- विचार का विद्यालय...
- School of thought
त्रिवेणी दास
एबीएन एडिटोरियल डेस्क। एक ऐसा संस्थान जहां से विचारों का प्रवाह सतत प्रवाहित होता रहे और उन विचारों के आधार पर खड़ा कोई भी महल कभी भी ध्वस्त नहीं होता है।
1947 के पहले कांग्रेस स्वतंत्रता प्राप्ति की विचारधारा वाली संगठन थी और देश भर के नागरिकों ने स्वतंत्रता के विचारधारा को ही समर्थन दिया था। आजादी के बाद कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी के रूप में परिवर्तित कर दी गई, सत्ता उसकी विचारधारा बन गई। धीरे-धीरे जन सामान्य को विचारधारा नहीं दिखाई देने के कारण जनता का समर्थन नगण्य होते चला गया।
विचारधारा की पार्टी कही जाने वाली वामदल की पश्चिम बंगाल में लंबी अवधि तक सरकार रही लेकिन विचारधारा से अलग हटते हुए सत्ताधारियों ने भ्रष्ट एवं अराजक तत्वों को संरक्षण देना शुरू किया और मनमाने तरीके से सत्ता का संचालन किया, परिणाम स्वरूप नागरिकों ने उसका परित्याग कर दिया।
लगभग यही स्थिति ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल इत्यादि क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की भी हुई है। दूसरी और भारतीय जनता पार्टी ने अपने आप को विचार के विद्यालय का विद्यार्थी बनाए रखा है। एक विशेष प्रकार की विचारधारा पार्टी की रगों में प्रवाहित होती रहती है, जिसकी अनुभूति संगठन से जुड़े लोगों को होती रहती है।
नागरिकों को भी वह विचारधारा प्रभावित करती रहती है और परिणाम यह है कि आज भाजपा अपने विचारधारा के आधार पर सत्ता का संचालन करते हुए जनता के बीच आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। सत्ता से दूर होने पर राजनीतिक दलों में बिखराव देखने को मिल रहा है, इसके कारणों में विचारधारा का नहीं होना ही मूल कारण है।
सामान्य सामाजिक जीवन में भी भरोसा एवं विश्वसनीयता विचारधारा के आधार पर ही प्राप्त होते हैं। सूत्र बताते हैं कि आजीवन विचारधारा के विद्यालय का विद्यार्थी बनकर रहने में ही लाभ है.. अन्यथा एक बार भी यदि भरोसा टूटा तो फिर उसे पुनः प्राप्त करना लगभग असंभव हो जाता है। (लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं।)