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Published / 2022-09-09 15:59:44
पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर शीघ्र लगेगा लगाम : वित्त मंत्री

एबीएन बिजनेस डेस्क। कच्चे तेल की कम होती कीमत के बीच भी पेट्रोल-डीजल के रेट पुराने स्तर पर ही कायम हैं। तेल की कीमत से जनता को राहत देने के लिए पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि सरकार अब हर 15 दिन में कच्चा तेल, डीजल-पेट्रोल और विमान ईंधन पर लगाए गए नए टैक्स की समीक्षा करेगी। अंतरराष्ट्रीय कीमत को ध्यान में रखते हुए करों की समीक्षा हर पखवाड़े की जायेगी। इसके बाद पिछले दिनों केंद्र सरकार ने डीजल और विमानन ईंधन पर विंडफॉल प्रॉफिट टैक्स बढ़ाने का फैसला किया था। इसके अलावा सरकार ने घरेलू क्रूड आॅयल पर भी टैक्स बढ़ाने का निर्णय लिया था। इस बदलाव को 1 सितंबर से लागू भी कर दिया गया है। यह निर्णय सरकार की तरफ से क्रूड की बेलगाम होती कीमत के बीच लिया गया था। हालांकि फिलहाल क्रूड 7 महीने के निचले स्तर पर चल रहा है। उन्होंने यह भी कहा, हम निर्यात को हतोत्साहित नहीं करना चाहते लेकिन घरेलू स्तर पर उपलब्धता बढ़ाना चाहते हैं। यदि तेल की उपलब्धता नहीं होगी और निर्यात अप्रत्याशित लाभ के साथ होता रहेगा तो कुछ हिस्सा देशवासियों के लिए भी रखना जरूरी है। घरेलू स्तर पर उत्पादित कच्चे तेल पर 23,250 रुपये प्रति टन का कर लगाया गया है। राजस्व सचिव तरुण बजाज ने कहा कि नया कर सेज इकाइयों पर भी लागू होगा। लेकिन उनके निर्यात को लेकर पाबंदी नहीं होगी। इसके साथ ही रुपये की गिरावट पर वित्त मंत्री ने कहा आरबीआई और सरकार स्थिति पर नजर रख रही है। सरकार आयात पर रुपये के मूल्य के असर को लेकर पूरी तरह सचेत है।

Published / 2022-09-07 15:42:03
गुड न्यूज : आठ महीने के निचले स्तर पर पहुंची कच्चे तेल की कीमत, क्या सस्ता होगा डीजल-पेट्रोल?

एबीएन बिजनेस डेस्क। पेट्रोल और डीजल की कीमत में आने वाले दिनों में कटौती देखने को मिल सकती है। इसकी वजह यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमत में भारी गिरावट आई है। रूस ने तेल की सप्लाई रोकने की धमकी दी है लेकिन इसके बावजूद तेल की कीमत में नरमी आई है। डॉलर की कीमत में तेजी और मांग में कमी की आशंका से तेल की कीमत गिरी है। यूएस बेंचमार्क वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट 85 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है जबकि ग्लोबल ब्रेंट बेंचमार्क की कीमत 90 डॉलर से कम रह गई है। यह जनवरी के बाद इसके न्यूनतम स्तर है। इससे आने वाले दिनों में देश में पेट्रोल और डीजल की कीमत में गिरावट आ सकती है। बुधवार को डॉलर गेज आॅल टाइम हाई पर पहुंच गया। महंगाई को काबू में करने के लिए दुनियाभर के सेंट्रल बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहे हैं। निवेशकों को आशंका है कि दुनिया के कई देश मंदी की चपेट में आ सकते हैं। चीन में महामारी के प्रकोप से बचने के लिए सख्त लॉकडाउन लगाया गया है। इससे मांग प्रभावित हुई है। ओपेक देशों ने उत्पादन में कटौती का फैसला किया था। इससे कच्चे तेल की कीमत में तेजी आई थी। लेकिन उसने इस बढ़त को खो दिया है। सऊदी अरब ने एशिया और यूरोप में अपनी कस्टमर्स के लिए अगले महीने के खेप की कीमत में कटौती की है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 139 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी जो 2008 के बाद इसका उच्चतम स्तर था। लेकिन हाल के दिनों में इसमें गिरावट आई है। हालांकि, भारतीय बाजार में कई महीनों से पेट्रोल और डीजल की कीमत स्थिर बनी हुई है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 96.72 रुपये और डीजल की कीमत 89.62 रुपये प्रति लीटर पर बनी हुई है। मुंबई में पेट्रोल 106.31 रुपये प्रति लीटर और डीजल 94.27 रुपये प्रति लीटर पर मिल रहा है। चेन्नई में पेट्रोल 102.63 रुपये प्रति लीटर पर और डीजल 94.24 रुपये प्रति लीटर पर मिल रहा है। कोलकाता में पेट्रोल 106.03 रुपये प्रति लीटर और डीजल 92.76 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है।

Published / 2022-09-02 17:50:50
इलेक्ट्रिक कार के बाजार में धमाकेदार एंट्री की तैयारी में जुटी मारुति सुजुकी

एबीएन बिजनेस डेस्क। इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी ईवी कार लेने का मन बना रहे हैं, तो थोड़ा सब्र कर लीजिये। हो सकता है इस इंतजार का फल ज्यादा मीठा हो। क्योंकि तब आपको गिने चुने नहीं बल्कि कई ऑप्शन मिलने वाले हैं। ईवी कार लॉन्च करने की कतार में अब एक और दिग्गज कंपनी शामिल हो गई है। देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने ईवी कार लॉन्चिंग का ऐलान कर दिया है। 2024-25 में लॉन्च होगी कार न केवल ऐलान बल्कि लॉन्चिंग का समय भी बता दिया है। जी हां, कंपनी ने फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में कार लॉन्च करने की उम्मीद जताई है। जनरल मीटिंग में शेयरहोल्डर्स के सवालों पर ये जानकारी कंपनी के प्रेसीडेंट आरसी भार्गव ने दी। इस दौरान बताया कि शुरुआती चरण के ईवी को अपर प्राइज बैंड में लॉन्च किया जायेगा। कंपनी अपने ग्रीन एनर्जी प्रोग्राम के अनुसार 2022-23 में 400,000 और 500,000 CNG कारों का निर्माण करेगी, जो 2021-22 में लगभग 250,000 CNG कारों से कहीं अधिक है। ईवी का प्रोडक्शन गुजरात में सुजुकी प्लांट में होने जा रहा है। कंपनी को उम्मीद है ग्राहक ईवी कार को काफी पसंद करेंगे। कार को डिजाइन काफी सावधानी से किया जायेगा। वहीं, बैटरी प्लांट लगने से ईवी में स्वदेशी अभियान को भी बढ़ावा मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को गुजरात के हंसलपुर में सुजुकी के ईवी बैटरी प्लांट की फाउंडेशन रखी थी। फिलहाल कंपनी का हाइब्रिड कार पर फोकस : इधर, पिछले कुछ वर्षों में, कंपनी ने अपनी ईवी योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया था, क्योंकि वह अधिग्रहण की हाई कॉस्ट को लेकर चिंतित थी। साथ ही चार्जिंग स्टेशन की कमी भी रोड़ा बन रही थी। इस बीच कंपनी ने ऑल्टरनेटिव टेक्निक जैसे CNG और हाइब्रिड पर फोकस किया। बता दें कि टाटा मोटर्स, एमजी मोटर, महिंद्रा एंड महिंद्रा, हुंडई और किआ जैसी कंपनी पहले ही ईवी लॉन्च कर चुकी हैं। कैसा रहा है कंपनी का प्रदर्शन : मारुति सुजुकी का मार्केट शेयर 2018-19 में 51.21 प्रतिशत के पीक से 2021-22 में 43.38 प्रतिशत तक गिरा है। इसका नेट प्रॉफिट 2020-21 में 4,389 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 22 में 11.6 प्रतिशत घटकर 3,879 करोड़ रुपये हो गया। 2019-20 से, कंपनी की बिक्री में 16 फीसदी और industry-wide sales में 18 फीसदी की गिरावट आई है। यह गिरावट मूल्य में बढोतरी के कारण हुई जब कंपनी बीएस IV से बीएस VI में स्विच कर रही थी। इसके बाद, 2020-21 में कोविड-19 ने झटका दिया। पिछले कुछ वर्षों में, सेमीकंडक्टर की कमी और यूक्रेन-रूस वॉर ने उद्योग की परेशानी को और बढा दिया है। इससे कार की कीमतों में काफी इजाफा हो गया। हालांकि अब हालात पहले से बेहतर हैं। बिक्री और प्रोडक्शन बढ़ा है। कंपनी के मुताबिक बाजार में हिस्सेदारी तब बढ़ेगी जब स्पोर्ट यूटिलिटी व्हीकल यानी एसयूवी सेगमेंट में अधिक से अधिक वाहन मिलेंगे। हाल ही में एक नई ऑल्टो लॉन्च हुई है। इस साल काफी कुछ अपग्रेडेशन हुआ है।

Published / 2022-09-01 17:48:41
अगस्त में UPI के जरिये 10.73 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन

एबीएन बिजनेस डेस्क। UPI के जरिये डिजिटल भुगतान लेनदेन का मूल्य इस साल अगस्त में बढ़कर 10.73 लाख करोड़ रुपये हो गया। जुलाई में UPI आधारित डिजिटल लेनदेन का मूल्य 10.63 लाख करोड़ रुपये रहा था। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अगस्त माह के दौरान यूपीआई के माध्यम से कुल 6.57 अरब (657 करोड़) लेनदेन हुए, जो पिछले महीने में 6.28 अरब (628 करोड़) रहा था। जून में 10.14 लाख करोड़ रुपये के 5.86 अरब लेनदेन हुए थे। NCPI ढांचे के अन्य आंकड़ों पर गौर करने पर पता चलता है कि तत्काल हस्तांतरण-आधारित आईएमपीएस के जरिये अगस्त में लेनदेन का मूल्य 4.46 लाख करोड़ रुपये रहा। अगस्त में आईएमपीएस के जरिये कुल 46.69 करोड़ लेनदेन हुए। जुलाई में, यह कुल 46.08 करोड़ लेनदेन पर 4.45 लाख करोड़ रुपये रहा था। टोल प्लाजा पर अगस्त में फास्टैग के जरिये 4,245 करोड़ रुपये का लेनदेन हुआ, जो पिछले महीने में 4,162 करोड़ रुपये था।

Published / 2022-09-01 13:04:00
रिपोर्ट का दावा... इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 8 सालों में होगी 5 करोड़

एबीएन बिजनेस डेस्क। साल 2030 तक देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की कुल संख्या लगभग पांच करोड़ पहुंच जायेगी। ये चार्जिंग कंपनियों के लिए एक बड़ा अवसर होगा। सलाहकार फर्म की एक रिपोर्ट में ईवी की संख्या का ये अनुमान लगाया है। रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स चार्जिंग को भी आने वाले समय में एक बड़ा सेक्टर बताया गया है। पीटीआई की खबर के अनुसार, भारत में इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से पॉपुलर हो रहे हैं और ये अब इलेक्ट्रिक वाहनों की ये रेंज समय के साथ मुख्यधारा में भी शामिल होती दिख रही हैं। केपीएमजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समय दोपहिया, तिपहिया और इलेक्ट्रिक बसों की बिक्री में तेजी दर्ज की गई है। सेगमेंट से आ रही है. पिछले वित्त वर्ष में ईवी की बिक्री तीन गुना बढ़ी थी। रिपोर्ट के अनुसार इस समय देशभर में लगभग 1,700 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन हैं, जो कि पर्याप्त नहीं होंगे अगर इसी तरह से इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में बढ़त जारी रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय सड़कों पर मार्च, 2022 तक इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या 10 लाख के आंकड़े को पार कर गई थी। जो कि साल 2030 तक 4.5 से 5 करोड़ तक बढ़ने की संभावना है। ऐसे में ईवी चार्जिंग से जुड़ी कंपनियों के लिए यह एक बड़ा अवसर है।

Published / 2022-08-28 15:27:52
गेहूं के आयात से ही मिलेगी खाद्य सुरक्षा को मजबूती

एबीएन बिजनेस डेस्क। जब तक हम खाद्य सुरक्षा जरूरतों की चुनौती को पूरा नहीं करते, हमारे पास पैदावार बढ़ाने तथा फसलों में विविधता लाने के लिए उच्च प्रौद्योगिकी नहीं है, जब तक हम आयात में रणनीतिक योजना तथा समन्वय को जोड़ नहीं पाते हैं तब तक भारत में खाद्य सुरक्षा व घरेलू मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए गेहूं का बड़े पैमाने पर आयात आवश्यक होगा। इस साल मार्च में उत्तर भारत में असाधारण गर्मी पड़ी जिसके कारण गेहूं की पैदावार में कमी आई है। उत्तरी यूरोप में गर्मी की लहर और भी खराब थी जिसके कारण गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ। गर्मी की लहर तथा यूक्रेन से निर्यात में गिरावट के कारण दुनिया में लगभग 14 मिलियन टन गेहूं की कमी हो सकती है। इससे गेहूं की कीमतों में उछाल आया है। पर्याप्त आपूर्ति के लिए राजनयिक और वाणिज्यिक दोनों ही स्तरों पर जोरदार प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें गोदामों में संग्रहित पिछले साल का अनाज भी शामिल है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आश्वासन दिया था कि बम्पर फसल होने के कारण भारत दुनिया को खिला सकता है, लेकिन मार्च में पड़ी तेज गर्मी के बाद फसल उत्पादन के पुनर्मूल्यांकन के कारण जल्दबाजी में गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह ऐसा कदम था जिसने ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण अप्रत्याशित लाभ की उम्मीद कर रहे किसानों को निराश कर दिया। अब स्थिति गंभीर हो सकती है। इस साल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में 10 प्रतिशत तक कम रह सकता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम- पीडीएस) और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) दोनों ही योजनाओं के लिए अधिक खाद्यान्न आवंटन के साथ ही कम खरीदी के कारण वर्तमान स्टॉक पर्याप्त से कम है। पीडीएस तथा पीएमजीकेएवाई (मुफ्त खाद्यान्न योजना) के साथ देश की कुल वार्षिक आवश्यकता लगभग 32 मिलियन टन है। इसमें 8 मीट्रिक टन का न्यूनतम बफर स्टॉक भी जोड़ना होगा जिसे आकस्मिकताओं, आपात स्थितियों और मूल्य स्थिरीकरण के लिए बनाए रखना होता है। दुर्भाग्य से वर्तमान स्टॉक में, जिसमें पिछले साल से कैरी ओवर स्टॉक शामिल है; करीब 20 मीट्रिक टन की नयी खरीद की कमी नजर आती है। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग इस संभावित कमी से इनकार करता है। हालांकि किसी भी आसन्न कमी का सबसे अच्छा संकेत कीमतों से मालूम पड़ता है। गेहूं की महंगाई दर 12 फीसदी पर चल रही है। व्यापारियों का अनुमान है कि पिछले साल के 111 मीट्रिक टन की तुलना में इस साल केवल 95 मीट्रिक टन उत्पादन होगा जो काफी कम है। यहां तक कि अमेरिका के कृषि विभाग के एक स्वतंत्र आकलन में भी इस साल भारत में गेहूं का उत्पादन 98 मीट्रिक टन होने का अनुमान है। पीएमजीकेएवाई के तहत खाद्यान्न वितरण की प्रतिबद्धता को हाल ही में छठी बार सितंबर 2022 के अंत तक बढ़ाया गया है। मुफ्त खाद्यान्न के हस्तांतरण ने न केवल कुछ मात्रा में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है बल्कि लाभार्थियों को खाद्य मुद्रास्फीति से भी बचाया भी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लाभ नकद के बजाय वस्तु रूप में दिया गया था। छठे चरण के लिए कुल वृद्धिशील परिव्यय लगभग 80,000 करोड़ रुपये है। कोविड-19 की पहली लहर के दौरान शुरू किए गए पीएमजीकेएवाई के लाभों को कम करने के बारे में सरकार विचार कर सकती है लेकिन पीएमजीकेएवाई की समाप्ति अचानक नहीं होनी चाहिए। इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि गेहूं का आयात न तो राष्ट्रीय शर्मिंदगी की बात है और न ही इसका राजनीतिकरण किया जाना चाहिए। यह गर्व की बात है कि हरित क्रांति की प्रारंभिक सफलता और किसानों को उत्पादन हेतु प्रोत्साहन देने वाली सार्वजनिक खरीद की नीतियों के बाद भारत कई दशकों से खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर रहा है, परन्तु पिछले कुछ वर्षों में भारतीयों की भोजन पद्धति में विभिन्न प्रकार के बदलाव दिखाई दे रहे हैं। सबसे पहले ज्वार और बाजरा जैसे मोटे अनाज के उपभोग के बदले गेहूं और चावल जैसे अनाज खाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। दूसरे, मांस, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों की खपत में वृद्धि हुई है। इसके लिए पशुओं को आहार के रूप में देने के लिए मक्का और सोया सहित खाद्यान्न के बड़े पैमाने पर उत्पादन की आवश्यकता होती है। वास्तव में पशु आहार की मांग तेजी से बढ़ी है जिसके कारण लागत भी बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप दूध की कीमतों में बहुत वृद्धि हुई है। अनाज सेवन बदलने का तीसरा कारण समाज में रेस्तरां और सामुदायिक रसोई में रेडीमेड भोजन के रूप में अधिक भोजन परोसा जा रहा है जिसका अधिकतर भाग बरबाद हो जाता है। इस वजह से भी खाद्यान्न की मांग में वृद्धि की संभावना है। इस प्रकार यदि हम बदलते उपभोग पैटर्न, बढ़ती आय और समृद्धि को ध्यान में रखते हुए खाद्यान्न की मांग को बढ़े स्वरूप में देखते हैं तो यह स्पष्ट है कि उत्पादकता, पैदावार तथा रकबे की वृद्धि की वर्तमान दर पर घरेलू उपलब्धता पर्याप्त नहीं होगी। इसलिए देर-सबेर भारत को खाद्य सुरक्षा के लिए आयात से महत्वपूर्ण संबंध रखने वाली योजना बनानी होगी या भारतीयकंपनियों को ऑस्ट्रेलिया या इथियोपिया जैसे देशों में खाद्य उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना होगा जहां खेती के लिए पर्याप्त जमीनें हैं। भले ही भारत को बदलते उपभोग पैटर्न के कारण बढ़ती घरेलू अपर्याप्तता की वजह से खाद्य आयात की योजना बनानी पड़ रही है लेकिन हकीकत यह है कि खाद्य असुरक्षा की वर्तमान स्थिति गंभीर है। हाल ही में प्रकाशित स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019-21 के दौरान भारत की 40.6 प्रतिशत आबादी मध्यम या गंभीर खाद्य असुरक्षा से पीड़ित थी। गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षित लोगों का अनुपात 2018-20 में 20.3 प्रतिशत से बढ़कर 22.3 प्रतिशत हो गया है। विश्व में यह औसत 10.7 प्रतिशत से भी कम है। इस प्रकार दुनिया के एक तिहाई से अधिक भूखे और कुपोषित लोग भारत में हैं जो यदि शर्मनाक नहीं तो चिंताजनक जरूर है। वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स- जीएचआई) में भी भारत की रैंक 116 देशों की सूची में गिरकर 101 पर आ गई है। अलबत्ता जीएचआई स्कोर में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हो रहा है लेकिन 27.5 का नवीनतम स्कोर अभी भी गंभीर माना जाता है। यहां तक कि अनाज के विकसित न होने, बरबादी और बाल कुपोषण जैसे अनेक उप-घटक भी चिंताजनक हैं। जीएचआई की गणना बाल मृत्यु दर, बच्चों के कुपोषण तथा खाद्य आपूर्ति पर्याप्तता के तीन आयामों का उपयोग करके की जाती है। आयातित खाद्य तेलों पर भारत की बहुत अधिक निर्भरता खाद्य अर्थव्यवस्था का एक अन्य पहलू है। दालें, प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं लेकिन इनके उत्पादन में भी वृद्धि नहीं हुई है। दालों का आयात कुल खपत का 10 से 15 प्रतिशत है। भविष्य में इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है। भारत में दूध का उत्पादन दुनिया में सबसे अधिक है लेकिन खपत के मामले में विश्व औसत तक आने के लिए प्रति व्यक्ति खपत को काफी बढ़ाने की आवश्यकता है। प्रति व्यक्ति दूध की खपत बढ़ाने के लिए दूध उत्पादन हेतु मकई जैसे पशु फीडस्टॉक के बहुत अधिक उत्पन्न होने की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह भी है कि कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि का दबाव है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि निकट भविष्य में खाद्य आयात पर भारत की निर्भरता बढ़ेगी। इन सब बातों को देखते हुए खाद्यान्न आयात का मुद्दा यह अपने आप में न तो राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मामला है और न ही शर्मिंदगी का। हम आखिरकार ऊर्जा के बड़े आयातक हैं और जिसे हम नवीकरणीय ऊर्जा के अधिक उपयोग के साथ कम करने की उम्मीद करते हैं। इसी तरह आने वाले वर्षों में हमें आयात बढ़ाकर और रणनीतिक योजना और समन्वय के साथ इसे जोड़कर खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने की चुनौती का सामना करना होगा। उत्पादकता बढ़ाने और फसल विविधीकरण सुनिश्चित करने में नवीनतम प्रौद्योगिकी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। वैसे, जब तक हम खाद्य सुरक्षा जरूरतों की चुनौती को पूरा नहीं करते, हमारे पास पैदावार बढ़ाने तथा फसलों में विविधता लाने के लिए उच्च प्रौद्योगिकी नहीं है, जब तक हम आयात में रणनीतिक योजना तथा समन्वय को जोड़ नहीं पाते हैं तब तक भारत में खाद्य सुरक्षा व घरेलू मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए गेहूं का बड़े पैमाने पर आयात आवश्यक होगा।

Published / 2022-08-25 17:32:38
रूफटॉप सौर क्षमता अप्रैल-जून में 25% घटकर 389 मेगावॉट पर : मेरकॉम इंडिया

एबीएन सेंट्रल डेस्क। स्वच्छ ऊर्जा के बारे में जानकारी और परामर्श देने वाली मेरकॉम इंडिया की 2022 की दूसरी तिमाही की रूफटॉप सोलर मार्केट रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 की दूसरी तिमाही के दौरान छतों पर लगी सौर परियोजनाएं, कुल सौर परियोजनाओं का 10 प्रतिशत थे। दूसरी तिमाही के अंत में भारत की कुल रूफटॉप सौर क्षमता 7.9 गीगावॉट से अधिक थी। इस साल की पहली छमाही यानी जनवरी-जून में रूफटॉप सौर क्षमता पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दो प्रतिशत घटकर 845 मेगावॉट रह गयी। मेरकॉम कैपिटल ग्रुप के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) राज प्रभु ने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दे, उच्च घटक लागत और मूल सीमा शुल्क ने दूसरी तिमाही में बाजार को प्रभावित किया है। सरकार ने एक अप्रैल 2022 से सौर मॉड्यूल पर 40 प्रतिशत और सौर सेल पर 25 प्रतिशत का मूल सीमा शुल्क लगाया है।

Published / 2022-08-24 15:08:30
आखि क्या है ओपन आफर? जानें कैसे तय होती है इसकी कीमत...

एबीएन सेंट्रल डेस्क। अडानी समूह ने अप्रत्यक्ष रूप से एनडीटीवी में 29.18 फीसदी हिस्सेदारी का अधिग्रहण करने के बाद कंपनी के अतिरिक्?त 26 फीसदी शेयर पाने के लिए ओपन आॅफर जारी कर दिया है। अडानी समूह ने 294 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर एनडीटीवी को 26 फीसदी हिस्सेदारी के लिए 493 करोड़ रुपये का आॅफर दिया है। मंगलवार को हुए इस घटनाक्रम ने ओपन आॅफर को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है, जिसका उपयोग कंपनियों द्वारा दूसरी फर्म का अधिग्रहण के लिए किया जाता है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के अनुसार, ओपन आॅफर वह कंपनी ला सकती है जो किसी कंपनी के शेयरों का अधिग्रहण कर रही है। अधिग्रहण करने वाली कंपनी टार्गेट कंपनी के शेयरधारकों को जब एक निश्चित मूल्य पर शेयर बेचने को आमंत्रित करती है तो वह ओपन आॅफर कहलाता है। एक ओपन आॅफर का उद्देश्य कंपनी पर नियंत्रण में बदलाव होने या फिर फिर शेयरों का पर्याप्त अधिग्रहण होने पर कंपनी के शेयरधारकों को कंपनी से बाहर निकले का विकल्प देना होता है। सरल शब्दों में कहें तो यह कंपनी के माइनॉरिटी शेयर होल्डर को पहले से तय कीमत पर अपने शेयर अपनी मर्जी से नए निवेशक को बेचने का एक साधन है। ओपन आॅफर कब लाया जाता है : लाइव मिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, शेयरधारकों से स्टॉक खरीदने के लिए ओपन आॅफर तब लाया जाता है जब एक इकाई ने टार्गेट कंपनी के शेयरों, मतदान के अधिकार या नियंत्रण का अधिग्रहण कर लिया है या ऐसा करने की सहमति व्यक्त की है। सेबी ने इसके लिए कुछ मानक स्थापित किए हैं। ओपन आॅफर के लिए आॅफर लाने वाली कंपनी ने टार्गेट कंपनी के 25 फीसदी से ज्यादा शेयरों का अधिग्रहण कर लिया हो या फिर एक वित्त वर्ष में पांच फीसदी से ज्यादा शेयर या वोटिंग अधिकार हासिल कर लिया हो। ओपन आॅफर की कीमत कैसे तय की जाती है : सेबी का टेकओवर कोड में एक ओपन आॅफर में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अधिग्रहित किए जाने वाले शेयरों की कीमत निर्धारण के फामूर्ले का वर्णन किया गया है। ओपन आॅफर के मूल्य तय करने के चार मेट्रिक्स हैं- (क) मूल्य 52 सप्ताह में किसी शेयर के वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस से अधिक होना चाहिए या (ख) ओपन आफर की घोषणा से पहले 26 सप्ताह में अधिग्रहणकर्ता द्वारा भुगतान की गई उच्चतम कीमत के बराबर इसका रेट होना चाहिए या (ग) ओपन आफर घोषणा से 60 दिन पहले शेयर की वॉल्यूम वेटेड एवरेज मार्केट प्राइस के बराबर रेट हो (घ) शेयर खरीद समझौते के तहत उच्चतम नेगोशिएटिड मूल्य हो।

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