एबीएन सेंट्रल डेस्क। झारखंड में ग्रामीण विकास विभाग के चीफ इंजीनियर वीरेंद्र कुमार राम के घर पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)की टीम ने छापा मारा है। ईडी की टीम ने कुल 24 ठिकानों पर एक साथ छापा मारा है।
सूत्रों के अनुसार ईडी ने वीरेंद्र राम के रांची, दिल्ली, सिरसा, सिवान, जमशेदपुर और आदित्यपुर स्थित ठिकानों पर छापामारी की है।
उल्लेखनीय है कि 2019 में एक कार्रवाई के दौरान वीरेंद्र राम के एक ठिकाने से 2 करोड़ 45 लाख रुपये मिले थे।
कहा जाता है कि उस समय जब्त किये गये पैसे भी श्री राम के ही थे। ईडी ने उसी समय श्री राम के खिलाफ मनी लाउंड्रिंग का केस दर्ज किया था।
टीम एबीएन, रांची। मनी लाउंड्रिंग मामले की आरोपित निलंबित आईएएस पूजा सिंघल ईडी के विशेष न्यायाधीश प्रभात कुमार शर्मा की अदालत में गुरुवार को सशरीर हाज़िर हुईं। इस दौरान उनके अधिवक्ता ने कोर्ट से आग्रह किया कि आरोप गठन (चार्जफ़्रेम) के बिंदु पर सुनवाई के लिए समय दिया जाये। इसके बाद न्यायालय ने आरोप गठन के लिए सुनवाई की तिथि एक मार्च निर्धारित की है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों मनी लॉउंड्रिंग की आरोपित निलंबित आईएएस पूजा सिंघल ने रांची ईडी की कोर्ट में याचिका दाखिल कर अपने केस से जुड़े दस्तावेज मुहैया कराने की मांग की थी। उनकी याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। पूजा सिंघल की ओर से अधिवक्ता स्नेह सिंह ने पक्ष रखा। पूजा सिंघल फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिलने के बाद न्यायिक हिरासत से बाहर हैं।
एबीएन सोशल डेस्क। उपभोक्ता को तय राशि के भुगतान के बदले दी जाने वाली सेवा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे में आती है। उसमें देरी या लापरवाही की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति न्याय प्राप्ति हेतु सेवा प्रदाता के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत का द्वार खटखटा सकता है। बेशक वह परिवहन सेवा हो या फिर डॉक्टर अथवा अस्पताल से मिलने वाली मेडिकल सेवा।
प्रदेश की एक उपभोक्ता अदालत में 31 जनवरी, 2017 को परिवादी प्रभुलाल पालीवाल द्वारा परिवाद दायर किया गया। जिसमें उन्होंने बताया कि 8 दिसंबर, 2016 को उनके पुत्र मुकेश का विवाह था। इसके लिए आठ दिसंबर को सुबह 11 बजे जावद से उदयपुर बारात लेकर जाने के लिए ट्रेवल एजेंसी की एक बस 14101 रुपये किराये पर तय की गई। बस के मालिक को 2100 रुपये बतौर पेशगी भी दिये थे। लेकिन उक्त बस तय किये गये समय 11 बजे नहीं पहुंची।
परिवादी प्रभुलाल द्वारा बस मालिक से बार-बार संपर्क करने पर उनके द्वारा कुछ देर में बस आने की बात कही जाती रही। प्रतीक्षा में शाम के तीन बज गए। परिवादी को दूसरी बस की व्यवस्था करके बारात लेकर जानी पड़ी। उपभोक्ता अदालत ने बस मालिक द्वारा समय पर बस न भेजने को लापरवाही माना और ट्रेवल कम्पनी पर 19 हजार रुपये हर्जाना लगाते हुए यह राशि पीड़ित उपभोक्ता को दिलाने का आदेश दिया। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की परिधि में माना है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि चिकित्सकों व स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत मुंबई हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए मेडिको लीगल एक्शन ग्रुप की याचिका को खारिजकर दिया।
न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ व न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने माना कि केवल 2019 के अधिनियम द्वारा 1986 के अधिनियम को निरस्त करने से चिकित्सकों द्वारा रोगियों को प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं को सेवा शब्द की परिभाषा से बाहर नहीं किया जायेगा। जबकि याचिकाकर्ता की दलील थी कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत चिकित्सकों के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत में शिकायत दर्ज नहीं की जा सकती है। मुंबई हाईकोर्ट ने अक्तूबर 2021 में इस याचिका को खारिज कर दिया था। याचिका में विधेयक पेश करते समय केंद्रीय मंत्री के बयान का हवाला दिया गया,जिसमे मंत्री ने तब कहा था, स्वास्थ्य सेवाएं विधेयक के तहत शामिल नहीं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि मंत्री का बयान कानून के दायरे को सीमित नहीं कर सकता।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 1986 के कानून में सेवाओं की परिभाषा में स्वास्थ्य सेवा का उल्लेख नहीं था। इसे नए अधिनियम के तहत शामिल करने का प्रस्ताव था जिसे अंतत: हटा दिया गया। इस पर न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि उपभोक्ता अधिनियम में सेवा की परिभाषा व्यापक है। यदि संसद इसे बाहर करना चाहती तो वह इसे स्पष्ट रूप से कहती। लेकिन संसद द्वारा उक्त बाबत कुछ न कहने से स्वास्थ्य सेवाओं को उपभोक्ता अधिनियम के दायरे में ही माना जायेगा।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम यूं तो सन 1986 में गठित हो गया था जो उपभोक्ताओ के हितों की रक्षा के लिए मील का पत्थर भी साबित हुआ। इस अधिनियम के लागू होने से उपभोक्ताओं को अपने शोषण से मुक्ति व न्याय प्राप्त करने का अधिकार मिला। लेकिन आज भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो इस उपभोक्ता कानून से अनभिज्ञ हैं। समाज के आखिरी व्यक्ति तक इस उपभोक्ता कानून व न्याय के लिए बनाई गई उपभोक्ता अदालतों की जानकारी होना आवश्यक है। क्योंकि आज भी जागरूकता के अभाव में उपभोक्ता विक्रेताओं व सेवा प्रदाताओं द्वारा की जा रही ठगी का शिकार हो रहे हैं।
उपभोक्ता अदालतों ने पीड़ित उपभोक्ताओं को समय-समय पर न्याय भी दिया है,जो एक ताकत के रूप में व्यवस्थाओं को सुधारने में सहायक सिद्ध हुआ है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 गठित होने के बाद इसमें उपभोक्ता संरक्षण नियम 1987 केंद्र सरकार द्वारा बजट घोषणा से प्रभाव में लाया गया था, जिसके चलते 16 मार्च 2011 को केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद का गठन किया गया। इस अधिनियम के नियमों में 17 बार नवीन प्रावधान जोड़े गये। इसी प्रकार 25 बार विभिन्न नियमों में संशोधन के साथ प्रावधानों को विलोपित किया गया। यानि समय और आवश्यकता के अनुरूप उपभोक्ता कानून को कारगर बनाने की कोशिश होती रही है, जो एक शुभ संकेत है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बीबीसी के दफ्तर पर आज बड़े पैमाने पर इनकम टैक्स ने छापे मारे। आयकर विभाग ने मंगलवार को कर चोरी की जांच के तहत दिल्ली और मुंबई में बीबीसी के कार्यालयों में एक सर्वे ऑपरेशन चलाया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी। प्रसारक द्वारा 2002 के गुजरात दंगों और भारत पर दो-भाग के डॉक्यूमेंट्री फिल्म को प्रसारित करने के कुछ सप्ताह बाद यह औचक कार्रवाई हुई।
उन्होंने कहा कि विभाग कंपनी के कारोबारी परिचालन और उसकी भारतीय इकाई से जुड़े दस्तावेजों पर गौर कर रहा है। एक सर्वे के तहत, आयकर विभाग केवल कंपनी के व्यावसायिक परिसर की ही जांच करता है और इसके प्रवर्तकों या निदेशकों के आवासों और अन्य स्थानों पर छापा नहीं मारता है।
जानकारी के मुताबिक, कर्मचारियों से दफ्तर छोड़कर घर जाने के लिए कह दिया गया है इसके साथ ही लंदन स्थित बीबीसी के दफ्तर में भी रेड की कार्रवाई की जानकारी दे दी गयी है। उधर, रेड पड़ते ही कांग्रेस ने आईटी की इस कार्रवाई को बीबीसी डॉक्यूमेंट्री पर बैन से जोड़ा है। कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा, पहले बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री आयी, उसे बैन किया गया। अब बीबीसी पर आईटी का छापा पड़ गया है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सेव अरुणाचल सेव इंडिजिनस (सासी) ने सोमवार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 (एच) को संशोधित करने के लिए राज्य विधानसभा में हाल ही में पारित निजी सदस्य प्रस्ताव पर कारवाई की मांग करते हुए राज्य सरकार को एक महीने का अल्टीमेटम दिया।
सोमवार को प्रेस क्लब में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, शासी के अध्यक्ष रोमजीर रक्षप ने कहा कि वे 13 अगस्त, 2021 से संसद में अनुच्छेद 371 (ए) और 371 (जी) को लाकर पारित या संशोधित करने की मांग कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि 2021 में विधानसभा सत्र के दौरान विधायक निनॉन्ग एरिंग द्वारा प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया गया था। बिल के पारित किये जाने पर राज्य सरकार द्वारा आश्वासन दिया गया था कि सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों को शामिल कर प्रतिनिधिमंडल गठित किये जायेंगे और अनुच्छेद 371 (एच) में संशोधन की मांग के लिए नई दिल्ली जायेंगे, लेकिन आज तक सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया है।
रोमजीर ने चेतावनी देते हुए कहा कि सासी ने राज्य सरकार से तुरंत पहल करने और जल्द से जल्द एक सर्वदलीय समिति बनाने और एक महीने के भीतर व्यावहारिक रूप से कार्य करने की मांग की। ऐसा नहीं होने पर लोकतांत्रिक आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी।
उन्होंने कहा कि राज्य में अवैध अप्रवासियों की प्रभावी जांच के लिए बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन 1873 के तहत वर्तमान इनर लाइन परमिट (आईएलपी) मानदंडों और विनियमन शासन में संशोधन की स्थिति की भी मांग की। सभी वन क्षेत्रों जो वन्य जीवन अभयारण्य और आरक्षित वन के कारण मानव को प्रभावित कर रहा है उन सब को तत्काल डी-आरक्षण पर काम करने की भी मांग की।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आयकर विभाग अनिवासी निवेशकों पर कर लगाने के उद्देश्य से गैरसूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों के उचित बाजार मूल्य (एफएमवी) का पता लगाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत संशोधित मूल्यांकन नियम जारी कर सकता है।
आयकर विभाग के एक अधिकारी ने यह जानकारी देते हुए कहा कि इस संशोधन की जरूरत इसलिए महसूस की जा रही है कि आयकर अधिनियम और फेमा कानून में गैर-सूचीबद्ध कंपनियों के एफएमवी की गणना के लिए अलग-अलग तरीके दिये गये हैं।
अधिकारी ने पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा कि आयकर अधिनियम के नियम 11यूए को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के अनुरूप बनाने के लिए हितधारकों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए फिर से निर्धारित किया जायेगा।
नियम 11यूए अचल संपत्ति के अलावा अन्य संपत्ति के एफएमवी के निर्धारण से संबंधित है। वित्त विधेयक, 2023 में आयकर अधिनियम के अनुच्छेद 56(2) में संशोधन का प्रस्ताव दिया गया है।
इससे निवेश एवं आंतरिक व्यापार प्रोत्साहन विभाग (डीपीआईआईटी) से मान्यता-प्राप्त स्टार्टअप को छोड़कर गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में किए जाने वाले विदेशी निवेश को कर दायरे में लाया जा सकेगा। हालांकि डीपीआईआईटी से मान्यता-प्राप्त और निर्धारित मानदंडों को पूरा करने वाले स्टार्टअप में निवेश पर कोई कर नहीं लगाया जायेगा।
मौजूदा नियमों के अनुसार, केंद्रीकृत नियंत्रण वाली कंपनियों में किये गये घरेलू निवेशकों या निवासियों के निवेश पर ही उचित बाजार मूल्य के ऊपर कर लगाया जाता है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड के रांची जिले में ध्वनि प्रदूषण को लेकर स्वत: संज्ञान पर झारखंड हाईकोर्ट में बीते शुक्रवार को सुनवाई हुई। अदालत ने ध्वनि प्रदूषण को लेकर शपथ पत्र दाखिल नहीं किए जाने पर राज्य सरकार को फटकार लगायी। मौखिक रूप से कहा कि रात में 10 बजे के बाद हर हाल में रांची शहर में लाउडस्पीकर नहीं बजना चाहिए। जरूरत पड़े तो प्राथमिकी दर्ज की जाये।
कोर्ट ने रात को लाउडस्पीकर बजाने पर लगायी रोक
न्यायालय ने एसएसपी, ट्रैफिक एसपी और नगर आयुक्त को कहा कि वे देखें कि ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम हो रही है या नहीं। ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के संबंध में कोर्ट के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करें। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि रांची शहर में ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, इस संबंध में कोर्ट को जानकारी नहीं दी गई है। जबकि कोर्ट ने पिछली सुनवाई में सरकार को ध्वनि प्रदूषण के लिए उठाए गए कदम के संबंध में रिपोर्ट देने को कहा था।
जरूरत पड़ने पर अपराधियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा सकता है प्रशासन
न्यायमूर्ति एसएन पाठक की अदालत ने स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की गयी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सरकार को अदालत के आदेश को सख्ती से लागू करना होगा। न्यायाधीश ने कहा कि जरूरत पड़ने पर प्रशासन अपराधियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा सकता है। न्यायाधीश ने रांची में ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गये हैं, यह बताने के लिए हलफनामा दायर करने में प्रशासन की विफलता पर नाराजगी व्यक्त की। वहीं, सुनवाई के दौरान रांची के उपायुक्त (डीसी) राहुल कुमार सिन्हा और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) किशोर कौशल अदालत में मौजूद थे।
टीम एबीएन, रांची। मनी लॉन्ड्रिंग मामले के आरोप में जेल में बंद झारखंड की निलंबित आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम बेल दे दी है। पूजा सिंघल की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई हुई। उनके अधिवक्ता ने पूजा सिंघल और उनकी बेटी के खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कोर्ट से यह आग्रह किया कि उन्हें बेल दी जाये।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पूजा सिंघल को दो महीनों की अंतरिम जमानत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस संजय मिश्रा की बेंच में हुई। अंतरिम जमानत मिलने से पूजा सिंघल को बड़ी राहत मिली है।
बता दें कि इससे पहले पिछले माह भी सुप्रीम कोर्ट ने पूजा सिंघल को बेटी की बीमारी के आधार पर जमानत दी थी। खूंटी में हुए मनरेगा घोटाला मामले में ईडी ने पूजा सिंघल को 11 मई 2022 को गिरफ्तार किया था।
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