल्दी बिकने पर देखा कि जहां वह सब्जी बेचने गयी थी, वहां एक बड़े ही ज्ञान की कथा चल रही थी। मंगला ने कहा- सुनो बहन सुमंगला, सब्जी तो आज जल्दी बिक गयी। हम इतनी जल्दी भी घर जाकर क्या करेंगे? यह महाराज जी कथा सुना रहे हैं, चलो कथा सुन लेते हैं। सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला, कथा क्या होती है? मंगला बोली बहन यह तो मुझे भी नहीं मालूम। पर चलो सब लोग कहते हैं कि कथा हो रही है तो चलो आज हम भी सुन ही लेंगे कि कथा क्या होती है? मंगला-सुमंगला दोनों सब्जी की टोकरी एक जगह रख कथा में गयी और सबसे पीछे पंडाल में जाकर बैठ गयी। दोनों ही बड़ी श्रद्धा से कथा सुनने लगी।  

महाराज जी कथा सुना रहे थे। कह रहे थे कि जिसने भगवान से प्रेम नहीं किया, उनका जीवन बेकार है। जिनका प्रेम कृष्ण के चरणों में नहीं हुआ उनका जीवन बेकार है। अरे आपने अगर भगवान को नहीं देखा, तो फिर क्या देखा? भगवान को नहीं पाया तो फिर क्या पाया? महाराज जी बड़े प्यार से भगवान की चर्चा सुना रहे थे। भगवान को प्राप्त कर लेना ही जीव मात्र, मनुष्य मात्र की सार्थकता है। महाराज जी कथा में कह रहे थे आप सबको पता है कि इस धरती पर आपका जन्म क्यों हुआ है? अरे भगवान को पाने के लिए आसे हो, तुम भगवान को खोजने के लिए आये हो। परंतु यहां आप लोग केवल अपना पेट भरने में लगे हो। पैसा इकट्ठा करने में लगे हो। भूल गये कि आने का उद्देश्य क्या था?  

जब महाराज जी ने इस तरह से कथा में समझाया और सुनाया तो मंगला और सुमंगला दोनों सखियां बड़ी प्रभावित हुई। मंगला ने कहा बहन सुमंगला देखो महाराज जी ने क्या कहा है कि श्री कृष्ण चरणों में प्रेम नहीं हुआ तो जीवन बेकार है। तो सुमंगला ने कहा कि बहन मंगला तो क्या हमारा जीवन बेकार हो जायेगा। क्या हमारी जिंदगी बेकार चली गयी? मंगला ने कहा- बहन लगता तो ऐसा ही है। अब कथा चल रही थी। इधर मंगला और सुमंगला को यमुना नदी पार करके वापस अपने गांव जाना था। इसलिए वह दोनों सखियां कथा से उठकर के चली गयी, परंतु दोनों सखियां रास्ते में यही चर्चा करती रही। 

बहन तू बता कभी तूने क्या कृष्ण को देखा है? भगवान को देखा है? मंगला बोली- बहन मैं तो हमेशा तेरे साथ रहती हूं। भला मैंने भगवान को कहां देखा है? तो सुमंगला बोली- बहन तो फिर हमें भगवान को देखना चाहिए। महाराज जी ने कहा कि यदि भगवान को नहीं देखा और भगवान से प्रेम नहीं किया तो जीवन बेकार है।  

सुमंगला ने कहा- यह बताओ फिर भगवान मिलेंगे? कहां मिलेंगे? तो मंगला ने कहा- मुझे लगता है भगवान साधु संतों के पास जरूर मिलेंगे। फिर दोनों सखियां बातें करते-करती यमुना नदी के तट पर पहुंच गयी। यमुना नदी के तट पर बैठकर वह दोनों अचार-रोटी खाने लगी और बस यही चर्चा कर रही थी कि हम तो तुच्छ प्राणी हैं। हम दोनों अभागी हैं। हमें कहां भगवान मिलेंगे? उन्होंने कहा साधुओं को भगवान मिलते होंगे। तभी यमुना के किनारे पर एक महाराज आते हैं। महाराज जी आये। उन्होंने अपना कमंडल और झोला यमुना के तट पर रखा और जंगल में शौच के लिए चले गये।  

जैसे ही महाराज जी जंगल में झाड़ियों के बीच जाकर बैठे, तो मंगला और सुमंगला आपस में कहने लगी- सुनो यह महाराज जी हैं और इनका सामान यहां रखा हुआ है। जरूर भगवान यहीं होंगे। महाराज जी तो यहां से बिल्कुल लंगोटी लगाकर के गये हैं। उनके शरीर पर तो कोई कपड़ा था नहीं। भगवान तो उन्होंने कहीं छुपाया नहीं था। जरूर उनके सामान में भगवान होंगे। मंगला बोली चलो फिरजल्दी से उन्होंने अपनी रोटी और अचार को छोड़ दिया और दोनों दौड़ कर गई और महाराज जी का जो सामान था कमंडल खोला तो उसमें कुछ नहीं मिला फिर झोला निकाला तो उसमें उनका पूजा पाठ का सामान था। वह कहने लगे अरे बहन इस झोली में तो भगवान नहीं हैं। देखो। ध्यान से देखो। भगवान तो महाराज जी के पास होते हैं। जरूर भगवान इनके पास होंगे, तुम्हें दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह दोनों सखियां इतनी भोली भाली थी कि उन्हें यह भी नहीं पता कि भगवान कहां है? 

उन्हें तो यह लगा कि भगवान साधुओं के पास होते हैं और साधु का झोला और सामान यहीं रखा हुआ है। अब उन्होंने महाराज जी का झोला पलट दिया पूरे झोले को खाली कर दिया। जब झोले को पूरा खाली कर दिया तो उसमे से एक छोटा सा डिब्बा निकला। अब जैसे ही उस डिब्बे को खोला तो उस डिब्बे के अंदर छोटे से लड्डू गोपाल जी बैठे हुए थे। लड्डू गोपाल जी को देखकर सुमंगला  ने कहा- बहन भगवान मिल गये। देखो यह रहे भगवान। मंगला रोने लगी तो सुमंगला बोली- बहन रोती क्यों हो? 

महाराज जी जरूर आपको डांटते होंगे। मंगला बोली- प्रभु अभी महराज जी नहीं है। महाराज जी अभी जंगल में गये हैं। आप एक काम करो, थोड़ी देर जब तक हम दोनों सखियां यहीं पर हैं आप अपना पांव सीधा कर लो। अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। आपको कोई डांटेगा नहीं। आप ने महाराज जी के डर के कारण पांव टेढ़ा करके रखा है। इतने छोटे से डिब्बे में बैठे हो आप। मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपको अपनी टोकरी में बैठाउंगी। मंगला ने कहा- लगता है भगवान ज्यादा ही डरे हैं। सुमंगला ने कहा- लाओ हम पांव सीधा कर देते हैं। भगवान को पकड़ा और लड्डू गोपाल जी का पांव पकड़ कर खींचने लगी। सुमंगला ने जब लड्डू गोपाल जी को पकड़ कर खींचा। उनके पैर को सीधा किया और कहा कि प्रभु अब आपको डरने की कोई जरूरत नहीं है। 

महाराज जी नहीं है आप अपना पांव सीधा कर लो थोड़ी देर आपको अच्छा लगेगा पांव सीधा करके। जब सुमंगला ने पांव सीधा किया, तो भगवान उसकी सहजता और उसकी सरलता पर रिझ गये। न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रिझ जाते हैं। भगवान उस मंगला और सुमंगला ने जब पांव पकड़ कर खींचा, तो श्याम सुंदर ने अपना पांव सीधा कर लिया। एक पांव नहीं, एक पांव मंगला ने खींचा तो सीधा हो गया और दूसरा पांव सुमंगला ने खींचा तो वह भी सीधा हो गया। अब तो भगवान बड़े हो गये। अभी टेढ़े पांव थे तो छोटे पांव सीधे हो गये। मंगला और सुमंगला ने ठाकुर जी को खड़ा किया। उनकी जो अचार रोटी बची हुई थी खाने के बाद उन्होंने कहा- प्रभु हमको लगता है आप भूखे हैं? आप खाना खा लीजिये। 

तो भगवान उनके प्रेम में रिझ कर उनकी बासी रोटी और अचार खाने लगे लड्डू गोपाल जी का मुंह खुला और वह भगवान को खिलाने लगी। भगवान उनकी तरफ देख कर मंद मंद मुस्कुराते जा रहे थे। मंगला और सुमंगला खिलाती जा रही थी। तब तक महराज जी जंगल के झाड़ियों से निकल कर आ गये और जब आये तो महराज जी ने देखा की हमारी झोली के पास दो महिलाएं खड़ी है। महराज जी तुरंत बोले अरे कौन हो चोर हो क्या? क्या चुराने आयी हो? महाराज जी दौड़े। कहने लगे पकड़ो, पकड़ो। अब मंगला और सुमंगला बोली- बहन भागो। फिर दोनों सखियां भगवान से कहने लगी- प्रभु फिर मिलेंगे हम। आपसे दोबारा आपके कब दर्शन होंगे? ऐसा कह कर भगवान को वहीं छोड़कर मंगला और सुमंगला भागी और अपनी टोकरी उठाकर तुरंत भाग गयी। अब महाराज जी बड़े गुस्से में आये और देखा तो पूरा सामान नीचे पड़ा हुआ था। 

झोली दूर पड़ी हुई थी। अब झोली को उठाया महराज जी ने अपना सामान रखा लड्डू गोपाल जी का डिब्बा देखा तो डिब्बा खुला हुआ था। देखा अरे डिब्बा खुला है। भगवान कहां हैं? यहां वहां देखा तो भगवान पड़े थे बालू रेत में। अब जैसे ही महाराज जी ने अपने भगवान जी को डिब्बे में रखा तो भगवान डिब्बे में आये ही नहीं। अब डिब्बे से पांव बाहर निकल रहे थे। भगवान डिब्बे में नहीं आ रहे थे। फिर जब महाराज जी ने ध्यान से देखा तो भगवान के दोनों पांव सीधे थे। यह देख कर महाराज जी लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़े और कहने लगे- प्रभु यह क्या लीला है? तब मंगला ने आवाज लगायी। महाराज जी भगवान को इतना डराना मत, आपने इन्हें डरा करके रखा था।

यह टेढ़ा पांव करके बैठे थे। हम दोनों सखियों ने इनका पांव सीधा किया है। अब उनके पांव टेढ़ा न करवाना। मंगला यह कह कर चली गयी और वह साधु बस एक नजर से मंगला और सुमंगला को देखते रहे। कहने लगे- रुक जाओ, रुक जाओ। मुझे अपने चरणों की धूल ले लेने दो। लेकिन मंगल और सुमंगला नहीं रुकी। वह दोनों सखियां चली गयी। उन्हें लग रहा था कि महाराज जी कहीं हमें पकड़ कर मार लगायेंगे। फिर महाराज जी बोले- हे नाथ मेरी सारी जिंदगी निकल गयी आपकी सेवा करते-करते। 

परंतु आपका पांव मैं सीधा नहीं कर पाया। और यह दोनों गांव की स्त्रियां, इन्होंने आपको अचार और रोटी का भोग लगाया और उनके कहने से आप ने भोग ग्रहण कर लिया। उनके कहने से अपना पांव सीधा कर लिया। वह महाराज जी भगवान के चरणों में गिरकर प्रणाम करते हुए कहने लगे- हे नाथ मैं अभागा हूं। मैंने सिर्फ आपको अपनी झोली में रखकर केवल वजन ढोया है। जैसा प्रेम उन दोनों ने कर लिया आपसे, जितनी सहजता और सरलता मेरे भीतर नहीं आयी। जिसके कारण आपने मुझे कभी दर्शन नहीं दिये।

Published / 2025-12-31 20:36:53
अयोध्या की प्रतिष्ठा द्वादशी पर गदगद हैं सनातनी

आकरापु केशवराजु 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। आज प्रतिष्ठा द्वादशी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में रामलल्ला मूर्ति की स्थापना के एक साल पूरे होने के उपलक्ष्य में ध्वस्त खंडहरों में भव्य मंदिर का निर्माण श्रीराम जन्मभूमि मंदिर: अयोध्या आंदोलन जिसने भारतीय राष्ट्र को जगाया और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ाया। 
विषय में प्रवेश करने से पहले, आइये श्री राम जन्मभूमि आंदोलन की पृष्ठभूमि की समीक्षा करें। यह आश्चर्य की बात है कि देश में मंदिर निर्माण के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने आंदोलन किया। 

विद्वानों से लेकर देश के आम लोगों ने श्रीराम को आदर्श माना, और यह भी आश्चर्य की बात है कि उन्हें अपने आराध्य भगवान की जन्मभूमि के लिए पीढ़ियों तक संघर्ष करना पड़ा, जिनके मन में उनके प्रति अटूट सम्मान और आस्था थी। यह संघर्ष 1528 से लेकर आज तक, मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद भी जारी है। लोगों के लंबे संघर्ष ने इस देश के स्वाभिमान और लोगों की राष्ट्रीय भावना को जन्म दिया है। 

यही बात डेविड फ्रॉली ने भी कही, जो प्रसिद्ध अमेरिकन काउंसिल आफ वैदिक एंड एस्ट्रोलॉजी के अध्यक्ष रह चुके हैं। अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन सिर्फ मंदिर के लिए नहीं, यह आंदोलन भारत के सांस्कृतिक गौरव के पुनरुत्थान की शुरुआत है। 

देश की जनता के स्वाभिमान का आंदोलन 

अयोध्या मंदिर के लिए 80 युद्धों और चार लाख लोगों के बलिदान के बाद, स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक संघर्ष में जीत के बाद, 5 अगस्त, 2020 को अयोध्या में भूमि पूजन हुआ। यह सिर्फ मंदिर निर्माण की शुरुआत नहीं है, बल्कि देश की जनता की राष्ट्रीय विचारधारा की भी शुरुआत है। हमारे देश में श्री राम के मंदिरों की कमी नहीं है। गांव-गांव में हैं, इसलिए यह कहना काफी नहीं है कि यह सिर्फ एक मंदिर का संघर्ष है। 

यह संघर्ष न तो धार्मिक है, न क्षेत्रीय, न किसी समुदाय विशेष का और न ही राजनीतिक। यह संघर्ष हमारे राष्ट्र की चेतना को जगाने का है। अगर यह धार्मिक है, तो जब यह आंदोलन जोरों पर चल रहा था, जब लाखों कारसेवक अयोध्या जा रहे थे, तो उनके रास्ते में कई गैर-हिंदुओं के पूजा स्थल थे, उनमें से कई उनके आगे और बीच में भी गये..., लेकिन किसी भी कारसेवक ने किसी गैर-हिंदू या उसके पूजा स्थल को नुकसान नहीं पहुंचाया। इसलिए, यह आंदोलन किसी के खिलाफ नहीं था। 

अयोध्या श्री राम जन्मभूमि आंदोलन हमारे देश और हिंदू समुदाय के स्वाभिमान के लिए एक संघर्ष था, हिंदू जाति के साथ हो रहे अन्याय पर सवाल उठाकर न्याय के लिए एक संघर्ष, विदेशी हमलावरों के हाथों नष्ट हुए इस देश के अस्तित्व को बचाने के लिए एक संघर्ष, प्राचीन परंपराओं, रीति-रिवाजों और जीवन शैली को फिर से स्थापित करने के लिए एक संघर्ष, देश के लोगों द्वारा एकजुट होकर किये गये इन संघर्षों ने हमारे राष्ट्र को बहुत ताकत दी, और यह ताकत देश के सम्मान और प्रतिष्ठा को भी बढ़ाती है। 

आंदोलन में लोगों की भागीदारी 

अगर हर गांव से लोगों की भागीदारी के लिए एक ईंट अयोध्या भेजी जाये, तो यह भावना और मजबूत होगी कि यह मंदिर हमारा है, यह मंदिर एकता का प्रतीक बनेगा, हमारे हारे हुए देश और हिंदू समाज की जीत का प्रतीक बनेगा। इसी भावना ने 495 साल तक श्री राम जन्मभूमि आंदोलन को प्रेरित किया। उस समय, श्री राम शिला पूजा के बाद, हमने आंदोलनकारियों से आंदोलन के खर्च के लिए पैसे देने को कहा, जब एक करोड़ परिवारों ने प्रति घर 1.25 रुपये दिये, तो न केवल आप बल्कि पूरी दुनिया हैरान रह गयी। 

तब से, कभी भी पैसे की कमी नहीं हुई क्योंकि भक्त श्रीराम के काम और मंदिर निर्माण में आर्थिक रूप से मदद कर रहे हैं। 2020 में, देश भर के पांच लाख 13 हजार से ज्यादा गांवों के 14 करोड़ परिवारों द्वारा दिये गये चढ़ावे की राशि 4 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा थी। उस पैसे से, इस मंदिर का, मुख्य मंदिर का निर्माण पूरा हुआ, और उप-मंदिरों का काम अभी भी चल रहा है। 

मंदिर का निर्माण ही राष्ट्र का निर्माण है 

यह मंदिर सिर्फ एक भव्य इमारत बनाने के इरादे से नहीं बनाया जा रहा है, हमने यह आंदोलन इस इरादे से किया है कि हर आम आदमी को खुद महसूस हो कि यह मेरा मंदिर है, एक पूजा स्थल है जिसकी मेरे पूर्वज सम्मान के साथ रक्षा करते आ रहे हैं, शायद मुझे लगता है कि भविष्य में आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। देश में श्री राम के आम भक्त की भी श्री राम और हमारे देश में आस्था है, ऐसी आस्था ही किसी भी देश के लिए सबसे बड़ी ताकत होती है। इस मायने में, अयोध्या में श्री राम मंदिर का निर्माण सीधे राष्ट्र का निर्माण है। 

यह देश के हितों और राष्ट्र की आस्था से जुड़ा है। अयोध्या मंदिर में बलराम की सुंदर मूर्ति की स्थापना, वहां होने वाली आरती और भजन ही नहीं, बल्कि श्री राम के जीवन के आदर्शों को भी अपने जीवन में अपनाना चाहिए, हमें उनके जीवन में अपनाए गए रास्ते पर चलना चाहिए, भेदभाव न करना, आसुरी शक्तियों का दमन करना, दिए गए वचन को निभाना, सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक नियमों को प्राथमिकता देना और यहां तक कि शासकों द्वारा प्रजा के नियमों का पालन करना जैसे कई गुण हैं जिनका हमारे वर्तमान देशवासी पालन करते हैं। यह मंदिर एक विश्व संस्कृति बनेगा। हां, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि एक प्रभावी मंदिर 100 पुलिस स्टेशनों की स्थापना को कम कर सकता है। 

श्री राम राज्यम आदर्श व्यवस्था 

अगर हम आज भी किसी आदर्श व्यवस्था की बात करें तो वह श्री राम राज्यम है। महात्मा गांधी ने भी कई भाषणों में कहा था कि देश में राम राज्यम आना चाहिए। चाहे वह आम आदमी हो, पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो, अमीर व्यक्ति हो, कोई भी पार्टी हो, हमारा भारतीय संविधान हो, या कोई और हो, हर कोई श्री राम का राज्य चाहता है। व्यवस्थाएं बदलती रहती हैं, समय के साथ नई बनती हैं। लेकिन, एक ऐसा देश जहां सभी लोग बिना किसी समझौते के असली मूल्यों के साथ रह सकें और जहां समृद्ध प्रगतिशील विचारों वाली राज्य व्यवस्था हो, उसे राम राज्यम कहते हैं। इस तरह, राम राज्यम एक आदर्श व्यवस्था की अवधारणा है। 

श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में सभी जातियों, धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों, सामाजिक स्थितियों, गरीब, अमीर, पढ़े-लिखे और अनपढ़ लोगों ने इस आंदोलन में शामिल होकर एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े हुए और पूरी दुनिया ने उस ताकत को देखा। उस समय अयोध्या में हुए संघर्ष का विश्लेषण करें तो तथाकथित बुद्धिजीवियों की यह बातें झूठी थीं कि हिंदू समाज खत्म हो गया है, और इस आंदोलन ने घोषणा की कि यह समाज मरा नहीं है। यह समाज शायद कुछ समय के लिए ही सुप्त अवस्था में आया था। इस आंदोलन ने दिखाया कि हिंदू समाज जब जागेगा तो कैसा दिखेगा। 

विश्व कल्याण की प्रेरणा 

वर्तमान में इस आंदोलन के माध्यम से हमारा देश प्राचीन गौरव को प्राप्त कर विश्व गुरु बनना चाहता है और भारत की यह जिम्मेदारी है कि वह न केवल अपने राष्ट्रीय कल्याण बल्कि विश्व का कल्याण भी करे, लेकिन वह केवल राज्य शक्ति से प्राप्त नहीं हो सकता, यह तभी संभव है जब यहां का आम आदमी भी हमारे राष्ट्र के लिए आस्था के साथ खड़ा हो और काम करे, तभी हमारा देश दुनिया को मार्गदर्शन दे सकता है। 

किसी भी मानव समूह को खतरा न हो 

आम लोगों को अनैतिक ताकतों से बचाना। दुनिया के हर इंसान को सम्मान के साथ जीने में मदद करना। संख्या बल या बाहुबल के आधार पर कोई भी मानव समूह को खतरा न बने, इसके लिए एक शक्तिशाली ताकत का साथ देना होगा। नियति ने तय किया है कि यह काम सिर्फ भारत को करना चाहिए। इस काम को करने के लिए इस देश के लोगों की भावना, उनकी भावनाओं और उनकी मान्यताओं को एक साथ लाना जरूरी है।

इस लिहाज से यह अयोध्या मंदिर प्रेरणा और शक्ति का स्रोत है। इसलिए, मुझे लगता है कि मंदिर जाने वाला हर व्यक्ति भगवान में आस्था, देश में आस्था और अपनी राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने के दृढ़ निश्चय के साथ वहां जाएगा और कम से कम जाने के बाद वह इस मुकाम पर पहुंचेगा। चाहे वह इस देश के गांवों में रहने वाला आम आदमी हो, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाला आदिवासी हो, किसी सुदूर वन क्षेत्र में रहने वाला हो या पड़ोस के इलाके में रहने वाला पड़ोसी हो, इस देश के लिए काम करने वाला कोई पढ़ा-लिखा, बुद्धिमान, बहादुर व्यक्ति होना चाहिए। 

हर किसी को इस देश में योगदान देना चाहिए। यह काम सरकार और सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संगठनों को करना चाहिए, ऐसा करने से ही सामूहिक शक्ति जागृत होगी। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन नामक प्रयास ने भारत के लोगों की एकता को बढ़ाया है और विकास को और तेज किया है..., इसकी शुरुआत शिक्षा से होनी चाहिए, इसकी शुरुआत अर्थव्यवस्था से होनी चाहिए, कृषि से होनी चाहिए, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली व्यवस्थाओं से होनी चाहिए, नागरिकों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के साथ, औद्योगिक क्षेत्र में प्रगति होनी चाहिए, जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने कहा था, अपना काम करते हुए सभी को श्री राम के रामत्व की अवधारणा के साथ कर्तव्यनिष्ठा से करना चाहिए। 

श्री राम की अवधारणा देश की अवधारणा है, जो बहुत गंभीर है। इस अर्थ में श्री राम मंदिर सभी सामाजिक क्षेत्रों को प्रभावित करता है, सभी को प्रेरणा देता है। यह केंद्र केवल भक्तों के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य किसी भी व्यक्ति के लिए जिसके मन में कुछ कर गुजरने की मंशा, इच्छा और दृढ़ संकल्प की भावना है, यह एक ऐसा शक्ति केंद्र बनेगा जहां वे अपने दिलों में उद्देश्य की मजबूत भावना बना सकते हैं और अपनी क्षमता को बढ़ा सकते हैं। 

इस सेंटर की नींव 1989 में श्री कामेश्वर चौपाल ने रखी थी, जो एक ऐसे समुदाय में पैदा हुए थे जिसे पीढ़ियों से नजरअंदाज किया गया था। इसकी नींव 5 अगस्त, 2020 को भारत के प्रधानमंत्री और पूज्य मोहन भागवत की मौजूदगी में रखी गयी थी। इसमें दुनिया भर के 150 देशों के प्रतिनिधि, 5500 स्वामी, पीठाधीप, मठाधीप, एक हजार दुनिया भर में मशहूर राम भक्त और आंदोलन को आर्गनाइज करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। 

पिछले साल, प्रतिष्ठा द्वादशी के दिन (22 जनवरी, 2023) प्रेरणा देने वाले भगवान श्री रामचंद्र ने बल राम का रूप लिया था। और पिछले 25 नवंबर को मंदिर के स्वर्ण शिखर पर, राज्य की शक्ति के प्रतीक के रूप में कोविधारा वृक्ष के साथ पवित्र भगवा ध्वज, भारत के प्रधानमंत्री और धार्मिक शक्ति के लिए विशेष रूप से समर्पित दो आदरणीय सर संघचालकों ने फहराया और हमने दुनिया को बताया कि न केवल गिरे हुए खंडहरों पर भव्य मंदिरों के पुनर्निर्माण का काम पूरा हो गया है, बल्कि हिंदू शक्ति को पुनर्जीवित करने का काम भी शुरू हो गया है। 

देश की मूल छवि बदलने का काम शुरू हुआ 

हजारों वर्षों की गुलामी से बाहर निकलने और आस्था के साथ अपने रास्ते पर चलने में कुछ समय लगेगा, लेकिन श्री राम का बताया सटीक मार्ग आज भी हमारे सामने है, इतने आंदोलन करने के बाद हमारे मन में दृढ़ इच्छाशक्ति है, हमने जो सपने देखे हैं, वे हमारी आंखों के सामने साफ दिखाई दे रहे हैं। प्रगति के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक ऊर्जा ऐसे शक्ति केंद्रों से प्राप्त होती है। भविष्य का भारत अनेक अग्रदूतों, सामाजिक विचार और व्यवस्था निर्माण क्षमता वाले लोगों और सामाजिक-धार्मिक संगठनों के सामूहिक प्रयासों से ही उभरेगा। इस मंदिर के निर्माण से हम सभी के मन में यह विश्वास जगा है कि वैश्विक स्तर पर भारत को जो जिम्मेदारी निभानी है, उसे हम अवश्य निभा सकते हैं।

अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर के दर्शन करने वहां जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसी भावना से प्रेरित होकर अपने जीवन की दिशा तय करता है। यह मेरा विश्वास है, इसीलिए मुझे लगता है कि भविष्य का भारत एक उज्ज्वल भारत होने वाला है, जो विश्व के लिए सही दिशा निर्धारित करेगा। इसी आधार पर विश्व में सद्भाव और शांति का वातावरण बनेगा। तब विश्व की वर्तमान यात्रा पहले से भी अधिक ऊंचा और व्यापक मार्ग बन जायेगी और इसे प्राप्त करने के लिए हम सभी अयोध्या श्री रामचंद्र के साक्षी बनने का संकल्प लें। (लेखक आकरापु केशवराजु, विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त सचिव हैं।)

Published / 2025-12-28 11:42:39
कांग्रेस की उलझन...

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कांग्रेस की केंद्रीय कार्य समिति (CWC) की की बैठक चल रही थी इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह जिन्हें राहुल गांधी के गरीबी माना जाता है;  सोशल मीडिया में एक तस्वीर जारी करते हुए अपनी अनुभूति साझा कर दी जिसने देश भर के लोगों का ध्यान आकृष्ट किया है।

उन्होंने पोस्ट में लिखा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक स्वयंसेवक एवं भारतीय जनता पार्टी का जमीन से जुड़ा हुआ कार्यकर्ता जमीन में बैठकर मुख्यमंत्री तथा बाद में प्रधानमंत्री बन जाता है। फोटो के संबंध में उन्होंने लिखा कि फोटो संगठन के शक्ति का परिचायक है।

ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि उन्होंने अपने पोस्ट को मल्लिकार्जुन खड़गे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भी टैग किया। यह कोई पहली घटना नहीं है कि कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने पार्टी के दुर्बलताओं की ओर स्पष्ट इंगित किया हो, परंतु कांग्रेस में कोई परिवर्तन होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। 

कांग्रेस पार्टी में उसी की चलती है जो गांधी परिवार का गुणगान करता है अथवा चाटुकारिता की कुशलता में पारंगत होता है। कहने और देखने में तो मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं परंतु वह कहते रहते हैं कि कोई भी निर्णय आला-कमान करेगा; जबकि लोगों को पता है कि कांग्रेस में आलाकमान का अर्थ क्या होता है।

यथार्थ है कि कांग्रेस पार्टी की शक्ति एवं नियंत्रण गांधी परिवार के पास है जिसका उपयोग अपनी पार्टी को सबल बनाने में न करते हुए प्रधानमंत्री भाजपा एवं संस्थाओं के ऊपर दोष मढ़ने में बर्बाद किया जाता रहा है। (लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं।)

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