एबीएन सेंट्रल डेस्क। अगर आपने अभी तक अपने पैन कार्ड को आधार कार्ड से लिंक नहीं किया है, तो इसे 31 दिसंबर से पहले जरूर कर लें। ऐसा न करने पर आपका पैन कार्ड निष्क्रिय हो सकता है, जिससे आपको वित्तीय लेन-देन में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सरकार ने यह कदम वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के लिए उठाया है, क्योंकि कई फिनटेक कंपनियां बिना अनुमति के पैन डेटा का गलत उपयोग कर रही थीं। गृह मंत्रालय ने आयकर विभाग को निर्देश दिया है कि पैन के माध्यम से व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा को बढ़ाया जाये।
ध्यान दें: यह अंतिम तारीख नजदीक है, ऐसे में जल्द से जल्द आधार-पैन लिंक करें और अपनी वित्तीय पहचान को सुरक्षित रखें।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने 7:2 के बहुमत के फैसले में मंगलवार को कहा कि संविधान के तहत सरकारों को आम भलाई के लिए निजी स्वामित्व वाले सभी संसाधनों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार नहीं है। हालांकि, भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि सरकारें कुछ मामलों में निजी संपत्तियों पर दावा कर सकती हैं।
प्रधान न्यायाधीश द्वारा सुनाये गये बहुमत के फैसले में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के पिछले फैसले को खारिज कर दिया गया जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) के तहत वितरण के लिए सरकारों द्वारा अधिगृहीत किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने और उस पीठ के छह अन्य न्यायाधीशों के लिए फैसला लिखा, जिसने इस जटिल कानूनी सवाल पर निर्णय किया कि क्या निजी संपत्तियों को अनुच्छेद 39 (बी) के तहत समुदाय के भौतिक संसाधन माना जा सकता है और आम भलाई के वास्ते वितरण के लिए सरकार के अधिकारियों द्वारा अपने कब्जे में लिया जा सकता है। इसने उन कई फैसलों को पलट दिया, जिनमें समाजवादी सोच को अपनाया था और कहा गया था कि सरकारें आम भलाई के लिए सभी निजी संपत्तियों पर कब्जा कर सकती हैं।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने प्रधान न्यायाधीश द्वारा लिखे गए बहुमत के फैसले से आंशिक रूप से असहमत जताई, जबकि न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने सभी पहलुओं पर असहमति जतायी। फैसला अभी सुनाया जा रहा है। अनुच्छेद 31सी, अनुच्छेद 39(बी) और (सी) के तहत बनाए गए कानून की रक्षा करता है जो सरकार को आम भलाई के वास्ते वितरण के लिए निजी संपत्तियों सहित समुदाय के भौतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार देता है।
शीर्ष अदालत ने 16 याचिकाओं पर सुनवाई की जिनमें 1992 में मुंबई स्थित प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन (पीओए) द्वारा दायर मुख्य याचिका भी शामिल थी। पीओए ने महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) अधिनियम के अध्याय 8-ए का विरोध किया है। 1986 में जोड़ा गया यह अध्याय सरकारी प्राधिकारियों को उपकरित भवनों और उस भूमि का अधिग्रहण करने का अधिकार देता है जिस पर वे बने हैं, यदि वहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोग पुनर्स्थापन उद्देश्यों के लिए ऐसा अनुरोध करते हैं।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने 7:2 के बहुमत के फैसले में मंगलवार को कहा कि संविधान के तहत सरकारों को आम भलाई के लिए निजी स्वामित्व वाले सभी संसाधनों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार नहीं है। हालांकि, भारत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली नौ न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि सरकारें कुछ मामलों में निजी संपत्तियों पर दावा कर सकती हैं।
प्रधान न्यायाधीश द्वारा सुनाये गये बहुमत के फैसले में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर के पिछले फैसले को खारिज कर दिया गया जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) के तहत वितरण के लिए सरकारों द्वारा अधिगृहीत किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने और उस पीठ के छह अन्य न्यायाधीशों के लिए फैसला लिखा, जिसने इस जटिल कानूनी सवाल पर निर्णय किया कि क्या निजी संपत्तियों को अनुच्छेद 39 (बी) के तहत समुदाय के भौतिक संसाधन माना जा सकता है और आम भलाई के वास्ते वितरण के लिए सरकार के अधिकारियों द्वारा अपने कब्जे में लिया जा सकता है। इसने उन कई फैसलों को पलट दिया, जिनमें समाजवादी सोच को अपनाया था और कहा गया था कि सरकारें आम भलाई के लिए सभी निजी संपत्तियों पर कब्जा कर सकती हैं।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने प्रधान न्यायाधीश द्वारा लिखे गए बहुमत के फैसले से आंशिक रूप से असहमत जताई, जबकि न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने सभी पहलुओं पर असहमति जतायी। फैसला अभी सुनाया जा रहा है। अनुच्छेद 31सी, अनुच्छेद 39(बी) और (सी) के तहत बनाए गए कानून की रक्षा करता है जो सरकार को आम भलाई के वास्ते वितरण के लिए निजी संपत्तियों सहित समुदाय के भौतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेने का अधिकार देता है।
शीर्ष अदालत ने 16 याचिकाओं पर सुनवाई की जिनमें 1992 में मुंबई स्थित प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन (पीओए) द्वारा दायर मुख्य याचिका भी शामिल थी। पीओए ने महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास प्राधिकरण (म्हाडा) अधिनियम के अध्याय 8-ए का विरोध किया है। 1986 में जोड़ा गया यह अध्याय सरकारी प्राधिकारियों को उपकरित भवनों और उस भूमि का अधिग्रहण करने का अधिकार देता है जिस पर वे बने हैं, यदि वहां रहने वाले 70 प्रतिशत लोग पुनर्स्थापन उद्देश्यों के लिए ऐसा अनुरोध करते हैं।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 के लिए मतदान दो चरणों में कराये जाने हैं। 13 और 20 नवंबर को मतदान होने हैं। ताजा घटनाक्रम में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइएम) ने संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया है। घोषणा पत्र में सरना धर्म कोड समेत कई बड़े वादे किये गये हैं।
बता दें कि इससे पहले भाजपा अपना घोषणा पत्र जारी कर चुकी है। पार्टी ने कहा है कि सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में दो लाख नौकरियों का सृजन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी जायेगी। घोषणा पत्र जारी होने के मौके पर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी मौजूद रहे।
झारखंड मुक्ति मोर्चा की तरफ से खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अलावा राष्ट्रीय जनता दल (राजद), वाम दल और गठबंधन पार्टियों के सहयोगी नेता भी मौजूद रहे। चुनावी घोषणा पत्र को गठबंधन ने न्याय पत्र का नाम दिया है। इसमें सात गारंटियों का जिक्र किया गया है। घोषणा पत्र पर एक वोट सात गारंटी लिखा गया है।
घोषणा पत्र जारी होने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि गठबंधन में शामिल दलों की सरकार बनने पर सरना घर्म कोड, सामाजिक न्याय की गारंटी सुनिश्चित की जायेगी। सरना धर्म कोड के तहत स्थानीय नीति बनाने का वादा भी किया है। सात किलो प्रति व्यक्ति राशन वितरण और 450 रुपये में गैस सिलिंडर दिलाने का दावा भी किया है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड विधानसभा चुनाव के बीच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अवैध खनन मामले में झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार में 17 ठिकानों पर छापेमारी की है। इसमें झारखंड के 3 जिले शामिल हैं। केंद्रीय एजेंसी ने जिन लोगों के यहां रेड मारी है, वे सभी पंकज मिश्रा के करीबी बताए जा रहे हैं।
सीबीआई ने छापेमारी के दौरान अलग-अलग जगहों से 30 लाख रुपए जब्त की है। टीम झारखंड के साहिबगंज, पाकुड़, राजमहल, कोलकाता और पटना में छापेमारी की। साहिबगंज में सीबीआई ने 7 ठिकानों पर छापेमारी की। जिनके यहां छापेमारी हुई, उसकी पूरी लिस्ट इस प्रकार है :
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सरकार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत एक खास बदलाव के बारे में विचार कर रही है। इस संगठन के तहत आने वाले स्वैच्छिक भविष्य निधि (VPF) में टैक्स फ्री (tax free) योगदान की सीमा को मौजूदा 2.5 लाख रुपये से बढ़ाने पर विचार कर रही है।
मौजूदा समय में 2.5 लाख रुपये से अधिक अर्जित कोई भी ब्याज टैक्स के तहत आता है। इस पहल का उद्देश्य निम्न-मध्यम और मध्यम आय वाले व्यक्तियों को EPFO के माध्यम से अपनी बचत बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे रिटायरमेंट मे लिए ज्यादा फंड जुटाने में मदद मिलेगी।
एक रिपोर्ट के तहत मामले से परिचित सूत्रों ने संकेत दिया है कि श्रम मंत्रालय वर्तमान में इस प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है और वित्त वर्ष 2026 के बजट विचार-विमर्श के दौरान वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा कर सकता है।
VPF वेतनभोगी कर्मचारियों द्वारा अनिवार्य ईपीएफ के अतिरिक्त किया जाने वाला एक वैकल्पिक निवेश है। इसे EPF के विस्तार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो कर्मचारियों को अपनी रिटायरमेंट सेविंग बढ़ाने और अपने मूल PF जमा के समान ब्याज दर अर्जित करने की अनुमति देता है। EPF की तरह, VPF में योगदान भी चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से बढ़ता है, क्योंकि रिटर्न सालाना आधार पर जारी किया जाता है।
यह भी ईपीएफओ के तहत ही आता है। VPF कस्टमर्स के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि पांच साल की न्यूनतम अवधि पूरी करने से पहले की गयी कोई भी निकासी टैक्सेशन के अधीन हो सकती है। ईपीएफ की तरह, VPF फंड रिटायरमेंट, इस्तीफे या खाताधारक की मृत्यु की दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर उनके नामित व्यक्ति को दिये जाते हैं।
VPF की एक खासियत ये भी है कि यह सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजना है, जिसमें जोखिम कम और रिटर्न ज्यादा है। इसमें किया जाने वाला योगदान किसी कर्मचारी द्वारा उसके ईपीएफओ अकाउंट में किए गए 12 प्रतिशत योगदान से ज्यादा है। अधिकतम योगदान मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 100 प्रतिशत तक है। इस योजना के तहत ईपीएफ के समान ही ब्याज मिलता है।
टीम एबीएन, रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने बीते शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की पूर्व अधिकारी पूजा सिंघल की जमानत अर्जी पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले में 22 नवंबर को फिर से सुनवाई होगी।
बता दें कि सिंघल पर खान सचिव और विभिन्न जिलों के उपायुक्त रहने के दौरान अपने पदों का दुरुपयोग करके भ्रष्टाचार से धन अर्जित करने का आरोप है। उच्चतम न्यायालय ने 29 अप्रैल को झारखंड कैडर की निलंबित आईएएस अधिकारी की याचिका खारिज कर दी थी जिसमें धनशोधन मामले में जमानत देने का अनुरोध किया गया था।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने झारखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था जिसमें उन्हें जमानत देने से इनकार किया गया था और कहा था कि यह एक असाधारण मामला है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के 17 गवाहों में से 12 से ईडी ने पूछताछ की है और उम्मीद जताई कि मामले की सुनवाई शीघ्र पूरी हो जाएगी।
उसने कहा था, आप जमानत के लिए कुछ समय प्रतीक्षा करें। यह कोई सामान्य मामला नहीं है, बल्कि एक असाधारण मामला है। इस मामले में कुछ गंभीर गड़बड़ी है। हम इस याचिका पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। हमें उम्मीद है कि मुकदमा तेजी से आगे बढ़ेगा। हालांकि, पीठ ने सिंघल को यह छूट दी कि यदि मुकदमा लंबा चलता है या परिस्थितियों में कोई अन्य परिवर्तन होता है तो वह दोबारा से अपनी जमानत याचिका दायर कर सकती हैं।
ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कुल हिरासत अवधि में से वह अधिकतर समय अस्पताल में बिता चुकी हैं। राजू ने अदालत को बताया कि मामले में हिरासत में बिताये गये 687 दिन में से सिंघल 481 दिन अस्पताल में रही हैं। पीठ ने सिंघल की ओर से पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल से कहा कि आपके मुवक्किल के खिलाफ आरोप बहुत गंभीर हैं।
जब्त नकदी भी भारी भरकम है। अदालत ने कहा, यह कोई सामान्य मामला नहीं बल्कि असाधारण मामला है। अगर यह सामान्य मामला होता तो हम आपको जमानत दे देते। अग्रवाल ने कहा कि रांची में बिरसा मुंडा केंद्रीय जेल में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं, जहां सिंघल न्यायिक हिरासत में रही हैं। बता दें कि सिंघल को मई 2022 में गिरफ्तार किया गया था। उससे पहले ईडी ने धनशोधन के एक मामले में उनसे जुड़ी संपत्तियों पर छापेमारी की थी।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में बाल विवाह के पूरी तरह खात्मे के उद्देश्य से कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सरकार को विस्तृत दिशानिर्देश जारी किया। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि बाल विवाह अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के अधिकारों का हनन है।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने कहा कि बाल विवाह या यहां तक की किसी बच्चे की सगाई भी अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के अधिकार का हनन है। एक गैरसरकारी संगठन सोसाइटी फॉर एनलाइटेनमेंट एंड वालंटरी एक्शन (सेवा) ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दावा किया था कि देश में बाल विवाह की स्थिति गंभीर है और इसकी रोकथाम के लिए बनाये गये कानूनों पर उनकी भावना के अनुसार अक्षरश: अमल नहीं किया जा रहा है।
गैरसरकारी संगठन सेवा देश से 2030 तक पूरे देश से बाल विवाह के खात्मे के लक्ष्य के साथ काम कर रहे बाल विवाह मुक्त भारत (सीएमएफआई) अभियान का सहयोगी संगठन है। इस फैसले से भारत में इन प्रयासों को और मजबूती मिलेगी जो पहले से ही बाल विवाह के खिलाफ अभियान का वैश्विक नेता है। पिछले एक साल में बाल विवाह मुक्त भारत अभियान और इसके सहयोगी गैरसरकारी संगठनों के प्रयासों से देश में सफलतापूर्वक 120,000 बाल विवाह रुकवाये गये। इसके अलावा, सरकार के प्रयासों से बाल विवाह की दृष्टि से संवेदनशील 11 लाख बच्चों का विवाह होने से रोका गया।
न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने बचाव-संरक्षण-अभियोजन रणनीति और समुदाय आधारित दृष्टिकोण पर जोर देते हुए कहा, कानून तभी सफल हो सकता है जब बहुक्षेत्रीय समन्वय हो। कानून प्रवर्तन अधिकारियों के प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण की आवश्यकता है। हम एक बार फिर समुदाय आधारित दृष्टिकोण की जरूरत पर जोर देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राहत जताते हुए याचिका दायर करने वाले गैरसरकारी संगठन सेवा की अल्का साहू और सामाजिक कार्यकर्ता निर्मल गोराना अग्नि ने कहा, याचिकाकर्ता होने के नाते हम इस ऐतिहासिक फैसले के लिए हृदय से सुप्रीम कोर्ट के आभारी हैं। यह फैसला हमारे देश से बाल विवाह के खात्मे की दिशा में एक बेहद अहम कदम है। बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के माध्यम से हम सभी इस बुराई के खिलाफ संघर्ष के लिए इकट्ठा और एकजुट हुए हैं और हमारी लड़ाई बच्चों के लिए एक सुनहरे व सुरक्षित भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगी।
बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के संस्थापक भुवन ऋभु ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भारत और पूरी दुनिया के लिए नजीर बताते हुए कहा, यह ऐतिहासिक फैसला सांस्थानिक संकल्प को मजबूती देने की दिशा में निर्णायक बिंदु साबित होगा। यह देश से बाल विवाह के समग्र उन्मूलन के लक्ष्य की प्राप्ति में एक बेहद अहम जीत है। सुप्रीम कोर्ट और सरकार के प्रयासों ने दिखाया है कि उन्हें बच्चों की परवाह है और अब समय आ गया है कि हम सभी आगे आएं और साथ मिलकर इस सामाजिक अपराध का खात्मा करें।
ऋभु ने कहा- अगर हम अपने बच्चों की सुरक्षा करने में विफल हैं तो फिर जीवन में कोई भी काम मायने नहीं रखता। सुप्रीम कोर्ट ने एक समग्र दृष्टिकोण की जरूरत को फिर मजबूती से रेखांकित किया है और पिकेट रणनीति के जरिए बाल विवाह मुक्त भारत अभियान भी इसी पर जोर देता रहा है। बाल विवाह अपने मूल रूप में बच्चों से बलात्कार है। यह निर्णय सिर्फ हमारे संकल्प को ही मजबूती नहीं देता बल्कि इस बात को भी रेखांकित करता है कि जवाबदेही और साझा प्रयासों से हम बच्चों के खिलाफ हिंसा के सबसे घृणित स्वरूप बाल विवाह का खात्मा कर सकते हैं।
बाल विवाह मुक्त भारत अभियान 200 से भी ज्यादा गैरसरकारी संगठनों का गठबंधन है जो 2030 तक बाल विवाह के खात्मे के लिए पूरे देश में काम कर रहे हैं। ये सभी सहयोगी संगठन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक समग्र रणनीति पिकेट पर अमल कर रहे हैं जिसमें नीति, संस्थान, संम्मिलन, ज्ञान, परिवेश, तकनीक जैसी चीजें शामिल हैं। धार्मिक नेताओं और समुदायों के साथ साझा प्रयासों से इसने इस अपराध के खात्मे के लिए 4.90 करोड़ लोगों को बाल विवाह के खिलाफ शपथ दिलायी है।
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