एबीएन हेल्थ डेस्क। कंप्यूटर के सामने घंटों एक पोजिशन में बैठकर काम करना और मोबाइल पर चैट-गेम खेलने की आदत युवाओं को स्पाइन की बीमारी का रोगी बना रही है। फरीदाबाद के सरकारी और निजी अस्पतालों में रोजाना 20-30 मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे में न्यूरो सर्जन ने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है।
फरीदाबाद में बीके, ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल सहित करीब 15 बड़े अस्पताल हैं। इन अस्पतालों की न्यूरोलॉजी ओपीडी में रोजाना चार से पांच मरीज पीठ दर्द और स्पाइन की समस्या से पीड़ित होते है। ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ। राहुल ने बताया कि युवाओं में यह बीमारी काफी तेजी से बढ़ी है। पिछले दो साल में ओपीडी में इस बीमारी के मरीजों में युवाओं के केस 30 प्रतिशत तक बढ़े हैं।
ग्रेटर फरीदाबाद स्थित एक निजी अस्पताल के न्यूरो सर्जन डॉ विक्रम दुआ ने बताया कि भागदौड़ भरी जीवनशैली में 70 से 80 प्रतिशत लोगों को पीठ दर्द की समस्या हो रही है। इसके अलावा सोते समय हाथ में दर्द, जलन और झुनझुनी भी लोगों को परेशान करती है। इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
साथ ही रहन-सहन में बदलाव व तकनीकी निर्भरता के कारण युवा इस बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं, जो कि आमतौर पर बुजुर्गों की बीमारी कही जाती है। उनके पास पहले जहां इस बीमारी के केस में 90 फीसदी बुजुर्ग तो 10 फीसदी युवा आते थे। वहीं आज यह रेश्यो 70 और 30 पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि युवा आजकल घंटों कंप्यूटर पर समय बिताते हैं। उनकी फिजिकल एक्टिविटी जीरो हो गई है, ऐसे में स्पाइन डिसआॅर्डर लगातार बढ़ रहा है।
शुरुआती दौर में भले ही युवा इसे गंभीरता से न लें, लेकिन लंबे समय में यह परेशानी का कारण बन सकती है। रीढ़ की हड्डी में दर्द और विकलांगता कैंसर, स्ट्रोक, हृदय रोग, मधुमेह और अल्जाइमर रोग की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। मूव योर स्पाइन अभियान का उद्देश्य घर, कार्यस्थलों, स्कूलों और समुदायों के भीतर की स्थितियों सहित रीढ़ की हड्डी में दर्द और विकलांगता के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है।
डॉ रवि शंकर ने कहा कि पीठ दर्द का एक कारण घंटों कंप्यूटर पर बैठने के अलावा अधिक ड्राइविंग करना भी है। जब हम एक ही पोजिशन में ज्यादा देर तक बैठते हैं तो सिर से कमर तक की हड्डियों में खिंचाव पैदा होता है जो लम्बर स्पोंडिलोसिसबीमारी का संकेत है। ओपीडी में इस बीमारी के रोजाना चार से पांच मरीज आ रहे हैं।
कंप्यूटर के सामने घंटों बैठकर काम करना इस बीमारी का मुख्य लक्षण है। इसके अलावा कमर टेढ़ी करके बैठना, गलत तरीके से चलना, कमर दर्द को नजरअंदाज करना, कमजोरी आना, शरीर का कोई भाग सुन्न पड़ जाना, पैरों में झनझनाहट होना, चलने में दिक्कत होना, पेशाब रुक जाना। अगर कमर दर्द ठीक नहीं होती है और साथ में बुखार या टांगों में दर्द है तो तुरंत स्पाइनल सर्जन को दिखायें।
एबीएन हेल्थ डेस्क। वर्तमान समय के भाग दौड़ भरी जीवन में हम अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते हैं जिसके कारण हम विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रसित हो जाते हैं, उन्हीं में से एक गंभीर बीमारी है किडनी रोग। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि वर्तमान समय में भारत ही नहीं पूरे विश्व में बच्चे युवा वर्ग महिलाएं वयस्क वरिष्ठजन किडनी रोग से ग्रस्त होते जा रहे हैं, एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जनसंख्या का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी) से पीड़ित है, बही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये संख्याएं चौंका देने वाली हैं।
अनुमान है कि दुनिया भर में 2 मिलियन से भी अधिक लोग किडनी फेलियर से पीड़ित हैं, और इस बीमारी से पीड़ित रोगियों की संख्या में हर साल 5-7% की दर से वृद्धि होती जा रही है। किडनी रोग होने के कई कारण देखे गए हैं जो इस प्रकार है, किडनी में पर्याप्त रक्त प्रवाह न होना,किडनी को प्रत्यक्ष क्षति,किडनी में मूत्र का जमा हो जाना, प्रोस्टेट ग्रंथि में वृद्धि, गुर्दे में पथरी, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, सिगरेट व धूम्रपान का अत्यधिक सेवन, गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं होना, जैसे एक्लेम्पसिया व प्रीक्लेम्पसिया, अत्यधिक शराब का सेवन एवं बिन्ज ड्रिंकिंग (जिसे महिलाओं के लिए 2 घंटे में लगभग चार ड्रिंक्स और पुरुषों के लिए 2 घंटे में पांच ड्रिंक्स के रूप में परिभाषित किया जाता है) बिन्ज ड्रिंकिंग एक जोखिम तीव्र किडनी फेलियर है जो किडनी के कार्य में अचानक गिरावट लाता है और किडनी फेलियर का कारण बनता है।
किडनी की बीमारियाँ तब होती हैं जब आपकी किडनी क्षतिग्रस्त हो जाती है और आपके रक्त को फिल्टर नहीं कर पाती। क्रोनिक किडनी रोग में, क्षति कई वर्षों के दौरान होती है ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस,इस प्रकार की किडनी की बीमारी में ग्लोमेरुली को नुकसान पहुंचता है, जो आपके गुर्दे के अंदर फिल्टरिंग इकाइयां हैं। आपके गुर्दे के कई काम हैं, लेकिन उनका मुख्य काम आपके रक्त को साफ करना, विषाक्त पदार्थों, अपशिष्ट और अतिरिक्त पानी को मूत्र (पेशाब) के रूप में बाहर निकालना है।
आपके गुर्दे आपके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स (जैसे नमक और पोटेशियम) और खनिजों की मात्रा को भी संतुलित करते हैं, रक्तचाप को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाते हैं, लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण करते हैं और आपकी हड्डियों को मजबूत रखते हैं। यदि आपके गुर्दे क्षतिग्रस्त हैं और ठीक से काम नहीं करते हैं, तो अपशिष्ट आपके रक्त में जमा हो जाते हैं और किडनी को क्षति पहुँचाते है और किडनी के रोगों से हम ग्रस्त होने लगते हैं, जब हम किडनी रोग से ग्रस्त होते हैं तो हमारे सामने कई लक्षण नजर आते हैं, थकान, कमजोरी, कम ऊर्जा स्तर,भूख में कमी हाथ, पैर और टखनों में सूजन सांस लेने में कठिनाई झागदार या बुलबुलादार पेशाब।
मोटी आंखें, सूखी और खुजली वाली त्वचा, ध्यान केन्द्रित करने में परेशानी, नींद न आना, सुन्न होना। मतली या उलटी,मांसपेशियों में ऐंठन, उच्च रक्तचाप, त्वचा का काला पड़ना, यह सारे लक्षण हमारी बॉडी में नजर आते हैं तो हमें तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए उसके पश्चात अन्य उपचार करने चाहिए, योग रक्तचाप को कम करने, गुर्दे की कार्यप्रणाली में सुधार करने, डायलिसिस की आवश्यकता को कम करने और सीकेडी के रोगियों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए पारंपरिक उपचार विधियों के सहायक उपचार के रूप में सुरक्षित और प्रभावी उपाय है, योग अभ्यास से हमारे दैनिक दिनचर्या और हमारी आहारचार्य में बदलाव आने से किडनी के रोगों के साथ साथ अन्य रोगों से भी बच सकते हैं।
किडनी रोग से बचाव के लिए हमें यह योग अभ्यास हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल करना चाहिए जिसमें कपालभाति सटकर्म, नाड़ी शोधन, अनुलोम विलोम प्राणायाम, आसन मैं धनुरासन, पश्चिमोत्तासन, चक्रासन वृक्षासन, उष्ट्रासन, सूर्य नमस्कार कटिचक्रासन आदि, कपालभाति के अभ्यास से किडनी फंक्शन को बेहतर करने में मदद मिलती है। प्राणायाम ग्लोमेरुली फिल्टरिंग इकाई को क्षति होने से बचाने में सहयोग करता है, आसन का अभ्यास लिवर, किडनी, ओवरी और यूट्रस के फंक्शन को स्टिम्युलेट करता है।
इस तरह रेगुलर योग अभ्यास करने से किडनी रोग ही नहीं अन्य रोगों से हम अपने आप को बचा सकते हैं हमें अपनी लाइफ स्टाइल में 1 घंटे का योग अभ्यास जरूर शामिल करना चाहिए और हमारी दैनिक दिनचर्या और आहारचार्य को हमारे स्वास्थ्य के अनुसार रखना चाहिए, जिससे कि हम हमारे जीवन में विभिन्न प्रकार के रोगों का व समस्याओं से बचे रहें। किडनी रोगियों के लिए भोजन मैं सोडियम प्रोटीन पोटेशियम और फास्फेट की कम मात्रा बाला भोजन लेना चाहिए।
एबीएन हेल्थ डेस्क। बच्चों में बढ़ती आंखों की समस्या एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है, जिसमें वर्तमान समय देखने में आ रहा है कि प्रत्येक बच्चे को जन्म से ही आंखों की समस्या से गुजरना पड़ रहा है। और आंखों पर चश्मा लगता जा रहा है। यह कारण माता-पिता की बदलती लाइफस्टाइल दैनिक दिनचर्या आहार शैली भी एक कारण है।
वहीं बच्चों की दिनचर्या एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का ज्यादा उपयोग और फास्ट फूड का अत्यधिक सेवन करने से बच्चे दिन प्रतिदिन आंखों की समस्याओं से ग्रसित होते जा रहे हैं। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि बच्चों में आँखों की समस्याएँ ऐसी किसी भी समस्या या स्थिति को संदर्भित करती हैं जो आँखों, ऑप्टिक तंत्रिका और मस्तिष्क सहित दृश्य प्रणाली को प्रभावित करती हैं।
ये समस्याएँ गंभीरता में भिन्न हो सकती हैं, हल्के अपवर्तक त्रुटियों से लेकर अधिक गंभीर स्थितियों तक जो बिना इलाज के दृष्टि हानि का कारण बन सकती हैं। बच्चों में होने वाली आम आँखों की समस्याओं में अपवर्तक त्रुटियाँ शामिल हैं, जैसे कि मायोपिया (नज़दीकी दृष्टि) और हाइपरोपिया (दूरदृष्टि), साथ ही एम्ब्लियोपिया (आलसी आँख), स्ट्रैबिस्मस (भरी आँखें) और कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख) जैसी स्थितियाँ।
इन स्थितियों और उनके संकेतों और लक्षणों के बारे में जागरूक होना ज़रूरी है ताकि समय रहते इनका पता लगाया जा सके और उचित उपचार के साथ साथ योग अभ्यास कर समय रहते आंखों की समस्या का निदान कर सकें, बच्चों में आँखों की समस्याओं के कुछ सामान्य लक्षणों में बार-बार आँखों को रगड़ना, अत्यधिक आँसू आना, लाल या सूजी हुई आँखें, प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, आँखें सिकोड़ना , ध्यान केंद्रित न कर पाना, पढ़ने या नज़दीक से काम करने में कठिनाई और आँखों का असामान्य संरेखण शामिल हैं।
वहीं आंखों की योगिक सूक्ष्म क्रिया से स्ट्रैबिस्मस, आँशु नलिकाओं का अवरुद्ध होने की समस्या, निस्टागमस आदि समस्याओं से बचा जा सकता है वहीं आसान और प्राणायाम ध्यान के द्वारा मायोपिया (निकट दृष्टि दोष), हाइपरोपिया (दूरदृष्टि दोष) एम्ब्लियोपिया (आलसी आँख) कंजंक्टिवाइटिस (गुलाबी आँख) आदि आँखों की समस्याओं से बचा जा सकता है, जिसमे रेगुलर योग अभ्यास मैं आँखों की योगिक सूक्ष्म क्रियाएं, सुखासन, स्वास्तिक आसान पद्मासन, सर्वांगासन शीर्षासन विपरीत करनी मुद्रा , प्राणायाम में अनुलोमविलोम, भ्रामरी, चंद्रभेदी आज्ञाचक्र पर ध्यान, नदी शोधन प्राणायाम आदि के अभ्यास से आंखों की समस्याओं से बचा जा सकता है।
5 वर्ष से अधिक के बच्चे योगाभ्यास अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं, आंखों में लालिमा होने की समस्या होने पर शीर्षासन का अभ्यास न करें। बच्चों की दैनिक दिनचर्या में पौष्टिक आहार शैली और दैनिक दिनचर्या में योगाभ्यास को स्थान देकर आंखों की समस्या के साथ-साथ हम बच्चों को भविष्य में आने वाले विभिन्न प्रकार मानसिक व शारीरिक रोगों से बचा सकते हैं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। परम श्रद्धेय योग ऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज, अध्यक्ष वर्ल्ड योगासन एवं योगाचार्य डॉ जयदीप आर्य, महासचिव वर्ल्ड योगासन एवं योगासन भारत के मार्गदर्शन में आॅल इंडिया योगासन पुलिस गेम 27 सितंबर 2024 को भिलाई छत्तीसगढ़ में 18 से 55 वर्ष के आयु वर्ग में संपन्न हुआ।
समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ जयदीप आर्य, महासचिव वर्ल्ड योगासन एवं योगासन भारत का सान्निध्य व आशीर्वाद प्राप्त हुआ। मुख्य अतिथि का स्वागत छत्तीसगढ़ योगासन सचिव एव कंपटीशन डायरेक्टर यश पाराशर कंपटीशन मैनेजर जयंत जैन ने पुष्प गुच्छ, स्मृति चिह्न और अंगवस्त्र देकर किया।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में रचित कौशिक, कोषाध्यक्ष योगासन भारत का स्वागत किया गया। अन्य गणमान्य अतिथियों में सचिव रोहित कौशिक, यस पारासर उमग नारंग श्रेयस मारकंडेय छत्तीसगढ़ पुलिस आईजी आदि शामिल रहे।
मुख्य अतिथि डॉ जयदीप आर्य जी ने करो योग, रहो निरोग के माध्यम से प्रतिदिन योगासन और प्राणायाम को जीवन में अपनाने की प्रेरणा दी और कहा वह दिन दूर नहीं जब योगासन खेल के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए सर्वाधिक मेडल जीतकर राष्ट्र का नाम रोशन करेंगे।
योगाचार्य महैश पाल ने बताया की इस प्रतियोगिता में छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा आल इंडिया नेशनल योगासन पुलिस गेम का आयोजन भिलाई छत्तीसगढ़ में किया गया जिसमें पूरे देश से 511 योग के खिलाड़ियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में पांच प्रकार के इवेंट्स—ट्रेडिशनल, आर्टिस्टिक पेयर, आर्टिस्टिक सिंगल, रिदमिक पेयर, और आर्टिस्टिक ग्रुप इवेंट्स—में प्रतिभागियों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में प्रत खिलाड़ी को प्रत्येक आसन के प्रदर्शन पर 10 अंक में से अंक दिये गये, जो माइक्रो मार्किंग सिस्टम के आधार पर खिलाड़ियों की प्रतिभा को आकलन किया गया।
योगासन भारत, भारत सरकार के खेल युवा कल्याण विभाग के अंतर्गत कार्य करने बाली योग की सबसे बड़ी संस्था है जो हमेशा योगासन को गाव से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर योग के खिलाडियों को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही है, इस प्रतियोगिता मे आर्टिस्टिक सिंगल सीनियर बी+सी ग्रुप में प्रथम स्थान बब्लिना खाकरे मध्य प्रदेश पुलिस का रहा, दूसरा स्थान राजस्थान व तृतीय स्थान पंजाब पुलिस का रहा।
इसी तरह अन्य इवेंट में बीएसएफ पुलिस आइटीबीपी पुलिस एवं अन्य इवेंट में अलग-अलग राज्य की पुलिस ग्रुप ने स्थान प्राप्त किया। समापन पर छत्तीसगढ़ योगासन सचिव व छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा सभी अतिथियों, खिलाड़ियों और आयोजन समिति का धन्यवाद ज्ञापित किया एवं राष्ट्रगान के साथ प्रतियोगिता को सम्पन्न किया गया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। नया जीवन पाने वाले इन हृदय रोगियों के लिए विश्व हृदय दिवस की पूर्व संध्या पर बत्रा हास्पिटल में सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। बत्रा हार्ट एंड मल्टीस्पिशयलिटी ग्रुप, फरीदाबाद ने समय पर और तत्परता से इलाज के जरिए पिछले एक साल में हृदयाघात से भर्ती सभी 110 मरीजों की जान बचा कर शून्य मृत्युदर का कीर्तिमान बनाया है। इन मरीजों में ज्यादातर वे थे जिन्हें गंभीर रूप से दिल का दौरा पड़ा था या हृदय संबंधी गंभीर समस्याएं थीं।
विश्व हृदय दिवस की पूर्व संध्या पर हास्पिटल में आयोजित एक सम्मान और सालगिरह समारोह को संबोधित करते हुए कार्डियक साइंसेज के निदेशक और अध्यक्ष डॉ. पंकज बत्रा ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, पिछले साल भर में हमारे पास हृदय रोगों और हृदयाघात के 110 मरीज आये और विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा उनके सफलतापूर्वक इलाज से उन्हें जीवनदान मिला। इस कार्यक्रम में उपस्थित अधिकांश मरीजों को गंभीर रूप से दिल के दौरे पड़े थे और उनकी धमनियों में 100 प्रतिशत ब्लॉकेज था।
इस कार्यक्रम में कश्मीर से लेकर केरल तक के 55 से 85 वर्ष की आयु के मरीजों ने बत्रा हार्ट एंड मल्टीस्पेशलिटी हास्पिटल, फरीदाबाद में नया जीवन पाने के अपने अनुभवों को साझा किया। दिल्ली के अधेड़ आयु के एक मरीज डेविड ने बताया कि किन हालात में वे इस अस्पताल पहुंचे और किस तरह डॉ. पंकज की तत्परता से उनका जीवन बच पाया। उन्होंने बताया, मुझे हृदय की समस्या थी जबकि मैं इसे पेट में गैस और जलन की समस्या समझता रहा।
जब सीने में दर्द बढ़ने लगा तो मुझे बत्रा हास्पिटल लाया गया जहां डॉ. पंकज ने तुंरत मेरे मर्ज को पहचान कर समय से मेरा इलाज कर मेरा जीवन बचाया। डेविड की पत्नी ने भी इसी बात को दोहराया और वहां मौजूद उन मरीजों की भावनाओं को अभियक्ति जिन्हें इस हास्पिटल में जीवनदान मिला।
ज्यादातर मरीजों ने छुट्टियों में भी गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों को आपात चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने की बत्रा हास्पिटल की प्रतिबद्धता की चर्चा करते हुए उम्मीद जताई कि यह रविवार और छुट्टियों के दिन भी खुला रहेगा।
डॉ. पंकज ने कहा, शून्य मृत्युदर हमारी टीम के समर्पण और उनकी विशेषज्ञता का प्रमाण है। हमने आपातकालीन चिकित्सा जिसे डोर बैलून टाइम कहते हैं और जहां मरीज की जान बचाने के लिए 30 मिनट से भी कम का समय मिलता है, में अपनी विशेषज्ञता से नये मानदंड स्थापित करते हुए इसे एक जीवनरक्षक प्रारूप बनाया है। मरीजों को सम्मानित करने के साथ ही अस्पताल प्रबंधन ने गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) के स्टाफ, नर्सों, डॉक्टरों और मरीज के अस्पताल में भर्ती होने से पहले व उसके बाद इलाज व देखभाल में शामिल सभी कर्मचारियों को भी मेरिट प्रमाणपत्र से सम्मानित किया।
इस मौके पर बत्रा हर्ट एंड मल्टी स्पेशियलिटी हास्पिटल, फरीदाबाद के अध्यक्ष रमेश कुमार बत्रा ने डॉ पंकज की किताब प्रीवेंशन आॅफ हर्ट डिजीज का लोकार्पण किया। हृदय की बीमारियों से बचाव के लिए जीवनशैली में सुधार की जरूरत की चर्चा करते हुए डॉ. पंकज ने नियमित व्यायाम, टहलने, तनावमुक्त रहने, धूम्रपान नहीं करने और ब्लड प्रेशर एवं मधुमेह पर नजर रखते हुए समय-समय पर चिकित्सा जांच कराते रहने की सलाह दी।
उन्होंने कहा, चिकित्सा विज्ञान में तमाम अविष्कारों के बावजूद 2019 के आंकड़े बताते हैं कि हृदय संबंधी बीमारियों से दुनिया में 1.80 करोड़ लोगों की मौत हुई जिसमें 58 प्रतिशत लोग एशिया के थे। इसकी बड़ी वजह अनियमित नींद, मोबाइल का लगातार इस्तेमाल, जंक फूड और धूम्रपान है। बत्रा हास्पिटल हृदय दशकों से हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है और देशभर के मरीजों की उम्मीदों पर खरा उतरा है।
एबीएन हेल्थ डेस्क। बदलती लाइफस्टाइल और गलत तरीके के खान-पान की वजह से लोग कोलेस्ट्रॉल जैसी कई समस्याओं के शिकार हो रहे हैं। शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ने से धमनियों में ब्लॉकेज का जोखिम होता है। इसलिए इसको नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में आप अपनी जीवनशैली में कुछ बदलाव करके हाइ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कंट्रोल में रख सकते हैं।
जो लोग फिजिकल एक्टिविटी कम करते हैं और जिनकी खराब खान-पान की आदत के साथ जीवन शैली भी गड़बड होती है। उन्हें हाई बीपी, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल जैसी गंभीर बीमारियां बड़ी ही आसानी से अपने चपेट में ले लेती हैं। बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल की समस्या को खुद से दूर रखना जरूरी है। वरना हम कई अन्य गंभीर बीमारियों का भी शिकार बन सकते हैं।
कुछ खाद्य पदार्थों में फैट अधिक मात्रा में पाया जाता है, जिनके अधिक सेवन से कोलेस्ट्रॉल का लेवल बढ़ जाता है, जिसे हाई कोलेस्ट्रॉल कहते हैं। शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर जब ज्यादा होने लगता है तो रक्त वाहिकाओं में फैट जमा होने लगता है और यह आपकी धमनियों के जरिए रक्त प्रवाह में परेशानी खड़ा करता है। वहीं जब खून हार्ट की मांसपेशियों तक ठीक तरह से नहीं पहुंच पाता है तो हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ जाता है, जिससे हम हार्ट अटैक और स्ट्रोक के शिकार भी हो सकते हैं।
डॉक्टर दवाओं की मदद से कोलेस्ट्रॉल के बढ़े हुए लेवल को कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं लेकिन अगर जीवन शैली अच्छी न हो तो इन दवाओं का असर भी धीरे-धीरे कम हो जाता है। अगर आप बैड कोलेस्ट्रॉल की समस्या को जड़ से खत्म करना चाहते हैं तो लाइफस्टाइल में कुछ छोटे-छोटे बदलाव आपके जीवन में असरदार साबित हो सकते हैं। इससे खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रण में रखा जा सकता है।
इस बीमारी को खुद से दूर रखना जरूरी है। वरना हम कई अन्य गंभीर बीमारियों के भी शिकार बन सकते हैं। शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने पर हाई ब्लड प्रेशर और वजन अधिक होने जैसी समस्या भी देखी जाती है। हाई कोलेस्ट्रॉल के खुद कोई खास लक्षण नहीं होते हैं।
ऐसे में 20 या उससे अधिक उम्र के लोगों को हर 5 सालों में कम से कम एक बार ब्लड में कोलेस्ट्रॉल के लेवल की जांच करानी चाहिए। अगर आपके घर के किसी सदस्य में हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या का अनुवांशिकी इतिहास रहा है तो डॉक्टर आपको बार-बार कोलेस्ट्रॉल की जांच करने की सलाह भी दे सकते हैं।
हमारे शरीर में कोलेस्ट्रॉल दो तरह के होते हैं। एक गुड कोलेस्ट्रॉल और दूसरा है बेड कोलेस्ट्रॉल। इसको हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया या हाइपरलिपिडेमिया और हाई कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। जानवरों से बने फूड्स जैसे अंडे, दूध, मीट, पनीर और मक्खन के साथ सैचुरेटेड फैट को लेने से उच्च कोलेस्ट्रॉल की समस्या हो सकती है। पैकेट बंद खाद्य पदार्थों जैसे बिस्किट, नमकीन और चिप्स का सेवन भी हाई कोलेस्ट्रॉल के कारणो में शामिल होता है।
अधिक वजन के कारण भी एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। जो लोग फिजिकल एक्टिविटी नहीं करते उनके शरीर में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ सकता है। हाइपोथाइरॉएडिज्म और किडनी लिवर जैसे रोगों के कारण भी हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या का खतरा बढ़ सकता है। धूम्रपान और शराब का सेवन खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा सकता है।
कोलेस्ट्रॉल के जोखिम को कम करने के लिए भले ही आप दवाइयों का सहारा ले रहे हो लेकिन जीवनशैली में कुछ बदलाव आपके लिए मददगार साबित हो सकते हैं। कोलेस्ट्रॉल को हमेशा ठीक रखना चाहते हैं तो स्वस्थ भोजन खाएं। अपने डाइट में साबूदाना, मिलेट्स, लीन प्रोटीन, फल, सब्जियां इत्यादि जरूर शामिल करें।
आहार में बदाम, अखरोट, एवोकाडो, अलसी के बीज और मछली जैसे ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर फूड्स को शामिल करें। कोलेस्ट्रॉल को कम करने में बैलेंस डाइट अहम भूमिका निभाती है। जिन फूड्स में ट्रांस फैट्स और सैचुरेटेड फैट्स कम मात्रा में पाया जाता है, ही अपनी डाइट का हिस्सा बनाएं।
एबीएन हेल्थ डेस्क। भारत में दवाओं की बढ़ती क़ीमतें आम लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस बीच जब ये पता चले की डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को कंट्रोल करने वाली कुछ दवाएं लैब टेस्ट में फेल हैं तो फिर ये चिंता का विषय है।
भारत की भारत में ड्रग रेगुलेटरी अथॉरिटी केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने 53 दवाओं को लैब क्वालिटी टेस्ट में फेल किया है। इनमें हाई ब्लड प्रेशर और टाइप-2 डायबिटीज को कंट्रोल करने वाली दवाएं भी शामिल हैं। भारत में डायबिटीज के 10 करोड़ से ज्यादा मरीज हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, आमतौर पर डायबिटीज के कुल मरीजों में से 80 फीसदी से ज्यादा टाइप-2 वाले होते हैं। इसी तरह भारत में हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों की संख्या भी 20 करोड़ है। ऐसे में अब सोचिए कि इतनी बड़ी आबादी जिस बीमारी की दवा खाती है उनकी क्लाविटी अच्छी नहीं है।
जो दवाएं टेस्ट में फेल हुई हैं उनमें हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने वाली मेडिसिन टेल्मिसर्टन और टाइप-2 डायबिटीज की दवा ग्लिमेपिराइड भी शामिल है। हालांकि इन नाम की सभी मेडिसिन फेल नहीं है, इन दवाओं को बनाने वाली दो कंपनियों की दवा की ही क्वालिटी खराब मिली है।
इस बीच यह जानना भी जरूरी है की टेस्ट में फेल दवाएं अगर कोई खा चुका है तो वह कैसे शरीर को नुकसान पहुंचाती है। क्या सभी दवाएं ही खराब हैं? इसको जानने के लिए हमने एक्सपर्ट्स से बातचीत की है। दिल्ली में मेडिसिन के डॉ अजय कुमार बताते हैं कि लैब टेस्ट में फेल होने वाली दवाएं वह होती हैं। जिनको खाने से सेहत खराब हो सकती है।
आमतौर पर दवा किडनी और लिवर को खराब करती है, चूंकि डायबिटीज और हाई बीपी की दवाएं लोग आमतौर पर हर दिन ही खाते हैं तो अगर टेस्ट में फेल दवा कोई खा चुका है तो इससे लिवर में खराबी या किडनी की कोई बीमारी होने की आशंका रहती है। हालांकि लैब टेस्ट में फेल होने का ये मतलब नहीं है कि भारत या दुनिया में मौजूद सभी ग्लिमेपिराइड और टेल्मिसर्टन दवा खराब हैं। ऐसा बिलकुल नहीं है।
डॉ कुमार बताते हैं कि हर दवा को कई कंपनियां अपने-अपने ब्रांड नेम से बनाती हैं।मैसर्स, मैस्कॉट हेल्थ सीरीज़ प्रा. लिमिटेड की ओर से बनाई जा रही ग्लिमेपिराइड लैब टेस्ट में फेल हुई है। इसी तरह स्विस गार्नियर लाइफ कंपनी की टेल्मिसर्टन फेल है। यानी सिर्फ इन कंपनी की ओर से बनाई जा रही ग्लिमेपिराइड और टेल्मिसर्टन दवाओं की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। बाकी कंपनियों की दवाएं ठीक है। उनको आप खा सकते हैं. उनसे नुकसान नहीं है।
जीटीबी हॉस्पिटल में सीनियर रेजिडेंट डॉ अंकित कुमार बताते हैं कि कई बार खराब मौसम और किसी बैक्टीरिया के दवाओं के स्टॉक में जाने से कुछ स्टॉक खराब हो जाता है। कुछ मामलों में सेंपलिंग एरर की वजह से भी दवाएं लैब टेस्ट में फेल हो जाती हैं।
ऐसे में जरूरी नहीं होता कि कंपनी की ओर से बनाई गई सभी दवाएं ही खराब हों, या आगे जो दवा बनेंगी वो भी फेल हो जाएं, ये सब जरूरी नहीं है। हालांकि फिर भी दवा कंपनियों को सभी चीजों का ध्यान रखना चाहिए। कंपनियों को स्टॉक की सही से जांच करनी चाहिए। इसके बाद ही दवाएं आम लोगों तक जानी चाहिए।
एबीएन हेल्थ डेस्क। दुनियाभर में लाखों लोगों की जान लेने वाला कोरोना वायरस एक बार फिर पैर पसार रहा है। इसी साल जून में जर्मनी के बर्लिन में कोरोना वायरस का एक नया वेरिएंट XEC (MV.1) सामने आया था, जानकारी के मुताबिक यह वेरिएंट दुनियाभर में तेज़ी से फैल रहा है।
स्क्रिप्स रिसर्च के आउटब्रेक डॉट इन्फो पेज पर 5 सितंबर को दी गयी जानकारी के मुताबिक अमेरिका के 12 राज्यों और 15 देशों में इस वेरिएंट के 95 मरीज पाये गये हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया के डाटा इंटिग्रेशन स्पेशलिस्ट माइक हनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी दी है कि यूरोप, नॉर्थ अमेरिका और एशिया के करीब 27 देशों में इस नए वेरिएंट के 100 से ज्यादा मरीजों की पहचान की जा चुकी है।
माइक हनी ने आशंका जतायी है कि आने वाले दिनों में यह वेरिएंट ओमिक्रॉन के DeFLuQE की तरह चुनौती बन सकता है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के मुताबिक इस महीने की शुरुआती दो हफ्तों में ओमिक्रॉन वेरिएंट का KP.3.1.1 स्ट्रेन (जिसे DeFLuQE के नाम से जाना जाता है) हावी रहा है।
1 से 14 सितंबर के बीच अमेरिका में इस वेरिएंट के करीब 52.7 % मरीज पाये गये हैं। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि जितनी तेजी से XEC वेरिएंट फैल रहा है, वह जल्द ही KP.3 वेरिएंट के बाद दूसरा बड़ा खतरा हो सकता है। इस वेरिएंट के लक्षण भी बुखार और सर्दी की तरह हैं। इसमें तेज बुखार आना, शरीर में दर्द, थकान, खांसी और गले में खराश महसूस हो सकती है।
इसके अलावा सांस लेने में परेशानी, सिरदर्द, स्वाद और सुगंध का पता न चलना, उल्टी और डायरिया जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। कोरोना वायरस से ग्रसित ज्यादातर लोग कुछ ही हफ्तों में ठीक महसूस करने लगते हैं लेकिन इस वेरिएंट से संक्रमित मरीज को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है।
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