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Published / 2026-02-18 21:03:38
एआई इंपैक्ट : फ्रांस ने खोले भारतीयों के द्वार

फ्रांस का एआई इंपैक्ट सम्मिट में बड़ा ऐलान ! मैक्रों ने भारतीय छात्रों के लिए खोले द्वार, दिया बड़ा उपहार 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron ने भारतीय छात्रों के लिए बड़ी राहत का ऐलान करते हुए कहा है कि फ्रांस वीज़ा और सोर्सिंग प्रक्रिया को सरल बनाएगा और अधिक शैक्षणिक पाठ्यक्रम इंग्लिश में उपलब्ध कराएगा। यह घोषणा उन्होंने नई दिल्ली में भारत-फ्रांस शैक्षणिक और वैज्ञानिक सहयोग पर उच्चस्तरीय बैठकों के दौरान की। 

2030 तक 30 हजार छात्रों का लक्ष्य

AIIMS परिसर में संबोधन के दौरान मैक्रों ने कहा कि फिलहाल हर साल लगभग 10,000 भारतीय छात्र फ्रांस जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर यह संख्या 2030 तक बढ़ाकर 30,000 प्रति वर्ष करने का फैसला लिया गया है। इसके लिए फ्रांस की ओर से वीज़ा प्रक्रिया को ज्यादा व्यावहारिक और छात्रों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाया जाएगा।

AIIMS में इंडो-फ्रेंच AI कैंपस का उद्घाटन

इस अवसर पर मैक्रों और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री JP Nadda ने All India Institute of Medical Sciences में Indo-French Campus on AI in Global Health का उद्घाटन किया। यह पहल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हेल्थकेयर समाधान, रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा देने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

इंग्लिश में पढ़ाई, वर्ल्ड-क्लास रिसर्च

मैक्रों ने भरोसा दिलाया कि फ्रांस आने वाले भारतीय छात्रों को विश्वस्तरीय शिक्षण, अत्याधुनिक रिसर्च सेंटर्स और मजबूत इंटर-डिसिप्लिनरी सहयोग मिलेगा। उन्होंने कहा कि फ्रांस विभिन्न विषयों में इंग्लिश-टॉट प्रोग्राम्स की पेशकश करेगा ताकि भारतीय छात्रों के लिए उच्च शिक्षा और अधिक सुलभ हो सके। इंडो-फ्रेंच AI कैंपस का उद्देश्य न केवल ग्लोबल हेल्थ में AI के उपयोग को आगे बढ़ाना है, बल्कि दोनों देशों के बीच अकादमिक उत्कृष्टता, छात्र आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को भी नई मजबूती देना है।

Published / 2026-02-12 12:08:48
रूस में सोशल मीडिया के कई विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर बन

  • रूस में सोशल मीडिया पर बड़ी कार्रवाई: व्हाट्सएप, यूट्यूब और इंस्टाग्राम समेत कई विदेशी प्लेटफॉर्म पर लगी रोक

एबीएन सेंट्रल डेस्क। रूस में कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच अचानक बंद हो गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म अब देश के भीतर काम नहीं कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन वेबसाइट्स के डोमेन नाम रूस के राष्ट्रीय डोमेन नेम सिस्टम (DNS) से हटा दिए गए हैं।

इससे पहले रूस में कुछ प्लेटफॉर्म की स्पीड धीमी कर दी जाती थी, लेकिन इस बार स्थिति अलग है। मौजूदा कदम के तहत ये वेबसाइटें पूरी तरह अदृश्य हो गई हैं। जब कोई यूजर इन साइट्स को खोलने की कोशिश करता है तो सिस्टम संबंधित IP एड्रेस खोज नहीं पाता। नतीजतन स्क्रीन पर एरर मैसेज दिखाई देता है कि ऐसा डोमेन मौजूद ही नहीं है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ही नहीं बल्कि कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की वेबसाइट्स भी प्रभावित हुई हैं। इनमें बीबीसी, डॉउचा वेले, रेडियो फ्री यूरोप रेडियो लिबर्टी जैसी साइट्स शामिल हैं। इसके अलावा गुमनाम ब्राउजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाला टॉर ब्राउजर (Tor Browser) भी ब्लॉक कर दिया गया है।

राष्ट्रीय DNS सिस्टम के तहत सख्ती
रूस में इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को देश के राष्ट्रीय DNS सिस्टम का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। यह सिस्टम Roskomnadzor नामक सरकारी एजेंसी की निगरानी में काम करता है, जो सॉवरेन इंटरनेट कानून के तहत इंटरनेट कंट्रोल को लागू करता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से ही रूस ने Google DNS जैसी वैकल्पिक DNS सेवाओं के उपयोग को भी धीरे-धीरे सीमित करना शुरू कर दिया था। अब ताजा कदम को इंटरनेट नियंत्रण की दिशा में एक बड़ा और कड़ा फैसला माना जा रहा है।

विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर कड़ा शिकंजा

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई रूस में विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और मीडिया आउटलेट्स की पहुंच को लगभग खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे देश के अंदर रहने वाले लोग कई वैश्विक सेवाओं और खबरों के स्रोतों से कट गए हैं।

Published / 2026-02-05 17:45:49
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में भारत ग्लोबर स्टार और पाकिस्तान महाकंगाल

विश्व बैंक रिपोर्ट : अर्थव्यवस्था महायुद्ध में भारत ग्लोबल स्टार, पाकिस्तान दाने-दाने को मोहताज 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। एक नयी रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड महामारी के बाद भारत और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्थाओं ने बिल्कुल अलग दिशा पकड़ी है। जहां पाकिस्तान कई वर्षों से आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, वहीं भारत तेजी से बढ़ते हुए विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2022 में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में 6% की बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन यह वृद्धि लंबे समय तक टिक नहीं पाई। 

2023 में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति लगभग ठहर सी गई और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने केवल 0.5% विकास का अनुमान लगाया। इसके विपरीत भारत की अर्थव्यवस्था 2023 में 6% से अधिक बढ़ी और इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की उजली किरण माना गया। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान की समस्याओं को उसके ही देश के अंदरूनी स्तर पर भी स्वीकार किया जा रहा है। 

इस्लामाबाद में हुए एक बिजनेस कार्यक्रम में विशेष निवेश सुविधा परिषद (एसआईएफसी) के राष्ट्रीय समन्वयक लेफ्टिनेंट-जनरल सरफराज अहमद ने कहा था कि पाकिस्तान के पास कोई विकास योजना नहीं है और देश की वित्तीय स्थिति बुरी तरह बिगड़ी हुई है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या महंगाई रही है। 

2022 से 2023 के बीच महंगाई दर 37.97% तक पहुंच गयी, जो पिछले 30 वर्षों में सबसे ज्यादा मानी जा रही है। इससे आम लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गयी और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें बढ़ गयीं। विश्व बैंक के अनुसार महंगाई के कारण लगभग 13 मिलियन पाकिस्तानियों को गरीबी में गिरना पड़ा। 

2023-24 तक गरीबी दर बढ़कर 25.3% हो गयी, यानी लगभग हर चार में से एक व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय गरीबी मानक (दैनिक 4 डॉलर से कम) लागू किया जाये तो पाकिस्तान की लगभग 45% आबादी गरीब मानी जा सकती है। भारत में भी इस अवधि में महंगाई रही, लेकिन यह पाकिस्तान की तुलना में काफी कम थी। भारत में 2023 में मुद्रास्फीति 5-6% के आसपास थी और 2024 में यह और कम हुई।

2023 के अंत में भारत में खुदरा महंगाई 5% से नीचे आ गयी, खासकर खाद्य कीमतों के नियंत्रण के कारण। रिपोर्ट में कहा गया है कि एक औसत पाकिस्तानी उपभोक्ता को भारत के मुकाबले लगभग पांच गुना अधिक महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। गरीबी के मामले में भी भारत ने बड़ी प्रगति की है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में दैनिक 4 डॉलर से कम पर जीने वाले लोगों की संख्या 2023 तक 16% से घटकर 2.3% रह गयी है।

Published / 2026-02-04 21:22:58
शांति वार्ता से पहले रूस ने यूक्रेन को किया तबाह

अबू धाबी में शांति वार्ता से पहले रूस का बड़ा हमला: यूक्रेन पर 450 ड्रोन 70 से ज्यादा मिसाइलें दागीं, ऊर्जा संयंत्र किये तबाह 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। यूक्रेन और रूस के बीच शांति वार्ता की तैयारी के बीच रूस ने मंगलवार को यूक्रेन पर एक बड़े पैमाने पर हमला किया। इस हमले में 450 से अधिक ड्रोन और 70 से अधिक विभिन्न मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। हमला विशेष रूप से यूक्रेन के ऊर्जा संयंत्रों और पावर ग्रिड को निशाना बनाकर किया गया, जिससे देश के कई हिस्सों में बिजली गुल हो गई और ठंड में हजारों लोगों की मुश्किलें बढ़ गयी। यह हमला ऐसे समय हुआ जब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के अबू धाबी में बुधवार और गुरुवार को शांति वार्ता होने वाली है। 

इस वार्ता में रूस, यूक्रेन और अमेरिका के अधिकारी हिस्सा लेंगे और इसका उद्देश्य लगभग चार वर्षों से जारी युद्ध को समाप्त करना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने लंबे समय से इस वार्ता के जरिए संघर्ष को खत्म करने का प्रयास किया है। यूक्रेनी ऊर्जा मंत्री ने बताया कि बीती रात की हवाई हमलों में राजधानी कीव और देश के दूसरे सबसे बड़े शहर खार्किव सहित आठ क्षेत्रों पर हमला किया गया। 

इसके कारण बिजली आपूर्ति ठप हो गयी और शून्य से 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान में रहने वाले लोगों की परेशानियां बढ़ गयीं। यूक्रेनी अधिकारियों ने कहा कि इस हमले में नौ लोग घायल हुए हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने इसे रूस की रणनीति बताया और कहा, भीषण ठंड का फायदा उठाकर लोगों को आतंकित करना रूस की रणनीति है। ऊर्जा संयंत्रों को जानबूझकर निशाना बनाया गया, जिसमें रिकॉर्ड संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल हुआ। 

जेलेंस्की ने सहयोगी देशों से अधिक वायु रक्षा प्रणाली मुहैया कराने और रूस पर अधिकतम दबाव डालने का आग्रह किया, ताकि 24 फरवरी 2022 को शुरू हुए युद्ध को समाप्त किया जा सके। नाटो महासचिव ने भी कीव का दौरा किया और कहा कि शांति वार्ता से पहले हुए ये हमले रूस के इरादों पर संदेह पैदा करते हैं। 

उन्होंने इसे शांति प्रयासों के लिए बेहद बुरा संकेत बताया। हालांकि, युद्ध के सबसे बड़े विवाद  रूस के कब्जे वाली यूक्रेनी जमीन  को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। इसी मुद्दे पर वार्ता में हल निकालना सबसे बड़ा लक्ष्य है, लेकिन फिलहाल किसी व्यापक समझौते की संभावना कम दिखाई दे रही है।

Published / 2026-01-27 15:43:55
सीएम का विदेश दौरा : लंदन में स्थापित बापू की प्रतिमा को सीएम हेमंत ने किया नमन...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर लंदन स्थित पार्लियामेंट स्क्वायर में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावपूर्ण नमन किया। 

बापू के सत्य और अहिंसा के आदर्श आज भी हमें उद्देश्य के साथ नेतृत्व करने, समाज की सेवा करने और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।  इस अवसर पर झारखंड राज्य से यहां पढ़ने वाले स्कॉलर्स, डायस्पोरा के सदस्यों एवं अन्य उपस्थित लोगों से मिलना हुआ।

Published / 2026-01-26 22:09:00
ट्रंप की नीतियां बढ़ा रही सोने और चांदी के दाम

  • ट्रंप की नीतियों से सोने के दामों में बढ़ोतरी, पहली बार बनाया नया रिकॉर्ड

एबीएन बिजनेस डेस्क। दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच निवेशकों का रुझान एक बार फिर सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ता दिख रहा है। इसी कड़ी में सोने की कीमतों ने नया इतिहास रच दिया है। रविवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना पहली बार 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर गया। 

कारोबार के दौरान इसकी कीमत 5,026 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई। सोने के साथ-साथ चांदी में भी जबरदस्त तेजी देखने को मिली। शुक्रवार को चांदी की कीमत पहली बार 102 डॉलर प्रति औंस से ऊपर चली गई थी। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से ही कीमती धातुओं के भाव लगातार मजबूत बने हुए हैं।

ट्रंप की नीतियां 

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति, खासतौर पर ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयानों और फेडरल रिजर्व पर बढ़ते राजनीतिक दबाव ने बाजारों में बेचैनी बढ़ा दी है। इसके चलते निवेशक डॉलर और बॉन्ड से दूरी बनाकर सोने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

 इसके अलावा बीते दो वर्षों से कमजोर अमेरिकी डॉलर, केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीद और लगातार ऊंची बनी महंगाई ने भी सोने की कीमतों को मजबूत सहारा दिया है। जनवरी 2024 में जहां सोना करीब 2,000 डॉलर प्रति औंस पर था, वहीं अब यह ढाई गुना से ज्यादा बढ़ चुका है।

यूरोप-अमेरिका तनाव और डॉलर पर दबाव

हाल ही में ट्रंप द्वारा कुछ यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की धमकियों से पीछे हटने के बावजूद अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव कम नहीं हुआ है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी रुख ने व्यापार युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी है। इसका सीधा असर डॉलर पर पड़ा, जो यूरो के मुकाबले चार महीने के निचले स्तर पर आ गया। वहीं, सोने की कीमतों में और तेजी आई।

सैक्सो यूके के निवेश रणनीतिकार नील विल्सन का कहना है कि जैसे-जैसे वैश्विक राजनीति में तनाव बढ़ा है, वैसे-वैसे सोना नए रिकॉर्ड बनाता चला गया। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड में संभावित अमेरिकी सैन्य गतिविधियों को अब बाजार पहले की तरह नजरअंदाज नहीं कर रहा।

फेड की बैठक पर टिकी नजर

इस हफ्ते होने वाली अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की नीति बैठक को लेकर भी बाजार सतर्क हैं। हाल ही में फेड चेयरमैन जेरोम पॉवेल को भेजे गए कानूनी नोटिस के बाद बैंक की स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप पहले भी कई मौकों पर पॉवेल की नीतियों और महंगाई को लेकर उनकी टिप्पणियों की आलोचना कर चुके हैं।

हालांकि, दुनिया के कई बड़े केंद्रीय बैंकों के प्रमुखों ने फेड और पॉवेल के समर्थन में बयान दिए हैं। स्वतंत्र विश्लेषक स्टीफन इन्स के मुताबिक, केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को लेकर बनी अनिश्चितता ने सोने की कीमतों को दीर्घकालिक मजबूती दी है।

Published / 2026-01-24 16:14:52
यूएस-ईरान तकरार का अब इंटरनेशनल हवाई सेवा पर असर

यूएस-ईरान तनाव चरम पर: प्रमुख यूरोपीय एयरलाइनों ने रोकीं मिडिल ईस्ट की उड़ानें 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिका और ईरान के बीच तेजी से बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवाओं पर भी साफ दिखने लगा है। यूरोप की प्रमुख एयरलाइनों केएलएम, लुफ्थांसा और एयर फ्रांस ने मिडिल ईस्ट के कई महत्वपूर्ण गंतव्यों के लिए अपनी उड़ानें अस्थायी रूप से निलंबित कर दी हैं। 

इन गंतव्यों में दुबई, रियाद, दम्माम और तेल अवीव जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। एयरलाइनों ने यह कदम क्षेत्र में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और यात्रियों व क्रू की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया है। जानकारी के मुताबिक, फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती बढ़ने और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता के माहौल ने एयरलाइनों की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। 

एयरलाइनों का कहना है कि वे हालात पर लगातार नजर बनाये हुए हैं और स्थिति सामान्य होने पर ही सेवाएं बहाल की जायेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका-ईरान टकराव और गहराता है, तो मिडिल ईस्ट के हवाई मार्गों पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय यात्रियों और वैश्विक एविएशन सेक्टर को भारी नुकसान होने की आशंका है।

Published / 2026-01-17 18:31:20
कोरोना के बाद नोरोवायरस से दहशत फैला रहा चीन

कोरोना के बाद अब नोरोवायरस से चीन में हड़कंप,  एक स्कूल में 100 से ज्यादा छात्र संक्रमित 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। चीन में एक बार फिर वायरस को लेकर चिंता बढ़ गयी है। कोविड-19 के बाद अब नोरोवायरस ने लोगों में दहशत पैदा कर दी है। दक्षिणी चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में स्थित फोशान शहर के एक सीनियर हाई स्कूल में 100 से ज्यादा छात्र इस वायरस की चपेट में आ गये हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, कुल 103 छात्रों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। 

स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि राहत की बात यह है कि सभी संक्रमित छात्रों की हालत सामान्य है। किसी भी छात्र को गंभीर समस्या नहीं हुई है और न ही किसी तरह की मौत की सूचना है। एहतियात के तौर पर स्कूल परिसर को पूरी तरह से सैनिटाइज कर दिया गया है और छात्रों की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है। 

नोरोवायरस के लक्षण 

संक्रमित छात्रों में पेट से जुड़ी परेशानियां सामने आयी हैं। उन्हें उल्टी और दस्त जैसी दिक्कतें हुईं, जो नोरोवायरस के आम लक्षण माने जाते हैं। सभी छात्रों को जरूरी इलाज दिया जा रहा है और वे चिकित्सकों की निगरानी में हैं। साथ ही यह पता लगाने के लिए जांच भी चल रही है कि वायरस किस वजह से फैला। 

ग्वांगडोंग प्रांत के रोग नियंत्रण विभाग के अनुसार, इस इलाके में हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच नोरोवायरस के मामले ज्यादा सामने आते हैं। ठंड के मौसम में यह वायरस तेजी से फैलता है और खासतौर पर स्कूलों, हॉस्टल और भीड़भाड़ वाली जगहों पर इसका खतरा बढ़ जाता है। 

नोरोवायरस एक बेहद संक्रामक वायरस है, जो पेट के संक्रमण का कारण बनता है। इसे आम बोलचाल में स्टमक फ्लू भी कहा जाता है, हालांकि इसका फ्लू से कोई सीधा संबंध नहीं होता। इस वायरस से संक्रमित होने पर अचानक उल्टी, दस्त, पेट दर्द और कमजोरी महसूस होती है। यह वायरस बहुत तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है, खासकर दूषित खाने, पानी या संक्रमित सतहों के संपर्क में आने से। 

हर साल करोड़ों लोग नोरोवायरस से प्रभावित 

दुनिया भर में हर साल करोड़ों लोग नोरोवायरस से प्रभावित होते हैं। आंकड़ों के अनुसार, सालाना करीब 68 करोड़ से ज्यादा लोग इसकी चपेट में आते हैं। इनमें 5 साल से कम उम्र के लगभग 20 करोड़ बच्चे शामिल होते हैं। यह वायरस हर साल करीब 2 लाख लोगों की जान भी ले लेता है, जिनमें करीब 50 हजार बच्चे होते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों में देखने को मिलता है, जहां इलाज की सुविधाएं सीमित होती हैं। 

आर्थिक रूप से भी यह वायरस दुनिया को भारी नुकसान पहुंचाता है। इलाज और कामकाज के नुकसान को मिलाकर हर साल करीब 60 अरब डॉलर का आर्थिक असर पड़ता है। अमेरिका में तो यह वायरस खाने से फैलने वाली बीमारियों की सबसे बड़ी वजह माना जाता है। 

नोरोवायरस का पहला बड़ा मामला

नोरोवायरस का पहला बड़ा मामला साल 1968 में अमेरिका के ओहायो राज्य के नॉरवॉक शहर में सामने आया था। उस समय एक स्कूल में एक साथ कई लोग बीमार पड़ गये थे। इसी घटना के बाद वैज्ञानिकों ने इस वायरस पर रिसर्च शुरू की थी। चूंकि यह बीमारी सबसे पहले नॉरवॉक शहर में पहचानी गई थी, इसलिए शुरुआत में इसे नॉरवॉक वायरस कहा गया, जो बाद में नोरोवायरस के नाम से जाना जाने लगा। 

मौसम के हिसाब से भी इस वायरस का असर अलग-अलग जगहों पर अलग समय में देखने को मिलता है। दुनिया के उत्तरी हिस्सों में यह बीमारी नवंबर से अप्रैल के बीच ज्यादा फैलती है, जबकि दक्षिणी हिस्सों में अप्रैल से सितंबर के बीच इसके मामले बढ़ते हैं। जो देश भूमध्य रेखा के पास स्थित हैं, वहां यह वायरस किसी खास मौसम तक सीमित नहीं रहता और साल भर फैल सकता है। 

फिलहाल चीन में स्वास्थ्य अधिकारी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और लोगों से साफ-सफाई और सावधानी बरतने की अपील की जा रही है ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।

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