एबीएन सेंट्रल डेस्क। मंगलवार को देश वासियों को महंगाई का एक और झटका लगा है। दरअसल, मदर डेयरी और अमूल दोनों ने ही दूध के दामों में 2-2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। 6 महीने के अंदर ये दूध की कीमतों में लगातर दूसरी बढ़त है। इससे पहले 6 मार्च को ही मदर डेयरी, अमूल और पराग मिल्क ने भी अपने अपने दूध उत्पादों की कीमतों को 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया था। यानि 6 महीने के अंदर पराग और मदर डेयरी के उत्पाद 4 रुपये प्रति लीटर महंगे हो चुके हैं। वहीं एक साल से कुछ ज्यादा वक्त यानि 13 महीने में कीमतें 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ी हैं। पिछले साल पहली जुलाई से अब तक 3 बार में 2-2 रुपये दूध महंगा हो चुका है। अमूल और मदर डेयरी ने बढ़ती लागत को कीमतों में बढ़ोतरी की वजह बताया है। इससे पहले मार्च को ही अमूल, पराग डेयरी, मदर डेयरी आदि ने कीमतों में बढ़ोतरी की थी। उस वक्त मदर डेयरी ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा था कि किसानों की बढ़ती लागत, ईंधन की कीमत और पैकेजिंग मैटिरियल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से दूध की कीमतें में वृद्धि की जा रही है। इस बढ़त से पहले यानि मार्च से पहले दिल्ली एनसीआर में एक किलो टोकन मिल्क की कीमत 44 रुपये प्रति लीटर थी। वहीं एक किलो फुल क्रीम दूध की कीमत 57 रुपये प्रति लीटर , टोंड मिल्क की कीमत 47 रुपये प्रति लीटर और डबल टोंड की कीमत 41 रुपये प्रति लीटर थी। गाय का दूध इस बढ़त से पहले 49 रुपये प्रति लीटर का मिल रहा था। 6 महीने के बाद टोकन मिल्क 48 रुपये, फुल क्रीम दूध 61 रुपये प्रति लीटर, टोंड दूध की कीमत 51 रुपये प्रति लीटर और डबल टोंड की कीमत 45 रुपये प्रति लीटर होगी वहीं गाय का दूध अब 53 रुपये प्रति लीटर मिलेगा। साल 2021 में जुलाई के महीने के दौरान अमूल और मदर डेयरी ने अपने दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। अमूल ने पहली जुलाई को कीमतों में 2 रुपये की बढ़ोतरी की थी। वहीं मदर डेयरी ने 11 जुलाई 2021 को कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। जुलाई की बढ़ोतरी से पहले अमूल गोल्ड 55 रुपये, अमूल ताजा 50 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था। वहीं गाय की दूध 47 रुपये प्रति लीटर मिल रहा था। यानि जुलाई 2021 से लेकर अगस्त 2022 के बीच तक देश में दूध की कीमतें 6 रुपये प्रति लीटर तक महंगी हो चुकी हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश के प्रमुख शेयर बाजार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के शेयरधारकों ने प्रबंध निदेशक (एमडी) एवं मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) के रूप में आशीष कुमार चौहान की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। एनएसई ने रविवार को यह जानकारी दी। एक बयान के अनुसार, एनएसई की असाधारण आम सभा 11 अगस्त को आयोजित की गई थी। इसमें शेयरधारकों ने 99.99 प्रतिशत मतों से चौहान की नियुक्ति को मंजूरी दी। चौहान इससे पहले बीएसई के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ थे। उन्होंने 26 जुलाई को एनएसई के प्रमुख का पद संभाला था। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 18 जुलाई को ही चौहान की नियुक्ति को मंजूरी दी थी। उन्होंने विक्रम लिमये का स्थान लिया है जिनका एनएसई में पांच साल का कार्यकाल 16 जुलाई को पूरा हो गया था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। मैं जिंदगी अपनी शर्तों पर जीता हूं, आज जो कुछ भी हूं अपने बूते हूं, अगर लाइफ में मिस्टेक करने से डर गए तो कुछ नहीं कर पाओगे। ये थे हमारे वॉरन बफेट यानी राकेश झुनझुनवाला। हर पल मस्ती में जीने वाला शख्स। चाहे कैमरे सामने हों, लाइव चल रहा हो अगर पान मसाला खाना है तो खाना है। कोई टोक नहीं सकता। कई बीमारियां पर दिलेरी वही। बैठे हैं वील चेयर पर लेकिन जब कजरारे - कजरारे... कजरारे तेरे नयना बजा तो झूमने लगे। दलाल स्ट्रीट का ये सरताज गमजदा कभी नहीं हुआ। आज जब हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं, तो ये जानना जरूरी है कि राकेश झुनझुनवाला हमेशा देश और इकॉनमी के बारे में पॉजिटिव रहे। जब अकासा एयर लॉन्च किया और किसी ने विजय माल्या, गोपीनाथ का जिक्र कर पूछा कि बजट एयरलाइन चल पाएगी, जवाब आया - क्यों नहीं, रिस्क तो लेना पड़ेगा न। 350 करोड़ डॉलर में 70 प्लेन के आॅर्डर देने के बाद आज अकासा एयर आसमां छू रहा है तब राकेश झुनझुनवाला हमारे बीच नहीं है। आखिरी बार अकासा एयर की पहली फ्लाइट के मौके पर ही उन्हें देखा गया। हर जगह हम ये खबर देख रहे कि शेयर मार्केट का बिग बुल नहीं रहा। लेकिन ये पूरा सच नहीं है। राकेश झुनझुनवाला को तेजड़िया (बुल) किसी ने बनाया तो उनके अंदर बसे मंदड़िए (बीयर) ने। तब जब बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर हर्षद मेहता का राज था। हर्षद मेहता कैसे आॅपरेट करता और किसी शेयर के भाव को आसमान पर पहुंचाता इसे वेब सिरीज स्कैम-1992 में बखूबी दिखाया है। दलाल स्ट्रीट का असली बुल तो मेहता था। उसने एसीसी के शेयर को 200 रुपए से 9000 रुपए पर पहुंचा दिया। एक अप्रैल 1991 से मई 1992 के बीच बीएसई का सेंसेक्स रॉकेट हुआ जा रहा था। कुछ लोगों की राय थी मनमोहन सिंह सरकार के उदारीकरण से उम्मीद जगी है और इसीलिए तेजी आई है। लेकिन ये सच नहीं था। हर्षद मेहता रिजर्व बैंक के सारे नियमों को तोड़ कर सरकारी बैंकों से पैसा उठा रहा था और वो भी बिना किसी अनामत के। हर्षद मेहता ने बैकों से बैंक रिसीट लिया पर 90 दिन के भीतर शेयर खरीदने का प्रूफ या शेयर पेपर जमा ही नहीं किए। ये बीआर कैश मनी की तरह था। हर्षद इसे दूसरे बैंक से कैश भी करा लेता था। हर्षद ने स्टेट बैंक आॅफ इंडिया को भी चूना लगा दिया। 500 करोड़ रुपए के स्कैम में हर्षद ने स्टॉक मार्केट को इतना बढ़ा दिया कि शेयरों की कुल कीमत देश के हेल्थ और शिक्षा बजट से ज्यादा हो गई। जब सुचेता दलाल ने हर्षद के गेम का पदार्फाश किया तो उसका दुश्मन मनु मानेक इसका फायदा उठाने को बेताब था। मनु मानेक को शेयर दलाल ब्लैक कोबरा के तौर पर जानते थे। राधाकृष्ण दमानी और राकेश झुनझुनवाला इसी के चेले थे। ले फटाफट-दे फटाफट : जैसे ही हिंट मिला कि मार्केट क्रैश होने वाला है। आरीबाई ने बीआर के गेम में बैंकों पर शिकंजा कस दिया है। वैसे ही ब्लैक कोबरा ने फन फैला दिया। फटाफट शेयर शॉर्ट होने लगे। यानी मंदड़िए बने ब्लैक कोबरा के गुट ने हर्षद मेहता की खरीदे शेयरों को बेचना शुरू कर दिया। जैसे ही मार्केट गिरना शुरू हुआ इनकी चांदी हो गई। 500 में शेयर बेच 200 में खरीदने लगे। यानी 300 का शुद्ध मुनाफा। देखते ही देखते सेंसेक्स 4500 से 2500 पर आ गया। राकेश झुनझुनवाला मालामाल हो गए। वो जमाना कागजों पर शेयरों की खरीद बिक्री का था। ब्लैक कोबरा के बारे में कहा जाता है कि अस्सी के दशक में वो शर्त लगाकर 100 रुपए के शेयर को एक रुपए पर तोड़ सकता है। मनु मानेक ने हर्षद मेहता को पटखनी देने के लिए 90-91 में अफवाह फैलाई कि हर्षद को एक करोड़ रुपए का घाटा हो गया है। उसे उम्मीद थी कि इसके बाद हर्षद ने जिन कंपनियों के शेयर खरीदे थे उसमें बिकवाली शुरू हो जाएगी। लेकिन तब ब्लैक कोबरा कामयाब नहीं हो सका। जैसे ही हिंट मिला कि मार्केट क्रैश होने वाला है। आरीबाई ने बीआर के गेम में बैंकों पर शिकंजा कस दिया है। वैसे ही ब्लैक कोबरा ने फन फैला दिया। फटाफट शेयर शॉर्ट होने लगे। यानी मंदड़िए बने ब्लैक कोबरा के गुट ने हर्षद मेहता की खरीदे शेयरों को बेचना शुरू कर दिया। हर्षद मेहता और सेंसेक्स के गर्त में जाने से जो पैसा राकेश झुनझुनवाला ने बनाया उसी से वो बीयर से बुल गियर में आ गये। वो सबकी नजरों में तब चढ़े जब 1996 में टाटा टी के शेयर 43 रुपये के भाव पर लिया और तीन महीने में दाम 143 रुपए हो गया। इसके बाद राकेश झुनझुनवाला ने कभी मुड़ कर नहीं देखा। ट्रेडिंग और इन्वेस्टमेंट दोनों पर समान पकड़ उनकी खासियत थी। शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों ही तरीकों से उन्होंने निवेश किया। ले फटाफट - दे फटाफट शैली वाले निवेशक। वो डील पकड़ने के माहिर थे। हाली ही में जब जी इंटरटेनमेंट और सोनी के बीज डील हुई तो उससे आठ दिन पहले ही झुनझुनवाला ने जी के शेयर लिए थे। महज हफ्ते भर में 50 करोड़ रुपए का मुनाफा उनकी जेब में थे। वो हमारे आपके जैसे छोटे निवेशकों के लिए रोल मॉडल थे। जिस कंपनी में पैसा लगा दिया उसके पीछे निवेशक टूट पड़ते। लेकिन एग्जिट स्ट्रैटेजी सबसे तगड़ी थी। एक शातिर ट्रेडर की तरह झुनझुनवाला ये नहीं बताते कि आज वो अमुक कंपनी से निकलने वाले हैं। टाटा ग्रुप की कंपनियों से उन्होंने जम कर पैसे कमाए। खासकर टाइटन के शेयर को तो झुनझुनवाला ने अनमोल रत्न बना दिया। आज जब राकेश झुनझुवाला हमारे बीच नहीं रहे, तब उनके पोर्टफोलियो में 32 कंपनियों के शेयर हैं। वो 36 हजार करोड़ रुपए का फंड छोड़ गए हैं। अकासा एयर रतन टाटा की एयर एशिया और एयर इंडिया को चुनौती देने के लिए उड़ान भर चुकी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश का निर्यात जुलाई में 2.14 प्रतिशत बढ़कर 36.27 अरब डॉलर रहा। वहीं व्यापार घाटा इसी महीने में लगभग तीन गुना होकर 30 अरब डॉलर पहुंच गया। शुक्रवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार आयात जुलाई महीने में सालाना आधार पर 43.61 प्रतिशत बढ़कर 66.27 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा जुलाई 2021 में 10.63 अरब डॉलर था। इस महीने की शुरूआत में जारी प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार जुलाई में निर्यात 0.76 प्रतिशत घटकर 35.24 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया था। जुलाई 2021 में यह 35.51 अरब डॉलर था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। देश की सबसे बड़ी कार विनिर्माता मारुति सुजुकी इंडिया ने सेमीकंडक्टर की आपूर्ति में सुधार से चालू वित्त वर्ष में करीब 20 लाख इकाइयों के उत्पादन का लक्ष्य रखा हुआ है जिसके लिए वह अपने उत्पादन में बढ़ोतरी भी करेगी। कंपनी के चेयरमैन आरसी भार्गव ने वित्त वर्ष 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट में शेयरधारकों को दिए गए अपने संदेश में कहा है कि चालू वित्त वर्ष में 20 लाख इकाइयों के उत्पादन लक्ष्य को हासिल करने में नया एसयूवी मॉडल ग्रैंड विटारा एक अहम भूमिका निभाएगा। पिछले वित्त वर्ष में मारुति सुजुकी का उत्पादन 13.4 प्रतिशत बढ़कर 16.52 लाख इकाई रहा। अप्रैल-जून 2021 में महामारी की दूसरी लहर के कारण उत्पादन गतिविधियों पर पड़े प्रतिकूल प्रभाव के बावजूद कंपनी ने यह उत्पादन आंकड़ा हासिल किया था। इसके अलावा सेमीकंडक्टर की आपूर्ति बाधित होने से भी कंपनी मांग के अनुरूप वाहनों की बिक्री नहीं कर पायी। भार्गव ने कहा, वित्त वर्ष 2021-22 के अंत में हम बुकिंग के बावजूद करीब 2.7 लाख वाहनों की आपूर्ति नहीं कर पाए। घरेलू बाजार में आपूर्ति कम होने की वजह से इसकी बाजार हिस्सेदारी भी करीब 50 फीसदी से कम होकर 43.4 फीसदी पर आ गई थी। भारतीय वाहन विनिर्माताओं के संगठन सायम के आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू बाजार में वर्ष 2021-22 में कुल 30,69,499 यात्री वाहनों की बिक्री हुई थी जबकि एक साल पहले 27,11,457 इकाई की बिक्री हुई थी। भार्गव ने वित्त वर्ष 2022-23 के लिए अपना आकलन पेश करते हुए कहा, सेमीकंडक्टर की उपलब्धता बेहतर होने से वाहन उत्पादन की स्थिति बेहतर होगी। अपना उत्पादन बढ़ाने के लिए हमने कुछ कदम भी उठाए हैं। हमने इस आंकड़े को 20 लाख इकाई तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वैसे इसे हासिल कर पाना एक चुनौती होगी। हालांकि उन्होंने कहा कि ग्रैंड विटारा मॉडल का उत्पादन टोयोटा के संयंत्र में होने से मारुति सुजुकी के लिए उत्पादन बढ़ाने की चुनौती को पूरा करने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि ग्रैंड विटारा मॉडल के आने से एसयूवी खंड में कंपनी की स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा कंपनी ने हाल ही में अपनी पुरानी एसयूवी ब्रेजा को नए अवतार में उतारा है। इलेक्ट्रिक वाहनों के संदर्भ में कंपनी चेयरमैन ने कहा कि वित्त वर्ष 2024-25 से सुजुकी मोटर कॉरपोरेशन के गुजरात संयंत्र में इलेक्ट्रिक मॉडलों का उत्पादन शुरू हो जाएगा और मारुति इनकी बिक्री करेगी। हालांकि उन्होंने कहा कि ईवी मॉडल के कार बाजार में अहम स्थान लेने में अभी वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि मारुति सुजुकी ने अपनी भावी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हरियाणा के खरखोडा में नया उत्पादन संयंत्र लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस संयंत्र के पहले चरण पर 11,000 करोड़ रुपए निवेश किए जाएंगे।
एबीएन बिजनेस डेस्क। हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) ने शेयर बाजारों को तिमाही नतीजों की जानकारी देते हुए कहा कि अप्रैल-जून तिमाही में उसे एकल आधार पर 10,196.94 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। यह किसी भी तिमाही में एचपीसीएल को हुआ सबसे बड़ा घाटा है। एक साल पहले की समान अवधि में उसे 1,795 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था। दरअसल, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में पेट्रोलियम कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी नहीं की जिससे उन्हें परिचालन व्यय के अनुपात में राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है। एचपीसीएल की तरह सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य पेट्रोलियम कंपनियों इंडियन आॅयल कॉरपोरेशन (आईओसी) और बीपीसीएल ने भी बीती तिमाही में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाए। ऐसा बढ़ती मुद्रास्फीति पर काबू पाने की सरकार की कोशिशों को ध्यान में रखते हुए किया गया। कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होने से आईओसी को भी इस तिमाही में 1,992.53 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि एचपीसीएल को तेल उत्पादन से अधिक बिक्री करने से ज्यादा बड़ा घाटा उठाना पड़ा है। एचपीसीएल को उत्पादों की बिक्री से मिलने वाला राजस्व बीती तिमाही में बढ़कर 1.21 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया जबकि पिछले साल की समान तिमाही में यह 77,308.53 करोड़ रुपये रहा था। राजस्व वृद्धि की बड़ी वजह कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हुई बढ़ोतरी रही। अप्रैल-जून तिमाही में एचपीसीएल को हुए रिकॉर्ड घाटे ने रिफाइनिंग कारोबार से हुए रिकॉर्ड मार्जिन को भी फीका कर दिया। एचपीसीएल को वित्त वर्ष की पहली तिमाही में प्रति बैरल कच्चे तेल पर 16.69 डॉलर की कमाई हुई जो एक साल पहले की समान अवधि में महज 3.31 डॉलर प्रति बैरल रही थी। एचपीसीएल ने अपने बयान में कहा, इस तिमाही में मोटर ईंधन और एलपीजी पर विपणन मार्जिन घटने से हमारी लाभप्रदता पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इसके अलावा कंपनी को विदेशी मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव होने से भी 945.40 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का नुकसान झेलना पड़ा। एचपीसीएल ने अप्रैल-जून तिमाही में 13,496.66 करोड़ रुपये का कर-पूर्व घाटा दिखाया है जबकि पिछले साल की इसी अवधि में उसे 2,381.53 करोड़ रुपये का लाभ हुआ था। कंपनी को आलोच्य तिमाही में तेल बिक्री में बढ़ोतरी के बावजूद घाटा उठाना पड़ा है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। सरकार चीनी निर्यात पर एक करोड़ टन के मात्रात्मक प्रतिबंध में ढील देगी और सितंबर को समाप्त होने वाले चालू विपणन वर्ष में अतिरिक्त 12 लाख टन निर्यात खेप को अनुमति प्रदान करेगी। मई के अंत में, केंद्र ने चीनी की घरेलू उपलब्धता और मूल्य स्थिरता बनाये रखने के लिए विपणन वर्ष 2021-22 (अक्टूबर-सितंबर) में चीनी निर्यात को एक करोड़ टन पर सीमित रखने का फैसला किया था। चीनी मिलों ने चालू विपणन वर्ष में अब तक लगभग एक करोड़ टन चीनी का निर्यात किया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। उद्योग की मांग रही है कि निर्यात सीमा बढ़ाई जानी चाहिए। यहां एक कार्यक्रम से इतर खाद्य सचिव सुधांशु पांडे ने कहा कि सरकार और 12 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति देगी। उन्होंने कहा कि इस संबंध में जल्द ही अधिसूचना जारी की जायेगी। विपणन वर्ष 2020-21 में चीनी का निर्यात 70 लाख टन रहा, जो पिछले वर्ष के 59.6 लाख टन से अधिक है। खाद्य मंत्रालय ने इस सप्ताह के आरंभ में एक बयान में कहा था, मौजूदा चीनी सत्र 2021-22 में एक अगस्त 2022 तक लगभग 100 लाख टन (एक करोड़ टन) चीनी का निर्यात किया गया है और निर्यात के 112 लाख टन का स्तर छूने की संभावना है। उद्योग निकाय भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने अनुमान लगाया है कि इथेनॉल निर्माण के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ने के कारण भारत का चीनी उत्पादन अक्टूबर से शुरू होने वाले विपणन वर्ष 2022-23 में थोड़ा घट सकता है। सितंबर को समाप्त होने वाले चालू विपणन वर्ष में चीनी का उत्पादन 3.6 करोड़ टन होने का अनुमान है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने सोमवार को कहा कि देश में 2022 की शुरूआत में पारा चढ़ना खाद्य वस्तुओं के दाम में तेजी का प्रमुख घरेलू कारण रहा है। एजेंसी ने 2021-22 के मुकाबले चालू वित्त वर्ष में खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव को देखते हुए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति 2022-23 में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 6.7 प्रतिशत के अनुमान से कुछ अधिक है। आरबीआई मुद्रास्फीति में वृद्धि का प्रमुख कारण रूस-यूक्रेन युद्ध और उससे जिंसों के दाम में तेजी को बताता रहा है। महंगाई दर लगातार रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर (दो से छह प्रतिशत) के ऊपर बनी हुई है। फिलहाल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत है। क्रिसिल रिसर्च ने एक रिपोर्ट में कहा, ह्यह्यखाद्य वस्तुओं की महंगाई दर का मुख्य कारण आपूर्ति की कमी है। आपूर्ति कम होने की वजह रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ घरेलू स्तर पर गर्मी का अचानक से बढ़ना है।' रेटिंग एजेंसी ने कहा, ह्यह्यहमारा अनुमान है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति 6.8 प्रतिशत रहेगी। यह खाद्य मुद्रास्फीति के सात प्रतिशत के स्तर पर रहने के अनुमान पर आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार मौद्रिक नीति समिति के समक्ष खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर एक बड़ी चुनौती है। गर्मी के बढ़ने से उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में औसत तापमान 122 साल के उच्चस्तर पर पहुंच गया था। पारा चढ़ने से गेहूं, मूंगफली, बाजरा और आम जैसे फसलों पर असर पड़ा है। क्रिसिल ने कहा, ह्यह्यलू चलना प्रमुख घरेलू कारण है जिससे इस साल खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े हैं। यह 2020 के आरबीआई के एक अध्ययन की ओर संकेत देता है। इसमें कहा गया है कि खाद्य मुद्रास्फीति पर जलवायु परिवर्तन का व्यापक आर्थिक प्रभाव पिछले दो दशकों में भारत के लिए सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.
टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।
© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse