एबीएन बिजनेस डेस्क। हीरो स्प्लेंडर देश में सबसे ज्यादा बिकने वाली बाइक है। इस बाइक को कम कीमत और दमदार परफॉर्मेंस की वजह से काफी पसंद किया जाता है। इस बाइक को टक्कर देने के लिए होंडा ने भी देश हाल ही में किफायती 100 सीसी मोटरसाइकिल उतारी है।
यह होंडा की मोस्ट पॉपुलर बाइक शाइन 125 का छोटा वर्जन शाइन 100 है। भारत में इसकी शुरुआती कीमत 64,900 एक्स शोरूम रखी गयी है और यह सीधे हीरो स्प्लेंडर प्लस को टक्कर देती है।
होंडा ने स्प्लेंडर को टक्कर देने के लिए अपनी नई बाइक को कई नए फीचर्स से लैस किया है। इसकी कीमत भी कम रखी गई है। अगर आप भी डेली यूज के लिए एक कम्यूटर बाइक खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो यहां आपको बता रहे हैं कि कौनसी मोटरसाइकिल आपके लिए सबसे ज्यादा सूटेबल रहेगी। एंट्री-लेवल 100 सीसी कम्यूटर मोटरसाइकिल स्पेसिफिकेशन-बेस्ड कंपेरिजन में कौनसी बाइक बेस्ट है।
डिजाइन के मामले में इन दोनों मोटरसाइकिल बेहतरीन हैं। दोनों को आम लोगों को टारगेट करते हुए डिजाइन किया गया है। सिंपल लुक के साथ दोनों शानदार दिखती हैं। शाइन 100 अपने बड़े वर्जन शाइन 125 की तरह दिखती है, जबकि स्प्लेंडर प्लस कई सालों से एक ही लुक के साथ आ रही है। होंडा शाइन 100 को 5 कलर आप्शन में बेच रही है, जबकि स्प्लेंडर प्लस 12 कलर में उपलब्ध है।
इंजन और पावर
होंडा शाइन 100 में 99.7 सीसी का सिंगल-सिलेंडर एयर-कूल्ड, फ्यूल-इंजेक्टेड इंजन दिया गया है, जो 7.6 बीएचपी और 8.05 एनएम का टार्क आउटपुट देता है। दूसरी ओर हीरो स्प्लेंडर प्लस में 97.2 सीसी का सिंगल-सिलेंडर, एयर-कूल्ड, फ्यूल-इंजेक्टेड इंजन मिलता है, जो 7.9 बीएचपी की पावर और 8.05 एनएम का पीक टॉर्क देता है। ये दोनों मोटरसाइकिलें 4-स्पीड मैनुअल गियरबॉक्स से जुड़े हैं। दोनों बाइक में 60 से 70 किलोमीटर प्रति लीटर तक का माइलेज मिल जाता है।
कीमत
होंडा शाइन 100 को सिंगल वेरिएंट में पेश किया गया है और इसकी कीमत 64,900 रुपये रखी गयी है। दूसरी ओर हीरो स्प्लेंडर प्लस को कई वेरिएंट में पेश किया जाता है, जिसमें रेंज-टॉपिंग फीचर से भरपूर एक्सटेक ट्रिम शामिल है और इसकी कीमत 72,076 रुपये से लेकर 76,346 रुपये तक हैं। सभी कीमत एक्स-शोरूम दिल्ली है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारत में चूंकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक ने पूर्व में ही कई निम्नलिखित निर्णय लिए हैं जिसके चलते भारतीय बैंकों की वित्तीय स्थिति इस संदर्भ में बहुत सुदृढ़ हो गया है।
अमेरिकी वित्तीय क्षेत्र में बैंकों पर भारी संकट आ गया है। अभी तक दो बैंक (सिलिकॉन वैली बैंक एवं सिग्नेचर बैंक) बंद हो चुके हैं और 6 अन्य छोटे आकार के बैंकों (फर्स्ट रिपब्लिक बैंक, वेस्टर्न अलाइन्स बैंक, पैकवेस्ट, यूएमबी फायनैन्शल सहित) पर गम्भीर संकट बना हुआ है। इन बैंकों में रोकड़ एवं तरलता की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है एवं इनके पास अपने जमाकतार्ओं को भुगतान करने के लिए पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं है। इन बैंकों के शेयरों की कीमत पूंजी बाजार में 14 से 30 प्रतिशत के बीच गिर चुकी है।
एक आकलन के अनुसार अमेरिका के 160 बड़े बैंकों (जिनके पास 500 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक राशि की आस्तियां हैं) को 20,600 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक्सान हुआ है। अमेरिका की रेटिंग संस्थाओं स्टैंडर्ड एंड पूअर्स एवं फिच ने कुछ बैंकों की रेटिंग घटाकर जंक श्रेणी में डाल दी है क्योंकि यह बैंक अपने जमाकतार्ओं को राशि वापस करने की स्थिति में नहीं हैं। अमेरिका के सबसे बड़े बैंकों को भी भारी आर्थिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि इनके अमेरिकी बांड्ज में किये गये निवेश की बाजार कीमत कम हो गयी है।
सिटी बैंक समूह को 4,700 करोड़ अमेरिकी डॉलर, बैंक आफ अमेरिका को 2,120 करोड़ अमेरिकी डॉलर, जेपी मोर्गन चेज को 1,730 करोड़ अमेरिकी डॉलर, टरुइस्ट फायनैन्शल को 1,360 करोड़ अमेरिकी डॉलर, वेल्ज फार्गो को 1,340 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं यूएस बैंक कॉर्प को 1,140 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक्सान हुआ है। यह सभी बड़े बैंक हैं अत: इस नुक्सान को सहन कर जाएंगे परंतु छोटे बैंक तो असफल (फैल) ही हो जाने वाले हैं।
दरअसल, अमेरिकी बैंकों में समस्या वहां के केंद्रीय बैंक, यूएस फेड रिजर्व, द्वारा लगातार यूएस फेड रेट में की जा रही वृद्धि के चलते उत्पन्न हुई है। अमेरिका में समस्त बैंकों ने अमेरिकी बांड्ज में भारी भरकम निवेश किया हुआ है। पहले चूंकि अमेरिका में ब्याज दरें कम थीं अत: इन बांड्ज पर कूपन रेट (ब्याज दर) भी कम था और समय के साथ जैसे जैसे अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना शुरू हुआ, नये बांड्ज बढ़ी हुई ब्याज दरों पर जारी किए जाने लगे।
इसके कारण पुराने बांड्ज की बाजार कीमत कम होती चली गई क्योंकि इन बांड्ज पर कम ब्याज दर लागू थी। इन बांड्ज की बाजार कीमत इतनी कम होती गई क्योंकि वह इन बांड्ज में निवेश की गई राशि से भी कम रह गई। अत: इन बैंकों को इन पुराने बांड्ज पर भारी भरकम नुकसान हुआ है। इन बांड्ज को आज के समय में बाजार में बेचने पर इन बैंकों को अपने निवेश की राशि भी नहीं मिल पा रही है। इस प्रकार ये बैंक अपने जमाकर्ताओं को राशि का भुगतान करने में असफल हो रहे हैं।
अमेरिका के साथ ही अन्य कई विकसित देशों ने भी मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से लगातार ब्याज दरों में वृद्धि की है। अत: यूरोपीयन देशों में भी बैंकों में इसी प्रकार की समस्या आ सकती है। क्रेडिट स्विस नामक एक निवेश बैंक में तो इस प्रकार की समस्या दृष्टिगोचर भी है। इस बैंक के शेयर की कीमत पूंजी बाजार में 98 प्रतिशत तक गिर गई है। दरअसल, विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा, मुद्रा स्फीति जो कि कोविड महामारी एवं रूस यूक्रेन युद्ध के चलते उत्पादों की आपूर्ति में आई कमी के कारण उत्पन्न हुई थी, को उत्पादों की मांग में कमी करने के उद्देश्य से, ब्याज दरों में वृद्धि कर नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा था।
यह अपने आप में एक सही निर्णय नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाने के स्थान पर उत्पादों की मांग कम करने के प्रयास किये जा रहे थे, जोकि एक नकारात्मक निर्णय कहा जा सकता है। इसके चलते कई संस्थानों को तो कर्मचारियों की छंटनी भी करनी पड़ी है और अब विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों के इस निर्णय ने इन देशों की बैंकों के लिए भी एक गंभीर वित्तीय संकट खड़ा कर दिया है।
अब यहां प्रश्न यह खड़ा हो रहा है कि अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों की बैंकों के सामने आए इस वित्तीय संकट का प्रभाव क्या भारतीय बैंकों पर भी पड़ेगा। इसके उत्तर में स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारत में चूंकि केंद्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक ने पूर्व में ही कई निम्नलिखित निर्णय लिए हैं जिसके चलते भारतीय बैंकों की वित्तीय स्थिति इस संदर्भ में बहुत सुदृढ़ हो गयी है।
बैंकिंग उद्योग किसी भी देश में अर्थ जगत की रीढ़ माना जाता है।
बैंकिंग उद्योग में आ रही परेशानियों का निदान यदि समय पर नहीं किया जाता है तो आगे चलकर यह समस्या उस देश के अन्य उद्योगों को प्रभावित कर, उस देश के आर्थिक विकास की गति को कम कर सकती है। इसलिए पिछले 8 वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने बैंकों की लगभग हर तरह की समस्याओं के समाधान हेतु कई ईमानदार प्रयास किए हैं। गैरनिष्पादनकारी आस्तियों से निपटने के लिए दिवाला एवं दिवालियापन संहिता लागू की गयी है। देश में सही ब्याज दरों को लागू करने के उद्देश्य से मौद्रिक नीति समिति बनायी गई है। साथ ही, केंद्र सरकार ने इंद्रधनुष योजना को लागू करते हुए, सरकारी क्षेत्र के बैंकों को 3.10 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी उपलब्ध करायी है।
साथ ही, दिनांक 30 अगस्त 2019 को देश की वित्त मंत्री माननीया श्रीमती निर्मला सीतारमण ने बैंकिंग क्षेत्र को और अधिक मजबूत बनाए जाने के उद्देश्य से सरकारी क्षेत्र के बैंकों के आपस में विलय की घोषणा की थी। सरकारी क्षेत्र के बैंकों की, समेकन के माध्यम से, क्षमता अनवरोधित (अनलाक) करने के उद्देश्य से ही सरकारी क्षेत्र के बैंकों के आपस में विलय की घोषणा की गयी थी।
इन बैंकों के विलय में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया था कि इनके विलय से किसी भी ग्राहक को किसी भी प्रकार की कोई परेशानी ना हो, ये तकनीक के लिहाज से एक ही प्लैट्फार्म पर हों, इन बैंकों की संस्कृति एक ही हो तथा इन बैंकों के व्यवसाय में वृद्धि दृष्टिगोचर हो। वर्ष 2017 में भारत में सरकारी क्षेत्र के 27 बैंक थे लेकिन इनके आपस में विलय के बाद अब केवल 12 सरकारी क्षेत्र के बैंक रह जाएंगे। इस प्रकार देश में सरकारी क्षेत्र के बैंकों को अगली पीढ़ी के बैंकों का रूप दिया जा रहा है।
उक्त विलय के बाद इन सरकारी क्षेत्र के बैंकों के बड़े हुए आकार ने इन बैंकों की ऋण प्रदान करने की क्षमता में अभितपूर्व वृद्धि की है। इन बैंकों की राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत उपस्थिति के साथ ही इनकी अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहुंच बन गई है। विलय के बाद इन बैंकों की परिचालन लागत में कमी आई है जिससे इनके द्वारा प्रदान किये जा रहे ऋणों की लागत में भी सुधार हुआ है। इन बैंकों द्वारा बैंकिंग व्यवसाय हेतु, नई तकनीकी के अपनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है जिससे इनकी उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार होता दिखाई दे रहा है। इन बैंकों की बाजार से संसाधनों को जुटाने की क्षमता में भी सुधार हुआ है।
भारत में समस्त वर्गीकृत वाणिज्यिक बैंकों में पूंजी पर्याप्तता अनुपात 31 मार्च 2022 को समाप्त अवधि में 16.7 प्रतिशत के सराहनीय स्तर पर पहुंच गया है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानदंडो के अनुसार, बैंकों में पूंजी पर्याप्तता अनुपात न्यूनतम 8 प्रतिशत (एवं 2.5 प्रतिशत के पूंजी कंजर्वेटिव बफर को मिलाकर 10.5 प्रतिशत) होना बैंकों के लिए आवश्यक माना जाता है। इसी प्रकार, भारत में वगीर्कृत वाणिज्यिक बैंकों की आस्तियों पर आय एवं इक्वटी पर आय भी इस अवधि में संतोषप्रद रही है, जिसके चलते पूंजी पर्याप्तता अनुपात में भी लगातार सुधार हो रहा है।
वर्गीकृत वाणिज्यिक बैंकों में सकल गैरनिष्पादनकारी आस्तियों एवं शुद्ध गैरनिष्पादनकारी आस्तियों का प्रतिशत भी 30 सितंबर 2022 को समाप्त तिमाही में कम होकर 5.0 प्रतिशत (पिछले 7 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर) एवं 1.3 प्रतिशत (पिछले 10 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर) क्रमश: हो गया है। उक्त बैंकों के प्रोविजन कवरेज अनुपात में सुधार हुआ है और यह मार्च 2021 के 67.6 प्रतिशत से बढ़कर 31 मार्च 2022 को 70.9 प्रतिशत हो गया है।
इसका आशय यह है कि इन बैंकों ने अपने खातों में गैरनिष्पादनकारी आस्तियों के लिए पर्याप्त मात्रा में प्रोविजन कर लिया है। यदि आगे आने वाले समय में इन गैरनिष्पादनकारी आस्तियों में समस्या होती है तो बैंकों को इस प्रकार की समस्या से निपटने में आसानी होगी।
भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार भारतीय बैंकों को 4.5 प्रतिशत रोकड़ रिजर्व अनुपात एवं 18 प्रतिशत संवैधानिक रिजर्व अनुपात बनाए रखना होता है। जिसके अंतर्गत बैंकों को रोकड़ एवं सरकारी प्रतिभूतियों के रूप में भारतीय रिजर्व बैंक के पास उक्त राशि जमा रखना होती है, ताकि बैंकों को तरलता सम्बंधी समस्या का सामना नहीं करना पड़े। साथ ही, भारतीय बैकों में प्रति जमाकर्ता के खाते में रुपये 5 लाख तक की जमाराशि का बीमा भी रहता है।
भारतीय बैंकों की उक्त वर्णित स्थिति के चलते भारतीय रिजर्व बैंक की आज पूरी दुनिया में बहुत प्रशंसा हो रही है कि उसने भारतीय बैकों को आज इतनी मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया है। अभी हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ. शक्तिकांत दास को गवर्नर आफ द ईयर अवार्ड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2023 के लिए सेंट्रल बैंकिंग, एक अंतरराष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान जर्नल की ओर से प्रदान किये जाने की घोषणा की गयी है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। अमेजन 9,000 और कर्मचारियों को दिखायेगी बाहर का रास्ता न्यूयॉर्क, 20 मार्च (एपी) ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन अगले कुछ सप्ताह में 9,000 और नौकरियों को खत्म कर सकती है। कंपनी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एंडी जैसी ने सोमवार को कर्मियों को भेजी एक सूचना में यह बात कही है। इसके साथ ही यह छंटनी कंपनी के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी कटौती होगी।
कंपनी ने इससे पहले इसी साल जनवरी में कहा था कि वह 18,000 कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखायेगी। इस तरह 2023 में कंपनी कम से कम 27,000 कर्मचारियों की छंटनी करेगी। जेसी ने कहा कि कंपनी की वार्षिक योजना प्रक्रिया का दूसरा चरण इस महीने पूरा हो गया और इसमें और नौकरियां घटाने का निर्णय लिया गया। उन्होंने कहा कि अमेजन कुछ रणनीतिक विभागों में भर्तियां भी करेगी।
एबीएन बिजनेस डेस्क। एशियाई बाजार से मिले कमजोर संकेतों के साथ ही घरेलू स्तर पर हुयी चौतरफा बिकवाली के दबाव में शेयर बाजार में आज 0.60 प्रतिशत की गिरावट में रहा।
बीएसई का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक 360.95 अंक टूटकर 57628.95 अंक पर और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का निफ्टी 111.65 अंक गिरकर 17 हजार अंक से नीचे 16988.40 अंक पर रहा।
एबीएन बिजनेस डेस्क। शेयर बाजार एनएसई और बीएसई ने बाबा रामदेव की अगुवाई वाले पतंजलि समूह की कंपनी पतंजलि फूड्स लिमिटेड (पीएफएल) के प्रवर्तकों के शेयरों पर रोक लगा दी है। हालांकि कंपनी ने कहा कि इस फैसले का उसके कामकाज पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
पतंजलि फूड्स लिमिटेड (जो पहले रुचि सोया इंडस्ट्रीज थी) ने गुरुवार को कहा कि कंपनी में उसके प्रवर्तकों की शेयरधारित पर रोक लगाने से उसकी वित्तीय स्थिति और कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पीएफएल ने गुरुवार को बताया कि बीएसई और एनएसई ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड, आचार्य बालकृष्ण, पतंजलि परिवहन और पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास समेत समेत उसकी 21 प्रवर्तक इकाइयों के शेयरों के लेनदेन पर न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों का पालन नहीं करने की वजह से रोक लगा दी है।
प्रतिभूति संविदा (विनियमन) नियम, 1957 का नियम 19ए(5) एक सूचीबद्ध इकाई के लिए 25 प्रतिशत की न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता (एमपीएस) रखने को अनिवार्य बनाता है।
पतंजलि फूड्स ने बताया कि उसके प्रवर्तक न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारित को हासिल करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं और इस बारे में विचार-विमर्श किया जा रहा है। उसने कहा कि कंपनी के प्रवर्तकों को पूरा भरोसा है कि वे अगले कुछ महीनों में अनिवार्य एमपीएस प्राप्त कर लेंगे।
मौजूदा समय में कंपनी के 19.18 प्रतिशत शेयर सार्वजनिक शेयरधारकों के पास हैं और एमपीए को हासिल करने के लिए सार्वजनिक शेयरधारिता में 5.82 प्रतिशत की बढ़ोतरी उसे करनी होगी। शेयरों पर रोक के इस आदेश से कुल 29,25,76,299 इक्विटी शेयर प्रभावित होंगे।
एबीएन बिजनेस डेस्क। हीरो इलेक्ट्रिक ने बुधवार को कहा कि वह अगले दो से तीन साल में भारत स्थित विनिर्माण इकाइयों से सालाना 10 लाख से ज्यादा वाहन तैयार करने लगेगी। कंपनी ने अपने तीन इलेक्ट्रिक स्कूटर मॉडल के नये संस्करण पेश किये हैं, जिनकी कीमत 85,000 रुपये से 1.3 लाख रुपये के बीच है।
हीरो इलेक्ट्रिक लगभग 1,200 करोड़ रुपये के निवेश से राजस्थान में एक नया संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है, जिसकी सालाना उत्पादन क्षमता 20 लाख इकाइयों की होगी।
हीरो इलेक्ट्रिक के प्रबंध निदेशक नवीन मुंजाल ने यहां नये मॉडल पेश किये जाने के मौके पर कहा कि देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हमने अपने भागीदारों के साथ मिलकर काम किया है। इसके तहत, हमें यह घोषणा करते हुए गर्व हो रहा है कि हम अपने कारखानों से सालाना 10 लाख से अधिक वाहन विनिर्माण करने के लिए तैयार हैं।
यह पूछने पर कि कंपनी कब 10 लाख इकाई प्रति वर्ष के स्तर को छू सकती है, उन्होंने कहा कि यह अगले दो से तीन वर्षों में हो सकता है। कंपनी को उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष में उसकी बिक्री एक लाख इकाई से अधिक रहेगी और 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 2.5 लाख इकाई हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इस समय इलेक्ट्रिक दोपहिया बाजार में मजबूत वृद्धि देखी जा रही है और हीरो इलेक्ट्रिक इससे उत्साहित है। कंपनी लुधियाना में एक नया कारखाना स्थापित कर रही है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति फरवरी 2023 में घटकर दो साल से भी अधिक समय के निचले स्तर 3.85 प्रतिशत पर आ गई। मंगलवार को जारी सरकारी आंकड़ों से यह जानकारी मिली। थोक मुद्रास्फीति में गिरावट मुख्य रूप से विनिर्मित वस्तुओं, ईंधन और ऊर्जा के दामों में कमी के चलते हुई है। हालांकि इस दौरान खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ी है।
फरवरी 2023 लगातार नौवां महीना है जब थोक मुद्रास्फीति में गिरावट दर्ज की गयी है। डब्ल्यूपीआई आधारित मुद्रास्फीति जनवरी 2023 में 4.73 प्रतिशत और पिछले साल फरवरी में 13.43 प्रतिशत थी।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि फरवरी 2023 में मुद्रास्फीति की दर में कमी की मुख्य वजह कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के दामों में गिरावट, गैर-खाद्य वस्तुओं, खनिजों, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक एवं आप्टिकल उत्पादों, रसायन एवं रासायनिक उत्पादों, इलेक्ट्रिकल उपकरण एवं मोटर वाहन, ट्रेलर एवं सेमी ट्रेलर के दामों में कमी आना है।
फरवरी 2023 में डब्ल्यूपीआई आधारित मुद्रास्फीति की दर जनवरी 2021 के बाद से सबसे कम है। उस समय यह 2.51 प्रतिशत थी। विशेषज्ञों ने कहा कि पिछले वर्ष के अनुकूल तुलनात्मक आधार से मुद्रास्फीति में नरमी आयी है।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में जिसों के दामों में नरमी से डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति और भी घट सकती है। हालांकि खाद्य मुद्रास्फीति का स्तर मौसमी परिस्थितियों और मानसून पर निर्भर करेगा।
विनिर्मित उत्पादों में मुद्रास्फीति घटी है लेकिन खाद्य वस्तुओं की मुद्रास्फीति फरवरी में बढ़कर 3.81 प्रतिशत हो गयी जो जनवरी में 2.38 प्रतिशत थी। दाल के मामले में मुद्रास्फीति 2.59 प्रतिशत रही जबकि सब्जियां 21.53 प्रतिशत सस्ती हुई। तिलहन की महंगाई दर फरवरी, 2023 में 7.38 प्रतिशत घटी।
इंधन और बिजली क्षेत्र में महंगाई जनवरी के 15.15 प्रतिशत से कम होकर फरवरी, 2023 में 14.82 प्रतिशत रह गयी। विनिर्मित उत्पादों में यह 1.94 प्रतिशत रही जबकि जनवरी में यह 2.99 प्रतिशत थी।
इससे पहले खुदरा मुद्रास्फीति में भी कमी दर्ज की गई थी। इसके आंकड़े सोमवार को जारी हुए थे। खाने का सामान एवं इंधन की कीमतों में नरमी के बीच खुदरा मुद्रास्फीति फरवरी में मामूली घटकर 6.44 प्रतिशत पर रही। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति जनवरी में 6.52 प्रतिशत थी।
एबीएन बिजनेस डेस्क। गर्मी के मौसम में अमूमन महंगे होने वाले फ्रिज और एसी के साथ स्मार्टफोन इस बार सस्ते हो गए हैं। तीन साल में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतें 4,000 रुपये तक घटी हैं। इनकी ढुलाई पर कम लागत और बचे हुए सामान को जल्दी बेचने के लिए कीमतों को 5-10 फीसदी तक कम कर दिया गया है।
कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 2020 और 2021 में स्मार्टफोन की मांग तेजी से बढ़ी थी। मोबाइल फोन कंपनियां पिछले साल मांग का ठीक से अनुमान नहीं लगा सकीं और इसलिए इस समय काफी सामान बिक्री के लिए पड़े हैं।
बढ़ती लागत के कारण इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां साल में दो-तीन बार कीमतों में करीब चार फीसदी तक बढ़ोतरी करती हैं। इस साल जनवरी तक स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों की कीमतें कोरोना पूर्व की तुलना में औसतन 18-25% अधिक थीं।
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