टीम एबीएन, रांची। झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), रांची में किडनी ट्रांसप्लांट सेवा शुरू करने की तैयारी तेज कर दी गयी है। इसके साथ ही भविष्य में राज्य के अन्य सरकारी अस्पतालों में भी चरणबद्ध तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट सुविधा उपलब्ध कराने की योजना पर काम किया जा रहा है।
इस संबंध में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग, झारखंड सरकार के उप सचिव ध्रुव प्रसाद ने पत्रांक 1 (13) के माध्यम से संबंधित विभागों को पत्र जारी किया है। इसके तहत 9 जनवरी 2026 को पूर्वाह्न 11:30 बजे एक महत्वपूर्ण बैठक बुलायी गयी है।
यह बैठक अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग अजय कुमार सिंह के कार्यालय कक्ष में आयोजित होगी। बैठक की अध्यक्षता अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग करेंगे।
बैठक में फिलहाल रांची के दो अस्पतालों, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) एवं राज हॉस्पिटल, रांची को किडनी ट्रांसप्लांट हेतु पंजीकरण एवं लाइसेंस प्रदान किए जाने पर विचार किया जायेगा।
स्वास्थ्य विभाग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति से पूर्व निदेशक-प्रमुख, स्वास्थ्य सेवाएं की अध्यक्षता में एक तकनीकी समिति का गठन किया जाता है। यह समिति संबंधित अस्पताल का स्थल निरीक्षण कर वहां उपलब्ध बुनियादी ढांचे, विशेषज्ञ फैकल्टी, नेफ्रोलॉजी एवं यूरोलॉजी सेवाएं, आपरेशन थिएटर, आईसीयू, ब्लड बैंक सहित अन्य आवश्यक संसाधनों का विस्तृत आकलन करती है। निरीक्षण के उपरांत समिति अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।
तकनीकी समिति की रिपोर्ट के आधार पर एडवायजरी कमिटी यह निर्णय लेती है कि संबंधित अस्पताल सभी निर्धारित मानकों एवं अर्हताओं को पूरा करता है या नहीं। मानकों की पूर्ति होने की स्थिति में अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग की अध्यक्षता में अंतिम निर्णय लेकर किडनी ट्रांसप्लांट का लाइसेंस जारी किया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि रिम्स में किडनी ट्रांसप्लांट सेवा शुरू होने से राज्य के किडनी रोगियों को इलाज के लिए बाहर के राज्यों में जाने की मजबूरी से राहत मिलेगी तथा झारखंड में उन्नत चिकित्सा सेवाओं को नया आयाम मिलेगा।
एबीएन हेल्थ डेस्क। कार ने दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके साथ ही, निमेसुलाइड की ऐसी सभी खाने वाली (ओरल) दवाओं की बिक्री और वितरण भी प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिनमें 100 मिलीग्राम से अधिक मात्रा होती है। यह प्रतिबंध 1940 के औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 26ए के तहत ड्रग्स तकनीकी सलाहकार बोर्ड से परामर्श के बाद लगाया गया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है कि 100 मिलीग्राम से अधिक डोज वाली निमेसुलाइड दवाओं के इस्तेमाल से मानव स्वास्थ्य को जोखिम हो सकता है और इनके सुरक्षित विकल्प पहले से मौजूद हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसको लेकर 29 दिसंबर 2025 को अधिसूचना जारी की।
मंत्रालय ने बताया कि निइमेसुलाइड की 100 मिलीग्राम से ज्यादा मात्रा वाली ओरल दवाएं मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम हो सकती हैं, जबकि इसके सुरक्षित विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं। इसी वजह से जनहित में यह कदम उठाया गया है। सरकार ने स्पष्ट कहा कि यह प्रतिबंध औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम के तहत लगाया गया है और यह तत्काल प्रभाव से लागू होगा।
इसके तहत देश में निमेसुलाइड की तय मात्रा से अधिक वाली ओरल दवाओं का निर्माण, बिक्री और वितरण पूरी तरह बंद रहेगा। इससे पहले मंत्रालय ने औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 में संशोधन का मसौदा भी जारी किया था और इस पर आम लोगों से आपत्तियां और सुझाव मांगे गये थे।
तय समय के भीतर मिले सुझावों पर विचार करने के बाद सरकार ने यह अंतिम फैसला लिया। सरकार का कहना है कि यह कदम लोगों की सेहत को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी है और दवाओं के इस्तेमाल में किसी भी संभावित खतरे को रोकने के मकसद से उठाया गया है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। डायबिटीज यानी ब्लड शुगर बढ़े रहने की समस्या सभी उम्र के लोगों में आम होती जा रही है। लाइफस्टाइल में गड़बड़ी के कारण होने वाली ये समस्या अब 20 से कम आयु वालों को भी अपना शिकार बनाती जा रही है। जिन लोगों के परिवार में जैसे माता-पिता या करीबी रिश्तेदारों में किसी को हाई शुगर की समस्या रही हो ऐसे लोगों को अपनी सेहत को लेकर विशेष सावधानी बरतते रहने की सलाह ही जाती है।
डायबिटीज को लेकर चिंता की बात यह है कि शुरुआती स्थिति में इसके लक्षण इतने हल्के होते हैं, कि लोग समय पर बीमारी की पहचान नहीं कर पाते। अगर ब्लड शुगर लंबे समय तक सामान्य से अधिक बना रहता है तो इसके कारण धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचाने लगता है।
डॉक्टर कहते हैं, अगर समय रहते शुगर को नियंत्रित करने के उपाय कर लिये जायें, तो यह कई गंभीर जटिलताओं से बचाव हो सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि आपको अपनी बीमारी के बारे में पता हो। डॉक्टर कहते हैं, अगर समय रहते कुछ जांच करा लिए जाएं तो इससे बहुत आसानी से स्पष्ट हो सकता है कि आपको डायबिटीज है या नहीं? या फिर इसका खतरा तो नहीं है?
बातचीत में एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ वसीम गौहरी कहते हैं, समय पर डायबिटीज की पहचान मौजूदा समय में बहुत जरूरी है क्योंकि ये बीमारी भारतीय आबादी में तेज रफ्तार से बढ़ती जा रही है। डायबिटीज का समय पर इलाज शुरू करने के लिए कुछ जरूरी टेस्ट सभी लोगों को करा लेने चाहिए।
अगर आपको डायबिटीज का शक है या परिवार में पहले से किसी को डायबिटीज की दिक्कत रही है तो समय रहते अपनी जांच जरूर करायें। कुछ जरूरी जांचों से शुगर की समस्या को समय रहते पकड़ा जा सकता है। फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट, पोस्ट प्रांडियल ब्लड शुगर टेस्ट और एचबीए1सी टेस्ट से शरीर में शुगर की स्थिति का सही आकलन होता है।
टीम एबीएन, रांची। आज नामकुम स्थित आरसीएच कैंपस में आयुष्मान भारत-मुख्यमंत्री अबुआ स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत एकदिवसीय उन्मुखीकरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल के पांच जिलों के सभी निजी एवं सरकारी अस्पतालों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी के जीएम प्रवीण चंद्र मिश्रा के संबोधन के साथ हुआ। इसके पश्चात अपर कार्यकारी निदेशक सीमा सिंह ने एचईएम पोर्टल पर अस्पतालों के अपग्रेडेशन की जिलावार समीक्षा की तथा सभी अस्पतालों को टीएमएस 2.0 में लंबित अपडेट शीघ्र पूर्ण करने के निर्देश दिये।
कार्यक्रम के दौरान झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी की वरिष्ठ परामर्शी श्रीमती श्वेता कुमारी ने एचईएम पोर्टल से संबंधित विस्तृत जानकारी दी, वहीं वरिष्ठ परामर्शी विश्वजीत ने नाफू से जुड़े मामलों पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ परामर्शी अंशु कुमार सिंह ने स्वास्थ्य सुरक्षा बीमा योजना की विस्तृत जानकारी देते हुए अस्पतालों के इंपैनलमेंट प्रक्रिया को भी स्पष्ट किया।
झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी के कार्यकारी निदेशक शशि प्रकाश झा ने स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े ए टू जेड पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए अस्पतालों से अपील की कि वे राज्य सरकार द्वारा संचालित स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी आम जनता तक पहुंचाएं ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठा सकें। उन्होंने एबीडीएम कार्यक्रम की भी विस्तार से जानकारी दी।
कार्यक्रम के अंत में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक श्री हरीश तिवारी ने अपने मधुर गायन से उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
स्वास्थ्य विभाग ने जारी की ए टू जेड स्वास्थ्य सेवाओं की सूची, अब एक ही छत के नीचे मिलेंगी ये सुविधाएं।
झारखंड सरकार के स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभागने राज्य के नागरिकों के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की एक व्यापक ए टू जेड सूची जारी की है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य आम जनता को सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मिलने वाली मुफ्त व रियायती सुविधाओं के प्रति जागरूक करना है।इस सूची में बच्चों के स्वास्थ्य से लेकर बुजुर्गों की देखभाल तक, कुल 26 श्रेणियों में सेवाओं को वगीर्कृत किया गया है।
विभाग द्वारा जारी इस सूची में 70 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विभाग द्वारा 6 जनवरी से 10 जनवरी के बीच विशेष स्वास्थ्य गतिविधियों का आयोजन किया जायेगा।
सरकार की इस पहल से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के मरीजों को यह समझने में आसानी होगी कि वे अपनी बीमारी के अनुसार किस केंद्र पर जाएं। स्वास्थ्य विभाग ने अपील की है कि नागरिक इन सुविधाओं का अधिक से अधिक लाभ उठायें।
टीम एबीएन, रांची। आज झारखंड के लिए एक ऐतिहासिक दिन है। लोकप्रिय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की दूरदर्शी सोच, सशक्त नेतृत्व और जनहितकारी मार्गदर्शन के परिणामस्वरूप रांची में मेडिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। यह निर्णय राज्य की स्वास्थ्य एवं मेडिकल शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने वाला साबित होगा।
झारखंड राज्य को बने 25 वर्ष हो चुके हैं। इस लंबे कालखंड में राज्य में मेडिकल यूनिवर्सिटी की आवश्यकता महसूस की जाती रही, लेकिन पूर्ववर्ती भाजपा सरकार इस दिशा में ठोस पहल नहीं कर सकी। भवन तो बने, परंतु फैकल्टी, परीक्षा प्रणाली और सुचारू संचालन की ठोस व्यवस्था के अभाव में मेडिकल कॉलेजों का पूर्ण संचालन और डॉक्टरों की बहाली प्रभावित होती रही।
अब मेडिकल यूनिवर्सिटी के गठन से जुड़ी सभी तकनीकी और प्रशासनिक अड़चनें दूर कर ली गई हैं। यूनिवर्सिटी के गठन के बाद मेडिकल कॉलेजों का पंजीकरण, फैकल्टी की नियुक्ति, परीक्षाओं का संचालन तथा अकादमिक नियंत्रण राज्य की अपनी मेडिकल यूनिवर्सिटी के माध्यम से किया जायेगा। इससे बड़े पैमाने पर डॉक्टरों की बहाली संभव होगी और मेडिकल कॉलेजों का संचालन सुचारू रूप से हो सकेगा।
मेडिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना से झारखंड में नये सरकारी एवं निजी मेडिकल कॉलेज खुलने का मार्ग प्रशस्त होगा। इससे राज्य में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी, स्वास्थ्य सेवाएं सुदृढ़ होंगी और आम जनता को बेहतर इलाज उपलब्ध हो सकेगा। यह उपलब्धि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की दूरदर्शी नीति और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता का स्पष्ट प्रमाण है।
स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल के तहत झारखंड मेडिकल यूनिवर्सिटी बोर्ड का गठन हो चुका है। यूनिवर्सिटी के अस्थायी संचालन हेतु रांची के ब्रांबे स्थित पंचायती राज विभाग द्वारा निर्मित पूर्व सेंट्रल यूनिवर्सिटी आफ झारखंड परिसर का चयन किया गया है। यह परिसर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और विशाल क्षेत्रफल के कारण मेडिकल यूनिवर्सिटी के लिए सर्वथा उपयुक्त पाया गया है।
गुरुवार को स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ इरफान अंसारी, अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह, संयुक्त सचिव ललित मोहन शुक्ल सहित अन्य पदाधिकारियों ने ब्रांबे स्थित परिसर का निरीक्षण किया। निरीक्षण के उपरांत परिसर को मेडिकल यूनिवर्सिटी के संचालन के लिए उपयुक्त घोषित किया गया। उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री होंगे।
मीडिया को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने कहा कि झारखंड गठन के बाद स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में यह अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने बताया कि राज्य में मेडिकल यूनिवर्सिटी के अभाव में अब तक छात्रों, डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं प्रशिक्षण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। अब यह कमी पूरी तरह दूर होगी।
डॉ. अंसारी ने जानकारी दी कि पहले रिनपास के समीप मेडिकल यूनिवर्सिटी खोलने की योजना थी, लेकिन कुछ कारणों से वह संभव नहीं हो सकी। इस विषय पर राज्यपाल से भी चर्चा हो चुकी है और अगले 6-7 महीनों के भीतर मेडिकल यूनिवर्सिटी का संचालन शुरू कर दिया जायेगा। उन्होंने यह भी बताया कि शनिवार को वे दिल्ली रवाना होंगे, जहां 104 देशों के विशेषज्ञ, डॉक्टर एवं सभी राज्यों के स्वास्थ्य मंत्री भाग लेंगे। इस मंच पर रांची में एम्स की स्थापना की मांग भी मजबूती से रखी जायेगी।
अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने कहा कि मेडिकल यूनिवर्सिटी से पूरे राज्य को व्यापक लाभ होगा। यहां नर्सिंग, पैरामेडिकल सहित कई नये कोर्स शुरू किए जाएंगे, जिससे झारखंड के छात्रों को पढ़ाई के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा। वर्तमान में राज्य में 10 मेडिकल कॉलेज हैं, जो आने वाले समय में पीपीपी मॉडल और सरकारी प्रयासों से बढ़कर 20 तक हो सकते हैं।
इन सभी कॉलेजों का शैक्षणिक और प्रशासनिक नियंत्रण मेडिकल यूनिवर्सिटी के माध्यम से होगा। उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ाई के साथ-साथ परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्र निर्माण, शोध एवं प्रशिक्षण का कार्य भी इसी यूनिवर्सिटी के अंतर्गत होगा, जिससे झारखंड में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को नया आयाम मिलेगा।
आने वाला समय झारखंड के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक होगा। राज्य स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा, निवेश बढ़ेगा और आधुनिक तकनीक से युक्त एक मजबूत एवं गुणवत्तापूर्ण मेडिकल शिक्षा व्यवस्था विकसित होगी। जनवरी के प्रथम सप्ताह में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी के कर-कमलों से मेडिकल यूनिवर्सिटी की आधारशिला रखी जायेगी।
टीम एबीएन, रांची। श्री कृष्ण प्रणामी सेवा धाम ट्रस्ट के प्रवक्ता सह हिंदी साहित्य भारती के उपाध्यक्ष संजय सर्राफ ने कहा है कि विश्व ध्यान दिवस को प्रत्येक वर्ष 21 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 6 दिसंबर 2024 को आधिकारिक रूप से घोषित किया गया था और इसका उद्देश्य दुनिया भर में ध्यान मेडिटेशन की महत्ता, मानसिक शांति, स्वस्थ, जीवनशैली और विश्व में सद्भाव बनाए रखने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाना है।
यह पहला विश्व ध्यान दिवस 21 दिसंबर 2024 को मनाया गया और अब से हर वर्ष यह दिन वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है। 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस मनाए जाने का कारण यह भी है कि यह दिन उत्तरी गोलार्ध के लिए वर्ष का सबसे छोटा दिन तथा सबसे लंबी रात का प्रतीक होता है, जिसे विंटर सोलस्टाइस कहा जाता है। यह खगोलीय घटना उस पल का प्रतीक है जब प्रकृति में सबसे गहरा (अचल शांति) होता है और इस दिन ध्यान का अभ्यास आंतरिक संतुलन, ऊर्जा और मानसिक स्थिरता की ओर जागरूकता बढ़ाता है।
विश्व ध्यान दिवस की घोषणा का मुख्य उद्देश्य है कि ध्यान की प्राचीन परंपरा और इसके वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित लाभों को विश्व स्तर पर पहचान मिले। ध्यान न केवल मानसिक तनाव को कम करने में मदद करता है, बल्कि यह शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और सामाजिक सद्भाव के निर्माण में भी योगदान देता है। इस दिवस को घोषित करने के पीछे संयुक्त राष्ट्र का विचार यह है कि हर व्यक्ति को उच्चतम संभव शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का आनंद लेने का अधिकार है।
ध्यान एक ऐसा अभ्यास है, जो हजारों वर्ष से भारत सहित अनेक आध्यात्मिक परंपराओं में प्रचलित रहा है। आज इसे न केवल आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, अवसाद और चिंता को नियंत्रित करने के लिए वैज्ञानिक रूप से भी स्वीकार किया जा रहा है। शोध के अनुसार नियमित ध्यान करने से तनाव कम होता है, एकाग्रता बढ़ती है, नींद में सुधार होता है और हृदय तथा तंत्रिका तंत्र की कार्य प्रणाली में सकारात्मक बदलाव आते हैं।
ध्यान शरीर और मन के बीच एक संतुलन स्थापित करता है, जिससे व्यक्ति दैनिक जीवन कीचुनौतियों का सामना अधिक शांत और समायोजित तरीके से कर पाता है। विश्व ध्यान दिवस का प्रचलन मानव जीवन में कई तरह की सकारात्मक ऊर्जा। जागरूकता लाता है- यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में आंतरिक शांति और मानसिक स्थिरता कितनी महत्वपूर्ण है। यह मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का एक वैश्विक संदेश देता है।
यह लोगों को तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों से मुक्त होने के लिए ध्यान को अपनाने की प्रेरणा देता है। यह विश्व समुदाय को एक साझा उद्देश्य-शांति, सद्भाव और सहयोग की दिशा में जोड़ता है। विश्व ध्यान दिवस पर दुनियाभर में समर्पित ध्यान सत्रों, समूह अभ्यास, योग और ध्यान कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है। विभिन्न संगठन, योग एवं ध्यान केंद्र, शैक्षणिक संस्थान और समाजसेवी समूह इस अवसर को एकजुटता और सकारात्मक ऊर्जा फैलाने के अवसर के रूप में मनाते हैं।
कुछ आयोजन ऐसे भी होते हैं जहां हजारों लोग एक साथ ध्यान के लिए इकट्ठा होते हैं और अपने मन को शांत करने एवं एकीकृत चेतना का अनुभव प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। विश्व ध्यान दिवस न केवल एक तारीख है, बल्कि यह जीवन में शांति, सहिष्णुता, मानसिक स्वास्थ्य और सामूहिक सद्भाव को बढ़ावा देने का वैश्विक अभियान है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि सच्ची शांति भीतर से आती है और एक शांत मन ही हमें व्यक्तिगत व सामाजिक संघर्षों से मुक्त कर सकता है। ध्यान के माध्यम से हम केवल व्यक्तिगत कल्याण नहीं पा सकते, बल्कि यह समूचे विश्व को एक सकारात्मक, शांतिपूर्ण और संतुलित दिशा में ले जाने का मार्ग भी प्रदान करता है।
टीम एबीएन, रांची। राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने की दिशा में आज अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग अजय कुमार सिंह की अध्यक्षता में विभागीय सभागार में सभी जिलों के सिविल सर्जनों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समीक्षा बैठक आयोजित की गयी।
बैठक में एनएचएम के एमडी शशि प्रकाश झा, अपर सचिव विद्यानंद शर्मा पंकज, संयुक्त सचिव ललित मोहन शुक्ला, डीआईसी सिद्धार्थ सान्याल सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे।
मुख्यमंत्री अस्पताल संचालन एवं रखरखाव से जुड़े निर्देशों की समीक्षा करते हुए अपर मुख्य सचिव ने सभी सिविल सर्जनों से उनके जिलों के अस्पतालों की रंग-रोगन की तस्वीरें मांगी। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया कि मार्च से पहले सभी जिला एवं डिविजनल अस्पतालों का रंग-रोगन पूरा कर लिया जाये तथा राज्य की वेबसाइट पर फोटो अपलोड किया जाये।
बैठक में अस्पतालों में उपलब्ध मशीनों की स्थिति की समीक्षा की गयी। अपर मुख्य सचिव ने निर्देश दिया कि आवश्यक मशीनों की तत्काल खरीद सुनिश्चित की जाये। साथ ही ब्लॉक एवं सीएचसी स्तर पर डॉक्टरों के कार्य का रिव्यू और उन्हें मोटिवेट करने के निर्देश दिये गये। किसी भी समस्या से विभाग को अवगत कराने को कहा गया।
दूसरे एजेंडे में सदर अस्पतालों में मॉड्यूलर ओटी निर्माण की प्रगति की समीक्षा की गयी। अपर मुख्य सचिव ने इसे शीघ्र पूरा करने का निर्देश देते हुए कहा कि आगे चलकर सभी सदर अस्पताल मेडिकल कॉलेजों को ट्रांसफर किये जायेंगे, जिससे संचालन की जवाबदेही कॉलेजों पर होगी।
बैठक में ट्रॉमा सेंटर और मुख्यमंत्री अस्पताल कायाकल्प योजना की भी समीक्षा की गयी। रिम्स के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ पी भट्टाचार्य ने ट्रॉमा सेंटर को लेकर अपने सुझाव रखे।
जानकारी दी गयी कि राज्य में 49 स्थानों पर ट्रॉमा सेंटर शुरू किये जायेंगे, जहां प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्स, टेक्नीशियन और अत्याधुनिक लाइफ सेविंग मशीनें उपलब्ध होंगी। इसके साथ ही हर जिले में 10 बेडेड आईसीयू और एक टेली आईसीयू स्थापित करने का लक्ष्य तय किया गया है। डॉ भट्टाचार्य ने बताया कि फिलहाल 5 स्थानों पर टेली आईसीयू के माध्यम से जांच की जा रही है, जिसका मूल्यांकन रांची रिम्स के डॉक्टर कर रहे हैं।
बैठक में चलंत ग्राम क्लीनिक योजना तथा आउटसोर्सिंग के तहत कार्यरत कर्मियों से संबंधित अधियाचना की स्थिति का भी आकलन किया गया। इस दौरान अपर सचिव विद्यानंद शर्मा पंकज ने आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से संबंधित सभी निजी स्वास्थ्य सुविधाओं के एचएफआर एवं एचपीआर से जुड़े कार्यों तथा एबीडीएम इनेबल्ड एचएमआईएस के कार्यों की प्रगति की समीक्षा की।
साथ ही सी-डैक एवं बीएसएनएल द्वारा किये जा रहे कार्यों की प्रगति की भी समीक्षा की गयी। इसके अतिरिक्त, अपर सचिव ने एबीडीएम के अंतर्गत हार्डवेयर एवं मैनपावर की स्थिति का आकलन भी किया।
अपर सचिव ने पीएम-अभीम से संबंधित एजेंडे पर निर्देश देते हुए कहा कि 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत उपकरणों का सत्यापन शीघ्र पूर्ण किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने आईपीएचएल एवं बीपीएचयू की स्थिति की जानकारी ली तथा पीएम-अभीम के व्यय (एक्सपेंडिचर) पर भी चर्चा की।
अपर सचिव ने दंत चिकित्सकों के योगदान की स्थिति एवं चिकित्सा पदाधिकारी तथा विशेषज्ञ चिकित्सा पदाधिकारी के पदस्थापन की पुष्टि हेतु प्रेषित विवरणी की अद्यतन स्थिति मांगी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने न्यायालयीन विवादों की स्थिति का भी आकलन किया। राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर और सुलभ बनाने के लिए अस्पतालों के कायाकल्प, आधुनिक सुविधाओं और मानव संसाधन को मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रही है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। फ्रोजन शोल्डर या एडहेसिव कैप्सुलाइटिस कंधे के जोड़ में होने वाला एक दर्दनाक एवं जकड़न वाला रोग है, जिसमें कंधे की गतिशीलता धीरे-धीरे कम होती जाती है। योगाचार्य महेश पाल ने बताया कि यह बीमारी आमतौर पर 40-70 वर्ष की आयु के लोगों में अधिक पायी जाती है और महिलाओं में इसकी संभावना थोड़ी अधिक होती है।
लेकिन वर्तमान समय में अवस्थित दिनचर्या और लगातार कंप्यूटर वर्क के कारण यह बीमारी सभी आयु वर्ग के लोगों में आम हो गयी है, फ्रोजन शोल्डर कंधे में एक विशेष प्रकार की कैप्सूल होती है जो जोड़ को ढककर उसकी सुरक्षा करती है। फ्रोजन शोल्डर में यह कैप्सूल सूजकर मोटी हो जाती है और इसके अंदर चिपकने बनने लगते हैं। जिसके परिणामस्वरूप कंधा हिलाना मुश्किल हो जाता है।
धीरे-धीरे दर्द फिर पूरी तरह जकड़न होने लगती है। वैज्ञानिक रूप से इसे इंफ्लामेशन आफ शोल्डर ज्वाइंट कैप्सूल कहा जाता है, जहां सूजन और फाइब्रोसिस के कारण मूवमेंट रुक जाता है।
दैनिक कार्यों में बाधा, कपड़े पहनना। नींद में बाधा रात में दर्द अधिक होने से नींद नहीं आती, जिससे तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। मांसपेशियों की कमजोरी कम मूवमेंट के कारण कंधे और बाजू की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। गर्दन और पीठ का दर्द कंधे का सहारा शरीर को संतुलित रखता है, इसकी जकड़न से गर्दन और पीठ में भी तनाव उत्पन्न होता है।
कामकाज प्रभावित कई लोगों में यह स्थिति महीनों या वर्षों तक चलती है, जिससे कार्य क्षमता कम होती है। फ्रोजन शोल्डर में योग की महत्वपूर्ण भूमिका है योग कंधे के जोड़ को धीरे-धीरे खोलने, मांसपेशियों को लचीला करने और सूजन कम करने में अत्यंत प्रभावी पाया गया है। मेडिकल स्टडी में पाया गया कि योग रक्त संचरण बढ़ाता है, एंडोर्फिन रिलीज करता है। सूजन कम करता है, जकड़न खोलकर जोड़ की मोबिलिटी बढ़ाता है।
नियमित अभ्यास से रेंज आफ मोशन बढ़ती है, फ्रोजन शोल्डर एक धीमी लेकिन कष्टदायक बीमारी है, परंतु सही समय पर उपचार, जीवनशैली में सुधार और नियमित योगाभ्यास से इसे पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। योग न केवल दर्द और जकड़न को कम करता है, बल्कि कंधों की शक्ति और लचीलापन वापस लौटाने में प्राकृतिक, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तरीका है। नियमित अभ्यास, धैर्य और सही योग तकनीक से इस रोग से मुक्ति दिलाने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं।
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