एबीएन सेंट्रल डेस्क। एक नयी रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ( आइसीएमआर) के अनुसार, देश के 21 प्रमुख अस्पतालों में सुपरबग्स की खतरनाक उपस्थिति देखी गई है। इन सुपरबग्स के कारण अस्पतालों में भर्ती मरीजों के जीवन को खतरा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा क्लासीफाइड सुपरबग्स (क्लेबसिएला न्यूमोनिया और एस्चेरिचिया कोलाई) मुख्य रूप से एम्स दिल्ली, पीजीआइ चंडीगढ़, अपोलो अस्पताल चेन्नई और दिल्ली के गंगाराम अस्पताल सहित कई अन्य अस्पतालों में पाये गये।
आईसीएमआर रिपोर्ट में कहा गया है कि ये सुपरबग्स मरीजों के सैंपल में पाये गये, जिनमें खून, यूरीन और अन्य तरल पदार्थ शामिल हैं, जो आउट पेशेंट विभागों (ओपीडी), वार्डों और आईसीयू से एकत्र किए गए थे। इस खुलासे से अस्पतालों में अलार्म बज गया है और उन्हें सुपरबग्स के आगे प्रसार को रोकने के लिए दवाओं का बेहतर मैनेजमेंट और जीवाणु अपशिष्ट के निपटान के लिए सख्त प्रोटोकॉल का पालन करने की सलाह दी गयी है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनइपी) द्वारा इस साल की शुरुआत में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि 2050 तक सुपरबग्स कैंसर जितने बड़े खतरे में हो सकते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे सुपरबग्स के प्रत्यक्ष आर्थिक परिणाम 2030 के अंत तक लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर प्रति वर्ष होंगे। इसके अलावा, 24 मिलियन लोग चरम गरीबी में धकेले जा सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि पशु पालन और फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा प्रदूषण से सुपरबग्स का उदय बढ़ गया है।
सुपरबग्स बैक्टीरिया, वायरस, फंगी या परजीवी के ऐसे स्ट्रेन हैं जो ज्यादातर एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति रजिस्टेंस होते हैं, जिनमें आधुनिक दवाएं भी शामिल हैं। वे अक्सर एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के कारण होते हैं। कीटाणुनाशक, एंटीसेप्टिक्स और एंटीबायोटिक्स जो जर्म्स को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं, हर जगह मौजूद हैं, टूथपेस्ट और शैम्पू से लेकर गाय के दूध और गंदे पानी तक।
टीम एबीएन, रांची। विश्व फिजियोथेरेपी दिवस पर सिनर्जी ग्लोबल हॉस्पिटल के फिजियोथेरेपी डिपार्टमेंट में वर्ल्ड फिजियोथेरेपी दिवस को बहुत ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया। इस बार वर्ल्ड फिजियोथेरेपी डे का थीम रोल आफ फिजियोथेरेपी इन मैनेजमैंट एंड प्रिवेंशन इन लो बैक पैन था। जिस विषय पर हमारे मुख्य अतिथि और प्रवक्ता ने अपने विचारों को साझा किया।
डॉ रजनीश कुमार (हड्डी रोग विशेषज्ञ) ने बताया कि हेल्थ केयर प्रोफेशन में जितना इंपोर्टेंट रोल हमारा है, उतने ही महत्वपूर्ण रोल फिजियोथेरेपी का है। सर्जरी के बाद पेशेंट को वापस दैनिक दिनचर्चा में लाने में फिजियोथेरेपी का पचास प्रतिशत का योगदान है। साथ ही डॉ राहुल (हड्डी रोग विशेषज्ञ) ने भी बताया कि जितने पेशेंट हमारे पास आते हैं उनमें से अस्सी- नब्बे प्रतिशत मामला का मुख्य कारण कमर दर्द से रिलेटेड ही रहता है।
जिसे ठीक करने हेतु हम फिजियोथेरेपी की सलाह देते हैं। फिजियोथेरेपी अतिथि के रूप में मौजूद संध्या आर मेहता (आईपीएस, डीआइजी, सीआईडी) मैम ने भी फिजियोथेरेपी को लेकर अपने जीवन के अनुभव को शेयर किया कि कैसे फिजियोथेरेपी की मदद से पुराने कमर दर्द से राहत पाया और वापस से दर्द से निजात पाया। विशेष अतिथि लवली चौबे (स्वर्ण विजेता भारत) (लॉन बॉल) और कॉमनवेल्थ गेम्स ने भी बताया कि खेलने के दौरान उन्होंने फिजियोथेरेपी के मदद से कैसे अपने सपनों को साकार किया।
साथ ही गेस्ट के तौर पर डॉ कुमकुम विद्यार्थी मैम (सीनियर ज्ञानिकोलोजिस्ट) और डॉ संगीत सौरभ सर (गैस्ट्रोलॉजिस्ट) ने भी फिजियोथेरेपी के जागरूकता हेतू अपने अपने विचार प्रकट किये। आखिरी स्पीकर के तौर पर डीबीपीआर के संस्थापक डॉ रजनीश कुमार बरियार, डॉ प्रियंका बरियार ने सभी अतिथियों को सौल और मोमेंटो देकर उनका सम्मान किया और डॉ बरियार ने बताया कि हम कैसे अपने समाज के हर व्यक्ति को फिजियोथेरेपी के एक्सरसाइज से हम उन्हें कमर के दर्द से दूर रख सकते हैं।
उनका बस एक ही उद्देश्य है कि समाज का हर व्यक्ति को स्वस्थ रहना है। उनकी पूरी टीम कैसे इस कार्य में जुटी हुई है और अंत में डॉ सुभालक्ष्मी खटुआ ने वोट आफ थैंक्स देकर कार्यक्रम का समापन किया। डॉ शुभालक्ष्मी ने उन सारे मरीज का भी सम्मान किया और उन्हें शॉल और गुलदस्ता देकर उनका स्वागत भी किया गया।
कार्यक्रम में डॉ ज्योत्सना, डॉ अफजल, डॉ आर्यन, डॉ राहुल, डॉ नेहा, डॉ शिवानी, डॉ शीला, डॉ धीरज, डॉ मेहर, डॉ सबाना, जौनुअल, निशांत, राज सिंह, संजू सिंह, डॉ नसीम, डॉ जावेद, डॉ हेमलता, सबीना, पिंकी सुशांत ने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। सबने फिजियोथेरेपी की जागरूकता को लेकर कमर के दर्द के इलाज और इसके रोक थाम के बारे में बेहतरिन जानकारी दी।
एबीएन हेल्थ डेस्क। योग एक आध्यात्मिक विज्ञान है, जिससे शरीर का समग्र विकास होता है। यदि किसी को अपनी एकाग्रता शक्ति बढ़ानी है, तो उसके लिए कई विशेष योग निर्धारित किये गये हैं। इन योग में से एक है त्राटक योग योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि त्राटक योग ध्यान का एक रूप है, जिसे एकाग्र दृष्टि के रूप में भी जाना जाता है। इसे आमतौर पर कैंडल ग्लेजिंग यानी मोमबत्ती देखने वाले योग के रूप में जाना जाता है।
त्राटक क्रिया मोमबत्ती ध्यान के साथ साथ गोलाकार, चक्राकार, बिंदु, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, आदि दृश्य पर भी ध्यान किया जाता है। त्राटक मूल रूप से षट्कर्म का भाग है। यह आंतरिक अंगों को शुद्ध करने के लिए उपयोग है। त्राटक योग का उपयोग सबसे पहले मन की अस्थिरता को दूर करने और एकाग्रता को बढ़ावा देने के साथ-साथ आंखों की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए किया जाता है। त्राटक योग के अभ्यास को मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की तैयारी के लिए बताये गये छह षट्कर्म में से एक माना गया है।
जब त्राटक योग का अभ्यास करने की बात आती है, तो इसे करने के कई तरीके हैं। चाहे उसका बौद्ध-प्रभावित श्वास-केंद्रित ध्यान हो, मंत्र के साथ वैदिक ध्यान हो या आपकी शारीरिक संवेदनाओं का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना हो, परंपरागत रूप से योगियों द्वारा न केवल आंखों पर इसके लाभकारी प्रभावों के लिए, बल्कि एकाग्रता में सुधार पर इसके जबरदस्त प्रभाव के लिए भी विभिन्न तरीकों से इसका अभ्यास किया जाता है।
इस योगीक क्रिया को करने के लिए सबसे पहले मोमबत्ती जलायें और इसे आंखों के स्तर पर रखें, सुनिश्चित करें कि मोमबत्ती की लौ हवा के कारण हिले नहीं, हाथों को घुटनों पर रखकर आरामदायक ध्यान मुद्रा में बैठें। शरीर को आराम देने के लिए धीरे-धीरे सांस लें अब आंखें बंद करें और कुछ सेकंड बाद धीरे-धीरे आंखें खोलें और बिना पलक झपकाये मोमबत्ती की लौ एकटक देखने की कोशिश करें।
आंखों पर दबाव डाले बिना, जितना संभव हो सके लौ को देखते रहें और फिर जरूरत पड़ने पर आंखें बंद कर दें आंखें बंद करके अपना पूरा ध्यान भौंहों पर केन्द्रित करें, इस अवस्था में ही मस्तिष्क में मोमबत्ती की लौ की कल्पना करें और उस पर ध्यान केंद्रित करें। साथ ही बंद आंखों से नजर आने वाले किसी भी रंग का अध्ययन करें। जब मस्तिष्क के भीतर उभरने वाली छवि गायब हो जाए, तो इस प्रक्रिया को 5-10 मिनट तक जारी रखें।
यदि मन भटकता है,तो श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। त्राटक योग अभ्यास करने से कई अनेक लाभ प्राप्त होते हैं जिसमें, आंखों की मांसपेशियों के रोग निकट दृष्टि दोष, एकाग्रता और स्मृति में सुधार करता है, इसलिए स्कूली बच्चों को इस योग का अभ्यास जरूरी है त्राटक योग के जरिए नींद से संबंधित विकारों, सिरदर्द, अनिद्रा व बुरे सपने, बेचैन मन शांत, मानसिक, व्यावहारिक और भावनात्मक बीमारियों को दूर करने में भी मदद करता है त्राटक योग से आपका आत्मविश्वास, धैर्य और इच्छाशक्ति को बढ़ावा मिलता है। त्राटक योग क्रिया के अभ्यास से पहले कुछ सावधानी बरतनी जरूरी है।
त्राटक योग खाली पेट और प्राणायाम अभ्यास के बाद सुबह 4-6 बजे के बीच अधिक प्रभावी है। आप रात में सोने से पहले भी इस योग का अभ्यास कर सकते हैं। त्राटक योग का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान रखें कि कमरा न तो रोशनी से भरा हो और न ही उसमें बहुत अंधेरा हो। प्रतिदिन 10-15 मिनट इसका अभ्यास किया जा सकता है। ग्लूकोमा जैसे गंभीर नेत्र विकार होने पर त्राटक योग नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा, सिजोफ्रेनिया या मतिभ्रम जैसी मानसिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों के लिए त्राटक योग उपयुक्त नहीं है। योगाचार्य के मार्गदर्शन में ही त्राटक योग क्रिया का अभ्यास किया जाना चाहिए त्राटक योग प्रभावी और लाभकारी विशेष योग है। इसके माध्यम से आप अपनी एकाग्रता शक्ति को बढ़ा सकते हैं। अगर आपको ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होती है, तो यह योग आपके लिए लाभदायक साबित होगा।
एबीएन हेल्थ डेस्क। योग की उत्पति जब से सभ्यता प्रारंभ हुई थी और तब से योग किया जा रहा है यह हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। योगाचार्य महेशपाल बताते है कि यह शारीरिक, आध्यात्मिक और मानसिक व्यायामों का एक समूह है जिसका अभ्यास हमारे स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। यह अब पश्चिम में भी शारीरिक व्यायाम के रूप में लोकप्रिय हो गया है। योग तनाव को कम करता है और अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। कपालभाति योगिक क्रिया एकलोकप्रिय योग अभ्यास है।
कपालभाति योग में षट्कर्म (हठ योग) की एक विधि (क्रिया) है। संस्कृत में कपाल का अर्थ होता है माथा या ललाट और भाति का अर्थ है तेज। इसके नियमित अभ्यास करने से मुख पर आंतरिक प्रभा (चमक) से उत्पन्न तेज रहता है। कपाल भाति बहुत ऊजार्वान उच्च उदर श्वास व्यायाम है। कपालभाति के तीन अलग-अलग प्रकार हैं। वातक्रम कपालभाति के में सांस को बाहर निकाला जाता है जबकि सांस को अंदर लेना स्वाभाविक और निष्क्रिय होता है। व्युत्क्रम कपालभाति में नाक से पानी अंदर प्रवेश कराया जाता है और फिर मुंह से बाहर निकाला जाता है।
अंत में, शीतक्रम कपालभाति वह है जिसमें पानी को मुँह में पिया जाता है और फिर नाक से बाहर निकाला जाता है। यह अभ्यास नाक के मार्ग और श्वसन प्रणाली को शुद्ध करने के लिए किया जाता है, कपालभाति योगिक क्रिया के अभ्यास करने के लिए रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी ध्यानात्मक आसन, सुखासन या फिर कुर्सी पर बैठें। इसके बाद तेजी से नाक के दोनों छिद्रों से साँस को यथासंभव बाहर फेंकें। साथ ही पेट को भी यथासंभव अंदर की ओर संकुचित करें। तत्पश्चात तुरन्त नाक के दोनों छिद्रों से सांस को अंदर खींचते हैं और पेट को यथासम्भव बाहर आने देते हैं।
इस क्रिया को शक्ति व आवश्यकतानुसार 50 बार से धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 500 बार तक कर सकते हैे, किन्तु एक क्रम में 50 बार से अधिक न करें। क्रम धीरे-धीरे बढ़ायें। फेफड़े श्वसन तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो आपको सांस लेने में मदद करते हैं। फेफड़ों के अलावा, श्वसन तंत्र में वायुमार्ग शामिल होते हैं जो आपके फेफड़ों में हवा को अंदर और बाहर ले जाते हैं, फेफड़ों के आसपास की रक्त वाहिकाएं और मांसपेशियां जो आपको सांस लेने में मदद करती हैं। अगर इनमें इंफेक्शन हो जाए तो काफी गंभीर समस्या हमारे सामने नजर आती हैं जिससे हम लंग्स इन्फेक्शन के नाम से जानते हैं, फेफड़ों का संक्रमण वायरस, बैक्टीरिया और कभी-कभी फंगस के कारण भी हो जाता है।
जब आपके फेफड़ों से हवा को लाने-ले जाने वाली बड़ी ब्रोन्कियल नलियां संक्रमित हो जाती हैं, तो इसे ब्रोंकाइटिस कहा जाता है। ब्रोंकाइटिस बैक्टीरिया की तुलना में वायरस के कारण होने की अधिक संभावना होती है। जिसके कारण कई गंभीर समस्या हमारे समक्ष आ जाती है जिसमें, खांसी के साथ बलगम और ब्लड आना, सांस लेने में समस्या होना, सीने में दर्द होना मांसपेशियों में दर्द होना,गले में दर्द होना, घरघराहट की समस्या, थोड़े काम या सामान्य क्रिया से जल्दी थकान होना, उल्टी-दस्त के साथ जी मिचलाना लंग्स इन्फेक्शन की समस्या से बचाव के लिए एवं वायरस बैक्टीरिया और फंगस के प्रकोप से बचाव के लिए कपालभाति योग क्रिया एवं भस्त्रिका प्राणायाम के द्वारा हम इन गंभीर रोगों से बचाव कर सकते हैं।
यह अभ्यास फेफड़ों के इंफेक्शन एवं फेफड़ों से हवा को लाने ले जाने वाली ब्रोंकाइल नालियों को संक्रमित होने से बचाते हैं और फेफड़ों की कार्य क्षमता बढ़ाने में मदद करता है जिससे हम विभिन्न प्रकार के रोगों से बच सकते हैं और हमारी इम्यूनिटी स्ट्रांग बनती है, कपाल भाती के अभ्यास से हमे कई लाभ प्राप्त होते हैं जिसमें यह कपाल को शुद्ध करता है कफ विकारों को समाप्त करता है। यह जुकाम, साइनोसाइटिस, अस्थमा एवं श्वास नली संबंधी संक्रमणों में लाभदायक है। यह पूरे शरीर का कायाकल्प करता है और चेहरे को सुकोमल और दीप्तिमान बनाये रखता है।
यह तंत्रिका तंत्र को संतुलित कर शक्तिशाली बनाता है साथ ही साथ पाचन तंत्र को शक्तिशाली बनाता है। कपालभाती क्रिया के अभ्यास करने से पहले कुछ सावधा सावधानिया रखनी चाहिए यह अभ्यास प्रारंभ मैं योगाचार्य के मार्गदर्शन मैं ही किया जाना चाहिए हृदय संबंधी व्याधियों में, चक्कर आने, उच्च रक्तचाप, नासिका से रक्त प्रवाह, मिरगी, माइग्रेनस्ट्रोक, हर्निया एवं गैस्ट्रिक अल्सर होने की स्थिति में इस अभ्यास को नहीं करना चाहिए।
कपालभाती क्रिया के अभ्यास करने से पहले कुछ सावधानिया रखनी चाहिए यह अभ्यास प्रारंभ मैं योगाचार्य के मार्गदर्शन मैं ही किया जाना चाहिए हृदय संबंधी व्याधियों में, चक्कर आने, उच्च रक्तचाप, नासिका से रक्त प्रवाह, मिरगी, माइग्रेनस्ट्रोक, हर्निया एवं गैस्ट्रिक अल्सर होने की स्थिति में इस अभ्यास को नहीं करना चाहिए।
एबीएन हेल्थ डेस्क। नौली एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है एक व्यायाम जो शरीर के आंतरिक अंगों की मालिश करके पेट के क्षेत्र को साफ करने के लिए किया जाता है। इसे अंग्रेजी में आइसोलेशन आॅफ द बेली भी कहा जाता है। योगाचार्य महेशपाल विस्तार से बताते हैं कि इस अभ्यास के चार अलग-अलग संस्करण हैं: मध्यान नौली, वामा नौली, दक्षिणा नौली और भ्रमर नौली क्रिया।
नौलि क्रिया में पेट की आन्तरिक मांसपेशियों को गोल-गोल घुमाया जाता है जिससे उनकी मालिश होता है। इस क्रिया को करने के लिये खड़े होकर, पैरों के बीच कुछ दूरे रखते हुए, घुटनों को मोड़कर किया जाता है। उड्डियान बन्ध, नौलि में किया जाने वाला बन्ध। नौलि छह षटकर्मों में से एक है, जो पारंपरिक हठ योग में प्रयुक्त शुद्धिकरण है।नौली शुरू करने के लिए क्लासिक स्थिति यह है कि खड़े होकर धड़ को थोड़ा आगे की ओर झुकायें और हाथों को जांघों पर टिकाएं।
पूरी सांस बाहर छोड़ी जाती है और फिर पेट को अंदर लाया जाता है। फिर पेट की मांसपेशियों को अलग किया जाता है और एक सर्कल में घुमाए जाने से पहले उन्हें सिकोड़ा जाता है। यह हठ योग में इस्तेमाल किए जाने वाले छह षट्कर्म या शुद्धिकरण विधियों में से एक है। माना जाता है कि नौली समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है और जीवन शक्ति को बढ़ाती है।
यह मणिपुर और स्वाधिष्ठान चक्रों को भी सक्रिय करती है नौली क्रिया में उड्डियन बन्ध में फेफड़ों को खाली किया जाता है, और पेट पसली के निचले किनारे के नीचे अंदर और ऊपर की ओर खींचा जाता है मध्यान नौलि : केवल पेट की केंद्रीय मांसपेशियां सिकुड़ती हैं वाम नौलि मैं केवल पेट की बाईं मांसपेशियां सिकुड़ती हैं दक्षिण नौलि मैं केवल पेट की दाहिनी मांसपेशियां सिकुड़ती हैं।
योग का एक नियम है कि प्रत्येक मांसपेशी एक दिन में कम से कम एक बार गतिशील अवश्य हो। इससे हमारी ऊर्जा पुन: प्रवाहित होने लगती है और रुकावटें दूर होती हैं। ऊर्जा पानी के समान है। जो पानी एक जगह ठहरा रहता है वह अशुद्ध और दुर्गंधयुक्त हो जाता है। इसके विपरीत, जो पानी बहता रहता है हमेशा शुद्ध रहता है। यही कारण है कि हमें भी अपने पेट की मांसपेशियों और आंतों को रोजाना गतिशील करना चाहिये। नौलि अति प्रभावी रूप से पाचन में सहायक है और इस प्रक्रिया में आने वाली रुकावटों को दूर करती है।
नौली योगिक क्रिया के पेट की मांसपेशियों को मजबूत करती है और आंतों व पेट के निचले अवयवों की मालिश करती है। यह रक्तचाप को नियमित करती है और मधुमेह के खिलाफ सुरक्षात्मक परहेजी प्रभाव रखती है। यह अम्ल शूल और चर्म रोगों (मुहांसों) को दूर करने में सहायक है संपूर्ण पाचक प्रणाली पर सकारात्मक असर और रुकावटें दूर करने से नौलि हमारे स्वास्थ के लिए सर्वोत्तम व्यायामों मैं से एक है।
बहुत सारे रोगों का मूल हमारी पाचन प्रणाली में ही है : सिर दर्द, चर्म रोग, कई बार कैंसर भी। विषैले पदार्थ और व्यर्थ उत्पाद जो समय पर बाहर नहीं निकल पाते वे हमारे शरीर में जमा हो जाते हैं - ये ही विषम परिस्थितियों का बनते नौली योगिक क्रिया करने से पहले कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। खाली पेट ही यह अभ्यास करें।
गर्भावस्था की स्थिति में या गुर्दे और पित्ताशय में पथरी हो तो इसका अभ्यास नहीं करें। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नौली क्रिया एक उन्नत योगिक अभ्यास है और इसे किसी अनुभवी योग प्रशिक्षक या योगाचार्य के मार्गदर्शन में सीखा और अभ्यास किया जाना चाहिए। उचित निर्देश के बिना इस तकनीक का प्रयास करने से चोट या असुविधा हो सकती है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं। जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है। पहले के जमाने में गांवों में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था जिसे जमोट कहते हैं।
दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहां जल के स्रोत बंद नहीं हुए हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख केएन श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है। एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाये जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।
सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाये, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदें मिक्स करके पी सकते हैं।
जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।
जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं। हर व्यक्ति अपने घर की पानी की टंकी में जामुन की लकड़ी का एक टुकड़ा जरूर रखें, एक रुपए का खर्चा भी नहीं और लाभ ही लाभ। आपको मात्र जामुन की लकड़ी को घर लाना है और अच्छी तरह से साफ सफाई करके पानी की टंकी में डाल देना है। इसके बाद आपको फिर पानी की टंकी की साफ सफाई करवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
क्या आप जानते हैं कि नाव की तली में जामुन की लकड़ी क्यों लगाते हैं, जबकि वह तो बहुत कमजोर होती है..? भारत की विभिन्न नदियों में यात्रियों को एक किनारे से दूसरे किनारे पर ले जाने वाली नाव की तली में जामुन की लकड़ी लगायी जाती है। सवाल यह है कि जो जामुन पेट के रोगियों के लिए एक घरेलू आयुर्वेदिक औषधि है, जिसकी लकड़ी से दांतों को कीटाणु रहित और मजबूत बनाने वाली दातुन बनती है, उसी जामुन की लकड़ी को नाव की निचली सतह पर क्यों लगाया जाता है। वह भी तब जबकि जामुन की लकड़ी बहुत कमजोर होती है। मोटी से मोटी लकड़ी को हाथ से तोड़ा जा सकता है। क्योंकि इसके प्रयोग से नदियों का पानी पीने योग्य बना रहता है।
जामुन की लकड़ी के चमत्कारी परिणामों का प्रमाण हाल ही में मिला है। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित निजामुद्दीन की बावड़ी की जब सफाई की गयी, तो उसकी तलहटी में जामुन की लकड़ी का एक स्ट्रक्चर मिला है। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख केएन श्रीवास्तव जी ने बताया कि जामुन की लकड़ी के स्ट्रक्चर के ऊपर पूरी बावड़ी बनायी गयी थी। शायद इसीलिए 700 साल बाद तक इस बावड़ी का पानी मीठा है और किसी भी प्रकार के कचरे और गंदगी के कारण बावड़ी के वाटर सोर्स बंद नहीं हुए। जबकि 700 साल तक इसकी किसी ने सफाई नहीं की थी।
यदि आप अपनी छत पर पानी की टंकी में जामुन की लकड़ी डाल देते हैं तो आप के पानी में कभी काई नहीं जमेगी। 700 साल तक पानी का शुद्धिकरण होता रहेगा। आपके पानी में एक्स्ट्रा मिनरल्स मिलेंगे और उसका टीडीएस बैलेंस रहेगा। यानी कि जामुन हमारे खून को साफ करने के साथ-साथ नदी के पानी को भी साफ करता है और प्रकृति को भी साफ रखता है। कृपया हमेशा याद रखिये कि दुनियाभर के तमाम राजे रजवाड़े और वर्तमान में अरबपति रईस जो अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंता करते हैं। जामुन की लकड़ी के बने गिलास में पानी पीते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार, षट्कर्म एक प्रारंभिक अभ्यास है जो शरीर को आंतरिक रूप से शुद्ध करता है और फिर योगी को आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तैयार करता है। योगाचार्य महेशपाल बताते है कि, बस्ती क्रिया बृहदान्त्र को पूरी तरह से साफ करके शरीर को आंतरिक रूप से फिर से भरने की एक तकनीक है।
यह हठ योग प्रदीपिका में वर्णित षट्कर्म के रूप में जानी जाने वाली छह शुद्धि तकनीकों में से एक है ।बस्ती क्रिया एक आयुर्वेदिक तकनीक, एनीमा से समानता रखती है, जिसमें औषधीय द्रव से भरी एक ट्यूब को मलाशय में डालकर बृहदान्त्र को साफ किया जाता है। इस तकनीकों के पीछे का उद्देश्य बृहदान्त्र से मल और अन्य अशुद्धियों को बाहर निकालना है। इसलिए, बस्ती क्रिया को योगिक एनीमा के रूप में भी जाना जाता है।
वस्ति (enima) वह क्रिया है, जिसमें गुदामार्ग, मूत्रमार्ग, अपत्यमार्ग, व्रण मुख आदि से औषधि युक्त विभिन्न द्रव पदार्थों को शरीर में प्रवेश कराया जाता बस्ती क्रिया करने के दो प्रकार हैं, अर्थात जल बस्ती (पानी के साथ) और स्थल बस्ती क्रिया (हवा के साथ)। परंपरागत रूप से, जला बस्ती नदी में बैठकर की जाती थी, हालाँकि, पानी से भरी बाल्टी या टब का उपयोग भी किया जा सकता है।
जला शब्द पानी को दर्शाता है, क्योंकि यहाँ पानी का उपयोग आंतों को साफ करने के लिए किया जाता है, पानी से भरा टब लें और उस पर उत्कटासन में बैठें या उकड़ू बैठें। पानी का स्तर नाभि तक आना चाहिए। अपने हाथों को घुटनों पर टिकाकर आगे झुकें गुदा-संकोचक मांसपेशियों को फैलाकर गुदा के माध्यम से पानी को बड़ी आंत में खींच लें।
साँस छोड़ें और साथ ही उदियाना बंध और नौली क्रिया करें। फिर, साँस छोड़ें और गुदा के माध्यम से पानी को बाहर निकाल दें यह पहले चक्र का समापन है, आप इसे 3-5 चक्रों तक दोहरा सकते हैं जब तक कि आंतें साफ न हो जाएं। स्थल वस्ति के अभ्यास के लिए विपरीत करणी मुद्रा में फर्श से 60 डिग्री के कोण पर पीठ के बल लेट जायें। अब घुटनों को छाती की ओर खींचें और स्फिंक्टर मांसपेशियों को बाहर और अंदर धकेलें ताकि आंतों में हवा भर जाये।
खींची गयी हवा को अंदर रोककर नौली क्रिया करते हुए बृहदान्त्र की ओर ऊपर की ओर खींचा जाता है। इस बीच, हवा (अपान वायु) नाभि क्षेत्र पर दबाव डालते हुए ऊपर की ओर उठती है। कुछ मिनट तक हवा को अंदर ही रोके रखें और फिर गुदा के माध्यम से उसे बाहर निकाल दें। इससे स्थल बस्ती का एक चक्र बनता है और सुविधानुसार इसे 3-5 बार दोहराया जा सकता है।
वस्ति षट्कर्म का अभ्यास करते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए, उच्च रक्तचाप, हर्निया या किसी भी गंभीर पाचन विकार से पीड़ित लोगों को बस्ती क्रिया से बचना चाहिए। बस्ती क्रिया करने के बाद लगभग 72 मिनट तक भोजन का सेवन न करें।बादल, बरसात, हवा या तूफानी मौसम में इस अभ्यास से बचना सबसे अच्छा है। यह अभ्यास सुबह खाली पेट किया जाना चाहिए। वस्ति क्रिया का अभ्यास योग गुरु या योगाचार्य के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।
इस क्रिया के अभ्यास से हमें कई लाभ प्राप्त होते हैं, यह आंतों से हानिकारक बैक्टीरिया, विषाक्त अशुद्धियाँ, जमा हुआ मल, थ्रेडवर्म और गर्मी, कब्ज, नर्वस डायरिया, पेट फूलना और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम से पीड़ित लोगों को बस्ती क्रिया से चिकित्सीय लाभ मिलता है। बस्ती क्रिया वात, पित्त और कफ के बीच संतुलन लाती है एवं शरीर को हाइड्रेट करती है जिससे त्वचा की चमक, रंगत और बनावट बढ़ती है।
कब्ज अमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है, जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है। मल कड़ा हो जाता है, उसकी आवृति घट जाती है या मल निष्कासन के समय अत्यधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है। अत्याधिक कब्ज की समस्या से बचाव के लिए महीने में दो बार वस्ति योग क्रिया का अभ्यास किया जाना चाहिए जिससे आंतो मैं जमा हुआ मल की सफाई हो सके, बस्ती क्रिया शरीर की एक उन्नत योगिक सफाई है जो अधिकांश बीमारियों को ठीक करती है।
इसका महत्व इसके अर्ध चिकित्सा के रूप में वर्णन से अच्छी तरह से समझा जा सकता है, अर्थात दुनिया के सभी उपचारों का आधा हिस्सा है बस्ती क्रिया करके अपनी सभी इंद्रियों को पुनर्जीवित करने के साथ-साथ अपने शरीर को उन्नत योगिक अभ्यासों के लिए शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तैयार करें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। नेति षट्कर्म नासिका मार्ग को साफ करने और शुद्ध करने की प्रक्रिया है, जिसमें गुनगुना नमकीन जल, सूत्र (धागा) दूध और घी का प्रयोग किया जाता है। जिससे साइनस में जमा हुआ मैल बाहर निकलता है और संतुलित श्वास को बढ़ावा मिलता है। योगाचार्य महेशपाल बताते हैं कि नेति हठयोग में वर्णित एक महत्वपूर्ण शरीर शुद्धि योग क्रिया है। नेति, षटकर्म का महत्वपूर्ण अंग है। नेति मुख्यत: सिर के अंदर वायु-मार्ग को साफ करने की क्रिया है। हठयोग प्रदीपिका और घेरंड सहिता में नेति के बहुत से लाभ वर्णित हैं।
नेति के मुख्यत: दो रूप हैं : जलनेति तथा सूत्रनेति। जलनेति में जल का प्रयोग किया जाता है; सूत्रनेति में धागा या पतला कपड़ा प्रयोग में लाया जाता है जलनेति में पानी से नाक की सफाई की जाती और आपको साइनस, सर्दी, जुकाम , पोल्लुशन, इत्यादि से बचाता है। जलनेति में नमकीन गुनगुना पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पानी को नेटिपोट से नाक के एक छिद्र से डाला जाता है और दूसरे से निकाला जाता है। फिर इसी क्रिया को दूसरी नॉस्ट्रिल से किया जाता है।
अगर संक्षेप में कहा जाए तो जलनेति एक ऐसी योग है जिसमें पानी से नाक की सफाई की जाती है और नाक संबंधी बीमारियों से आप निजात पाते हैं। जलनेति दिन में किसी भी समय की जा सकती है। यदि किसी को जुकाम हो तो इसे दिन में कई बार भी किया जा सकता है। इसके लगातार अभ्यास से यह नासिका क्षेत्र में कीटाणुओं को पनपने नहीं देती। सूत्र नेति में, गीली डोरी या पतली सर्जिकल ट्यूबिंग की लंबाई को सावधानीपूर्वक और धीरे से नाक के माध्यम से मुंह में डाला जाता है।
फिर छोर को मुंह से बाहर निकाला जाता है और दोनों सिरों को एक साथ पकड़कर बारी-बारी से डोरी को नाक और साइनस से अंदर और बाहर खींचा जाता है। इसका उपयोग नाक को साफ करने और नाक के पॉलीप्स को हटाने के लिए भी किया जाता है। सूत्र नेति एक नाक साफ करने वाला योगाभ्यास है जिसमें नाक के क्षेत्र और बाहरी श्वसन क्षेत्रों को नरम धागे की मदद से साफ किया जाता है।
नेति योग क्रिया का अभ्यास योग गुरु या योगाचार्य के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए, साइनस नाक के आसपास चेहरे की हड्डियों के भीतर नम हवा के रिक्त स्थान हैं, जिन्हें वायुविवर या साइनस कहते हैं। साइनस पर उसी श्लेष्मा झिल्ली की परत होती है, जैसी कि नाक और मुँह में। जब किसी व्यक्ति को जुकाम तथा एलर्जी हो, तो साइनस ऊतक अधिक श्लेष्म बनाते हैं एवं सूज जाते हैं।
साइनस का निकासी तंत्र अवरुद्ध हो जाता है एवं श्लेष्म इस साइनस में फंस सकता है। बैक्टीरिया, कवक एवं वायरस वहां विकसित हो जाते हैं तथा वायुविवरशोथ,या साइनसाइटिस रोग का कारण बन जाते हैं। वायुविवरशोध साइनसाइटिस की रोकथाम के लिए नेति योग क्रिया का अभ्यास किया जाता है जिससे नासिका के अंदर बैक्टीरिया, कवक वायरस विकसित न हो और हम साइनस रोग से बच्चे रहे नैति क्रिया जिसमें जल नेति, सूत्र नैति के द्वारा बैक्टीरिया फंगस और वायरस को साफ किया जाता है अगर कोई रोगी साइनस रोग से ग्रसित हैं वह भी निरंतर नेति क्रिया से धीरे-धीरे ठीक हो जाता है नैति क्रिया के अभ्यास से शरीर पर कई लाभ देखे गए जिसमें जुकाम और कफ कान, आंख, गले सिर दर्द, तनाव, क्रोध आदि समस्याओं मैं लाभकारी है।
यह गले की खराश, टॉन्सिल्स और सूखी खांसी एवं आंसू नलिकाओं को साफ करने में मदद करता है, जिससे दृष्टि स्पष्ट होती है और आंखों में चमक आती है। नाक के मार्ग को साफ करता है जिससे गंध की अनुभूति में सुधार होता है, नैति क्रिया के अभ्यास से संबंधित कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, जलनेति के बाद नाक को सुखाने के लिए भस्त्रिका प्राणायाम व अग्निसार क्रिया का अभ्यास करे इस योग क्रिया को करते समय मुंह से ही सांस लेनी चाहिए।
अभ्यास खाली पेट सुबह किया जाना चाहिए इस तरह नैति योगक्रिया षट्कर्म के अभ्यास से हमारे आंखों में चमक आती है और हमारे चेहरे का उसे और तेज बढ़ता है और संपूर्ण शरीर स्वस्थ बने के साथ-साथ उसमें ओज,तेज, स्फूर्ति का विकास होता है हमारी दैनिक दिनचर्या में एक हफ्ते में एक बार नेति योग क्रिया का अभ्यास जरूर करना चाहिए जिससे हम विभिन्न प्रकार के आंख नाक कान गले से संबंधित रोगों से हम बच रहे हैं।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse