टीम एबीएन, रांची। राम प्रवेश कुमार, झा०प्र०से० (चतुर्थ सीमित बैच), तत्कालीन अंचल अधिकारी, वलिपुर, धनबाद, सम्प्रति अंचल अधिकारी, करमाटांड, जामताड़ा के विरूद्ध झारखंड सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2016 के नियम-14 के तहत असंचयात्मक प्रभाव से एक वेतन वृद्धि पर रोक का दण्ड अधिरोपित किए जाने के प्रस्ताव पर राज्य सरकार ने स्वीकृति दी है।
चंद्रशेखर सिंह, सेवानिवृत झा०प्र०से०, तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी, सोनवर्षा, सहरसा (बिहार) के विरूद्ध झारखंड पेंशन नियमावली के नियम-43 (ख) के तहत उनकी समूची पेंशन आजीवन रोकने का दंड अधिरोपित किये जाने के प्रस्ताव पर राज्य सरकार ने स्वीकृति दी है।
अवधेश कुमार पांडेय, सेवानिवृत झा०प्र० से० (कोटि क्रमांक-528/03), तत्कालीन, नगर आयुक्त, धनबाद नगर निगम, धनबाद के विरूद्ध झारखण्ड पेंशन नियमावली के नियम-43 (ख) के अंतर्गत उनके पेंशन से 05 प्रतिशत राशि की कटौती एक वर्ष तक करने का दण्ड अधिरोपित करने के प्रस्ताव पर राज्य सरकार ने स्वीकृति दी है।
डॉ अशोक कुमार पाठक, तत्कालीन सिविल सर्जन, बोकारो के विरूद्ध गठित प्रपत्र क सापेक्ष विभागीय कार्यवाही संचालित करने के प्रस्ताव पर राज्य सरकार ने स्वीकृति दी है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। अगर आपने अभी तक आधार कार्ड अपडेट नहीं किया अभी तक तो करवा लें। बस कुछ ही दिन रह गये आधार को अपडेट करवा लें। दरअसल, 14 जून के बाद इसके लिए आपको जुर्माना लग सकता है। इसको जितना जल्दी अपडेट करवा लें उतना ही अच्छा है।
यदि आपके पास भी 10 साल पुराना आधार कार्ड है और अभी तक अपडेट नहीं कराया तो यह खबर आपके लिए है। सरकार ने आधार अपडेट कराने के लिए 14 जून 2024 की तारीख तय की है। वहीं, 14 जून में कुछ ही दिन बाकी है। इस तारीख तक आप अपने आधार को फ्री में अपडेट करा सकते हैं।
अगर आपने अभी तक नहीं करवाया अपडेट तो इस पर जुर्माना भी लगे तो फिर आधार अपडेट की हालत पैन अपडेट जैसी हो जायेगी। आइये आपको आधार कार्ड अपडेट कैसे करें बताते हैं।
आधार अपडेट के लिए आपको दो जरूरी डॉक्यूमेंट की जरूरत होगी। पहला पहचान पत्र और दूसरा एड्रेस प्रूफ। वैसे आधार अपडेट के लिए आधार सेंटर पर 50 रुपये का शुल्क लगता है लेकिन यूआइडीएआइ के मुताबिक 14 जून तक यह सेवा फ्री है। पहचान पत्र के तौर पर आप पैन कार्ड और एड्रेस के लिए वोटर कार्ड दे सकते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दिल्ली की एक विशेष अदालत ने कथित आबकारी नीति घोटाले से संबंधित धनशोधन के एक मामले के आरोपी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की मेडिकल अधार पर सात दिन की अंतरिम जमानत याचिका ठुकराते हुए विशेष अदालत ने बुधवार को उनकी न्यायिक हिरासत 19 जून तक बढ़ा दी।
राउज एवेन्यू स्थित प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) मामलों से संबंधित कावेरी बावेजा की विशेष अदालत ने यह आदेश पारित किया। विशेष अदालत ने केजरीवाल के स्वास्थ्य की चिंताओं से संबंधित उनके अधिवक्ता के सवालों पर कहा कि मेडिकल जांच से संबंधित कुछ निर्देश दिये गये हैं। जरूरत के मुताबिक याचिकाकर्ता की अर्जी पर आगे भी विचार किया जायेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। चुनाव आयोग ने सोमवार को कांग्रेस नेता जयराम रमेश से कहा कि वे वोट काउंटिंग से पहले गृह मंत्री के 150 कलेक्टर्स को फोन करने के दावे पर आज ही जवाब दें और शाम तक सबूत पेश करें। रमेश को चुनाव आयोग ने रविवार शाम तक उन आरोपों का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा था, जो उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लगाये थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने सोमवार को आयोग को पत्र लिखकर अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का और समय मांगा।
रमेश को लिखे पत्र में चुनाव आयोग ने कहा कि आयोग समय बढ़ाने के आपके अनुरोध को सिरे से खारिज करता है और आपको निर्देश देता है कि आप तथ्यात्मक आरोपों के साथ आज यानी 3 जून शाम 7 बजे तक जवाब दाखिल करें।
ऐसा करने में विफल रहने पर यह मान लिया जाएगा कि आपके पास इस मामले में कहने के लिए कुछ भी ठोस नहीं है और आयोग उचित कार्रवाई के लिए आगे बढ़ेगा। चुनाव आयोग ने कहा कि उनके इस आरोप का मंगलवार को होने वाली मतगणना प्रक्रिया की शुचिता पर सीधा असर पड़ता है।
रमेश ने दावा किया था कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिलाधिकारियों या कलेक्टरों को फोन कर रहे हैं और उन्हें खुलेआम डराने-धमकाने में लगे हैं। चुनाव के दौरान जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर अपने-अपने जिलों के निर्वाचन अधिकारी होते हैं।
रमेश ने दावा किया कि शाह पहले ही 150 जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टरों से बात कर चुके हैं। आयोग ने कहा कि किसी भी जिलाधिकारी ने इस तरह के किसी अनुचित प्रभाव की सूचना नहीं दी है, जैसा कि उन्होंने आरोप लगाया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। 27 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि एक मुस्लिम पुरुष और एक हिंदू महिला की आपस में शादी नहीं हो सकती है, ना तो इस्लामिक कानूनों के मुताबिक और न ही स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लामिक कानून किसी मुस्लिम पुरुष की मूर्ति पूजा या आग की पूजा करने वाली हिंदू महिला से शादी की अनुमति नहीं देता है और स्पेशल मैरिज एक्ट से भी ऐसी शादी को वैधता नहीं मिल सकती।
हालांकि विश्लेषक, हाई कोर्ट के इस फैसले की आलोचना कर रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला स्पेशल मैरिज एक्ट के लागू करने के उद्देश्यों के खिलाफ है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है कि मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला की शादी, जिसमें दोनों शादी के बाद अपने-अपने धर्म को मानते हों, वह शादी भी वैध नहीं हो सकती। मध्य प्रदेश के मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला के जोड़े ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इन दोनों ने आपस में तय किया था कि शादी के बाद कोई अपना धर्म नहीं बदलेगा और अपने-अपने धर्मों को मानते रहेंगे।
इस जोड़े ने कहा है कि उन्होंने पहले स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी के लिए मैरिज आफिसर के पास आवेदन दिया था, लेकिन दोनों के परिवार वालों की आपत्तियों के चलते शादी रजिस्टर्ड नहीं हो सकी। दोनों ने अदालत से सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की थी, ताकि वे अपनी शादी का पंजीयन करा सकें। स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 में पारित कानून है जिसके तहत अंतर-धार्मिक वैवाहिक जोड़े अपनी शादी का पंजीयन करा सकते हैं। इस कानून के तहत विवाह करने को इच्छुक जोड़े मैरिज आफिसर के पास इस संबंध में आवेदन देते हैं।
इस आवेदन के बाद मैरिज आफिसर 30 दिनों के लिए एक नोटिस जारी करते हैं। इस अवधि में, कोई भी व्यक्ति यह कहते हुए आपत्ति दर्ज करा सकता है कि यह जोड़ा, विवाह पंजीकृत कराने के लिए आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में विवाह का पंजीयन नहीं होता है। इस मामले में लड़की के परिवार ने आरोप लगाया कि वह परिवार के गहने लेकर घर से चली गयी थी। लड़की के परिवार वालों ने अपनी आपत्ति में यह भी कहा है कि अगर अंतर-धार्मिक विवाह होने दिया गया तो पूरे परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा।
कोर्ट ने सबसे पहले इस बात पर विचार किया कि ये शादी वैध होगी या नहीं। इसके बाद कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत ऐसी शादी वैध नहीं है। इसके बाद अदालत ने यह भी कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट भी उस शादी को वैध नहीं करेगा जो पर्सनल लॉ के तहत वैध नहीं है। कोर्ट ने ऐसा कहने का आधार 2019 के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को बनाया जिसमें कहा गया था कि मुस्लिम पुरुष का उस गैर-मुस्लिम महिला से विवाह वैध नहीं होगा जो अग्नि या मूर्तियों की पूजा करती हैं। हालांकि, एक मुस्लिम पुरुष यहूदी या ईसाई महिला से शादी कर सकता है। ऐसी शादी को वैध माना जा सकता है, बशर्ते महिला इन तीनों धर्मों में से किसी एक को अपना ले।
हालांकि इस जोड़े की दलील थी कि स्पेशल मैरिज एक्ट के सामने पर्सनल लॉ की अहमियत नहीं होनी चाहिए और उनकी शादी को रजिस्टर करने की अनुमति दी जानी चाहिए। लेकिन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस पर सहमति नहीं जताई। हाई कोर्ट ने कहा कि अगर शादी पर पाबंदी है, तो यह कानून उसे वैध नहीं ठहरा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा संबंधित उनकी याचिका को खारिज कर दिया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले से पारिवारिक मामलों के कई कानून विशेषज्ञ असहमत नजर आते हैं। हाई कोर्ट ने वास्तव में यह कहा है कि उन मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला के बीच शादी, जो अपने-अपने धर्म को मानते रहना चाहते हैं, स्पेशल मैरिज एक्ट या मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध नहीं हो सकती।
इन विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले में स्पेशल मैरिज एक्ट लागू करने वाले उद्देश्यों को नकार दिया गया। स्पेशल मैरिज एक्ट के उद्देश्यों में कहा गया है कि यह कानून सभी भारतीयों के विवाह के लिए बनाया गया है, चाहे विवाह करने वाला कोई भी पक्ष या किसी भी धर्म को क्यों न मानता हो। इसमें कहा गया है कि विवाह करने वाले जब तक स्पेशल मैरिज एक्ट के लिए जरूरी शर्तों का पालन करते हैं तब तक वे, शादी के लिए कोई भी रीति रिवाज अपना सकते हैं। वकील और परिवार संबंधित कानूनों की एक्सपर्ट मालविका राजकोटिया ने इस फैसले पर कहा कि यह कानून के हिसाब से सही फैसला नहीं है। इसे सुप्रीम कोर्ट में पलट दिया जाएगा। इस फैसले में स्पेशल मैरिज एक्ट के मूल भाव को शामिल नहीं किया गया है, जिसका उद्देश्य अंतर-धार्मिक विवाहों को सुविधाजनक बनाना था।
महिला अधिकार संबंधी मामलों की वकील वीना गौड़ा ने कहा- कोर्ट के एक अवलोकन के रूप में भी यह बेहद भ्रामक है। मेरी तो यही इच्छा है कि इस्लामिक कानून पर ध्यान केंद्रित करते हुए न्यायाधीश ने स्पेशल मैरिज एक्ट (जो अंतरधार्मिक विवाह को सुविधाजनक बनाता है) के उद्देश्य और कारणों पर भी विचार किया होता। बेंगलुरु स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पारिवार संबंधी कानून की प्रोफे़सर सरसु एस्तेर थॉमस भी इस नजरिए से सहमत दिखती हैं। उन्होंने कहा, यह फैसला बिल्कुल भी सही नहीं है। फैसले में स्पेशल मैरिज एक्ट का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा गया है। इसमें इस्लामिक कानून का ध्यान रखा गया है। जबकि स्पेशल मैरिज एक्ट विभिन्न धर्मों के लोगों को विवाह करने की अनुमति देता है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले में गलत तरीके से कहा गया है कि पर्सनल लॉ के तहत निषिद्ध विवाह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत नहीं किये जा सकते। हालांकि, स्पेशल मैरिज एक्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इस कानून के तहत कौन से विवाह नहीं हो सकते, जैसे कि एक दूसरे के रक्त संबंधी रिश्तेदारों के विवाह नहीं हो सकते हैं, या फिर आयु संबंधी पात्रता नहीं रखने वालों के विवाह इस कानून के तहत नहीं हो सकते। क्या उच्च न्यायालय के इस फैसले का असर अंतर-धार्मिक जोड़ों के बीच विवाह पर पड़ेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। हालांकि, उनका मानना है कि इससे अंतर-धार्मिक विवाह को लेकर उत्साह कम होता है। वीना गौड़ा ने कहा, यह पुलिस सुरक्षा की मांग करने वाली एक रिट याचिका में न्यायालय का अवलोकन मात्र है। इसलिए यह कोई बाध्यकारी फैसला नहीं है। न्यायालय विवाह की वैधता पर विचार नहीं कर रहा था।
वहीं मालविका राजकोटिया ने कहा, विवाह रोकने का कोई निर्देश नहीं है। अब हमें देखना होगा कि क्या रजिस्ट्रार इस फैसले के आधार पर क्या करते हैं? रजिस्ट्रार अभी भी अंतर-धार्मिक विवाह को पंजीकृत कर सकते हैं। विवाह की वैधता को न्यायालय बाद में तय कर सकता है। प्रोफेसर सरसु एस्तेर थॉमस ने कहा कि अगर इस फैसले को लागू किया गया तो, स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इसका बहुत ही बुरा प्रभाव हो सकता है क्योंकि यह फैसला कह रहा है कि ये वैध विवाह नहीं है। यह वैध बच्चों को अवैध मान सकता है क्योंकि उनके माता-पिता की शादी वैध नहीं होगी। और यह सिर्फ इस्लामिक कानून पर लागू नहीं होगा।
टीम एबीएन, रांची। टेंडर कमीशन घोटाला मामले में मंत्री आलमगीर आलम की 14 दिनों की रिमांड अवधि गुरुवार को समाप्त हो गयी। 14 दिनों की रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद मंत्री आलमगीर आलम को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें सीधे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।
आलमगीर आलम को गिरफ्तार करने के बाद प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने पहले 6 दिनों की रिमांड ली, छह दिनों की रिमांड पर पूछताछ के बाद फिर पांच दिनों की रिमांड अवधि ली गई। 11 दिनों की रिमांड अवधि पूरी होने के बाद ईडी की टीम ने एक बार फिर तीन दिनों की रिमांड ली।
तीन दिनों की रिमांड अवधि भी गुरुवार को समाप्त हो गयी। ऐसे में 14 दिनों की रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद ईडी की टीम के पास आलमगीर आलम से पूछताछ के लिए समय मांगने का कोई विकल्प नहीं बचा। क्योंकि नियमानुसार ईडी किसी को भी अधिकतम 14 दिनों तक रिमांड पर रख सकती है।
आलमगीर आलम का पक्ष रख रहे उनके वकील किसलय प्रसाद ने बताया कि 14 दिनों की रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने का अनुरोध कोर्ट से किया गया। जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि मंत्री आलमगीर आलम शारीरिक रूप से बीमार हैं।
74 वर्ष की उम्र होने के कारण उन्हें कई तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए जेल में प्रोटोकॉल के तहत जो भी सुविधाएं हैं, वो सारी सुविधाएं उन्हें मुहैया करायी जाये। उन्होंने जेल के अंदर मंत्री आलमगीर आलम को मेडिकल सुविधा मुहैया कराने का अनुरोध किया। जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। किसी भी कंपनी या किसी सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) की ओर से पेंशन स्कीम चलाई जाती है। ईपीएफओ अपने ग्राहकों को 7 प्रकार की पेंशन मुहैया कराती है। पेंशन क्लेम करने के लिए अलग-अलग नियम और शर्तें हैं। इस पेंशन योजना को ईपीएफओ, ईपीएस- 1995 के नाम से चलाता है। जिसके अंतर्गत ईपीएफओ अपने कर्मचारियों को पेंशन के अलावा भी कई और लाभ प्रदान कराता है।
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की इस योजना का लाभ तभी उठाया जा सकता है, जब कर्मचारी ने कम से कम 10 साल तक नौकरी पूरी की हो। इस योजना को 1995 में लॉन्च किया गया था। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के द्वारा दिए जाने वाले पेंशन कुछ इस प्रकार है। आइये जानते हैं
ईपीएफ इस पेंशन योजना के तहत उन कर्मचारी को लाभ देता है, जिन्होंने 10 साल पूरे कर लिये हैं। इसके अलावा वे 58 साल के हो गये हों।
अगर आपकी उम्र 50 साल से ज्यादा है, साथ ही अगर अपने अपनी सेवा के 10 साल पूरे कर लिये हैं उसके बाद नौकरी छोड़ दिया है और किसी ऐसे संस्थान में काम नहीं करते, जहां ईपीएफ अधिनियम मान्य नहीं है। ऐसी स्थिति में आप पूर्व पेंशन का लाभ उठा सकते हैं।
दिव्यांग होने के कारण नौकरी छोड़ने पर दिव्यांगो को पेंशन दी जा सकती है। इस पेंशन को पाने के लिए न्यूनतम उम्र या 10 वर्ष की सेवा की कोई आवश्यकता नहीं है।
कर्मचारी की मृत्यु के मामले में, कर्मचारी की पत्नी और 25 साल से कम उम्र के दो बच्चे को एक साथ पेंशन मिलता है। अगर कोई बच्चा विकलांग हो जाता है तो उसे जीवन भर पेंशन मिलती रहेगी।
किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है और पत्नी भी नहीं है तो 25 साल से कम उम्र के दो बच्चों से अधिक को एक ही समय में पेंशन दी जाती है। सबसे बड़े बच्चे के 25 साल का हो जाने पर पेंशन बंद हो जायेगी।
कर्मचारी की मृत्यु पर नामांकित व्यक्ति पेंशन ले सकता है। यह तभी कर सकते हैं जब उसके परिवार में पत्नी-बच्चे जीवित नहीं हो।
अगर ईपीएफओ कर्मचारी शादी शुदा हो और उसकी मौत हो जाती है। सदस्य ने किसी को नामांकित भी नहीं किया है तो उसके पिता या माता को पेंशन दी जाती है।
टीम एबीएन, रांची। निर्वाचन आयोग ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में झारखंड भाजपा, कांग्रेस विधायक इरफान अंसारी और बोकारो की स्टील अथॉरिटी आफ इंडिया (सेल) को चेतावनी दी है और नियमों का अक्षरश: अनुपालन करने का निर्देश दिया है।
इधर, झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रवि कुमार के निर्देश के बाद बोकारो स्टील प्लांट प्रबंधन ने अपने आदेश को पुनरीक्षित करते हुए 25 मई को अपने कर्मियों को सवैतनिक अवकाश देने की घोषणा की है। इसके साथ ही जो कर्मी शिफ्ट में मतदान करने जाएंगे, उनको दो महीने के अंदर एक दिन का अवकाश भी मिलेगा।
भाजपा पर झारखंड में चौथे और पांचवें चरण के मतदान के दौरान मतदान केंद्रों पर मानक मतदाता पर्ची की जगह अबकी बार 400 पार नारा के साथ फोटो, चुनाव चिह्न आदि के साथ मतदाता पर्ची वितरण करने का आरोप है। इसे लेकर एफआइआर भी दर्ज है।
झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के रवि कुमार द्वारा भाजपा के प्रदेश संयोजक (विधि प्रकोष्ठ) सुधीर श्रीवास्तव को पत्र के माध्यम से सूचित किया गया है कि भारत निर्वाचन आयोग के दिशा निर्देश के तहत वोटरों को अनधिकृत पहचान पत्र सादे कागज पर देना है और उस पर किसी दल विशेष का चिह्न, प्रत्याशी का नाम और दल का नाम नहीं होना चाहिए।
उन्होंने इस दिशा निर्देश को पार्टी के सभी पदाधिकारियों, कार्यकतार्ओं को अवगत कराते हुए उसका अनुपालन सुनिश्चित कराने को कहा गया है। लोकसभा आम चुनाव 2024 के लिए झारखंड के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में निर्धारित मतदान की तिथि को निगोशिएबुल इनस्ट्रूमेंट्स एक्ट 1881 की धारा के तहत सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है।
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