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Published / 2021-12-01 15:05:50
वैज्ञानिक का खुलासा - नये वेरिएंट ओमिक्रॉन को देख पैरों तले खिसक गयी थी जमीन

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दक्षिण अफ्रीका से दुनिया के कई देशों में फैले कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रॉन को लेकर एक बार फिर से दुनिया भर में हाहाकार मच गई है। नए वैरिएंट का पता लगाने वाली दक्षिण अफ्रीका की सबसे बड़ी प्राइवेट टेस्टिंग लैब लैंसेट लैबोरेटरी की प्रमुख वैज्ञानिक राक्वेल वियाना का एक बड़ा बयान सामने आया है। दरअसल, उन्होंने बतावैज्ञानिक का खुलासा - नये वेरिएंट ओमिक्रॉन को देख पैरों तले खिसक गयी थी जमीन या कि जब उन्होंने जिनोम सिक्वेंसिंग के दौरान नए वैरिएंट के म्यूटेशंस को देखा तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। नए वैरिएंट को देखकर आश्चयर्चकित हो गई थीं साईंटिस्ट : नए वैरिएंट को देखकर वह आश्चयर्चकित हो गई थीं। वियाना ने बताया कि सबसे पहले 19 नवंबर को जब वे कोरोना वायरस के 8 नमूनों की जीनोम सिक्वेंसिंग कर रही थीं तो वायरस के म्यूटेट होने की रफ्तार को देखकर वह बहुत हैरान हो गई थीं। मुझे मेरी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था : वियाना ने ने बताया कि मुझे मेरी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं खुद से ही सवाल कर रही थी कि कहीं मैंने प्रोसेस में कोई गलती तो नहीं कर दी, मेरा दिल बैठ रहा था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि अगर मेरी खोज सही निकली तो मेरे सामने जो सैम्पल थे, उनका बहुत बड़ा असर होने वाला था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे बताऊं कि मैंने क्या खोजा है उन्होंने तुरंत जोहान्सबर्ग स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ कम्यूनिकेबल डिजीजेज में अपने साथी और जीन सीक्वेंसर डेनियल अमोआको को फोन किया और बताया कि मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे बताऊं कि मैंने क्या खोजा है उन्होंने बताया कि मैंने अमोआको से कहा कि मुझे लग रहा है कि यह नया वेरिएंट है। बता दें कि दक्षिण अफ्रीका में मिले इस यह नया वेरिएंट पूर्ण टीकाकरण करा चुकी आबादी में भी तेजी से फैल सकता है, इस डर के कारण अन्य प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। अमोआको ने कहा कि 32 अन्य नमूनों की जांच के बाद, यह स्पष्ट था, यह डरावना था, इसके बाद 24 नवंबर को इसके बारे में एनआईसीडी अधिकारियों और विभाग ने डब्ल्यूएचओ को जानकारी दी गई।

Published / 2021-11-29 01:57:00
वैक्सीन पर भारी पड़ेगा कोरोना वायरस का ओमिक्रोन वेरिएंट? - डॉ गुलेरिया

एबीएन डेस्क। कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ओमिक्रोन को लेकर दुनिया भर में लोग दहशत में हैं। कुछ ऐसे ही हालात भारत में भी हैं। सरकार इस नए वेरिएंट को लेकर गंभीरता से काम कर रही है क्योंकि कई देशों में इससे संक्रमण फैलना शुरू हो गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रमुख डॉ रणदीप गुलेरिया ने कहा है कि कोरोना वायरस के नए ओमिक्रोन स्वरूप के स्पाइक प्रोटीन क्षेत्र में 30 से अधिक परिवर्तन मिले हैं, जो इसे प्रतिरक्षा तंत्र से बचने की क्षमता विकसित करने में मदद कर सकता है और इसलिए इसके खिलाफ टीकों की प्रभावशीलता का मूल्याकंन गंभीरता से करने की जरूरत है।स्पाइक प्रोटीन की उपस्थिति पोषक कोशिका में वायरस के प्रवेश को आसान बनाती है और इसे फैलने देने और संक्रमण पैदा करने के लिए जिम्मेदार है। एम्स के निदेशक डॉ गुलेरिया ने बताया, कोरोना वायरस के नए स्वरूप में स्पाइक प्रोटीन क्षेत्र में कथित तौर पर 30 से अधिक उत्परिवर्तन हुए हैं और इसलिए इसके प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलने की क्षमता विकसित करने की संभावना है। अधिकांश टीके स्पाइक प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाकर काम करते हैं, इसलिए स्पाइक प्रोटीन क्षेत्र में इतने सारे परिवर्तन से कोविड-19 टीकों की प्रभावशीलता कम हो सकती है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में, भारत में प्रयुक्त होने सहित अन्य टीकों की प्रभावशीलता का गंभीर मूल्यांकन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भविष्य की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि इसके प्रसार, तीव्रता और प्रतिरक्षण क्षमता से बच निकलने के सामर्थ्य पर अधिक जानकारी में क्या सामने आता है। अधिकारियों ने कहा कि भारतीय सार्स-सीओवी-2 जीनोमिक कंसोर्टिया इनसाकोग कोरोना वायरस के नए स्वरूप बी.1.1.1.529 पर बारीकी से नज़र रख रहा है और देश में इसकी उपस्थिति का अभी तक पता नहीं चला है। डॉ गुलेरिया ने अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और उस क्षेत्र में जहां मामलों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है, दोनों के लिए बहुत सतर्क रहने और आक्रामक निगरानी रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, साथ ही, हमें सभी से इमानदारी से कोविड उपयुक्त व्यवहार का पालन करने के लिए कहना चाहिए और अपनी सुरक्षा को कम नहीं करना चाहिए। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को टीके की दोनों खुराकें मिलें और जिन लोगों ने अभी तक टीका नहीं लिया है, उन्हें इसे लेने के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

Published / 2021-11-27 07:26:26
WHO ने जताई चिंता : कोरोना के नए वैरिएंट ओमीक्रॉन के आगे वैक्सीन व बूस्टर डोज सब फेल !

एबीएन डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) की एक सलाहकार समिति ने दक्षिण अफ्रीका में पहली बार सामने आए कोरोना वायरस के नए वैरिएंट को बेहद तेजी से फैलने वाला चिंताजनक स्वरूप करार दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के इस नए वैरिएंट के आगे वैक्सीन व बूस्टर डोज सब फेल हो सकते हैं। WHO ने ग्रीक वर्णमाला के तहत इसे ओमीक्रॉन नाम दिया है। संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी की ओर से शुक्रवार को की गई यह घोषणा पिछले कुछ महीनो में वायरस के नए प्रकार के वर्गीकरण में पहली बार की गई है। इसी वर्ग में कोरोना वायरस के डेल्टा प्रकार को भी रखा गया था जिसका प्रसार दुनियाभर में हुआ था। तेजी से फैलने वाले वैरिएंट के सामने आने के बाद से यह डर बढ़ गया है कि यह संभावित रूप से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। ओमीक्रॉन की वजह से कई देशों को प्रभावित क्षेत्रों से यात्रा पर प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इससे दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेजी से गिरावट आई है। इस वैरिएंट की घोषणा गुरुवार को साउथ अफ्रीका में वैज्ञानिकों ने की थी। अब यह दो अन्य देशों इजरायल और बेल्जियम में भी पाया गया है। इससे पहले बोत्सवाना और हांगकांग में इसके मामले सामने आ चुके हैं। WHO का कहना है कि अब तक वैरिएंट के लगभग 100 जीनोम अनुक्रमों की सूचना मिली है। गौर करने वाली बात यह है कि कई संक्रमित व्यक्तियों को पूरी तरह से वैक्सीन लग चुकी थी। इसमें इजरायल का एक व्यक्ति भी शामिल है जिसे वैक्सीन की बूस्टर डोज भी दी जा चुकी थी। भारत ने शुक्रवार को 15 दिसंबर से नियमित अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं को फिर से शुरू करने की घोषणा की थी। अब तक के वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चलता है कि नया वैरिएंट डेल्टा सहित किसी भी अन्य स्वरूप की तुलना में तेजी से फैल रहा है। इसका सबूत टीका लगवा चुके लोगों का संक्रमण की चपेट में आना है। यह संकेत है कि इस वैरिएंट के खिलाफ वैक्सीन की प्रभाविकता पर भी असर पड़ सकता है।

Published / 2021-11-18 03:02:31
शोध : चाय-कॉफी का सेवन घटा सकता है आघात और मस्तिष्क रोग का जोखिम

एबीएन डेस्क। चाय-कॉफी से होने वाले नुकसान तो अकसर सुर्खियां बनते हैं लेकिन अब इनके शौकीनों के लिए अच्छी खबर है। एक शोध में सामने आया है कि चाय-कॉफी की चुस्कियां आघात और डिमेंशिया (मस्तिष्क रोग) का जोखिम घटा सकती हैं। फायदेमंद चुस्कियां : सेवन करने वालों में 32% तक कम मिला खतरा चीन की तिआंजिन मेडिकल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा जारी अध्ययन के मुताबिक, जिन लोगों ने दिनभर में दो-तीन कप कॉफी या तीन-पांच कप चाय या फिर दोनों के चार-छह कप पीए, उनमें आघात व डिमेंशिया का जोखिम सबसे कम पाया गया। शोधकर्ताओं ने 10 से 14 साल की अवधि में 50 से 74 साल के 3.60 लाख प्रतिभागियों पर यह अध्ययन किया है। अध्ययन में चाय और कॉफी का संतुलित सेवन करने वाले लोगों में डिमेंशिया का 28 फीसदी और आघात का 32 फीसदी कम जोखिम मिला। छह कप से ज्यादा बढ़ सकता है खतरा : वहीं, कुछ अध्ययन यह भी बता चुके हैं कि रोजाना तीन कप कॉफी पीना अल्जाइमर का खतरा घटा सकता है। हालांकि, एक दिन में छह कप से ज्यादा कॉफी पीने वालों में डिमेंशिया या मस्तिष्क विकारों का जोखिम बढ़ भी सकता है।

Published / 2021-11-16 17:30:58
वैज्ञानिकों ने की बिना इलाज के ठीक होने वाले दुनिया के दूसरे एचआईवी मरीज की पहचान

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दुनिया के दूसरे ऐसे एचआईवी मरीज की पहचान हुई है, जिसके बारे में माना जा रहा है कि उसके शरीर ने बिना एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के वायरस को समाप्त कर दिया है। वैज्ञानिकों ने मंगलवार को यह जानकारी दी। जर्नल "एनल्स ऑफ इंटर्नल मेडिसिन" में प्रकाशित इस अध्ययन में पता चला है कि एचआईवी के साथ जी रहे इस व्यक्ति की डेढ़ अरब से अधिक रक्त व ऊतक कोशिकाओं के विश्लेषण में एचआईवी के बरकरार वायरल जीनोम के बारे में कोई सबूत नहीं मिला है। वैज्ञानिकों ने इस व्यक्ति को एस्परेंजा पेशंट नाम दिया है। यह अध्ययन करने वाले शोधार्थियों का कहना है कि जैसी प्रतिक्रिया इस मरीज के प्रतिरक्षा तंत्र ने दी है अगर हम उसे समझ सकें तो हम इलाज के ऐसे तरीके विकसित कर सकते हैं जो अन्य एचआईवी मरीजों के प्रतिरक्षा तंत्र को इस तरह की प्रतिक्रिया देना सिखा सकते हैं। उन्होंने कहा कि संक्रमण के दौरान एचआईवी डीएनए या कोशिकाओं में अपने जीनोम की प्रतियां पहुंचाता है, जिससे वायरस का एक पूल बन जाता है। उन्होंने कहा कि इस स्थित में वायरस खुद को एचआईवी रोधी दवाओं और शरीर के प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं से खुद को प्रभावी तरीके से बचा लेता है। अधिकांश मरीजों में वायरस के इस पूल से लगातार वायरल के नए पार्टिकल बनते रहते हैं। एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) नए वायरस के निर्माण को रोक सकती है लेकिन यह इसके पूरे पूल को समाप्त नहीं कर सकती है। इस वजह से एचआई के मरीजों में वायरस को कमजोर करने के लिए दैनिक इलाज की जरूरत होती है। वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ लोगों का प्रतिरक्षा तंत्र ऐसा होता है जो बिना किसी इलाज के एचआईवी को कमजोर कर सकता है। ऐसे लोगों को एलीट कंट्रोलर नाम दिया गया है। ऐसे लोगों में वायरल का पूल होता है लेकिन एक तरह की प्रतिरक्षा कोशिका "टी किलर कोशिका" बिना इलाज की आवश्यकता के वायरस को कमजोर करती रहती है। इससे पहले अपने अध्ययन में एक और व्यक्ति का पता लगाया था जिसके शरीर में बिना इलाज के वायरस अपने आप समाप्त हो गया था। इस व्यक्ति को "सैन फ्रांसिस्को पेशंट" नाम दिया गया था। वैज्ञानिकों ने उसकी अरबों कोशिकाओं की सीक्वेंसिंग की थी लेकिन उन्हें एक भी बरकरार एचआईवी वायरल सीक्वेंस नहीं मिला था। यह इस बात की ओर संकेत था कि उसके प्रतिरक्षा तंत्र ने पूल को समाप्त कर दिया है। वैज्ञानिकों ने इसे "स्टेरिलाइजिंग क्योर" कहा है। इस तरह का पहला यह पहला मामला 2020 में नेचर जर्नल में प्रकाशित हुआ था और इसे खोजने वाले वैज्ञानिक भी वही थे जिन्होंने दूसरे मरीज की पहचान की है।

Published / 2021-11-07 15:06:43
खतरनाक आंकड़ा: भारत में 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार

एबीएन डेस्क : सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में इस समय 33 लाख से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से आधे से ज्यादा यानी कि 17.7 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, बिहार और गुजरात में हैं। इस बात की जानकारी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक आरटीआई के जवाब में दी है। मंत्रालय ने समाचार एजेंसी पीटीआई द्वारा एक आरटीआई के जवाब में कहा कि यह 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़ों का संकलन है। देश में कुल 33,23,322 बच्चे कुपोषित हैं। देश में 14 अक्तूबर तक 17.76 लाख बच्चे अत्यंत कुपोषित : मंत्रालय का अनुमान है कि कोरोना महामारी से गरीब से गरीब व्यक्ति में स्वास्थ्य और पोषण संकट और बढ़ सकता है। इस पर चिंता जताते हुए मंत्रालय ने कहा कि 14 अक्तूबर 2021 तक भारत में 17.76 लाख बच्चे अत्यंत कुपोषित (एसएएम) और 15.46 लाख बच्चे अल्प कुपोषित (एसएएम) थे। हालांकि ये आंकड़े अपने आप में खतरनाक हैं, लेकिन पिछले नवंबर के आंकड़ों से तुलना करने पर ये और भी ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं। नवंबर 2020 और 14 अक्तूबर 2021 के बीच एसएएम बच्चों की संख्या में 91 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है, जो अब 9,27,606 (9.27 लाख) से बढ़कर 17.76 लाख हो गई है। महाराष्ट्र में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे, दूसरे व तीसरे नंबर पर क्रमशः बिहार और गुजरात पोषण ट्रैकर के हवाले से आरटीआई के जवाब के मुताबिक, महाराष्ट्र में कुपोषित बच्चों की संख्या सबसे अधिक 6.16 लाख दर्ज की गई, जिसमें 1,57,984 बच्चे अल्प कुपोषित और 4,58,788 बच्चे अत्यंत कुपोषित थे। इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां 4,75,824 लाख कुपोषित बच्चे हैं। वहीं, तीसरे नंबर पर गुजरात है, जहां कुपोषित बच्चों की कुल संख्या गुजरात में कुल 3.20 लाख है। इनमें 1,55,101 (1.55 लाख) एमएएम बच्चे और 1,65,364 (1.65 लाख) एसएएम बच्चे शामिल हैं। बाकी राज्यों का ये हाल : अगर अन्य राज्यों की बात करें तो, आंध्र प्रदेश में 2,67,228 बच्चे (69,274 एमएएम और 1,97,954 एसएएम) कुपोषित हैं। कर्नाटक में 2,49,463 बच्चे (1,82,178 एमएएम और 67,285 एसएएम) कुपोषित हैं। उत्तर प्रदेश में 1.86 लाख, तमिलनाडु में 1.78 लाख, असम में 1.76 लाख और तेलंगाना में 1,52,524 लाख बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। वहीं, बच्चों के कुपोषण के मामले में नई दिल्ली भी पीछे नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी में 1.17 लाख बच्चे कुपोषित हैं। बता दें कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 46 करोड़ से अधिक बच्चे हैं।

Published / 2021-11-06 15:03:25
एम्स निदेशक का आगाह : दिल्ली की हवा सिगरेट के धुएं से भी ज्यादा हानिकारक, बढ़ सकते हैं कोरोना के मामले

एबीएन सेंट्रल डेस्क। दिवाली के बाद दिल्ली की हवा बेहद खराब हो गई है और एक्यूआई गंभीर श्रेणी में पहुंच गया है। लोगों की सांस और आंखों की खुजली की परेशानी बढ़ गई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने आगाह करते हुए कहा कि प्रदूषण से कोरोना के मामले में बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने कहा कि दिल्ली की हवा सिगरेट के धुएं से ज्यादा हानिकारक हो गई है। प्रदूषण के चलते लोगों का जीवनकाल भी काफी कम हो गया है। कहा कि अध्ययनों से पता चला है कि दिल्ली के निवासियों की जीवन अवधि काफी कम हो गई है। एक अंग्रेजी चैनल से खास बातचीत में एम्स निदेशक ने कहा कि प्रदूषित क्षेत्रों में कोविड की गंभीरता काफी बढ़ जाती है। मरीजों के फेफड़ों में अधिक सूजन हो जाती है। जिससे कोरोना के मामले में बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं, दिल्ली की हवा लोगों के गले में खराश, आंखों में जलन, सांस में तकलीफ दो रही है। खासकर बुजुर्ग, छोटे बच्चे और हाल ही में कोरोना से ठीक हुए गंभीर मरीजों की दिक्कत बढ़ गई है। रणदीप गुलेरिया ने शुक्रवार को बताया कि हर साल दिवाली और सर्दियों के समय उत्तरी भारत में पराली जलाने, पटाखों, दूसरी वजहों से दिल्ली और पूरे इंडो गैंजेटिक बेल्ट में स्मॉग होता है और कई दिनों तक विजिबिलिटी बहुत खराब रहती है। इसका सांस के स्वास्थ्य पर बहुत असर होता है। उन्होंने कहा कि हमने एक अध्ययन किया है, जिसमें हमने देखा कि जब भी प्रदूषण का स्तर ज्यादा होता है तो उसके कुछ दिन बाद बच्चों और व्यस्कों में सांस की समस्या की इमरजेंसी विजिट बढ़ जाती है। ये तय है कि प्रदूषण से सांस की समस्या बढ़ जाती है। डॉक्टरों के अनुसार, प्रदूषण के कारण दिल्ली के सभी अस्पतालों में मरीज पहुंच रहे हैं।

Published / 2021-11-03 13:04:30
खुशखबरी : भारत की कोवैक्सीन को डब्ल्यूएचओ से मिली आपात इस्तेमाल की मंजूरी, जानें क्यों अहम है ये फैसला

एबीएन डेस्क। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भारत में निर्मित कोरोना वायरस वैक्सीन कोवैक्सीन को बुधवार को आपात इस्तेमाल की मंजूरी दे दी। डब्ल्यूएचओ के अधिकारियों ने 27 अक्तूबर को कोवैक्सीन पर समीक्षा बैठक की थी। हालांकि, तब भारत बायोटेक से भारत में बनी इस वैक्सीन की ज्यादा जानकारी देने की मांग की गई थी। इससे पहले डब्ल्यूएचओ के प्रवक्ता ने कहा था कि अगर समिति संतुष्ट होती है, तो भारत की वैक्सीन को महज 24 घंटों के भीतर ही मंजूरी दे दी जायेगी। डब्ल्यूएचओ के तकनीकी सलाहकार समूह ने भारत बायोटेक से जो भी अतिरिक्त जानकारी मांगी थी वह विशेष रूप से वैक्सीन के अंतिम जोखिम-लाभ मूल्यांकन (फाइनल रिस्क-बेनेफिट एसेस्मेंट) से संबंधित थी।

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