कानून व्यवस्था

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Published / 2025-12-25 21:18:44
नो ड्यूज सर्टिफिकेट के बिना नहीं लड़ सकेंगे नगर निकाय चुनाव

नगर निकाय चुनाव : अगर नहीं किया ये काम तो प्रत्याशी नहीं लड़ पायेंगे चुनाव, आयोग ने जारी किया सख्त निर्देश 

टीम एबीएन, रांची। अगर आप नगर निकाय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, तो ये काम जरूर कर लें। नहीं तो आपकी उम्मीदवारी रद हो सकती है। दरअसल, चुनाव आयोग ने निर्देश जारी किया है। इसके तहत अगर आपके नाम पर उस क्षेत्र में नगर निगम या जिला प्रशासन के द्वारा अधिरोपित कोई टैक्स बकाया है, तो उसे समय पर चुका दें और नो ड्यूज सर्टिफिकेट ले लें। नहीं तो नगर निगम चुनाव के लिए आपकी उम्मीदवारी रद कर दी जायेगी। 

राज्य चुनाव आयोग ने आने वाले नगर निगम चुनावों को लेकर सभी जिलों को साफ निर्देश जारी किये हैं। आयोग के सचिव राधेश्याम प्रसाद के अनुसार, जिस भी उम्मीदवार पर होल्डिंग टैक्स या किसी भी तरह का कोई और टैक्स बकाया है, उसे बकाया चुकाना आवश्यक है। सभी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करते समय इस संबंध में एक शपथ पत्र देना करना होगा, यह अनिवार्य है। 

इन शहरी नगर निकाय क्षेत्रों में होना है चुनाव 

  1. नगर निगम - रांची, हजारीबाग, मेदिनीनगर, धनबाद, गिरिडीह, देवघर, चास, आदित्यपुर और मानगो। 
  2. नगर परिषद - गढ़वा, विश्रामपुर, चाईबासा, झुमरी तिलैया, चक्रधरपुर, चतरा, चिरकुंडा, दुमका, पाकुड़, गोड्डा, गुमला, जुगसलाई, कपाली, लोहरदगा, सिमडेगा, मधुपुर, रामगढ़, साहिबगंज, फुसरो और मिहिजाम। 
  3. नगर पंचायत - बंशीधर नगर, मझिआंव, हुसैनाबाद, हरिहरगंज, छतरपुर, लातेहार, कोडरमा, डोमचांच, बड़की सरैया, धनवार, महगामा, राजमहल, बरहरवा, बासुकीनाथ, जामताड़ा, बुंडू, खूंटी, सरायकेला और चाकुलिया। 

जनवरी के दूसरे सप्ताह तक चुनाव की घोषणा होने की है संभावना 

काफी जद्दोजहद के बाद राज्य में नगर निकाय चुनाव का रास्ता साफ होता हुआ दिख रहा है। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो जनवरी के दूसरे सप्ताह तक इसकी अधिकारी घोषणा होने की संभावना है। बैलेट पेपर के जरिए राज्य में पहली बार शहर की सरकार चुनी जायेगी। इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग तैयारी पूरी करने में जुटी है। 

संभावना है कि फरवरी में चुनाव की प्रक्रिया संपन्न कर ली जाये। राज्य में 48 शहरी निकाय क्षेत्र हैं, जिसके तहत नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों का चुनाव कराया जाना है। वार्डों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जल्द ही आयोग के द्वारा अध्यक्ष और मेयर जैसे पदों के लिए आरक्षण को अंतिम रूप दिया जायेगा।

Published / 2025-12-25 21:15:31
हजारीबाग : रिश्वतखोर पंचायत सचिव दबोचा गया

हजारीबाग में पीएम आवास में रिश्वतखोरी, एसीबी ने पंचायत सचिव को दबोचा 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। केंद्र सरकार की गरीबों के लिए महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री आवास में भी भ्रष्टाचार होने लगी है। ताजा मामला झारखंड के हजारीबाग का है। यहां पर हुवाग पंचायत के सचिव प्रभु नारायण सिंह को पीएम आवास योजना में रिश्वतखोरी के आरोप में एसीबी की तीन में गिरफ्तार किया है। 

पंचायत सचिव की गिरफ्तारी उस व्यक्त हुई, जब इस योजना में लाभुक से पहली किश्त जारी करने के बदले रिश्वत की रकम ले रहा था। लाभुक की शिकायत के बाद एसीबी ने जाल बिछाया और पंचायत सचिव को दबोचने में कामयाब हुए। इस कार्रवाई के बाद सरकारी योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गये हैं। 

जानकारी के मुताबिक हुवाग गांव निवासी मो. अलीजान अंसारी को पीएम आवास स्वीकृत हुआ था। इस योजना में कई लभुकों को पहली किश्त मिल चुकी थी। लेकिन मो. अलीजान अंसारी को पहली किश्त देने में टालमटोल किया जा रहा था। पंचायत सचिव ने कहा कि बगैर सेटिंग के कैसे भुगतान होगा। तय योजना के अनुसार जैसे ही पंचायत सचिव ने 2500 रुपये की रकम ली, एसीबी की टीम ने मौके पर ही उसे पकड़ लिया।   

गिरफ्तारी के बाद आरोपी से पूछताछ की जा रही है और मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की भी जांच की जा रही है। वहीं एसीबी अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी ताकि सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर लगाम लगायी जा सके। एसीबी के अधिकारियों ने बताया कि सरकारी योजनाओं में लभुकों को हो रही शिकायत पर हमलोग जांच करते हैं और योजना बना के संबंधित घुसखोर पर कार्रवाई करते हैं।

Published / 2025-12-24 18:09:13
बाल तस्करी को लेकर गहरी चिंता में सुप्रीम कोर्ट

एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने बाल तस्करी पर गहरी चिंता जतायी है। शीर्ष कोर्ट ने एक फैसले में बाल तस्करी को लेकर कहा कि यह देश में एक बेहद चिंताजनक हकीकत है। आधुनिक गुलामी के सबसे भयावह रूपों में से एक बाल तस्करी है। अफसोस कि सुरक्षा कानूनों के बावजूद संगठित गिरोहों द्वारा बच्चों का यौन शोषण फल-फूल रहा है। सुप्रीम कोर्ट बेंगलुरु में तस्करों के एक गिरोह द्वारा जबरन यौन शोषण की शिकार एक नाबालिग लड़की के मामले की सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरोह के सदस्यों की सजा को बरकरार रखा। 

बाल तस्करी संवैधानिक बुनियाद पर चोट 

द हिंदू की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संगठित अपराध नेटवर्क की जटिल और बहुस्तरीय संरचना की ओर ध्यान दिलाया, जो नाबालिग पीड़ितों की भर्ती, परिवहन, आश्रय और शोषण के विभिन्न स्तरों पर काम करते हैं। अदालत ने कहा कि यह अपराध गरिमा, शारीरिक अखंडता और प्रत्येक बच्चे को शोषण से बचाने के राज्य के संवैधानिक वादे की बुनियाद पर चोट करता है। पीठ ने बाल तस्करी के मामलों में पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देश निर्धारित किये। 

बचाव पक्ष की दलीलें पीठ ने खारिज कर दी 

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अपीलकर्ता के वकील ने पीड़िता के बयानों और अभियोजन के मामले को कई आधारों पर चुनौती दी थी। 

  1. गवाही में विरोधाभास: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पीड़िता ने कोर्ट में दावा किया कि जबरन यौन संबंध बनाने से उसे चोटें आईं और खून बहने लगा, जबकि मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए उसके पिछले बयान में इसका जिक्र नहीं था। 
  2. जगह का विवरण: बचाव पक्ष ने घटनास्थल के नक्शे को लेकर विरोधाभास उजागर किया। पीड़िता ने बताया था कि वहां दो कमरे थे, जबकि अन्य गवाहों ने कहा कि वहां एक हॉल था। 
  3. प्रक्रिया का उल्लंघन: यह तर्क दिया गया कि तलाशी और बरामदगी के दौरान आईटीपीए की धारा 15(2) का उल्लंघन किया गया। इस धारा के अनुसार, तलाशी के दौरान इलाके के दो या अधिक सम्मानित निवासियों (जिसमें कम से कम एक महिला हो) का उपस्थित होना अनिवार्य है। 
  4. पीठ का तर्क : नाबालिग पीड़िता की गवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता की गवाही में मामूली विरोधाभासों से जुड़े तर्कों को खारिज कर दिया। जस्टिस बागची ने फैसले में लिखा कि यौन तस्करी की नाबालिग पीड़ितों की गवाही को संवेदनशीलता और यथार्थवाद के साथ देखा जाना चाहिए। 

बच्चे की गवाही पर अविश्वास न करें अदालतें 

पीठ ने बच्चे की गवाही सुनते समय अदालतों को संवेदनशीलता और लचीलापन बरतने की आवश्यकता पर बल दिया। पीठ ने कहा कि बच्चे के लिए अपराध की प्रकृति को सटीक और स्पष्ट रूप से बयान करना संभव नहीं हो सकता है। ऐसे में अदालतों को उसके साक्ष्य में मामूली विसंगतियों के कारण उसकी गवाही पर अविश्वास नहीं करना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसी पीड़िता किसी भी तरह से अपराध में सहभागी नहीं होती, बल्कि वह एक घायल गवाह की तरह होती है, जिसकी गवाही अपने आप में अहम सबूत है। 

पीठ ने कहा- यह भयावह और अमानवीय 

पीठ ने यह भी कहा है कि बाल तस्करी का अपराध समाज और संविधान दोनों की बुनियाद पर सीधा हमला है। बच्चों को शिकार बनाने वाली यह व्यवस्था बेहद भयावह, अमानवीय और गहराई तक फैली हुई है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यौन तस्करी की शिकार खासकर नाबालिग पीड़िता के बयान को पूरी गंभीरता और भरोसे के साथ देखा जाना चाहिए। 

सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों का रखें ध्यान 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि अदालतों को नाबालिग पीड़िताओं की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कमजोरियों को ध्यान में रखते हुए उनके बयान का मूल्यांकन करना चाहिए। खासकर जब पीड़िता किसी हाशिये पर खड़े या सामाजिक रूप से पिछड़े समुदाय से आती हो। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह उम्मीद करना कि पीड़िता हर बात को बिल्कुल सटीक और क्रमबद्ध तरीके से बतायेगी, व्यवहारिक नहीं है। 

भयावह यादों को दोबारा बताना खुद में एक और पीड़ा 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन शोषण की भयावह यादों को दोबारा बताना खुद में एक और पीड़ा है, जिसे द्वितीयक पीड़ितकरण कहा जा सकता है। यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है, जब पीड़िता नाबालिग हो और उसे धमकी, बदले का डर, सामाजिक बदनामी और पुनर्वास की अनिश्चितता का सामना करना पड़े। ऐसे में अदालतों को पीड़िता की गवाही को संवेदनशीलता, यथार्थ और मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए। 

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय 

स्टेट आफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह (1996) के फैसले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यदि पीड़िता का बयान विश्वसनीय है, तो केवल उसकी गवाही पर भी सजा दी जा सकती है। पीठ ने पाया कि पीड़िता की गवाही सबसे विश्वसनीय है और एनजीओ कार्यकर्ता, डिकॉय गवाह और स्वतंत्र गवाह ने इसकी पुष्टि की है। 

मामला 2010 का है, जिसमें केपी किरणकुमार @ किरण बनाम स्टेट बाय पीन्या पुलिस के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। 19 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन फैसलों को सही ठहराया जिनमें आरोपियों को कई धाराओं में दोषी पाया गया था।

Published / 2025-12-23 20:11:05
रांची : होटवार जेल में डांस कर रहे कैदी, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से मांगा जवाब

रांची के होटवार जेल में कैदियों के डांस वीडियो पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से मांगा जवाब 

टीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट में रांची स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार (होटवार जेल) में शराब व जीएसटी घोटाला के आरोपियों का डांस करते वीडियो सामने आने के बाद स्वत: संज्ञान से दर्ज जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने मंगलवार की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को पूरे मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। 

अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की घटना शर्मनाक है। अदालत अब इस मामले में छह जनवरी को अगली सुनवाई करेगा। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ में इस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।  

वरिष्ठ अधिवक्ता धीरज ने बताया कि जेल में नाच प्रकरण के बाद सोशल मीडिया अकाउंट से माफिया एवं सरगनाओं के द्वारा आपराधिक क्रियाकलापों की खबर समाचार पत्रों के माध्यम से आने पर झारखंड उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसे बहुत ही गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को शपथ पत्र के माध्यम से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। 

खंडपीठ ने नाराजगी जाहिर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि राज्य की एजेंसी के लिए शर्मनाक चिंताजनक स्थिति है। इस मामले की विस्तृत सुनवाई के लिए छह जनवरी का समय निर्धारित किया गया है।

Published / 2025-12-20 21:07:09
किशोर न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार— 55 हजार लंबित मामलों का बोझ और भविष्य की चुनौती

एबीएन सेंट्रल डेस्क। किशोर न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य है—गलती करने वाले बच्चों को दंड के बजाय सुधार और पुनर्वास की ओर ले जाना। लेकिन आज यही प्रणाली भारी बोझ के नीचे दबी हुई है। देशभर के किशोर न्याय बोर्डों में 55,000 से अधिक मामले लंबित हैं, और 50,000 से ज्यादा किशोर फैसले का इंतजार कर रहे हैं। 

यह स्थिति न केवल न्याय प्रक्रिया की कमजोरियों को उजागर करती है, बल्कि उन बच्चों के भविष्य पर भी गहरा प्रभाव डालती है जो जीवन की सबसे संवेदनशील उम्र में न्याय के इंतजार में हैं। 

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों की संख्या तीन-चौथाई से अधिक है। यह वह उम्र है जब व्यक्तित्व का निर्माण होता है, और किसी भी कानूनी अनिश्चितता का असर जीवनभर उनके साथ चलता है। 

ढांचागत कमियां: सुधार की सबसे बड़ी बाधा 

  • इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 ने स्पष्ट किया है कि देश में किशोर न्याय प्रणाली के सामने ढांचागत संसाधनों की भारी कमी है। 
  • कई जिलों में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड पर्याप्त कर्मचारियों के बिना काम कर रहे हैं। 
  • विधिक-सह-परिवीक्षा अधिकारियों की गंभीर कमी है, जबकि इन्हीं पर किशोरों की सामाजिक पड़ताल और पुनर्वास की जिम्मेदारी होती है। 
  • निरीक्षण गृह, सेफ्टी होम और आब्जर्वेशन होम की संख्या और क्षमता, दोनों ही जरूरत से काफी कम हैं। 
  • देशभर में हुए अपराधों से जुड़े 31,365 मामले आईपीसी या विशेष कानूनों के तहत दर्ज हुए, जिनमें से अधिकांश को जिस गति से निपटाया जाना चाहिए था, वह संभव नहीं हो पाया। 

क्षमता बनाम आवश्यकता: आंकड़े बताते हैं सच्चाई 

  • भारत में 707 जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड हैं, जबकि देश में जिले 765 हैं। यानी कई जिलों में बोर्ड ही मौजूद नहीं है। जिन बोर्डों ने डेटा उपलब्ध कराया है, 
  • उनमें से 362 पर ही यह आंकड़े आधारित हैं—और वहीं 55,000 केस लंबित मिले। 
  • उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों ने जानकारी साझा नहीं की, जिससे वास्तविक संख्या और भी अधिक होने की आशंका है। 
  • मामलों के निपटान की राष्ट्रीय औसत दर सिर्फ 45% है। 
  • मिजोरम ने 79% मामलों का निपटान कर सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। 
  • वहीं ओडिशा केवल 17.4% की दर के साथ सबसे नीचे है। 
  • दिल्ली जैसे बड़े शहरी केंद्र में निपटान की दर राष्ट्रीय औसत से भी कम—41.9%—रही। 
  • दिल्ली में एक विधिक सह-परिवीक्षा अधिकारी पर औसतन 820 मामलों का बोझ है, जो किसी भी कुशल न्याय प्रणाली के लिए असंभव चुनौती है। 

कानून की मंशा और जमीन पर वास्तविकता 

2015 में किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव कर प्रणाली को मजबूत और अधिक संवेदनशील बनाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन एक दशक बाद भी कानून द्वारा अपेक्षित बुनियादी संरचना तैयार नहीं हो सकी। 

इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार 

  • यह स्थिति दशार्ती है कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्थाएं अपने लक्ष्य से काफी पीछे हैं। 
  • जब इतने बड़े पैमाने पर केस लंबित हों, तो यह सिर्फ अदालतों की देरी का मामला नहीं है यह उन सभी संस्थागत स्तरों की विफलता है जिन्हें 
  • किशोर के अधिकारों, पुनर्वास और मानसिक विकास का ध्यान रखना था। 

क्या है रास्ता? सुधार के लिए कुछ बुनियादी कदम अनिवार्य हैं 

  • कार्यबल बढ़ाया जाये, खासकर विधिक सह-परिवीक्षा अधिकारियों की संख्या। 
  • जुवेनाइल बोर्डों की संख्या बढ़े, ताकि हर जिले को समुचित न्यायिक सहायता मिले। 
  • आब्जर्वेशन होम और सेफ्टी होम को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाये। 
  • डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम को लागू कर केसों की रफ्तार बढ़ायी जाये। 
    किशोरों के पुनर्वास के लिए काउंसलिंग, शिक्षा और कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाये। 

निष्कर्ष : न्याय में देरी का अर्थ है अन्याय 

लाखों बच्चों का भविष्य केवल इसलिए दांव पर नहीं लगना चाहिए क्योंकि हमारी व्यवस्था समय पर निर्णय लेने में सक्षम नहीं है। 55,000 लंबित मामले सिर्फ एक संख्या नहीं हैं ये वे बच्चे हैं जो जीवन के चौराहे पर खड़े हैं और अपने लिए न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कानून की मंशा तभी पूरी होगी जब किशोर न्याय प्रणाली को संसाधनों, संवेदनशीलता और गति तीनों से सशक्त बनाया जाये। बच्चों का भविष्य इंतजार नहीं कर सकता; व्यवस्था को अब तेजी से जागना ही होगा।

Published / 2025-12-19 21:40:42
पॉक्सो मामलों के निपटारे में छतीसगढ़ देश में शीर्ष पर

  • पॉक्सो मामलों के निपटारे में छतीसगढ़ देश में शीर्ष पर
  • भारत में पॉक्सो मामलों की निपटान दर अब 109 प्रतिशत, जबकि छतीसगढ़ में 189 प्रतिशत रही
  • छतीसगढ़ की अदालतों ने लंबित मामलों को कम करने में पाई बड़ी सफलता, एक साल में दर्ज हुए मामलों से भी अधिक केस निपटाए
  • एक शोध के अनुसार 4 वर्षों में सभी लंबित मामलों को खत्म करने के लिए देशभर में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की जरूरत
  • यह अध्ययन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन ने किया

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत ने पॉक्सो मामलों में बच्चों को न्याय दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगाई है। पहली बार एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। इस मामले में  छत्तीसगढ़ शीर्ष पर है जिसने 189 प्रतिशत मामलों का निपटारा किया। साल 2025 में जहां छत्तीसगढ़ में पॉक्सो कानून के तहत 1416 मामले दर्ज हुए, वहीं अदालतों ने 2678 मामलों का निपटारा  किया, जिसमें पिछले कई वर्षों से लंबित मामलों का बड़ा हिस्सा शामिल है।

इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गई। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गई है।

मुकदमों को लेकर अक्सर तारीख पर तारीख की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किए गए मामलों से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।

रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। जैसे कि राज्यों के बीच मामलों के निपटान की दर में अंतर, दोष सिद्धि की दर में निरंतरता की कमी और लगभग 50 फीसदी मामलों का दो साल तक लंबित रहना। उदाहरण के तौर पर, छत्तीसगढ़ में लंबित मामलों में 3 प्रतिशत 6–10 साल से, 6 प्रतिशत 5 साल से, 14 प्रतिशत 4 साल से, 34 प्रतिशत 3 साल से और शेष 43 प्रतिशत मामले 2 साल से लंबित हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि कई मामले वर्षों से लंबित हैं। ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है, किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा, भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है। इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हक़ीक़त बन सके।

इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।

राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटारे की दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पाई।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए। साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।
यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गए सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है।

और जानकारी के लिए संपर्क करें
जितेंद्र परमार
8595950825

Published / 2025-12-18 20:55:08
पॉक्सो : पहली बार दर्ज मामलों से ज्यादा मामलों का हुआ निपटारा

  • भारत ने पॉक्सो के लंबित मामलों का बोझ किया कम 
  • भारत में पॉक्सो मामलों की निपटान दर अब 109 प्रतिशत हुई। यानी एक वर्ष में दर्ज होने वाले मामलों से अधिक मामलों का हुआ निपटारा 
  • एक शोध के अनुसार 4 वर्षों में सभी लंबित मामलों को खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की जरूरत 
  • यह अध्ययन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन ने तैयार किया 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। पहली बार भारत ने एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। यह न्यायिक प्रणाली में वर्षों से चले आ रहे लंबित मामलों के खिलाफ एक ऐतिहासिक बदलाव है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स आफ सेक्सुअल एब्यूज के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। 

इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गयी। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल आफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गयी है। 

मुकदमों को लेकर अक्सर तारीख पर तारीख की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किये गये मामलों से ज्यादा हो गयी है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जायें। 

इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है। रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। लगभग आधे लंबित मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है और अलग-अलग राज्यों में मामलों की स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। 

उदाहरण के तौर पर, पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पॉक्सो के सभी मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत के चलते सबसे बड़ी भागीदारी है। इसके बाद महाराष्ट्र (24 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (11 प्रतिशत) का स्थान है। कुल मिलाकर देखा जाये तो पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों में लगभग तीन-चौथाई अकेले सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में है। 

न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा कि भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है।

इसलिए इस गति को बनाये रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हकीकत बन सके। इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है। 

राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटान दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि पिछले वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पायी। 

ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है कि किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। 

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गयी है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाये रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाये। 

साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाये। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके। 

यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गये सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है। इस खबर से संबंधित और जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825) से संपर्क कर सकते हैं।

Published / 2025-12-15 20:19:58
ईपीएफओ खाताधारकों को तोहफा, बढेगा ब्याज दर!

ईपीएफओ : 8 करोड़ पीएफ खाताधारकों के लिए आने वाली है खुशखबरी, मिल सकता है ये बड़ा फायदा 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत भरी खबर सामने आ सकती है। वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार कर्मचारी भविष्य निधि (पीएफ) पर मिलने वाली ब्याज दरों में बढ़ोतरी पर विचार कर रही है। अनुमान है कि मौजूदा 8.25 प्रतिशत की दर को बढ़ाकर 8.75 प्रतिशत किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो इसका लाभ करीब 8 करोड़ पीएफ खाताधारकों को मिलेगा। 

मौजूदा और प्रस्तावित ब्याज दर 

फिलहाल वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पीएफ पर 8.25 प्रतिशत ब्याज दिया जा रहा है। प्रस्तावित बदलाव के तहत इसमें 0.50 प्रतिशत यानी 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। ब्याज दर बढ़ने से पीएफ खातों में सालाना मिलने वाली रकम सीधे बढ़ जायेगी। 

कितना मिल सकता है फायदा 

पीएफ का ब्याज हर साल एकमुश्त आपके खाते में जमा किया जाता है। अगर किसी कर्मचारी के पीएफ खाते में 5 लाख रुपये जमा हैं, तो मौजूदा दर पर उसे लगभग 41 हजार रुपये के आसपास ब्याज मिलता है। दर बढ़ने पर यह राशि बढ़कर करीब 43 हजार रुपये तक पहुंच सकती है, यानी सीधे हजारों रुपये का अतिरिक्त लाभ। 

कब लिया जायेगा फैसला 

ईपीएफओ के सेंट्रल बोर्ड आफ ट्रस्टीज की आने वाली बैठक में ब्याज दरों को लेकर चर्चा होने की संभावना है। माना जा रहा है कि जनवरी में इस पर अंतिम निर्णय लिया जा सकता है। मंजूरी मिलने के बाद ब्याज की राशि कर्मचारियों के खातों में जमा की जायेगी। कुल मिलाकर, यदि ब्याज दरों में यह बढ़ोतरी होती है तो नौकरीपेशा लोगों के पीएफ रिटर्न में अच्छी बढ़त देखने को मिल सकती है।

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