एबीएन हेल्थ डेस्क। आज के समय में हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप एक आम समस्या बन चुका है, जिसे साइलेंट किलर के नाम से भी जाना जाता है। शुरूआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन समय के साथ यह खतरनाक रूप ले सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हाई बीपी का सबसे पहले असर हमारे शरीर के उस अंग पर दिखता है, जो सबसे संवेदनशील है : यानी आंख।
हाई ब्लड प्रेशर के प्रभाव का सबसे पहला संकेत आंखों में रेटिना पर दिखाई देता है। रेटिना में मौजूद छोटी ब्लड वेसल्स रक्तचाप में मामूली बदलाव को भी तुरंत दर्शाती हैं। जैसे-जैसे ब्लड प्रेशर बढ़ता है, ये वेसल्स पहले की तुलना में सख्त और संकरी नजर आने लगती हैं। इसका असर आंखों में साफ दिखाई देता है और डॉक्टर इसके माध्यम से मरीज की हाई बीपी की स्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं।
अगर हाई बीपी लंबे समय तक बनी रहती है, तो रेटिना को नुकसान पहुंचता है, जिसे मेडिकल टर्म में हाइपरटेंसिव रेटिनोपैथी कहा जाता है। इस स्थिति में रेटिनल आर्टरीज सख्त और मोटी हो जाती हैं। समय के साथ इन आर्टरीज के चारों तरफ सिल्वर वायरिंग दिखाई देने लगती है और ब्लड फ्लो बाधित होने लगता है, जिसे आर्टीरियोवेनस निकिंग कहा जाता है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो इससे दृष्टि पर असर पड़ने लगता है। इसके अलावा रेटिनल वेन आॅक्लूजन, रेटिनल आर्टरी आॅक्लूजन, मैलिग्नेंट हाइपरटेंशन और आंखों में सूजन या फ्लूएड रिसाव जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं। लंबे समय तक हाई बीपी का प्रभाव हार्ट और किडनी सहित आंखों पर भी गहरा असर डालता है।
नई दिल्ली के निजी अस्पताल की प्रतिष्ठित नेत्र विशेषज्ञ डॉ रामचंद्र सिंह का कहना है, हाई बीपी सिर्फ हार्ट और किडनी पर असर नहीं डालता, यह आंखों को भी नुकसान पहुंचाता है। इसलिए हाई बीपी के मरीजों को नियमित रूप से आंखों की जांच करवाते रहना चाहिए ताकि समय रहते किसी गंभीर समस्या से बचा जा सके।
टीम एबीएन, रांची। आज राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के सभागार में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण, नई दिल्ली के मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी सुनील कुमार बरनवाल ने झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी के अंतर्गत संचालित आयुष्मान भारत, मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की समीक्षा की।
बैठक में झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी की कार्यकारी निदेशक डॉ नेहा अरोड़ा, अपर सचिव विद्यानंद शर्मा पंकज, प्रवीण चंद्र मिश्रा, जीएम, जेएसएएस तथा विभाग के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
समीक्षा के दौरान कार्यकारी निदेशक डॉ नेहा अरोड़ा ने पीपीटी के माध्यम से आयुष्मान भारत - मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना की अद्यतन स्थिति की जानकारी दी। पहले चरण में सरकारी अस्पतालों में नंबर आॅफ केसेस केवल 10 प्रतिशत ही थे, लेकिन पिछले वर्ष यह भागीदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच गयी।
श्री बरनवाल ने राज्य में 15 नवंबर 2025 तक ई-केवाईसी को राष्ट्रीय औसत के स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया। उन्होंने कहा कि राज्य में कम से कम 70% लाभार्थियों का ई-केवाईसी अनिवार्य रूप से पूरा होना चाहिए। इस हेतु व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश भी दिये गये।
उन्होंने सार्वजनिक अस्पतालों की क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए क्षेत्रीय कार्यशालाएं (रीजनल वर्कशॉप) आयोजित करने के निर्देश दिये। विशेष रूप से रांची सदर अस्पताल की तर्ज पर अन्य अस्पतालों में भी आॅनलाइन बुकिंग प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू करने पर बल दिया गया।
सीईओ ने कहा कि राज्य के अधिकांश सार्वजनिक अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता है, लेकिन आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत बुकिंग की संख्या अपेक्षाकृत कम है। इस दिशा में सुधार की आवश्यकता जताई गई।
श्री बरनवाल ने फ्रॉड मामलों के संपन्न आॅडिट को रि आॅडिट करने का निर्देश दिया ताकि योजना की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनी रहे।
उन्होंने राज्य के सभी 6 मेडिकल कॉलेजों एवं अन्य सार्वजनिक अस्पतालों में बड़े पैकेजों को सक्रिय करने के लिए सभी आवश्यक कार्रवाई शीघ्रता से पूरी करने के निर्देश दिए।
आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के बारे में बताते हुए कार्यकारी निदेशक ने कहा कि इसके लिए कई पहल की जा रही हैं। इसके अंतर्गत संबंधित चिकित्सकीय संस्थानों और चिकित्सकों का डाटा एंट्री किया जा रहा है। साथ ही, मरीजों का डिजिटल रिकॉर्ड एकत्र किया जा रहा है।
यह समीक्षा बैठक झारखंड में आयुष्मान भारत योजना की प्रभावशीलता, पारदर्शिता और लाभुकों तक प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में आयोजित की गयी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। एक सेब रोज खाओ और डॉक्टर से दूर रहो। सेब के बारे में ये कहावत काफी प्रचलित है। पूरी दुनिया में सेब काफी पसंद किये जाते हैं। कई तरह के रंगों और स्वाद में मिलने वाले सेब के बारे में कहा जाता है कि यह हमें स्वस्थ रहने में मदद कर सकता है। हर साल दुनिया में 10 करोड़ टन सेब पैदा होता है। रोज एक सेब खाकर डॉक्टर को दूर रखने वाली कहावत 1866 में वेल्स की लिखी बात से निकली है, जो कहती है सोने से पहले एक सेब खाकर आप किसी डॉक्टर को रोजी कमाने से महरूम रख सकते हैं।
क्या दूसरे फलों की तुलना में सेब सेहत के लिए ज्यादा अच्छे होते हैं। सबसे पहले ये जान लेते हैं कि सेब में कौन से पोषक तत्व होते हैं। सेब फ़्लेवानोल्स समेत फायटोकेमिकल्स के अच्छे स्रोत होते हैं। इसके कई फायदे होते हैं। दिल को स्वस्थ रखने और वजन कम करने में इससे मदद मिलती है। जाहिर है ये तत्व हृदय रोग का जोखिम कम करता है। सेब सेहत के लिए इतना अच्छा क्यों माना जाता है? सेब में कई प्रकार के पॉलीफेनॉल्स होते हैं, जिसमें एन्थोकेनिन्स भी शामिल है। ये सेब के छिलके को लाल रंग देता है और यह हृदय को भी स्वस्थ रखने में मदद करता है। फ़्लोर्दिजिन एक और पॉलीफेनॉल है जो सेब में पाया जाता है।
इसे खून में ग्लूकोज नियंत्रित करने में मददगार पाया गया है। सेब में काफी मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जिसमें सबसे ज्यादा पेक्टिन होता है जो खून में लो डेनसिटी लिपोप्रोटीन्स (एलडीएल- इसे बैड कॉलेस्ट्रोल कहते हैं) की मात्रा कम करता है। हम अपने भोजन से जो शुगर और फैट ग्रहण करते हैं उसे पेक्टिन कम करता है। इस तरह ये हमारे खून में ग्लूकोज के स्तर को स्थिर रखता है। सेब में मौजूद ये न्यूट्रिएंट्स शरीर को स्वस्थ रखने में कारगर मालूम होते हैं। 2017 में पांच अध्ययनों के रिव्यू से से पता चला कि नियमित सेब खाने से टाइप 2 डायबिटीज पनपने का खतरा 18 फीसदी तक कम हो सकता है। 2022 में 18 स्टडीज के एक और रिव्यू के मुताबिक ज्यादा सेब खाने या सेब का रस पीने से कॉलेस्ट्रोल कम हो सकता है।
लेकिन ये तभी कारगर होता है जब आप अपनी इस आदत को एक हफ़्ते से ज्यादा बनाए रखते हैं। आमतौर पर पौष्टिक भोजन से कैंसर का खतरा 40 फीसदी कम हो जाता है। पौष्टिक भोजन में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड और फोटोकेमिकल्स इसका जोखिम कम करने में मददगार साबित होते हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या सेब दूसरे ऐसे खाद्य पदार्थों से बेहतर है जो पौधों से प्राप्त होते हैं? अमेरिका की मिडिल टेनेसी यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन और फूड साइंस की प्रोफेसर जेनेट कोलसन कहती हैं, सेब में ज्यादा विटामिन सी नहीं होता। आयरन और कैल्शियम भी ज़्यादा नहीं होता। लेकिन इसमें कई और ऐसे तत्व होते हैं जो बेहतर स्वास्थ्य बनाये रखने में कारगर होते हैं।
इटली की वेरोना यूनिवर्सिटी में प्लांट बायोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर, फ़्लविया गूजो का कहना है कि सेब में कई ऐसे कंपाउंड्स होते हैं, जो कई फलों और सब्जियों में भी समान रूप से पाये जाते हैं। इनमें फायदेमंद पॉलीफेनोल्स भी शामिल हैं। पॉलीफेनोल्स ताकतवर एंटीआॅक्सिडेंट अणु होते हैं। ये हमारे शरीर में एंटीआक्सीडेंट और फ्री रेडिकल्स के अनुपात को संतुलित करने में मदद करते हैं। फ्री रेडिकल्स तेजी से प्रतिक्रिया करने वाले और कोशिकाओं को नुकसान पहुुचाने वाले आक्सीजन अणु होते हैं। फ्री रेडिकल्स को नियंत्रण में रखकर हम लंबे समय तक कैंसर और हृदय रोग को बढ़ने से रोक सकते हैं।
अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थित डार्टमाउथ गीसेल स्कूल आॅफ मेडिसिन में महामारी विज्ञान के सहायक एसोसिएट प्रोफेसर मैथ्यू डेविस का कहना है कि रोजाना सेब खाने और डॉक्टर के पास जाने की संभावना के बीच ज़्यादा संबंध नहीं पाया गया है। वो कहते हैं हमारे विश्लेषण के आधार पर ये निष्कर्ष निकला कि जो लोग सेब खाते हैं, वे सामान्य रूप से अधिक स्वस्थ होते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जो लोग रोजाना सेब खाते हैं, उनके दवाओं पर निर्भर रहने की संभावना कम होती है। यह निष्कर्ष तब भी अहम रहा जब प्रतिभागियों के सामाजिक-आर्थिक स्तर के फासले के मद्देनजर विश्लेषण किया गया। इसलिए शोधपत्र का निष्कर्ष है कि कहावत को थोड़ा बदला जा सकता है- रोजाना एक सेब खाओ, फार्मासिस्ट से दूर रहो। हालांकि डेविस को रोजाना एक सेब वाली कहावत से कुछ आपत्ति है।
वो कहते हैं कि संभव है कि उन्होंने और उनके साथियों ने रोजाना सेब खाने और डॉक्टर के पास जाने के बीच कोई ठोस संबंध इसलिए नहीं पाया क्योंकि इसके पीछे कुछ और कारण भी हो सकते हैं। वो कहते हैं इस कहावत में छिपी इस धारणा को मान लिया जाता है कि लोग डॉक्टर के पास केवल तब जाते हैं जब वे बीमार होते हैं। लेकिन लोग सालाना हेल्थ चेकअप और बीमारियों की रोकथाम के लिए जरूरी सलाह लेने के लिए भी डॉक्टर के पास जाते हैं। लेकिन आखिरकार वो कहते हैं कि ये धारणा गलत है कि सिर्फ सेब खाने भर से ही आपको डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दरअसल, आपका पूरा खाना पौष्टिक और सेहतमंद होना चाहिए।
कोलसन भी इस बात से सहमत हैं कि रोजाना एक सेब वाली कहावत का आशय यह है कि लोग नियमित रूप से पौधों से हासिल भोजन लें। सेब इसका एक अच्छा उदाहरण हैं क्योंकि ये आसानी से उपलब्ध हैं। किफायती हैं और इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है। वो कहती हैं फ्रिज आने से पहले लोग सेबों को तहखाने में रखते थे और वे लंबे समय तक ताजा रहते थे। उनमें फफूंद भी नहीं लगती थी। अन्य शोधों में यह पाया गया है कि रोजाना सेब खाने से सेहत को लाभ होता है। लेकिन यह केवल तब जब लोग दिन में एक से अधिक सेब खाते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि रोजाना तीन सेब खाने से लोगों के वजन में कमी आयी।
2020 में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 40 प्रतिभागियों (इन सभी का कोलेस्ट्रॉल स्तर थोड़ा ऊंचा था) को दो समूहों में बांटा। एक समूह को रोजाना दो सेब खाने को कहा गया, जबकि दूसरे समूह को उतनी ही कैलोरी वाला सेब से बना ड्रिंक दिया गया। यह प्रयोग आठ सप्ताह तक चला और प्रतिभागियों ने सेब या इससे बने ड्रिंक के अलावा अपने खानपान में कोई और बदलाव नहीं किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि सेब खाने वाले प्रतिभागियों का कोलेस्ट्रॉल स्तर स्टडी के अंत में अहम रूप से कम हो गया। हालांकि इस अध्ययन की एक कमजोरी यह थी कि इसमें केवल 40 प्रतिभागी थे। जो किसी बड़े निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए जरूरी सैंपल से संख्या में कम थे।
एक और अध्ययन में पाया गया कि रोजाना तीन सेब खाने से लोगों का वजन घटा है और ब्लड ग्लूकोज लेवल में सुधार देखा गया। यह अध्ययन अधिक वजन वाली 40 से ज्यादा महिलाओं पर किया गया गया था। जहां तक सेब को खाने का सबसे अच्छा तरीके का मामला है तो रिसर्चर कहते हैं कि सेब का छिलका न उतारें, क्योंकि सेब के छिलके में कई पोषक तत्व और एंटीआक्सीडेंट होते हैं। वो कहती हैं, हमें सेब का छिलका जरूर खाना चाहिए, क्योंकि सेब के अधिकांश पॉलीफेनॉल्स वहीं पाये जाते हैं। उनके मुताबिक जितनी पुरानी प्रजाति का सेब होगा वो नयी प्रजाति से बेहतर होगा।
2021 में, उन्होंने और उनके सहयोगियों ने एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया जिसमें पॉम प्रुशियन नामक एक प्राचीन इटली के उत्तरी भाग में मिलने वाले सेब का अध्ययन किया गया था। उन्होंने पाया कि इस किस्म आधुनिक सेबों की तुलना में अधिक पॉलीफेनॉल्स था। वो कहती हैं, हालांकि जब सेब की नयी किस्में तैयार की जाती हैं तो आमतौर पर अन्य गुणों पर ध्यान देते हैं — जैसे आकार, स्वाद, और पेड़ों की मजबूती पर ध्यान दिया जाता है। वो कहती हैं जहां तक रंग की बात है तो इसका उतना महत्व नहीं है। सेब के छिलकों को लाल या हरा रंग ही देते हैं।
टीम एबीएन, रांची। डॉ बरियार फिजियोथेरेपी एंड न्यूरोरिहैबिलिटेशन द्वारा सिनर्जी ग्लोबल हॉस्पिटल के फिजियोथेरेपी विभाग में सोमवार, 8 सितम्बर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। इस वर्ष का विषय था : स्वस्थ बुढ़ापे में फिजियोथेरेपी और शारीरिक गतिविधि की भूमिका - दुर्बलता और गिरने से बचाव पर विशेष ध्यान।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन एवं गणेश वंदना के साथ हुई। मौके पर मुख्य अतिथि न्यूरोसर्जन विशेषज्ञ डॉ सीबी सहाय, हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ रजनीश कुमार, हड्डी एवं स्पाइन रोग विशेषज्ञ डॉ विभाष चंद्रा, हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ राहुल सिन्हा, सीनियर प्लास्टिक सर्जन और डॉ विवेक गोस्वामी उपस्थित थे। सभी अतिथियों का डीबीपीआर परिवार की ओर से स्वागत एवं सम्मान किया गया।
मौके पर डॉ ज्योत्सना रत्नम्, डॉ अफजल अहमद, डॉ आर्यन राजा, डॉ नेहा शर्मा, डॉ शिवानी, डॉ शीला, डॉ धीरज, डॉ पल्लवी, डॉ रश्मि, डॉ तसनीम, डॉ अंगद और डॉ अमृत ने कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
कार्यक्रम का समापन डॉ ज्योत्सना रत्नम् के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने कहा कि एजिंग का आनंद लें, सही जानकारी के साथ आगे बढ़ें। यदि दर्द, मांसपेशियों की कमजोरी या असामान्यता का अनुभव हो, तो फिजियोथेरेपिस्ट से अवश्य मिलें और स्वस्थ रहे।
रिम्स में टूटने लगी मरीजों की आस, 30 से ज्यादा वेंटिलेटर खराब
विभिन्न विभागों में लगातार ऑपरेशन टाले जा रहे हैं। न्यूरो सर्जरी विभाग में पिछले दस दिनों में लगभग 20 से ज्यादा ऑपरेशन टाले जा चुके हैं। वहीं मेडिसिन, कार्डियोलॉजी, सर्जरी सहित कई अन्य विभागों में भी मशीनें खराब पड़ी हैं।
जानकारी के मुताबिक सबसे गंभीर स्थिति क्रिटिकल केयर विभाग की है, जहां क़रीब 10 वेंटिलेटर खराब पड़े हैं। इसका नतीजा यह है कि जिन मरीजों की हालत नाजुक होती है और जिन्हें तुरंत वेंटिलेटर की जरूरत होती है, उन्हें समय पर यह सुविधा नहीं मिल पाती। डॉक्टरों का कहना है कि वेंटिलेटर की कमी के बारे में प्रबंधन को कई बार पत्राचार किया गया है, लेकिन अब तक न तो किसी वेंटिलेटर की मरम्मत हो पाई है और न ही नए वेंटिलेटर खरीदे जा सके हैं।
उल्लेखनीय HC द्वारा रिम्स निर्देशक से इस विषय पर पूछे जाने पर निर्देशक डॉ राज कुमार ने बताया कि स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी द्वारा पत्र लिख कर कहा गया है कि उनकी अनुमति के बिना मशीनों की खरीदारी न की जाए।
मामले को लेकर हाईकोर्ट ने 14 सितंबर तक शासी परिषद की बैठक बुलाने और 19 सितंबर को सुनवाई की तारीख तय की है। उम्मीद जताई जा रही है कि जिस राज्य में विधायकों और मंत्रियों के लिए एयर एंबुलेंस जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां आम जनता और गरीब मरीजों की उम्मीदें भी इस बैठक के बाद कुछ हद तक पूरी हो सकेंगी।
टीम एबीएन, रांची। रांची के रिम्स अस्पताल में 40वें नेशनल आई डोनेशन फोर्टनाइट के दिन सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। यह समारोह उन परिवारों के सम्मान में किया गया, जिन्होंने अपनों की आंखों को दान करके दूसरों की जिंदगी को रोशन किया है। इस कार्यक्रम में कई परिवार ऐसे थे, जिन्होंने समय से पहले अपनों को खो दिया था। यही वजह रही कि इस कार्यक्रम के दौरान उन परिवारों की आंखें नम दिखीं।
हालांकि, भले ही परिवार के सदस्यों के आंखों में अपने को खोने का गम था, पर साथ ही साथ उनमें किसी और के जीवन के अंधेरे को रोशन कर देने की खुशी भी दिखाई दी। नामकुम में रहने वाली ज्योति कश्यप, जिन्होंने अपने भाई को एक एक्सीडेंट में खो दिया था। लेकिन उनके परिवार ने लिटा निर्मल कुजूर नाम के युवक को अपने भाई की आंखों को दान करके मदद की।
ऐसे में दोनों ही परिवार समारोह में भावुक नजर आये। ऐसा ही एक और परिवार है, जिसमें कीर्ति सिन्हा नाम की युवती ने अपनी मां को तबीयत खराब होने की वजह से खो दिया। लेकिन इस गम और अंधेरे वाले माहौल में भी उन्होंने दूसरों के जीवन में रोशनी भरना ज्यादा सही समझा। उनके लिए यह गर्व की बात है। नेत्रदान का यह फैसला उतना आसान नहीं, जितना सुनने में लगता है।
यह फैसला लेकर परिवार वालों ने यकीनन एक हौसला दिखाया। इसके साथ ही लोहरदगा जिले के रहने वाले कैलाश मुंडा ने कहा कि भले ही उनकी बीवी उन्हें छोड़ कर चली गयी पर उनकी बीवी की आंखें अब भी जिंदा हैं। वहीं कैलाश मुंडा के बेटे भी अपने पिता के इस फैसले से काफी गौरव महसूस करते हुए दिखाई दिये। उनका यह भी कहना है कि अगर जरूरत पड़ी तो वह भी भविष्य में नेत्रदान जरूर करेंगे।
मामले की जानकारी देते हुए अस्पताल के अंगदान विभाग के अध्यक्ष ने बताया कि पिछले 3 साल में तकरीबन 500 से अधिक लोगों ने नेत्रदान किया है और दूसरे लोगों की जिंदगी का अंधेरा दूर किया है। इसलिए अंधेरे को कोसने से अच्छा है कि हम एक दीया जलायें। रांची में कई परिवारों ने नेत्रदान कर इस मुहिम को बल दिया है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनिया भर में हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन एक silent killer के रूप में सामने आ चुका है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण नजर नहीं आते और जब तक मरीज़ को इसका एहसास होता है, तब तक यह दिल, दिमाग और किडनी जैसे अहम अंगों को नुकसान पहुंचा चुका होता है। हर साल करोड़ों लोगों की जान लेने वाली इस बीमारी से निपटने के लिए अब एक बड़ी मेडिकल तकनीक सामने आई है।
भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक ऑनलाइन टूल तैयार किया है, जो हाई ब्लड प्रेशर के इलाज को पहले से कहीं अधिक सटीक बना देगा। इस टूल का नाम है - Blood Pressure Treatment Efficacy Calculator यानी बीपी ट्रीटमेंट कैलकुलेटर। यह टूल डॉक्टरों की मदद करेगा कि वे मरीज को कौन-सी दवा दें और कितनी मात्रा में दें जिससे उसका ब्लड प्रेशर जल्दी और सुरक्षित स्तर तक आ सके।
इस टूल को बनाने से पहले शोधकर्ताओं ने 1 लाख से ज्यादा मरीजों पर किए गए करीब 500 मेडिकल ट्रायल्स के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन आंकड़ों के आधार पर यह टूल बताता है कि कौन-सी दवा, किस खुराक में और किस मरीज के लिए कितनी प्रभावी साबित हो सकती है।
डॉक्टर इन स्तरों को देखकर यह तय कर सकते हैं कि मरीज के लिए किस दवा की जरूरत है और कितनी डोज़ में।
अब नहीं करना होगा Trial-and-Error
अभी तक हाई बीपी के इलाज में डॉक्टरों को कई बार अलग-अलग दवाएं आज़मानी पड़ती थीं ताकि यह पता चले कि मरीज पर कौन-सी दवा बेहतर असर कर रही है। इससे इलाज में देरी और रिस्क दोनों बढ़ जाते थे। लेकिन इस स्मार्ट टूल की मदद से अब शुरुआत से ही मरीज को टारगेटेड दवा मिल सकेगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। मोटापा इंसान को सिर्फ मोटा ही नहीं करता बल्कि बीमार भी कर देता है। मोटापे से इंसान को कई बीमारियां लग जाती हैं। लगातार प्रयास करने के बाद भी वजन कम न होने के बाद हम सभी परेशान हो जाते हैं। वहीं, झारखंड में मोटापा कम करने का शौक तेजी से बढ़ रहा है। इसके लिए लोग इंजेक्शन लगवा रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक राज्य भर में लोग मोटापा कम करने के लिए इंजेक्शन लगवा रहे हैं। मैडिकल स्टोर में सेमाग्लुटाइड और टिरजेपेटाइड जैसे दवाओं की मांग भी लगातार बढ़ रही है। वहीं, मोटापा कम करने वाले इंजेक्शन काफी महंगे हैं। इन इंजेक्शनों की कीमत प्रत्येक डोज के लिए 3500 से 4500 रुपये के बीच है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मरीज को हर महीने 4 इंजेक्शन दिए जाते हैं, जिससे एक माह का खर्च 14,000 से 16,000 रुपये तक पहुंच जाता है। इलाज की अवधि 6 से 8 महीने तक होती है जिससे कुल खर्च 84,000 से 1.28 लाख रुपये के बीच तक पहुंच सकता है।
एक डायबेटोलॉजिस्ट ने बताया कि उनके पास करीब 100 नियमित मरीज हैं जो इन इंजेक्शनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका कहना है कि सेमाग्लुटाइड और टिरजेपेटाइड दवाओं के सेवन से भी व्यायाम के बिना वजन में कमी देखी गयी है, जिससे इसकी लोकप्रियता और बढ़ गई है। दवा व्यापारियों के अनुसार, यह इंजेक्शन एक माह पूर्व ही बाजार में आया है, लेकिन इसकी मांग इतनी तेजी से बढ़ी है कि 8 से 10 लाख रुपये तक का मासिक व्यापार हो रहा है।
डॉ श्रीवास्तव का कहना है कि मोटापा से वैसे पीड़ित व्यक्ति जो पैंक्रियाटाइटिस, किसी भी प्रकार के कैंसर, आंत की बीमारी और डायबिटिक रेटिनोपैथी वाले मरीज है, उन्हें यह इंजेक्शन नहीं लेना चाहिए। इससे उनके शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ता है।
डायबेटोलॉजिस्ट डॉ वीके ढांढनिया ने बताया कि सेगाग्लूटाइड और टिरजेपेटाइड दवा से मोटापा कम करने वाले हमारे पास दर्जनों मरीज है जिनको मेहनत नहीं करनी है, वह इसका उपयोग कर रहे हैं। दवाओं का साइड इफेक्ट तो होता ही है, इसलिए सामान्य व्यायाम और संयमित खानपान से वजन कम करना चाहिए।
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