एबीएन डेस्क। भूकंप के तेज झटकों से मंगलवार रात मेक्सिको शहर कांप उठा। झटके इतने तेज थे कि दक्षिणी मेक्सिको शहर की ज्यादातर इमारतें हिलती हुईं दिखाई पड़ीं। इसके बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया। अमेरिकी जियोलॉजिक सर्वे का कहना है कि ग्युरेरो से 11 किलोमीटर दूर अकापुल्को में 7.0 तीव्रता के झटके महसूस किए गए। इससे पहले ग्यूरेरो सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि शुरू में यूएसजीएस की ओर से रिएक्टर स्कूल पर 7.4 की तीव्रता मापी गई थी। इस कारण चट्टानों में दरार आ गई और कई जगह सड़कें धंस गईं। काफी देर तक रहा दहशत का माहौल : तेज भूकंप के झटकों के बाद लोग घरों से बाहर निकलकर सड़क पर आ गए। झटके रुकने के बाद भी लोग काफी देर तक घरों के अंदर नहीं गए। न्यूज एजेंसी राउटर्स के मुताबिक लोग एक दूसरे को पकड़कर खुद को संभालने की कोशिश करते हुए दिखाई दिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह भूकंप सतह से 12 किलोमीटर नीचे टकराया। अब सुनामी का भी खतरा : 7.0 तीव्रता के झटकों के बाद अब मेस्किको में सुनामी का खतरा भी मंडरा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों की ओर से इसको लेकर चेतावनी जारी की गई है और लोंगों को सतर्क रहने को कहा गया है। हालांकि,मेक्सिको सिटी मेयर क्लॉडिया शेनबम का कहना है कि अभी तक किसी भारी नुकसान की जानकारी नहीं मिली है।
एबीएन डेस्क। अफगानिस्तान के सभी प्रांतों में कब्जे का दावा करने के बाद तालिबान ने जल्द ही सरकार गठन का फैसला किया है। इसके मद्देनजर संगठन ने चीन, पाकिस्तान, रूस, ईरान, कतर और तुर्की को सरकार गठन के कार्यक्रम के लिए न्योता भी भेजा है। तालिबान के इस न्योते से साफ है कि इन देशों की सरकारों ने पहले ही संगठन से संपर्क साधा है। गौरतलब है कि चीन, रूस, तुर्की और पाकिस्तान ने तो अपने दूतावासों में भी पहले की तरह काम जारी रखा है। हालांकि, भारत से तालिबान का अब तक कोई आधिकारिक संपर्क नहीं हुआ। एक दिन पहले ही तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्ला मुजाहिद ने सरकार गठन को अगले सप्ताह तक स्थगित करने का एलान किया था। उसने कहा था कि तालिबान एक ऐसी सरकार बनाने के लिये संघर्ष कर रहा है जो समावेशी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को स्वीकार्य हो। माना जा रहा है कि तालिबान अगले कुछ दिनों में काबुल में नई सरकार के गठन की घोषणा करेगा, जिसका नेतृत्व संगठन का सह-संस्थापक मुल्ला अब्दुल गनी बरादर कर सकता है। चीन से नियंत्रित होगा तालिबान? बताया सबसे अहम साझेदार इससे पहले अफगान तालिबान ने चीन को अपना सबसे महत्वपूर्ण साझेदार बताते हुए कहा है कि उसे अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और तांबे के उसके समृद्ध भंडार का दोहन करने के लिए चीन से उम्मीद है। युद्ध से परेशान अफगानिस्तान व्यापक स्तर पर भूख और आर्थिक बदहाली की आशंका का सामना कर रहा है।तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने कहा कि समूह चीन की वन बेल्ट, वन रोड पहल का समर्थन करता है जो बंदरगाहों, रेलवे, सड़कों और औद्योगिक पार्कों के विशाल नेटवर्क के जरिए चीन को अफ्रीका, एशिया और यूरोप से जोड़ेगी। मुजाहिद ने यह भी कहा था कि तालिबान क्षेत्र में रूस को भी एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखता है और वह रूस के साथ अच्छे संबंध बनाए रखेगा।
एबीएन डेस्क। तालिबान के लिए अफगानिस्तान का पंजशीर टेढ़ी खीर बन गया है। यहां पर कब्जे के लिए अभी भी संघर्ष जारी है। बार-बार तालिबान दावा कर रहा है कि उसके लड़ाकों ने पंजशीर को अपने कब्जे में ले लिया है, लेकिन अफगान प्रतिरोधी मोर्चे की ओर से इस दावे को खारिज किया जा रहा है। अब एक बार फिर खबर सामने आई है कि तालिबान और अफगान प्रतिरोधी मोर्च के बीच जारी संघर्ष में 600 से ज्यादा तालिबानी लड़ाकों को मौत के घाट उतार दिया गया है। न्यूज एजेंसी स्पुतनिक के मुताबिक प्रतिरोधी मोर्चे के प्रवक्ता फहीम दश्ती ने ट्वीट किया है कि उनके लड़ाकों ने 600 से ज्यादा तालिबानी मार तो गिराए ही हैं। एक हजार से ज्यादा ने आत्मसमर्पण भी कर दिया है। यह लड़ाई शनिवार की बताई जा रही है। तालिबान का दावा चार जिलों पर जमाया कब्जा : एक तरफ अफगान प्रतिरोधी मोर्चे ने 600 तालिबानियों को मार गिराने का दावा किया है तो दूसरी ओर तालिबान का कहना है कि उसने पंजशीर प्रांत के सात में से चार जिलों पर कब्जा जमा लिया है। अल जजीरा के मुताबिक, तालिबान के एक नेता का कहना है कि हमारी लड़ाई जारी थी और लड़ाके गवर्नर हाउस की ओर से बढ़ रहे थे, लेकिन रास्ते में बारूदी सुरंगों के कारण लड़ाई धीमी पड़ गई। वहीं तालिबान के प्रवक्ता बिलाल करीमी का कहना है कि हमने खिंच व उनाबहा जिले पर अपना कब्जा जमा लिया है, इसके बाद पंजशीर प्रांत के सात में से चार जिले हमारे कब्जे में आ चुके हैं। उसने आगे कहा कि हमारे लड़ाके अब पंजशीर की ओर बढ़ रहे हैं। अहमद मसूद बोला हम लड़ते रहेंगे : तालिबान के दावे से इतर अफगान प्रतिरोधी मोर्चे के प्रवक्ता फहीन दश्ती का कहना है कि ख्वाक दर्रे में हमारे लड़ाकों ने हजारों तालिबानियों को घेर लिया है और रेवाक क्षेत्र में कब्जे में लिए गए वाहनों को छोड़ दिया गया है। उधर, पंजशीर के कमांडर अहमद मसूद ने फेसबुक पर लिखा है कि हमारी लड़ाई जारी रहेगी और पंजशीर में और मजबूत हो रहे हैं। साहेल का कहना है कि अफगानी प्रतिरोधी मोर्चे के लिए यह कठिन परिस्थिति है, लेकिन हम हार नहीं मानने वाले। तालिबान के खिलाफ जंग जारी रहेगी और हम जीत कर रहेंगे। अमेरिका ने जताई गृह युद्ध की आशंका : इस बीच अमेरिका के ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष मार्क मिले ने अफगानिस्तान में गृह युद्ध की आशंका जताई है। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में जिस तरह के हालात हैं, उससे जल्द ही गृह युद्ध छिड़ सकता है। मुझे नहीं पता कि तालिबानी सरकार को चला पाने और अपना शासन स्थापित करने में सक्षम है या नहीं। फॉक्स न्यूज़ से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि अगर तालिबान अपना शासन स्थापित नहीं कर पाया तो आने वाले सालों में अफगानिस्तान में फिर से अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन विकसित होने लगेंगे
एबीएन डेस्क। अफगानिस्तान के काबुल हवाई अड्डे में एक के बाद एक हुए आत्मघाती हमलां में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। खबरों के अनुसार इन हमलों में अब तक 90 लोग मारे गए हैं और 1338 लोग लोग घायल हो गए हैं। इसमें 13 अमेरिकी सैनिक भी शामिल हैं। हमले में 12 और सेवारत कर्मी घायल हुए है और मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। यह विस्फोट ऐसे समय हुआ है, जब अफगानिस्तान पर तालिबान के नियंत्रण के बाद से हजारों अफगान देश से निकलने की कोशिश कर रहे हैं और पिछले कई दिनों से हवाई अड्डे पर जमा हैं। काबुल हवाई अड्डे से बड़े स्तर पर लोगों की निकासी अभियान के बीच पश्चिमी देशों ने हमले की आशंका जतायी थी। अमेरिका के एक अधिकारी का कहना है कि “निश्चित तौर पर माना जा रहा है कि” काबुल हवाई अड्डे के पास हुए हमले के पीछे आतंकी समूह इस्लामिक स्टेट का हाथ है। इस्लामिक स्टेट समूह तालिबान से अधिक चरमपंथी है और इसने असैन्य नागरिकों पर कई बार हमले किये हैं। पेंटागन के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा कि एक धमाका हवाईअड्डे के प्रवेश द्वार के पास हुआ जबकि दूसरा एक होटल से कुछ दूरी पर हुआ। उन्होंने कहा कि हमले में सैनिकों समेत कई लोग हताहत हुए हैं लेकिन कोई आंकड़ा नहीं दिया। एक अफगानिस्तानी व्यक्ति ने कहा कि काबुल हवाई अड्डे के एक द्वार के बाहर इंतजार कर रही भीड़ के बीच हुए धमाके के बाद उसे कुछ लोग मृत या घायल नजर आए। दूसरा धमाका होटल बारोन के पास हुआ जहां अफगान, ब्रिटिश और अमेरिकी नागरिकों समेत अन्य लोग एकत्र थे जिन्हें देश छोड़ने के लिए हवाईअड्डे पर जाने से पहले हाल के दिनों में यहां ठहराया गया था। पिछले सप्ताह के दौरान इस युद्धग्रस्त देश से निकलने के लिए हवाई अड्डे पर अफरा-तफरी जैसा माहौल देखने को मिला था। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद से तालिबान के क्रूर शासन की आशंका के चलते तमाम लोग देश छोड़ने को आतुर नजर आ रहे हैं। कुछ देश पहले ही अफगानिस्तान से लोगों को निकालने का अभियान समाप्त कर चुके हैं और अपने सैनिकों और राजनयिकों को निकालना शुरू कर चुके हैं। तालिबान ने तय समयसीमा में निकासी अभियान के दौरान पश्चिमी बलों पर हमला नहीं करने का संकल्प जताया था। हालांकि, यह भी दोहराया है कि अमेरिका द्वारा 31 अगस्त की तय समयसीमा में सभी विदेशी सैनिकों को देश छोड़ना होगा।
एबीएन डेस्क। अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे के बाद से आए दिन हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि लोग बिना सामान लिए देश छोड़कर भाग रहे हैं। वहीं काबुल एयरपोर्ट पर पहुंच रहे लोगों के लिए भी विकट स्थिति खड़ी हो गई है। जानकारी के मुताबिक लोग यहां महंगे भोजन और पानी की वजह से भूखे-प्यासे रहने को मजबूर हो रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार काबुल एयरपोर्ट पर एक पानी की बोतल 40 डॉलर यानी 3000 रुपये में मिल रही है। जबकि चावल की एक प्लेट के लिए 100 डॉलर यानी लगभग 7500 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। इतना ही नहीं एयरपोर्ट पर पानी या खाना कुछ भी खरीदना हो, यहां अफगानिस्तान की अपनी करेंसी भी नहीं ली जा रही। सिर्फ डॉलर में ही भुगतान स्वीकार किए जा रहे हैं। ऐसे में अफगानी नागरिकों को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। इतनी महंगाई के कारण लोग भूखे-प्यासे कतार में लग जा रहे हैं। सबसे मुश्किल हालात में बच्चे पड़ गए हैं जो भूख और प्यास के कारण बेहोशी की हालत में पहुंच रहे हैं। हालांकि इन लोगों का हौसला अब टूटने लगा है। शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया है। अधिकतर लोग खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक काबुल एयरपोर्ट के बाहर अब भी 50 हजार से ज्यादा लोग इंतजार कर रहे हैं। इस वजह से यहां इतना भयानक जाम लगा हुआ है कि एयरपोर्ट तक पहुंचना नामुमकिन सा काम है।
एबीएन डेस्क। अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद चीन अब उसके साथ दोस्ताना बढ़ने की कोशिश में जुट गया है। कब्जे से पहले तालिबान चीन के लिए आंखों की किरकिरी था लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पाकिस्तान के स्पोर्ट से आंतक फैला रहे तालिबान के जरिए अपने हित साधने के लिए चीन अब इस आंतकी समूह के साथ काम करने को तैयार हो चुका है और इसका मुख्य कारण है अफगानिस्तान का बड़ा खजाना। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसके पास 10 खरब डॉलर यानी करीब 741 खरब रुपए से भी ज्यादा की खनिज संपत्ति है। अगर सही से इस्तेमाल हो तो अफगानिस्तान में दुनिया का सबसे ज्यादा लीथियम रिजर्व भी है। हालांकि, पिछले चार दशकों से युद्ध जैसे हालात का सामना कर रहे अफगानिस्तान को ये खनिज फायदा नहीं दे सके लेकिन अब चीन ने अपनी पैनी नजरें इसपर गड़ा दी हैं और यही कारण है कि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद तालिबान के साथ दोस्ती को तैयार है। हालांकि साल 2001 में अफगानिस्तान में वैश्विक अर्थव्यवस्था आज की परिस्थितियों की तुलना में काफी अलग थी। साल 2001 में अमेरिका की अफगानिस्तान में एंट्री से पहले यहां न तो टेस्ला जैसी कंपनी थी और न ही आईफोन। हालांकि अब ये आधुनिक अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। अब हाईटेक चिप और बड़ी क्षमता वाली बैटरी का जमाना है जिन्हें बनाने के लिए तरह-तरह के खनिजों की जरूरत है । साल 2003 से 2020 के बीच चीनी सेना में सीनियर कर्नल रहे झो बो ने न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार के एक लेख में लिखा, अमेरिकी सेना की वापसी के बाद चीन ही काबुल की ज्यादा से ज्यादा जरूरतों को पूरा कर सकता है। तालिबान को मान्यता देने से लेकर अफगान में निवेश तक और इसके एवज में चीन को अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे के विकास का मौका मिल सकता है और साथ में ही अफगान की 10 खरब डॉलर की खनिज संपत्ति तक उसकी पहुंच हो सकती है, जहां तक अभी कोई नहीं पहुंच सकता है। अमेरिकी अधिकारियों ने साल 2010 में ही यह अनुमान पेश किया था कि अफगानिस्तान में 10 खरब डॉलर से ज्यादा की खनिज संपत्ति है, जिसका अभी तक पता नहीं लग सका है। हालांकि, अफगान सरकार ने उस समय भी यह दावा किया था कि उनके पास इससे तीन गुना ज्यादा खनिज संपत्ति है। इसमें लीथियम रिजर्व के साथ ही दुर्लभ धातु भी शामिल हैं, जो ग्लोबल ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन के लिए जरूरी हैं। हालांकि, देश की खस्ता हालत की वजह से अभी तक इसकी खोज शुरू नहीं हो सकी।
एबीएन डेस्क। अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान अरबों रुपए के अमेरिकी युद्धक साजो-सामानअपने आका तक पाकिस्तान को पहुचाने में जुट गया है। अमेरिका ने अफगान आर्मी को अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया था, जो अब तालिबानियों के हाथ लग गए हैं। तालिबान इन हथियारों को पाकिस्तान सप्लाई कर रहा है जो भारत के लिए बड़े खतरे की घंटी हो सकती है। द मिरर ने इस हफ्ते खुलासा किया कि कैसे अमेरिका अफगानिस्तान में अरबों पाउंड के हथियार और उपकरण छोड़कर गया है, जिसका अधिकांश हिस्सा अब तालिबान के हाथों में है और तालिबान इसे अब पाकिस्तान को बेच रहा है। तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से दुनिया की नजर अफगानिस्तान पर है। ऐसे में तालिबान द्वारा पाकिस्तान को अमेरिकी हथियार सप्लाई करना भारत समेत दूसरे पड़ोसी देशों के लिए भी अच्छे संकेत नहीं है। देश के शीर्ष सैन्य अधिकारियों का मानना है कि लूटा गया अमेरिकी हथियारों का जखीरा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (ISI) के पाले हुए आतंकी संगठन पहले पाकिस्तान में हिंसा फैलाने के लिए करेंगे फिर उनका रुख भारत की तरफ हो सकता। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने कहा कि ये हथियार भारत में संचालित आतंकवादी समूहों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी, लेकिन सुरक्षा बल उनसे निपटने को पूरी तरह तैयार है। द मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक तालिबान नेटवर्क द्वारा अफगानिस्तान से लाखों पाउंड मूल्य के चुराए गए अमेरिकी सैन्य हार्डवेयर का निर्यात किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की ISI ने गुप्त रूप से अमेरिकी सैन्य वाहनों के खुले तौर पर आयात को हरी झंडी दे दी है।अमेरिकी सेना के Humvees और अन्य बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों को अफगानिस्तान से पाकिस्तान ले जाते हुए देखा गया। एक काफिले की तस्वीरों से पता चला कि सैन्य ट्रकों को पाकिस्तान में क्वेटा सिटी में शिफ्ट किया जा रहा था, जिसे लंबे समय से अफगान-तालिबान नेतृत्व का मुख्यालय माना जाता था। सूत्रों के अनुसार अमेरिका द्वारा अफगान सेना को दिए बहुत सारे युद्धक साजो-सामान तालिबान के हाथ लग गए हैं और इन्हीं सबको अब तालिबान निर्यात कर रहा है। पाकिस्तान में फ्रंटियर सिटी क्वेटा, कंधार से तीन घंटे की दूरी पर है। ये आतंकवादी समूहों और नशीली दवाओं विशेष रूप से हेरोइन के व्यापार के लिए एक आश्रय स्थल है। रिपोर्ट में बताया गया कि पाकिस्तान के क्वेटा में तालिबानी पहले भी पनाह लेते रहे हैं। तालिबान को खाड़ी के दानदाताओं का अधिकांश पैसा क्वेटा के माध्यम से सप्लाई होता रहा है। घायल तालिबान लड़ाकों को इलाज के लिए यहीं लाया जाता रहा है। एक आकलन के मुताबिक अमेरिकी फौज ने अफगानी फौज को 6.5 लाख छोटे हथियार दिए थे जिनमें एम-16 और एम-4 असॉल्ट राइफलें भी शामिल हैं। तालिबान ने अफगानी फौज से भारी मात्रा में संचार यंत्र भी लूट लिए हैं। इसके साथ ही, बुलेटप्रुफ औजार, अंधेरे में देख पाने में सक्षम चश्मे और स्निपर राइफलें भी तालिबानी आतंकियों के हाथ लगे हैं। सूत्रों का कहना है कि ये सारे चीजें पाकिस्तानी आर्मी के हाथ लग सकती है।
नई दिल्ली। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद काबुल में खराब होती सुरक्षा स्थिति की पृष्ठभूमि में भारत अफगान राजधानी से अपने नागरिकों को बाहर निकालने के अपने प्रयासों के तहत तीन उड़ानों के जरिए दो अफगान सांसदों समेत 392 लोगों को रविवार को देश वापस ले आया। अधिकारियों ने बताया कि 87 भारतीयों और दो नेपाली नागरिकों के एक अन्य समूह को दुशाम्बे से एअर इंडिया के एक विशेष विमान से वापस लाया गया। इससे एक दिन पहले उन्हें भारतीय वायु सेना के एक विमान आईएएफ 130जे के जरिए ताजिकिस्तान की राजधानी दुशाम्बे ले जाया गया था। इस बीच, अमेरिका और नाटो के विमान के जरिए पिछले कुछ दिन में काबुल से दोहा ले जाए गए 135 भारतीयों के एक समूह को एक विशेष विमान से दोहा से दिल्ली लाया गया। भारत ने अमेरिका, कतर, ताजिकिस्तान और कई अन्य मित्र देशों के साथ समन्वय स्थापित करके अफगानिस्तान से लोगों को बाहर निकालने का अभियान चलाया। अफगानिस्तान से लोगों को बाहर निकालने के अभियान से अवगत अधिकारियों ने बताया कि काबुल से लाए गए 168 लोगों के समूह में अफगान सांसद अनारकली होनारयार और नरेंद्र सिंह खालसा एवं उनके परिवार भी शामिल हैं।खालसा ने दिल्ली के निकट हिंडन एयरबेस पर पत्रकारों से कहा, भारत हमारा दूसरा घर है। भले ही हम अफगान हैं और उस देश में रहते हैं लेकिन लोग अक्सर हमें हिंदुस्तानी कहते हैं। मदद के लिए हाथ बढ़ाने के लिए मैं भारत को धन्यवाद देता हूं। उन्होंने कहा, मुझे रोने का मन कर रहा है। सब कुछ समाप्त हो गया है। देश छोड़ने का यह एक बहुत ही कठिन और दर्दनाक निर्णय है। हमने ऐसी स्थिति नहीं देखी है। सब कुछ छीन लिया गया है। सब खत्म हो गया है। रविवार की निकासी के साथ काबुल से भारत द्वारा निकाले गए लोगों की संख्या पिछले सोमवार से लगभग 590 तक पहुंच गई। भारत में अफगानिस्तान के राजदूत फरीद ममुंडजे ने समर्थन के संदेशों के लिए भारतीय मित्रों को ट्विटर पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, मैं पिछले कुछ हफ्तों, विशेषकर पिछले 7-8 दिनों में अफगानों की पीड़ा पर सभी भारतीय मित्रों और नई दिल्ली में राजनयिक मिशनों के सहानुभूति और समर्थन संदेशों की सराहना करता हूं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने विमान के हिंडन में उतरने से कुछ घंटों पहले ट्वीट किया कि भारतीयों की निकासी जारी है। भारत के 107 नागरिकों समेत 168 यात्री भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से काबुल से दिल्ली लाए जा रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि काबुल से दोहा लाए गए भारतीय अफगानिस्तान स्थित कई विदेशी कंपनियों के कर्मी हैं।बागची ने देर रात करीब एक बजकर 20 मिनट पर ट्वीट किया, अफगानिस्तान से भारतीयों को वापस लाया जा रहा है। एआई1956 विमान ताजिकिस्तान से कुल 87 भारतीयों को नयी दिल्ली ला रहा है। दो नेपाली नागरिकों को भी लाया जा रहा है। इसमें दुशाम्बे में स्थित भारत के दूतावास ने सहायता की। लोगों को निकालने के लिए और उड़ानों का प्रबंधन किया जाएगा। तालिबान के पिछले रविवार को काबुल पर कब्जा जमाने के बाद भारत अफगान राजधानी से पहले ही भारतीय राजदूत और दूतावास के अन्य कर्मियों समेत 200 लोगों को वायुसेना के दो सी-19 परिवहन विमानों के जरिये वहां से निकाल चुका है। सोमवार को 40 से ज्यादा भारतीयों को लेकर पहली उड़ान भारत पहुंची थी। भारतीय राजनयिकों, अधिकारियों एवं सुरक्षाकर्मियों और वहां फंसे कुछ भारतीयों समेत करीब 150 लोगों के साथ दूसरा सी-17 विमान मंगलवार को भारत पहुंचा था। अमेरिकी सैनिकों की स्वदेश वापसी की पृष्ठभूमि में तालिबान ने अफगानिस्तान में इस महीने तेजी से अपने पांव पसारते हुए राजधानी काबुल समेत वहां के अधिकतर इलाकों पर कब्जा जमा लिया है। इन लोगों की वापसी के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा था कि अब ध्यान अफगानिस्तान की राजधानी से सभी भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने पर होगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि सरकार के लिए तात्कालिक प्राथमिकता अफगानिस्तान में फिलहाल रह रहे सभी भारतीय नागरिकों के बारे में सटीक सूचना प्राप्त करना है। मंत्रालय ने भारतीयों के साथ ही उनके नियोक्ताओं से अनुरोध किया है कि वे विशेष अफगानिस्तान प्रकोष्ठ के साथ प्रासंगिक विवरण तत्काल साझा करें। एक अनुमान के मुताबिक, अफगानिस्तान में करीब 400 भारतीय फंसे हो सकते हैं और भारत उन्हें वहां से निकालने का प्रयास कर रहा है और इसके लिए वह अमेरिका एवं अन्य मित्र राष्ट्रों के साथ समन्वय से काम कर रहा है।
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