एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक आधिकारिक नोटिस जारी कर बताया है कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की तबीयत खराब है, जिस वजह से वह आज निर्धारित मामलों पर सुनवाई नहीं करेंगे।
नोटिस में कहा गया है कि देश के मुख्य न्यायाधीश 28 जुलाई 2023 को सुनवाई नहीं करेंगे। इसके चलते कोर्ट नंबर एक में जस्टिस मनोज मिश्रा और मुख्य न्यायाधीश की पीठ की बैठक रद्द की जाती है।
इस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई नहीं की जायेगी। नोटिस में कहा गया है कि जस्टिस मनोज मिश्रा की एकल पीठ ही चैंबर के मामलों को संभालेगी।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट में सोमवार को चीफ जस्टिस संजय कुमार मिश्र एवं जस्टिस आनंद सेन की खंडपीठ में द्वितीय जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा की सीबीआई जांच कराने एवं राज्य सरकार की अपील की सुनवाई हुई। मामले में सीबीआई की ओर से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल किया गया।
जिस पर राज्य सरकार ने स्टेटस रिपोर्ट अध्ययन करने के लिए कोर्ट से समय की मांग की। मामले की अगली सुनवाई 16 अगस्त को होगी। इससे पहले इसी मामले में राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से कोर्ट को मौखिक रूप से बताया गया कि सरकार ने उन्हें पद पर फिर से बहाल कर प्रमोशन दे दिया है, उनमें से बहुत लोगों का कंफर्मेशन भी हो गया है।
इसलिए सरकार की अपील पर मेरिट पर सुनवाई करने का कोई औचित्य नहीं है। सरकार एक तरफ जेपीएससी द्वितीय की परीक्षा के नियुक्त अधिकारियों को रीइंस्टेट कर उन्हें प्रमोशन दे रही है और उनकी नियुक्ति कंफर्म कर रही है वहीं दूसरी ओर नियुक्त अधिकारियों के खिलाफ अपील भी दायर कर रही है, यह समझ से परे है।
जेपीएससी की ओर से अधिवक्ता संजय पिपरवार एवं प्रिंस कुमार ने पैरवी की। दरअसल, बुद्धदेव उरांव ने जेपीएससी द्वितीय की परीक्षा में अंको की हेरा फेरी एवं एवं रिजल्ट प्रकाशन में गड़बड़ी की जांच सीबीआई से कराने का आग्रह किया है।
वही राज्य सरकार की ओर से जेपीएससी द्वितीय के नियुक्त अधिकारियों के खिलाफ एलपीए दायर किया गया है। बता दें कि पहले राज्य सरकार द्वारा ली गई द्वितीय जेपीएससी जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में गड़बड़ी की जांच निगरानी ब्यूरो कर रही थी, बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर इसकी जांच सीबीआई को दे दी गयी थी।
टीम एबीएन, लातेहार/ रांची। झारखंड पुलिस ने वनकर्मी की हत्या के मामले में 12 माओवादियों के खिलाफ केस दर्ज किया है। बता दें कि लातेहर जिले की दुरुप पंचायत में वनकर्मी देव कुमार प्रजापति (35 वर्षीय) की पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी थी। हत्या का आरोप माओवादियों के एक गुट पर लगा था। अब पुलिस ने हत्या के इस मामले में 12 माओवादियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
लातेहर एसपी ने दी जानकारी
लातेहर एक एसपी अंजनी अंजन ने बताया कि 12 माओवादियों के खिलाफ नामजद एफआईआर की गयी है और कई अन्य अज्ञात भी आरोपी बनाये गये हैं। ये सभी प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के सदस्य हैं। माओवादियों के क्षेत्रीय कमांडर छोटू खरवार, जोनल कमांडर मनीष, सब जोनल कमांडर उज्जवल और प्रदीप का नाम एफआईआर में शामिल है। एसपी ने बताया कि माओवादियों को पकड़ने के लिए छापेमारी की जा रही है।
पीट-पीटकर की गयी थी वनकर्मी की हत्या
बता दें कि देव प्रजापति पलामू टाइगर रिजर्व में दैनिक वेतन पर वन ट्रैकर का काम करता था। माओवादियों को शक था कि वह पुलिस का मुखबिर है। हत्या के बाद वनकर्मी के घर पर माओवादियों ने चेतावनी भी लिखी थी और लोगों को पुलिस की मुखबिरी नहीं करने को कहा था। माओवादियों ने चार अन्य लोगों को भी पीटकर घायल कर दिया था।
वहीं लातेहर जिले में ही सीआरपीएफ के जवानों ने माओवादियों के प्रभाव वाले कुकु गांव से आईईडी बरामद किया है। सीआरपीएफ की 112वीं बटालियन के कमांडेंट प्रमोद साहू ने यह जानकारी दी है। आईईडी को निष्क्रिय कर दिया गया है।
टीम एबीएन, रांची। एटीएस की टीम ने गैंगस्टर अमन श्रीवास्तव के दो गुर्गे ऐजाज अंसारी और मिंकू खान उर्फ शहरियार को गिरफ्तार किया है। दोनों के पास से 49 लाख 83 हजार रुपये बरामद किया है। वहीं, एक स्कॉर्पियो और चार मोबाइल फोन भी जब्त किया है।
बता दें कि संगठित अपराधिक गिरोहों के फंडिंग, आर्थिक स्त्रोतों, अपराध से अर्जित किये गये संपत्ति का पता लगाने और इन गिरोहों के खिलाफ ठोस कार्रवाई को लेकर गिरफ्तारी हुई है।
बताया गया कि गिरफ्तार दो अपराधी गैंगस्टर अमन श्रीवास्तव, रवि सरदार, फिरोज खान, जहीर अंसारी एवं नेपाली उर्फ महमूद के इशारे पर रंगदारी का पैसा उठाने का काम करता था।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। वाराणसी के बहुचर्चित ज्ञानवापी परिसर में वजूस्थल को छोड़कर परिसर के सर्वे वाली याचिका पर आदेश आ गया है। जिला जज डॉ अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत ने मां श्रृंगार गौरी मूल वाद में ज्ञानवापी के सील वजूखाने को छोड़कर बैरिकेडिंग वाले क्षेत्र का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से रडार तकनीक से सर्वे कराने का आदेश दिया है।
अदालत ने कहा है कि एएसआई बताए कि किस तरह से और कैसे सर्वे होगा कि ज्ञानवापी परिसर में किसी भी तरह का नुकसान न हो। सर्वे के संबंध में पूरी तैयारी के साथ एएसआई चार अगस्त तक रिपोर्ट दाखिल करे। इसके साथ ही मुकदमे की सुनवाई की अगली तिथि अदालत ने चार अगस्त नियत की है।
अदालत में हिंदू पक्ष की चार वादिनी रेखा पाठक, मंजू व्यास, लक्ष्मी देवी और सीता साहू की तरफ से बीते 16 मई को प्रार्थना पत्र दिया गया था। कहा गया था कि ज्ञानवापी में सील किए गए वजूखाना को छोड़कर बाकी क्षेत्र का एएसआई से रडार तकनीक से सर्वे कराया जाये।
इस पर 19 मई को अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने आपत्ति की थी। 14 जुलाई को सुनवाई पूरी हो गई थी। तब कोर्ट ने आदेश के लिए पत्रावली सुरक्षित रखते हुए सुनवाई के लिए 21 मई की तिथि तय की थी।
हिंदू पक्ष ने जतायी खुशी
जिला जज की अदालत में आवेदन मंजूर होने पर हिंदू पक्ष ने खुशी जताते हुए इसे बड़ी जीत करार दिया है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने कहा कि सर्वे से यह स्पष्ट हो जायेगा कि ज्ञानवापी की वास्तविकता क्या है। सर्वे में बिना क्षति पहुचायेंं पत्थरों, देव विग्रहों, दीवारों सहित अन्य निर्माण की उम्र का पता लग जायेगा।
वहीं, विपक्षी अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने सर्वे कराने के आवेदन का विरोध किया है। अपर जिला जज (नवम) विनोद कुमार सिंह की अदालत में गुरुवार को ज्ञानवापी परिसर स्थित वजूखाना में गंदगी फैलाने और शिवलिंग जैसी आकृति पर दिये गये विवादास्पद बयान के मामले में दाखिल निगरानी अर्जी पर सुनवाई हुई।
एआईएमआईएम के अध्यक्ष असुदद्दीन ओवैसी की ओर से अधिवक्ता एहतेशाम आब्दी और शवनवाज परवेज ने वकालत नामा लगाया। कोर्ट ने अन्य विपक्षीगण को उपस्थित होने के लिए अगली सुनवाई 16 अगस्त की तिथि तय की।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दिल्ली की एक अदालत ने सागर धनखड़ हत्याकांड के आरोपी ओलंपिक पदक विजेता पहलवान सुशील कुमार को चिकित्सा आधार पर बुधवार को एक सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुशील कुमार ने दलीलें सुनने के बाद कहा कि अदालत के समक्ष पेश किये गके दस्तावेजों से पता चलता है कि आरोपी सुशील कुमार दाहिने घुटने के आंशिक लिगामेंट टियर पीएफ से पीड़ित हैं और उन्हें वैकल्पिक सर्जरी की जरूरत है।
न्यायाधीश ने आदेश में कहा कि अभियुक्त की वर्तमान चिकित्सा स्थिति को ध्यान में रखते हुए, यह आदेश दिया जाता है कि उसे एक सप्ताह की अवधि के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा किया जाये।
जमानत की अवधि 23 जुलाई को शुरू होगी और 30 जुलाई को समाप्त होगी।
अंतरिम जमानत अवधि समाप्त होने के बाद आरोपी को संबंधित जेल अधीक्षक के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि पहलवान सुशील कुमार पर अन्य लोगों के साथ मिलकर कथित संपत्ति विवाद को लेकर 4 मई, 2021 को दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम की पार्किंग में पूर्व जूनियर राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियन धनखड़ और उनके दोस्तों पर कथित तौर पर हमला करने का आरोप है। धनखड़ ने बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृत्यु का कारण मस्तिष्क में चोट आना बताया गया था।
एबीएन सोशल डेस्क। हाल में कई विवादास्पद वीडियो के कारण चर्चा में रहे केदारनाथ मंदिर में मोबाइल फोन लेकर प्रवेश करने, फोटो लेने और वीडियो बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने इस संबंध में मंदिर परिसर में जगह-जगह बोर्ड लगा दिये हैं।
इन बोर्ड में कहा गया है कि मंदिर परिसर में मोबाइल फोन लेकर प्रवेश न करें, मंदिर के भीतर किसी प्रकार की फोटोग्राफी तथा वीडियोग्राफी पूर्णत: वर्जित है और आप सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में हैं। कुछ अन्य बोर्ड में मंदिर और मंदिर परिसर में मर्यादित वस्त्र ही धारण करने को कहा गया है जबकि एक अन्य बोर्ड में कहा गया है कि मंदिर प्रांगण में तंबू या शिविर स्थापित करना दंडनीय अपराध है।
हिंदी और अंग्रेजी में लिखे इन बोर्ड में साफ तौर पर कहा गया है कि ऐसा करते पकड़े जाने पर कानूनी कार्रवाई की जायेगी। हाल में गढ़वाल हिमालय में स्थित केदारनाथ मंदिर में बनाये गये ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हुए जिन्हें लेकर तीर्थ पुरोहितों से लेकर आम श्रद्धालुओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने भी आपत्ति प्रकट की थी और धार्मिक स्थानों पर ऐसे कृत्यों को गलत ठहराया था।
एक वीडियो में जहां मंदिर परिसर में अपने पुरुष मित्र को नाटकीय अंदाज में घुटनों के बल बैठकर प्रपोज करती एक व्लॉगर दिखाई दी थी, वहीं एक अन्य वीडियो में मंदिर के गर्भगृह में एक महिला नोट उड़ाती दिखाई दी थी। इसके अलावा भी, कई लोगों को केदारनाथ मंदिर में रील बनाते देखा गया था।
बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने कहा कि धार्मिक स्थल की एक गरिमा, मान्यताएं और परंपराएं होती हैं और श्रद्धालुओं को उसके अनुरूप ही आचरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हालांकि बदरीनाथ धाम में ऐसी कोई शिकायतें अभी नहीं आई हैं लेकिन जल्द ही वहां भी ऐसे बोर्ड लगाये जायेंगे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अक्सर सवाल उठाया जाता है कि क्या स्वतंत्रता मिलने के बावजूद देश का कानून उतना संवेदनशील व व्यावहारिक है, जो किसी लोकतांत्रिक देश के लिए अपरिहार्य होना चाहिए। विभिन्न मामलों में कानून की परिभाषा के अंतर्गत तमाम ऐसे व्यवस्थागत अतिक्रमण हैं जिन्हें गंभीर जुर्म की श्रेणी में रखा गया है।
जाने-अनजाने में हुए ऐसे जुर्मों को लेकर जेल की सजा और आर्थिक जुर्माना यानी दोनों लागू होने को लेकर भी सवाल उठाये जाते हैं। सवाल यह भी कि जब जेल हुई है तो आर्थिक दंड क्यों? वहीं दूसरी ओर देश में अंग्रेजों के जमाने के तमाम कानून प्रचलित हैं जो स्वतंत्र देश की व्यवस्था में तार्किक नजर नहीं आते।
राजग सरकार की उस मुहिम की सराहना करनी होगी कि जिसके अंतर्गत उसके नौ साल के कार्यकाल में 1500 ऐसे कानून निरस्त किये गये, जो अमृतकाल तक पहुंचे देश में न्याय की कसौटी में खरे नहीं उतरते थे। दरअसल, तमाम कानून ऐसे थे जो अंग्रेजी राज को स्वतंत्रता सेनानियों के विरोध से संरक्षित करते थे। वहीं दूसरी ओर व्यक्तिगत आजादी पर अंकुश लगाते थे।
इसी दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ी पहल की है और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनविश्वास विधेयक पर मोहर लगा दी है। जिसके अंतर्गत 42 कानूनों में बदलाव किया जायेगा। इनके तहत आने वाले 183 प्रावधानों में बदलाव होगा। दरअसल, इस प्रयास का मकसद अदालतों में मुकदमों का बोझ कम करना, कारोबारी सुगमता बढ़ाना तथा छोटे अपराधों के मामलों में लोगों को जेल जाने से बचाना है।
दरअसल, यह पहल छोटे अपराधों के मामले में कारावास की सजा को खत्म करने का प्रयास है। ऐसे मामलों में सिर्फ आर्थिक दंड ही लगाया जायेगा। गत बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनविश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक 2023 को मंजूरी दे दी। दरअसल, इस विधेयक को दिसंबर 2022 में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में पेश किया था।
इस बिल को तार्किक बनाने व इससे जुड़ी विसंगतियों को दूर करने के लिए कालांतर संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था। दरअसल, इस मुद्दे पर गंभीर मंथन के लिए 31 सदस्यीय समिति का गठन विशेष रूप से किया गया। जिसमें विधायी और विधि मामलों से जुड़े विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारियों से लंबा विमर्श किया गया।
इतना नहीं, इस मुद्दे पर विभिन्न राज्यों से भी राय ली गई। तदुपरांत, इस वर्ष मार्च में समिति ने अपनी रिपोर्ट दी थी। समिति ने राज्यों को भी ऐसे प्रावधानों में संशोधन के लिए प्रेरित करने की सलाह दी थी। समिति का मानना था कि केंद्र राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों को प्रेरित करे कि वे जनविश्वास विधेयक की तर्ज पर छोटे जुर्मों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने को कानूनी उपाय करें।
दरअसल, विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, आर्थिक दंड का निर्धारण गलती की गंभीरता के अनुसार होना चाहिए। गलती की पुनरावृत्ति पर जुमार्ना राशि में वृद्धि की जायेगी। दरअसल, इस विधेयक में अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे अनेक ऐसे कानूनों में कारावास की सजा समाप्त करने की सिफारिश है, जो मौजूदा दौर में तार्किक व न्याय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते।
ब्रिटिश कालीन जिन कानूनों में संशोधन होना है उनमें भारतीय डाकघर अधिनियम 1898, कृषि उपज (ग्रेडिंग और मार्किंग) अधिनियम 1937, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940, सार्वजनिक ऋण अधिनियम 1944 आदि शामिल हैं। दरअसल, विधेयक में अपराध की गंभीरता के आधार पर आर्थिक दंड को तर्कसंगत बनाने और भरोसे पर आधारित शासन को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है।
साथ ही इसमें विभिन्न अपराधों के लिये जुमार्ने में समीक्षा का भी प्रावधान है, हर तीन साल में जुमार्ने की राशि दस फीसदी बढ़ा दी जायेगी। वहीं ब्रिटिश शासन को संरक्षण देने वाले भारतीय डाकघर अधिनियम 1898 के सभी अपराधों को खत्म कर दिया जायेगा।
दरअसल, कोशिश यही है कि छोटे अपराध के लिये बड़ी सजा न मिले और आर्थिक दंड को सुधारात्मक दृष्टि से उपयोग में लाया जाये। सरकार का कहना है कि यह प्रयास कारोबार को सुगम बनाने और नागरिकों के दैनिक कामकाज को आसान बनाने में सहायक होगा। निस्संदेह, केंद्र सरकार की इस रचनात्मक पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।
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