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ब्रिक्स अपनी सामूहिक आवाज को प्रभाव में कैसे बदले : डॉ सिमी मेहता

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ब्रिक्स अपनी सामूहिक आवाज को प्रभाव में कैसे बदले : डॉ सिमी मेहता
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  • 18वें ब्रिक्स अकादमिक मंच में पांकी विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ० कुशवाहा शशिभूषण मेहता जी की सुपुत्री डॉ सिमी मेहता ने वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व और संयुक्त राष्ट्र सुधार का प्रश्न प्रमुखता से उठाया 
  • लखनऊ का अकादमिक मंच 12-13 सितंबर को नयी दिल्ली में होने वाले 18वें इफकउर शिखर सम्मेलन की महत्वपूर्ण नीतिगत पूर्वपीठिका 

एबीएन न्यूज नेटवर्क, पलामू/ लखनऊ। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के अंतर्गत लखनऊ में आयोजित 18वें इफकउर अकादमिक मंच में इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएमपीआरआई) की ओर से डॉ सिमी मेहता ने सहभागिता की। मंच के विभिन्न अकादमिक एवं नीतिगत सत्रों में उन्होंने वैश्विक दक्षिण की भूमिका, बहुपक्षीय व्यवस्था के पुनर्गठन तथा संयुक्त राष्ट्र में आवश्यक सुधारों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों को विमर्श के केंद्र में रखा। 
23 से 25 अगस्त 2026 तक आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच का आयोजन आॅब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) द्वारा रिसर्च एंड इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) तथा लखनऊ विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया। इसमें इफकउर के सदस्य एवं साझेदार देशों सहित विभिन्न देशों के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति विशेषज्ञों और विचार संस्थानों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। मंच का केंद्रीय विषय लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण रहा। 

यह अकादमिक मंच भारत की वर्ष 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के व्यापक कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा। विशेष रूप से, इसे आगामी 18वें इफकउर शिखर सम्मेलन की बौद्धिक एवं नीतिगत पूर्वपीठिका के रूप में देखा जा सकता है। ब्रिक्स अकादमिक मंच विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और विचार संस्थानों के स्तर पर ऐसे विमर्श को आगे बढ़ाता है, जिसके निष्कर्ष और सिफारिशें आगे उच्चस्तरीय अंतर-सरकारी विचार-विमर्श में योगदान कर सकती हैं। इस वर्ष लखनऊ में इफकउर थिंक टैंक परिषद की सिफारिशें भारत के विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि को भी प्रस्तुत की गयी। 

भारत की अध्यक्षता के अंतर्गत 18वां इफकउर शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित होगा, जिसमें ब्रिक्स के सदस्य एवं साझेदार देशों के नेता तथा आमंत्रित देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे। भारत की अध्यक्षता का केंद्रीय विषय भी लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण है। इस दृष्टि से लखनऊ में हुआ अकादमिक विमर्श विशेष महत्व रखता है। यहां जिन विषयों और प्रश्नों पर विशेषज्ञ समुदाय ने विचार किया, वे अब नयी दिल्ली में राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों के उच्चस्तरीय विमर्श के व्यापक संदर्भ में प्रवेश कर रहे हैं। 

संयुक्त राष्ट्र सुधार पर उठाया मूल प्रश्न 

विभिन्न सत्रों में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करते हुए डॉ सिमी मेहता ने विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान संरचना और उसमें वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया। उन्होंने इस व्यापक विमर्श की ओर ध्यान आकृष्ट किया कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात निर्मित वैश्विक संस्थागत व्यवस्था आज की दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं से किस सीमा तक मेल खाती है। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील क्षेत्रों की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक प्रभाव में पिछले दशकों में व्यापक परिवर्तन आया है। इसके बावजूद वैश्विक निर्णय-निर्माण की प्रमुख संस्थाओं की संरचना अब भी बड़े पैमाने पर बीसवीं सदी के शक्ति-संतुलन को प्रतिबिंबित करती है। 

इसी संदर्भ में डॉ मेहता ने प्रश्न उठाया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की व्यवस्था पर चर्चा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या केवल वीटो के अधिकार का प्रश्न ही पर्याप्त है? मूल प्रश्न इससे कहीं व्यापक है- क्या आज की वैश्विक व्यवस्था में उन देशों और समाजों की आवाज वास्तव में उतनी प्रभावशाली है, जितनी उनकी जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और वैश्विक योगदान के अनुपात में होनी चाहिए? 

ब्रिक्स अपनी सामूहिक आवाज को प्रभाव में कैसे बदले? 

डॉ मेहता के हस्तक्षेप का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि यदि संयुक्त राष्ट्र में सुधार की प्रक्रिया लंबी और जटिल है, तो ब्रिक्स जैसे मंच वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज को किस प्रकार अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं? उन्होंने इस मूल प्रश्न को सामने रखा कि ब्रिक्स की शक्ति केवल उसके सदस्य देशों की संख्या, आर्थिक क्षमता या वैश्विक हिस्सेदारी में नहीं है। 

उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में निहित होगी कि वह वैश्विक दक्षिण की साझा प्राथमिकताओं को एक स्पष्ट नीतिगत दृष्टिकोण में परिवर्तित कर सके और उस दृष्टिकोण को वैश्विक निर्णय-निर्माण के मंचों तक प्रभावी ढंग से पहुंचा सके। अर्थात प्रश्न केवल यह नहीं है कि ब्रिक्स में कौन-कौन से देश शामिल हैं, बल्कि यह है कि ब्रिक्स की सामूहिक आवाज विश्व व्यवस्था को कितना प्रभावित कर सकती है। यही प्रश्न 12-13 सितंबर को नयी दिल्ली में होने वाले शिखर सम्मेलन के संदर्भ में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। शिखर सम्मेलन के व्यापक एजेंडे में वैश्विक शासन को सुदृढ़ करना और बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाना भी महत्वपूर्ण विषय हैं। 

बीसवीं सदी की संस्थाओं से इक्कीसवीं सदी की दुनिया का संचालन नहीं हो सकता 

18वें ब्रिक्स अकादमिक मंच में वैश्विक शासन के सुधार पर हुई चर्चा ने इस आवश्यकता को रेखांकित किया कि वर्तमान बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक समावेशी, प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। मंच के आधिकारिक विमर्श में भी वैश्विक शासन में सुधार को प्रमुख विषय के रूप में शामिल किया गया। डॉ मेहता का हस्तक्षेप इसी व्यापक प्रश्न पर केंद्रित रहा कि वर्तमान वैश्विक संस्थागत संरचनाएं क्या वास्तव में इक्कीसवीं सदी की बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हैं। 

उनके विचार-विमर्श का मूल आशय यह था कि संयुक्त राष्ट्र सुधार को केवल सुरक्षा परिषद में कुछ अतिरिक्त सीटों अथवा वीटो के पुनर्विन्यास तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह वैश्विक प्रतिनिधित्व, समानता, वैधता और निर्णय-निर्माण में विकासशील देशों की सार्थक भागीदारी का व्यापक प्रश्न है। यदि विश्व की राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताएं बदल चुकी हैं, तो वैश्विक संस्थाओं की संरचना भी उसी अनुरूप विकसित होनी चाहिए। अन्यथा इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का समाधान बीसवीं सदी में निर्मित संस्थागत संरचनाओं के माध्यम से करने की विसंगति बनी रहेगी। 

ब्रिक्स : आवाज से आगे, प्रभाव की ओर 

अकादमिक मंच की चचार्ओं में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि इफकउर का दायरा केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रह सकता। आर्थिक एवं जलवायु लचीलापन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार, सतत विकास, शिक्षा और कौशल के साथ-साथ वैश्विक शासन में सुधार भी इसके भविष्य के महत्वपूर्ण विषय हैं। समापन पर ब्रिक्स थिंक टैंक परिषद की सिफारिशें भारत के विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधि को प्रस्तुत की गयीं। इन सिफारिशों में आर्थिक एवं जलवायु लचीलेपन को सुदृढ़ करने, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी सहयोग को गहरा करने, सतत विकास को आगे बढ़ाने तथा अधिक समावेशी बहुपक्षीय व्यवस्था के निर्माण के लिए व्यावहारिक उपायों पर बल दिया गया। इस प्रकार लखनऊ का अकादमिक मंच केवल विचार-विमर्श का मंच नहीं रहा, बल्कि भारत की इफकउर अध्यक्षता के अंतर्गत नीतिगत विचारों, विशेषज्ञ सिफारिशों और उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय विमर्श के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में सामने आया। 

वैश्विक दक्षिण की आवाज से वैश्विक दक्षिण की शक्ति तक 

18वें ब्रिक्स अकादमिक मंच ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक दक्षिण अब केवल वैश्विक व्यवस्था का विषय नहीं है; वह वैश्विक व्यवस्था के पुनर्निर्माण का सक्रिय भागीदार है। डॉ सिमी मेहता ने आईएमपीआरआई का प्रतिनिधित्व करते हुए इस विचार को आगे बढ़ाया कि वैश्विक दक्षिण की आवाज को केवल घोषणाओं और वक्तव्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे नीतिगत प्रभाव, संस्थागत प्रतिनिधित्व और वैश्विक निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति में परिवर्तित करना होगा। 

12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की वर्ष 2026 की अध्यक्षता के अंतर्गत आयोजित विभिन्न अकादमिक, कूटनीतिक और नीतिगत प्रयासों का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस परिप्रेक्ष्य में लखनऊ का 18वां इफकउर अकादमिक मंच उस व्यापक प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण बौद्धिक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है, जिसने विशेषज्ञ समुदाय के विचारों और सिफारिशों को उच्चस्तरीय शिखर वार्ताओं से जोड़ने का कार्य किया। 

ब्रिक्स के आधिकारिक विवरण के अनुसार, लखनऊ का मंच शिखर सम्मेलन से पूर्व द्वितीय-पट्टी कूटनीति के महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्यरत रहा और इसमें 11 सदस्य एवं साझेदार देशों के 80 से अधिक विशेषज्ञ शामिल हुए। डॉ. सिमी मेहता की सहभागिता ने इसी मूल प्रश्न को विमर्श के केंद्र में रखा- दुनिया इक्कीसवीं सदी में पहुंच चुकी है। अब वैश्विक शासन की संस्थाएँ इक्कीसवीं सदी की वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व कब करेंगी? 

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