एबीएन सेंट्रल डेस्क। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बाद एक दिन की राहत के बाद बुधवार को शेयर बाजार के बेंचमार्क सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी लगभग दो प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए। इसके अलावा, विदेशी निधियों की निरंतर निकासी और ब्लू-चिप बैंक शेयरों की बिकवाली ने भी बाजारों को नीचे धकेल दिया। रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 16 पैसे गिरकर 92.01 पर बंद हुआ।
30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 1,342.27 अंक या 1.72 प्रतिशत गिरकर 76,863.71 पर बंद हुआ। दिन के दौरान इसमें 1,446.72 अंक या 1.84 प्रतिशत की गिरावट आई और यह 76,759.26 पर पहुंचा। 50 शेयरों वाला एनएसई निफ्टी 394.75 अंक या 1.63 प्रतिशत गिरकर 23,866.85 पर बंद हुआ।
सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से बजाज फाइनेंस, एक्सिस बैंक, बजाज फिनसर्व, महिंद्रा एंड महिंद्रा, मारुति, ट्रेंट, भारती एयरटेल और कोटक महिंद्रा बैंक प्रमुख रूप से पिछड़ने वाली कंपनियों में शामिल थीं। सन फार्मा और एनटीपीसी को लाभ हुआ।
आनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ टेक फर्म एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने कहा कि हालांकि मंगलवार को शेयर बाजारों में तकनीकी रूप से सुधार देखने को मिला, लेकिन अंतर्निहित भावना सतर्कता बनी हुई है क्योंकि पश्चिम एशिया में गहराता संकट ऊर्जा की बढ़ती कीमतों, प्रमुख शिपिंग मार्गों में व्यवधान और निवेशकों की जोखिम लेने की प्रवृत्ति में बदलाव के माध्यम से वैश्विक वित्तीय बाजारों को प्रभावित करना शुरू कर रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि इक्विटी बाजार के दृष्टिकोण से, इस तरह की भू-राजनीतिक उथल-पुथल से अस्थिरता के तीव्र दौर उत्पन्न होते हैं क्योंकि वैश्विक निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की ओर रुख करते हैं और जोखिम-संवेदनशील बाजारों में अपना जोखिम कम करते हैं। लिवेलॉन्ग वेल्थ के रिसर्च एनालिस्ट और संस्थापक हरिप्रसाद के ने कहा कि वैश्विक संकेत मिले-जुले बने हुए हैं क्योंकि निवेशक पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रमों और कच्चे तेल की कीमतों में हो रहे तीव्र उतार-चढ़ाव पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
एशियाई बाजारों में, जापान का निक्केई 225 सूचकांक 1.43 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी सूचकांक 1.40 प्रतिशत चढ़ गया। शंघाई का एसएसई कंपोजिट सूचकांक भी सकारात्मक दायरे में बंद हुआ, जबकि हांगकांग का हैंग सेंग सूचकांक गिरावट के साथ समाप्त हुआ। यूरोप के बाजारों में गिरावट देखी गयी। अमेरिकी बाजार मंगलवार को स्थिर रुख के साथ बंद हुआ।
भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के कारण वैश्विक बेंचमार्क में तेजी आने से बुधवार को वायदा कारोबार में कच्चे तेल की कीमतें 460 रुपये बढ़कर 7,881 रुपये प्रति बैरल हो गयीं। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर, मार्च डिलीवरी के लिए कच्चे तेल की कीमत 460 रुपये या 6.2 प्रतिशत बढ़कर 7,881 रुपये प्रति बैरल हो गयी, जिसमें 16,930 लॉट का कारोबार हुआ। इसी प्रकार, अप्रैल अनुबंध में भी 462 रुपये या लगभग 6.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 7,833 लॉट में 7,815 रुपये प्रति बैरल पर पहुंच गया।
वैश्विक तेल मानक ब्रेंट क्रूड में 5.76 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 92.86 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। बाजार विनिमय आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने मंगलवार को 4,672.64 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने 6,333.26 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
एबीएन बिजनेस डेस्क। घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत शनिवार, 7 मार्च से बढ़ा दी गयी है, जिससे देश भर में 14.2 किलो वाले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 60 रुपये बढ़ गयी है।
इसी तरह 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी गैस सिलेंडर की कीमत भी आज से 115 रुपये बढ़ा दी गई है, जिससे होटल, रेस्टोरेंट और छोटे कमर्शियल प्रतिष्ठानों जैसे बिजनेस पर असर पड़ा है।
दिल्ली में 14.2 किलो वाले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 853 रुपये से बढ़कर 913 रुपये हो गयी है। मुंबई में घरेलू एलपीजी सिलेंडर का नया रेट अब 912.50 रुपये हो गया है जो पहले 852.50 रुपये था।
इससे पहले घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत अप्रैल 2025 से ही स्थिर रही जब दिल्ली में बिना सब्सिडी वाला रेट 853 रुपये था। नवीनतम संशोधन घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ उन कमर्शियल उपयोगकर्ताओं के लिए भी एक महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है जो दैनिक कार्यों के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं।
यह बढ़ोतरी भारत की एनर्जी सप्लाई और फ्यूल की उपलब्धता पर चर्चा के बीच हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पहले भरोसा दिलाया था कि देश में एनर्जी की कोई कमी नहीं है। कंज्यूमर्स को सप्लाई में रुकावट की चिंता करने की जरूरत नहीं है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय शेयर बाजारों में शुक्रवार, 6 मार्च को फिर से गिरावट लौट आई। एक दिन की राहत के बाद बाजार दबाव में आ गया और कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 1085 अंक तक टूट गया, जबकि निफ्टी 24,450 के नीचे फिसल गया। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और कमजोर वैश्विक संकेतों ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया।
1097.00 अंक यानी 1.37% की गिरावट के साथ 78,918.90 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 315.45 अंक या 1.27% टूटकर 24,450.45 के स्तर पर आ गया।
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कमजोर किया है। इस संघर्ष से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने और कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आने की आशंका बढ़ गई है, जिससे वैश्विक महंगाई पर दबाव बन सकता है।
इसके अलावा एशियाई बाजारों में कमजोरी और अमेरिकी बाजारों से मिले नकारात्मक संकेतों का असर भी भारतीय बाजार पर पड़ा। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स एक प्रतिशत से अधिक गिरावट के साथ कारोबार करता दिखाई दिया, जिससे एशियाई बाजारों में दबाव का माहौल बना रहा।
विदेशी संस्थागत निवेशक भी लगातार बिकवाली कर रहे हैं। गुरुवार को एफआईआई ने 3,752.52 करोड़ रुपए के शेयर बेचे, जबकि मार्च महीने में अब तक करीब 16,000 करोड़ रुपये की बिकवाली हो चुकी है। इससे बाजार की धारणा और कमजोर हुई है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी बाजार के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। ब्रेंट क्रूड की कीमत गुरुवार को करीब 5% उछलकर 86.28 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो लगभग 20 महीनों का उच्च स्तर है। हालांकि शुक्रवार सुबह यह करीब 84.4 डॉलर प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रही थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। अगर ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाता है, तो इसका असर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर पड़ सकता है।
बैंकिंग शेयरों में भी आज भारी बिकवाली देखने को मिली। बैंक निफ्टी करीब 1% तक टूट गया, जबकि निफ्टी पीएसयू बैंक और प्राइवेट बैंक इंडेक्स भी एक प्रतिशत से अधिक गिरावट में रहे। विश्लेषकों के अनुसार तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई बढ़ सकती है, जिससे ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो जाती है और इसका असर बैंकिंग सेक्टर के प्रदर्शन पर पड़ता है।
टीम एबीएन, रांची। रांची के बाजारों में इन दिनों बेंत से बना एक बेहद खूबसूरत हार लोगों का ध्यान खींच रहा है। इस हार की कारीगरी इतनी शानदार है कि जो भी इसे देखता है, एक बार रुककर जरूर निहारता है। खास बात यह है कि यह हार पूरी तरह से असली नेकलेस जैसा दिखता है, लेकिन इसे बेंत से तैयार किया गया है। इसकी कीमत 150 से 300 के बीच है, जिससे यह हर बजट में आसानी से मिल जाता है।
इस हार को बनाने वाले कलाकार संदीप बताते हैं कि एक हार तैयार करने में करीब 3 से 4 घंटे का समय लगता है। यह स्थानीय कला का बेहतरीन उदाहरण है। हार को इस तरह से गूंथा जाता है कि पहली नजर में यह असली गहने जैसा लगता है। इसमें बीच-बीच में सुंदर मोती लगाए गए हैं, जो इसकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं। लोग इसे गरीबों का नौलखा हार भी कह रहे हैं, क्योंकि कम कीमत में यह बहुत ही आकर्षक लुक देता है। साथ ही यह इको-फ्रेंडली भी है, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता।
यहां सिर्फ हार ही नहीं, बल्कि पूरा सेट उपलब्ध है। बेंत से बने ब्रेसलेट और इयररिंग्स भी खूब पसंद किये जा रहे हैं। इयररिंग्स में भी सुंदर मोती और लटकन लगे हैं, जो इसे और खास बनाते हैं। अगर कोई इस पूरे सेट को पहन ले, तो उसका पूरा लुक बदल जाता है। हार की पांच वैरायटी उपलब्ध हैं- रानी हार, नेकलेस, पट्टी हार और सिंपल डिजाइन। खासतौर पर महिलाएं इयररिंग्स और हार की खरीदारी में ज्यादा रुचि दिखा रही हैं।
शॉपिंग करने आयी ग्राहक अर्चना ने बताया कि उन्होंने पहली बार बेंत से बना इतना सुंदर हार देखा है। उनका कहना है कि यह यूनिक भी है, इको-फ्रेंडली भी और बजट में भी है। किसी खास कार्यक्रम में पहनने के लिए यह एक बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि इसे पहनने से अलग और आकर्षक लुक मिलता है। कम कीमत, शानदार कारीगरी और पर्यावरण के प्रति जागरूकता इन्हीं खूबियों की वजह से रांची की मार्केट में यह बेंत का हार लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है।
टीम एबीएन, रांची। 20 फरवरी को घरेलू शेयर बाजार मजबूती के साथ कारोबार करता दिखा। सेंसेक्स करीब 586.13 अंकों की तेजी के साथ 83,084.27 पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी 193.40 अंक चढ़कर 25,647.75 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। आज के सत्र में मेटल और सरकारी बैंकों के शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिल रही है, जबकि आईटी सेक्टर दबाव में है।
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक निफ्टी हाल ही में 2026 के शुरुआती निचले स्तरों तक फिसल चुका है। ऐसे में मौजूदा स्तर बेहद अहम माने जा रहे हैं।
सपोर्ट: 25,300
मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट आनंद जेम्स के अनुसार, यदि निफ्टी 25,500 के ऊपर टिकता है तो यह तेजी 25,650 तक बढ़ सकती है। यह स्तर फिबोनाची रिट्रेसमेंट जोन के आसपास है और इंडेक्स के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। सप्ताह के चौथे कारोबारी दिन गुरुवार को शेयर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मजबूत शुरुआत के बाद अचानक बिकवाली हावी हो गई और बाजार के प्रमुख सूचकांक बुरी तरह फिसल गए।
कारोबार के दौरान BSE Sensex 1448 अंकों से ज्यादा टूट कर 83,000 के अहम स्तर के नीचे आ गया। वहीं, निफ्टी में 421 अंक की गिरावट आई। कोराबर बंद होने पर सेंसेक्स 1236.11 अंक लुढ़क कर 82,498.14 के स्तर पर बंद हुआ। Nifty 365.00 अंक गिरकर 25,454.35 के लेवल पर आ गया।
पिछले तीन सत्रों से बाजार में जारी तेजी के बाद निवेशकों ने ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली शुरू कर दी, जिससे सूचकांकों पर दबाव बढ़ा।
आईटी सेक्टर पर एआई से जुड़ी अनिश्चितताओं का असर बना हुआ है। NSDL के आंकड़ों के मुताबिक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने इस महीने के शुरुआती 15 दिनों में आईटी शेयरों में 10,956 करोड़ रुपये की बिकवाली की है। उनकी होल्डिंग में करीब 16% की गिरावट दर्ज की गई।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखा। Brent Crude में 1% से ज्यादा की तेजी आई और कीमत 71 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। तेल की बढ़ती कीमतें आयातक देशों जैसे भारत के लिए चिंता का विषय हैं।
एबीएन बिजनेस डेस्क। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर बढ़ती आशंकाओं का असर सिर्फ नौकरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि शेयर बाजार पर भी इसका सीधा प्रभाव दिख रहा है। पिछले आठ कारोबारी दिनों में आईटी स्टॉक्स में भारी बिकवाली के चलते करीब 6 लाख करोड़ रुपये की मार्केट वैल्यू घट चुकी है। एनआईएफटी आईटी इंडेक्स में 8 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गयी है, जो निवेशकों की चिंता को दर्शाता है।
आईटी कंपनियों पर जबरदस्त असर बाजार में डर इस बात का है कि एआई आधारित टूल्स एप्लिकेशन डेवलपमेंट, मेंटेनेंस और टेस्टिंग जैसी पारंपरिक आईटी सर्विसेज को काफी हद तक आॅटोमेट कर सकते हैं। इससे कंपनियों के मौजूदा बिजनेस मॉडल और मार्जिन पर दबाव पड़ने की आशंका जतायी जा रही है।
हालांकि, प्रमुख सॉफ्टवेयर कंपनियां लगातार यह भरोसा दिला रही हैं कि एआई उनकी सेवाओं को खत्म नहीं करेगा, बल्कि उन्हें और सक्षम बनायेगा। ब्रोकरेज फर्म जेपी मोर्गन चेज का मानना है कि एआई नए अवसर भी पैदा करेगा और आईटी कंपनियां इस बदलाव से लाभ उठा सकती हैं। वहीं एचएसबीसी (रिसर्च रिपोर्ट के संदर्भ में) का कहना है कि एआई मौजूदा बिजनेस मॉडल के भीतर ही काम करेगा, जहां आईटी सर्विस प्रदाताओं की भूमिका बनी रहेगी।
विशेषज्ञों का तर्क है कि बड़े संगठनों में एआई किसी मैजिक बॉक्स की तरह अकेले काम नहीं कर सकता। उसे डेटा सिस्टम, आॅडिट चेक्स, साइबर सुरक्षा और रिस्क कंट्रोल जैसे मजबूत ढांचे की जरूरत होती है, जिसमें आईटी वेंडर्स और एंटरप्राइज प्लेटफॉर्म की अहम भूमिका रहती है। हालांकि, मुनाफे को लेकर आशंका बनी हुई है।
ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विस का अनुमान है कि अगले तीन से चार वर्षों में एआई के व्यापक उपयोग से आईटी सेक्टर के रेवेन्यू में 9 से 12 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। कुल मिलाकर, एआई को लेकर बाजार में डर और अवसर दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। अल्पकाल में अनिश्चितता बनी रह सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आईटी कंपनियां इस तकनीकी बदलाव को कितनी तेजी और रणनीतिक तरीके से अपनाती हैं।
देश की प्रमुख आईटी कंपनियां अब एआई को लेकर सैद्धांतिक चर्चा से आगे बढ़कर व्यावहारिक बदलाव कर रही हैं। वे अपने आॅपरेशंस में एआई कोडिंग असिस्टेंट, आटोमेशन टूल्स और एआई एजेंट्स का तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं, ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके और डिलीवरी टाइम कम किया जा सके। एक्वेरियस कैपिटल के संदीप गोगिया के अनुसार, आईटी कंपनियां अब अपने कर्मचारियों को एआई टूल्स के साथ काम करने की व्यवस्थित ट्रेनिंग दे रही हैं।
वर्कफोर्स को एआई-आधारित कोडिंग, आॅटोमेशन प्लेटफॉर्म और इंटेलिजेंट एजेंट्स के उपयोग की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे बदलती टेक्नोलॉजी के अनुरूप खुद को ढाल सकें। इसी रणनीति के तहत टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टीसीएस) ने एआई क्षमताओं को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है।
कंपनी ने 1 गीगावॉट क्षमता वाले डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश किया है और अब तक साढ़े तीन लाख से अधिक कर्मचारियों को एआई से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान किया है। यह रुझान दर्शाता है कि आईटी कंपनियां एआई को खतरे के रूप में नहीं, बल्कि एक अवसर के रूप में देख रही हैं। फोकस नौकरियों को खत्म करने के बजाय स्किल अपग्रेडेशन और नयी तकनीकों के साथ तालमेल बैठाने पर है, ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बढ़त बनायी जा सके।
एबीएन बिजनेस डेस्क। भारतीय सरार्फा बाजार में सोने की कीमतों में जबरदस्त गिरावट का सिलसिला जारी है। जनवरी 2026 में 1,80,779 प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर को छूने वाला सोना अब अपने ऊंचे स्तर से लगभग 13.50% (24,500) फिसल चुका है। सोमवार को एमसीएक्स पर सोना 0.61% की गिरावट के साथ 1,54,937 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह गिरावट महज एक शुरुआत हो सकती है।
सोने में आई इस अचानक गिरावट की सबसे बड़ी वजह रूस का अमेरिकी डॉलर (यूएसडी) के प्रति बदलता रुख माना जा रहा है।
लंबे समय से डॉलर के खिलाफ अभियान चलाने वाला रूस अब अमेरिका के साथ फिर से डॉलर में व्यापार की संभावनाएं तलाश रहा है।
ब्रिक्स देशों ने डॉलर को चुनौती देने के लिए गोल्ड बेस्ड ट्रेड का सपना देखा था। रूस की डॉलर में संभावित वापसी इस लक्ष्य को कमजोर कर रही है, जिससे सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग घट गयी है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतों में आयी उछाल कृत्रिम मांग के कारण थी।
2020 से 2024 के बीच वैश्विक स्वर्ण खरीद का 50% हिस्सा ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंकों ने खरीदा।
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद टैरिफ के डर से दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने सोने का स्टॉक जमा करना शुरू किया, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया।
पीएसीई 360 के अमित गोयल जैसे विशेषज्ञों ने सोने को लेकर मंदी के संकेत दिये हैं। उनका मानना है कि सबसे पहले डिजिटल या पेपर गोल्ड में बिकवाली होगी, जिसका असर भौतिक सोने पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोना $3,000 प्रति औंस तक गिर सकता है।
वहीं भारत में कीमतें 1,00,000 प्रति 10 ग्राम के स्तर से भी नीचे जा सकती हैं। बाजार में आने वाली किसी भी छोटी तेजी को एक्सपर्ट डेड कैट बाउंस कह रहे हैं, यानी एक अस्थायी उछाल जो बड़ी गिरावट का संकेत है।
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