एबीएन सेंट्रल डेस्क। देशभर में बढ़ती महंगाई के चलते सरकार ने कई बड़े नए बदलाव किए है जो 1 जुलाई से देशभर में लागू होने जा रहे हैं। इन बदलावों के बीच चार नए लेबर कोड (श्रम संहिता) के नियम भी लागू हो जाएंगे, इसके अलावा क्रिप्टोकरेंसी, टीडीएस और एसी खरीदने के लिए अब ज्यादा खर्च करना होगा। आईए जानते हैं 1 जुलाई से कौन-कौन से होंगे बदलाव- गैस सिलेंडर का बढ़ेगा बोझ : जुलाई महीने के पहले दिन गैस में बदलाव की संभावना है। ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में इजाफा हो सकता है। पैन-आधार लिंक कराना जरूरी : अगर 1 जुलाई से आपका पैन-आधार लिंक नहीं है तो आपकों भारी जुमार्ना देना होगा। पैन कार्ड और आधार को लिंक करने के लिए आज आखिरी तारीख 30 जून निर्धारित की गई है। इसके बाद 500 रुपये जुर्माने का प्रावधान है, एक जुलाई से आपको इन दस्तावेजों को लिंक करने के लिए 1,000 रुपये जुमार्ना भरना पड़ेगा। क्रिप्टोकरेंसी पर एक फीसदी टीडीएस : क्रिप्टोकरेंसी उभोक्ताओं के लिए यह जरूरी खबर है। बता दें कि 1 जुलाई से क्रिप्टोकरेंसी पर सरकार की ओर से 30 फीसदी का टैक्स लगाए जाने के बाद अब निवेशकों को सभी तरह के क्रिप्टो ट्रांजैक्शन पर 1 फीसदी की दर से टीडीएस का भुगतान करना होगा, चाहे वो क्रिप्टो असेट लाभ में बेचा गया हो या फिर नुकसान में। 10 फीसदी टीडीएस : वहीं, 1 जुलाई 2022 से व्यवसायों से प्राप्त गिफ्ट पर 10 फीसदी का टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स 6 देना होगा। ये टैक्स सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और डॉक्टरों पर लागू होगा। डॉक्टरों को मिलने वाली मुफ्त दवा के सैंपल, विदेशी फ्लाइट टिकट या अन्य मंहगे गिफ्ट पर यह नियम लागू होगा। प्लास्टिक बैन : भारत में 1 जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक बैन हो जाएगा। इसके चलते पैक्ड जूस, सॉफ्ट ड्रिंक्स और डेयरी प्रोडक्ट बनाने और बेचने वाली कंपनियों को तगड़ा झटका लगा है। एक जुलाई से इस प्रतिबंध के लागू होने के बाद बेवरेज कंपनियां प्लास्टिक स्ट्रॉ के साथ अपने प्रोडक्ट को नहीं बेच पाएंगी। एयर कंडीशनर खरीदना 10 फीसदी तक होगा महंगा : गर्मियों के बीच आम जनता पर एक और बोझ बढ़ने वाला है। 1 जुलाई से एयर कंडीशनर खरीदना महंगा हो जाएगा। ब्यूरो आॅफ एनर्जी एफिशिएंसी (इएए) ने एयर कंडीशनर्स के लिए एनर्जी रेटिंग रूल्स में किए बदलाव 1 जुलाई 2022 से लागू होने जा रहा है। इसके मुताबिक, जुलाई महीने की पहली तारीख से 5-स्टार अउ की रेटिंग सीधे 4-स्टार हो जाएगी। इसके साथ ही भारत में एसी की कीमतों में आने वाले समय में 10 फीसदी तक की वृद्धि देखने को मिल सकती है। नए श्रम कानून होंगे लागू : 1 जुलाई से लेबर कोड के नए नियम लागू हो सकते हैं। नया कानून लागू होते ही इन हैंड सैलरी, कर्मचारियों की आॅफिस टाइमिंग, पीएफ योगदान और ग्रेच्युटी पर असर देखने को मिलेगा। कामकाज के अधिकतम घंटों को बढ़ाकर 12 करने का प्रस्ताव भी है।
एबीएन बिजनेस डेस्क। जीएसटी परिषद ने कुछ सामानों पर छूट को वापस लेने जबकि कुछ अन्य पर दरें बढ़ाये जाने का फैसला किया है। इससे अब डिब्बाबंद और लेबल-युक्त गेहूं आटा, पापड़, पनीर, दही और छाछ पर पांच प्रतिशत कर लगेगा। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मीडिया को कहा कि माल एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की यहां दो दिन की बैठक में विभिन्न समूहों के दरों को युक्तिसंगत बनाने के बारे में दिये गये सुझावों को स्वीकार कर लिया गया। इससे कर की दरों में बदलाव हुए हैं। कर दर में बदलाव 18 जुलाई से प्रभाव में आएंगे। हालांकि परिषद ने कसीनो, आॅनलाइन गेमिंग और घुड़दौड़ पर रिपोर्ट को मंत्री समूह (जीओएम) के पास फिर विचार के लिए भेज दिया है। गोवा के वित्त मंत्री कसीनो पर जीएसटी दर के बारे में और चर्चा चाहते हैं। ऐसे में ‘आॅनलाइन गेमिंग’ और घुड़दौड़ पर भी फिर से विचार किया जाएगा। मंत्री समूह ने तीनों पर 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने की सिफारिश की थी। इस बारे में रिपोर्ट 15 जुलाई तक तैयार हो जाने की उम्मीद है और अगस्त में परिषद की अगली बैठक में इसपर विचार किया जाएगा। छूट समाप्त करने का मतलब है कि डिब्बा या पैकेट बंद और लेबल युक्त (फ्रोजन को छोड़कर) मछली, दही, पनीर, लस्सी, शहद, सूखा मखाना, सूखा सोयाबीन, मटर जैसे उत्पाद, गेहूं और अन्य अनाज तथा मुरमुरे पर अब पांच प्रतिशत जीएसटी लगेगा। इसी प्रकार, टेट्रा पैक और बैंक की तरफ से चेक जारी करने पर 18 प्रतिशत और एटलस समेत नक्शे तथा चार्ट पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। वहीं खुले में बिकने वाले बिना ब्रांड वाले उत्पादों पर जीएसटी छूट जारी रहेगी। इसके अलावा 1,000 रुपये प्रतिदिन से कम किराए वाले होटल कमरों पर 12 प्रतिशत की दर से कर लगाने की बात कही गई है। अभी इसपर कोई कर नहीं लगता है। इसके साथ ही अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिये 5,000 रुपये से अधिक किराए वाले कमरों (आईसीयू को छोड़कर) पर पांच प्रतिशत जीएसटी लगेगा। ‘प्रिंटिंग/ड्राइंग इंक’, धारदार चाकू, कागज काटने वाला चाकू और ‘पेंसिल शार्पनर’, एलईडी लैंप, ड्राइंग और मार्किंग करने वाले उत्पादों पर कर की दरें बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दी गई हैं। सौर वॉटर हीटर पर अब 12 प्रतिशत जीएसटी लगेगा जबकि पहले 5 प्रतिशत कर लगता था। सड़क, पुल, रेलवे, मेट्रो, अपशिष्ट शोधन संयंत्र और शवदाहगृह के लिए जारी होने वाले कार्य अनुबंधों पर अब 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा। जो अबतक 12 प्रतिशत था। हालांकि, रोपवे के जरिये वस्तुओं और यात्रियों के परिवहन तथा अवशिष्ट निकासी सर्जरी से जुड़े उपकरणों पर कर की दर घटाकर पांच प्रतिशत की गई है। पहले यह 12 प्रतिशत था। ट्रक, वस्तुओं की ढुलाई में इस्तेमाल होने वाले वाहनों जिसमें ईंधन की लागत शामिल है, पर अब 12 प्रतिशत जीएसटी लगेगा जो अभी 18 प्रतिशत है। बागडोगरा से पूर्वोत्तर राज्यों तक की हवाई यात्रा पर जीएसटी छूट अब इकनॉमी श्रेणी तक सीमित होगी। आरबीआई (भारतीय रिजर्व बैंक), बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड जैसे नियामकों की सेवाओं के साथ रिहायशी मकान कारोबारी इकाइयों को किराये पर देने पर कर लगेगा। बैटरी या उसके बिना इलेक्ट्रिक वाहनों पर रियायती पांच प्रतिशत जीएसटी बना रहेगा। जीएसटी परिषद ने ई-कॉमर्स पोर्टल के माध्यम से की जाने वाली अंतर-राज्य आपूर्ति के लिए प्रक्रिया को आसान बनाने का भी निर्णय किया है। अब ऐसे आपूर्तिकर्ताओं का वस्तुओं और सेवाओं का कारोबार क्रमश: 40 लाख रुपये और 20 लाख रुपये से कम है तो उन्हें जीएसटी पंजीकरण प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी। यह एक जनवरी, 2023 से लागू होगा। परिषद ने जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण के गठन के संदर्भ में राज्यों की तरफ से उठाये गये विभिन्न मुद्दों पर चर्चा और सीजीएसटी कानून में उपयुक्त संशोधन के लिये मंत्री समूह भी गठित करने का निर्णय किया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट अब निर्णायक मोड़ पर आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महाराष्ट्र के राज्यपाल के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमें उन्होंने उद्धव सरकार को गुरुवार को बहुमत साबित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि वह राज्यपाल के फैसले पर रोक नहीं लगा रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को होने वाले फ्लोर टेस्ट के खिलाफ शिवसेना के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) सुनील प्रभु की याचिका पर करीब साढ़े तीन घंटे तक सुनवाई की। उसके बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के दौरान प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी याचिका में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार को गुरुवार (30 जून) को बहुमत साबित करने के लिए महाराष्ट्र के राज्यपाल के निर्देश को अवैध करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनील प्रभु से सवाल किया कि अगर किसी सरकार ने सदन में बहुमत खो दिया है और विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन वापस लेने वालों को अयोग्य घोषित करने के लिए कहा जाता है, तो क्या राज्यपाल को फ्लोर टेस्ट का इंतजार करना चाहिए ? प्रभु का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की अवकाश पीठ के समक्ष दलील दी कि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य हैं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल मंत्रियों की सलाह पर काम कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं, लेकिन वे किसी भी हाल में विपक्ष की सलाह पर काम नहीं कर सकते हैं। सिंघवी ने कहा कि अगर गुरुवार को बागी विधायकों को वोट देने की अनुमति दी जाती है, तो अदालत उन विधायकों को वोट देने की अनुमति देगी, जिन्हें बाद में अयोग्य घोषित किया जा सकता है, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। इस पर, बेंच ने सिंघवी से पूछा कि मान लीजिए कि एक सरकार को पता है कि उन्होंने सदन में बहुमत खो दिया है और अध्यक्ष को समर्थन वापस लेने वालों को अयोग्यता नोटिस जारी करने के लिए कहा जाता है। फिर उस समय, राज्यपाल को फ्लोर टेस्ट बुलाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए या फिर वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं? पीठ ने पूछा, राज्यपाल को क्या करना चाहिए? क्या वह अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं? सुनील प्रभु ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर महाराष्ट्र के राज्यपाल के उस निर्देश को चुनौती दी है, जिसमें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को गुरुवार को बहुमत साबित करने के लिए कहा गया है। शिवसेना की इस याचिका में दलील दी गई है कि अभी बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्य ठहराए जाने की कार्रवाई पूरी नहीं हुई है, ऐसे में बहुमत साबित करने का निर्देश पारित नहीं किया जाना चाहिए।
टीम एबीएन, कोडरमा। शहर में एक जुलाई से सिंगल यूज प्लास्टिक प्रतिबंध लग जाएगा। भारत सरकार के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वितरण, भंडारण और प्रयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। इसके बाद झुमरी तिलैया नगर परिषद भी इसे प्रतिबंधित करने के लिए एक-दो दिनों में चेंबर ऑफ कॉमर्स, व्यवसायिक और सामान बेचने वाले दुकानदारों के साथ बैठक करेगा। नप के ईओ विनीत कुमार के अनुसार एक जुलाई के बाद नियमों की अनदेखी करनेवालों पर कार्रवाई की जाएगी। प्रतिबंध की भनक मिलते ही मिलते ही दुकानदारों ने सामानों को मंगाना बंद कर दिया है। दुकान में बचे प्लास्टिक के सामान कम दामों में बेचे जा रहे हैं। प्लास्टिक स्टिक,प्लास्टिक के झंडे, आइसक्रीम स्टिक, थर्मोकोल की प्लेट, कप, ग्लास, कांटे के चम्मच, मिठाई के डब्बे, निमंत्रण कार्ड, सिगरेट पैकेट समेत सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग बंद हो जाएगा। दुकानदार पत्तल मंगाए जा रहे हैं। अचानक प्रतिबंधित होने की घोषणा से लोग परेशान दिख रहे हैं। हालांकि इससे पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा। ज्ञात हो कि पहले शादी-विवाह समेत अन्य सामूहिक भोज में पत्ते से बने पत्तल का उपयोग होता था। प्रतिबंध की घोषणा से प्राचीन परंपरा जीवित हो सकती है। उत्पादन पर लगे रोक : उपयोग पर प्रतिबंध की घोषणा के बाद शहर के कुछ व्यापारियों ने दबी जुवान से कहा कि सरकार को इसके उत्पादन पर ही रोक लगा देना चाहिए जिससे उपयोग की संभावना ही समाप्त हो जाती। सरकार की दोहरी नीति समझ से परे है। एक ओर, उत्पादन भी हो रहा है और दूसरी ओर उपयोग पर रोक भी लगाया जा रहा है जो समझ से परे है।
टीम एबीएन, पलामू। झारखंड में पलामू की एक अदालत ने हत्या के एक मामले में 12 लोगों को सबूत के अभाव में शुक्रवार को बरी कर दिया। इन 12 लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई थी और उनपर आरोप लगाया था कि 2018 में मनातु थानाक्षेत्र के सरगुजा बाहेरतांड गांव में उन्होंने इंद्रदेव उरांव एवं उसकी पत्नी सुकनी देवी की जादू-टोना करने को लेकर हत्या कर दी थी। अभियोजन पक्ष एवं बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार चौबे ने इन सभी 12 लोगों को सबूत के अभाव में बरी कर दिया। बचाव पक्ष के वकील राहुल सत्यार्थी ने कहा कि आरोपियों को सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के विरोधाभासी बयानों के मद्देनजर संदेह का लाभ दिया गया। उन्होंने कहा कि गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट एवं इस संबंध में पुलिस द्वारा दाखिल किए गए आरोपपत्र के बीच मिलान नहीं पाया गया।
टीम एबीएन, रांची। राजधानी रांची में 10 जून को हुए हिंसा को लेकर दायर जनहित याचिका पर झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने मामले में दोनों पक्षों को सुनने के बाद राज्य सरकार को समय देते हुए 8 जुलाई से पहले हर हाल में जवाब पेश करने को कहा है। अदालत ने पहले भी सरकार को जवाब पेश करने के लिए निर्देश दिया था, लेकिन सरकार ने जवाब पेश नहीं किया था। झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ रवि रंजन और न्यायाधीश एसएन प्रसाद की अदालत में रांची हिंसा मामले पर सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने अदालत को जानकारी दी कि विस्तृत जवाब नहीं पेश किया जा सका है। इसलिए जवाब के लिए समय दिया जाए। अदालत ने राज्य सरकार की आग्रह को स्वीकार करते हुए उन्हें 8 जुलाई से पूर्व अदालत में विस्तृत जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 8 जुलाई को होगी। भाजपा प्रवक्ता रही नूपुर शर्मा के द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर विवादित टिप्पणी के बाद रांची में 10 जून को जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन हुआ था। इस प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी। जांच में पाया गया है कि सुनियोजित तरीके से हिंसा फैलाई गई। उसी हिंसा की एनआईए से जांच की मांग को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। पंकज यादव ने जनहित याचिका दायर की है। मामले की उच्च स्तरीय जांच हो, इसलिए इस मामले की एनआईए से जांच की मांग की है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार को समाप्त कर दिया है। देश की सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात के संवैधानिक अधिकार से जुड़े 50 साल पुराने फैसले को पलट दिया है। इसका मतलब यह है कि अमेरिका में गर्भपात के अधिकार खत्म हो गए हैं। यह डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वह इस अधिकार की समर्थक रही है। आशंका जताई जा रही है कि इस फैसले से विरोध प्रदर्शन तेज हो सकता है। अमेरिका में पिछले 50 सालों से गर्भपात कानून को लेकर विवाद बना रहा है और अमेरिकी समाज भी गर्भपात करवाने के लिए कानून हो या ने हो इस मुद्दे पर बंटा रहा है। पिछले एक साल से ये मुद्दा सुर्खियों में बना हुआ है। पिछले महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट का इससे जुड़ा एक ड्राफ्ट लीक हो गया था, जिसके बाद पूरे देश में प्रदर्शन होने लगे थे। मीडिया में लीक ड्राफ्ट के मुताबिक, गर्भपात के अधिकार को खत्म करने की तैयारी थी। ड्राफ्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने 1973 के रो बनाम वेड के फैसले को पलटने के लिए मतदान किया है। इसके खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन शुरू हो गए। अमेरिकी की एक बड़ी आबादी का मानना है, कि गर्भपात करवाना उनका मौलिक अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट उनसे यह अधिकार नहीं छीन सकता है। गर्भपात अमेरिका में हमेशा ही सामाजिक तनाव का मुद्दा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी सहित बाकी कंजरवेटिव समूह और ईसाई चर्च महिलाओं को गर्भपात का अधिकार देने के खिलाफ मुहिम चलाते रहे हैं। जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी और अन्य प्रगतिशील खेमे इस अधिकार के समर्थक रहे हैं। अमेरिका में गर्भपात को जायज ठहराने वाला कोई कानून नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के 1973 में दिए एक फैसले के तहत इसे वैध ठहराया गया था। अब लगभग 50 साल बाद इसे पलट दिया है। बीते महीने राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक बयान जारी कर कहा था कि गर्भपात कराने या ना कराने के बारे में फैसला लेना महिलाओं का मूलभूत अधिकार है। उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट फैसले को पलट देता है, तो फिर गर्भपात के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कांग्रेस को कानून बनाना चाहिए। बर्नी सैंडर्स सहित कई प्रोग्रेसिव सांसदों ने भी उनका समर्थन किया था। वहीं, दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गर्भपात के अधिकार के खिलाफ लगातार मुहिम चलाते रहे हैं। राष्ट्रपति रहते हुए उन्होंने कई जज नियुक्त किए। तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे सुप्रीम कोर्ट में ऐसे जज चाहते हैं, जो गर्भपात को संवैधानिक अधिकार घोषित करने के 1973 के निर्णय को पलट दें। ट्रंप ने अपने कार्यकाल के आखिर में एक जज की नियुक्ति कर दी थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कंजर्वेटिव विचारधारा का बहुमत हो गया था, तब ही ये माना जा रहा था कि सुप्रीम कोर्ट में ये फैसला पलटा जा सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रपति बाइडन और दूसरे डेमोक्रेटिक नेता गर्भपात के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कानून बनाने की बात भले ही करें मगर ऐसा करना आसान नहीं होगा। गर्भपात के लिए कानून पारित होने के लिए 100 सदस्यीय सीनेट में फिलिबस्टर नियम के तहत 60 सदस्यों का समर्थन जरूरी होगा। डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 50 सीनेटर ही हैं। उप-राष्ट्रपति का एक अतिरिक्त वोट उनके पक्ष में है। फिर भी कुल समर्थक सदस्यों की संख्या 51 ही होती है। हालांकि राष्ट्रपति के पास फिलिबस्टर नियम को रद्द करने का अधिकार है, लेकिन जो बाइडन ऐसा करने से हिचकते रहे हैं। अमेरिका में सबसे पहले गर्भपात को लेकर विवाद साल 1973 में शुरू हुआ था, जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच ने 7-2 के बहुमत गर्भपात कानून के खिलाफ फैसला सुनाया था। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, कि गर्भपात करना महिलाओं का निजी अधिकार है। इसके बाद साल 1992 में भी अमेरिका में इसी तरह का एक मामला आया और उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात कानून के खिलाफ ही फैसला सुनाया था। उस वक्त अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यहां तक कहा था, कि एक मां गर्भपात करने लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है और इसमें किसी भी तरह की दखलअंदाजी नहीं दी जा सकती है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उच्चतम न्यायालय ने 2002 के गुजरात दंगे मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सहित 64 लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका को खारिज कर दिया। जकिया गुजरात में 2002 के दंगों में मारे गए, कांग्रेस के सांसद एहसान जाफरी की पत्नी हैं। न्यायमूर्ति एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने एसआईटी की मामले को बंद करने संबंधी रिपोर्ट के खिलाफ दायर जकिया जाफरी की याचिका को खारिज करने के, विशेष मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि जाफरी की याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। एहसान जाफरी 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद में गुलबर्ग सोसाइटी में मारे गए 68 लोगों में शामिल थे। इससे एक दिन पहले गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगा दी गई थी, जिसमें 59 लोग मारे गए थे। इन घटनाओं के बाद ही गुजरात में दंगे भड़क गए थे।
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