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Published / 2022-08-28 15:27:52
गेहूं के आयात से ही मिलेगी खाद्य सुरक्षा को मजबूती

एबीएन बिजनेस डेस्क। जब तक हम खाद्य सुरक्षा जरूरतों की चुनौती को पूरा नहीं करते, हमारे पास पैदावार बढ़ाने तथा फसलों में विविधता लाने के लिए उच्च प्रौद्योगिकी नहीं है, जब तक हम आयात में रणनीतिक योजना तथा समन्वय को जोड़ नहीं पाते हैं तब तक भारत में खाद्य सुरक्षा व घरेलू मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए गेहूं का बड़े पैमाने पर आयात आवश्यक होगा। इस साल मार्च में उत्तर भारत में असाधारण गर्मी पड़ी जिसके कारण गेहूं की पैदावार में कमी आई है। उत्तरी यूरोप में गर्मी की लहर और भी खराब थी जिसके कारण गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ। गर्मी की लहर तथा यूक्रेन से निर्यात में गिरावट के कारण दुनिया में लगभग 14 मिलियन टन गेहूं की कमी हो सकती है। इससे गेहूं की कीमतों में उछाल आया है। पर्याप्त आपूर्ति के लिए राजनयिक और वाणिज्यिक दोनों ही स्तरों पर जोरदार प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें गोदामों में संग्रहित पिछले साल का अनाज भी शामिल है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि बम्पर फसल होने के कारण भारत दुनिया को खिला सकता है, लेकिन मार्च में पड़ी तेज गर्मी के बाद फसल उत्पादन के पुनर्मूल्यांकन के कारण जल्दबाजी में गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह ऐसा कदम था जिसने ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण अप्रत्याशित लाभ की उम्मीद कर रहे किसानों को निराश कर दिया। अब स्थिति गंभीर हो सकती है। इस साल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत तक कम रह सकता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम- पीडीएस) और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) दोनों ही योजनाओं के लिए अधिक खाद्यान्न आवंटन के साथ ही कम खरीदी के कारण वर्तमान स्टॉक पर्याप्त से कम है। पीडीएस तथा पीएमजीकेएवाई (मुफ्त खाद्यान्न योजना) के साथ देश की कुल वार्षिक आवश्यकता लगभग 32 मिलियन टन है। इसमें 8 मीट्रिक टन का न्यूनतम बफर स्टॉक भी जोड़ना होगा जिसे आकस्मिकताओं, आपात स्थितियों और मूल्य स्थिरीकरण के लिए बनाए रखना होता है। दुर्भाग्य से वर्तमान स्टॉक में, जिसमें पिछले साल से कैरी ओवर स्टॉक शामिल है; करीब 20 मीट्रिक टन की नयी खरीद की कमी नजर आती है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग इस संभावित कमी से इनकार करता है। हालांकि किसी भी आसन्न कमी का सबसे अच्छा संकेत कीमतों से मालूम पड़ता है। गेहूं की महंगाई दर 12 फीसदी पर चल रही है। व्यापारियों का अनुमान है कि पिछले साल के 111 मीट्रिक टन की तुलना में इस साल केवल 95 मीट्रिक टन उत्पादन होगा जो काफी कम है। यहां तक कि अमेरिका के कृषि विभाग के एक स्वतंत्र आकलन में भी इस साल भारत में गेहूं का उत्पादन 98 मीट्रिक टन होने का अनुमान है। पीएमजीकेएवाई के तहत खाद्यान्न वितरण की प्रतिबद्धता को हाल ही में छठी बार सितंबर 2022 के अंत तक बढ़ाया गया है। मुफ्त खाद्यान्न के हस्तांतरण ने न केवल कुछ मात्रा में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है बल्कि लाभार्थियों को खाद्य मुद्रास्फीति से भी बचाया भी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लाभ नकद के बजाय वस्तु रूप में दिया गया था। छठे चरण के लिए कुल वृद्धिशील परिव्यय लगभग 80,000 करोड़ रुपये है। कोविड-19 की पहली लहर के दौरान शुरू किए गए पीएमजीकेएवाई के लाभों को कम करने के बारे में सरकार विचार कर सकती है लेकिन पीएमजीकेएवाई की समाप्ति अचानक नहीं होनी चाहिए। इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि गेहूं का आयात न तो राष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात है और न ही इसका राजनीतिकरण किया जाना चाहिए। यह गर्व की बात है कि हरित क्रांति की प्रारंभिक सफलता और किसानों को उत्पादन हेतु प्रोत्साहन देने वाली सार्वजनिक खरीद की नीतियों के बाद भारत कई दशकों से खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर रहा है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में भारतीयों की भोजन पद्धति में विभिन्न प्रकार के बदलाव दिखाई दे रहे हैं। सबसे पहले ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाज के उपभोग के बदले गेहूं और चावल जैसे अनाज खाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। दूसरे, मांस, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों की खपत में वृद्धि हुई है। इसके लिए पशुओं को आहार के रूप में देने के लिए मक्का और सोया सहित खाद्यान्न के बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता होती है। वास्तव में पशु आहार की मांग तेजी से बढ़ी है जिसके कारण लागत भी बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप दूध की कीमतों में बहुत वृद्धि हुई है। अनाज सेवन बदलने का तीसरा कारण समाज में रेस्तरां और सामुदायिक रसोई में रेडीमेड भोजन के रूप में अधिक भोजन परोसा जा रहा है जिसका अधिकतर भाग बरबाद हो जाता है। इस वजह से भी खाद्यान्न की मांग में वृद्धि की संभावना है। इस प्रकार यदि हम बदलते उपभोग पैटर्न, बढ़ती आय और समृद्धि को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न की मांग को बढ़े स्वरूप में देखते हैं तो यह स्पष्ट है कि उत्पादकता, पैदावार तथा रकबे की वृद्धि की वर्तमान दर पर घरेलू उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए देर-सबेर भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए आयात से महत्वपूर्ण संबंध रखने वाली योजना बनानी होगी या भारतीयकंपनियों को ऑस्ट्रेलिया या इथियोपिया जैसे देशों में खाद्य उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना होगा जहां खेती के लिए पर्याप्त जमीनें हैं। भले ही भारत को बदलते उपभोग पैटर्न के कारण बढ़ती घरेलू अपर्याप्तता की वजह से खाद्य आयात की योजना बनानी पड़ रही है लेकिन हकीकत यह है कि खाद्य असुरक्षा की वर्तमान स्थिति गंभीर है। हाल ही में प्रकाशित स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019-21 के दौरान भारत की 40.6 प्रतिशत आबादी मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा से पीड़ित थी। गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षित लोगों का अनुपात 2018-20 में 20.3 प्रतिशत से बढ़कर 22.3 प्रतिशत हो गया है। विश्व में यह औसत 10.7 प्रतिशत से भी कम है। इस प्रकार दुनिया के एक तिहाई से अधिक भूखे और कुपोषित लोग भारत में हैं जो यदि शर्मनाक नहीं तो चिंताजनक जरूर है। वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स- जीएचआई) में भी भारत की रैंक 116 देशों की सूची में गिरकर 101 पर आ गई है। अलबत्ता जीएचआई स्कोर में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हो रहा है लेकिन 27.5 का नवीनतम स्कोर अभी भी गंभीर माना जाता है। यहां तक कि अनाज के विकसित न होने, बरबादी और बाल कुपोषण जैसे अनेक उप-घटक भी चिंताजनक हैं। जीएचआई की गणना बाल मृत्यु दर, बच्चों के कुपोषण तथा खाद्य आपूर्ति पर्याप्तता के तीन आयामों का उपयोग करके की जाती है। आयातित खाद्य तेलों पर भारत की बहुत अधिक निर्भरता खाद्य अर्थव्यवस्था का एक अन्य पहलू है। दालें, प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं लेकिन इनके उत्पादन में भी वृद्धि नहीं हुई है। दालों का आयात कुल खपत का 10 से 15 प्रतिशत है। भविष्य में इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है। भारत में दूध का उत्पादन दुनिया में सबसे अधिक है लेकिन खपत के मामले में विश्व औसत तक आने के लिए प्रति व्यक्ति खपत को काफी बढ़ाने की आवश्यकता है। प्रति व्यक्ति दूध की खपत बढ़ाने के लिए दूध उत्पादन हेतु मकई जैसे पशु फीडस्टॉक के बहुत अधिक उत्पन्न होने की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह भी है कि कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि का दबाव है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि निकट भविष्य में खाद्य आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ेगी। इन सब बातों को देखते हुए खाद्यान्न आयात का मुद्दा यह अपने आप में न तो राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मामला है और न ही शर्मिंदगी का। हम आखिरकार ऊर्जा के बड़े आयातक हैं और जिसे हम नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक उपयोग के साथ कम करने की उम्मीद करते हैं। इसी तरह आने वाले वर्षों में हमें आयात बढ़ाकर और रणनीतिक योजना और समन्वय के साथ इसे जोड़कर खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने की चुनौती का सामना करना होगा। उत्पादकता बढ़ाने और फसल विविधीकरण सुनिश्चित करने में नवीनतम प्रौद्योगिकी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वैसे, जब तक हम खाद्य सुरक्षा जरूरतों की चुनौती को पूरा नहीं करते, हमारे पास पैदावार बढ़ाने तथा फसलों में विविधता लाने के लिए उच्च प्रौद्योगिकी नहीं है, जब तक हम आयात में रणनीतिक योजना तथा समन्वय को जोड़ नहीं पाते हैं तब तक भारत में खाद्य सुरक्षा व घरेलू मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए गेहूं का बड़े पैमाने पर आयात आवश्यक होगा।

Published / 2022-08-25 17:32:38
रूफटॉप सौर क्षमता अप्रैल-जून में 25% घटकर 389 मेगावॉट पर : मेरकॉम इंडिया

एबीएन सेंट्रल डेस्क। स्वच्छ ऊर्जा के बारे में जानकारी और परामर्श देने वाली मेरकॉम इंडिया की 2022 की दूसरी तिमाही की रूफटॉप सोलर मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 की दूसरी तिमाही के दौरान छतों पर लगी सौर परियोजनाएं, कुल सौर परियोजनाओं का 10 प्रतिशत थे। दूसरी तिमाही के अंत में भारत की कुल रूफटॉप सौर क्षमता 7.9 गीगावॉट से अधिक थी। इस साल की पहली छमाही यानी जनवरी-जून में रूफटॉप सौर क्षमता पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दो प्रतिशत घटकर 845 मेगावॉट रह गयी। मेरकॉम कैपिटल ग्रुप के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) राज प्रभु ने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दे, उच्च घटक लागत और मूल सीमा शुल्क ने दूसरी तिमाही में बाजार को प्रभावित किया है। सरकार ने एक अप्रैल 2022 से सौर मॉड्यूल पर 40 प्रतिशत और सौर सेल पर 25 प्रतिशत का मूल सीमा शुल्क लगाया है।

Published / 2022-08-24 15:08:30
आखि क्या है ओपन आफर? जानें कैसे तय होती है इसकी कीमत...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अडानी समूह ने अप्रत्यक्ष रूप से एनडीटीवी में 29.18 फीसदी हिस्सेदारी का अधिग्रहण करने के बाद कंपनी के अतिरिक्?त 26 फीसदी शेयर पाने के लिए ओपन आॅफर जारी कर दिया है। अडानी समूह ने 294 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर एनडीटीवी को 26 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 493 करोड़ रुपये का आॅफर दिया है। मंगलवार को हुए इस घटनाक्रम ने ओपन आॅफर को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है, जिसका उपयोग कंपनियों द्वारा दूसरी फर्म का अधिग्रहण के लिए किया जाता है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के अनुसार, ओपन आॅफर वह कंपनी ला सकती है जो किसी कंपनी के शेयरों का अधिग्रहण कर रही है। अधिग्रहण करने वाली कंपनी टार्गेट कंपनी के शेयरधारकों को जब एक निश्चित मूल्य पर शेयर बेचने को आमंत्रित करती है तो वह ओपन आॅफर कहलाता है। एक ओपन आॅफर का उद्देश्य कंपनी पर नियंत्रण में बदलाव होने या फिर फिर शेयरों का पर्याप्त अधिग्रहण होने पर कंपनी के शेयरधारकों को कंपनी से बाहर निकले का विकल्प देना होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह कंपनी के माइनॉरिटी शेयर होल्डर को पहले से तय कीमत पर अपने शेयर अपनी मर्जी से नए निवेशक को बेचने का एक साधन है। ओपन आॅफर कब लाया जाता है : लाइव मिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेयरधारकों से स्टॉक खरीदने के लिए ओपन आॅफर तब लाया जाता है जब एक इकाई ने टार्गेट कंपनी के शेयरों, मतदान के अधिकार या नियंत्रण का अधिग्रहण कर लिया है या ऐसा करने की सहमति व्यक्त की है। सेबी ने इसके लिए कुछ मानक स्थापित किए हैं। ओपन आॅफर के लिए आॅफर लाने वाली कंपनी ने टार्गेट कंपनी के 25 फीसदी से ज्यादा शेयरों का अधिग्रहण कर लिया हो या फिर एक वित्त वर्ष में पांच फीसदी से ज्यादा शेयर या वोटिंग अधिकार हासिल कर लिया हो। ओपन आॅफर की कीमत कैसे तय की जाती है : सेबी का टेकओवर कोड में एक ओपन आॅफर में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अधिग्रहित किए जाने वाले शेयरों की कीमत निर्धारण के फामूर्ले का वर्णन किया गया है। ओपन आॅफर के मूल्य तय करने के चार मेट्रिक्स हैं- (क) मूल्य 52 सप्ताह में किसी शेयर के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस से अधिक होना चाहिए या (ख) ओपन आफर की घोषणा से पहले 26 सप्ताह में अधिग्रहणकर्ता द्वारा भुगतान की गई उच्चतम कीमत के बराबर इसका रेट होना चाहिए या (ग) ओपन आफर घोषणा से 60 दिन पहले शेयर की वॉल्यूम वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस के बराबर रेट हो (घ) शेयर खरीद समझौते के तहत उच्चतम नेगोशिएटिड मूल्य हो।

Published / 2022-08-24 08:00:58
झटके पे झटका... गेहूं के बाद अब चावल की भी खुदरा कीमतें 6.31% बढ़ीं

एबीएन बिजनेस डेस्क। आपूर्ति संबंधी चिंताओं के कारण गेहूं के बाद अब देशभर में चावल की खुदरा कीमतें एक साल पहले के मुकाबले 6.31 फीसदी बढ़ गईं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, खुदरा बाजार में चावल 37.7 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रहा है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने कहा, उस रिपोर्ट के बाद चावल की खुदरा कीमत बढ़ी है, जिसमें कहा गया था कि चालू खरीफ मौसम में धान की बुवाई 8.25% घटने की वजह से कुल उत्पादन घट सकता है। आटा भी 17% महंगा : आंकड़ों के मुताबिक, गेहूं की औसत खुदरा कीमत 22 अगस्त तक 22 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 31.04 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गईं। एक साल पहले भाव 25.41 रुपये प्रति किलो था। • इसके अलावा, खुदरा बाजार में आटा की कीमत 17 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 35.17 रुपये प्रति किलो पहुंच गई। एक साल पहले भाव 30.04 रुपये प्रति किलो था।

Published / 2022-08-24 07:55:02
2030 तक हर साल 1.7 करोड़ से ज्यादा ई-वाहन बेचने की तैयारी

एबीएन बिजनेस डेस्क। देश में 2030 तक हर साल 1.7 करोड़ से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन बिकेंगे। भारत ऊर्जा भंडारण गठबंधन (आईईएसए) ने मंगलवार को कहा, घरेलू ईवी उद्योग में 2021 से 2030 के बीच हर साल 49% की रफ्तार से बढ़ोतरी हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है, ईंधन की बढ़ती कीमतों, नए कंपनियों के प्रवेश, ईवी प्रौद्योगिकी में उन्नति, केंद्र और राज्य सरकारों से लगातार सब्सिडी मिलने की वजह से ईवी उद्योग में तेजी आएगी। इसके अलावा, उत्सर्जन मानकों को लागू करने से भी इन्हें बढ़ावा मिलेगा। • रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में ईवी उद्योग ने 2020 में महामारी के चलते आई मंदी के बाद तेजी से वापसी की है। ई-दोपहिया वाहनों की घरेलू ईवी बाजार में 2021 के दौरान कुल 50 फीसदी हिस्सेदारी थी। • ई-दोपहिया वाहनों की कुल बिक्री 4.67 लाख इकाई से अधिक रही। इसके बाद धीमी गति वाले ई-तिपहिया वाहनों का स्थान रहा।

Published / 2022-08-21 11:54:09
विदेशी बाजार में भाव गिरने से खाद्य तेल की कीमतों में और राहत की उम्मीद

एबीएन सेंट्रल डेस्क। शिकागो एक्सचेंज के लगभग आधा प्रतिशत मजबूती के साथ बंद होने से शनिवार को दिल्ली तेल-तिलहन बाजार में सोयाबीन तेल की कीमतों में सुधार देखने को मिला जबकि आयात भाव के मुकाबले सोयाबीन का स्थानीय भाव कम होने से सोयाबीन तिलहन के भाव पूर्व-स्तर पर बने रहे। वहीं पामोलीन तेल के भाव टूटने के बीच बाकी लगभग सभी खाद्य तेल-तिलहनों की कीमतें पिछले स्तर पर बंद हुईं। वहीं बाजार के सूत्रों ने कहा कि फिलहाल खाद्य तेलों के दाम काफी नीचे हैं लेकिन खुदरा कीमतों में खास गिरावट नहीं आई है ऐसे में कीमतों में और गिरावट की पूरी गुंजाइश है। बाजार के जानकार सूत्रों ने बताया कि सोयाबीन डीगम तेल का आयात कहीं महंगा बैठता है और इस तेल का स्थानीय भाव भी कमजोर होने से इसके आयात में नुकसान है। पामोलीन तेल का भाव इतना कम है कि इसके आगे कोई खाद्यतेल नहीं टिकेगा। पामोलीन इसी तरह सस्ता बना रहा तो अगले लगभग सवा महीने बाद आने वाली सोयाबीन, मूंगफली और बिनौला की फसल की खपत को लेकर दिक्कत आ सकती है। सूत्रों ने कहा कि ऐसा होने पर सरकार को घरेलू किसानों के हित साधने के लिए समुचित कदम उठाने होंगे। विदेशों में खाद्य तेलों के भाव टूट गए हैं और सरकार ने आयात शुल्क में भी ढील दे रखी है। इसके बावजूद कीमतों में हुई टूट के मुकाबले उपभोक्ताओं को उसका 25-30 प्रतिशत भी लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसका कारण खुदरा कारोबार में अधिकतम खुदरा मूल्य जरुरत से कहीं ज्यादा रखा जाना है। सूत्रों ने कहा कि शुक्रवार को दिल्ली के मालवीय नगर में खुदरा कारोबारियों को सरसों तेल 140 रुपए प्रति लीटर के भाव पर बिका जबकि वहां से 180-200 रुपए प्रति लीटर के एमआरपी भाव पर सरसों तेल बेचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे सौदों की निगरानी कर सकती है और उनके बिलों की जांच कर सकती है कि एक सीमा से अधिक कीमत उपभोक्ताओं से क्यों वसूली जा रही है। सूत्रों का कहना है कि यह तेल 145 रुपए प्रति लीटर से अधिक भाव पर नहीं बिकना चाहिए। थोक कारोबारियों का मार्जिन बेहद कम है पर खुदरा में एमआरपी के बहाने अधिक कीमत वसूली जा रही है। सूत्रों ने कहा कि विदेशों में जिस मात्रा में भाव टूटे हैं, उसी के अनुरूप भारत में भी तेल कीमतें कम होनी चाहिए।

Published / 2022-08-20 15:36:00
निवेश से जुड़ी सलाह और अविवेकी चयन

एबीएन बिजनेस डेस्क (देवाशीष बसु)। मीडिया रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) शोध विश्लेषकों और निवेश सलाहकारों की सेवाओं को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है। इसके लिए उन नियमों में एक बार फिर बदलाव किया जाएगा जिनसे ये शासित होते हैं। बात की शुरुआत एक प्रकटीकरण से करते हैं। मैं एक कंपनी चलाता हूं जो सेबी द्वारा विनियमित है और ऐसे में मेरा नजरिया निरपेक्ष नहीं होगा। बहरहाल, मैं इस बारे में कुछ अंत:दृ?ष्टि प्रदान कर सकता हूं कि निवेशकों को किस चीज की तलाश है। कुछ ऐसी बातें जिनका अनुमान शायद उन लोगों को नहीं होगा जो वास्तव में व्यावहारिक रूप से काम नहीं कर रहे हैं। सेबी ने निवेश सलाहकारों को 2013 में और शोध विश्लेषकों को 2014 में नियामकीय दायरे में शामिल किया। निवेश सलाहकार प्राय: पारिवारिक चिकित्सकों की तरह होते हैं जिसे परिवार के हर सदस्य के स्वास्थ्य की पूरी जानकारी होती है। जो बातें चिकित्सक स्वास्थ्य के बारे में जानता है वही बातें निवेश सलाहकार को आपकी संपत्ति के बारे में जानना चाहिए। परंतु यह तुलना यहीं समाप्त हो जाती है। यदि एक से 100 के पैमाने पर चिकित्सकों पर नियामकीय बोझ का स्तर 10 है तो निवेश सलाहकारों के लिए यह 100 है। चिकित्सक हमारी जिंदगी से ताल्लुक रखते हैं। 2013 और 2016 के सेबी नियमन के जरिये पहले ही ग्राहकों के जोखिम के अनिवार्य आकलन, अनुशंसित उत्पादों की उपयुक्तता और दी जाने वाली हर सलाह की उपयुक्तता और व्यवहार्यता पर ध्यान दिया जा चुका था। निवेश सलाहकारों के पास यकीनन एक दस्तावेजीकृत प्रक्रिया होनी चाहिए जिसके मुताबिक वे ग्राहक की जरूरत और वित्तीय स्थिति के अनुसार निवेश का निर्णय कर सकें। उनके पास यह मानने का उचित आधार भी होना चाहिए कि कोई अनुशंसा या लेनदेन ग्राहक के लक्ष्यों और जोखिम प्रोफाइल के अनुरूप है। ये नियमन अब और अधिक सख्त होते जा रहे हैं। सन 2019-21 के दौरान सेबी ने कुछ और बदलाव किए। उसने 23 सितंबर, 2020 को अतिरिक्त दिशा-निर्देश जारी कर दिए। यानी जुलाई 2020 में किए गए व्यापक बदलाव के दो माह के भीतर। इन बदलावों के परिणामस्वरूप निवेश सलाहकार क्रेडिट कार्ड से शुल्क नहीं ले सकते और उन्हें 26 प्रावधानों वाले निवेशक समझौते पर हस्ताक्षर करने होते हैं। इसके अलावा उन्हें लिखित और हस्ताक्षरित लिखित रिकॉर्ड रखने होते हैं, टेलीफोन की रिकॉर्डिंग, ईमेल, एसएमएस संदेश तथा अन्य विधिक रूप से जांचे जा सकने लायक रिकॉर्ड कम से कम पांच वर्ष तक रखने होते हैं। क्या ऐसी व्यवस्था व्यावहारिक है : निवेशक सलाहकार को इनका अनुपालन करने के लिए कर्मचारियों की पूरी फौज रखनी होगी। यदि एक चिकित्सक को हर मरीज के साथ 25 पन्नों पर हस्ताक्षर करने पड़े और हर मरीज को लिखे जाने वाले पर्चे को पांच वर्ष तक संभालना हो तथा हर वर्ष पूरी आॅडिट कराना हो तो वह एक दिन में शायद कुछ मरीज ही देख पाएगा। इस स्थिति में स्वास्थ्य सेवा अधिकांश लोगों की पहुंच से बाहर निकल जाएगी। यहां मूल विषय है सेबी का आदर्श निवेश सलाहकार का विचार जिसे अपने ग्राहक की पूरी वित्तीय जानकारी हो, उसके लक्ष्य और प्राथमिकताओं के बारे में, उसकी उधारी के बारे में, उसका वर्तमान निवेश, बचत, व्यय और व्यय और व्यक्तिगत कर आदि सब पता हो ताकि वह उसे एक समग्र राय दे सके। सेबी के दिमाग में जो चल रहा था उस पर उन व्यापक केस अध्ययन ने मुहर लगा दी जिन्हें निवेश सलाहकारों को हर तीसरे वर्ष राष्ट्रीय प्रतिभूति बाजार संस्थान (एनआईएसएम) की अनिवार्य परीक्षा पास करने के लिए पढ़ना पड़ता। सेबी की यह चाह हो सकती है कि सलाहकार व्यापक आंकड़े जुटाएं और अधिक विशिष्ट सेवा प्रदान करें लेकिन कई बार ग्राहक ही अपना ब्योरा नहीं देना चाहते। कुछ लोग विभिन्न सलाहकारों की सेवा का इस्तेमाल करना चाहते हैं जबकि अन्य पूरा भरोसा नहीं करते। दूसरी ओर फिनटेक कंपनियों का संचालन कर रहे वित्तीय उद्यमी एमेजॉन जैसी उपभोक्ता तकनीक को वित्तीय दुनिया में प्रतिरोपित करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ ही महीनों में उनके लाखों ग्राहक हो जाएं। इतने बड़े पैमाने पर काम तभी हो सकता है जब न्यूनतम हस्तक्षेप हो, भौतिक प्रतिक्रिया न के बराबर हो और सारी प्रक्रिया महज कुछ मिनटों में समाप्त हो जाए। मौजूदा नियमन के तहत ऐसा कर पाना असंभव है और सेबी तथा फिनटेक कंपनियां दोनों का लक्ष्य है कि उचित निवेश सलाह लाखों लोगों तक पहुंचायी जा सके। फिनटेक कंपनियों की नजर में सेबी का वास्तविक निवेश सलाहकार का मॉडल गुजरे जमाने की व्यवस्था है। फिलहाल फिनटेक कंपनियां मशविरा देने और जोखिम प्रोफाइलिंग का काम कर रही हैं वह भी बिना सेबी के नियमों की परवाह किए। सवाल यह है कि उपभोक्ता क्या चाहते हैं : क्या हर ग्राहक को अत्यधिक गुणवत्तापूर्ण वित्तीय सलाह चाहिए या कुछ लोग सामान्य सलाह से संतुष्ट होंगे? याद रखिए कि वित्तीय नियोजन बिकता है, उसे खरीदना नहीं जाता। चिकित्सक के पास जाना किसी बीमार के लिए जरूरी हो सकता है लेकिन किसी वित्तीय सलाहकार के सामने बैठना जरूरी नहीं है। हमें अपने ग्राहकों से जो हजारों सवाल मिलते हैं उनमें से 80 प्रतिशत को व्यापक तौर पर तीन श्रे?णियों में बांटा जा सकता है: पहली, मेरे पास पांच लाख रुपये की अधिशेष राशि बैंक में रखी है, मुझे उसे कहां निवेश करना चाहिए? दूसरा, यह मेरा पोर्टफोलियो है। क्या मुझे इन शेयरों को अपने पास रखना चाहिए या बेच देना चाहिए? तीसरा, फलाने शेयर या फंड के बारे में आपकी क्या राय है? सेबी के मौजूदा नियमन के अधीन निवेशक सलाहकार इनमें से किसी सवाल का जवाब तब तक नहीं दे सकता जब तक कि उसे वित्तीय नियोजन के बारे में भरपूर जानकारियां न हों। फिनटेक कंपनियां सेबी की मांग की भौतिक प्रक्रिया से कैसे निपटती हैं? वे ऐसा नहीं कर सकतीं। उनकी प्रक्रियाएं सेबी के नियमन का उल्लंघन करती हैं। पश्चिम में रोबो सलाह शुरू होने के एक दशक बाद 2016 में सेबी ने एक चर्चा पत्र में इसका उल्लेख किया लेकिन नियमन में इसकी इजाजत नहीं दी। इसके बावजूद बिना नियामकीय कदमों के भय के इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। ग्राहकों की जरूरत पूरी करने के लिहाज से शुरू की गई एक तरह की सेवा ने शोध विश्लेषकों और निवेश सलाहकारों के बीच के अंतर को धुंधला कर दिया है। यह दुख की बात है कि सेबी के कुछ नियम बहुत अस्पष्ट हैं लेकिन नियामक ने निवेश सलाहकारों द्वारा मानकों के उल्लंघन के मामलों में? किसी तरह की नरमी नहीं दिखाई। हकीकत में ग्राहकों की आवश्यकता, फिनटेक कंपनियों द्वारा उन्हें की जा रही पेशकश और निवेश सलाहकारों से सेबी की अपेक्षाओं में काफी अंतर है। मैं इस अंतर को दूर करने के लिए पेश किए जाने वाले चर्चा पत्र की प्रतीक्षा कर रहा हूं। (लेखक मनीलाइफडॉटइन के संपादक हैं।)

Published / 2022-08-20 12:49:42
मिजोरम से दुबई भेजी गई अनानास की पहली खेप

एबीएन सेंट्रल डेस्क। मिजोरम में उगाए गए अनानास को पहली बार दुबई निर्यात किया गया है। पहली खेप के तौर पर 230 किलोग्राम अनानास शुक्रवार को दुबई के लिए रवाना किया गया। मिजोरम के उप मुख्यमंत्री तॉनलुइया ने अनानास की इस निर्यात खेप को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि राज्य में उगाए गए अनानास को कतर की राजधानी दोहा में और बहरीन भी भेजने की तैयारी चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि खाजॉल जिले के सैलहॉक गांव के किसानों ने अनानास की खेती की है। उसमें से 230 किलोग्राम अनानास की खेप को दुबई रवाना किया गया। राज्य के बागवानी विकास बोर्ड उपाध्यक्ष एफ लालननमाविया ने इसे मिजोरम के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि बताया। बागवानी विभाग में सचिव के ललथममाविया ने बताया कि सैलहॉक से और 900 किलो अनानास को दुबई भेजा जाएगा। इसके अलावा 740-740 किलो की खेप जल्द ही कतर और बहरीन भी भेजी जाएगी।

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