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Published / 2025-05-21 20:56:36
आखिर लौट के ट्रंप घर को आये...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं। वे कब क्या कह दें, अपने कहे से मुकर जाएं, पलटी मार दें, अंदाज लगाना मुश्किल है। आपरेशन सिंदूर के बाद भारत द्वारा पाक पर ताबड़तोड़ हमले किये जाने और पाक द्वारा मुकाबला करने की नाकाम कोशिश के बाद जिन भी परिस्थितियों में सीजफायर हुआ, निष्पक्ष विश्लेषक कुछ भी आंकलन करें लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले तो सीजफायर का सारा श्रेय खुद बटोर लिया लेकिन भारत सरकार द्वारा उनके दावों, प्रतिदावों को सख्ती से खारिज किये जाने के बाद उन्होंने यह कहते हुए यूटर्न ले लिया है कि दक्षिण एशिया के इन दोनों परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के दरम्यान सीजफायर या मध्यस्थता कराने में उनकी कोई भूमिका नहीं है। 

यह साफ है कि बाइडन की ढुलमुल नीतियों और तात्कालिक परिस्थितियों के चलते ट्रंप भले ही अमेरिका में दोबारा राष्ट्रपति बन गये हैं लेकिन अब उनकी लोकप्रियता का पैमाना तेजी से खिसक रहा है। यही वजह है कि भारत पाक संघर्ष रुकवाने का सेहरा अपने सिर बांधकर वे अपनी सर्वमान्य विश्वनेता की छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जिस तरह भारत ने उनके दावे पर अपनी मोहर लगाने से इंकार कर दिया, उसके बाद उन्हें अपने कदम पीछे खिसकाना पड़े हैं। 

कश्मीर, एलओसी, पीओके और भारत पाक के संबंधों से जुड़े अन्य पहलुओं पर भारत की रीति नीति शीशे की तरह साफ है। भारत का स्पष्ट मानना है कि उसके पाक से जुड़े जो भी विवाद हैं, उन्हें सुलझाने की वह पूर्ण सामर्थ्य रखता है और किसी तीसरे देश का दखल या मध्यस्थता उसे स्वीकार नहीं है लेकिन आपरेशन सिंदूर के मध्य दोनों देशों के डीजीएमओ की बातचीत के बाद सीजफायर पर जो रजामंदी बनी, ट्रंप ने उसे अमेरिकी प्रयासों का प्रतिफल बताकर भारत की कश्मीर नीति को नए और आश्चर्यपूर्ण संदर्भ देने की कोशिश की। 

ट्रंप ने आतंकवाद और सैन्य संघर्ष को यह कहते हुए व्यापार से जोड़ दिया कि उन्होंने दोनों ही संघर्षरत देशों को बता दिया है कि यदि वे युद्ध रोकेंगे तो अमेरिका उनके साथ कारोबार करेगा। ट्रंप यह भूल गए कि भारत अपनी स्थापित नीति और देश की अखंडता और एकजुटता से जुड़े 78 वर्ष पुराने मसले को सिर्फ कारोबार के लोभ में अधबीच नहीं छोड़ सकता है। अमेरिका भले ही सुपरपावर है लेकिन विश्व राजनीति में ट्रंप के बयानों को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता। सीजफायर के बाद उन्होंने जिस तरह के वक्तव्य दिए, उनमें भारत के प्रति सम्मान तो कहीं भी परिलक्षित नहीं होता। 

उन्होंने आतंकवाद से पीड़ित भारत और आतंकियों के संरक्षक पाकिस्तान, दोनों देशों को महान बताकर बराबरी में खड़ा करने की कोशिश की। वे यह भूल गये कि भारत की सभ्यता और संस्कृति युगों पुरानी है जबकि पाक का जन्म ही 78 वर्ष पहले हुआ है। भारत ने जहां आजादी के बाद लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनाया वहीं पाक में ज्यादातर वक्त फौजी हुकूमतें रहीं, जहां जनता के सच बोलने पर हमेशा पाबंदी रही। भारतीय जनता को खुशी होती, डोनाल्ड ट्रंप यदि भारत में आतंकवाद फैलाने के लिए पाक को फटकार लगाकर न सिर्फ सुधर जाने की चेतावनी देते बल्कि आपरेशन सिंदूर को भारत का न्यायोचित कदम ठहराते। 

यह अच्छी बात है कि ट्रंप को बहुत जल्द इस बात का एहसास हो गया कि सीजफायर का श्रेय लेने की कोशिश का दुनियाभर में मजाक बन रहा है। उनके आधारहीन बयानों पर भारत की ओर से उन्हें कई बार सख्त संदेश देने पड़े, तब कहीं उन्हें अपने कहे से मुकरना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई को ही देश के नाम अपने संबोधन में साफ कर दिया था कि भारत किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा। इसके बाद हमारे विदेश मंत्रालय ने भी कह दिया था कि ट्रंप नहीं बल्कि भारत ने अपनी शर्तों पर पाकिस्तान के साथ सैन्य कार्रवाई को स्थगित करने का फैसला किया है। 

भारत ने बार बार स्पष्ट रूप से कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और पाक को पीओके खाली करना ही होगा। ट्रंप का यह दावा भी सच की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है कि भारत ने उन्हें शून्य टैरिफ का आफर दिया है, असलियत यह है कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता अभी चल ही रही है। अभी तलक कोई निष्कर्ष नहीं निकला है लेकिन भारत का मानना है कि कोई भी डील दोनों देशों के लिए फायदेमंद होनी चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि व्यापार से एक देश को फायदा हो और दूसरे को नुकसान। दुनिया को भ्रम में डालने वाले ट्रंप के बयानों पर भारत ने जो त्वरित काउंटर स्टैंड अपनाया, यह अपने पैरों पर खड़े एक मजबूत देश की मजबूत विदेश नीति का द्योतक है।

Published / 2025-05-15 21:17:34
आखिर पाक में बार-बार क्यों आ रहे हैं भूकंप?

क्या पाकिस्तान में हुई परमाणु बम टेस्टिंग? उठे गंभीर सवाल 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। हाल ही में पाकिस्तान में बार-बार महसूस किये गये भूकंप के झटकों ने केवल जमीन ही नहीं, लोगों के मन में भी हलचल पैदा कर दी है। बीते कुछ दिनों में वहां 3-4 बार भूकंप आ चुके हैं, लेकिन इन झटकों को लेकर इस बार सोशल मीडिया पर अटकलों का बाजार गर्म है। 

कई यूजर्स ने दावा किया कि ये झटके प्राकृतिक नहीं, बल्कि पाकिस्तान द्वारा गुपचुप तरीके से किए गए परमाणु परीक्षण का नतीजा हैं। यहां तक कि कुछ लोगों ने इसे इस्लामाबाद तक असर करने वाली हाई इंटेंसिटी एक्टिविटी बताया है। 

क्या सच में हुआ है परमाणु परीक्षण? 

सोशल मीडिया पर चल रहे इन दावों को लेकर आम लोगों के मन में सवाल उठने लाजमी हैं। पाकिस्तान का परमाणु इतिहास भी इन अफवाहों को हवा देता है - साल 1998 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के चगाई हिल्स में भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था। 

ऐसे परीक्षण जमीन के अंदर होने के कारण भूकंप जैसी तरंगें उत्पन्न करते हैं जिन्हें सीस्मोग्राफ आसानी से पकड़ लेता है। इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के भूकंप आम भूकंप नहीं, बल्कि किसी संभावित सैन्य गतिविधि का नतीजा भी हो सकते हैं। 

एनसीएस की प्रतिक्रिया 

हालांकि, इस पूरे मामले पर नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (एनसीएस) के निदेशक ओपी मिश्रा ने स्थिति साफ करते हुए इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि प्राकृतिक भूकंप और परमाणु विस्फोटों के बीच फर्क करना संभव है, और हालिया झटकों की प्रकृति पूरी तरह से प्राकृतिक रही है। 

सबसे पहले एक तेज और चौंधियाने वाली चमक उत्पन्न होती है। इसके बाद आती है शॉकवेव, जो कई सौ किमी प्रति घंटे की रफ्तार से फैलती है। नजदीकी इलाकों में यह लहर इतनी घातक होती है कि इमारतें चकनाचूर हो जाती हैं, लोगों के शरीर पर आंतरिक प्रभाव होता है— जैसे फेफड़ों को नुकसान, कानों के पर्दे फटना, और भारी रक्तस्राव। कांच, ईंट, लकड़ी के टुकड़े जैसे मलबे से भी व्यापक नुकसान होता है।

Published / 2025-05-14 21:59:19
अमेरिका बोला : पाक के न्यूक्लियर ठिकाने में रेडिएशन लीक

पाक न्यूक्लियर ठिकाने में रेडिएशन लीक! आया अमेरिका का बड़ा बयान 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत की हालिया एयरस्ट्राइक आपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने किराना हिल्स को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह सनसनी अफवाहें फैल गयी। 

दावे किये गये कि भारत की कार्रवाई से वहां रेडियोएक्टिव रिसाव शुरू हो गया और स्थिति की जांच के लिए एक अमेरिकी विमान भी मौके पर भेजा गया। इन खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी थी। अब इन अटकलों पर अमेरिका ने पहली बार आधिकारिक बयान जारी किया है, जिससे इस पूरे घटनाक्रम पर नयी बहस छिड़ गयी है। 

अमेरिका ने क्या कहा? 

अमेरिकी विदेश विभाग के मुख्य उप प्रवक्ता थॉमस पिगॉट ने 13 मई को एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमारे पास इस विषय पर फिलहाल कोई पूर्वावलोकन करने लायक जानकारी नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल अमेरिका इन दावों की पुष्टि नहीं कर रहा है। 

आपरेशन सिंदूर और परमाणु ठिकानों के नजदीक हमले 

आपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्तान के कई प्रमुख एयरबेस — सरगोधा और नूर खान एयरबेस — पर सटीक हवाई हमले किये थे। यही दोनों ठिकाने पाकिस्तान के परमाणु ढांचे के काफी करीब माने जाते हैं: 

  • नूर खान एयरबेस: पाकिस्तान के न्यूक्लियर कमांड सेंटर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित। 
  • सरगोधा एयरबेस: किराना हिल्स से लगभग 20 किमी दूर। 
  • यही वजह है कि इन हवाई हमलों के बाद सोशल मीडिया और कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों ने दावा किया कि भारत ने किराना हिल्स के न्यूक्लियर साइट पर हमला किया, जिससे रेडियोएक्टिव रिसाव हुआ। 

भारत की सफाई और सेना का खंडन 

इन दावों को लेकर भारतीय सेना की ओर से पहले ही स्पष्ट बयान आ चुका है कि ऐसा कोई हमला नहीं किया गया, जिससे किराना हिल्स की परमाणु फैसिलिटी को नुकसान पहुंचा हो। भारतीय सेना ने इन खबरों को अफवाह और भ्रम फैलाने वाला बताया था। 

अमेरिका ने की भारत-पाक शांति प्रयासों की सराहना 

अमेरिका ने सीजफायर की दिशा में भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रयासों की सराहना की है। पिगॉट ने बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों — नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ — की बुद्धिमत्ता और दृढ़ता की तारीफ की है। थॉमस पिगॉट ने कहा, हम इस बात से उत्साहित हैं कि दोनों देश संवाद की राह पर हैं और हम इसी दिशा में उनके प्रयासों को समर्थन देते हैं। 

अमेरिका की प्राथमिकता : शांति 

अमेरिका ने यह भी दोहराया कि उसका ध्यान सीधे संवाद और स्थिरता पर केंद्रित है। पिगॉट ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका फर्स्ट एजेंडे के साथ-साथ शांति को भी प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने हमेशा संघर्ष समाप्त करने की मंशा दिखायी है।

Published / 2025-05-11 22:02:03
नये पोप का संदेश : कभी युद्ध न हो...

पोप लियो 14वें का पहला संदेश : अब कभी युद्ध न हो 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। पोप लियो 14वें ने रविवार को अपने पहले आधिकारिक आशीर्वचन के दौरान विश्व समुदाय से  यूक्रेन में स्थायी शांति और गाजा में युद्धविराम व बंधकों की रिहाई  की अपील की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,  अब कभी युद्ध न हो। 

सेंट पीटर्स बेसिलिका के ऐतिहासिक बरामदे से बोलते हुए उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ का स्मरण किया और कहा कि दुनिया में चल रहे तमाम संघर्ष इस समय टुकड़ों-टुकड़ों में तीसरे विश्व युद्ध की स्थिति बना रहे हैं। यह वक्तव्य उन्होंने अपने पूर्ववर्ती पोप फ्रांसिस के शब्दों को उद्धृत करते हुए दिया। 

गौरतलब है कि पोप लियो 14वें अमेरिका से निर्वाचित होने वाले पहले पोप हैं। गुरुवार की रात उनके निर्वाचन की घोषणा के समय भी उन्होंने शांति का संदेश दिया था। यह रविवार पहला अवसर था जब वे पोप बनने के बाद दोबारा सार्वजनिक रूप से सेंट पीटर्स बेसिलिका के बरामदे पर लौटे।

Published / 2025-05-10 19:44:45
वेटिकन न्यूज के अनुसार पोप लियो 14वें का उद्घाटन मिस्सा 18 मई को

टीम एबीएन, रांची। होली सी ने नये निर्वाचित पोप लियो 14वें के आगामी कार्यक्रम की घोषणा की है। उनका उद्घाटन मिस्सा (प्रथम धार्मिक समारोह) रविवार, 18 मई को सुबह 10 बजे रोम के समयानुसार सेंट पीटर्स स्क्वायर में आयोजित किया जायेगा। 

पहले तीन हफ्तों का कार्यक्रम इस प्रकार है: 

  • 10 मई, शनिवार : कार्डिनलों से मुलाकात 
  • 11 मई, रविवार : सेंट पीटर्स बैसिलिका की बालकनी से रेजिना काइली प्रार्थना 
  • 12 मई, सोमवार : अंतरराष्ट्रीय प्रेस से मुलाकात 
  • 16 मई, शुक्रवार : दुनियाभर के राजनयिक प्रतिनिधियों से मुलाकात 
  • 18 मई, रविवार : सुबह 10:00 बजे, सेंट पीटर्स स्क्वायर में पोप के कार्यकाल की शुरुआत का पवित्र मिस्सा  
  • 20 मई, मंगलवार : सेंट पॉल आउटसाइड द वॉल्स बैसिलिका का आधिकारिक अधिग्रहण 
  • 21 मई, बुधवार : पहली सार्वजनिक आम सभा 
  • 24 मई, शनिवार : रोमन कुरिया (वेटिकन के प्रशासनिक विभाग) और वेटिकन सिटी के कर्मचारियों से मुलाकात 
  • 25 मई, रविवार : रेजिना काइली प्रार्थना, सेंट जॉन लेटरन बैसिलिका का अधिग्रहण, सेंट मैरी मेजर बैसिलिका का अधिग्रहण 

एक अन्य बयान में प्रेस आफिस ने बताया कि पोप ने रोमन कुरिया, वेटिकन सिटी स्टेट की पोन्शिफिकल कमीशन के अध्यक्ष व सचिवों से कहा है कि वे फिलहाल अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते रहें जब तक कोई नया आदेश नहीं आता। 

पोप लियो कश् ने यह भी कहा है कि वे थोड़ा समय प्रार्थना, सोच-विचार और बातचीत के लिए लेना चाहते हैं ताकि वे भविष्य में किसी पद की स्थायी नियुक्ति या पुष्टि कर सकें।

Published / 2025-05-09 14:53:42
जानें कौन हैं पोप लिओ 14वें...

  • जानें पोप लिओ 14वें की जीवनी

धर्माध्यक्ष रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट

एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। धर्माध्यक्ष रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट का जन्म 14 सितंबर 1955 को अमेरिका के शिकागो, इलिनोइस में हुआ। उन्होंने 1977 में सेंट ऑगस्टीन धर्मसंघ (ऑर्डर ऑफ सेंट ऑगस्टीन - OSA) के नवशिष्यालय में प्रवेश किया और 29 अगस्त 1981 को अपनी धार्मिक प्रतिज्ञा पूरी की। इसके पश्चात उन्होंने शिकागो स्थित कैथोलिक थियोलॉजिकल यूनियन से धर्मशास्त्र में स्नातक डिग्री प्राप्त की।

27 वर्ष की आयु में, उन्हें रोम भेजा गया जहाँ उन्होंने पोंटिफिकल यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट थॉमस एक्विनास (एंजेलिकम) से कैनन लॉ में अध्ययन किया। 19 जून 1982 को वे पुरोहित अभिषिक्त हुए। उन्होंने 1984 में कैनन लॉ में अपनी स्नातकोत्तर डिग्री (लाइसेंस) पूर्ण की और फिर उन्हें पेरू के चुलुकानास मिशन में सेवा हेतु भेजा गया (1985-1986)।

1987 में उन्होंने द रोल ऑफ द लोकल प्रायर ऑफ द ऑर्डर ऑफ सेंट ऑगस्टीन विषय पर शोध कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। अगले वर्ष उन्हें पेरू के ट्रूजिलो मिशन में भेजा गया, जहाँ वे चुलुकानास, इक्विटोस और अप्यूरिमैक विकारीएट के ऑगस्टिनियन उम्मीदवारों के प्रशिक्षण परियोजना के निदेशक नियुक्त हुए। यहाँ उन्होंने समुदाय के सुपीरियर (1988-1992), प्रशिक्षण निदेशक (1988-1998) और प्रोफेसर (1992-1998) जैसे कई महत्वपूर्ण दायित्व निभाए।

ट्रूजिलो महाधर्मप्रांत में वे न्यायिक विकर (1989-1998) रहे, और संत कार्लोस तथा संत मार्सेलो मेजर सेमिनरी में कैनन लॉ, धर्मसंघ शास्त्र और नैतिक शिक्षा के प्राध्यापक के रूप में योगदान दिया।

1999 में उन्हें मदर ऑफ गुड काउंसिल प्रांत का प्रांतीय अध्यक्ष चुना गया। कुछ वर्षों बाद, उन्हें धर्मसंघ का सुपीरियर जनरल नियुक्त किया गया। अक्टूबर 2013 में वे पुनः अपने प्रांत में लौटे, जहाँ उन्होंने प्रोफेसर और प्रांतीय विकर की भूमिका निभाई।

3 नवंबर 2014 को संत पापा फ्राँसिस ने उन्हें पेरू के चिकलेयो धर्मप्रांत का प्रेरितिक प्रशासक नियुक्त किया, साथ ही उन्हें सूफ़र धर्मप्रांत का धर्माध्यक्ष नामित किया गया। उनका धर्माध्यक्षीय अभिषेक 12 दिसंबर को महाधर्मदूत जेम्स पैट्रिक ग्रीन की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।

26 सितंबर 2015 से वे चिकलेयो के धर्माध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। मार्च 2018 से वे पेरू के धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के द्वितीय उपाध्यक्ष हैं। संत पापा फ्राँसिस ने उन्हें 2019 में पुरोहितों की धर्मसंघ का सदस्य और 2020 में धर्माध्यक्षीय धर्मसंघ का सदस्य नियुक्त किया।

Published / 2025-05-09 14:49:40
लियो XIV नये पोप हैं...

  • आप सभी के साथ शांति हो! - पोप लियो XIV के पहले शब्द

एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। कॉन्क्लेव ने रॉबर्ट फ्रांसिस कार्डिनल प्रीवोस्ट को रोम के 267वें बिशप के रूप में चुना है। नए पोप की घोषणा प्रतीक्षारत भीड़ के लिए कार्डिनल प्रोटोडेकॉन डोमिनिक मैम्बर्टी द्वारा की गयी।

पोप लियो XIV (जन्म रॉबर्ट फ्रांसिस प्रीवोस्ट, 14 सितंबर 1955) एक अमेरिकी कैथोलिक प्रेलेट हैं जो 8 मई 2025 से कैथोलिक चर्च के प्रमुख और वेटिकन सिटी राज्य के संप्रभु रहे हैं। उन्होंने 2023 से बिशप्स के डिकैस्टरी के प्रीफेक्ट और लैटिन अमेरिका के पोंटिफिकल कमीशन के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। 

इससे पहले वे 2015 से 2023 तक पेरू में चिकलायो के बिशप रहे, और 2001 से 2013 तक सेंट ऑगस्टीन के ऑर्डर के प्रायर जनरल रहे। 2015 में कार्डिनल प्रीवोस्ट पेरू के नागरिक बन गये। जैसा कि पेरू के नेशनल सिविल रजिस्ट्री द्वारा पुष्टि की गयी। 8 मई 2025 को, उन्हें पोप चुना गया, और उन्होंने पापल नाम लियो XIV चुना।

शिकागो में जन्मे प्रीवोस्ट ने अपने करियर की शुरुआत ऑगस्टिनियन के लिए काम करते हुए की। उन्होंने 1985 से 1986 और 1988 से 1998 तक पेरू में एक पैरिश पादरी, धर्मप्रांत अधिकारी, सेमिनरी शिक्षक और प्रशासक के रूप में कार्य किया।

2023 में उन्हें कार्डिनल बनाया गया और पोप फ्रांसिस ने उन्हें बिशप्स के डिकैस्टरी के प्रीफेक्ट के रूप में नियुक्त किया, जो एक प्रमुख भूमिका है।

Published / 2025-05-06 22:10:21
वाटिकन सिटी में अधिकारियों और कर्मचारियों ने ली गोपनीयता की शपथ

एबीएन सेंट्रल डेस्क। वाटिकन सिटी में 5 मई 2025 को पौलाईन चैपल में कॉन्क्लेव से पहले अधिकारियों और कर्मचारियों ने गोपनीयता की शपथ ली। यह शपथ पोप जॉन पॉल द्वितीय द्वारा 1996 में निर्धारित नियमों के अनुसार दिलायी गयी। जिसका उद्देश्य नये संत पापा के चुनाव की प्रक्रिया की पूर्ण अखंडता बनाये रखना है। 

इस समारोह की अध्यक्षता कैमरलेन्गो कार्डिनल केविन जोसेफ फैरेल ने की, जिसमें याजक और लोकधर्मी दोनों शामिल थे। इस दल में विभिन्न भूमिकाओं वाले लोग जैसे कार्डिनलमंडल के सचिव, चिकित्सा कर्मी, तकनीकी स्टाफ, स्विस गार्ड और अन्य सहायक कर्मचारी शामिल थे। सभी ने एक निर्धारित सूत्र का उच्चारण कर हस्ताक्षर किया, जिसमें यह प्रतिज्ञा थी कि वे चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी किसी भी जानकारी को गोपनीय रखेंगे। 

इस शपथ में यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी प्रकार की आॅडियो या वीडियो रिकॉर्डिंग पर पूर्ण निषेध है, और उल्लंघन पर स्वचालित बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन) का प्रावधान है। यह समारोह कलीसिया की पारदर्शिता, गोपनीयता और निष्ठा के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता को दशार्ता है। कॉन्क्लेव का कार्यक्रम निम्नलिखित है: 

7 मई, 2025  

  • सुबह 10 बजे नये पोप के चुनाव के लिए सेंट पीटर बेसिलिका में पवित्र मिस्सा (प्रो एलिजेंडो रोमानो पोंटिफिस) 
  • शाम 4:15 बजे: कार्डिनल पॉलिन चैपल में इकट्ठे होते हैं 
  • शाम 4:30 बजे: सिस्टीन चैपल में कॉन्क्लेव शुरू करने के लिए जुलूस

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