एबीएन सेंट्रल डेस्क। पहली बार भारत ने एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। यह न्यायिक प्रणाली में वर्षों से चले आ रहे लंबित मामलों के खिलाफ एक ऐतिहासिक बदलाव है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स आफ सेक्सुअल एब्यूज के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया।
इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गयी। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल आफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गयी है।
मुकदमों को लेकर अक्सर तारीख पर तारीख की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किये गये मामलों से ज्यादा हो गयी है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जायें।
इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है। रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। लगभग आधे लंबित मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है और अलग-अलग राज्यों में मामलों की स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
उदाहरण के तौर पर, पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पॉक्सो के सभी मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत के चलते सबसे बड़ी भागीदारी है। इसके बाद महाराष्ट्र (24 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (11 प्रतिशत) का स्थान है। कुल मिलाकर देखा जाये तो पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों में लगभग तीन-चौथाई अकेले सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में है।
न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा कि भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है।
इसलिए इस गति को बनाये रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हकीकत बन सके। इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।
राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटान दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि पिछले वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पायी।
ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है कि किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गयी है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाये रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाये।
साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाये। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।
यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गये सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है। इस खबर से संबंधित और जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क कर सकते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आ सकती है। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार कर्मचारी भविष्य निधि (पीएफ) पर मिलने वाली ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार कर रही है। अनुमान है कि मौजूदा 8.25 प्रतिशत की दर को बढ़ाकर 8.75 प्रतिशत किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो इसका लाभ करीब 8 करोड़ पीएफ खाताधारकों को मिलेगा।
फिलहाल वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पीएफ पर 8.25 प्रतिशत ब्याज दिया जा रहा है। प्रस्तावित बदलाव के तहत इसमें 0.50 प्रतिशत यानी 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। ब्याज दर बढ़ने से पीएफ खातों में सालाना मिलने वाली रकम सीधे बढ़ जायेगी।
पीएफ का ब्याज हर साल एकमुश्त आपके खाते में जमा किया जाता है। अगर किसी कर्मचारी के पीएफ खाते में 5 लाख रुपये जमा हैं, तो मौजूदा दर पर उसे लगभग 41 हजार रुपये के आसपास ब्याज मिलता है। दर बढ़ने पर यह राशि बढ़कर करीब 43 हजार रुपये तक पहुंच सकती है, यानी सीधे हजारों रुपये का अतिरिक्त लाभ।
ईपीएफओ के सेंट्रल बोर्ड आफ ट्रस्टीज की आने वाली बैठक में ब्याज दरों को लेकर चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि जनवरी में इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। मंजूरी मिलने के बाद ब्याज की राशि कर्मचारियों के खातों में जमा की जायेगी। कुल मिलाकर, यदि ब्याज दरों में यह बढ़ोतरी होती है तो नौकरीपेशा लोगों के पीएफ रिटर्न में अच्छी बढ़त देखने को मिल सकती है।
एबीएन न्यूज नेटवर्क, दुमका। झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान शनिवार को राज्य की उपराजधानी दुमका से राज्यस्तर पर आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत का वर्चुअल उद्घाटन एवं राज्य सरकार द्वारा कार्यान्वित विभिन्न योजना के तहत लाभुकों के बीच परिसंपति वितरित करेंगे।
इसके साथ ही झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकार के तत्वावधान में आयोजित विधिक सेवा जागरुकता कार्यक्रम में भी शिरकत करेंगे। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि मुख्य न्यायाधीश के साथ विशिष्ठ अतिथि के रुप में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और झालसा के कार्यकारी अध्यक्ष न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद, न्यायमूर्ति आनन्द सेन और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव भी संबोधित करेंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अब तक, लाल चंदन संरक्षण के लिए पहुंच तथा लाभ साझाकरण (एबीएस) तंत्र के तहत 101 करोड़ रुपये से अधिक बांटे जा चुके हैं, जिससे एनबीए का कुल एबीएस वितरण 127 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने 11.12.2025 को जैव विविधता अधिनियम, 2002 के पहुंच तथा लाभ साझाकरण (एबीएस) तंत्र के तहत लाभार्थियों के लिए 6.2 करोड़ रुपये जारी किये। यह धनराशि संकटग्रस्त लाल चंदन के संरक्षण का समर्थन करेगी और पांच राज्यों में किसानों तथा वन-निर्भर समुदायों की आजीविका को सशक्त बनायेगी।
पहुुंच तथा लाभ साझाकरण निधि राज्य वन विभागों, राज्य जैव विविधता बोर्डों और लाल चंदन उगाने वालों को जारी की गयी है, जो इस देशज और वैश्विक रूप से मूल्यवान प्रजाति की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नवीनतम वितरण लाल चंदन के सतत संरक्षण और जिम्मेदार उपयोग को समर्थन देता है।
जारी किये गये 6.2 करोड़ रुपये में से, तेलंगाना के किसानों को 17.8 लाख रुपये और आंध्र प्रदेश के किसानों को 1.1 करोड़ रुपये मिलेंगे। तमिलनाडु वन विभाग को 2.98 करोड़ रुपये, कर्नाटक वन विभाग को 1.05 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र वन विभाग को 69.2 लाख रुपये और तेलंगाना वन विभाग को 5.8 लाख रुपये प्राप्त होंगे। इसके अतिरिक्त, 16.0 लाख रुपये संबंधित राज्य जैव विविधता बोर्डों में बांटे जायेंगे।
इस नवीनतम किस्त के साथ ही, लाल चंदन संरक्षण के लिए विशेष रूप से वितरित की गयी कुल एबीएस निधि, इस प्रजाति के लिए अइर तंत्र लागू किये जाने के बाद से अब तक, 101 करोड़ रुपये से अधिक हो गयी है। अब तक, लाल चंदन एबीएस तंत्र के तहत 216 व्यक्तिगत किसानों को लाभ हुआ है, जिसमें से 198 आंध्र प्रदेश के और 18 तमिलनाडु के किसान हैं। इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और ओडिशा के वन विभाग और राज्य जैव विविधता बोर्ड भी लाभान्वित हुए हैं।
यह निधि फ्रंटलाइन सुरक्षा, उन्नत पैट्रोलिंग तथा निगरानी अवसंरचना, शोध-आधारित वनस्पति प्रबंधन पद्धतियों को लागू करने, समुदाय आधारित आजीविका कार्यक्रमों का विस्तार करने, और लाल चंदन उगाने वालों की सामाजिक-आर्थिक क्षमता को बढ़ाने के लिए उपयोग की जायेगी।
इस वितरण के साथ ही, एनबीए का कुल एबीएस निधि वितरण 127 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जो जैविक संसाधनों से जुड़े न्यायसंगत और समान लाभ-साझाकरण के कार्यान्वयन में भारत की वैश्विक नेतृत्व वाली भूमिका को मजबूत करता है।
यह कदम राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्ययोजना 2024-2030 के लक्ष्य-13 को प्राप्त करने और लक्ष्य-19 के तहत जैव विविधता संरक्षण के लिए वित्तीय संसाधनों को जुटाने की दिशा में सहायक है, साथ ही कुन्मिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे (जैविक विविधता सम्मेलन) के उद्देश्यों को आगे बढ़ाता है।
यह वितरण इस बात का प्रमाण है कि कैसे जैव विविधता अधिनियम के एबीएस प्रावधान संरक्षण को सतत आजीविका के अवसर में बदल सकते हैं। ये कदम एबीएस सिद्धांतों को व्यावहारिक, परिणामोन्मुखी ढंग से लागू करने में भारत की नेतृत्व की भूमिका को रेखांकित करते हैं, जो पारिस्थितिक सुरक्षा और सतत् आजीविका को सुदृढ़ बनाते हैं।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड में नकली और प्रतिबंधित दवाओं के अवैध कारोबार को रोकने के लिए अपराध अनुसंधान विभाग (सीआईडी) ने एक विशेष निर्देश जारी किया है। सीआईडी के आईजी ने सभी जिले के डीसी और एसपी को तत्काल प्रभाव से ड्रग इंस्पेक्टर और पुलिस की संयुक्त टीम बनाकर एक विशेष अभियान चलाने का आदेश दिया है।
यह कदम झारखंड हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका (डब्ल्यू.पी.(पीआईएल) न.-6691 ऑफ 2025, सुनील कुमार महतो बनाम झारखंड राज्य व अन्य) के संदर्भ में उठाया गया है, जिसमें नकली और नियंत्रित दवाओं के अवैध वितरण की गंभीर अनियमितताओं की जांच का आग्रह किया गया था। इस अभियान के तहत जिले के सभी मेडिकल दुकानें, थोक और खुदरा विक्रेता की स्टॉक पंजी, खरीद-बिक्री दस्तावेजों का मिलान और जांच की जाएगी।
खासकर बिना चिकित्सीय सलाह के नियंत्रित दवाओं की बिक्री पर कड़ी नजर रखी जाएगी। अनियमितता मिलने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी और अभियान की सभी रिपोर्ट सीआईडी को तत्काल प्रस्तुत करनी होगी।
टीम एबीएन, रांची। प्रवर्तन निदेशालय ने बृहस्पतिवार को उत्तर प्रदेश के तीन शहरों में छापेमारी की है। ये कार्रवाई झारखंड के एक पोंजी घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत की गई, जिसमें निवेशकों से करीब 300 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप है। अधिकारियों के अनुसार, नोएडा, गाजियाबाद और मेरठ में कम से कम 20 ठिकानों पर तलाशी ली जा रही है।
यह मामला मैक्सीजोन पोंजी स्कीम से जुड़ा है, जिसे कथित रूप से चंद्र भूषण सिंह और प्रियंका सिंह नाम के दो लोगों ने संचालित किया था।दोनों आरोपी कुछ महीने पहले झारखंड पुलिस द्वारा गिरफ्तार किये गये थे और फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं।
इस कार्रवाई को संघीय जांच एजेंसी ईडी के रांची जोनल कार्यालय द्वारा संचालित किया जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि इस पोंजी स्कीम के माध्यम से निवेशकों को अवास्तविक मुनाफे का लालच देकर 300 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की गयी थी।
टीम एबीएन, रांची। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने विदेश में कथित रूप से अघोषित संपत्ति रखने के मामले में रांची के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और उसके सहयोगियों के खिलाफ मंगलवार को छापे मारे। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
अधिकारियों ने बताया कि चार्टर्ड अकाउंटेंट और संदिग्ध हवाला आपरेटर नरेश कुमार केजरीवाल, उनके कुछ पारिवारिक सदस्यों और सहयोगियों के रांची, मुंबई और सूरत स्थित परिसरों की विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के प्रावधानों के तहत तलाशी ली जा रही है।
ईडी के अधिकारियों ने बताया कि यह कार्रवाई आयकर विभाग के निष्कर्षों के आधार पर की गयी है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि नरेश कुमार केजरीवाल का संयुक्त अरब अमीरात, नाइजीरिया और अमेरिका में अघोषित विदेशी मुखौटा संस्थाओं पर नियंत्रण हैं और इनका प्रबंधन भारत से प्रभावी ढंग से किया जाता है।
उन्होंने बताया कि इन परिसंपत्तियों में 900 करोड़ रुपये से अधिक की अघोषित राशि जमा है और संदेह है कि लगभग 1,500 करोड़ रुपये फर्जी टेलीग्राफिक हस्तांतरण के माध्यम से भारत में वापस भेजे गये।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत सरकार ने लोकप्रिय मैसेजिंग ऐप्स—WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh—के लिए बड़े बदलावों की घोषणा की है। दूरसंचार विभाग (DoT) ने आदेश जारी किया है कि अब कोई भी यूज़र सक्रिय SIM कार्ड के बिना इन सेवाओं का उपयोग नहीं कर सकेगा। यह प्रावधान टेलीकम्युनिकेशन Cybersecurity Amendment Rules 2025 के तहत लागू किया गया है, जिसमें पहली बार ऐप-आधारित मैसेजिंग प्लेटफ़ॉर्म्स को टेलीकॉम सेवाओं की श्रेणी में रखा गया है।
सरकार का तर्क है कि इससे ऐसे अपराधियों पर रोक लगेगी जो निष्क्रिय या फर्जी SIM का उपयोग करके धोखाधड़ी और साइबर अपराध करते हैं।
सरकार के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में बड़ी खामी यह थी कि एक बार नंबर वेरिफाई होने के बाद मैसेजिंग ऐप्स SIM हट जाने या निष्क्रिय होने पर भी चलते रहते थे। COAI का कहना है कि इंस्टॉलेशन के समय सिर्फ एक बार SIM-बाइंडिंग होती है, लेकिन उसके बाद ऐप SIM की उपस्थिति की जांच नहीं करता।
इस ढिलेपन का फायदा साइबर अपराधियों को मिलता था—वे SIM बदलकर या उसे डिसेबल कराकर भी ऐप्स का इस्तेमाल जारी रखते थे, जिससे कॉल रिकॉर्ड, लोकेशन लॉग या कैरियर डेटा के आधार पर उनकी ट्रेसिंग मुश्किल हो जाती थी।
सरकार का दावा है कि लगातार SIM-बाइंडिंग से यूज़र, नंबर और डिवाइस के बीच संबंध मजबूत होगा, जिससे स्पैम, फ्रॉड और मैसेजिंग आधारित वित्तीय अपराधों पर प्रभावी रोक लगेगी। सरकार यह भी बताती है कि UPI और बैंकिंग ऐप्स में पहले से ही SIM वेरिफिकेशन अनिवार्य है। SEBI ने भी ट्रेडिंग अकाउंट्स के लिए SIM लिंकिंग और फेस रिकग्निशन का प्रस्ताव रखा था।
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