कानून व्यवस्था

View All
Published / 2025-07-30 21:14:16
बच्चों के यौन उत्पीड़न मामलों में सपोर्ट पर्सन के लिए सी-लैब ने शुरू किया देश का पहला सर्टिफिकेट कोर्स

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के फैसले में पॉक्सो मामलों में सभी पीड़ित बच्चों की सहायता के लिए अनिवार्य रूप से सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का दिया था आदेश 
    सपोर्ट पर्सन की भूमिका के लिए प्रशिक्षित और दक्ष पेशेवरों की कमी बनी राज्य सरकारों के लिए चुनौती 
  • सपोर्ट पर्सन यौन शोषण पीड़ित बच्चों की कानूनी, चिकित्सकीय व भावनात्मक तरीके से मदद करता है और उन्हें मुख्य धारा में वापस लाने में सहायता करता है।       

एबीएन सेंट्रल डेस्क। बाल यौन शोषण के सभी मामलों में सपोर्ट पर्सन की अनिवार्य रूप से नियुक्ति के 2023 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पीड़ितों की मदद के लिए बड़ी संख्या में सपोर्ट पर्सन की जरूरत को पूरा करने के लिए द सेंटर फॉर लीगल एक्शन एन बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन (सी-लैब) ने देश में अपनी तरह का पहला सर्टिफिकेट कोर्स शुरू किया है। सी-लैब देश का एक प्रमुख संस्थान है जो कानून के शासन पर अमल के जरिए बच्चों के सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में योगदान दे रहा है। 

अहम बात यह है कि देश में 2019 से 2022 के बीच पॉक्सो के तहत दर्ज मामलों में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जिससे यौन शोषण के पीड़ित बच्चों की सहायता के लिए योग्य व प्रशिक्षित व सपोर्ट पर्सन की कमी साफ दिख रही है। बताते चलें कि सपोर्ट पर्सन वह होता है जो यौन शोषण के पीड़ित बच्चों की कानूनी, चिकित्सकीय व भावनात्मक तरीके से मदद करता है और उन्हें समाज की मुख्य धारा में वापस लाने में सहायता करता है।       

सपोर्ट पर्सन की अहमियत को रेखांकित करते हुए शीर्ष अदालत ने राज्य सरकारों को पॉक्सो मामलों में हर पीड़ित बच्चे के लिए अनिवार्य रूप से सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सुनिश्चित हुआ कि न्याय की प्रतीक्षा कर रहे यौन शोषण के शिकार 2.39 लाख बच्चों की मदद के लिए प्रशिक्षित सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति होगी जो चिकित्सा, कानूनी व भावनात्मक मामलों में उनकी सहायता करेंगे। 

हालांकि सपोर्ट पर्सन की भूमिका के लिए प्रशिक्षित और दक्ष पेशेवरों की कमी राज्य सरकारों के लिए चुनौती बनी हुई है। सपोर्ट पर्सन जांच व मुकदमे के दौरान बच्चों की मदद करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि वह मुकदमे की कार्यवाही को समझ सके, उसे भावनात्मक सहारा मिले और ज्ञान की कमी या संवेदनहीन तंत्र की वजह से बच्चों को दोबारा पीड़ा की स्थिति से नहीं गुजरना पड़े।  

इस कोर्स में पहले व्याख्यान के लिए बुलाये गये जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के संस्थापक भुवन ऋभु ने कहा, न्याय का पैमाना सिर्फ फैसले ही नहीं बल्कि यह भी है कि पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चे की गरिमा और सम्मान का कितना ख्याल रखा गया। इस पूरी यात्रा में पर्दे के पीछे सबसे बड़ी ताकत सपोर्ट पर्सन होते हैं जो उन्हें मार्ग दिखाते हैं, सुरक्षा करते हैं और सबसे बुरे वक्त में पीड़ित परिवार का संबल व सहारा बनते हैं। 

चाहे कचहरी हो, थाना या अस्पताल हो वे पीड़ित के घावों पर मरहम लगाने और संकट की घड़ी में धैर्य रखने के लिए एक कंधा मुहैया कराते हैं। सी-लैब की यह पहल प्रशिक्षण से कहीं आगे जाती है। यह सुव्यवस्थित रूपांतरण की दिशा में एक कदम है। यदि यह सही तरीके से होता है तो यह न सिर्फ एक पीड़ित बच्चे को फिर से खड़ा होने में मदद करेगा बल्कि उसे यह विश्वास दिलाएगा कि न्याय संभव है। 

अपनी तरह के पहले 10 हफ्ते के इस कोर्स में आॅनलाइन और क्लासरूम में पढ़ाई का एक मिश्रण होगा। इसमें एसाइनमेंट और फील्ड वर्क भी होगा। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि भावी सपोर्ट पर्सन को यौन शोषण के शिकार बच्चों व उनके परिवारों के सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी ज्ञान और कौशल से लैस किया जा सके ताकि न्याय के संघर्ष में बच्चा न अकेला पड़े और न ही अनभिज्ञ रहे। 

इस अनूठे कोर्स की निदेशक डॉ. संगीता गौड़ ने इसके बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए कहा, पॉक्सो जैसे सख्त कानूनों के बावजूद हमारे हजारों बच्चे अदालतों के चक्कर काट रहे हैं या फिर अपने घर में दुबके हुए हैं और उनकी सहायता व मार्गदर्शन के लिए कोई नहीं है। इन बच्चों के साथ संवेदनशीलता से पेश आने की जरूरत है, उनके जख्मों पर प्यार से मरहम लगाने की जरूरत है और इससे भी अहम यह है कि उन बच्चों को बताया जाए कि उनके कानूनी अधिकार क्या हैं और वे किन चीजों के हकदार हैं। 

एक प्रशिक्षित सपोर्ट पर्सन बच्चों की मदद करते हुए यह सुनिश्चित कर सकता है कि उनकी गरिमा से खिलवाड़ नहीं हो और न्याय अवश्य मिले। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो यौन शोषण के शिकार बच्चों की मदद के क्षेत्र में काम कर रहा हो, सपोर्ट पर्सन के रूप में काम कर रहा हो या सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर बाल सुरक्षा तंत्र का हिस्सा बनना चाहता हो, इस कोर्स में दाखिले के लिए आवेदन कर सकता है।   

पाठ्यक्रम की कुछ मुख्य विशेषताओं में शामिल हैं- बाल अधिकार और बाल संरक्षण की मूलभूत जानकारी, पॉक्सो एवं बाल यौन शोषण मामलों में बुनियादी कानूनी प्रक्रियाएं, सपोर्ट पर्सन की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां, पीड़ितों को मुआवजा और उनके पुनर्वास में सहयोग और मार्गदर्शन व बच्चों के अनुकूल संवाद तथा बाल मन पर गहरे आघात से उन्हें उबारने के लिए कौशल विकसित करना। इस पाठ्यक्रम की एक प्रमुख विशेषता है—बाल पीड़ितों के साथ काम करते समय सपोर्ट पर्सन को मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता का प्रशिक्षण देना। 

सपोर्ट पर्सन यौन शोषण के शिकार बच्चों के लिए उनकी पहली सुरक्षा पंक्ति होते हैं, ऐसे में उन्हें बच्चों से जुड़ने और उनकी स्थिति को समझने के लिए संवेदनशील बनाया जाना आवश्यक है। इस पाठ्यक्रम को पढ़ाने के लिए कानून, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक कार्य के क्षेत्र के विशेषज्ञों और विख्यात हस्तियों को शामिल किया गया है। सी-लैब बाल अधिकारों की सुरक्षा के क्षेत्र में अग्रणी संगठन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की परिकल्पना है। यह संगठन बाल यौन शोषण और उससे जुड़े अपराधों—जैसे बच्चों की ट्रैफिकिंग, साइबर जगत में बच्चों के शोषण और बाल विवाह के खिलाफ काम करने के लिए समर्पित है।

Published / 2025-07-29 23:32:12
लातेहार : घूसखोर रोजगार सेवक गिरफ्तार

  • भ्रष्टाचार के खिलाफ एसीबी की कार्रवाई, रोजगार सेवक को रिश्वत लेते रंगे हाथ दबोचा

टीम एबीएन, रांची। झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की मुहिम लगातार जारी है। इसी क्रम में मंगलवार को पलामू प्रमंडल की एसीबी टीम ने लातेहार जिले के मनिका प्रखंड अंतर्गत जमा पंचायत में बड़ी कार्रवाई की। टीम ने रोजगार सेवक चंदन कुमार को पांच हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। 

सूत्रों के अनुसार, चंदन कुमार ने एक सरकारी योजना से जुड़े कार्य के एवज में एक लाभुक से रिश्वत की मांग की थी। मामले की शिकायत मिलने के बाद एसीबी की टीम ने योजना बनाकर जाल बिछाया और आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया। गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी को हिरासत में लेकर एसीबी ने कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस कार्रवाई से प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है, वहीं आमजन के बीच भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई को लेकर संतोष की भावना देखी जा रही है।

एसीबी ने क्या कहा

पलामू प्रमंडलीय एसीबी के अधिकारियों ने बताया कि मामले की गहन जांच जारी है। दोष सिद्ध होने पर आरोपी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह मुहिम लगातार जारी रहेगी। जहां से भी शिकायत मिलती है, पहले उसकी जांच की जाती है और पुख्ता सबूत मिलने पर कार्रवाई की जाती है।

Published / 2025-07-25 23:09:49
स्टूडेंट्स की ख़ुदकुशी पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया गाइडलाइन्स

देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों में छात्रों की खुदुकशी का मामले में SC ने जारी की गाइडलाइंस
देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों में छात्रों की खुदुकशी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है. छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों के आदेश दिए गए हैं. इसे लेकर गाइडलाइन  जारी की गई हैं.- आंध्र में  NEET अभ्यर्थी की मौत की सीबीआई जांच के निर्देश दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निजी कोचिंग सेंटरों और पूरे भारत के सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों, अनिवार्य काउंसलिंग , शिकायत निवारण तंत्र और नियामक ढांचों को अनिवार्य बनाने हेतु व्यापक, राष्ट्रव्यापी दिशानिर्देश जारी किए हैं. निजी कोचिंग सेंटरों से लेकर स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, प्रशिक्षण अकादमियों और छात्रावासों में छात्रों की आत्महत्याओं  को लेकर ये फैसला आया है. 
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यह स्थिति एक "प्रणालीगत विफलता है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता" और छात्रों को मनोवैज्ञानिक संकट, शैक्षणिक बोझ और संस्थागत असंवेदनशीलता से बचाने के लिए तत्काल संस्थागत सुरक्षा उपायों को अनिवार्य किया. फैसले में कहा गया कि संकट की गंभीरता को देखते हुए संवैधानिक हस्तक्षेप आवश्यक है, क्योंकि इसमें मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किया गया है और अनुच्छेद 141 के तहत दिए गए अपने निर्णय को देश का कानून माना गया है. पीठ ने घोषणा की कि उसके दिशानिर्देश तब तक लागू रहेंगे जब तक संसद या राज्य विधानसभाएं एक उपयुक्त नियामक ढांचा लागू नहीं कर देती. ये निर्देश छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं पर राष्ट्रीय कार्यबल के चल रहे कार्यों के पूरक और समर्थन के लिए तैयार किए गए हैं, जिसका गठन पिछले साल सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के जज न्यायमूर्ति रवींद्र भट की अध्यक्षता में किया गया था. यह निर्णय एक ऐसे मामले में आया है, जो 17 वर्षीय NEET अभ्यर्थी, की दुखद और अप्राकृतिक मृत्यु से उत्पन्न हुआ था, जो आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम स्थित आकाश बायजू संस्थान में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी।


14 जुलाई, 2023 को जब यह घटना घटी, तब लड़की एक छात्रावास में रह रही थी. उसके पिता ने स्थानीय पुलिस से जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपने की मांग की थी, लेकिन आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने 14 फरवरी, 2024 के एक आदेश द्वारा उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इस आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने अब सीबीआई को लड़की की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच अपने हाथ में लेने का आदेश दिया है.

पीठ ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्तिगत मामले का नहीं है, बल्कि भारत के शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाली एक गहरी, संरचनात्मक अस्वस्थता का प्रतीक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए, पीठ ने बढ़ती छात्र आत्महत्याओं के चिंताजनक पैटर्न का उल्लेख किया और कहा कि मनोवैज्ञानिक संकट, कलंक और संस्थागत उपेक्षा जैसे रोके जा सकने वाले कारणों से युवाओं की लगातार हो रही जान ने न्यायपालिका के लिए हस्तक्षेप करना अनिवार्य कर दिया है हालांकि केंद्र ने पहले ही स्कूलों के लिए UMMEED मसौदा दिशा-निर्देश, मनोदर्पण मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति जैसी कई पहल शुरू कर दी हैं, फिर भी पीठ ने कहा कि एक अंतरिम लागू करने योग्य ढांचे की तत्काल आवश्यकता है। निर्णय में जारी प्रमुख निर्देशों में यह आवश्यकता शामिल है कि सभी शैक्षणिक संस्थान UMMEED, मनोदर्पण और आत्महत्या रोकथाम दिशानिर्देशों के आधार पर एक समान मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनाएं और यह नीति सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो और सालाना अद्यतन की जाए।

100 से अधिक छात्रों वाले संस्थानों को कम से कम एक योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर, जैसे मनोवैज्ञानिक, परामर्शदाता या सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति करनी होगी। यहां तक कि छोटे संस्थानों को भी बाहरी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ औपचारिक रेफरल संपर्क स्थापित करने के लिए कहा गया है। समय पर और निरंतर सहायता सुनिश्चित करने के लिए छात्रों के छोटे समूहों को विशेष रूप से परीक्षा अवधि और संक्रमण काल के दौरान सलाहकार या परामर्शदाता नियुक्त किए जाने चाहिए।

न्यायालय ने कोचिंग संस्थानों पर भी विशिष्ट दायित्व लागू किए हैं, जो हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बहस के केंद्र में रहे हैं। इसने निर्देश दिया कि शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर समूहों में विभाजन, सार्वजनिक रूप से बदनामी और अवास्तविक शैक्षणिक लक्ष्य निर्धारित करने को हतोत्साहित किया जाना चाहिए. टेली-मानस और अन्य आत्महत्या रोकथाम सेवाओं जैसे हेल्पलाइन नंबर छात्रावासों, कक्षाओं और सार्वजनिक स्थानों पर स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाने चाहिए। सभी संस्थानों में शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को चेतावनी संकेतों की पहचान करने, मनोवैज्ञानिक प्राथमिक चिकित्सा और रेफरल प्रोटोकॉल में वर्ष में कम से कम दो बार अनिवार्य प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा।

संस्थानों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके कर्मचारियों को कमजोर या हाशिए पर रहने वाले पृष्ठभूमि के छात्रों, जिनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय, विकलांग छात्र और वे छात्र शामिल हैं, जिन्होंने आघात या शोक का अनुभव किया है, के साथ संवेदनशील रूप से जुड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। महत्वपूर्ण बात ये है कि यह निर्णय सभी संस्थानों को जाति, लिंग, दिव्यांगता, धर्म या यौन अभिविन्यास के आधार पर यौन उत्पीड़न, रैगिंग और उत्पीड़न की रिपोर्टिंग और उससे निपटने के लिए गोपनीय तंत्र स्थापित करने का निर्देश देता है।

इन तंत्रों में मनोवैज्ञानिक-सामाजिक सहायता तक तत्काल पहुंच शामिल होनी चाहिए और संस्थानों को चेतावनी दी गई है कि त्वरित कार्रवाई न करने पर खासकर उन मामलों में जो आत्म-क्षति या आत्महत्या की ओर ले जाते हैं, संस्थागत दोष माना जाएगा, जिसके कानूनी और नियामक परिणाम होंगे। पीठ ने आगे निर्देश दिया कि माता-पिता और अभिभावक नियमित संवेदीकरण सत्रों के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य ढांचे में सक्रिय रूप से शामिल हों। इन सत्रों का उद्देश्य अनुचित शैक्षणिक दबाव को कम करना और घर पर एक सहायक वातावरण को बढ़ावा देना है। 

संस्थानों से मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता और जीवन कौशल को अभिविन्यास कार्यक्रमों और पाठ्येतर गतिविधियों में एकीकृत करने के लिए भी कहा गया है। प्रतिस्पर्धी शिक्षा को परिभाषित करने वाले तीव्र शैक्षणिक दबाव को कम करने के प्रयास में, न्यायालय ने आदेश दिया कि संस्थान पाठ्येतर विकास को प्राथमिकता दें, समय-समय पर परीक्षा प्रारूपों की समीक्षा करें और रैंक और परीक्षा स्कोर से परे छात्र की सफलता की परिभाषा को व्यापक बनाएं. करियर परामर्श को भी अनिवार्य कर दिया गया है। न्यायालय ने कहा कि सभी संस्थानों को छात्रों और उनके अभिभावकों, दोनों को संरचित, समावेशी और सूचित परामर्श सेवाएं प्रदान करनी चाहिए ताकि छात्र रुचि-आधारित विकल्प चुन सकें। 

छात्रावासों सहित आवासीय सुविधाएं प्रदान करने वाले संस्थानों के लिए न्यायालय ने आत्मक्षति के आवेगपूर्ण कृत्यों को रोकने हेतु, शारीरिक सुरक्षा उपायों को बढ़ाने का आदेश दिया जैसे कि छेड़छाड़-रोधी छत वाले पंखे और छतों तक सीमित पहुंच। कोटा, जयपुर, सीकर, चेन्नई, हैदराबाद, दिल्ली और मुंबई जैसे कोचिंग केंद्रों जहां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़ी संख्या में छात्र आते हैं को निवारक और परामर्श संबंधी बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने के लिए चुना गया। इन दिशा-निर्देशों के अलावा पीठ ने सरकारों और प्राधिकारियों को कई बाध्यकारी निर्देश जारी किये।

इसने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो महीने के भीतर पंजीकरण अनिवार्य करने, छात्र सुरक्षा मानदंडों को लागू करने और निजी कोचिंग केंद्रों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने के लिए नियम अधिसूचित करने का निर्देश दिया। कार्यान्वयन की निगरानी, निरीक्षण करने और शिकायतें प्राप्त करने के लिए जिला मजिस्ट्रेटों की अध्यक्षता में जिला-स्तरीय निगरानी समितियां स्थापित की जाएंगी। केंद्र सरकार को इन निर्देशों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों, कोचिंग केंद्रों के लिए नियामक नियम-निर्माण की स्थिति और राज्य सरकारों के साथ स्थापित समन्वय तंत्र का विवरण देते हुए अनुपालन हलफनामा दाखिल करने के लिए 90 दिनों का समय दिया गया है। हलफनामे में राष्ट्रीय कार्यबल की अंतिम रिपोर्ट के लिए समय-सीमा भी बताई जानी चाहिए। 

तत्काल और व्यापक प्रसार सुनिश्चित करने के लिए, न्यायालय ने आवश्यक कार्रवाई हेतु शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, एनसीईआरटी, सीबीएसई, एआईसीटीई और सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को निर्णय की एक प्रति प्रसारित करने का आदेश दिया। एक विशिष्ट मामले में निष्पक्ष जांच के निर्देश के साथ तत्काल नियामक कार्रवाई को जोड़कर, पीठ ने एक कड़ा संदेश दिया है कि मानसिक स्वास्थ्य और छात्र सुरक्षा वैकल्पिक विचार नहीं हैं, बल्कि संवैधानिक दायित्व हैं जिन्हें प्रत्येक संस्थान को पूरा करना होगा।

Published / 2025-07-24 21:19:03
वन स्टॉप सेंटरों की विफलता पर हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से कहा- अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत

  • हाई कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा, वन स्टॉप सेंटरों को कारगर बनाने की दिशा में दिल्ली सरकार व दिल्ली पुलिस के कदम नाकाफी 
  • जन जागरूकता के प्रसार, अखबारों में इश्तिहार, खाली पदों को भरने व बाल विवाह व किशोर गर्भावस्था के मामलों को देखने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया तय करने के निर्देश 
  • ये वन स्टॉप सेंटर या सखी केंद्र हिंसा की शिकार महिलाओं व बच्चों को कानूनी व चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए बनाए गए थे 
  • सखी केंद्रों की बदहाली के खिलाफ बचपन बचाओ आंदोलन जिसे एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन के नाम से जानते हैं, ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। राजधानी में वन स्टॉप सेंटरों (सखी केंद्रों) की बदहाल स्थिति को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने राज्य सरकार और दिल्ली पुलिस को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि वे यौन शोषण और गर्भवती किशोरियों की सहासता के लिए बने इन सेंटरों को प्रभावी, उपयोगी, सबकी जानकारी में लाने और सबको सुलभ बनाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करें। 

इस मामले में बचपन बचाओ आंदोलन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने इन केंद्रों को लेकर जन जागरूकता के प्रसार, सभी बड़े अखबारों में हिंदी और अंग्रेजी में विज्ञापन देने और सभी रिक्त पदों को शीघ्र भरने जैसे कई निर्देश दिये। बचपन बचाओ आंदोलन जिसे एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन के नाम से भी जाना जाता है।

देश के 418 जिलों में बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए काम कर रहे 250 से भी ज्यादा नागरिक संगठनों के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का सहयोगी संगठन है। इन सखी केंद्रों की स्थापना हिंसा के शिकार बच्चों व महिलाओं की सहायता के लिए की गई थी। इसका उद्देश्य था कि पीड़ितों को एक ही जगह शिकायत दर्ज करने, कानूनी और चिकित्सकीय सहायता प्रदान की जा सके। 

हाई कोर्ट ने कहा कि इन सखी केंद्रों के बारे में सभी हितधारकों जैसे पुलिस, पीड़ित, उनके माता-पिता, गैरसरकारी संगठनों और आम जनता के बीच जागरूकता के प्रसार के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। साथ ही, यह भी आदेश दिया कि स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, बाजारों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर ऐसे साइनबोर्ड लगाए जाएं, जिनमें इन केंद्रों में उपलब्ध सुविधाओं और हेल्पलाइन नंबर की जानकारी स्पष्ट रूप से दी गयी हो।    

खंडपीठ ने इस बात को रेखांकित किया कि किस तरह बाल विवाह और नाबालिग गर्भावस्था जैसे मामलों के निपटारे की मौजूदा प्रणाली, पीड़ितों को और मानसिक चोट पहुंचाती है। उन्होंने कहा, हम निर्देश देते हैं कि बाल विवाह और नाबालिग गर्भावस्था से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) सभी को भेजी जाए, जो पुलिसकर्मियों, इन केंद्रों के चलाने वाले कर्मचारियों पर लागू हो। इस संदर्भ में एक उपयुक्त परिपत्र भी जारी किया जाए ताकि इन प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित हो सके। 

इसके साथ ही, हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि एक वरिष्ठ स्तर का नोडल अफसर नियुक्त किया जाए जो सभी संबंधित पक्षों के साथ समन्वय और इस मामले में पारित सभी निदेर्शों व भविष्य में दिए जाने वाले निर्देशों पर अमल के लिए जिम्मेदार हो। यह नोडल अफसर सभी सुनवाइयों के दौरान अदालत में मौजूद रहेगा। साथ ही, उसने निर्देश दिया कि जीएनसीटीडी इन केंद्रों के कर्मचारियों को समय पर वेतन सुनिश्चित करे और बुनियादी ढांचे में कमियों को दूर किया जाए। 

वन स्टॉप सेंटरों के बाबत हाई कोर्ट के दिशानिदेर्शों का स्वागत करते हुए हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की विधिक सलाहकार रचना त्यागी ने कहा, वन स्टॉप सेंटरों पर हाई कोर्ट का निर्णय इस बात की सशक्त पुष्टि है कि न्याय न केवल सुलभ होना चाहिए, बल्कि वह सम्मानजनक और पूर्ण भी होना चाहिए। यह फैसला पीड़ित-केंद्रित सहायता तंत्र की अहमियत को रेखांकित करने के अलावा एक बार फिर पुष्टि करता है कि यौन शोषण और बाल विवाह की शिकार बच्चियों को केवल न्यायिक राहत नहीं, बल्कि समय पर समन्वित सहायता की आवश्यकता होती है। उन्हें दो बार पीड़ित नहीं बनाया जाना चाहिए- पहले अपराधियों द्वारा और फिर एक टूटी हुई व्यवस्था द्वारा। न्याय की तलाश में किसी भी हालत में पीड़ितों को दोबारा उसी पीड़ा से नहीं गुजरना चाहिए।  

हाई कोर्ट ने इन सखी केंद्रों में परामर्शकों की गैरमौजूदगी पर भी गहरी नाराजगी जताते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि सभी रिक्त पदों को तत्काल भरा जाए, सभी कर्मचारियों को समय पर वेतन मिले और इन केंद्रों में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाए। कोर्ट ने मई में दायर दिल्ली सरकार के हलफनामे का संज्ञान लेते हुए कहा कि वह इन उपायों से संतुष्ट नहीं है और दिल्ली पुलिस व सरकार को जो जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे नहीं उठाये गये। 

हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह हलफनामा दायर कर इस फैसले पर अमल सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2015 से सितंबर 2023 के बीच दिल्ली में कुल 11 केंद्रों सहित पूरे देश में 802 वन स्टॉप सेंटर चल रहे थे। इस खबर से संबंधित और जानकारी के लिए जितेंद्र परमार (8595950825)  से संपर्क करें।

Published / 2025-07-23 20:40:29
चाईबासा : उपडाकपाल को 20 हजार रिश्वत लेते सीबीआई ने किया गिरफ्तार

पहली किश्त के रूप में ले रहा था घूस 

एबीएन न्यूज नेटवर्क, चाईबासा। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले से रिश्वतखोरी का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मनोहरपुर उपडाकघर के उपडाकपाल को 20 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई मंगलवार को की गयी, जिसकी पुष्टि बुधवार को एजेंसी ने की है। 

सीबीआई ने जानकारी दी कि 21 जुलाई को उन्होंने इस उपडाकपाल के खिलाफ एक शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया था। शिकायत में कहा गया था कि आरोपी ने आवेदक से 1,18,000 रुपये की रिश्वत की मांग की थी। 

यह रकम आवेदक को आरडी (रेकरिंग डिपोजिट) कमीशन और एसएएस (स्मॉल सेविंग स्कीम) कमीशन के रूप में मिलने वाली राशि का एक बड़ा हिस्सा थी- 20 प्रतिशत आरडी कमीशन और 75 प्रतिशत एसएएस कमीशन के एवज में। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए सीबीआई ने जाल बिछाया और रिश्वत की पहली किश्त के रूप में 20 हजार रुपये लेते हुए उपडाकपाल को रंगेहाथ गिरफ्तार कर लिया। 

सीबीआई के अधिकारियों ने आरोपी को पकड़ने के लिए योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया था। जैसे ही आरोपी ने शिकायतकर्ता से तय की गयी रकम ली, अधिकारियों ने मौके पर दबिश देकर उसे पकड़ लिया। एजेंसी के मुताबिक, इस मामले की जांच फिलहाल जारी है और अन्य पहलुओं की भी छानबीन की जा रही है।

Published / 2025-07-14 22:05:00
15 जुलाई से बदल जायेगा बुकिंग का तरीका...

रेलवे के तत्काल टिकट में बड़ा बदलाव 

जानें नया सिस्टम कैसे करेगा काम 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। भारतीय रेलवे ने 15 जुलाई 2025 से तत्काल टिकट बुकिंग को और पारदर्शी, सुरक्षित और यात्रियों के लिए आसान बनाने के उद्देश्य से एक नया आधार ओटीपी आधारित सत्यापन लागू करने का फैसला किया है। भारतीय रेलवे दुनिया का चौथा सबसे बड़े ट्रेन नेटवर्क में से एक है, जिसका संचालन लाखों यात्रियों की रोजाना आवागमन की जिम्मेदारी संभालता है। 

तत्काल टिकट सिस्टम में हर बार सबसे पहले बॉट्स और एजेंट टिकट बुक कर लेते थे, जिससे असली यात्रियों को टिकट नहीं मिल पाता। इस नियम से एजेंट और बॉट्स की दौड़ शुरू होने के पहले 10 मिनट तक टिकट सिर्फ आधार-लिंक्ड यात्रियों को मिलेगा। रफ्तार और पारदर्शिता बढ़ेगी, और असली यात्री प्राथमिकता पाएंगे। 

15 जुलाई से क्या बदल जायेगा? 

आधार लिंक होना अनिवार्य: IRCTC ऐप/वेब के लिए अपना आधार अपने यूजर अकाउंट से पहले लिंक करें। OTP सत्यापन ज़रूरी: टिकट बुक करते समय आपका मोबाइल नंबर (जो आधार से जुड़ा है) में OTP आएगा। OTP के बिना बुकिंग नहीं होगी। 

एजेंटों पर रोक: टिकट बुकिंग विंडो खुलने के 30 मिनट तक एजेंट बुकिंग नहीं कर पाएंगे-सिर्फ आधार वेरिफाइड यूज़र्स को मौका मिलेगा।

पहली बुकिंग विंडो—10 मिनट का लाभ

जिन यूज़र्स का आधार पहले से लिंक नहीं है, उन्हें तुरंत लिंक करना होगा। लिंक करने वाले यात्रियों को शाम 10 मिनट की प्राथमिकता विंडो मिलेगी, जिससे टिकट मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।

महीने में कितनी टिकट बुक हो सकती हैं?

बिना आधार लिंक: माह में केवल 12 टिकट ही बुक कर पाएंगे। बाय-आधार लिंक: अब यह लिमिट बढ़कर 24 टिकट प्रति माह हो जाएगी।

कैसे लिंक करें IRCTC अकाउंट?

  • IRCTC में लॉग-इन करें
  • My Account- Authenticate User पर जाएं
  • आधार नंबर या वर्चुअल ID डालें
  • OTP से ऑथेंटिकेट करें, फिर सबमिट
  • सफल पॉप-अप आने पर आपका अकाउंट लिंक हो जाएगा

काउंटर बुकिंग में बदलाव

15 जुलाई से टिकट काउंटर पर भी आधार + OTP अनिवार्य होगा। जिस व्यक्ति के लिए टिकट हो, उसका आधार नंबर और OTP देना ज़रूरी होगा—भले ही टिकट आप किसी और के लिए करा रहे हों।

टिकट कंफर्म न हो तो?

तत्काल टिकट भी अगर कनफर्म नहीं होती है, तो ऑटोमैटिक कैंसल होती है। 2–3 दिनों में आपका रिफ़ंड IRCTC अकाउंट में आ जाएगा। अगर बुकिंग में अटकल लगे…IRCTC हेल्पलाइन: 139 या फिर नज़दीकी स्टेशन के टिकट काउंटर पर मदद लें। वहीं आधार संबंधित दिक्कतों के लिए UIDAI हेल्पलाइन: 1947 पर कॉल कर सकते हैं।

Published / 2025-07-11 19:35:59
झारखंड : शराब बेचने के लिए एक सितंबर से नयी उत्पाद नियमावली

झारखंड में 1 सितंबर से खुदरा शराब दुकानों पर लागू होगी नयी उत्पाद नियमावली 

टीम एबीएन, रांची। झारखंड में अब 1 सितंबर से निजी हाथों में शराब की खुदरा बिक्री का काम शिफ्ट हो जायेगा। उस दिन से झारखंड उत्पाद (मदिरा की खुदरा बिक्री हेतु दुकानों की बंदोबस्ती एवं संचालन) नियमावली, 2025 के तहत खुदरा उत्पाद दुकानों का संचालन होगा। उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग की ओर से इस बाबत अधिसूचना जारी कर दी गयी है। 

अब सवाल है कि क्या 1 सितंबर तक राज्य में शराब की सभी खुदरा दुकानें बंद रहेंगी। इसका जवाब है नहीं। अगर ऐसी बात है तो फिर ज्यादातर खुदरा शराब की दुकानें बंद क्यों हैं। इन सवालों का जवाब जानने के लिए एबीएन की टीम ने झारखंड शराब व्यापारी संघ के महासचिव सुबोध कुमार जायसवाल से बात की। 

1 सितंबर से इस व्यवस्था से होगी शराब की बिक्री 

सुबोध कुमार जायसवाल का कहना है कि आज से 45 दिनों के भीतर लॉटरी के जरिए निजी हाथों में शराब दुकानों के आवंटन की प्रक्रिया पूरी कर ली जायेगी। इससे पहले दुकानों के रेवेन्यू और टारगेट की लिस्ट तैयार होगी। उसी आधार पर आनलाइन लॉटरी होगी। उनके मुताबिक 15 अगस्त तक इस प्रक्रिया को पूरा करना है।

तबतक खुदरा दुकानों का संचालन झारखंड बिवरेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड के स्तर से किया जायेगा। इस दौरान मैनपावर की कमी की वजह से आधी से ज्यादा दुकानों के बंद रहने की संभावना है। फिलहाल, प्लेसमेंट एजेंसियों से जुड़े स्टॉफ के जरिए जेएसबीसीएल की देखरेख में दुकानें संचालित होगी।

Published / 2025-07-01 18:43:57
नयी शिक्षा नीति के बाद आज से नयी खेल नीति भी लागू

नई खेल नीति को मोदी कैबिनेट ने दी हरी झंडी, बैठक में लिए गए 4 बड़े फैसले 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। 1 जुलाई 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जिसमें देश के विकास और रोजगार से जुड़े कई अहम फैसले लिये गये। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि सरकार ने एंप्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव योजना, रिसर्च एंड डेवलपमेंट एवं इनोवेशन स्कीम, नेशनल स्पोर्ट्स पॉलिसी और परमाकुड़ी-रामनाथपुरम हाईवे के चौड़ीकरण को मंजूरी दी है। 

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि कैबिनेट ने परमाकुड़ी से रामनाथपुरम तक के नेशनल हाईवे को चार लेन करने की योजना को हरी झंडी दी है। यह लंबे समय से तमिलनाडु के कोस्टल इलाके के लोगों की बड़ी मांग थी। इस परियोजना से पंबन ब्रिज की कनेक्टिविटी भी बेहतर होगी। इस 46.7 किलोमीटर लंबे हाईवे के निर्माण की कुल लागत लगभग 1,853 करोड़ रुपये अनुमानित है। 

केंद्रीय मंत्री ने एंप्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव (ईएलआई) योजना के बारे में बताया कि इस योजना का उद्देश्य दो वर्षों में देश में 3.5 करोड़ से ज्यादा नये रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है। इसके लिए 99,446 करोड़ रुपये आवंटित किये गये हैं। 

इस योजना को दो भागों में बांटा गया है : 

  1. पहला हिस्सा : पहली बार नौकरी करने वालों को दो किस्तों में एक महीने का वेतन (?15,000 तक) दिया जाएगा। 
  2. दूसरा हिस्सा : नियोक्ताओं को प्रत्येक नए कर्मचारी के लिए कम से कम छह महीने तक निरंतर रोजगार देने पर दो साल तक हर महीने ?3,000 तक का प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में यह प्रोत्साहन तीसरे और चौथे वर्ष तक भी जारी रहेगा। 

रिसर्च डेवलपमेंट और इनोवेशन स्कीम की जानकारी 

अश्विनी वैष्णव ने रिसर्च डेवलपमेंट और इनोवेशन स्कीम के बारे में भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन (एएनआरएफ) को मंजूरी दे दी थी। एएनआरएफ ने इजरायल, अमेरिका, सिंगापुर और जर्मनी जैसे देशों के शोध कार्यक्रमों का गहन अध्ययन किया और उससे मिली सीख के आधार पर नई योजना तैयार की गयी है, जो देश में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देगी। 

राष्ट्रीय खेल नीति 2025 की मुख्य विशेषताएं 

नई राष्ट्रीय खेल नीति (एनएसपी) 2025, जो खेल नीति-2001 की जगह लेगी, भारत को खेल के क्षेत्र में विश्व स्तरीय महाशक्ति बनाने का लक्ष्य रखती है। इस नीति का उद्देश्य ओलंपिक 2036 और अन्य अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में देश की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करना है। एनएसपी-2025 तैयार करने में केंद्रीय मंत्रालयों, नीति आयोग, राज्य सरकारों, राष्ट्रीय खेल संघों, खिलाड़ियों, विशेषज्ञों और आम जनता की राय शामिल की गयी है। इस नीति के पांच मुख्य स्तंभ हैं। 

  1. वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन : यह नीति खेल संरचना को जमीनी स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक मजबूत बनाने पर केंद्रित है। प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षण, कोचिंग और खिलाड़ी विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। साथ ही खेल विज्ञान, चिकित्सा और तकनीकी उन्नति को बढ़ावा दिया जायेगा। कोच, अधिकारी और अन्य स्टाफ को भी प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा। 
  2. खेल के माध्यम से आर्थिक विकास : एनएसपी-2025 खेल पर्यटन को बढ़ावा देने, बड़े खेल आयोजनों के आयोजन और खेल उपकरणों के निर्माण एवं स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करने की योजना बनाती है। इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी, कॉपोर्रेट सामाजिक जिम्मेदारी और अन्य वित्तीय मॉडल के जरिये निजी निवेश को आकर्षित किया जायेगा। 
  3. सामाजिक समावेशन और विकास : इस नीति के तहत महिलाओं, कमजोर वर्गों, जनजातीय समुदायों और दिव्यांगों को खेलों में सक्रिय रूप से शामिल करने के लिए प्रेरित किया जायेगा। साथ ही पारंपरिक और स्थानीय खेलों के संरक्षण और प्रचार पर भी जोर दिया जायेगा। खेल को शिक्षा से जोड़कर इसे एक स्थायी कैरियर विकल्प बनाया जायेगा। 
  4. खेल को जन आंदोलन बनाना : राष्ट्रीय स्तर पर खेल को जन आंदोलन का रूप देने के लिए फिटनेस अभियान चलाने, स्कूलों और कार्यस्थलों में फिटनेस इंडेक्स लागू करने तथा खेल सुविधाओं की व्यापक पहुंच सुनिश्चित करने की योजना है।
  5. शिक्षा में खेल का समावेश : राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत खेल को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल करने और खेल शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण देने का प्रावधान किया गया है, जिससे खेल शिक्षा को बढ़ावा मिले।

Page 11 of 95

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

Tranding

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse