टीम एबीएन, रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ दायर एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण झारखंड सरकार आज से नहीं दे सकती है। जब तक की झारखंड सरकार सुप्रीम कोर्ट के जरनैल सिंह जजमेंट 1, 2 एवं एम नागराज के केस में जो दिए गए दिशा-निर्देश के आलोक में नयी नियमावली नहीं बनाती।
हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस एस चंद्रशेखर और जस्टिस नवनीत कुमार की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रार्थी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा गया था कि झारखंड सरकार का 31 मार्च 2003 का संकल्प गलत है। क्योंकि इसमें सुप्रीम कोर्ट के एम नागराज जजमेंट एवं जरनैल सिंह जजमेंट में जो गाइडलाइन दिया गया था उसका पालन नहीं किया गया है।
अदालत ने 2003 से लंबित इस याचिका को मंगलवार को निष्पादित कर दिया। अपने फैसले में अदालत ने कहा है कि झारखंड सरकार का 31 मार्च 2003 का संकल्प अब प्रभावी नहीं होगा। जब तक नियमावली, गाइडलाइन, एग्जिक्यूटिव इंस्ट्रक्शन सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट एम नागराज एवं जनरैल सिंह जजमेंट 1 व 2 के आलोक में नहीं लाए जाते।
दरअसल वर्ष 2003 में राज्य सरकार ने सड़क निर्माण विभाग में पदस्थापित एसटी-एसटी कैटगरी के जूनियर इंजीनियर को असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दिया था। जबकि सामान्य जाति को इसका लाभ नहीं मिला था। सरकार के इस आरक्षण -प्रमोशन के विरोध में झारखंड हाईकोर्ट में रघुवंश प्रसाद सिंह, जय किशोर दत्ता, गणेश प्रसाद समेत 37 से अधिक लोगों ने अगल-अलग समय में रिट याचिका दाखिल की थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने शनिवार को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में 15,000 रुपये के जमानत बांड और 1 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी। मामले पर ईडी की दो शिकायतों के आधार पर अदालत द्वारा उन्हें जारी किये गये समन के बाद केजरीवाल अदालत में पेश हुए थे।
ईडी ने मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष दो शिकायतें दायर की थीं, जिसमें मामले में उन्हें जारी किए गए कई समन को नजरअंदाज करने के लिए केजरीवाल के खिलाफ मुकदमा चलाने की मांग की गई थी। ताजा शिकायत आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक द्वारा समन संख्या का सम्मान नहीं करने से संबंधित है।
ईडी ने इससे पहले मजिस्ट्रियल अदालत में याचिका दायर कर केजरीवाल पर मुकदमा चलाने की मांग की थी, क्योंकि वह अब खत्म हो चुकी दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में उन्हें जारी किए गए पहले तीन समन में शामिल नहीं हुए थे।
एसीएमएम मल्होत्रा की अदालत ने मामले को (समन संख्या 1 से 3 के संबंध में) अन्य शिकायत के साथ 16 मार्च को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था। बता दें कि आज दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राउज एवेन्यू कोर्ट में पेशी हुई।
इसी के चलते उनके आवास के बाहर भी काफी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। करीब 10 बजे अरविंद केजरीवाल अपने आवास से कोर्ट के लिए रवाना हुए थे, जिसके चलते दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट के बाहर भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे। बता दें, केजरीवाल अब तक एजेंसी द्वारा जारी किये गये आठ समन को छोड़ चुके हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बाल पोर्नोग्राफी देखने और उसे डाउनलोड करने को अपराध नहीं मानने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है। मद्रास हाई कोर्ट ने एक चर्चित आदेश में चेन्नई के 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई को खारिज करते हुए कहा था कि बाल पोर्नोग्राफी देखना पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर खुशी जाहिर करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने कहा, यह न्याय का अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक पल है जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि एक आपराधिक मामले में भी कोई तीसरा पक्ष जो कि सीधे इस अपराध से प्रभावित नहीं है, ऊपरी अदालतों का रुख कर सकता है अगर उसे लगता है कि न्याय नहीं हुआ है।
पांच गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस, जिसके 120 से ज्यादा सहयोगी हैं, और बचपन बचाओ आंदोलन ने हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी थी। यह गठबंधन पूरे देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न, चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल दुव्यार्पार और बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहा है।
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एलायंस ने याचिका में कहा कि इस फैसले से आम जनता में यह संदेश गया है कि बाल पोर्नोग्राफी देखना और इसके वीडियो अपने पास रखना कोई अपराध नही है। इससे बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े वीडियो की मांग और बढ़ेगी और लोगों का इसमें मासूम बच्चों को शामिल करने के लिए हौसला बढ़ेगा।
इससे पहले 11 जनवरी को मद्रास हाई कोर्ट ने बाल पोर्नोग्राफी देखने और इसे डाउनलोड करने को अपराध मानने से इनकार करते हुए इस संबंध में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया था। चेन्नई की अंबत्तूर पुलिस ने आरोपी के फोन को जब्त कर छानबीन में पाया कि उसमें बड़ी मात्रा में बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां हैं।
इसके बाद उसके खिलाफ आईटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि आरोपी ने महज बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां डाउनलोड कर इसे अकेले में देखा, उसने इसे कहीं भी प्रसारित या वितरित नहीं किया। हाई कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला पॉक्सो के दायरे में नहीं आता क्योंकि आरोपी ने बाल पोर्नोग्राफी के लिए किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल नहीं किया। लिहाजा इसे ज्यादा से ज्यादा आरोपी का नैतिक पतन कहा जा सकता है।
मद्रास हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करने के लिए आईटी और पॉक्सो एक्ट के तहत दिये गये केरल हाई कोर्ट के एक फैसले का सहारा लिया। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस ने अपनी याचिका में कहा कि इस मामले में केरल हाई कोर्ट के फैसले पर भरोसा करना एक चूक थी। एलायंस ने कहा, ह्लसामग्रियों की विषयवस्तु एवं प्रकृति से स्पष्ट है कि यह पॉक्सो के प्रावधानों के तहत आता है और यह इसे उस मामले से अलग करती है जिस पर केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया था।
शीर्ष अदालत के रुख का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संयोजक रवि कांत ने कहा, बच्चों के आॅनलाइन यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में यह एक उल्लेखनीय कदम है। यदि कोई व्यक्ति बाल पोर्नोग्राफी, बाल यौन शोषण से जुड़े वीडियो डाउनलोड करता है तो इसका मतलब है कि किसी बच्चे का बलात्कार हुआ है और आनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटीरियल (सीसैम) की मांग बच्चों से बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देती है।
हमारे गणतंत्र के 75 साल पूरे होने के बाद बाल यौन शोषण और बच्चों के खिलाफ हिंसा के उभरते स्वरूपों के खिलाफ लड़ाई को इसी तात्कालिकता और गंभीरता से लेने की जरूरत है जो सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल पोर्नोग्राफी के मामले में तेजी से इजाफा हुआ है। देश में 2018 में जहां 44 मामले दर्ज हुए थे वहीं 2022 में यह बढ़कर 1171 हो गये।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। बाल पोर्नोग्राफी देखने और उसे डाउनलोड करने को अपराध नहीं मानने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया है।
मद्रास हाई कोर्ट ने एक चर्चित आदेश में चेन्नई के 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर और आपराधिक कार्रवाई को खारिज करते हुए कहा था कि बाल पोर्नोग्राफी देखना पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर खुशी जाहिर करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फूलका ने कहा, यह न्याय का अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में ऐतिहासिक पल है जहां सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि एक आपराधिक मामले में भी कोई तीसरा पक्ष जो कि सीधे इस अपराध से प्रभावित नहीं है, ऊपरी अदालतों का रुख कर सकता है अगर उसे लगता है कि न्याय नहीं हुआ है।
पांच गैरसरकारी संगठनों के गठबंधन जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस, जिसके 120 से ज्यादा सहयोगी हैं, और बचपन बचाओ आंदोलन ने हाई कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी थी। यह गठबंधन पूरे देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न, चाइल्ड ट्रैफिकिंग यानी बाल दुव्यार्पार और बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहा है।
हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए एलायंस ने याचिका में कहा कि इस फैसले से आम जनता में यह संदेश गया है कि बाल पोर्नोग्राफी देखना और इसके वीडियो अपने पास रखना कोई अपराध नही है। इससे बाल पोर्नोग्राफी से जुड़े वीडियो की मांग और बढ़ेगी और लोगों का इसमें मासूम बच्चों को शामिल करने के लिए हौसला बढ़ेगा।
इससे पहले 11 जनवरी को मद्रास हाई कोर्ट ने बाल पोर्नोग्राफी देखने और इसे डाउनलोड करने को अपराध मानने से इनकार करते हुए इस संबंध में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दिया था। चेन्नई की अंबत्तूर पुलिस ने आरोपी के फोन को जब्त कर छानबीन में पाया कि उसमें बड़ी मात्रा में बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां हैं।
इसके बाद उसके खिलाफ आईटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मामले को खारिज कर दिया कि आरोपी ने महज बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्रियां डाउनलोड कर इसे अकेले में देखा, उसने इसे कहीं भी प्रसारित या वितरित नहीं किया।
हाई कोर्ट ने आगे कहा कि यह मामला पॉक्सो के दायरे में नहीं आता क्योंकि आरोपी ने बाल पोर्नोग्राफी के लिए किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल नहीं किया। लिहाजा इसे ज्यादा से ज्यादा आरोपी का नैतिक पतन कहा जा सकता है। मद्रास हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी करने के लिए आईटी और पॉक्सो एक्ट के तहत दिए गए केरल हाई कोर्ट के एक फैसले का सहारा लिया।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस ने अपनी याचिका में कहा कि इस मामले में केरल हाई कोर्ट के फैसले पर भरोसा करना एक चूक थी। एलायंस ने कहा कि सामग्रियों की विषयवस्तु एवं प्रकृति से स्पष्ट है कि यह पॉक्सो के प्रावधानों के तहत आता है और यह इसे उस मामले से अलग करती है जिस पर केरल हाई कोर्ट ने फैसला दिया था।
शीर्ष अदालत के रुख का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संयोजक रवि कांत ने कहा- बच्चों के आॅनलाइन यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में यह एक उल्लेखनीय कदम है। यदि कोई व्यक्ति बाल पोर्नोग्राफी, बाल यौन शोषण से जुड़े वीडियो डाउनलोड करता है तो इसका मतलब है कि किसी बच्चे का बलात्कार हुआ है और आनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटीरियल (सीसैम) की मांग बच्चों से बलात्कार की संस्कृति को बढ़ावा देती है।
हमारे गणतंत्र के 75 साल पूरे होने के बाद बाल यौन शोषण और बच्चों के खिलाफ हिंसा के उभरते स्वरूपों के खिलाफ लड़ाई को इसी तात्कालिकता और गंभीरता से लेने की जरूरत है जो सुप्रीम कोर्ट ने दिखायी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में बाल पोर्नोग्राफी के मामले में तेजी से इजाफा हुआ है। देश में 2018 में जहां 44 मामले दर्ज हुए थे वहीं 2022 में यह बढ़कर 1171 हो गये।
टीम एबीएन, कोडरमा। पत्नी की गला दबाकर हत्या करने के एक मामले की मात्र 4 माह कार्य दिवस में त्वरित सुनवाई करते हुए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वितीय अजय कुमार सिंह की अदालत ने बुधवार को आरोपी दिलीप पंडित 40 वर्ष, पिता- कमल पंडित काको जयनगर जिला- कोडरमा निवासी को 302 आईपीसी के तहत दोषी पाते हुए कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनायी। साथ ही 25000 जुर्माना लगाया। जुर्माना की राशि नहीं देने पर 1 वर्ष अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी।
मामला वर्ष 2023 का है। इसे लेकर जयनगर थाना कांड संख्या 90/ 2023 एवं 90/2023 दर्ज किया गया था। अभियोजन का संचालक लोक अभियोजक पीपी एंजेलिना वारला ने किया। इस दौरान सभी 7 गवाहों का परीक्षण कराया गया। लोक अभियोजक पीपी एंजेलिना वारला ने कार्रवाई के दौरान अपराध की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय से अभियुक्त को फांसी की सजा देने का आग्रह किया।
वहीं बचाव पक्ष की ओर से एल ए डीसी डिप्टी चीफ किरन कुमारी ने दलीलें पेश करते हुए बचाव किया। अदालत ने सभी गवाहों और साक्षयो का अवलोकन करने के उपरांत अभियुक्त को दोषी पाते हुए सजा मुकर्रर की और जुर्माना लगाया। बताते चले कि न्यायालय ने एक दिन पूर्व आरोपी को दोषी उठहराया था।
कोडरमा- इसे लेकर मृतक संगीता देवी के पिता इतवारी पंडित ने जयनगर थाना में आवेदन देकर मामला दर्ज कराते हुए कहा था कि उसकी पुत्री की शादी 23 वर्ष पहले देवेंद्र पंडित उम्र 40 वर्ष पिता कमल पंडित, काको, जयनगर, कोडरमा निवासी के साथ हुई थी। शादी के बाद उसकी पांच लड़की और एक लड़का है।
इधर, 6 -7 वर्षों से दोनों के बीच लड़ाई- झगड़ा होते आ रहा था। कई बार हम लोग समझने गए और समझाएं भी, पर कोई फायदा नहीं हुआ। 9 मई 2023 के सुबह 6 बजे मोहल्ले के लोगों के द्वारा फोन आया कि देवेंद्र पंडित (आपका दामाद) आपकी पुत्री का गला दबाकर हत्या कर दिया है। तब हम लोग वहां पहुंचे तो देखें कि मेरी बेटी मृत अवस्था में पर पड़ी हुई है।
दामाद से पूछताछ किया तो वह कुछ भी नहीं बोला। आस पड़ोस से पता चला कि मेरा दामाद ही उसकी हत्या गला दबाकर कर दिया है। उनके द्वारा अपने दामाद देवेंद्र पंडित पर पुत्री की गला दबाकर हत्या करने का आरोप लगाते हुए उचित कानूनी कार्रवाई करने की गुहार लगायी गयी थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सर्वोच्च न्यायालय ने सांसदों और विधायकों के विशेषाधिकार को परिभाषित करते हुए सोमवार को निर्णय दिया कि पैसा लेकर प्रश्न पूछना, पैसा लेकर भाषण करना ओर पैसा लेकर सदन के भीतर वोट देना भ्रष्टाचार है और ऐसा करने वाले सांसदों, विधायकों पर मुकदमा चलेगा।
यह निर्णय स्वागत योग्य है, परंतु यदि कोई मंत्री संसद अथवा विधानसभा में किसी सांसद या विधायक के प्रश्न का गलत और गुमराह करने वाला उत्तर देता है और यह साबित हो जाता है कि जिसका संरक्षण देने के लिए वह उत्तर दे रहा है, उससे उसका संबंध है तो ऐसे मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार का मुकदमा चलना चाहिए। इस क्रम में सरयू राय ने झारखण्ड विधानसभा के माननीय अध्यक्ष महोदय को जो पत्र लिखा है, वह भी इसी दायरे में आना चाहिए। इस पत्र की प्रति संलग्न है, जो स्वत: स्पष्ट है।
विधायक के रूप में सरयू राय ने विधानसभा में राज्य के माननीय स्वास्थ्य मंत्री से एक सवाल पूछा था कि जमशेदपुर की एक महिला चिकित्सक, रेणुका चैधरी ने कई वर्षों तक सेवा से अनुपस्थित रहने के बावजूद वेतन लिया और अनुपस्थिति की अवधि में फर्जी हस्ताक्षर उपस्थिति पंजिका में किया। एक बार दिनांक 19.08.2013 को तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव के आदेश पर तीन सदस्यीय समिति ने जांच की तो पाया कि ये आरोप सही है और चूंकि आरोपी चिकित्सक तब तक अवकाश ग्रहण कर चुकी थी, इसलिए उनके वेतन की पूरी कटौती करने का आदेश पारित हुआ।
परंतु जब विधायक सरयू राय ने विधानसभा के वर्तमान बजट सत्र में और इसके पूर्व रांची विधानसभा के विधायक सीपी सिंह ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में संबंधित प्रश्न उठाया तो सरकार ने उत्तर दिया कि उस समय की उपस्थिति पंजिका जिला यक्ष्मा कार्यालय, जमशेदपुर से गायब हो गयी है और जिस लिपिक (संजय तिवारी) की अभिरक्षा में उपस्थिति पंजिका थी, उसने आत्महत्या कर ली है।
यानी जिस उपस्थिति पंजिका के आधार पर वर्ष 2016 में स्वास्थ्य विभाग की तीन सदस्यीय समिति ने पाया कि डॉ रेणुका चैधरी ने उपस्थिति पंजिका पर फर्जी हस्ताक्षर किया है और जिस पंजिका के बारे में एक आरटीआई कार्यकर्ता को विभाग ने उत्तर दिया कि वह उपस्थिति पंजिका गायब नहीं हुई है, वहीं किसी और आरटीआई कार्यकर्ता को विभाग ने लिखित तौर पर बताया कि मांगे गये दस्तावेजों की प्रति खोजी गई, जिसमें उक्त दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।
दूसरी ओर विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री ने उत्तर दिया कि वह उपस्थिति पंजिका गायब है और आरोपी चिकित्सक पर कार्रवाई करने के लिए माननीय स्वास्थ्य मंत्री ने पूर्वी सिंहभूम जिला के सिविल सर्जन के उपर ही सही तथ्य नहीं बताने के लिए प्रपत्र क गठित कर विभागीय कार्यवाही आरंभ कर दिया है।
विधायक श्री सरयू राय ने इस बारे में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा है और कहा है कि यदि सभा व्यवस्थित होती तो इस प्रश्न के उत्तर पर वाद-विवाद होता तो वे इस बारे में कतिपय सवाल पूछते, परंतु सभा की कार्यवाही बाधित हो गयी, इसलिए सरकार के गलत उत्तर को वे परिभाषित नहीं कर सके।
उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया है कि वे विधानसभा में गलत उत्तर देने वालों के खिलाफ सदन की अवमानना की कार्रवाई करे, परंतु जब आज माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पैसा लेकर प्रश्न आदि पूछने के बारे में सांसदों और विधायकों के विशेषाधिकार को परिभाषित कर दिया है, तब प्रश्न उठता है कि विधानसभा में गलत उत्तर देने वाले मंत्री के विरूद्ध भ्रष्टाचार के विरूद्ध आपराधिक कार्रवाई हो सकती है या नहीं।
यह सवाल विधायक सरयू राय माननीय विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष उठायेंगे ताकि सरकार में व्याप्त मंत्रियों का भ्रष्टाचार भी इस दायरे में आये और मंत्री बनकर भ्रष्टाचार करने वाले और भ्रष्टाचार के प्रभाव में गलत उत्तर देने वाले मंत्रियों के विरूद्ध भी आपराधिक कार्रवाई हो सके।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारत सरकार ने ऐतिहासिक प्रेस और पत्रिकाओं का पंजीकरण (पीआरपी) अधिनियम, 2023 और इसके नियमों को अपने राजपत्र में अधिसूचित कर दिया है और इसके परिणामस्वरूप यह अधिनियम 1 मार्च, 2024 से लागू हो गया है।
अब से, पत्रिकाओं का पंजीकरण प्रेस और पत्रिकाओं के पंजीकरण अधिनियम (पीआरपी अधिनियम), 2023 और प्रेस और पत्रिकाओं के पंजीकरण नियमों के प्रावधानों के अनुसार होगा। अधिसूचना के अनुसार, भारत के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल का कार्यालय- पीआरजीआई, जिसे पहले रजिस्ट्रार आफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया के नाम से जाना जाता था, नये अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करेगा।
डिजिटल इंडिया के मूल्यों के अनुरूप, नया अधिनियम देश में समाचार पत्रों और अन्य पत्रिकाओं के पंजीकरण की सुविधा के लिए एक आनलाइन प्रणाली प्रदान करेगा। नई प्रणाली मौजूदा मैनुअल, बोझिल प्रक्रियाओं को बदल देगी। पुरानी प्रक्रिया में कई चरणों में अनुमोदन शामिल होते हैं जो प्रकाशकों के लिए अनावश्यक कठिनाइयों का कारण बन रहे थे।
इससे पहले, सूचना और प्रसारण मंत्री श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने नए अधिनियम के अनुसार विभिन्न आवेदन प्राप्त करने के लिए प्रेस रजिस्ट्रार जनरल का आनलाइन पोर्टल, प्रेस सेवा पोर्टल लॉन्च किया था। किसी पत्रिका के प्रिंटर द्वारा दी गयी सूचना सहित सभी आवेदन, किसी विदेशी पत्रिका के स्थानीय संस्करण के पंजीकरण के लिए आवेदन, किसी पत्रिका के पंजीकरण का प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए प्रकाशक द्वारा आवेदन, पंजीकरण के प्रमाण पत्र में संशोधन के लिए आवेदन, ट्रांसफर के लिए आवेदन पत्रिकाओं का स्वामित्व, पत्रिका के प्रकाशक द्वारा वार्षिक विवरण प्रस्तुत करना, और पत्रिका के प्रसार के सत्यापन के लिए डेस्क आॅडिट की प्रक्रिया आदि सभी कार्य प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से आनलाइन होंगे।
प्रेस सेवा पोर्टल पेपरलेस प्रोसेसिंग सुनिश्चित करता है और ई-साइन सुविधा, डिजिटल भुगतान गेटवे, तत्काल डाउनलोड के लिए क्यूआर कोड-आधारित डिजिटल प्रमाणपत्र, प्रिंटिंग प्रेस द्वारा सूचना प्रदान करने के लिए आनलाइन प्रणाली, टाइटल उपलब्धता के लिए संभावना का प्रतिशत, पंजीकरण तक आनलाइन पहुंच, सभी प्रकाशकों के लिए डेटा, वार्षिक विवरण दाखिल करना आदि सेवाएं प्रदान करता है।। इसका इरादा एक चैटबॉट-आधारित इंटरैक्टिव शिकायत समाधान सिस्टम स्थापित करने का भी है। प्रेस सेवा पोर्टल के साथ एक नयी वेबसाइट भी है जिसमें सभी संबंधित जानकारी और उपयोगकर्ता के अनुकूल इंटरफेस है।
नया पीआरपी अधिनियम पुराने पीआरबी अधिनियम द्वारा आवश्यक पंजीकरण के दायरे से पुस्तकों और पत्रिकाओं को हटा देता है; नया अधिनियम एक पत्रिका को एक समाचार पत्र सहित किसी भी प्रकाशन के रूप में परिभाषित करता है जो नियमित अंतराल पर प्रकाशित और प्रिंट होता है जिसमें सार्वजनिक समाचार या सार्वजनिक समाचार पर टिप्पणियां शामिल होती हैं लेकिन इसमें वैज्ञानिक, तकनीकी और शैक्षणिक प्रकृति की कोई पुस्तक या पत्रिका शामिल नहीं होती है। इसलिए, पुस्तक, या वैज्ञानिक, तकनीकी और शैक्षणिक प्रकृति की पुस्तक या जर्नल सहित को पीआरजीआई के साथ पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है।
नये अधिनियम के अनुसार, पत्रिकाओं के पंजीकरण के लिए सभी आवेदन केवल प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से आनलाइन मोड में किये जायेंगे। इस तरह पत्रिकाएं निकालने के इच्छुक प्रकाशकों को इसे प्रकाशित करने से पहले इसका टाइटल पंजीकृत करना होगा। चूंकि पंजीकरण प्रक्रिया आनलाइन होगी और सॉफ्टवेयर के माध्यम से निर्देशित होगी, आवेदन में त्रुटियों की संभावना काफी कम हो जायेगी जिसके परिणामस्वरूप आवेदनों की तेजी से प्रोसेसिंग होगी। आवेदन की स्थिति सभी चरणों में अपडेट की जायेगी और आवेदक को एसएमएस और ईमेल के माध्यम से सूचित किया जायेगा ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके और गलत संचार के कारण होने वाली देरी को समाप्त किया जा सके।
पंजीकरण प्रक्रिया शुरू करने के लिए, प्रस्तावित पत्रिका के मालिक को 5 प्राथमिकता के क्रम में प्रस्तावित शीर्षकों के साथ आवश्यक प्रासंगिक दस्तावेज/विवरण प्रस्तुत करके प्रेस सेवा पोर्टल पर साइन अप करना और एक प्रोफाइल बनाना आवश्यक है। ये शीर्षक विकल्प भारत में कहीं भी एक ही भाषा में या एक ही राज्य में किसी अन्य भाषा में किसी पत्रिका के किसी अन्य मालिक के पास पहले से मौजूद शीर्षक से मिलते हुए नहीं होने चाहिए और ये शीर्षक विकल्प इस प्रयोजन के लिए प्रेस रजिस्ट्रार जनरल द्वारा बनाए गए दिशानिदेर्शों के अनुरूप होने चाहिए।
प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत आवेदन प्रेस रजिस्ट्रार जनरल और जिले में निर्दिष्ट प्राधिकारी के लिए एक साथ पहुंच/उपलब्ध होंगे। इसलिए, किसी अन्य कार्यालय/पोर्टल पर अलग से आवेदन जमा करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
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अपनी प्रोफाइल बनाने के बाद, प्रकाशक सभी प्रासंगिक विवरण/दस्तावेज भरकर, आवेदन पर ई-हस्ताक्षर करके और भारतकोश के माध्यम से निर्धारित शुल्क का भुगतान करके पंजीकरण के लिए आवेदन जमा कर सकते हैं।
आवेदन जमा करने के बाद, प्रकाशकों के पास आवेदन में मामूली संशोधन करने के लिए 5 दिन (120 घंटे की समय-विंडो) होती है। इस अवधि के बाद आवेदन में कोई संशोधन संभव नहीं है।
एक यूनीक एप्लिकेशन रेफरेंस नंबर के साथ रसीद: आवेदन के सफल अपलोड होने पर, प्रेस सेवा पोर्टल एक यूनीक 10 अंकों के अल्फान्यूमेरिक एप्लिकेशन रेफरेंस नंबर (एआरएन) के साथ एक रसीद उत्पन्न करेगा, और प्रकाशक और प्रेस रजिस्ट्रार जनरल भविष्य के सभी पत्राचारों और संदर्भों के लिए इस रेफरेंस नबंर का उपयोग करेंगे।
आवेदन और समय पर प्रतिक्रिया में कमियाँ: प्रारंभिक जांच के बाद, भारतीय प्रेस रजिस्ट्रार जनरल (पीआरजीआई) का कार्यालय आवश्यकता पड़ने पर त्रुटियों पर संदेश जारी करेगा। प्रकाशकों को 30 दिन की समय सीमा के भीतर अपने जवाब प्रस्तुत करने होंगे। इस अवधि का पालन करने में विफलता के परिणामस्वरूप आवेदन अस्वीकार कर दिया जाएगा।
सभी प्रकाशकों के लिए प्रेस सेवा पोर्टल में एकीकृत भारतकोश डिजिटल भुगतान प्रणाली के माध्यम से 1000 रुपये (केवल एक हजार रुपये) का पंजीकरण शुल्क भेजना अनिवार्य है।
प्रेस सेवा पोर्टल पंजीकरण विवरण में संशोधन के लिए आॅनलाइन सुविधा भी प्रदान करता है। पंजीकरण को संशोधित करने और पत्रिकाओं के विवरण में बदलाव के लिए सभी आवेदन पोर्टल के माध्यम से किये जाने हैं। ये विकल्प आॅनर/प्रकाशक प्रोफाइल में उपलब्ध होंगे।
प्रेस और आवधिक पंजीकरण अधिनियम, 2023 पारंपरिक दृष्टिकोण से पंजीकरण प्रक्रियाओं में एक आदर्श बदलाव लाने की एक पहल है, और व्यापार करने में आसानी सुनिश्चित करने वाले प्रकाशकों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण तैयार करेगा। नया अधिनियम मौजूदा कानूनों से अप्रचलित और पुराने प्रावधानों को हटाने के सरकार के प्रयासों की भी गवाही देता है।
विस्तृत जानकारी के लिए, प्रकाशकों और अन्य हितधारकों को सलाह दी जाती है कि वे प्रेस और पत्रिका अधिनियम और पीआरपी नियमों के प्रावधानों को ध्यान से पढ़ें।
ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें: https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1989267
https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2008020
प्रेस एवं आवधिक पंजीकरण अधिनियम, 2023: https://mib.gov.in/sites/default/files/Press%20and%20Registration%20of%20Periodicals%20Act%202023.pdf
एबीएन सेंट्रल डेस्क। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग (ईसीआई) ने शुक्रवार को राजनीतिक दलों को एक एडवाइजरी जारी की। जिसमें उनसे चुनाव प्रचार के दौरान शिष्टाचार और संयम बनाने रखने व मुद्दों पर आधारित बहस की जरूरत पर जोर दिया गया।
आयोग ने यह भी कहा कि जिन स्टार प्रचारकों या उम्मीदवारों को पहले भी नोटिस जारी किये गये, उन्हें आचार संहिता के बार-बार उल्लंघन के लिए सख्त कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। एडवाइजरी में कहा, सोशल मीडिया पर प्रतिद्वंद्वियों को बदनाम या अपमानित करने वाले या दूसरों की गरिमा को गिराने वाले पोस्ट साझा नहीं किए जाने चाहिए।
आयोग ने राजनीतिक दलों को विभाजनकारी बयानबाजी से दूरे रहने के लिए भी कहा। एडवाइजरी में स्टार प्रचारकों और उम्मीदवारों पर विशेष जोर देते हुए उन्हें आदर्श आचार संहिता के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों उल्लंघनों के प्रति आगाह किया गया है।
एडवाइजरी में कहा गया, चुनाव आयोग आगामी चुनाव में समय और सामग्री के संबंध में दिए जाने वाले नोटिस पर पुनर्विचार के लिए आचार संहिता के उल्लंघन का आकलन करेगा।
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