एबीएन सेंट्रल डेस्क। गैस आपूर्ति में संभावित बाधा और बढ़ती मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग के नियमों में आंशिक बदलाव किया है। साथ ही ई-केवाईसी नहीं कराने वाले उपभोक्ताओं की बुकिंग और सब्सिडी भी अस्थायी रूप से रोक दी गई है।
केंद्र सरकार ने एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग व्यवस्था में कुछ बदलाव किए हैं। नए नियमों के अनुसार अब शहरी क्षेत्रों में 25 दिन बाद और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन बाद ही गैस सिलेंडर की नई बुकिंग की जा सकेगी। बुकिंग करने के दो से तीन दिन के भीतर गैस की आपूर्ति कर दी जाएगी।
इसके लिए गैस कंपनियों के सॉफ्टवेयर में भी जरूरी बदलाव किए जा रहे हैं। जिन उपभोक्ताओं ने अभी तक ई-केवाईसी नहीं कराया है, उनकी गैस बुकिंग बंद कर दी गई है और सब्सिडी भी रोक दी गई है। हालांकि ई-केवाईसी की प्रक्रिया अभी भी जारी है। जो उपभोक्ता ई-केवाईसी करा लेंगे, वे पहले की तरह गैस सिलेंडर बुक कर सकेंगे।
जिले में अलग-अलग कंपनियों की कुल 14 गैस एजेंसियां काम कर रही हैं, जिनमें से आठ ग्रामीण वितरक हैं। इन एजेंसियों से जुड़े ग्रामीण उपभोक्ता अब 45 दिन बाद ही सिलेंडर बुक करा पाएंगे।
जिले में करीब 2 लाख 60 हजार एलपीजी उपभोक्ता हैं। इनमें लगभग 1 लाख 87 हजार उज्ज्वला योजना के कनेक्शनधारी हैं, जबकि करीब 73 हजार सामान्य कनेक्शन वाले उपभोक्ता हैं। उज्ज्वला योजना के कनेक्शनधारकों में ई-केवाईसी की रफ्तार अभी काफी धीमी है।
फिलहाल उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को साल में सात सिलेंडर पर सब्सिडी मिलती है, जबकि सामान्य कनेक्शन वालों को नौ सिलेंडर पर सब्सिडी दी जाती है। उज्ज्वला कनेक्शनधारकों को प्रति सिलेंडर 337 रुपये और सामान्य कनेक्शन वालों को 37 रुपये की सब्सिडी मिलती है।
जानकारों के मुताबिक फिलहाल गैस की वास्तविक कमी नहीं है और प्लांट में सामान्य दिनों की तरह ही गैस की बॉटलिंग हो रही है। युद्ध की आशंका के कारण लोगों ने पहले से ही गैस सिलेंडर जमा करना शुरू कर दिया, जिससे अस्थायी समस्या पैदा हुई।
जिन उपभोक्ताओं ने पहले ही ई-केवाईसी करा लिया है, उनकी बुकिंग सामान्य रूप से हो रही है। इस बीच कुछ लोग स्थिति का फायदा उठाकर गैस सिलेंडर की कालाबाजारी भी कर रहे हैं। शुक्रवार को कुछ जगहों पर गैस सिलेंडर 1500 रुपये तक में बेचे जाने की जानकारी मिली है।
प्रशासन ऐसे लोगों पर नजर रख रहा है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की तैयारी की जा रही है। इसके अलावा, कमर्शियल गैस की आपूर्ति बंद होने के बाद कुछ होटल और रेस्टोरेंट संचालकों द्वारा घरेलू एलपीजी सिलेंडर का उपयोग करने की भी शिकायतें मिली हैं। ऐसे मामलों में भी प्रशासन कार्रवाई करेगा।
एबीएन सेंट्रल डेस्क (नयी दिल्ली)। तेल विपणन कंपनियों ने होटल, रेस्त्रां तथा अन्य गैर-घरेलू उपभोक्ताओं के लिए रसोई गैस (एलपीजी) सिलेंडर की अपनी जरूरत सरकार द्वारा गठित समिति के समक्ष रखने के लिए ई-मेल आईडी जारी कर दिये हैं।
सरकार ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण आपूर्ति में आयी कमी को देखते हुए एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति पर लगाम लगाया है। घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता के आधार पर सिलेंडर देने का फैसला किया गया। गैर-घरेलू उपभोक्ताओं में अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों को आपूर्ति जारी रहेगी।
अन्य गैर-घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरत पर विचार करने के लिए सरकार ने तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। इस बात से संतुष्ट होने पर कि उपभोक्ता को रसोई गैस की अनिवार्य जरूरत है और उसे आपूर्ति की जानी चाहिये, समिति इसकी अनुमति देगी
टीम एबीएन, रांची। सात वर्षों तक चले लंबे कानूनी संघर्ष के बाद नागपुरी विषय के अभ्यर्थी डॉ। मनोज कच्छप को आखिरकार न्याय मिल गया। सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनकी नियुक्ति रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर नागपुरी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कर दी गई है। यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं।
झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) ने वर्ष 2018 में बैकलॉग और नियमित असिस्टेंट प्रोफेसर पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था। इस प्रक्रिया में नागपुरी विषय के अभ्यर्थी डॉ मनोज कच्छप ने भी आवेदन किया था। फरवरी 2020 में आयोग द्वारा जारी एकेडेमिक अंक में डॉ. कच्छप को अपने विषय में 85 में से 72.10 अंक मिले, जो नागपुरी विषय में सबसे अधिक थे।
उत्कृष्ट शैक्षणिक उपलब्धियों के बावजूद 23 नवंबर 2021 को जारी साक्षात्कार सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। जबकि वे गोल्ड मेडलिस्ट, नेट-जेआरएफ योग्यताधारी और शिक्षण अनुभव वाले अभ्यर्थी हैं। न्याय की मांग को लेकर उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की। अदालत के हस्तक्षेप के बाद उनका नाम साक्षात्कार सूची में जोड़ा गया।
मामले की सुनवाई के बाद 6 मार्च 2024 को झारखंड हाईकोर्ट ने डॉ. कच्छप के पक्ष में फैसला सुनाते हुए चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति देने का आदेश दिया। इसके बाद भी जेपीएससी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट की डबल बेंच में ले गया। डबल बेंच ने भी सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए आयोग पर एक लाख रुपये का जुमार्ना लगाया और दो सप्ताह के भीतर जॉइनिंग कराने का निर्देश दिया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 24 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अभ्यर्थी के पक्ष में निर्णय सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जेपीएससी ने परिणाम अधिसूचित किया और डॉ. मनोज कच्छप की नियुक्ति रांची विश्वविद्यालय के नागपुरी पीजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कर दी गयी।
फिलहाल नागपुरी पीजी विभाग में केवल एक स्थायी सहायक प्राध्यापक डॉ. उमेशनंद तिवारी, जो विभागाध्यक्ष भी हैं, कार्यरत हैं। इसके अलावा दो नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बीरेंद्र कुमार महतो और डॉ. रिझू नायक कार्य कर रहे हैं।
विभाग में पीजी छात्रों के साथ लगभग 40 शोधार्थी शोध कार्य कर रहे हैं। ऐसे में डॉ. मनोज कच्छप जैसे योग्य और संघर्षशील असिस्टेंट प्रोफेसर के आने से विभाग में शिक्षण और शोध कार्य को नयी गति मिलने की उम्मीद जतायी जा रही है। मौके पर विभाग के सहायक प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्रों ने डॉ. मनोज कच्छप को पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया। इनके ज्वाइनिंग से सभी लोग काफी खुश हुए।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। ईरान-इजराइल युद्ध और दुनियाभर में ईंधन की अनिश्चितता को देखते हुए घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की आपूर्ति में बदलाव किया गया है। अब कोई भी घरेलू उपभोक्ता पिछली डिलीवरी के 21 दिन बाद ही अगला सिलेंडर बुक कर सकेगा।
पहले यह अंतराल 15 दिन का था, लेकिन अस्थिर वैश्विक हालात को ध्यान में रखते हुए इसे बढ़ाकर 21 दिन कर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह है कि सभी घरेलू उपभोक्ताओं को समान रूप से गैस सिलेंडर की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने गैस एजेंसियों के सिस्टम (सॉफ्टवेयर) में बदलाव कर नई व्यवस्था लागू कर दी है।
महावीर गैस एजेंसी के संचालक देव नारायण महतो ने बताया कि अब 21 दिन के अंतराल के बाद ही दूसरा सिलेंडर बुक किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं को गैस डिलीवरी में कोई परेशानी नहीं होगी। यह अस्थायी व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते।
टीम एबीएन, रांची। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में आज कांके रोड, रांची स्थित मुख्यमंत्री आवासीय कार्यालय में झारखंड राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद की 36वीं बैठक संपन्न हुई। बैठक में राज्य के विभिन्न कारागारों में आजीवन सजा काट रहे 23 कैदियों को रिहा किये जाने से संबंधित निर्णय पर सहमति बनी।
बैठक में राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद द्वारा अनुशंसित नये मामलों के साथ साथ पिछली बैठकों में रिहाई से संबंधित अस्वीकृत किये गये 34 मामलों की भी गहन समीक्षा की गयी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य सजा पुनरीक्षण परिषद की अनुशंसा के आलोक में आजीवन सजा काट रहे 34 कैदियों के रिहाई प्रस्ताव पर बिंदुवार गहन विचार विमर्श किया, और अंतत: 23 कैदियों की रिहाई पर सहमति दी गयी।
मुख्यमंत्री ने कैदियों के अपराध की प्रवृत्ति, न्यायालयों, संबंधित जिलों के पुलिस अधीक्षकों, जेल अधीक्षकों एवं प्रोबेशन अधिकारियों द्वारा दिये गये मंतव्यों की समीक्षा करने के बाद यह सुनिश्चित किया कि रिहाई न्यायिक नियमों, सामाजिक सुरक्षा एवं कारा अधिनियमों के दृष्टिकोण से वैध और उचित रहे।
बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने रिहा होने वाले कैदियों के लिए एक व्यवस्थित डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि डायन बिसाही के आरोप में रहे कैदियों के साथ महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाया जाये।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि रिहा होने वाले कैदियों को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ा जाये, उनकी आय सृजन और सामाजिक पुनर्वास सुनिश्चित किया जाये, तथा जिला स्तर पर उनके जीवनयापन के लिए निर्धारित जिला समन्वयकों की विशेष जिम्मेदारी तय की जाये।
बैठक में मुख्य सचिव अविनाश कुमार, प्रधान सचिव, गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग वंदना दादेल, डीजीपी तदाशा मिश्रा, प्रधान सचिव विधि परामर्शी, विधि विभाग नीरज कुमार श्रीवास्तव, महानिरीक्षक, कारा एवं सुधारात्मक सेवाएं सुदर्शन प्रसाद मंडल, न्यायिक आयुक्त अनिल कुमार मिश्रा सहित अन्य अधिकारी उपस्थित थे।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। उद्योगपति अनिल अंबानी के मुंबई स्थित घर को अस्थाई रूप से कुर्क किया गया है। कुर्की की ये कार्रवाई प्रवर्तन निदेशालय (ED) की तरफ से की गई है। ईडी से जुड़ें सूत्रों के अनुसार इस घर की कीमत करीब 3,716 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
ईडी के अनुसार अनिल अंबानी और उनके समूह की कंपनियों के खिलाफ अब तक कुल अटैचमेंट की कार्रवाई ₹15,000 करोड़ से अधिक की हो चुकी है। आपको बता दें कि इस कार्रवाई से पहले बंबई उच्च न्यायालय ने उद्योगपति अनिल अंबानी को झटका देते हुए एकल पीठ के उस अंतरिम आदेश को सोमवार को रद्द कर दिया, जिसमें उनके एवं रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड के बैंक खातों को धोखाधड़ी वाला वर्गीकृत करने की कार्यवाही पर रोक लगाई गई थी।
मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अनखड़ की खंडपीठ ने सार्वजनिक क्षेत्र के तीन बैंक और लेखा परामर्श कंपनी बीडीओ इंडिया एलएलपी की, दिसंबर 2025 में पारित एकल पीठ के अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया था। खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए इसे अवैध एवं विकृत करार दिया था।
अनिल अंबानी के वकीलों ने उच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि आदेश पर रोक लगाई जाए ताकि वे उच्चतम न्यायालय का रुख कर सकें, लेकिन अदालत ने यह मांग ठुकरा दी। अंबानी एवं उनकी कंपनी को अंतरिम राहत देने वाले दिसंबर 2025 के आदेश को तीनों बैंक ने पिछले महीने चुनौती दी थी। उस आदेश में अनिवार्य भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए कहा गया था कि बैंक वर्षों बाद गहरी नींद से जागे हैं।
एकल पीठ ने इंडियन ओवरसीज बैंक, आईडीबीआई बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा की गई वर्तमान और भावी कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कहा था कि यह कार्रवाई कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण फोरेंसिक ऑडिट पर आधारित है और भारतीय रिजर्व बैंक के अनिवार्य दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करती है।
इन बैंक ने अपनी अपील में कहा कि जिस फोरेंसिक ऑडिट के आधार पर खातों को धोखाधड़ी वाला वर्गीकृत किया गया, वह कानूनी रूप से वैध था और उसमें धन की हेराफेरी एवं दुरुपयोग के गंभीर परिणाम सामने आए हैं जो बीडीओ इंडिया एलएलपी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में दर्ज है।
बैंकों ने साथ ही कहा कि अंबानी ने एकल पीठ के समक्ष फोरेंसिक ऑडिट को तकनीकी आधार पर चुनौती दी थी और खंडपीठ से एकल पीठ के अंतरिम आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया था। अनिल अंबानी ने एकल पीठ के समक्ष इंडियन ओवरसीज बैंक, आईडीबीआई बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी थी, जिनमें उनके और रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड के खातों को धोखाधड़ी खाता वर्गीकृत करने का प्रस्ताव था।
टीम एबीएन, रांची। सीएम हेमंत सोरेन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनके खिलाफ ईडी की कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। यह मामला कथित जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ चल रही ईडी की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही, ट्रायल कोर्ट में चल रही कार्यवाही को भी फिलहाल रोक दिया गया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने ईडी से कहा कि उन्होंने अखबारों में पढ़ा है कि एजेंसी बड़ी संख्या में बल्क शिकायतें दाखिल कर रही है। अदालत ने यह भी कहा कि एजेंसी को अपनी ताकत उन मामलों में लगानी चाहिए, जिनसे ठोस और सकारात्मक नतीजे निकलें। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अब तक इस मामले में उद्देश्य पूरा हो चुका है।
इससे पहले झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सोरेन की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिल गयी। हेमंत सोरेन कथित जमीन घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में करीब पांच महीने तक जेल में रहे थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद का गलत इस्तेमाल करते हुए रांची में सरकारी जमीन अपने नाम पट्टे पर करवाई। ईडी ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज कर जांच शुरू की थी।
एजेंसी का आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के जरिए सेना की जमीन बेची गयी। इस मामले मेंरांची नगर निगम ने प्राथमिकी दर्ज करायी थी, जिसके आधार पर ईडी ने जांच शुरू की। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ईडी की कार्रवाई पर रोक लग गयी है और हेमंत सोरेन को बड़ी राहत मिली है।
एबीएन सेंट्रल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करने के बाद खुशी व राहत की सांस लेते हुए नाबालिग पीड़िता की मां ने कहा कि इस आदेश से न्याय में उनका भरोसा बहाल हुआ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की तैयारी थी। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।
पीड़िता, जो घटना के समय सिर्फ 11 वर्ष की थी, की मां ने कहा, इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों व पीड़ितों की सुरक्षा कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि अब किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार का विश्वास दिलाने के लिए ठोकर नहीं खानी पड़ेगी और इस फैसले से उन बहुत सारे बच्चों को मदद मिलेगी जो आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जेआरसी तब उनके साथ खड़ा हुआ जब उन्हें लग रहा था कि वे असहाय हैं और कोई उनकी आवाज नहीं सुनेगा। उनके समर्थन से हम न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने की हिम्मत जुटा पाए।
नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज में दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। इस मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, यह कृत्य सिर्फ बलात्कार की तैयारी है और यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यह बलात्कार का प्रयास या बलात्कार है। इस फैसले के नतीजे में आरोपों की गंभीरता काफी कम हो गई।
बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी ज्यादा नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता की ओर से शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों में और अधिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध भी किया गया।
हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को निर्देश दिया कि वह यौन शोषण के संवेदनशील पीड़ितों से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता विकसित करने के उद्देश्य से एक समग्र व व्यापक दिशानिर्देश तय करने के लिए एक समिति गठित करे। कमेटी से तीन महीने में यह रिपोर्ट तैयार करने व सुप्रीम कोर्ट को सौंपने का अनुरोध किया गया है।
जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से पीड़िता की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने इसे ऐतिहासिक करार देते हुए कहा, यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरगामी फैसला है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विवेचना में पीड़ितों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है। इस फैसले के लिए हम खंडपीठ के आभारी हैं।” शीर्ष अदालत ने दिशानिर्देश तय करने में नेटवर्क से सुझाव भी मांगे हैं।
इसी बीच, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।
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