टीम एबीएन, रांची। मेदांता हॉस्पिटल, रांची के कंसलटंट न्यूरो सर्जन डॉ आनंद कुमार झा ने वर्ल्ड ट्रॉमा डे के अवसर पर बताया कि हर साल बड़ी संख्या में सड़क हादसे में लोग अपनी जान गवां बैठते हैं। लोगों को अगर हादसे के बाद सही वक्त पर ट्रीटमेंट दिया जाये, तो बहुत संभव है कि इन आंकड़ों में भी सुधार हो सकता है। अगर किसी मरीज की दुर्घटना हो जाती है तो शुरुआती 6 घंटे बहुत मायने रखते हैं। अगर इन 6 घंटे में मरीज का इलाज किया जाए तो उसकी जान बचायी जा सकती है। मेदांता हॉस्पिटल, रांची में ऐसे मरीजों के इलाज की विशेष सुविधा है। वर्ल्ड ट्रॉमा डे के बारे में डॉक्टर आनंद कुमार झा ने बताया कि इस डे को मनाए जाने का उद्देश्य प्रिवेंशन और अवेयरनेस होता है। विशेष रूप से एक्सीडेंट से कैसे बचे? यदि अगर कोई टू व्हीलर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उसके लिए हेलमेट बहुत जरूरी होता है। अवेयरनेस के कारण जो ड्राइविंग करते हैं, वह तो हेलमेट लगाते ही हैं लेकिन जो पीछे बैठते हैं। हेलमेट उनके लिए भी ज्यादा जरूरी है। ट्रैफिक रूल को फॉलो करना भी बहुत जरूरी होता है। अगर कोई फोर व्हीलर का यूज कर रहा है तो सीट बेल्ट का उपयोग जरूर करें। यह अनिवार्य है। डॉ आनंद ने बताया कि अगर दुर्भाग्य से घटना हो जाती है तो सबसे पहले इस चीज को देखा जाता है कि मरीज में जान बची है या नहीं ? उसमें पल्स की स्पीड देखनी होती है। मरीज को वाहन की सहायता से नजदीक के हॉस्पिटल में लेकर जाना होता है। इसमें कुछ सावधानी अपनाने की जरूरत होती है। मरीज को ले जाने के वक्त सीधा लिटा कर ली जाए। इस बात का ख्याल रखना होता है अगर मुंह से खून निकल रहा है या उल्टी जैसा लग रहा है तो उसे थोड़ा करवट दे सकते हैं। उसके जो भी नजदीकी हॉस्पिटल है उसमें मरीज को शिफ्ट किया जा सकता है। वह बताते हैं कि दुर्घटना होने के बाद जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी ट्रीटमेंट देने की जरूरत होती है। लेकिन 6 घंटे बहुत अहम माने जाते हैं। मेदांता हॉस्पिटल, रांची में 24 घंटे और सातों दिन इमरजेंसी और ट्रॉमा विभाग कार्यरत रहता है। डॉ आनंद कुमार झा यह भी बताते हैं कि सड़क हादसे में सबसे अहम ब्रेन को बचाना होता है। अगर ब्रेन में गहरी चोट लगे तो पेशेंट की मौत आॅन द स्पॉट भी हो सकती है। इसके अलावा छाती या पेट का चोट भी घातक हो सकता है। अगर छाती में चोट लगती है तो तुरंत सिक्योर करने की जरूरत होती है। पेट में चोट लगने से ब्लड लॉस होने के चांसेस ज्यादा होते हैं। मेदांता हॉस्पिटल रांची में विश्वस्तरीय इलाज की व्यवस्था है, जिससे हादसे के शिकार मरीजों का बेहतर इलाज होता है। वर्ल्ड ट्रॉमा डे के मौके पर डॉक्टर आनंद कुमार झा यह कहते हैं कि कुछ सावधानी जरूर रखे। ड्राइविंग के वक्त हेलमेट का इस्तेमाल जरूर करें साथ ही हेलमेट को प्रॉपर टाइ करें। ड्राइविंग के वक्त मोबाइल पर कभी बातें न करें और ट्रैफिक रूल को जरूर फॉलो करें। ज्यादातर खुद की गलती से नहीं बल्कि दूसरों की गलती से एक्सीडेंट होता है। अगर आप सही हैं तो फिर दूसरे भी सही रहेंगे। अगर लोग यह सोच ले कि ट्रैफिक रूल का पालन करेंगे और गाड़ी को सही चलाएंगे तो ऐसी नौबत शायद नहीं आएगी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। देश में पिछले कुछ महीनों में हार्ट अटैक के मामले काफी बढ़ गये हैं। कम उम्र में ही दिल का दौरा पड़ रहा है और इससे मौत हो रही है। कई मामलों में अटैक अचानक आ रहा है और मौके पर ही मौत हो रही है। हालांकि हार्ट अटैक के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं, जिनकी पहचान से समय रहते इस बीमारी की पहचान हो सकती है, जिससे मरीज की जान बचाई जा सकती है। आइये जानते हैं क्या हैं वे लक्षण और कैस दिल की बीमारियों से बचाव कैसे करें। डॉक्टर गुप्ता बताते हैं कि खराब लाइफस्टाइल, खानपान की गलत आदतों और कोविड वायरस की वजह से हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। कोविड महामारी के बाद कोरोना हार्ट डिजीज के केस काफी बढ़ गये हैं। लोग डाइट में जंक फूड लेते हैं। शराब और धूम्रपान की लत भी काफी बढ़ गई है। साथ ही कोरोना वायरस की वजह से हार्ट आर्टरीज में हुए ब्लड क्लॉट की वजहे से भी दिल का दौरा पड़ रहा है। ब्लड क्लॉट की वजह से हार्ट फंक्शन सही से नहीं हो पाते हैं और इससे ब्लड पंप करने में परेशानी होती है और दिल का दौरा पड़ जाता है। हार्ट डिजीज के बढ़ते मामलों का एक कारण यह भी है कि लोग इस बीमारी के लक्षणों पर ध्यान नहीं देते हैं। कई मामलों में छाती में दर्द को गैस का दर्द समझते हैं, लेकिन ये हार्ट अटैक का कारण बनता है। कई मामलों में जेनिटिक कारणों और अधिक मानसिक तनाव की वजह से भी हार्ट डिजीज हो सकती है। इसलिए मानसिक सेहत पर भी ध्यान दें। अगर घर में किसी को पहले से ही दिल की बीमारी है, तो अपना ध्यान रखें और डॉक्टरों से सलाह जरूर लें। हार्ट अटैक आने से पहले दिखते हैं ये लक्षण अचानक ज्यादा पसीना आना सांस लेने में परेशानी छाती में दर्द और जकड़न बाएं हाथ और कंधे में दर्द जी मिचलाना और गर्दन जबड़े या पीठ तक पहुंचा दर्द ऐसे करें हार्ट डिजीज से बचाव खानपान का ध्यान रखें और डाइट में प्रोटीन और विटामिन शामिल करें। रोजाना कम से कम आधा घंटा एक्सरसाइज करें। धूम्रपान और शराब का सेवन न करें। हर तीन महीने में हार्ट की जांच के लिए लिपिड प्रोफाइल और चेस्ट एमआरआई करायें। कम से कम सात घंटे की नींद जरूर लें। हार्ट अटैक का कोई भी लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टरों से सलाह लें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस का एक और नया वेरिएंट बनाया है। कहा जा रहा है कि यह ओमिक्रोन से 80 गुना ज्यादा संक्रामक है। इस प्रयोग के बाद पूरी दुनिया के वैज्ञानिक चिंता में हैं, लोगों का डर है कि इस तरह के प्रयोगों के चलते से फिर से कहीं महामारी न फैल जाये। बता दें कि यह वायरस ओमिक्रोम और मूल कोरोनावायरस का हाइब्रिड है। यह इतना खतरनाक है कि रिसर्च में शामिल 100 में से 80 चूहों की इस वायरस के चलते मौत हो गयी। बोस्टन के जिस प्रयोगशाला में यह हाइब्रिड तैयार किया गया है उसके प्रमुख का कहना है कि शोध के जरिए कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन की भूमिका को समझने और इसके बेहतर इलाज के सिस्टम को तैयार करने में मदद मिलेगी। वहीं दुनियाभर के वैज्ञानिक इस शोध के बाद टेंशन में हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनिया को 2030 से पहले कैंसर का टीका मिल जायेगा। कोविड-19 का टीका बनाने वाली बायोएनटेक के सह-संस्थापक युगुर साहिन ने एक बयान में कहा कि कैंसर के इलाज के लिए या कैंसर मरीजों के जीवन को बदलने का इलाज बहुत जल्द हमारी मुट्ठी में होगा। उन्होंने कहा कि कैंसर का टीका कोविड-19 वैक्सीन के विकास के दौरान वैज्ञानिकों की हासिल सफलताओं पर आधारित होगा। उन्होंने कहा, अब सिर्फ आठ साल के भीतर कैंसर का टीका व्यापक रूप से उपलब्ध हो सकता है। हमें भरोसा है कि 2030 से पहले निश्चित रूप से कैंसर का टीका दुनिया में आ जाएगा। उन्होंने कहा, हमारा लक्ष्य फिलहाल यह देखना है कि क्या हम सर्जरी के तुरंत बाद मरीजों को व्यक्तिगत टीका दे सकते हैं या नहीं।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में कोरोना और लंपी वायरस के चलते अब मिजिल्स-रूबेला नामक बीमारी ने दस्तक दे दी है। यह बीमारी राज्य के कई जिलों में तेजी से फैल रही है। वहीं, धनबाद जिले में मिजिल्स के मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है। इस बीमारी की चपेट में आकर अब तक 4 बच्चों की मौत हो गई है। वहीं, 30 से ज्यादा मरीज संक्रमित पाए गए हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जिला रेड जोन की तरफ चला जाएगा। दरअसल, यह बीमारी बच्चों में तेजी से फैलती है, जिसकी वजह से अब तक 4 बच्चों की मौत हो गई है। बता दें कि इस बीमारी के ज्यादातर मरीज ग्रामीण इलाके के हैं। स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी से लोगों को बचाने के लिए विशेष टीम तैयार कर ली है। टीम में शामिल डॉक्टर द्वारा मिजिल्स के मरीजों पर लगातार नजर रखी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की टीम गांवों में कैंप लगाकर लोगों का इलाज शुरू करने की तैयारी में है। स्वास्थ्य विभाग ने आंकड़े जारी कर बताया है कि साल 2021-22 में 67 प्रतिशत बच्चों को मिजिल्स का टीका दिया गया है। 33 प्रतिशत बच्चे टीकाकरण नहीं हो सका। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार बाघमारा, बलियापुर, धनबाद सदर, गोविंदपुर, झरिया, निरसा, तोपचांची व टुंडी ब्लॉक में 72,327 बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित था जबकि, 48,459 बच्चों को मिजिल्स का टीका दिया गया। करीब 23,868 बच्चे मिजिल्स टीकाकरण से छूट गए। सिविल सर्जन डॉ आलोक ने बताया कि मिजिल्स संक्रामक बीमारी है। खासकर बच्चों के बीच यह तेजी से फैलता है। इससे बचाव के लिए 15 माह के बच्चों को मिजिल्स व रूबेला का टीका दिया जाता है। पहला टीका का पहला डोज 9 माह में और दूसरा डोज 15 माह में बच्चे को दिया जाता है। इस समय सीमा में छोटे बच्चों को 5 साल की अवधि तक में 1 माह में 2 टीका देना अनिवार्य है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। सर्दी का मौसम जल्दी ही दस्तक दे देगा और ऐसा माना जा रहा है कि इसमें कोरोना जैसी महामारी फिर से दस्तक दे सकती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक सर्दी के आने से पहले नजर आने वाले इन लक्षणों को भूल से भी नजरअंदाज न करें। गले में खराश: रिपोर्ट्स में सामने आया है कि आने वाली सर्दियों में कोरोना वायरस फिर से अपना ज्यादा प्रभाव दिखा सकता है। कोरोना के शुरूआती लक्षण आम बीमारियों से जुड़े होते हैं। अगर आपको गले में खराश है, तो इसका इलाज तुरंत कराएं। खांसी-जुकाम : ये कोरोना वायरस का एक बड़ा लक्षण है। मौसम चल रहे बदलाव में खांसी या जुकाम नॉर्मल वायरल हो सकता है। इस समस्या के होने पर घरेलू नुस्खे अपनाने की गलती न करें। ऐसा होने पर कोरोना का टेस्ट कराएं और दवा का सही तरीके से सेवन करें। लाल आंखें : इस बदलते मौसम में आंखों में खुजली और जलन होने पर भी इलाज कराना जरूरी है। आंखों का लाल होना भी कोरोना का एक लक्षण है। सर्दियों के आने से पहले आंखों की देखभाल से जुड़े सभी तरीके आजमाना शुरू कर दें। थकान : शरीर में पोषक तत्वों की कमी, काम का बोझ या फिर अन्य कारणों के चलते थकान हो सकती है। लेकिन आपको बता दें कि थकान भी कोरोना का एक लक्षण है। थकावट, रीढ़ की हड्डी और जोड़ों में दर्द को इग्नोर न करें। सर्दियों में थकान होना आम है, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि कोरोना ने आपको अपनी चपेट में लिया हुआ हो।
एबीएन हेल्थ डेस्क। आज की लगातार बदल रही जीवन शैली और भागदौड़ वक्त में कब किसे क्या हो जाए, कोई नहीं जानता। कोरोना काल के बाद लोगों के जीवन में अप्रत्याशित रूप से बदलाव आए हैं। कई नई बीमारियों ने भी एक घर कर लिया है। इससे कोई भी अछूता नहीं है। इन्हीं बीमारियों में अर्थराइटिस भी अब शामिल हो गया है। जो तेजी से लोगों में फैल रहा है और लोगों को अपना शिकार बना रहा है। वर्ल्ड अर्थराइटिस डे पर मेदांता रांची ने लोगों को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि यह ऐसी बीमारी है जो अब हर उम्र के लोगों को अपने चपेट में ले रही है। जीवन शैली में बदलाव करके काफी हद तक इस बीमारी से बचा जा सकता है। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा कहते हैं, हर साल 12 अक्टूबर को वर्ल्ड अर्थराइटिस डे मनाया जाता है। ऐसे में हमारी कोशिश लोगों के बीच में यह अवेयर करने की होती है कि किसी भी बीमारी को लोग छोटा नहीं समझे। अर्थराइटिस एक ऐसी बीमारी है। जिससे लोगों को चलने या बैठने में तकलीफ होती है और अगर इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिए दिया गया तो भारी परेशानी हो सकती है। निलेश यह भी बताते हैं कि कोरोना के बाद युवाओं में अर्थराइटिस से जुड़े गठिया के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा कहते हैं कि पहले अर्थराइटिस की बीमारी सामान्य तौर पर 40- 45 साल के बाद देखने को मिलती थी लेकिन अब इसके फैलाव में काफी तेजी हो गई है। हर रोज मेदांता रांची में बड़ी संख्या में वैसी महिला और पुरुष पहुंच रहे हैं जो जोड़ों के दर्द से परेशान हैं। अर्थराइटिस यानी कि गठिया जोड़ों की सूजन और दर्द से जुड़ा हुआ रोग है। जब शरीर में यूरिक एसिड बढ़ जाता है तो ऐसी बीमारी होती है। यह ऐसी बीमारी है जो मुख्यत ओल्ड एज के लोगों में देखने को मिलता है। अपने देश में साठ साल से ज्यादा लगभग 80 फीसदी बुजुर्ग इस बीमारी से पीड़ित हैं। डॉक्टर नीलेश यह भी बताते हैं कि वर्क फ्रॉम होम कल्चर आने के बाद आर्थराइटिस में अप्रत्याशित रूप से तेजी देखी जा रही है। मेदांता रांची के वरिष्ठ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर नीलेश मिश्रा यह भी कहते हैं कि अगर कुछ चीजों पर ध्यान दिया जाए तो बहुत हद तक आर्थराइटिस पर कंट्रोल किया जा सकता है। वह बताते हैं कि एक्सरसाइज और डाइट का ख्याल तो लोगों को रखना ही होगा और साथ ही साथ प्रचुर मात्रा में ताजी और हरी सब्जी का सेवन और खानपान में सीजनल फलों के उपयोग को शामिल करके अर्थराइटिस से बचा जा सकता है। उन्होंने यह भी आगाह किया कि जब जोड़ों में दर्द शुरू हो तो उसे हल्के में कतई न लें। डॉक्टर निलेश यह भी बताते हैं कि अक्सर यह देखा जाता है कि जब जोड़ों में दर्द होता है तो लोग हॉट वाटर बैग से उसकी सिकाई करते हैं जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। जब दर्द होता है तो बिना डॉक्टर की सलाह के लोग पेन किलर का भी इस्तेमाल करने लगते हैं। इससे क्षणिक तौर पर आराम तो मिल जाता है लेकिन किडनी और इससे संबंधित अन्य बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है।
टीम एबीएन, रांची। प्रोस्टेट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसका डायग्नोस आमतौर पर 60 साल के बाद सामने आता है। अगर शुरुआती दौर में ही में इस बीमारी के लक्षण को पकड़ लिया जाए और उचित दिशा निर्देश में इलाज किया जाए तो ऐसी हालत में मरीजों को बहुत लाभ मिल सकता है। यह आंकड़ा मेदांता रांची के प्रोस्टेट कैंसर के विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक गुप्ता ने दी। डॉ अशोक ने बताया कि प्रोस्टेट एक छोटी ग्रंथि होती है जो एक इंसान के निचले पीछे पेट में पाई जाती है। यह मूत्राशय के नीचे और मूत्र मार्ग के आसपास स्थित है। प्रोस्टेट हार्मोन टेस्टोस्टेरोन द्वारा विनियमित होता है और एक तरल पदार्थ का उत्पादन करता है। जिसे वीर्य कहते हैं। वीर्य शुक्राणु युक्त तरल पदार्थ है, जो स्क्रीन के दौरान मूत्र मार्ग से निकलता है। जो प्रोस्टेट में कोशिकाओं की असामान्य और घातक वृद्धि से ट्यूमर बन जाता है। उसे ही प्रोस्टेट कैंसर कहा जाता है। ये कैंसर शरीर के अन्य क्षेत्रों में फैल जब फैलना शुरू करता है। तब भी इसे प्रोस्टेट कैंसर ही कहा जाता है क्योंकि कैंसर प्रोस्टेट के कोशिकाओं से बना है। उन्होंने यह भी बताया कि यह पुरुषों में होने वाला कैंसर है और यह बहुत कॉमन कैंसर है। इसके होने का मुख्य और सबसे बड़ा कारण अनुवांशिक है और इस कैंसर के करीब 90: मामले अनुवांशिक ही होते हैं। दरअसल जेनेटिक म्यूटेशन से जो बदलाव आता है तो उससे मरीजों में कैंसर होने के चांसेज हो जाते हैं। वैसे लोग या वैसे मरीज जिनके भाई और पिताजी को कैंसर रहा हो या फिर फर्स्ट डिग्री रिलेटिव को कैंसर रहा हो। वैसे मरीजों में आम आदमी की तुलना में कैंसर होने का खतरा ढाई गुना ज्यादा होता है। यह मुख्य तौर पर अमेरिकन में पाए जाने वाला रोग है और इसकी तुलना में एशियन और अफ्रीकन में यह बीमारी कम होती है। भारतीयों में यह बीमारी कम होने का एक मुख्य कारण रेसियल डिफरेंस भी है। डॉक्टर अशोक ने यह भी बताया कि यह कैंसर धीरे-धीरे होता है। 70 से 90 साल से ऊपर के पुरुषों में इस कैंसर का खतरा ज्यादा रहता है। पुरुषों में मुंह के कैंसर के बाद होने वाला दूसरा सबसे कॉमन कैंसर है। अपने देश में अभी जब हम स्क्रीनिंग कर रहे हैं तो यह अब जल्दी पकड़ में आ रहा है। करीब 80 से 90: मामलों में हम यह स्क्रीनिंग तब करते हैं, जब यह काफी फैल चुका होता है। इसमें उनकी ट्रीटमेंट भी होता है और रिकवरी भी होती है। अगर शुरूआती दौर में ही कैंसर को पकड़कर बेहतर इलाज की जाए तो अच्छे परिणाम मिल सकते हैं। खास बात यह कि जो लोग स्मोकिंग करते हैं उनमें बीमारी होने दोबारा होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर किसी का प्रोस्टेट कैंसर ठीक हो गया और वह स्मोकिंग करने लगे तो उसे कैंसर दुबारा हो जाएगा , या फिर जिनका वजन ज्यादा होता है, उनमें बीमारी हायर स्टडीज में डायग्नोसिस करवाते हैं। स्मोकिंग और अधिक वजन कुछ रिस्क फैक्टर है।
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