विचार

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Published / 2026-08-10 21:29:41
सान्निध्य, आशीर्वाद और वरदान...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सामान्य जीवन में गुरु, माता-पिता एवं ईस्ट देवी देवता भगवान की कृपा, आशीर्वाद तथा वरदान की आकांक्षा सभी को रहती है; यहां तक कि सांसारिक जीवन में किसी उच्च शक्तिशाली व्यक्ति की कृपापात्र बनने की अपने-अपने नफा नुकसान के गणित से प्रयास किया जाता है।  

प्रश्न है कि भौतिक अथवा आध्यात्मिक आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए क्या किया जाये। सबसे पहले तो किसी बड़े अधिकारी/पदाधिकारी के पास जाना होता है। तीर्थ स्थान मंदिर देवालय जाने के पीछे का उद्देश्य नजदीक पहुंचना ही होता है। सान्निध्य बनाये बिना आदान-प्रदान की क्रिया असंभव तो नहीं है लेकिन सरल भी नहीं है।  

प्रकृति के प्रत्येक अवयव का एक अपना विशेष प्रभाव मंडल एवं प्रभाव होता है जिसकी अनुभूति उसके सानिध्य में आने के उपरांत ही हो पता है। समुद्र एवं नदी का अपना-अपना प्रभाव मंडल होता है जिसकी अनुभूति तभी प्राप्त की जा सकती है जब उनके नजदीक में जाया जाये, इसी प्रकार गांव शहर जंगल पहाड़ इत्यादि इत्यादि के अपने-अपने विशेष प्रभा मंडल होते हैं और उसका प्रभाव पानी के लिए उनके आसपास होना आवश्यक होता है।  

गुरु माता-पिता एवं ईश्वर का आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त करने के लिए उनका सान्निध्य नितांत आवश्यक है। दूर-दूर से काम नहीं बनने वाला है। अपनी चेतना भावना संवेदना बुद्धि विवेक श्रद्धा भक्ति विश्वास; अपने निवेदन एवं प्रार्थना में व्यापक करना पड़ता है। 

यही तो तप एवं तपस्या है, और सबको सामान्य रूप से पता होता है कि भोजन बनाने के लिए अनाज एवं सब्जी को अग्नि में पकाना पड़ता है। आजकल अनुग्रह प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के ड्रामा और नौटंकी किये जाते हैं जिनका फल-प्रतिफल और परिणाम नहीं प्राप्त होने से आस्था एवं विश्वास टूट जाते हैं।  

पहले सान्निध्य बनाया जाये, समर्पण प्रस्तुत किया जाए, निवेदन एवं प्रार्थना अर्पित किया जाए तो किसी का भी आशीर्वाद एवं वरदान प्राप्त किया जा सकता है.. और इसके लिए प्रथम एवं अंतिम शर्त यही होता है कि अपनी पात्रता को विकसित किया जाये। हर-हर महादेव...

Published / 2026-08-05 19:56:33
क्या मिलावटी भोजन के विरुद्ध महाराष्ट्र के नक्शे कदम पर चलेंगे बिहार-झारखंड!

महाराष्ट्र का निर्णय एक चेतावनी: क्या झारखंड और बिहार भी मिलावटी भोजन के विरुद्ध निर्णायक कदम उठायेंगे? 

शिवाजी क्रांति 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जैसा अन्न, वैसा मन- भारतीय संस्कृति का यह कथन केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज की आधारशिला है। यदि भोजन ही मिलावटी, भ्रामक और निम्न गुणवत्ता का हो जाये तो उसका दुष्प्रभाव केवल व्यक्ति के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। 

हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। राज्य में एनालॉग (नॉन-डेयरी) पनीर के निर्माण, भंडारण, परिवहन, वितरण और बिक्री पर एक वर्ष का प्रतिबंध लगाया गया। यह निर्णय तब लिया गया जब जांच में ऐसे उत्पादों के उपयोग और गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आयीं। 

इस कदम ने पूरे देश में यह संदेश दिया है कि यदि सरकार इच्छाशक्ति दिखाये तो खाद्य मिलावट और उपभोक्ता को भ्रमित करने वाली प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। अब प्रश्न केवल महाराष्ट्र का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या झारखंड और बिहार जैसे राज्य भी उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ऐसी ही स्पष्ट और कठोर नीति अपनायेंगे? 

आज शहरों से लेकर कस्बों तक भोजन का बड़ा हिस्सा होटल, रेस्टोरेंट, ढाबों, मिठाई दुकानों, बेकरी और आॅनलाइन फूड डिलीवरी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रहा है। उपभोक्ता स्वाद, सुविधा और समय बचाने के लिए इन पर निर्भर हो गया है। लेकिन क्या उसे यह पता है कि उसकी थाली में परोसा गया पनीर वास्तव में दूध से बना है या किसी वनस्पति वसा और रसायनों से तैयार एनालॉग उत्पाद? क्या उसे बताया जाता है कि मिठाई में शुद्ध खोया है या कृत्रिम मिश्रण? क्या मसाले, तेल और घी वास्तव में वही हैं जो उनके नाम से बेचे जा रहे हैं? 

दुर्भाग्य से अधिकांश मामलों में उत्तर नहीं है। 

छिपे हुए किचन और अदृश्य खतरे 

उपभोक्ता किसी होटल या रेस्टोरेंट का सजा-धजा भोजन कक्ष देखता है, लेकिन उसका किचन नहीं देख पाता। अधिकांश रसोईघर आम जनता के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं। भोजन किन परिस्थितियों में तैयार हो रहा है, किस प्रकार का तेल बार-बार उपयोग हो रहा है, कच्चे माल की गुणवत्ता क्या है, सफाई का स्तर कैसा है—इन सबकी जानकारी उपभोक्ता के पास नहीं होती। यही वह जगह है जहां उपभोक्ता और विक्रेता के बीच सबसे बड़ी सूचना-असमानता पैदा होती है। उपभोक्ता विश्वास के आधार पर भोजन खरीदता है, जबकि उसके पास गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच का कोई साधन नहीं होता। 

मिलावट केवल धोखा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य का संकट 

अक्सर खाद्य मिलावट को केवल आर्थिक अपराध माना जाता है, जबकि इसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। घटिया तेल, कृत्रिम रंग, सिंथेटिक दूध, नकली मसाले, मिलावटी घी और निम्न गुणवत्ता के खाद्य पदार्थ अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इनके कारण पाचन संबंधी रोगों से लेकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याओं तक का जोखिम बढ़ सकता है। 

सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब उपभोक्ता को यह भी नहीं बताया जाता कि वह जो पनीर समझकर खा रहा है, वह वास्तव में पारंपरिक डेयरी पनीर नहीं है। यदि किसी उत्पाद का स्वरूप, नाम या प्रस्तुति उपभोक्ता को भ्रमित करती है, तो यह केवल व्यापारिक नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि उपभोक्ता के सूचना के अधिकार का भी उल्लंघन है। 

झारखंड और बिहार में स्थिति पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता 

झारखंड और बिहार में समय-समय पर दूध, खोया, पनीर, मिठाइयों, सरसों तेल, मसालों तथा अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। त्योहारों के समय प्रशासन द्वारा छापेमारी भी होती है और नमूने लिए जाते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई पूरे वर्ष समान गंभीरता से चलती है? 

  • क्या प्रत्येक जिले में पर्याप्त खाद्य सुरक्षा अधिकारी हैं? 
  • क्या खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं आधुनिक और पर्याप्त क्षमता वाली हैं? 
  • क्या दोषियों को समयबद्ध दंड मिलता है? 
  • क्या उपभोक्ताओं को जांच के परिणाम नियमित रूप से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराये जाते हैं? 
  • इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर आज भी तलाशे जाने बाकी हैं। 

केवल छापेमारी नहीं, व्यवस्था में सुधार चाहिए 

खाद्य सुरक्षा केवल त्योहारों के दौरान अभियान चलाने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए स्थायी व्यवस्था विकसित करनी होगी। रेस्टोरेंट और होटल उद्योग में ओपन किचन जैसी अवधारणाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जहां उपभोक्ता भोजन बनने की प्रक्रिया देख सके। जहां यह संभव न हो, वहां नियमित निरीक्षण, डिजिटल रिकॉर्ड, स्वच्छता रेटिंग और निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक करने जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा सकती हैं। 

भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी उपभोक्ता के लिए उतनी ही सहज उपलब्ध होनी चाहिए जितनी किसी पैक्ड खाद्य पदार्थ पर सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी उपलब्ध होती है। 

कानून का भय आवश्यक है 

खाद्य मिलावट से होने वाला लाभ यदि दंड से अधिक होगा तो यह अपराध चलता रहेगा। इसलिए केवल जुर्माना पर्याप्त नहीं है। जानबूझकर मिलावट करने, नकली खाद्य पदार्थ बेचने या उपभोक्ता को भ्रमित करने वाले मामलों में कठोर दंड, लाइसेंस निरस्तीकरण और त्वरित न्यायिक प्रक्रिया आवश्यक है। महाराष्ट्र का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि सरकारें केवल सलाह जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक प्रशासनिक कदम भी उठायें। 

केंद्र और राज्यों की साझा जिम्मेदारी 

खाद्य सुरक्षा एक ऐसा विषय है जिसमें केंद्र सरकार, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और जिला प्रशासन सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है। यदि विभिन्न राज्यों में अलग-अलग स्तर की निगरानी होगी तो मिलावटी उत्पाद एक राज्य से दूसरे राज्य में आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति आवश्यक है। इस रणनीति में आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, त्वरित परीक्षण तकनीक, डिजिटल ट्रेसबिलिटी, नियमित सैंपलिंग, पारदर्शी रिपोर्टिंग और राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान शामिल होना चाहिए। 

सामाजिक संगठनों की भागीदारी भी आवश्यक 

खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। उपभोक्ता संगठन, सामाजिक संस्थाएं, व्यापारी संगठन, शिक्षण संस्थान, चिकित्सक और जागरूक नागरिक भी इस अभियान के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत जैसे संगठन वर्षों से उपभोक्ता जागरण और व्यवस्था सुधार का कार्य कर रहे हैं। यदि सरकार ऐसे संगठनों को विश्वास में लेकर जिला और राज्य स्तर पर संयुक्त जागरूकता अभियान चलाए, शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करे तथा निरीक्षण प्रक्रियाओं में सामाजिक सहभागिता सुनिश्चित करे, तो इसका सकारात्मक प्रभाव अधिक व्यापक होगा। 

उपभोक्ता भी अपनी भूमिका निभायें जागरूक उपभोक्ता ही सबसे बड़ा प्रहरी है। बिना बिल के खरीदारी, संदिग्ध रूप से सस्ते खाद्य पदार्थ, अत्यधिक चमकीले रंग, असामान्य स्वाद या गुणवत्ता पर संदेह होने पर शिकायत दर्ज कराना नागरिक जिम्मेदारी भी है। यदि समाज मिलावट को सामान्य बात मानकर स्वीकार करता रहेगा तो यह समस्या कभी समाप्त नहीं होगी। 

समय की मांग 

महाराष्ट्र का निर्णय केवल एक राज्य का प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। आज आवश्यकता है कि झारखंड, बिहार सहित सभी राज्य खाद्य सुरक्षा को केवल औपचारिक निरीक्षण का विषय न मानें, बल्कि इसे जनस्वास्थ्य और उपभोक्ता अधिकारों के केंद्र में रखें। हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसकी थाली में परोसा गया भोजन शुद्ध, सुरक्षित और सही जानकारी के साथ उपलब्ध हो। भोजन में ईमानदारी केवल व्यापारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, उपभोक्ता अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। 

यदि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन, व्यापारी और जागरूक नागरिक मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर मिलावट मुक्त भारत का अभियान चलायें, तो वह दिन दूर नहीं जब उपभोक्ता भय नहीं, बल्कि विश्वास के साथ भोजन करेगा। अब समय आ गया है कि झारखंड और बिहार भी स्वयं से यह प्रश्न पूछें- क्या हम केवल मिलावट पकड़ने की प्रतीक्षा करेंगे, या महाराष्ट्र की तरह साहसिक निर्णय लेकर अपने नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ठोस कदम उठायेंगे? इस प्रश्न का उत्तर केवल सरकारों को नहीं, पूरे समाज को मिलकर देना होगा। क्योंकि ग्राहक रहेगा मौन तो उसकी सुनेगा कौन?  (लेखक शिवाजी क्रांति : अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के क्षेत्रीय बिहार, झारखंड के संगठन मंत्री हैं।)

Published / 2026-08-04 12:38:37
परिपक्व हो गया लोकतंत्र ...

त्रिवेणी दास

परिपक्व हो गया लोकतंत्र 
जनता समझदार हो गई,
राजनीति की सूझ बूझ अब
उसकी अरदार हो गई

लोकतंत्र के ताने-बाने में 
कीर्तिमान टूट जाते हैं 
बनाने वाले कीर्तिमान 
पीछे छूट जाते हैं ,
जिन्हें टूटा कहा जाता था
कीर्तिमान बन जाते हैं

स्टार प्रचारक काम न आए 
जनता के मन में न भाए 
जात पात सब मिट गया ,
बांकीपुर में देखो भाई 
पांडेय प्रशांत किशोर जीत गया। 

Published / 2026-08-03 18:45:45
श्रावण मास की प्रथम सोमवारी...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। वैसे तो देवाधिदेव महादेव की विशेष पूजा, अर्चना, प्रार्थना, समर्पण एवं सानिध्य प्राप्त करने के लिए सोमवार का दिन शुभ मुहूर्त माना गया है। 

आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देव शयनी एकादशी) को सृष्टि के संचालक श्रीहरि भगवान विष्णु चातुर्मास के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में तल्लीन हो जाते हैं तथा कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के एकादशी को उनकी योगनिद्रा भंग होती है। इन चार महीना में सृष्टि के संचालन का कार्य भगवान शंकर के द्वारा की जाती है; इसीलिए इन दिनों महादेव समाधि की अवस्था से जागृत अवस्था में क्रियाशील रहते हैं।  

कांवड़ यात्रा करते हुए महादेव को जलार्पण तपस्या की श्रेणी में आता है। सात्विक भोजन, एकांत, मौनव्रत (यथासंभव अनावश्यक बहस से बचाना), महादेव के सानिध्य की अनुभूति, और उनसे आशीर्वाद तथा वरदान मांगना भक्तों के भौतिक एवं आध्यात्मिक जीवन के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। 

श्रावण मास के अतिरिक्त चातुर्मास में महादेव की कृपापात्र बनाना अन्य दिनों के तुलना में सरल है। इन दिनों भक्त/साधक के लिए ईश्वरीय शक्ति से जुड़ना थोड़ा सहज हो जाता है और तपस्या का पुरुषार्थ उसकी आदत बन जाती है और यही आदत भविष्य में उसे सब प्रकार के सफलता एवं समृद्धि का आधार बन जाता है। हर-हर महादेव...

Published / 2026-08-02 18:17:18
हाथी की मस्ती के जैसी मोदी जी की चाल...

त्रिवेणी दास 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। बाजार में हाथी जब चल रहा होता है तब गांव के बड़े-बूढ़े हाथी को प्रणाम करते हैं, बच्चों से प्रणाम करवाते हैं और हाथी का दर्शन करके लोग स्वयं को सौभाग्यशाली समझते हैं; यह हाथी के आगे का दृश्य होता है। गांव भर के कुत्ते इकट्ठा होकर हाथी के पीछे-पीछे चलते हुए भौंकते रहते हैं ; हाथी के पीछे का एक दृश्य यह भी होता है। 

गांव भर के श्रद्धालु  

हाथी के आगे खड़े होंगे,  

गांव भर के कुत्ते  

हाथी के पीछे पड़े होंगे 

समझना बड़ा कठिन है कि आखिर कुत्तों को हाथी से चिढ़ क्यों होती है? हाथी से वे मुकाबला कर नहीं कर सकते, आकार के गणित से सारे भौंकते कुत्ते हाथी के पेट में समा सकते हैं। किसी ने कुत्तों से पूछा की भाई तुम लोगों को हाथी से  क्या परेशानी है, तो कुत्तों ने कहा कि हमें इस बात से दिक्कत है कि हाथी के आगे कुछ लोग खड़े होकर उसे सम्मान क्यों दे रहे हैं और जब हमारी बारी आती है तो हमें लाठी से दुत्कार दिया जाता है। 

अपनी मस्ती में हाथी  

आगे बढ़ता जाता है  

भौंकने वाले कुत्तों को  

पीछे मुड़कर देखता नहीं  

प्रशंसा कर रहे आगे खड़े  

लोगों के सामने रुकता नहीं 

निंदा एवं प्रशंसा से दूर अपने लक्ष्य की ओर हाथी आगे ही आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति के लिए निंदा एवं प्रशंसा में कोई अंतर नहीं रह गया हो, राग वैमनस्य से परे हो गया हो, विवेक की सक्रियता उसका साथ दे रहा हो; वह मनुष्य अपने लक्ष्य की ओर आगे ही आगे बढ़ता जाता है और उद्देश्य को परिणाम में परिवर्तित करते फिर नई लक्ष्य की ओर आगे निकल जाता है।

Published / 2026-08-01 20:52:49
शिक्षा का असली धर्म : मेरिट, अनुशासन और चरित्र

जब विद्यालय नागरिक गढ़ते हैं, तो उनकी पहचान धर्म नहीं, गुणवत्ता से होती है 

शिक्षा की कसौटी—पहचान नहीं, प्रतिभा और प्रदर्शन  

डॉ बृज किशोर पाण्डेय  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा को लेकर देश में अनेक बहसें उभरी हैं। कभी विद्यालयों के ड्रेस कोड और धार्मिक प्रतीकों पर विवाद हुआ, कभी अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता चर्चा का विषय बनी, तो कभी सीखने की गुणवत्ता, शिक्षक उत्तरदायित्व और विद्यालयी अनुशासन पर प्रश्न उठे। आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था दो महत्वपूर्ण प्रश्नों के सामने खड़ी है।  

  • पहला : क्या किसी शिक्षण संस्थान का मूल्यांकन उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर होना चाहिए यदि वह उत्कृष्ट शिक्षा दे रहा हो?  
  • दूसरा : क्या अनुशासन के बिना कोई संस्थान वास्तव में श्रेष्ठ कहलाने का अधिकारी है? दोनों प्रश्न का उत्तर एक है- शिक्षा का धर्म ज्ञान है और ज्ञान का मार्ग अनुशासन।  

शिक्षा का काम निष्पक्ष आकलन है, पूर्वाग्रह या पहचान के आधार पर निर्णय नहीं। जब एक संस्थान सच में श्रेष्ठ शिक्षा दे रहा है तो उसको मापने का पैमाना उसकी पढ़ाई होनी चाहिए उसका धर्म नहीं। इसलिए किसी विद्यालय की पहचान उसके नाम या प्रबंधन से नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और विद्यार्थियों की उपलब्धियों से होनी चाहिए। 

ऐसे समय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि किसी विद्यालय का प्रबंधन किस समुदाय के हाथ में है, बल्कि यह है कि वह अपने विद्यार्थियों को कितना सक्षम, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बना रहा है। कबीर का कालजयी संदेश- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान- आज प्रत्येक विद्यालय, गुरुकुल, मदरसा, मिशनरी स्कूल और विश्वविद्यालय पर समान रूप से लागू होता है। 

भारतीय संविधान भी विविधता का सम्मान करते हुए शिक्षा को समान अवसर और उत्कृष्टता का माध्यम मानता है। अनुच्छेद 29और 30 विभिन्न समुदायों को अपनी शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार देते हैं। लेकिन यह अधिकार शिक्षा की गुणवत्ता, समान अवसर, चरित्र निर्माण और संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं हो सकता है। 

विविधता का सम्मान लोकतंत्र की शक्ति है और शिक्षा की गुणवत्ता पर कोई समझौता स्वीकार्य नहीं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मूल्यांकन का आधार परिणाम नहीं पहचान बन जाती है। किसी भी शिक्षण संस्थान का मूल्यांकन उसके नाम, वेश, प्रबंधन  या धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन, समान अवसर और विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण से होनी चाहिए। शिक्षा धर्मनिरपेक्ष है ।स्कूल का काम ज्ञान देना है दीक्षा देना नहीं। शिक्षा में पहचान नहीं, प्रदर्शन और प्रतिभा ही अंतिम कसौटी है। 

शिक्षक, अनुशासन और मेरिट की नयी कसौटी 

विद्यालय वह कार्यशाला है जहां  ज्ञान के साथ व्यक्तित्व भी गढ़ा जाता है। किसी विद्यालय की आत्मा उसकी इमारत नहीं, उसके शिक्षक और उसकी कार्य-संस्कृति होती है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि चरित्र का निर्माण करना है। यह कार्य पाठ्यपुस्तकों से अधिक शिक्षक के आचरण से पूरा होता है। इसके लिए अनुशासन पहली शर्त है। अनुशासन भय से नहीं, आत्मनियंत्रण से जन्म लेता है, आदेश से नहीं आदर्श से विकसित होता  है। 

समय का सम्मान करने वाला शिक्षक ही समय का सम्मान करने वाले विद्यार्थियों का निर्माण कर सकता है। ऐसा विद्यालय ही सीखने का वातावरण बनाता है जहां जिज्ञासा, परिश्रम और उत्तरदायित्व स्वाभाविक बन जाते हैं। बिना अनुशासन वाला स्कूल  ऐसा दिशाविहीन यात्रा है जहां गति तो होती है पर गंतव्य नहीं। अनुशासन श्रेष्ठ शिक्षा की पहली ईंट है। कोई संस्थान अपनी धार्मिक पहचान से नहीं बल्कि अनुशासन, गुणवत्ता और कार्य संस्कृति से उत्कृष्ट बनता है। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब धार्मिक पहचान और शैक्षणिक अनुशासन आमने-सामने खड़े हो जाएं।

ऐसी स्थिति में लक्ष्मण रेखा साफ है- अगर संस्थान शिक्षा की आड़ में नफरत, भेदभाव या अधूरा ज्ञान परोसता है तो वह ज्ञान का मंदिर नहीं है। आज मेरिट की परिभाषा भी बदल चुकी है। 21वीं सदी में मेरिट का अर्थ केवल अंक नहीं बल्कि समस्या -समाधान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नैतिकता, संवाद- कौशल और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी इसको शिक्षा का अनिवार्य लक्ष्य मानती है।

विभिन्न राष्ट्रीय अधिगम सर्वेक्षणों और असर जैसे अध्ययनों ने भी संकेत दिया है कि विद्यालयों की सबसे बड़ी चुनौती केवल नामांकन नहीं, बल्कि बुनियादी भाषा और गणितीय दक्षता को मजबूत करना है। इसलिए श्रेष्ठ संस्थान वही है जो अंक के साथ व्यक्तित्व भी गढ़े? क्योंकि  श्रेष्ठ शिक्षा की पहचान चरित्र, काबिलियत और उत्तरदायित्व है जिसका आधार अनुशासन है। 

विकसित भारत की राह : विद्यालय से राष्ट्र तक 

विश्व के जिन देशों ने शिक्षा को राष्ट्रीय शक्ति बनाया है, उन्होंने विद्यालयों को वैचारिक संघर्ष का नहीं, गुणवत्ता का केंद्र बनाया। फिनलैंड ने शिक्षक की गुणवत्ता पर, सिंगापुर ने सतत कौशल-विकास पर और जापान ने अनुशासन तथा सामूहिक उत्तरदायित्व पर विशेष बल दिया। इन अनुभवों का संदेश स्पष्ट है- श्रेष्ठ शिक्षा वही है जो ज्ञान के साथ चरित्र का निर्माण करे। 

भारत जब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब प्रत्येक विद्यालय को केवल परीक्षा परिणाम देने वाला संस्थान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और संवेदनशील नागरिक तैयार करने वाला केंद्र बनना होगा। वहां धर्म, भाषा, जाति या आर्थिक पृष्ठभूमि अवसरों की बाधा नहीं, बल्कि विविधता की शक्ति बननी चाहिए। 

विज्ञान और संस्कार, नवाचार और नैतिकता, प्रतिस्पर्धा और करुणा- इन सभी का संतुलन ही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला है।  देश के अनेक आकांक्षी जिलों में सामुदायिक भागीदारी, शिक्षक नेतृत्व और स्थानीय नवाचारों के माध्यम से विद्यालयों ने सीखने के स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। उत्कृष्ट विद्यालय केवल अधिक बजट से नहीं बल्कि स्पष्ट दृष्टि, जवाबदेही और सतत प्रयास से बनते हैं।

विद्यालयों की पहचान उनके प्रार्थना स्थलों से नहीं उनकी प्रयोगशाला और पुस्तकालयों, कक्षाओं और वहां से निकलने वाले जिम्मेदार नागरिकों से होगी। विकसित भारत का मतलब है हर गांव और शहर में एक ऐसा स्कूल जहां प्रवेश का आधार समान अवसर हो पहचान नहीं, जहां घंटी की आवाज नफरत से ऊंची हो, जहां अनुशासन डंडे से नहीं आदर्श से उपजे। जिस दिन भारत यह कसौटी स्वीकार कर लेगा उसी दिन विश्वगुरु कोई नारा नहीं बल्कि शिक्षा से अर्जित राष्ट्रीय प्रतिष्ठा होगी। 

ज्ञान ही सबसे बड़ा धर्म 

शिक्षा का उद्देश्य किसी पहचान को श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की संभावनाओं को विकसित करना है। किसी संस्थान का मूल्यांकन उसके धार्मिक परिचय से नहीं, बल्कि उसकी शैक्षणिक गुणवत्ता, अनुशासन, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व से होना चाहिए। यही संविधान की भावना है और यही आधुनिक शिक्षा का मूल दर्शन भी। शिक्षा का कोई संप्रदाय नहीं होता। उसका एकमात्र धर्म ज्ञान, एकमात्र साधना अनुशासन और एकमात्र पहचान चरित्र तथा मेरिट होती है। 

विद्यालयों की महानता उनके नाम से नहीं बल्कि उनसे निकलने वाले जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिकों से तय होती है। जिस दिन भारत का प्रत्येक विद्यालय ज्ञान को धर्म, अनुशासन को संस्कृति और चरित्र को सफलता की पहली शर्त मान लेगा उसी दिन विकसित भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बल्कि न्याय, ज्ञान और मानवीय मूल्यों से समृद्ध सभ्यता के रूप में विश्व का मार्गदर्शन करेगा। 

Published / 2026-07-30 13:53:19
संपर्क और सान्निध्य...

संपर्क और सान्निध्य... 

त्रिवेणी दास

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कल गुरु पूर्णिमा की तिथि थी। बधाई एवं शुभकामनाओं वाले स्टीकर से सोशल मीडिया अटे-पटे थे; मैंने उन संदेशों के ऊपर बहुत ध्यान दिया और विश्लेषण किया कि मेरे व्यक्तित्व में कितना प्रभाव हुआ? 

मैंने पाया कि बात आई राम गई राम हो गई। किसी एक व्यक्ति के एक जीवन में अनेक गुरुओं से संपर्क एवं सानिध्य प्राप्त होता है। प्रथम तो माता-पिता परिवार एवं समाज के सानिध्य में व्यक्ति आता है और उसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व के ज्ञान विज्ञान कला साहित्य बुद्धि विवेक के ऊपर  सीधा असर डालता है। 

विद्यार्थी जीवन से लेकर आगे के जीवन में भी कई प्रकार के गुरुओं का सानिध्य प्राप्त होता है और उसका लाभ व्यवहारिक जीवन के लिए बहुमूल्य हो जाता है। यह भी होता है कि प्रत्यक्ष स्वरूप में गुरु का संपर्क एवं सानिध्य नहीं मिल पाता हो, परंतु उनका स्मरण मन, मस्तिष्क एवं भावना में सूक्ष्म रूप से क्रियाशील होते हुए संपर्क एवं सानिध्य का कार्य करते रहता है। 

गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य से हर किसी की इच्छा होती है कि गुरु उसे वह सब कुछ दें जो गुरु के पास होती है। गुरु तो गुरु ही होते हैं, देने के पहले शिष्य की पात्रता का गहन निरीक्षण परीक्षण गुरु महाराज की प्राथमिकता होती है। 

गुरु महाराज के संपर्क एवं सानिध्य में जाने से पहले अपनी पात्रता के विषय में भलीभांति जान लेना ही एक श्रेष्ठ शिष्य का दायित्व होता है। सांसारिक/भौतिक जीवन में गुरु का प्रभाव परिलक्षित होते रहता है। लोगबाग अमुक व्यक्ति के व्यवहार से समझ जाते हैं कि व्यक्ति का गुरु कैसा रहा होगा। आध्यात्मिक जीवन में गुरु महाराज का महत्व सबसे ज्यादा होता है।

मोटे तौर पर अध्यात्म का अर्थ ईश्वरीय अनुकंपा से जोड़कर देखा जाता है; जबकि ईश्वर की अनुकंपा के लिए स्वयं ही पुरुषार्थ करने का विधान है। गुरु महाराज के सानिध्य एवं संपर्क से चेतना भावना संवेदना बुद्धि  विवेक एवं अनुशासन इत्यादि का शोधन परिशोधन तो हो जाता है, परंतु व्यवहार में संतुलन एवं साधना का मार्ग स्वयं ही तय करना होता है। 

सांसारिक उपलब्धि तथा आध्यात्मिक उपलब्धि दोनों में निर्मित व्यक्तित्व ही परिणाम उत्पन्न करता है। वास्तव में गुरु की कृपा व्यक्तित्व निर्माण के स्वरूप में ही प्राप्त होती है। गुरु के पास जाने, उनसे संपर्क एवं सानिध्य साधने के लिए श्रद्धा भक्ति एवं विश्वास की पूंजी होनी ही चाहिए।

Published / 2026-07-28 20:58:00
हर दिल में बसने वाले नायक जेआरडी टाटा

एक ऐसी महान विभूति, जिन्होंने अनगिनत जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया 

सत्येंद्र कुमार 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। इतिहास जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जे.आर.डी. टाटा) को एक दूरदर्शी उद्योगपति, अग्रणी विमान चालक, राष्ट्र निर्माता और आधुनिक भारतीय उद्योग के शिल्पकार के रूप में याद करता है। लेकिन जिन लोगों ने उन्हें निकट से जाना, वे उन्हें उनकी उपलब्धियों से भी बढ़कर उनकी मानवीयता और विनम्रता के लिए याद करते हैं।  

वे ऐसे विलक्षण नेता थे, जो बोलने से पहले सुनने में विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि हर व्यक्ति, चाहे उसका पद कोई भी हो, सम्मान और गरिमा का समान अधिकारी है। उन्होंने कभी अधिकार का सहारा लेकर नेतृत्व नहीं किया; बल्कि अपने आदर्श आचरण से उत्कृष्टता की प्रेरणा दी। 

जे.आर.डी. टाटा से जुड़ी अनगिनत कहानियां हैं। उनमें से कई कभी किताबों में दर्ज नहीं हो सकीं, लेकिन जिन लोगों के जीवन को उन्होंने स्पर्श किया, उनकी यादों में वे आज भी जीवंत हैं। 

मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग आज भी बताते हैं कि जे.आर.डी. टाटा कई बार स्वयं कार चलाकर किसी को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार वे परिवार के साथ एक प्याली चाय पर आत्मीयता से बातचीत करते  कुछ पल भी बिताते थे और अक्सर शाम का समापन बच्चों के साथ नीचे खेलते हुए होता था। 

उस समय वे भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के अध्यक्ष नहीं, बल्कि सबके प्रिय मित्र बन जाते थे। बॉम्बे हाउस की एक और घटना जे.आर.डी. टाटा के व्यक्तित्व की गहराई को बखूबी दशार्ती है। एक दिन वे लिफ्ट के लिए धैर्यपूर्वक कतार में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे, तब भी लिफ्ट आॅपरेटर ने उन्हें कतार तोड़कर आगे जाने की अनुमति नहीं दी। 

उसके लिए नियम सबके लिए समान थे, यहाँ तक कि चेयरमैन के लिए भी। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जे.आर.डी. ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा, यह व्यक्ति सिद्धांतों और अनुशासन का पक्का है। इसे दंडित कैसे किया जा सकता है? जे.आर.डी. टाटा के लिए सम्मान कभी पद से नहीं मिलता था, बल्कि वह व्यक्ति के चरित्र, सिद्धांतों और आचरण से अर्जित होता था। 

उनकी विनम्रता उनके व्यक्तित्व की सबसे  विशेषताओं में से एक थी। अपने असाधारण जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने एक बार कहा था, मुझे नहीं लगता कि मैं उस सम्मान का पूरी तरह हकदार हूं, जो मुझे मिला है... मेरे साथ हमेशा एक उत्कृष्ट टीम रही। यही उनके नेतृत्व का सार था। वे स्वयं श्रेय लेने के बजाय अपनी टीम को आगे बढ़ाते थे और हर व्यक्ति को बड़े सपने देखने, निर्भीक होकर नवाचार करने तथा सामूहिक रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते थे। 

1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन के रूप में जे.आर.डी. टाटा ने तकनीकी आधुनिकीकरण को नयी दिशा दी, लेकिन यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रगति का वास्तविक केंद्र उसके लोग होते हैं। उन्होंने कर्मचारियों के कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, प्रगतिशील मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा दिया, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संयुक्त परामर्श की संस्कृति को प्रोत्साहित किया तथा ऐसी अनेक पहलों की नींव रखी, जो आज भी टाटा स्टील की पीपल-फर्स्ट संस्कृति को सशक्त बनाती हैं। 

उनका विश्वास सरल, किन्तु अत्यंत गहरा था: कोई भी संस्थान तभी सफल होता है, जब उससे जुड़े लोग समृद्ध और प्रगतिशील हों। जिम्मेदार व्यवसाय के वैश्विक प्राथमिकता बनने से बहुत पहले, जे.आर.डी. ने नैतिकता, कर्मचारियों के कल्याण और राष्ट्र-निर्माण को व्यवसाय की सफलता से अलग नहीं, बल्कि उसका अभिन्न हिस्सा माना। 

परिवार कल्याण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने जमशेदपुर को एक आदर्श औद्योगिक नगर में बदल दिया, जबकि नैतिक नेतृत्व के प्रति उनकी हिमायत आज भी उनकी जयंती के आसपास मनाए जाने वाले टाटा स्टील के वार्षिक एथिक्स मंथ के लिए प्रेरणा बनी हुई है। 

इनोवेशन भी जेआरडी की दूरदर्शी सोच का एक प्रमुख आधार था। चाहे टाटा स्टील का आधुनिकीकरण हो, भारत के विमानन उद्योग की नींव रखने की पहल हो या युवा नेतृत्व को परंपरागत सोच से आगे बढ़कर नए रास्ते अपनाने के लिए प्रेरित करना—जेआरडी ने हमेशा लोगों को वर्तमान से आगे सोचने और भविष्य के निर्माण के लिए कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया। 

उनके निधन के तीन दशक से अधिक समय बाद भी उनकी विरासत टाटा स्टील की कार्यसंस्कृति और मूल्यों को सार्थक रूप से दिशा दे रही है। यह हमारी नैतिकता और सत्यनिष्ठा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता में रची बसी है। यह कर्मचारियों के समग्र कल्याण शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर हमारे विशेष ध्यान में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। 

साथ ही, सस्टेनेबल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, वर्ष 2045 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने तथा नवाचार, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और उत्तरदायी व्यावसायिक कार्यप्रणालियों में निरंतर निवेश की हमारी प्रतिबद्धता में भी उनकी दूरदृष्टि साफ दिखाई देती है। 

सबसे बढ़कर, उनकी विरासत हमारे इस विश्वास में जीवित है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाये। वन टाटा स्टील के रूप में हम जमशेदजी टाटा और जेआरडी टाटा के आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए केवल एक संगठन ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और उद्देश्यपूर्ण सोच के साथ समाज, उद्योग और राष्ट्र को भी सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। 

कुछ लीडर्स अपने बनाए हुए व्यवसायों के कारण इतिहास में अमर हो जाते हैं। जेआरडी टाटा उन अनगिनत जीवनों के कारण हमेशा याद किये जायेंगे, जिन्हें उन्होंने अपने नेतृत्व, मानवीय दृष्टिकोण और मूल्यों से समृद्ध किया।

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