एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहते हैं योग को यदि पूरी तरह से और गंभीरता से अपना लिया जाए तो वह आदमी का सबसे अच्छा और भरोसेमंद मित्र साबित होता है। यह अपने साधकों को दु:खों और क्लेशों से मुक्त करता है और सुखपूर्वक समग्रता या पूर्णता में जीने का मार्ग प्रशस्त करता है। वेदों से निकला हुआ योग शब्द शाब्दिक रूप से जुड़ने के अर्थ को व्यक्त करता है।
अनुमानत: लगभग 200 वर्ष ईसापूर्व महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में प्राचीन ज्ञान को कुछ सूत्रों यानी थोड़े से शब्दों से बनी संक्षिप्त शब्द-शृंखला में ग्रथित कर योग-विज्ञान के सिद्धांत और प्रयोग के निष्कर्षों को बड़े वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित कर लोक-कल्याण के लिए प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य था मन में उठने वाली उथल-पुथल को रोकने, दैनिक जीवन में शांति स्थापित करने, और अंतत: आत्मा और ब्रह्म का संयोग कराने के लिए मार्ग दिखाना। ध्यान, आसन, प्राणायाम और आध्यात्मिक नियमों के उपयोग को स्पष्ट करते हुए यह लघु ग्रंथ सहस्रों वर्षों से सबका मार्गदर्शक बना हुआ है। योग-दर्शन के अनुसार स्वास्थ्य और खुशहाली एक ऐसी स्थिति है जो मनुष्य की मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक दशाओं के संतुलन और गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
वस्तुत: योग एक यात्रापथ भी है और यात्रा का लक्ष्य भी है। दिव्यता का निर्देश गुरु के माध्यम से मिलता है। यहां पर यह बताना भी उचित होगा कि दुर्गम जटिल संसार में दिव्य तत्व के प्रति समर्पण शांति पाने में लाभकर होता है। प्रभु-अनुग्रह के लिए समर्पण भी एक सक्रिय स्थिति या जीवन-प्रक्रिया है। परंतु योग के लिए यह समर्पण जरूरी नहीं है। निरीश्वरवादी भी योग में प्रवृत्त हो सकता है।
स्मरण रहे कि शरीर-मन-संकुल में आने वाला सुधार केवल सतही उपकरण होता है। योग एक आध्यात्मिक अनुशासन है क्योंकि यह न केवल शरीर-मन-संकुल का सुधार करता है बल्कि इसके समुचित उपयोग की विधि भी बतलाता है। योग का उपयोग हमें योग के अभ्यास का अवसर देता है। योग हममें से जो श्रेष्ठ है उसे उपलब्ध कराता है। चेतन रूप से योग का उपयोग जीवन को समृद्ध करता चलता है।
स्मरणीय है कि एक अध्ययन-विषय के रूप में योग भारतीय दर्शनों में से एक है। प्राय: सभी भारतीय दर्शन उस सर्वव्यापी परमात्म तत्व को स्वीकार करते हैं जो सभी विद्यमान वस्तुओं में उपस्थित है। व्यक्ति और उस परम सत्ता में एकात्मता होती है। योग मार्ग वह पाठ है जो व्यक्ति-चैतन्य को विकसित और समृद्ध करता है ताकि जीवन में अधिक सामंजस्य (हार्मनी) का अनुभव शामिल हो सके और अंतत: परमात्म तत्व के साथ एकता का अनुभव हो सके।
जैसा कि उपनिषदों में वर्णित है हमारा अस्तित्व पांच कोशों से बनी रचना है। इस रचना में शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद के पांच क्रमिक स्तर पहचाने गये हैं। योग का अभ्यास इन कोशों के बीच पारस्परिक संतुलन और चैतन्य लाता है और अस्तित्व के केंद्र परमात्म तत्व की ओर अग्रसर करता है। कह सकते हैं कि योग बाह्य से आंतरिक बुद्धि और आंतरिक से बाह्य बुद्धि की यात्रा है।
पातंजल योग-सूत्र बड़े ही सूक्ष्म ढंग से गूढ़ बातों को सामने रखते हैं। उन संक्षिप्त सूत्रों की विशद व्याख्या मनीषियों द्वारा कई तरह की जाती रही है। यह अष्टांग योग के नाम से प्रसिद्ध है। इसके आठ अंग हैं : यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। सारे सूत्रों को चार अध्यायों या पादों : समाधि, साधना, विभूति और कैवल्य, के अंतर्गत व्यवस्थित किया गया है। इसी में पूरे योग-शास्त्र का विवेचन निबद्ध है। समाधि पाद में बताया गया है कि अहं के विचार के साथ अपना तादात्मीकरण और परमात्मा के साथ या उनके अंश के रूप में अपनी पहचान बनाना ही योग का मुख्य प्रतिपाद्य है।
योगाभ्यास से चेतना का परिष्कार होता है ताकि मन परमात्मा की दिशा में अग्रसर हो। दु:ख और पीड़ा का अनुभव जो जो अहं के जुड़ने के फलस्वरूप होता है दूर हो और साधक प्रसन्नतापूर्वक जीवनयापन कर सके। एकाग्रता मुख्य प्रतिपाद्य है। साधन पाद का विषय क्रिया-योग है । मन में उठने वाले विघ्न को नियंत्रित करने की विधि बताई गई है। विभूति पाद में विभिन्न सिद्धियों या असाधारण शक्तियों का वर्णन किया गया है। चौथे, कैवल्य पाद में उस वास्तविक स्वतंत्रता की बात की गई है जो योग से मिलती है।
आत्म-ज्ञान के लिए अष्टांग योग के अभ्यास के अनुगमन, जिसे राज-योग भी कहते हैं, की संस्तुति की जाती है। योग के आठ अंग हैं न कि एक के बाद एक आने वाले चरण या सोपान। साधक को इन पर साथ-साथ समानांतर रूप से चलना चाहिए। योगाभ्यास का उद्देश्य साधक को आत्मावलोकन : अपने विचारों और व्यवहारों और उनके परिणामों को देखना-समझना भी होता है। यम और नियम नामक पहले दो चरण नैतिकता और सदाचारपूर्वक जीवन जीने के लिए निर्देश देते हैं। जहां यम बाहरी दुनिया के साथ सम्बन्ध पर केंद्रित हैं वहीं नियम निजी आध्यात्मिक विकास और आत्मानुशासन की आदतों को बताते हैं।
यम पांच हैं : अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (इंद्रियसुख का नियंत्रण) और अपरिग्रह (अनावश्यक वस्तुओं संचय/ संग्रह)। बाह्य और आभ्यंतर इंद्रियों के संयम को यम कहते हैं। पतंजलि ने इनको महाव्रत कहा है जो जाति, देश और काल की सीमा से रहित सार्वभौम स्वरूप वाले हैं। यम वस्तुत: प्रतिबंध हैं जो सिर्फ कर्म के स्तर पर ही नहीं बल्कि विचार और शब्द के स्तर पर भी लागू होते हैं। इन यमों को अपनाने पर योगाभ्यासी व्यक्ति को स्वतंत्रता मिलती है और खुली सांस लेने का अवसर मिलता है।
इनके अतिरिक्त पांच नियम हैं जो वस्तुत: सदाचार के पालन पर बल देते हैं। ये हैं : शौच (पवित्रता), संतोष, तप (इच्छाओं का शमन), स्वाध्याय (आध्यात्मिक ग्रंथों तथा स्वयं का अध्ययन) और ईश्वर-प्रणिधान (परमेश्वर को आत्मार्पण। इस तरह यम और नियम योग पथ के राही के लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्याख्या करते हैं। ये आत्म शोधन का भी काम करते हैं और अच्छे तथा सुखी जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये नींव रखने का काम करते हैं।
आसन और प्राणायाम शारीरिक अभ्यास हैं पर इनका आध्यात्मिक महत्व भी है। आध्यात्मिक विकास की ओर उन्मुख जीवन के लिए औजार भी ठीक होना चाहिए। राह मालूम हो लक्ष्य भी ज्ञात हो पर चालक ठीक है या नहीं यह भी देखना होता है। सोद्देश्य जीवन के लिए शरीर ठीक रखना जरूरी है। यह पवित्र कर्तव्य बनता है कि शरीर को स्वस्थ रखा जाए। प्राणायाम से प्राण ऊर्जा का संचरण शरीर में स्वेच्छा से होता है, सिद्धियां भी आती हैं और मन की स्थिरता भी।
वस्तुत: प्राणायाम और प्रत्याहार दोनों ही आंतरिक दुनिया की ओर उन्मुख होते है और इस अर्थ में पहले के तीन चरणों- यम, नियम और आसान- से भिन्न होते हैं है। प्राणायाम का अभ्यास लयात्मक स्वांस द्वारा इंद्रियों के अंदर की ओर खोजने की दिशा में चेतना को ले चलना, अंदर के अध्यात्म के गहन अनुभव की ओर अग्रसर करना संभव हो पाता है। पहले के पाँच चरणों द्वारा बाद के तीन चरणों के लिए उर्वर आधार भूमि का निर्माण करते हैं। धारणा योग का छठां चरण है।
इसके अंतर्गत साधक अपने अवधान की एकाग्रता एक दिशा में और लम्बे समय तक बनाए रखता है। यह परमात्म तत्व पर ध्यान केंद्रित करने की तैयारी है। बिना किसी व्यवधान के निर्बाध ध्यान करना साधक को सहकार का अवसर देता है। साधक का समग्र अस्तित्व - शरीर, श्वांस, इंद्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार, ध्यान की वस्तुझ्रसभी परमात्म तत्व के साथ एकीकृत हो जाते हैं। इस यात्रा का अंतिम पड़ाव समाधि है जिसमें परमात्म तत्व के साथ एकाकार होना होता है।
तब अलगाव का भ्रम दूर हो जाता है और आनंद के साथ परम चेतना के साथ एकत्व का अनुभव होता है। आधुनिक युग में भारत में योग के ऊपर अध्ययन-अनुसंधान लगभग एक सदी से हो रहे हैं। पश्चिमी देशों में योग की लोकप्रियता बढ़ने के साथ मनोचिकित्सा (थेरैपी) के रूप में इसके वैज्ञानिक विश्लेषण और शोध का तेजी से प्रचलन हुआ। अब अनेक मानसिक, सांवेगिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं जैसे दुश्चिंता (ऐंजाइटी), अवसाद (डिप्रेशन), पाचन क्रिया से जुड़े रोग, हृदय रोग, अस्थमा, मधुमेह और कैंसर आदि पर योग-अभ्यास के प्रभाव जांचे समझे जा रहे हैं।
चिकित्सा और मनोविज्ञान के अंतर्गत योग द्वारा आध्यात्मिक परिष्कार पर ध्यान नहीं दिया गया है जो जीवन के प्रति दृष्टिकोण या जीवन के अनुभव को प्रभावित करता है। योगाभ्यास करने वाले प्राय: शरीर में विश्राम, मन में एकाग्रता और हृदय में शांति का अनुभव करते हैं। योग अपने को साधने की पराकाष्ठा या चरम बिंदु तक पहुंचा देता है। परंतु मनुष्य स्वभाव से अपूर्ण होता है।
दिव्य या परमात्म तत्व ही उसे चरम उत्कर्ष (परफेक्शन) की ओर ले जाता है। परम तत्व से संयुक्त होना ही योग का लक्ष्य हो जाता है। वेदांत के दृष्टिकोण को मानें तो मनुष्य उसी दिव्य तत्व की प्रकट अभिव्यक्ति होता है। यह मिलन वस्तुत: आत्मान्वेषण हो जाता है। स्वयं अपने भीतर और सारे जगत में दिव्यता का दर्शन ही योग का अभीष्ट होता है। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस से संबंधित विशेष एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत सहित पूरे विश्व में हर साल की भांति इस साल भी बड़े उत्साह, उमंग और हर्षोल्लास के साथ 10वा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को स्वयं और समाज के लिए योग थीम के अनुसार हम अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने जा रहे हैं, योगाचार्य महेशपाल विस्तार पूर्वक बताते है कि आंतरराष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लम्बा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घायु बनाता है। इसलिए 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने के लिए चुना गया, 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी। भारत के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अन्दर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो किसी प्रस्तावित दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ में पारित करने के लिए सबसे कम समय था, उसके पश्चात 21 जून 2015 को सद्भाव और शांति के लिए योग थीम के साथ 192 देशों द्वारा प्रथम बार विश्व योग दिवस मनाया गया। महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को केंद्र में रखते हुए महिला सशक्तिकरण के लिए योग एवं स्वयं और समाज के लिए योग।थीम इस साल 2024 के योग दिवस की थीम बनाई गई है जिससे हमारी मातृशक्ति ,बहन बेटियां शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से सशक्त बन सकें और विभिन्न प्रकार के रोगों से अपने स्वयं का और अपने परिवार का बचाव करते हुए राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि-सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं तक का अनुपम समावेश है। जो भी व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज में लगा है तथा जीवन के पूर्ण सत्य को परिचित होना चाहता है, उसे अष्टांग योग का अवश्य ही पालन करना चाहिए। यम और नियम अष्टांग योग के मूल आधार हैं। अष्टांग योग का उद्देश्य सही कार्यों, ध्यान, अनुशासन और व्यायाम की मदद से किसी व्यक्ति की आंतरिक ऊर्जा को उसकी बाहरी दुनिया की ऊर्जा के साथ जोड़ना है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्तियों को अष्टांग योग के आठ अंगों का अभ्यास करने की आवश्यकता है। जैसा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में यह आठ अंगों का वर्णन किया है जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि मुख्य रूप से समाहित है। यम और नियम वस्तुतः शील और तपस्या के द्योतक हैं। यम का अर्थ है संयम जो साधक के अंदर सामाजिक नैतिकता का विकास करता है, वही नियम द्वारा व्यक्तिगत नैतिकता का विकास होता है। आसन से तात्पर्य है स्थिर और सुख पूर्वक बैठने के प्रकार से (स्थिर सुखमासनम्) जो देहस्थिरता, शरीरिक नियंत्रण को साधता है। प्राणायाम प्राणस्थैर्य एवं मन की चंचलता और विक्षुब्धता पर विजय प्राप्ति की साधना हैं, प्राणस्थैर्य और मन:स्थैर्य की मध्यवर्ती साधना का नाम प्रत्याहार, प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। देह के किसी अंग पर (हृदय में, नासिका के अग्रभाग पर) अथवा बाह्य पदार्थ पर (जैसे इष्टदेवता की मूर्ति आदि पर) चित्त को लगाना धारणा कहलाता है, किसी एक स्थान पर या वस्तु पर निरन्तर मन स्थिर होना ही ध्यान है। ध्यान में सदृशवृत्ति का ही प्रवाह रहता है, ध्यान की परिपक्वावस्था का नाम ही समाधि है। यह चित्त की वह अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है, धारणा ध्यान समाधि का सामूहिक नाम संयम है जिसे जीतने का फल है विवेक ख्याति का आलोक या प्रकाश। समाधि के बाद प्रज्ञा का उदय होता है और यही योग का अंतिम लक्ष्य और मोक्ष प्राप्ति का साधन है। इस प्रकार हमें हमारे जीवन में अष्टांग योग का पालन करते हुए दैनिक दिनचर्या में नित्य प्रतिदिन योग करते हुए योग अनुसार आहारचर्या का पालन करते हुए निरोग और स्वस्थ पूर्वक जीवन जीते हुए समाधि की ओर आगे बढ़ जाते हैं जिससे हमारे जीवन जीने का उद्देश्य पूरा होता है, आइये हम सब मिलकर योग से अपने आप को स्वस्थ बनाकर अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाए और जीवन को सफल बनायें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में सत्यानंद योग मिशन राजधानी के प्रमुख-प्रमुख जगहों पर योग शिविर का संचालन कर रहा है। इस कड़ी में आज होटल रेन्ड्यू, लालपुर में वृहद योग कक्षा का संचालन हुआ। जिसमें स्वामी मुक्तरथ और इनकी टीम ध्यान, प्राणायाम और योग की आवश्यक क्रियाओं को बताये।
मुक्तरथ जी ने बताया कि 80 प्रतिशत बीमारियों का कारण हमारा मन है। सिर्फ बीस प्रतिशत बीमारियां ही शारीरिक हैं। पेट के समस्त प्रकार की बीमारियों का जड़ हमारे मन में है और उपाय ढूंढ़ते हैं शरीर में। ईलाज करते हैं पेट का। पेप्टिक अल्सर, ड्यूडिनल अल्सर, कोलाइटिस, गेस्ट्रोइंटेसटाइनल डिजीज, कॉन्स्टिपेशन, पाइल्स ये सारी बीमारियां तनाव की वजह से आती है।
जब तक हम मन को रिलैक्स करने का उपाय नहीं करेंगे, मेडिटेशन नहीं करेंगे, प्राणायाम नहीं करेंगे। तब तक इन बीमारियों को दूर नहीं किया जा सकता है। बढ़ते कैंसर का भी बड़ा कारण तनाव है। आज इंसान को योग की बहुत ज्यादा जरूरत है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए योग से बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है।
होटल रेन्ड्यू के प्रबंधक अमित साहू ने कहा कि राजधानी में योग के प्रचार-प्रसार और शिविर लगाने में मेरा सहयोग स्वामी जी को मिलते रहेगा। योग से हमने बहुत लाभ देखा है और खुद महसूस भी किया है।
फिर सामने आया कोरोना का नया वैरिएंट, JN1 से भी खतरनाक
एबीएन हेल्थ डेस्क। अमेरिका में कोरोना के फिर से नए के मामले देखने को मिल रहे हैं। रोग नियंत्रण और रोकनाम केंद्र ने बताया है कि देश में कोविड के नये वैरिएंट (KP.3 Covid Strain) का पता चला है। इसका नाम KP.3 है।
अमेरिका में 25 प्रतिशत से अधिक कोरोना पीड़ितों में ये पाया गया है। ये नया वैरिएंट पहले के JN.1 वैरिएंट से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा है। जानकारी के मुताबिक, न्यू केपी 3 वैरिएंट ओमिक्रॉन वैरिएंट से निकला है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन केपी 3 वैरिएंट के खिलाफ कारगर साबित हो रहे हैं।
इस वैरिएंट के हल्के से लेकर गंभीर लक्षण हो सकते हैं। सामान्य लक्षणों में बुखार, सूखी खांसी और थकान शामिल हैं, इसके बाज जोड़ों में दर्द, सिरदर्द और गले में खराश हो सकती है। कई कोरोना पॉजिटिव पाये गये लोगों में स्वाद या गंध का खोना वायरस के विशिष्ट लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा उल्टी और दस्त जैसे गैस्ट्रोंइटेस्टाइनल लक्षण भी देखे गये हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। षट्कर्म शब्द की उत्पत्ति षट् और कर्म इन दो शब्दों के मेल से हुई है। इनमें षट् का अर्थ है छः (6) और कर्म का अर्थ है कार्य । इस प्रकार षट्कर्म का अर्थ हुआ छः कार्य। हां पर षट्कर्म का अर्थ ऐसे छः विशेष कर्मों से है जिनके द्वारा शरीर की शुद्धि होती है।
हठयोग में इन छः प्रकार के शुद्धि कर्मों को षट्कर्म कहते हैं। इन्हें अंग्रेजी में सिक्स बॉडी क्लींजिंग प्रोसेस कहा जाता है। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि महर्षि घेरण्ड ने छः षट्कर्मों को घेरण्ड संहिता में सप्तांग योग (घटस्थ योग) के पहले अंग के रूप में वर्णित किया है।
उनका मानना है कि बिना षट्कर्म के अभ्यास के कोई भी साधक योग मार्ग में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । सबसे पहले शरीर की शुद्धि आवश्यक है। बिना शरीर की शुद्धि के योग के अन्य अंगों के पालन में साधक को आगे बढ़ने में कठिनाई होती है। इसलिए महर्षि घेरण्ड ने षट्कर्म को योग के पहले अंग के रूप में स्वीकार किया है।
स्वामी स्वात्माराम ने हठप्रदीपिका में षट्कर्म का वर्णन करते हुए कहा है कि जिन साधको के शरीर में चर्बी ( मोटापा ) और कफ अधिक है उन साधको को पहले षट्कर्मों का अभ्यास करना चाहिए। जिनमें चर्बी व मोटापा नहीं है उन योग साधकों को षट्कर्मों की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार स्वामी स्वात्माराम ने केवल चर्बी व कफ की अधिकता वालों के लिए ही षट्कर्म करने का उपदेश दिया है ।
मुख्य रूप से यह छह कर्मों द्वारा बॉडी को डिटॉक्स किया जाता है जिनमें, धौति, बस्ति, नेति,त्राटक लौलिकी( नौलि),कपालभाति शामिल हैं धौति क्रिया से पाचनतंत्र एवं आहार नलिका की सफाई होती है और कब्ज, अपच, अम्लता ( एसिडिटी ) व कफ रोग ठीक होते हैं, वस्ति क्रिया से उत्सर्जन तंत्र व बड़ी आँत की सफाई होती है।
कब्ज, बवासीर, भगन्दर , प्लीहा, वायु गोला, वात, पित्त व कफ से उत्पन्न रोग समाप्त होते हैं, नेति क्रिया से आँख, नाक व गले से सम्बंधित बीमारियों को ठीक होती है, नौलि क्रिया को लोकिकी भी कहा जाता है । यह उदर ( पेट ) से सम्बंधित रोगों के लिए उपयोगी होती है, त्राटक क्रिया से हमारी आँखों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं जिससे हमारे आँखों के रोग दूर होते हैं।
कपालभाति क्रिया मस्तिष्क सम्बंधित रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी होती है । इससे हमारे श्वसनतंत्र की शुद्धि होती है ।षट्कर्मों की हमारे जीवन में बहुत उपयोगिता है इनके अभ्यास से हमारे सारे शरीर की शुद्धि होती है ।षट्कर्म का अभ्यास करने से पहले हमें कुछ सावधानी बरतनी चाहिए षट्कर्मों के अभ्यास से पूर्व साधक को अपने आहार की शुद्धि रखनी चाहिए ।
साधक को केवल पथ्य (सात्विक) आहार ही ग्रहण करना चाहिए। किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं लेना चाहिए । आहार का योग साधना में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी बीमारी या रोग की अवस्था में पहले चिकित्सक से सुझाव लेना आवश्यक है । उसके बाद ही आप षट्कर्मों का अभ्यास करें षट्कर्मों के अभ्यास की शुरुआत अकेले ही घर पर नहीं करनी चाहिए,इसके लिए विधिवत रूप से योग केन्द्र पर जाकर, योग गुरु से ही इनका प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।
एबीएन हेल्थ डेस्क। राष्ट्रीय खेल संस्थान पटियाला में योगासन भारत द्वारा द्वितीय राष्ट्रीय कोच प्रशिक्षण प्रारंभ हो चुका है, जिसका शुभारंभ एनएस एनआईएस निर्देशक डॉ कल्पना शर्मा एवं योगासन भारत के महासचिव डॉ जयदीप आर्य ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। जिसमें भारत के सभी राज्यों के योग में प्राप्त विशेष अनुभव 150 से भी अधिक कोचों को शामिल किया गया है।
योगाचार्य महेश पाल ने जानकारी देते हुए बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम 16 जून 2024 तक चलेगा, जिसमें योगासन खेल की बारीकियों के बारे में बॉडी मूवमेंट के बारे में एवं योग के अनुसार आहार शैली कैसी होना चाहिए। बॉडी को किस तरह फ्लैक्सिबल बनाते हुए विभिन्न प्रकार के एडवांस आसनों को सीखते हुए नेशनल और इंटरनेशनल व खेलो इंडिया में योग के खिलाड़ी किस तरह अच्छा परफॉर्मेंस कर सकते हैं।
इस विषय से संबंधित विस्तार पूर्वक विशेष ट्रेनिंग दी जायेगी, योगासन भारत, भारत सरकार के युवा मामले एवं खेल मंत्रालय के अंतर्गत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय खेल महासंघ है जो ग्राम स्तर से तहसील स्तर जिला स्तर स्टेट और नेशनल स्तर तक के बच्चों को योग के क्षेत्र में उनकी प्रतिभाओं को पहचान कर उनको आगे बढ़ता है और खेलो इंडिया नेशनल गेम्स एशियाई योगासन वर्ल्ड योगासन प्रतियोगिताओं में बच्चों को आगे बढ़ाता है।
यह महासंघ योगासन खेल से संबंधित लगभग 12 प्रकार योगासन खेल प्रतियोगिताएं आयोजित करवाता है। योगासन भारत के महासचिव डॉ जयदीप आर्य ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस कोचेस ट्रेनिंग प्रोग्राम में जो कोच ट्रेनिंग ले रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर की उन कोचेस को विदेश में भी योगासन खेल के माध्यम से ट्रेनिंग और कोचिंग के लिए उन्हें आगे बढ़ाया जायेगा, जिससे कोचेस का भी भविष्य योगासन खेल महासंघ से उज्ज्वल हो सके।
मौके पर भारतीय खेल प्राधिकरण के मुख्य कोच सीके मिश्रा, एशियाई योगासन के उपाध्यक्ष डॉ निरंजन मूर्ति, रचित कौशिक, उमेश नारंग, पियूषकांत मिश्रा, रोहित कौशिक, पंजाब योगासन की अध्यक्ष डॉ अकलकला, विक्रम बाबा, बंदना कोरपाल उपस्थित रहे।
एबीएन हेल्थ डेस्क। सहितो द्विविधा प्रोक्तः सागरभश्च निगर्भकः, सागरभो बीजमुच्चार्य निगर्भो बीज वर्जितः अनुवाद:- सहित प्राणायाम दो प्रकार का होता है : सगर्भ और निगर्भ। सगर्भ प्रकार का अभ्यास बीज मंत्र का जाप करके किया जाता है और निगर्भ प्रकार का अभ्यास इसके बिना किया जाता है।
योगाचार्य महेश पाल विस्तार से बताते हैं कि घेरण्ड संहिता मैं वर्णित सहित सगर्भ प्राणायाम महत्वपूर्ण आठ प्राणायामों में से एक है, सहित कुंभक प्राणायाम (योगिक श्वास अभ्यास) में सांस रोकने का एक रूप है। यह शब्द संस्कृत के शब्द सह से आया है, जिसका अर्थ है साथ ज , जिसका अर्थ है पैदा होना और कुंभक , जिसका अर्थ है सांस रोकना।
इसका मतलब है सांस को स्वाभाविक रूप से रोकना, जिसमें सांस अंदर लेना या बाहर छोड़ना शामिल न हो। इसे कभी-कभी केवला कुंभक का पर्याय माना जाता है लेकिन जब अंतर किया जाता है, तो केवला को समाधि की स्थिति या ईश्वर के साथ मिलन के बराबर माना जाता है, जिसमें सांस लेना और छोड़ना आवश्यक नहीं है।
कुंभक आमतौर पर प्रत्याहार या इंद्रियों की वापसी द्वारा उत्पन्न होता है, जो योग का पांचवां अंग है सहित कुंभक प्राणायाम का एक प्रमुख घटक है, जिसका उपयोग ध्यान और कुछ योग आसनों के साथ किया जाता है।यह अभ्यास शरीर में गर्मी बढ़ाता है और ऊर्जा प्रणालियों को संतुलित करता है, जिससे शारीरिक और मानसिक कई लाभ मिलते हैं।
यह त्वचा संबंधी विकारों से लेकर मधुमेह तक कई तरह की बीमारियों को रोकने और उनका इलाज करने में मदद करता सहित या सहज कुंभक एक मध्यवर्ती अवस्था है, जब इंद्रियों की वापसी के चरण में, योग के आठ अंगों में से पांचवां, प्रत्याहार, सांस रोकना स्वाभाविक हो जाता है। सहित कुंभक प्राणायाम हमारे बहिर्मुखी इंद्रियों को अंतर्मुखी कर देता है, जिससे हमारी पंच ज्ञानेंद्रिय से भटकने वाला मन स्थिर हो जात हैं और हमारे चित्र में उठने वाले विचार शांत हो जाते हैं।
हमारी इंद्रियां हमारे बस में हो जाती हैं जिससे हम बीज मंत्र पर ध्यान केंद्रित कर पाते है और समाधि की ओर अग्रसर हो जाते हैं सहित प्राणायाम का अभ्यास करने के लिए पद्मासन या किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठें, रीढ़ सीधी होनी चाहिए। दोनों नथुनों से धीरे-धीरे और जितना संभव हो सके उतनी लंबी सांस अंदर लें।जिस क्षण आपको यह एहसास हो कि अब आप नाक से सांस नहीं ले सकते, तब अपने होठों (कौवा चोंच) से हवा को निगल लें। पहले जीभ लॉक का प्रयोग करें, फिर ठोड़ी लॉक का।
अपनी क्षमता के अनुसार सांस को रोककर रखें (अंतर कुम्भक)।फिर ठोड़ी को खोलें, फिर जीभ को खोलें और दोनों नथुनों से गहरी और लंबी सांस छोड़ें। इस तकनीक के बाद 5 प्राकृतिक श्वास लें।फिर, चार गिनती तक अपनी नाक से सांस अंदर लें, चार गिनती तक सांस को ऊपरी हिस्से में रोककर रखें, चार गिनती तक अपनी नाक या मुंह से सांस छोड़ें और अंत में, चार गिनती तक सांस को नीचे की तरफ रोककर रखें। इस पैटर्न को कम से कम 2-3 मिनट तक अभ्यास को दोहराएं।
इस प्राणायाम के अभ्यास से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, शरीर में शारीरिक शक्ति का विकास होता है, जिससे शरीर ताजा, सक्रिय और मजबूत बनता है। चेहरे पर सुन्दरता और चमक बढ़ती है। मन को प्रसन्न और शांत बनाता है। इस प्राणायाम से मानसिक समस्याएं समाप्त होती हैं। भूख और प्यास को नियंत्रित किया जा सकता है। एकाग्रता और ध्यान के लिए बहुत उपयोगी है। यह अभ्यास हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप, मिर्गी रोगियों के लिए वर्जित है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में पिछले कुछ वर्षों से कभी न कभी और किसी न किसी भाग में बर्ड फ्लू की पुष्टि हो जा रही है। वर्ष 2023 में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के रांची स्थित आवास पर पाली गयी मुर्गियों में बर्ड फ्लू के वायरस एच5एन1 मिलने की पुष्टि हुई थी।
इस वर्ष अप्रैल महीने में होटवार स्थित पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय कुक्कुट प्रक्षेत्र की मुर्गियों में बर्ड फ्लू के वायरस मिले थे, तो इस महीने मोराबादी-बरियातू स्थित रामकृष्ण मिशन आश्रम के फार्म हाउस की मुर्गियों में बर्ड फ्लू के वायरस की पुष्टि हुई है।
बर्ड फ्लू की पुष्टि के बाद पशुपालन विभाग, जिला प्रशासन के साथ साथ स्वास्थ्य महकमा भी अलर्ट मोड में आ जाता है। लेकिन आम जनता में बर्ड फ्लू को लेकर उतनी गंभीरता नहीं आम जनता में नहीं दिखती। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि जब बर्ड फ्लू का संक्रमण पक्षियों से इंसानों में आने की संभावना बहुत ही कम है तो फिर स्वास्थ्य महकमा इतना अलर्ट क्यों हो जाता है?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए ईटीवी भारत की टीम ने रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक और वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट डॉ बिमलेश कुमार सिंह से बात की। डब्ल्यूएचआ की एक स्टडी का हवाला देते हुए डॉ बिमलेश सिंह ने कहा कि दुनिया भर में अब तक करीब 900 लोगों को बर्ड फ्लू का संक्रमण हुआ है।
यह संख्या काफी कम है, लेकिन दुखद बात यह है कि जिन लोगों को बर्ड फ्लू का संक्रमण हुआ उसमें लगभग आधे की मौत हो गयी। यानी इंसानों में भी इसकी मोर्टेलिटी रेट काफी हाई है। इस वजह से कहीं भी बर्ड फ्लू के केस मिलने पर स्वास्थ्य महकमा ज्यादा चौकस और चौकन्ना हो जाती है। ताकि यह इंसानों में न फैले।
एबीएन से बातचीत में डॉ बिमलेश कुमार सिंह ने कहा कि इसके साथ साथ हम सब जानते हैं कि वायरस में म्यूटेशन बहुत जल्दी जल्दी होता है। कौन सा बदलाव इंसानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो जाये, यह कोई नहीं जानता, यही वजह है कि हम सबको ज्यादा चौकन्ना रहना होता है।
डॉ बिमलेश कुमार सिंह के अनुसार संक्रमित पक्षियों से एच5एन1 वायरस के इंसानों में आने की संभावना रेयर आफ रेयरेस्ट होने के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि इंसानों को बर्ड फ्लू नहीं हो सकता।
रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ बिमलेश सिंह ने कहा कि कछर यानी इन्फ्लुएंजा लाइक सिंड्रोम होने पर एक बार डॉक्टर्स की सलाह लेकर दवा जरूर लें। उन्होंने बताया कि होटवार में बर्ड फ्लू के पिछले महीने केस मिलने के बाद ही सदर अस्पताल में बर्ड फ्लू या वायरल इन्फेक्शन की दवा टेमी फ्लू मंगा ली गयी थी। आपात स्थिति को ध्यान में रखते हुए 10 वार्ड का आइसोलेशन वार्ड भी तैयार रखा गया है। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान जो एहतियात हम बरतते थे जैसे मास्क लगाना, हाथों को सेनेटाइज करना वह अब भी करें। सर्दी, आंख लाल होने, आंख और नाक से पानी आने, बुखार होने पर खुद को आइसोलेट कर लें।
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